नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ कान्हा और यशोदा मैया की रंगोली
वृंदावन में सुबह होते ही हर तरफ चहल-पहल शुरू हो गई थी। गोपियाँ अपने घरों के बाहर आँगन साफ कर रही थीं। कोई फूलों की माला बना रही थी तो कोई घर के दरवाजे पर सुंदर रंगोली सजा रही थी।
उस दिन नंद भवन के पास रहने वाली गोपी राधिका ने अपने आँगन में बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी। उसने कई रंगों से फूल, पत्तियाँ और बीच में एक बड़ा सा मोर बनाया था।
राधिका रंगोली पूरी करके पीछे हटी और खुशी से बोली—
“आज तो मेरी रंगोली सबसे सुंदर लग रही है।”
पास खड़ी दूसरी गोपी ने कहा—
“सच में बहुत सुंदर है। बस इसे कान्हा से बचाकर रखना।”
राधिका का चेहरा तुरंत बदल गया।
“अरे हाँ! कान्हा ने देख लिया तो मेरी सारी मेहनत खराब कर देगा।”
उधर थोड़ी दूरी पर खड़े कान्हा अपने दोस्तों के साथ यह बात सुन रहे थे।
कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—
“तुमने सुना?”
दोस्त बोला—
“क्या?”
“वो कह रही है कि मैं उसकी रंगोली खराब कर दूँगा।”
दोस्त हँस पड़ा।
“तो क्या करोगे?”
कान्हा ने आँखों में शरारत भरकर कहा—
“कुछ नहीं।”
दोस्त ने कहा—
“तुम्हारे चेहरे से तो लग रहा है कि जरूर कुछ करोगे।”
कान्हा मुस्कुराए और चुप हो गए।
कुछ देर बाद राधिका घर के अंदर चली गई।
कान्हा धीरे-धीरे उसके आँगन के पास पहुँचे।
उन्होंने रंगोली को देखा।
“बहुत सुंदर है।”
उनके दोस्त भी पास आ गए।
एक दोस्त बोला—
“इसे मत छूना। बहुत मेहनत से बनाई है।”
कान्हा ने कहा—
“मैं खराब थोड़ी करूँगा।”
उन्होंने अपनी छोटी सी उंगली रंग के पास ले जाकर रोक ली।
फिर अचानक उन्होंने रंगोली के बीच एक छोटा सा बांसुरी का निशान बना दिया।
दोस्तों ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी रोक ली।
कान्हा बोले—
“अब ये मेरी भी हो गई।”
तभी राधिका बाहर आ गई।
उसने रंगोली देखी।
पहले तो वह चौंकी।
फिर कान्हा को देखकर बोली—
“कान्हा!”
कान्हा भागने लगे।
राधिका उनके पीछे दौड़ी।
“रुको! आज तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”
कान्हा हँसते हुए बोले—
“मैंने रंगोली खराब नहीं की। मैंने तो उसमें बांसुरी बनाई है।”
“तुमने मेरी पूरी रंगोली में अपनी बांसुरी क्यों बना दी?”
“क्योंकि तुमने मोर बनाया था। मोर को भी तो बांसुरी सुननी चाहिए।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
पास खड़े बच्चे हँसने लगे।
राधिका ने कहा—
“तुम्हारी बातें सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”
कान्हा मुस्कुराए।
“तो फिर गुस्सा मत करो।”
राधिका ने हाथ में थोड़ा रंग लिया और कान्हा के गाल पर लगा दिया।
“अब बराबर!”
कान्हा कुछ पल चुप रहे।
फिर उन्होंने भी रंग उठाया और राधिका के गाल पर लगा दिया।
अब बाकी बच्चे भी रंग लगाने लगे।
कुछ ही पल में पूरा आँगन रंगों से भर गया।
राधिका की सुंदर रंगोली जरूर खराब हो गई थी, लेकिन आँगन में बच्चों की हँसी गूँज रही थी।
तभी वहाँ यशोदा मैया आ गईं।
उन्होंने चारों तरफ देखा।
“ये क्या हो रहा है?”
सब बच्चे एकदम शांत हो गए।
यशोदा ने रंगोली की तरफ देखा।
फिर कान्हा की तरफ।
कान्हा ने तुरंत कहा—
“मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”
यशोदा ने पूछा—
“तो ये रंग तुम्हारे गाल पर कैसे आया?”
कान्हा बोले—
“राधिका ने लगाया।”
राधिका तुरंत बोली—
“पहले कान्हा ने लगाया था!”
यशोदा मुस्कुराने लगीं।
उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़ा।
“चलो मेरे साथ।”
कान्हा ने पूछा—
“कहाँ?”
“घर।”
“क्यों?”
“तुम्हारे कपड़े देखे हैं?”
