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टैग: #बच्चों कि कहानी

  • बादलों का गुच्छा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया — भाग 1

     

    आसमान के बहुत ऊपर, नीले आकाश के बीच सफेद-सफेद बादलों का एक बड़ा सा गुच्छा रहता था। उसका नाम था बादलू। बादलू बाकी बादलों से थोड़ा अलग था। वह बहुत चंचल था, हर समय इधर-उधर घूमता रहता और नई-नई जगहें देखने का सपना देखता था।

     

    उसका सबसे अच्छा दोस्त था धवल, जो हमेशा उसे समझाता था।

     

    “बादलू, ज्यादा दूर मत जाना। हवा कभी भी अपना रुख बदल सकती है।”

     

    बादलू हँसकर कहता, “अरे धवल, मैं कोई छोटा बच्चा थोड़ी हूँ। देखना, एक दिन मैं पूरे आसमान की सैर करके आऊँगा।”

     

    उनका पूरा बादलों का परिवार एक साथ रहता था। सुबह सूरज निकलता तो बादल चमकने लगते। शाम को आसमान नारंगी हो जाता तो सभी बादल एक-दूसरे के पास आकर दिनभर की बातें करते।

     

    बादलू को अपने साथियों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता था—

     

    “आखिर आसमान के उस पार क्या है?”

     

    एक दिन हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    धवल ने कहा, “आज कहीं मत जाना। हवा बहुत तेज है।”

     

    बादलू बोला, “बस थोड़ी दूर तक जाऊँगा। फिर वापस आ जाऊँगा।”

     

    वह धीरे-धीरे अपने साथियों से अलग होकर आगे बढ़ने लगा।

     

    शुरुआत में सब ठीक था।

     

    हवा उसे हल्के-हल्के आगे ले जा रही थी। बादलू नीचे धरती को देखकर खुश हो रहा था।

     

    नीचे हरे-भरे खेत थे, छोटी-छोटी नदियाँ थीं और गांवों के बीच बने घर खिलौनों जैसे लग रहे थे।

     

    “वाह! दुनिया तो कितनी बड़ी है!” बादलू ने कहा।

     

    लेकिन तभी हवा अचानक बहुत तेज हो गई।

     

    बादलू संभल नहीं पाया।

     

    “अरे! रुको!”

     

    हवा उसे तेजी से अपने साथ बहाकर दूर ले गई।

     

    बादलू ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    उसके साथी अब बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे।

     

    “धवल!”

     

    उसने जोर से आवाज लगाई।

     

    लेकिन तेज हवा में उसकी आवाज कहीं खो गई।

     

    कुछ ही देर में उसके साथी पूरी तरह दिखाई देना बंद हो गए।

     

    अब बादलू अकेला था।

     

    पहली बार उसे अपने फैसले पर पछतावा हुआ।

     

    “काश मैंने धवल की बात मान ली होती।”

     

    हवा उसे एक अनजान इलाके में ले गई।

     

    वहाँ आसमान बहुत साफ था। आसपास कोई दूसरा बादल नहीं था।

     

    बादलू ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    कुछ समय बाद उसे नीचे एक छोटा सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव के लोग आसमान की ओर देख रहे थे।

     

    बादलू ने ध्यान से देखा तो खेत सूखे हुए थे।

     

    तालाब में पानी बहुत कम था।

     

    पेड़ों के पत्ते भी मुरझाए हुए थे।

     

    एक छोटी बच्ची अपने पिता से पूछ रही थी—

     

    “पिताजी, बारिश कब होगी?”

     

    पिता ने उदास होकर कहा—

     

    “पता नहीं बेटी। अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    बादलू को बहुत दुख हुआ।

     

    वह खुद भी बारिश का बादल था, लेकिन इस समय उसके पास बारिश करने जितना पानी नहीं था।

     

    फिर भी उसने कोशिश की।

     

    वह गांव के ऊपर जाकर रुका और अपने अंदर जमा थोड़ी-सी नमी को बूंदों में बदलने लगा।

     

    टप…

     

    एक बूंद नीचे गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    बच्ची ने आसमान की ओर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    लोग खुशी से बाहर आ गए।

     

    बादलू ने जितना पानी उसके पास था, सब बरसा दिया।

     

    लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी सारी नमी खत्म हो गई।

     

    वह फिर हल्का होकर आसमान में तैरने लगा।

     

    गांव में लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखकर उसे खुशी हुई।

     

    लेकिन उसके मन में अपने साथियों की याद और भी बढ़ गई।

     

    “अगर धवल यहाँ होता तो मैं उसे बताता कि मैंने आज किसी की मदद की।”

     

    उसी समय एक बूढ़ा पेड़ हवा में झूमते हुए बोला—

     

    “बादल, तुम उदास क्यों हो?”

