बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया — भाग 1
आसमान के बहुत ऊपर, नीले आकाश के बीच सफेद-सफेद बादलों का एक बड़ा सा गुच्छा रहता था। उसका नाम था बादलू। बादलू बाकी बादलों से थोड़ा अलग था। वह बहुत चंचल था, हर समय इधर-उधर घूमता रहता और नई-नई जगहें देखने का सपना देखता था।
उसका सबसे अच्छा दोस्त था धवल, जो हमेशा उसे समझाता था।
“बादलू, ज्यादा दूर मत जाना। हवा कभी भी अपना रुख बदल सकती है।”
बादलू हँसकर कहता, “अरे धवल, मैं कोई छोटा बच्चा थोड़ी हूँ। देखना, एक दिन मैं पूरे आसमान की सैर करके आऊँगा।”
उनका पूरा बादलों का परिवार एक साथ रहता था। सुबह सूरज निकलता तो बादल चमकने लगते। शाम को आसमान नारंगी हो जाता तो सभी बादल एक-दूसरे के पास आकर दिनभर की बातें करते।
बादलू को अपने साथियों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता था—
“आखिर आसमान के उस पार क्या है?”
एक दिन हवा बहुत तेज चल रही थी।
धवल ने कहा, “आज कहीं मत जाना। हवा बहुत तेज है।”
बादलू बोला, “बस थोड़ी दूर तक जाऊँगा। फिर वापस आ जाऊँगा।”
वह धीरे-धीरे अपने साथियों से अलग होकर आगे बढ़ने लगा।
शुरुआत में सब ठीक था।
हवा उसे हल्के-हल्के आगे ले जा रही थी। बादलू नीचे धरती को देखकर खुश हो रहा था।
नीचे हरे-भरे खेत थे, छोटी-छोटी नदियाँ थीं और गांवों के बीच बने घर खिलौनों जैसे लग रहे थे।
“वाह! दुनिया तो कितनी बड़ी है!” बादलू ने कहा।
लेकिन तभी हवा अचानक बहुत तेज हो गई।
बादलू संभल नहीं पाया।
“अरे! रुको!”
हवा उसे तेजी से अपने साथ बहाकर दूर ले गई।
बादलू ने पीछे मुड़कर देखा।
उसके साथी अब बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे।
“धवल!”
उसने जोर से आवाज लगाई।
लेकिन तेज हवा में उसकी आवाज कहीं खो गई।
कुछ ही देर में उसके साथी पूरी तरह दिखाई देना बंद हो गए।
अब बादलू अकेला था।
पहली बार उसे अपने फैसले पर पछतावा हुआ।
“काश मैंने धवल की बात मान ली होती।”
हवा उसे एक अनजान इलाके में ले गई।
वहाँ आसमान बहुत साफ था। आसपास कोई दूसरा बादल नहीं था।
बादलू ने चारों तरफ देखा।
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
कुछ समय बाद उसे नीचे एक छोटा सा गांव दिखाई दिया।
गांव के लोग आसमान की ओर देख रहे थे।
बादलू ने ध्यान से देखा तो खेत सूखे हुए थे।
तालाब में पानी बहुत कम था।
पेड़ों के पत्ते भी मुरझाए हुए थे।
एक छोटी बच्ची अपने पिता से पूछ रही थी—
“पिताजी, बारिश कब होगी?”
पिता ने उदास होकर कहा—
“पता नहीं बेटी। अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”
बादलू को बहुत दुख हुआ।
वह खुद भी बारिश का बादल था, लेकिन इस समय उसके पास बारिश करने जितना पानी नहीं था।
फिर भी उसने कोशिश की।
वह गांव के ऊपर जाकर रुका और अपने अंदर जमा थोड़ी-सी नमी को बूंदों में बदलने लगा।
टप…
एक बूंद नीचे गिरी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
बच्ची ने आसमान की ओर देखा।
“बारिश!”
