नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और जामुन के पेड़ की शरारत
वृंदावन की सुबह आज कुछ अलग ही थी। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए पेड़ों की पत्तियों पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। गलियों में मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी और गायें अपने बछड़ों के साथ धीरे-धीरे चरने निकल रही थीं।
कान्हा अपने दोस्तों के साथ नंद भवन के बाहर बैठे थे। उनके हाथ में छोटी सी लकड़ी थी, जिससे वह मिट्टी पर तरह-तरह की आकृतियाँ बना रहे थे।
तभी एक दोस्त दौड़ता हुआ आया।
“कान्हा! मैंने कुछ देखा है!”
कान्हा ने लकड़ी छोड़ दी।
“क्या?”
दोस्त ने कहा—
“गाँव के बाहर वाले बड़े जामुन के पेड़ पर बहुत सारे जामुन लगे हैं।”
कान्हा की आँखें चमक उठीं।
“सच?”
“हाँ। इतने सारे कि पूरा पेड़ काला दिखाई दे रहा है।”
दूसरा दोस्त बोला—
“लेकिन पेड़ बहुत ऊँचा है। हम जामुन तोड़ नहीं पाएँगे।”
कान्हा मुस्कुराए।
“पेड़ कितना भी ऊँचा हो, जामुन नीचे तो आने ही पड़ेंगे।”
एक दोस्त ने पूछा—
“कैसे?”
कान्हा ने आसपास देखा।
फिर बोले—
“चलो, पेड़ के पास।”
सभी बच्चे उनके पीछे चल पड़े।
कुछ ही देर में वे उस बड़े जामुन के पेड़ के पास पहुँच गए।
सचमुच पेड़ पर इतने जामुन लगे थे कि उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं।
कान्हा ने ऊपर देखा।
“वाह!”
एक दोस्त बोला—
“अब बताओ, इन्हें तोड़ेंगे कैसे?”
कान्हा ने पेड़ के तने को देखा।
“पहले मैं चढ़ूँगा।”
दोस्त बोला—
“तुम गिर गए तो?”
कान्हा हँसे।
“मैं गिरूँगा नहीं।”
वह पेड़ पर चढ़ने लगे।
पहली डाल तक पहुँचे।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
दोस्त नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।
कान्हा एक मजबूत डाल पर बैठ गए।
उन्होंने जामुन तोड़े और नीचे फेंकने लगे।
“पकड़ो!”
नीचे खड़े बच्चे खुशी से जामुन पकड़ने लगे।
किसी ने अपनी धोती में जामुन बाँध लिए।
किसी ने पत्तों से छोटी टोकरी बना ली।
कान्हा ऊपर से जामुन तोड़ते रहे।
लेकिन तभी एक शरारती दोस्त ने नीचे से कहा—
“कान्हा! सबसे बड़े जामुन तो अपने लिए रख लेना।”
कान्हा बोले—
“नहीं! सब बराबर मिलेंगे।”
उन्होंने एक बड़ा जामुन तोड़ा और नीचे फेंक दिया।
एक बच्चा उसे पकड़ने के लिए दौड़ा।
लेकिन जामुन उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया।
सभी बच्चे हँस पड़े।
वह बच्चा बोला—
“मेरा जामुन!”
कान्हा ऊपर से बोले—
“कोई बात नहीं। दूसरा दूँगा।”
उन्होंने उसके लिए एक और जामुन तोड़कर नीचे फेंका।
इस बार बच्चे ने दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“मिल गया!”
सब हँसने लगे।
तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—
“अरे! तुम लोग वहाँ क्या कर रहे हो?”
बच्चे अचानक शांत हो गए।
कान्हा ने नीचे देखा।
एक गोपी हाथ में टोकरी लिए उनकी तरफ आ रही थी।
वह बोली—
“ये जामुन का पेड़ किसने तोड़ना शुरू कर दिया?”
कान्हा नीचे उतरते हुए बोले—
“हम तो बस कुछ जामुन ले रहे थे।”
गोपी ने कहा—
“कुछ? तुम्हारे पास तो पूरी टोकरी है!”
कान्हा ने अपनी टोकरी देखी।
वह सच में भर चुकी थी।
उन्होंने मासूम चेहरा बनाया।
“हम अकेले नहीं खाएँगे।”
गोपी ने पूछा—
“तो किसके लिए?”
कान्हा ने आसपास के बच्चों की तरफ इशारा किया।
“सबके लिए।”
गोपी का गुस्सा थोड़ा कम हो गया।
उसने कहा—
“ठीक है, लेकिन पेड़ की डालियाँ मत तोड़ना।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“नहीं तोड़ेंगे।”
तभी ऊपर बैठे एक बच्चे का पैर फिसला।
“कान्हा!”