कान्हा ने नीचे देखा।
उनका पूरा कुर्ता रंगों से भर गया था।
वह हँसने लगे।
“मैया, आज तो मैं बहुत सुंदर लग रहा हूँ।”
यशोदा बोलीं—
“हाँ, बिल्कुल रंगों की पोटली जैसे।”
कान्हा हँसते हुए उनके साथ चल दिए।
घर पहुँचकर यशोदा ने उन्हें पानी से साफ किया।
कान्हा बार-बार पानी से बचने की कोशिश करते।
“मैया, ठंडा पानी है!”
“चुपचाप बैठो।”
“मैया, आँख में चला गया।”
“आँखें बंद कर लो।”
“मैया, कान में चला गया।”
“कान्हा!”
कान्हा हँस पड़े।
यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।
उन्होंने कान्हा के बाल साफ किए और कपड़े बदलाए।
फिर उन्हें पास बैठाकर बोलीं—
“कान्हा, किसी की मेहनत खराब नहीं करनी चाहिए।”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“मुझसे गलती हो गई।”
“अगर तुम्हें रंगोली पसंद आई थी तो तुम राधिका से पूछ सकते थे।”
कान्हा ने कहा—
“मैं उससे माफी माँगूँगा।”
यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।
“बस यही बात अच्छी है।”
कुछ देर बाद कान्हा वापस राधिका के घर पहुँचे।
राधिका नई रंगोली बना रही थी।
कान्हा उसके पास गए।
“राधिका।”
राधिका ने उनकी तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
कान्हा बोले—
“मुझे माफ कर दो।”
राधिका मुस्कुरा दी।
“ठीक है।”
कान्हा ने पूछा—
“मैं तुम्हारी मदद करूँ?”
राधिका ने सोचा।
फिर बोली—
“लेकिन इस बार रंगोली खराब मत करना।”
कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।
“नहीं करूँगा।”
दोनों मिलकर रंगोली बनाने लगे।
कान्हा ने फूलों के लिए पीला रंग दिया।
राधिका ने नीला रंग लगाया।
कुछ देर बाद रंगोली पहले से भी सुंदर बन गई।
कान्हा ने उसे देखकर कहा—
“अब ये सच में सुंदर है।”
राधिका बोली—
“क्योंकि इस बार तुमने इसे बिगाड़ा नहीं।”
कान्हा हँस पड़े।
तभी उनके दोस्त आ गए।
एक बोला—
“कान्हा, चलो! नदी के पास चलते हैं।”
कान्हा ने कहा—
“तुम लोग जाओ, मैं अभी आता हूँ।”
दोस्तों के जाते ही राधिका ने पूछा—
“तुम्हें इतनी शरारत करने की जरूरत क्यों पड़ती है?”
कान्हा कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“क्योंकि जब सब हँसते हैं ना, तो मुझे अच्छा लगता है।”
राधिका मुस्कुराई।
“लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शरारत से किसी को दुख भी हो सकता है।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“अब ध्यान रखूँगा।”
शाम को यशोदा ने कान्हा को बुलाया।
“आज क्या किया?”
कान्हा बोले—
“आज मैंने रंगोली बनाई।”
“खराब तो नहीं की?”
“नहीं मैया। इस बार मैंने बनवाई है।”
यशोदा ने पूछा—
“सच?”
कान्हा ने गर्व से सिर हिलाया।
“हाँ। और राधिका ने मुझे माफ भी कर दिया।”
यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।
“मेरा कान्हा बड़ा हो रहा है।”
कान्हा तुरंत बोले—
“नहीं मैया, मैं बड़ा नहीं होना चाहता।”
“क्यों?”
“क्योंकि बड़ा हो गया तो आप मुझे गोद में नहीं उठाओगी।”
यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।
उन्होंने कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया।
“तुम चाहे कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए हमेशा मेरे नन्हे कान्हा ही रहोगे।”
कान्हा ने माँ के गले में हाथ डाल दिया।
बाहर शाम की हवा चल रही थी और वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी।
लेकिन उसी समय कान्हा के दोस्तों ने बाहर से आवाज लगाई—
“कान्हा! जल्दी आओ!”
कान्हा ने यशोदा से पूछा—
“मैया, जाऊँ?”
यशोदा बोलीं—
“जाओ, लेकिन आज कोई नई शरारत मत करना।”
कान्हा मुस्कुराए।
“मैं कोशिश करूँगा।”
और यह कहते ही वह दौड़ते हुए बाहर निकल गए।
यशोदा उन्हें जाते हुए देखती रहीं और मुस्कुराकर बोलीं—
“ये ‘कोशिश’ कह रहा है… मतलब आज फिर कोई शरारत होने वाली है।”
और सच में, अगले दिन कान्हा की शरारत वृंदावन की रंगोली से निकलकर यमुना किनारे तक पहुँचने वाली थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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