लोग खुशी से बाहर आ गए।
बादलू ने जितना पानी उसके पास था, सब बरसा दिया।
लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी सारी नमी खत्म हो गई।
वह फिर हल्का होकर आसमान में तैरने लगा।
गांव में लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखकर उसे खुशी हुई।
लेकिन उसके मन में अपने साथियों की याद और भी बढ़ गई।
“अगर धवल यहाँ होता तो मैं उसे बताता कि मैंने आज किसी की मदद की।”
उसी समय एक बूढ़ा पेड़ हवा में झूमते हुए बोला—
“बादल, तुम उदास क्यों हो?”
बादलू चौंक गया।
“आपने मुझे देखा?”
पेड़ हँसा।
“मैंने तुम्हें आते हुए देखा था। तुम बाकी बादलों जैसे नहीं हो। तुम्हारे चेहरे पर खुशी भी है और चिंता भी।”
बादलू ने अपनी पूरी कहानी पेड़ को बता दी।
पेड़ ने कहा—
“कभी-कभी रास्ता भटकना भी जरूरी होता है। इससे हमें पता चलता है कि हम वास्तव में किसके लिए बने हैं।”
बादलू बोला—
“लेकिन मुझे अपने साथियों के पास वापस जाना है।”
पेड़ ने कहा—
“तो रास्ता खोजो। मगर याद रखना, हवा को सिर्फ दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास भी पहुँचा सकती है।”
बादलू ने उम्मीद से आसमान की तरफ देखा।
उसी समय दूर से ठंडी हवा आई।
बादलू ने महसूस किया कि यह हवा बाकी हवाओं से अलग थी।
वह एक दिशा में लगातार बह रही थी।
“शायद यही रास्ता है!”
बादलू हवा के साथ आगे बढ़ गया।
कई घंटे बीत गए।
लेकिन उसके साथी कहीं दिखाई नहीं दिए।
अचानक आसमान में काले बादल छाने लगे।
बादलू डर गया।
उसने देखा कि बिजली चमक रही थी।
तेज हवा और गरज ने पूरे आसमान को घेर लिया।
वह पीछे हटने की कोशिश करने लगा, लेकिन तूफान ने उसे अपने बीच खींच लिया।
“मैं कहाँ आ गया?”
बादलू चारों तरफ घूम रहा था।
उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी बिजली चमकी और उसे दूर एक बड़ी सी सफेद आकृति दिखाई दी।
वह कोई पहाड़ नहीं था।
वह बादलों का एक विशाल समूह था।
बादलू ने उम्मीद से पुकारा—
“क्या मेरे साथी वहाँ हैं?”
लेकिन तूफान की आवाज इतनी तेज थी कि उसे कोई जवाब नहीं मिला।
वह उस विशाल बादल समूह की तरफ बढ़ने लगा।
जैसे ही वह पास पहुँचा, उसे एक परिचित आवाज सुनाई दी—
“बादलू!”
बादलू अचानक रुक गया।
यह आवाज…
यह तो धवल की थी!
उसने पूरी ताकत से पुकारा—
“धवल!”
तूफान के बीच से जवाब आया—
“बादलू, तुम कहाँ थे?”
बादलू खुशी से भर गया।
लेकिन तभी तेज हवा ने दोनों को फिर अलग-अलग दिशाओं में धकेल दिया।
“धवल!”
“बादलू!”
दोनों एक-दूसरे को पुकारते रहे।
लेकिन तूफान और तेज होता गया।
और तभी बादलू ने देखा कि धवल के पीछे उसका पूरा बादलों का परिवार मौजूद था।
वे सभी उसे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक पहुँच गए थे।
लेकिन उनके बीच एक बड़ी काली आँधी खड़ी थी।
बादलू ने सोचा—
“क्या मैं अपने साथियों तक पहुँच पाऊँगा?”
उसे नहीं पता था कि अगले कुछ पल उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाले थे।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं