❤️ रूठी पार्वती और भोले महादेव
कैलाश पर्वत पर उस दिन सब कुछ शांत था। महादेव अपने स्थान पर बैठे ध्यान कर रहे थे और नंदी पास ही बैठे थे। गणेश जी भी अपने काम में लगे हुए थे। तभी माता पार्वती वहाँ आईं। उनके चेहरे पर हल्की नाराज़गी थी।
महादेव ने आँखें खोलीं और उन्हें देखते ही बोले,
“आइए देवी।”
पार्वती जी ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह चुपचाप पास से निकल गईं।
महादेव ने नंदी की तरफ देखा।
“नंदी, देवी हमसे नाराज़ हैं क्या?”
नंदी ने धीरे से सिर हिलाया।
महादेव ने कुछ सोचा और फिर बोले,
“लेकिन क्यों?”
नंदी के पास इसका जवाब नहीं था।
थोड़ी देर बाद महादेव ने पार्वती जी को फिर देखा। वह कैलाश के एक कोने में बैठी थीं और फूलों की माला बना रही थीं।
महादेव उनके पास गए।
“देवी।”
पार्वती जी चुप रहीं।
“आप मुझसे बात नहीं करेंगी?”
कोई जवाब नहीं।
महादेव उनके सामने बैठ गए।
“क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”
पार्वती जी ने धीरे से कहा,
“आपको नहीं पता?”
महादेव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
पार्वती जी ने मुँह फेर लिया।
“यही तो बात है।”
महादेव थोड़ा उलझ गए।
“क्या बात?”
“आपको कुछ पता ही नहीं चलता।”
महादेव शांत बैठे रहे।
“देवी, आप बता देंगी तो मुझे पता चल जाएगा।”
पार्वती जी ने कहा,
“अगर हर बात मुझे ही बतानी पड़े तो फिर आपको खुद समझने की जरूरत क्या है?”
महादेव मुस्कुराने लगे।
“आप सही कह रही हैं।”
“अब मुस्कुराइए मत।”
महादेव ने तुरंत अपनी मुस्कान रोक ली।
“ठीक है।”
पार्वती जी फिर फूलों की माला बनाने लगीं।
महादेव कुछ देर उनके पास बैठे रहे। फिर उठकर चले गए।
नंदी ने सोचा कि शायद महादेव अब समझ गए होंगे।
लेकिन कुछ ही देर बाद महादेव वापस आए।
उनके हाथ में एक सुंदर फूल था।
उन्होंने फूल पार्वती जी की तरफ बढ़ाया।
“देवी, यह आपके लिए।”
पार्वती जी ने फूल देखा।
“फूल देने से गलती खत्म नहीं होगी।”
“तो गलती क्या है?”
पार्वती जी ने उनकी तरफ देखा।
“आपको सच में नहीं पता?”
महादेव ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
पार्वती जी ने गहरी साँस ली।
“कल मैंने आपसे कहा था कि आज मेरे साथ कुछ समय बिताइए।”
महादेव बोले,
“हाँ।”
“और आपने क्या कहा था?”
महादेव सोचने लगे।
“मैंने कहा था कि बाद में।”
“और वह ‘बाद में’ कब आया?”
महादेव चुप हो गए।
पार्वती जी बोलीं,
“पूरा दिन बीत गया और आपको याद ही नहीं आया।”
महादेव ने धीरे से कहा,
“देवी, मैं ध्यान में था।”
“मुझे पता है। आप हमेशा ध्यान में रहते हैं।”
“लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
महादेव मुस्कुराए।
“मैंने सोचा था कि आप समझ जाएँगी।”
पार्वती जी ने तुरंत कहा,
“और मैं सोच रही थी कि आप समझेंगे।”
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर महादेव बोले,
“तो हम दोनों ही एक-दूसरे के समझने का इंतजार करते रहे।”
पार्वती जी का चेहरा थोड़ा नरम हुआ।
“शायद।”
महादेव उनके पास बैठ गए।
“देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए।”
पार्वती जी बोलीं,
“इतनी आसानी से नहीं।”
“तो क्या करना होगा?”
“आपको खुद पता लगाना होगा।”
महादेव ने कुछ पल सोचा।
फिर बोले,
“ठीक है। आज पूरा दिन मैं आपके साथ रहूँगा।”
पार्वती जी ने कहा,
“सच?”
“सच।”
“ध्यान नहीं करेंगे?”
“नहीं।”
“किसी और काम के लिए नहीं जाएंगे?”
“नहीं।”
“नंदी के साथ भी नहीं जाएंगे?”
दूर खड़े नंदी ने यह सुनते ही अपना सिर झुका लिया।
महादेव हँस पड़े।
“नंदी भी हमारे साथ रहेगा।”
पार्वती जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
लेकिन तभी महादेव बोले,
“लेकिन एक बात है।”
“क्या?”