     

    बादलू चौंक गया।

     

    “आपने मुझे देखा?”

     

    पेड़ हँसा।

     

    “मैंने तुम्हें आते हुए देखा था। तुम बाकी बादलों जैसे नहीं हो। तुम्हारे चेहरे पर खुशी भी है और चिंता भी।”

     

    बादलू ने अपनी पूरी कहानी पेड़ को बता दी।

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “कभी-कभी रास्ता भटकना भी जरूरी होता है। इससे हमें पता चलता है कि हम वास्तव में किसके लिए बने हैं।”

     

    बादलू बोला—

     

    “लेकिन मुझे अपने साथियों के पास वापस जाना है।”

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “तो रास्ता खोजो। मगर याद रखना, हवा को सिर्फ दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास भी पहुँचा सकती है।”

     

    बादलू ने उम्मीद से आसमान की तरफ देखा।

     

    उसी समय दूर से ठंडी हवा आई।

     

    बादलू ने महसूस किया कि यह हवा बाकी हवाओं से अलग थी।

     

    वह एक दिशा में लगातार बह रही थी।

     

    “शायद यही रास्ता है!”

     

    बादलू हवा के साथ आगे बढ़ गया।

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    लेकिन उसके साथी कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    अचानक आसमान में काले बादल छाने लगे।

     

    बादलू डर गया।

     

    उसने देखा कि बिजली चमक रही थी।

     

    तेज हवा और गरज ने पूरे आसमान को घेर लिया।

     

    वह पीछे हटने की कोशिश करने लगा, लेकिन तूफान ने उसे अपने बीच खींच लिया।

     

    “मैं कहाँ आ गया?”

     

    बादलू चारों तरफ घूम रहा था।

     

    उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी बिजली चमकी और उसे दूर एक बड़ी सी सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह कोई पहाड़ नहीं था।

     

    वह बादलों का एक विशाल समूह था।

     

    बादलू ने उम्मीद से पुकारा—

     

    “क्या मेरे साथी वहाँ हैं?”

     

    लेकिन तूफान की आवाज इतनी तेज थी कि उसे कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह उस विशाल बादल समूह की तरफ बढ़ने लगा।

     

    जैसे ही वह पास पहुँचा, उसे एक परिचित आवाज सुनाई दी—

     

    “बादलू!”

     

    बादलू अचानक रुक गया।

     

    यह आवाज…

     

    यह तो धवल की थी!

     

    उसने पूरी ताकत से पुकारा—

     

    “धवल!”

     

    तूफान के बीच से जवाब आया—

     

    “बादलू, तुम कहाँ थे?”

     

    बादलू खुशी से भर गया।

     

    लेकिन तभी तेज हवा ने दोनों को फिर अलग-अलग दिशाओं में धकेल दिया।

     

    “धवल!”

     

    “बादलू!”

     

    दोनों एक-दूसरे को पुकारते रहे।

     

    लेकिन तूफान और तेज होता गया।

     

    और तभी बादलू ने देखा कि धवल के पीछे उसका पूरा बादलों का परिवार मौजूद था।

     

    वे सभी उसे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक पहुँच गए थे।

     

    लेकिन उनके बीच एक बड़ी काली आँधी खड़ी थी।

     

    बादलू ने सोचा—

     

    “क्या मैं अपने साथियों तक पहुँच पाऊँगा?”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले कुछ पल उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाले थे।

     

     

  • चार सब्जियां की लड़ाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चार सब्जियों की अनोखी लड़ाई

     

    एक छोटे से शहर में मार्था नाम की एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसका एक छोटा-सा बगीचा था, जिसमें वह तरह-तरह की सब्जियां उगाती थी। टमाटर, आलू, बैंगन, भिंडी, गाजर, मटर और कई तरह की हरी सब्जियां उसके बगीचे की शोभा बढ़ाती थीं।

     

    लेकिन उस बगीचे में चार सब्जियां ऐसी थीं, जो खुद को सबसे ज्यादा खास समझती थीं।

     

    टमाटर, आलू, बैंगन और भिंडी।

     

    चारों में हमेशा किसी न किसी बात पर बहस होती रहती थी।

     

    एक सुबह टमाटर ने अपनी लाल चमक दिखाते हुए कहा—

     

    “देखो मुझे! मैं कितनी सुंदर हूं। मेरे बिना सलाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

     

    आलू तुरंत बोला—

     

    “सुंदर होने से क्या होता है? सबसे ज्यादा काम तो मेरा आता है। सब्जी बनानी हो, पराठे हों, चाट हो या पकौड़े… हर जगह मैं काम आता हूं।”

     

    भिंडी ने गर्दन हिलाई।

     

    “तुम दोनों अपनी-अपनी तारीफ कर लो। लेकिन मेरे जैसा स्वाद किसके पास है?”

     

    बैंगन हंसते हुए बोला—

     

    “तुम तीनों भूल रहे हो कि असली सब्जियों का राजा कौन है।”

     

    टमाटर ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बैंगन ने गर्व से कहा—

     

    “मैं! मुझसे भरता बनता है, सब्जी बनती है और मसालेदार पकवान भी।”

     

    आलू ने हंसकर कहा—

     

    “तुम्हें कौन पसंद करता है? बच्चे तो तुम्हारा नाम सुनकर ही मुंह बना लेते हैं।”

     

    बैंगन गुस्से में लाल पड़ गया।

     

    “कम से कम मैं तुम्हारी तरह हर सब्जी में घुसकर अपनी पहचान नहीं खोता!”

     

    आलू ने कहा—

     

    “क्या कहा?”

     

    भिंडी बीच में बोली—

     

    “बस करो तुम दोनों!”

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “आज फैसला हो ही जाना चाहिए कि हम चारों में सबसे जरूरी कौन है।”

     

    चारों सब्जियां मान गईं।

     

    उन्होंने तय किया कि अगले दिन बगीचे में एक प्रतियोगिता होगी।

     

    जिस सब्जी को मार्था सबसे ज्यादा पसंद करेगी, वही सबसे खास मानी जाएगी।

     

    अगली सुबह मार्था बगीचे में आई।

     

    उसने टोकरी उठाई और चारों सब्जियों को देखा।

     

    सबसे पहले उसने टमाटर तोड़े।

     

    टमाटर खुशी से फूल गया।

     

    “देखा! सबसे पहले मुझे चुना।”

     

    आलू बोला—

     

    “अभी फैसला मत करो।”

     

    कुछ देर बाद मार्था ने आलू भी खोद लिए।

     

    आलू मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ, कौन ज्यादा जरूरी है?”

     

    भिंडी और बैंगन भी टोकरी में रख दिए गए।

     

    चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    टमाटर बोला—

     

    “अब तो हम सब बराबर हो गए।”

     

    आलू ने कहा—

     

    “नहीं। असली फैसला रसोई में होगा।”

     

    मार्था सब्जियां लेकर रसोई में पहुंची।

     

    उसने टमाटर से चटनी बनाई।

     

    टमाटर खुशी से बोला—

     

    “देखा! मेरा इस्तेमाल सबसे पहले हुआ।”

     

    फिर आलू की सब्जी बनी।

     

    आलू ने गर्व से कहा—

     

    “अब मेरी बारी।”

     

    इसके बाद भिंडी मसाले के साथ पकाई गई।

     

    भिंडी बोली—

     

    “अब समझ आया कि स्वाद किसमें है?”

     

    अंत में बैंगन का भरता बना।

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “अब तो सबको मानना पड़ेगा कि मैं सबसे खास हूं।”

     

    लेकिन तभी रसोई में मार्था की छोटी पोती एलीना आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “दादी, आज इतनी सारी सब्जियां?”

     

    मार्था मुस्कुराई।

     

    “हां बेटा। आज सबकी पसंद की चीज बनेगी।”

     

    एलीना ने चारों पकवान चखे।

     

    “दादी, सब बहुत अच्छे हैं!”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    लेकिन उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    टमाटर बोला—

     

    “एलीना ने पहले मेरी चटनी की तारीफ की थी।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन उसने मेरी सब्जी ज्यादा खाई।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “उसने मेरी प्लेट पूरी खत्म की।”

     

    बैंगन बोला—

     

    “और भरता दोबारा मांगा।”

     

    अब चारों फिर झगड़ने लगे।

     

    मार्था रसोई साफ करने के बाद आराम करने बैठी थी। उसने उनकी बातें सुन लीं।

     

    वह मुस्कुराई और बोली—

     

    “तुम चारों लड़ क्यों रहे हो?”

     

    सब्जियां चुप हो गईं।

     

    टमाटर बोला—

     

    “हममें से सबसे अच्छी कौन है, इसी का फैसला कर रहे हैं।”

     

    मार्था हंस पड़ी।

     

    “सबसे अच्छी?”

     

    “हां।”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “तुम चारों अलग हो। कोई सलाद में अच्छा लगता है, कोई सब्जी में, कोई भरते में और कोई अलग-अलग पकवानों में।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन सबसे जरूरी कौन है?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “अगर तुममें से एक भी न हो तो खाना थोड़ा कम स्वादिष्ट हो सकता है। लेकिन अगर तुम सब मिलकर रहो तो रसोई और भी अच्छी बनती है।”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    फिर भी बैंगन बोला—

     

    “लेकिन क्या हम अपनी-अपनी खासियत नहीं बता सकते?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “बिल्कुल बता सकते हो। अपनी अच्छाई पर गर्व करना गलत नहीं है। लेकिन अपनी अच्छाई को दूसरों को छोटा दिखाने के लिए इस्तेमाल करना गलत है।”

     

    यह बात चारों के दिल में उतर गई।

     

    लेकिन उसी समय बगीचे से एक आवाज आई।

     

    “अरे! मेरी बात कोई नहीं कर रहा!”

     

    चारों ने पीछे देखा।

     

    वह गाजर थी।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “मैं भी तो हूं!”

     

    भिंडी हंस पड़ी।

     

    “तुम्हें तो हम भूल ही गए।”

     

    गाजर नाराज होकर बोली—

     

    “यही तो समस्या है। तुम चारों खुद को सबसे बड़ा समझते हो।”

     

    चारों चुप हो गए।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “इस बगीचे में हर सब्जी की अपनी जगह है। किसी की जरूरत कम नहीं।”

     

    आलू ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम सही कह रही हो।”

     

    टमाटर बोला—

     

    “हम बिना वजह लड़ रहे थे।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “हमें अपनी खूबियां पता हैं, लेकिन दूसरों की खूबियां देखना भूल गए।”

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “तो क्या आज से कोई नहीं लड़ेगा?”

     

    आलू ने मजाक में कहा—

     

    “अगर तुमने खुद को राजा कहना बंद कर दिया तो।”

     

    बैंगन हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    चारों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली।

     

    अब जब भी बगीचे में कोई सब्जी खुद को सबसे खास बताती, चारों उसे समझाते—

     

    “सबसे खास बनने की जरूरत नहीं है। अपनी जगह अच्छी तरह निभाना ही काफी है।”

     

    कुछ दिनों बाद मार्था ने बगीचे में एक बड़ा बोर्ड लगाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “इस बगीचे में कोई सब्जी छोटी-बड़ी नहीं। हर किसी की अपनी खासियत है।”

     

    चारों सब्जियां उस बोर्ड को देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “अब समझ आया, लाल होने का मतलब सिर्फ गुस्सा करना नहीं है।”

     

    आलू बोला—

     

    “और हर जगह काम आने का मतलब सबसे बड़ा होना नहीं।”

     

    भिंडी हंसी—

     

    “मेरी लंबाई ज्यादा है, इसका मतलब मैं दूसरों से बड़ी नहीं।”

     

    बैंगन ने कहा—

     

    “और मेरा भरता मशहूर है, इसका मतलब मैं सब्जियों का राजा नहीं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    उस दिन के बाद बगीचे में चारों की दोस्ती पूरे शहर में मशहूर हो गई।

     

    जब भी मार्था चारों को एक साथ रसोई में लाती, वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “लड़ाई में कोई जीतता नहीं। लेकिन जब सब मिलकर रहें, तो हर किसी की खूबसूरती और स्वाद और बढ़ जाता है।”

     

    और चारों सब्जियों ने हमेशा के लिए यह सीख याद रखी—

     

    दूसरों से बेहतर साबित होने से ज्यादा जरूरी है, अपनी खासियत को पहचानना और दूसरों की खासियत की कद्र करना।

  • लौटाया जंगल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    शहर से थोड़ा दूर एक सुनसान सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे और शाम होते ही वहां लोगों का आना-जाना बहुत कम हो जाता था।

     

    एक दिन राजेश अपनी बाइक से उसी रास्ते से घर लौट रहा था। अचानक उसे सड़क किनारे से किसी छोटे जानवर के रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    राजेश ने बाइक रोक दी।

     

    “ये आवाज कैसी है?”

     

    वह आवाज की तरफ बढ़ा तो झाड़ियों के पास उसे एक छोटा सा बच्चा दिखाई दिया।

     

    पहले तो राजेश समझ नहीं पाया कि वह कौन सा जानवर है। लेकिन जब उसने ध्यान से देखा तो उसके होश उड़ गए।

     

    वह शेर का बच्चा था।

     

    बच्चा बहुत कमजोर था और लगातार आवाज कर रहा था। उसके आसपास कोई दूसरा जानवर नहीं था।

     

    राजेश ने काफी देर तक आसपास देखा।

     

    “इसकी मां कहां है?”

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    राजेश ने वन विभाग को सूचना देने की कोशिश की, मगर उस समय आसपास नेटवर्क नहीं था। बच्चा ठंड से कांप रहा था।

     

    राजेश का दिल नहीं माना।

     

    उसने उसे सावधानी से उठाया और अपनी बाइक पर रख लिया।

     

    “चल छोटे… पहले तुझे सुरक्षित जगह ले चलता हूं।”

     

    वह उसे अपने घर ले आया।

     

    घर पहुंचते ही उसकी पत्नी सीमा घबरा गई।

     

    “राजेश! ये क्या लेकर आए हो?”

     

    राजेश ने कहा,

     

    “सड़क किनारे अकेला मिला था। बहुत छोटा है। अगर वहीं छोड़ देता तो शायद बचता नहीं।”

     

    सीमा ने बच्चे को देखा तो उसका दिल भी पिघल गया।

     

    “लेकिन ये शेर है।”

     

    राजेश ने सिर हिलाया।

     

    “जानता हूं। इसे हमेशा अपने पास नहीं रखेंगे। जब तक ये ठीक नहीं हो जाता, तब तक इसकी देखभाल करेंगे।”

     

    उन्होंने उसका नाम रखा—शेरू।

     

    कुछ ही दिनों में शेरू घर का हिस्सा बन गया।

     

    वह राजेश के पीछे-पीछे चलता।

     

    राजेश जहां बैठता, शेरू वहीं आकर बैठ जाता।

     

    राजेश काम से बाहर जाता तो शेरू दरवाजे के पास बैठकर उसका इंतजार करता।

     

    धीरे-धीरे वह इतना राजेश से जुड़ गया कि उसे देखते ही दौड़कर उसके पास आता।

     

    सीमा अक्सर हंसकर कहती,

     

    “लगता है इसे तुम इंसान नहीं, इसकी मां समझ में आते हो।”

     

    राजेश मुस्कुराकर कहता,

     

    “मैंने इसे सड़क से उठाया था, लेकिन अब लगता है इसने मुझे ही अपना घर बना लिया है।”

     

    समय गुजरता गया।

     

    कुछ महीने बाद शेरू बड़ा होने लगा।

     

    उसके पंजे बड़े हो गए।

     

    उसकी आवाज में भी पहले से ज्यादा ताकत आ गई।

     

    अब वह घर में दौड़ता तो छोटे-मोटे सामान गिर जाते।

     

    एक दिन राजेश ने उसे खेलते हुए देखा और उसके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    उसे समझ आ गया था कि अब शेरू को हमेशा घर में रखना संभव नहीं होगा।

     

    वह शेर था।

     

    उसका असली घर जंगल था।

     

    रात को राजेश देर तक सो नहीं पाया।

     

    सीमा ने पूछा,

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    राजेश ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “शेरू को जंगल वापस छोड़ना पड़ेगा।”

     

    सीमा कुछ पल चुप रही।

     

    “तुम उसे छोड़ पाओगे?”

     

    राजेश की आंखें भर आईं।

     

    “पता नहीं।”

     

    अगले दिन राजेश ने वन विभाग से संपर्क किया। अधिकारियों ने उसे समझाया कि शेरू जैसे-जैसे बड़ा होगा, उसके लिए घर का माहौल खतरनाक भी हो सकता है और उसके प्राकृतिक व्यवहार पर भी असर पड़ सकता है।

     

    राजेश सब समझ रहा था।

     

    लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।

     

    शेरू को क्या पता था कि उसका मालिक उसके भविष्य के बारे में फैसला कर रहा है।

     

    उस रात शेरू हमेशा की तरह राजेश के पास आकर लेट गया।

     

    राजेश ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “शेरू… तू मुझसे नाराज मत होना।”

