नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
अध्याय कान्हा और नन्ही चिड़िया
सुबह होते ही कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँच गए। कल उन्होंने तय किया था कि आज वहाँ खूब खेलेंगे, लेकिन जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, कान्हा की नजर घास के बीच किसी छोटी सी चीज पर पड़ी।
उन्होंने कदम रोक दिए।
“रुको!”
सभी बच्चे रुक गए।
कान्हा धीरे-धीरे उस जगह पहुँचे। वहाँ एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। वह उड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार अपने पंख समेटकर नीचे बैठ जाती।
कान्हा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए।
“क्या हुआ तुम्हें?”
चिड़िया ने गर्दन हिलाई।
कान्हा ने उसे हाथ लगाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस ध्यान से देखा।
एक दोस्त बोला—
“शायद इसे चोट लगी है।”
कान्हा ने धीरे से कहा—
“हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”
दूसरे दोस्त ने पूछा—
“अब क्या करें?”
कान्हा कुछ देर सोचते रहे।
“इसे पानी चाहिए होगा।”
उन्होंने अपनी छोटी कटोरी में थोड़ा पानी भरा और चिड़िया के पास रख दिया।
चिड़िया पहले तो पीछे हट गई, लेकिन कुछ देर बाद धीरे-धीरे पानी पीने लगी।
कान्हा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“देखा? इसे प्यास लगी थी।”
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, इसे घर ले चलते हैं।”
कान्हा ने कहा—
“अगर इसकी माँ इसे ढूँढ़ रही होगी तो?”
सभी बच्चे चुप हो गए।
कान्हा ने आसपास देखा।
“पहले इसकी माँ को ढूँढ़ेंगे।”
वे पेड़ों की तरफ देखने लगे।
कान्हा ने चिड़िया की आवाज की नकल की।
“चीं… चीं…”
एक दोस्त हँस पड़ा।
“तुम चिड़िया की आवाज निकाल रहे हो?”
कान्हा बोले—
“अगर इससे इसकी माँ आ गई तो?”
उन्होंने फिर आवाज निकाली।
कुछ देर बाद ऊपर पेड़ से एक चिड़िया की आवाज सुनाई दी।
कान्हा ने ऊपर देखा।
“शायद इसकी माँ है।”
उन्होंने नीचे बैठी चिड़िया को देखा।
वह भी ऊपर की ओर देखने लगी।
कान्हा ने कहा—
“हाँ, यही है।”
लेकिन समस्या यह थी कि छोटी चिड़िया उड़ नहीं पा रही थी।
कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—
“इसे पेड़ के नीचे ले चलते हैं।”
सब बच्चे सावधानी से उसके पास बैठ गए।
कान्हा ने पत्तों की मदद से उसके लिए छोटी सी जगह बनाई।
फिर बोले—
“अब इसकी माँ नीचे आएगी।”
कुछ देर बाद ऊपर वाली चिड़िया नीचे की डाल पर आकर बैठ गई।
वह लगातार आवाज कर रही थी।
कान्हा मुस्कुराए।
“देखो, इसकी माँ इसे बुला रही है।”
एक दोस्त बोला—
“लेकिन ये ऊपर कैसे जाएगी?”
कान्हा ने कहा—
“जब इसके पंख ठीक होंगे, तब उड़ जाएगी। अभी इसे आराम चाहिए।”
कान्हा ने पास की झाड़ियों से कुछ नरम पत्ते लाकर उसके आसपास रख दिए।
फिर वह वहीं बैठ गए।
दोस्तों ने पूछा—
“तुम यहीं बैठे रहोगे?”
कान्हा ने कहा—
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसे डर लग रहा है।”
कुछ देर बाद चिड़िया शांत हो गई।
कान्हा ने धीरे से बांसुरी निकाली।
उन्होंने बहुत धीमी धुन बजानी शुरू की।
आसपास का वातावरण शांत हो गया।
ऊपर बैठी चिड़िया भी कुछ देर चुप रही।
एक दोस्त ने धीरे से कहा—
“लगता है इसे तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”
कान्हा मुस्कुराए।
“शायद।”
कुछ समय बाद छोटी चिड़िया ने अपने पंख हिलाए।
कान्हा तुरंत खुश हो गए।
“देखो! ये कोशिश कर रही है।”
उसने फिर पंख फैलाए, लेकिन इस बार भी उड़ नहीं पाई।
कान्हा ने कहा—
“कोई बात नहीं। जल्दी नहीं करनी चाहिए।”
एक दोस्त ने पूछा—
“तुम्हें कैसे पता?”
कान्हा ने कहा—
“हर किसी को ठीक होने में अपना समय लगता है।”
बच्चे चुप हो गए।
दोपहर होने लगी।
यशोदा मैया को चिंता होने लगी कि कान्हा अभी तक घर क्यों नहीं आया।
उन्होंने नंद बाबा से कहा—
“आज फिर बहुत देर हो गई।”
नंद बाबा मुस्कुराए।
“तुम्हारा कान्हा कहीं न कहीं कोई नई कहानी बना रहा होगा।”
उधर कान्हा अभी भी चिड़िया के पास बैठे थे।
तभी एक दोस्त ने कहा—
“कान्हा, अब घर चलें?”
कान्हा ने चिड़िया की तरफ देखा।
“थोड़ी देर और।”
अचानक छोटी चिड़िया ने अपने पंख फैलाए।
वह पहले एक छोटी सी छलांग लगाकर पास की डाल तक पहुँची।
कान्हा खुशी से खड़े हो गए।
“उड़ गई!”
सभी बच्चे खुश हो गए।
चिड़िया थोड़ी देर डाल पर बैठी रही।
फिर उसने अपने पंख फैलाए और ऊपर अपनी माँ की तरफ उड़ गई।
ऊपर बैठी बड़ी चिड़िया भी उसके साथ उड़ गई।
कान्हा उन्हें देखते रहे।
उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, तुमने इसे बचा लिया।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“नहीं। इसकी माँ ने इसे बचाया। हमने बस थोड़ा इंतजार किया।”
सभी बच्चे वापस घर की तरफ चल पड़े।
रास्ते में कान्हा अचानक रुक गए।
एक दोस्त ने पूछा—
“क्या हुआ?”
कान्हा बोले—
“हम इसके लिए कुछ लेकर नहीं गए।”
“क्या?”
“इसके लिए दाना।”
एक दोस्त हँस पड़ा।
“अब तो वो उड़ गई।”
कान्हा भी हँसने लगे।
घर पहुँचते ही यशोदा मैया ने कान्हा को देखते ही पूछा—
“इतनी देर कहाँ थे?”
कान्हा उनके पास बैठ गए।
“मैया, आज हमें एक छोटी चिड़िया मिली थी।”
यशोदा का चेहरा नरम हो गया।
“क्या हुआ था उसे?”
कान्हा ने पूरी बात बताई।
यशोदा ध्यान से सुनती रहीं।
जब कान्हा ने बताया कि वह चिड़िया अपनी माँ के पास उड़ गई, तो यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।
“मेरे कान्हा ने आज अच्छा काम किया।”
कान्हा ने कहा—
“मैया, वो बहुत छोटी थी। उसे अकेला देखकर अच्छा नहीं लगा।”
यशोदा बोलीं—
“तुम्हें हर छोटे जीव की चिंता होती है।”
कान्हा मुस्कुराए।
“क्योंकि वो बोल नहीं सकते।”
यशोदा कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा—
“जो बोल नहीं सकता, उसके दर्द को समझना बहुत बड़ी बात है।”
कान्हा माँ की तरफ देखने लगे।
“मैया, अगर किसी को हमारी जरूरत हो और हम मदद न करें तो?”
यशोदा बोलीं—
“जहाँ तक हो सके, मदद करनी चाहिए।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“मैं हमेशा करूँगा।”
शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ फिर बाहर बैठे।
एक दोस्त ने कहा—
“आज तुमने कोई शरारत नहीं की।”
कान्हा बोले—
“क्यों?”
“क्योंकि तुम पूरा दिन चिड़िया के साथ बैठे रहे।”
कान्हा हँस पड़े।
“हर दिन शरारत करना जरूरी है क्या?”
दोस्त बोला—
“तुम्हारे लिए तो है।”
सभी बच्चे हँसने लगे।
कान्हा ने अचानक मिट्टी से एक छोटी सी चिड़िया बनाई।
उन्होंने उसे अपने सामने रखा।
“देखो, ये हमारी दोस्त है।”
एक दोस्त बोला—
“ये तो मिट्टी की है।”
कान्हा बोले—
“लेकिन याद तो असली वाली की दिलाएगी।”
शाम की हवा चल रही थी।
दूर आसमान में कई पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
कान्हा उन्हें देखते हुए मुस्कुराते रहे।
तभी ऊपर से एक छोटी चिड़िया उनके पास से उड़ती हुई गुजरी।
कान्हा ने उसे पहचान लिया।
“देखो!”
दोस्तों ने ऊपर देखा।
कान्हा बोले—
“यही है!”
चिड़िया एक पल के लिए पास की डाल पर बैठी और फिर उड़ गई।
कान्हा ने हाथ हिलाकर कहा—
“फिर मिलना!”
उस दिन कान्हा ने अपने दोस्तों को एक छोटी सी बात समझाई—
“किसी की मदद करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा पानी, थोड़ा इंतजार और थोड़ा प्यार भी किसी के लिए बहुत होता है।”
सभी बच्चे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे।
लेकिन अगले ही पल कान्हा ने मिट्टी की चिड़िया उठाई और दोस्त के सिर पर रख दी।
“अब तुम चिड़िया बनो!”
दोस्त चौंक गया।
“क्या?”
कान्हा हँसते हुए भागने लगे।
“पकड़ो मुझे!”
सारे बच्चे उनके पीछे दौड़ पड़े।
यशोदा ने दूर से यह देखा और मुस्कुराईं।
“मेरा कान्हा फिर अपनी शरारत पर लौट आया।”
लेकिन उस दिन की शरारत में भी एक मिठास थी।
क्योंकि कान्हा ने अपने दोस्तों को सिखाया था कि खेल और हँसी के साथ-साथ किसी छोटे और कमजोर जीव के लिए दया रखना भी जरूरी है।
और वृंदावन की उस शाम को कान्हा की बांसुरी की आवाज के साथ पेड़ों पर बैठे पक्षी भी जैसे खुशी से चहक रहे थे।
लेकिन अगले दिन कान्हा को एक नई परेशानी मिलने वाली थी—यशोदा मैया ने घर में बहुत सारी मिश्री बनाई थी, और कान्हा के दोस्तों को इसकी खबर लग चुकी थी।
अब शुरू होने वाली थी मिश्री की सबसे मीठी चोरी!

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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