“अगर आप नाराज़ न होतीं तो मुझे यह सब करने का मौका भी नहीं मिलता।”
पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।
“मतलब अब गलती मेरी?”
महादेव तुरंत बोले,
“नहीं, नहीं। मैंने ऐसा नहीं कहा।”
पार्वती जी हँस पड़ीं।
“आप भी ना, कभी-कभी अपनी बातों में खुद ही फँस जाते हैं।”
महादेव भी मुस्कुराने लगे।
तभी गणेश जी वहाँ आए।
उन्होंने दोनों को साथ बैठे देखा तो बोले,
“माता, अब आपका गुस्सा खत्म हो गया?”
पार्वती जी ने कहा,
“अभी थोड़ा बाकी है।”
महादेव ने गणेश जी की तरफ देखा।
“पुत्र, तुम मेरी सहायता करोगे?”
गणेश जी हँसकर बोले,
“पिता, इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूँगा। माता के सामने आपकी कोई नहीं चलती।”
पार्वती जी हँस पड़ीं।
महादेव ने गणेश जी से कहा,
“तुम भी अपनी माता का पक्ष ले रहे हो?”
गणेश जी बोले,
“पिता, मैं तो सच का पक्ष ले रहा हूँ।”
“और सच क्या है?”
“यह कि माता आपसे नाराज़ हैं।”
महादेव ने मुस्कुराकर कहा,
“यह तो मुझे भी पता है।”
कुछ देर बाद सभी कैलाश के पास बैठे थे। पार्वती जी फूलों की माला बना रही थीं और महादेव उनके लिए फूल चुनकर ला रहे थे।
एक फूल लाकर महादेव ने पूछा,
“यह अच्छा है?”
पार्वती जी ने देखा।
“हाँ।”
महादेव दूसरा फूल लाए।
“और यह?”
“यह भी अच्छा है।”
महादेव तीसरा फूल लाए।
पार्वती जी ने हँसकर कहा,
“महादेव, आपको फूल चुनना नहीं आता।”
“तो आप ही चुन लीजिए।”
“नहीं। आज आप चुनेंगे।”
महादेव एक-एक करके फूल लाते रहे।
कुछ देर बाद पार्वती जी ने कहा,
“अब समझे कि मुझे कल कैसा लगा था?”
महादेव ने उनकी तरफ देखा।
“हाँ देवी।”
“क्या समझे?”
महादेव ने धीरे से कहा,
“कभी-कभी जिसे हम बहुत प्रेम करते हैं, उसे हमारी चीजों की नहीं, बस हमारे समय की जरूरत होती है।”
पार्वती जी की आँखों में हल्की चमक आ गई।
“और?”
महादेव बोले,
“और यह कि प्रेम में बड़ी-बड़ी चीजें जरूरी नहीं होतीं। साथ बैठना भी काफी होता है।”
पार्वती जी मुस्कुरा दीं।
“अब आप समझे।”
महादेव ने हाथ जोड़कर कहा,
“हाँ देवी।”
पार्वती जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन एक बात याद रखिएगा।”
“क्या?”
“अगर अगली बार फिर मुझे यूँ इंतजार करवाया…”
महादेव ने तुरंत पूछा,
“तो?”
पार्वती जी बोलीं,
“तो मैं आपसे तीन दिन तक बात नहीं करूँगी।”
महादेव ने आँखें बड़ी कर लीं।
“तीन दिन?”
गणेश जी हँसने लगे।
नंदी भी खुशी से अपनी पूँछ हिलाने लगे।
महादेव ने कहा,
“देवी, एक दिन की नाराज़गी ही मेरे लिए बहुत थी। तीन दिन का दंड मत दीजिए।”
पार्वती जी हँसते हुए बोलीं,
“तो फिर मुझे इंतजार मत करवाइए।”
महादेव ने उनकी तरफ देखकर कहा,
“वचन है।”
फिर दोनों साथ बैठ गए।
कैलाश की हवा धीरे-धीरे चल रही थी। आसपास शांति थी। महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा और मुस्कुराए।
पार्वती जी ने पूछा,
“अब क्या देख रहे हैं?”
महादेव बोले,
“सोच रहा हूँ कि आज अगर आप रूठती नहींं, तो मुझे यह याद कैसे रहता कि आपके साथ बिताया हुआ एक छोटा-सा पल भी मेरे लिए कितना खास है।”
पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,
“और मुझे यह याद रहेगा कि मेरे भोले महादेव को कभी-कभी बात समझाने के लिए थोड़ा रूठना भी पड़ता है।”
महादेव हँस पड़े।
और इस तरह कैलाश पर हुई छोटी-सी नाराज़गी फिर से मुस्कान में बदल गई।
क्योंकि जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ रूठना भी रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं होता—बल्कि एक-दूसरे को थोड़ा और समझने के लिए होता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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