     

    शेरू ने उसकी तरफ देखा।

     

    राजेश की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं तुझे छोड़ना नहीं चाहता। लेकिन तुझे आजाद करना जरूरी है।”

     

    अगले कुछ दिनों में वन विभाग ने शेरू को जंगल में वापस भेजने की तैयारी शुरू कर दी।

     

    जिस दिन उसे ले जाना था, सुबह से ही राजेश बहुत चुप था।

     

    सीमा की आंखें भी नम थीं।

     

    शेरू को जैसे कुछ समझ आ रहा था। वह बार-बार राजेश के पास आ रहा था।

     

    राजेश ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तू जहां भी रहेगा, खुश रहना।”

     

    फिर शेरू को वाहन में ले जाया गया।

     

    राजेश भी उसके साथ जंगल तक गया।

     

    गाड़ी जंगल के एक सुरक्षित हिस्से में रुकी।

     

    अधिकारी ने कहा,

     

    “अब इसे यहीं छोड़ना होगा।”

     

    राजेश कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    शेरू बाहर आया।

     

    उसने चारों तरफ देखा।

     

    फिर अचानक पीछे मुड़ा।

     

    सीधे राजेश की तरफ।

     

    वह कुछ कदम आगे बढ़ा और राजेश के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    राजेश का दिल टूट गया।

     

    उसने शेरू के सिर पर आखिरी बार हाथ फेरा।

     

    “जा… अब यही तेरा घर है।”

     

    शेरू ने राजेश को कुछ पल तक देखा।

     

    फिर वह धीरे-धीरे जंगल की तरफ बढ़ने लगा।

     

    कुछ कदम बाद वह फिर पलटा।

     

    राजेश वहीं खड़ा था।

     

    उसने हाथ उठाकर कहा,

     

    “जा शेरू।”

     

    इस बार शेरू जंगल की ओर बढ़ गया।

     

    कुछ ही देर में वह पेड़ों के बीच गायब हो गया।

     

    राजेश वहीं खड़ा रहा।

     

    उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    सीमा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “तुमने उसे छोड़ा नहीं है राजेश… तुमने उसे उसकी जिंदगी वापस दी है।”

     

    राजेश ने जंगल की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “जानता हूं… लेकिन दिल तो यही चाहता है कि वो वापस आ जाए।”

     

    कई महीने बीत गए।

     

    राजेश अक्सर उसी जंगल के आसपास जाता, लेकिन शेरू उसे कभी दिखाई नहीं देता।

     

    एक दिन वन विभाग के एक अधिकारी ने राजेश को फोन किया।

     

    “राजेश जी, आपको एक खबर देनी है।”

     

    राजेश घबरा गया।

     

    “क्या हुआ शेरू को?”

     

    अधिकारी हंसते हुए बोले,

     

    “घबराइए मत। शेरू बिल्कुल ठीक है। हमने उसे जंगल में कई बार देखा है। अब वह दूसरे शेरों के साथ रहना सीख गया है।”

     

    राजेश की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    “सच?”

     

    “हां। और एक बात और…”

     

    “क्या?”

     

    “वह अब बिल्कुल जंगली शेर की तरह व्यवहार करता है।”

     

    राजेश कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

     

    “तो आखिरकार वो अपने घर पहुंच ही गया।”

     

    उस शाम राजेश जंगल के बाहर काफी देर तक खड़ा रहा।

     

    उसे दूर से शेर की दहाड़ सुनाई दी।

     

    राजेश की आंखें भर आईं।

     

    उसे लगा जैसे वह आवाज कह रही हो—

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    राजेश ने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराकर कहा,

     

    “खुश रहना शेरू… अब मुझे तेरी चिंता नहीं।”

     

    उस दिन राजेश समझ गया कि प्यार हमेशा किसी को अपने पास रखने का नाम नहीं होता।

     

    कभी-कभी सच्चा प्यार वह होता है…

     

    जब हम अपने सबसे प्यारे को अपने से दूर करके भी

    उसकी आजादी चुनते हैं।

    और शेरू?

     

    वह जंगल में लौट चुका था।

     

    लेकिन उसके दिल में शायद आज भी उस इंसान के लिए एक जगह थी…

     

    जिसने उसे सड़क किनारे लावारिस पाया था,

     

    उसे घर दिया था,

     

    प्यार दिया था,

     

    और आखिर में…

     

    उसे उसकी असली दुनिया लौटा दी थी।