कान्हा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
बच्चा डर गया था।
कान्हा ने कहा—
“डरो मत। धीरे-धीरे नीचे आओ।”
उन्होंने उसे सुरक्षित नीचे उतारा।
गोपी ने यह देखा तो बोली—
“कान्हा, शरारत करते हो लेकिन अपने दोस्तों का ध्यान भी रखते हो।”
कान्हा मुस्कुराए।
“दोस्त हैं तो ध्यान रखना पड़ेगा।”
सभी बच्चे जामुन लेकर बैठ गए।
कान्हा ने एक जामुन उठाया और खाने लगे।
उनके होंठ और जीभ बैंगनी हो गए।
एक दोस्त उन्हें देखकर हँस पड़ा।
“कान्हा! तुम्हारी जीभ देखो!”
कान्हा ने अपनी जीभ बाहर निकाली।
“तुम्हारी भी तो ऐसी ही है।”
सभी बच्चे अपनी-अपनी जीभ देखने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।
कुछ देर बाद वे जामुन लेकर घर की ओर लौटे।
कान्हा ने सोचा कि आज यशोदा मैया को भी जामुन खिलाएँगे।
घर पहुँचते ही उन्होंने आवाज लगाई—
“मैया!”
यशोदा रसोई से बाहर आईं।
उन्होंने कान्हा का चेहरा देखा और हैरान रह गईं।
“ये क्या हाल बना रखा है?”
कान्हा ने कहा—
“जामुन खाए हैं।”
यशोदा ने उनके गाल देखे।
“तुम्हारा पूरा मुँह बैंगनी हो गया।”
कान्हा हँस पड़े।
“मैया, आपको भी दूँ?”
यशोदा बोलीं—
“पहले ये बताओ कि जामुन कहाँ से लाए?”
कान्हा ने टोकरी आगे कर दी।
“पेड़ से।”
“किसकी अनुमति से?”
कान्हा चुप हो गए।
यशोदा ने समझ लिया।
“फिर से बिना पूछे?”
कान्हा बोले—
“मैया, हम बहुत सारे नहीं तोड़े।”
यशोदा ने टोकरी देखी।
“ये तुम्हारे हिसाब से थोड़े हैं?”
कान्हा हँसने लगे।
“हमने सबमें बाँट दिए।”
तभी पीछे से नंद बाबा आ गए।
उन्होंने पूछा—
“क्या बाँटा?”
यशोदा ने कहा—
“आपका बेटा आज जामुन का पूरा पेड़ बाँट आया।”
नंद बाबा हँस पड़े।
उन्होंने कान्हा से पूछा—
“किसी को नुकसान तो नहीं हुआ?”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“नहीं बाबा। हमने डालियाँ नहीं तोड़ीं।”
नंद बाबा ने कहा—
“तो ठीक है। लेकिन अगली बार पेड़ से फल लेने से पहले उसके मालिक से पूछ लेना।”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“ठीक है बाबा।”
फिर उन्होंने टोकरी से सबसे बड़ा जामुन उठाया और नंद बाबा को दे दिया।
“ये आपके लिए।”
नंद बाबा ने जामुन लिया।
“मेरे लिए?”
“हाँ।”
फिर कान्हा ने दूसरा जामुन यशोदा को दिया।
“ये आपके लिए।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“मेरे लिए इतना बड़ा?”
“आपको सबसे बड़ा मिलना चाहिए।”
यशोदा ने जामुन खाया और बोलीं—
“बहुत मीठा है।”
कान्हा खुशी से बोले—
“मैंने कहा था ना!”
उस शाम कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में बैठे थे।
एक दोस्त ने पूछा—
“कान्हा, कल क्या करेंगे?”
कान्हा ने कहा—
“कल?”
“हाँ।”
कान्हा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।
कुछ देर सोचकर बोले—
“कल हम नदी किनारे खेलेंगे।”
एक दोस्त ने कहा—
“वहाँ क्या करेंगे?”
कान्हा मुस्कुराए।
“अभी नहीं बताऊँगा।”
सभी बच्चे बोले—
“क्यों?”
“क्योंकि फिर तुम सब आज ही सोचना शुरू कर दोगे।”
सब हँस पड़े।
यशोदा दूर से बच्चों की बातें सुन रही थीं।
उन्होंने कान्हा को आवाज लगाई—
“अब घर आ जाओ।”
कान्हा बोले—
“आ रहा हूँ मैया।”
वह दोस्तों के साथ अंदर जाने लगे।
लेकिन जाते-जाते उन्होंने पीछे मुड़कर उस जामुन के पेड़ की तरफ देखा।
हवा से उसकी डालियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
कान्हा मुस्कुराए।
उन्हें लगा जैसे पेड़ भी उनसे कह रहा हो—
“कल फिर आना।”
अगले दिन कान्हा सचमुच यमुना किनारे गए।
लेकिन वहाँ उन्हें एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी, जिसे देखकर उनकी सारी शरारतें कुछ देर के लिए भूल जानी थीं।
यमुना किनारे एक छोटा घायल पक्षी पड़ा था।
कान्हा ने उसे देखा तो तुरंत अपने दोस्तों से कहा—
“इसे घर ले चलो।”
और यहीं से शुरू हुई कान्हा की एक ऐसी बाल लीला, जिसमें पहली बार उनके दोस्तों ने देखा कि उनका नटखट कान्हा किसी छोटे से जीव का दर्द देखकर कितना परेशान हो जाता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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