नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और नंद बाबा की पगड़ी
सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी। गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और यशोदा मैया रसोई में नाश्ता बना रही थीं।
नंद बाबा आज गाँव के कुछ लोगों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपनी सबसे सुंदर पीली पगड़ी निकाली और उसे बड़े ध्यान से सिर पर बाँधा।
कान्हा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।
उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा—
“मेरे बाबा आज इतने सुंदर क्यों लग रहे हैं?”
दोस्त ने कहा—
“आज उन्हें गाँव की सभा में जाना है।”
कान्हा कुछ देर पगड़ी को देखते रहे।
फिर बोले—
“पगड़ी बहुत सुंदर है।”
दोस्त ने तुरंत कहा—
“कान्हा, इसे हाथ मत लगाना।”
कान्हा ने मासूमियत से पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तुमने कुछ किया तो बाबा नाराज होंगे।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“मैं कुछ नहीं करूँगा।”
दोस्त ने राहत की साँस ली।
लेकिन वह कान्हा को नहीं जानता था।
कान्हा ने मन ही मन एक योजना बना ली थी।
नंद बाबा तैयार होकर बाहर जाने लगे।
यशोदा ने उन्हें देखा और कहा—
“आज तो आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“अच्छा लगना जरूरी है। आज गाँव के बड़े लोग भी आएँगे।”
कान्हा तुरंत उनके पास पहुँचे।
“बाबा!”
“क्या हुआ बेटा?”
“आपकी पगड़ी मुझे भी पहननी है।”
नंद बाबा हँस पड़े।
“अभी नहीं। ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ी है।”
कान्हा ने पगड़ी को देखा।
“मैं छोटी कर लूँगा।”
नंद बाबा ने कहा—
“जब तुम बड़े हो जाओगे, तब अपनी पगड़ी पहनना।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
नंद बाबा बाहर चले गए।
कान्हा कुछ देर उन्हें जाते देखते रहे।
फिर उन्होंने अपने दोस्तों की तरफ देखा।
“चलो।”
एक दोस्त ने पूछा—
“कहाँ?”
“पगड़ी पहनने।”
सभी बच्चे हँस पड़े।
कान्हा दौड़ते हुए बाहर गए।
नंद बाबा कुछ दूर ही गए थे।
कान्हा उनके पीछे भागे।
“बाबा!”
नंद बाबा ने पीछे मुड़कर देखा।
“क्या हुआ?”
कान्हा हाँफते हुए उनके पास पहुँचे।
“आपकी पगड़ी ठीक नहीं है।”
नंद बाबा ने आश्चर्य से पूछा—
“क्या खराब है?”
कान्हा ने कहा—
“इसमें मोरपंख नहीं है।”
नंद बाबा हँसने लगे।
“पगड़ी में मोरपंख क्यों लगाऊँ?”
कान्हा ने अपने सिर की तरफ इशारा किया।
“मेरे सिर पर तो है।”
नंद बाबा बोले—
“वो तुम्हारे लिए है।”
कान्हा कुछ पल सोचते रहे।
फिर बोले—
“तो एक मेरे बाबा के लिए भी होना चाहिए।”
नंद बाबा ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा।
“तुम्हारा मन बहुत बड़ा है।”
कान्हा ने तुरंत अपना मोरपंख निकाल लिया।
“ये आप लगा लो।”
नंद बाबा ने कहा—
“नहीं बेटा, ये तुम्हें ही अच्छा लगता है।”
कान्हा बोले—
“मुझे अच्छा लगता है कि मेरे बाबा भी सुंदर लगें।”
नंद बाबा की आँखों में प्यार भर आया।
उन्होंने मोरपंख लिया और अपनी पगड़ी में लगा लिया।
कान्हा खुशी से बोले—
“अब आप बिल्कुल मेरे जैसे लग रहे हो!”
नंद बाबा हँस पड़े।
लेकिन तभी गाँव के दो आदमी वहाँ आ गए।
उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी में मोरपंख देखा।
एक ने मजाक में कहा—
“अरे नंद जी, आज तो आप कान्हा जैसे बन गए।”
दूसरा बोला—
“लगता है कान्हा ने आपको भी अपनी टोली में शामिल कर लिया।”
नंद बाबा हँस पड़े।
कान्हा गर्व से बोले—
“ये मेरे बाबा हैं।”
सब मुस्कुराने लगे।
कुछ देर बाद नंद बाबा गाँव की सभा में चले गए।
कान्हा अपने दोस्तों के साथ वापस घर आ गए।
लेकिन उनकी नजर अब भी पगड़ी पर थी।
एक दोस्त बोला—
“तुमने बाबा की पगड़ी में मोरपंख तो लगा दिया, लेकिन अब आगे क्या करोगे?”
कान्हा ने कहा—
“कुछ नहीं।”
दोस्त हँस पड़ा।
“फिर वही कुछ नहीं!”
कान्हा भी हँसने लगे।
उधर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।
“तुम अपने बाबा के पीछे क्यों गए थे?”
कान्हा ने कहा—
“बस ऐसे ही।”
“सच बताओ।”
“मैंने बाबा की पगड़ी में मोरपंख लगाया।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“अच्छा किया।”
कान्हा खुश हो गए।
“आप नाराज नहीं हुईं?”
“नहीं।”
कान्हा ने कहा—
“बाबा बहुत सुंदर लग रहे थे।”
यशोदा बोलीं—
“तुम्हें अपने बाबा बहुत प्यारे हैं ना?”
कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।
“बहुत।”
दोपहर तक नंद बाबा वापस लौट आए।
कान्हा दौड़कर उनके पास गए।
“बाबा!”
नंद बाबा ने उन्हें गोद में उठा लिया।
“क्या हुआ?”
“आपकी पगड़ी में मोरपंख अच्छा लगा?”
नंद बाबा ने कहा—
“बहुत अच्छा।”
कान्हा ने पूछा—
“सबने देखा?”
“हाँ।”
“क्या सबने कहा कि आप सुंदर लग रहे हो?”
नंद बाबा हँसते हुए बोले—
“सबने कहा कि मैं आज कान्हा जैसा लग रहा हूँ।”
कान्हा खुशी से हँसने लगे।
“तो फिर रोज लगाना।”
नंद बाबा बोले—
“रोज नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि नंद बाबा ने कान्हा की नकल करनी शुरू कर दी।”
कान्हा ने कहा—
“तो कहने दो।”
दोनों हँसने लगे।
शाम को नंद बाबा गायों को देखने जा रहे थे।
कान्हा उनके साथ चल दिए।
रास्ते में नंद बाबा ने पूछा—
“कान्हा, तुम मुझे मोरपंख क्यों देना चाहते थे?”
कान्हा कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“क्योंकि मुझे अच्छा लगता है जब मेरे बाबा खुश होते हैं।”
नंद बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“और मुझे खुशी तब होती है जब तुम मेरे साथ होते हो।”
कान्हा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
दोनों धीरे-धीरे गायों की तरफ बढ़ने लगे।
तभी एक गाय कान्हा के पास आ गई।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बाबा, ये आज उदास लग रही है।”
नंद बाबा ने गाय को देखा।
“शायद इसका बछड़ा दूसरी तरफ चला गया है।”
कान्हा तुरंत बोले—
“तो उसे बुला लेते हैं।”
उन्होंने आवाज लगाई।
कुछ ही देर में बछड़ा दौड़ता हुआ आया।
गाय उसे देखते ही शांत हो गई।
नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।
“तुम्हें सच में सबकी चिंता रहती है।”
कान्हा मुस्कुराए।
“सब हमारे अपने हैं।”
नंद बाबा ने कहा—
“ये बात हमेशा याद रखना।”
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।
कान्हा और नंद बाबा वापस घर लौट रहे थे।
दरवाजे पर यशोदा उनका इंतजार कर रही थीं।
उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी देखी और मुस्कुराईं।
“मोरपंख अभी तक लगा हुआ है?”
नंद बाबा बोले—
“इसे निकालने का मन ही नहीं हुआ।”
कान्हा खुशी से बोले—
“मैंने कहा था ना, अच्छा लगता है।”
यशोदा ने दोनों को पास बुलाया।
“मेरे दोनों नंदलाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”
नंद बाबा हँसे।
“एक ही काफी है।”
कान्हा बोला—
“नहीं बाबा, दो होने चाहिए।”
यशोदा ने दोनों को प्यार से देखा।
रात को कान्हा सोने के लिए अपनी माँ के पास गए।
यशोदा ने पूछा—
“आज क्या किया?”
कान्हा ने कहा—
“आज मैंने बाबा को सुंदर बनाया।”
“कैसे?”
“उनकी पगड़ी में मोरपंख लगाया।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“और कल?”
कान्हा ने आँखें बड़ी कर लीं।
“कल?”
“हाँ, कल क्या शरारत करोगे?”
कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।
“कुछ नहीं।”
यशोदा हँस पड़ीं।
“तुम्हारा ये ‘कुछ नहीं’ सुनकर ही मुझे डर लगता है।”
कान्हा माँ की गोद में सिर रखकर मुस्कुराने लगे।
लेकिन अगले दिन उनके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था।
नंद बाबा की पगड़ी के बाद अब उनकी नजर वृंदावन की सबसे ऊँची पेड़ की डाल पर लगे मीठे जामुनों पर थी।
और कान्हा ने तय कर लिया था कि वह अकेले जामुन नहीं खाएँगे…
पूरे ग्वाल-बालों को खिलाएँगे।
लेकिन जामुन तोड़ते समय जो होने वाला था, उसका अंदाजा किसी को नहीं था।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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