भक्त के सामने महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक
कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। चारों तरफ शांति थी। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। नंदी थोड़ी दूरी पर बैठे थे और गणेश जी अपने काम में व्यस्त थे।
तभी कैलाश की ओर एक गरीब भक्त आया। उसका नाम माधव था। वह बहुत दूर एक छोटे से गाँव से पैदल चलकर आया था। उसके कपड़े साधारण थे और हाथ में फूलों की छोटी-सी गठरी थी।
माधव कैलाश के पास पहुँचकर हाथ जोड़कर बोला,
“हे महादेव, मैं आपके दर्शन करने आया हूँ। मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है, बस ये फूल हैं।”
वह आगे बढ़ा और फूल महादेव के चरणों में रख दिए।
महादेव ने आँखें खोलीं और प्रेम से उसकी ओर देखा।
“माधव, तुम्हारे फूल नहीं, तुम्हारी श्रद्धा हमारे लिए मूल्यवान है।”
माधव की आँखें भर आईं।
“प्रभु, मुझे लगा था कि मेरे जैसे गरीब आदमी की भेंट शायद आपको पसंद नहीं आएगी।”
तभी माता पार्वती मुस्कुराते हुए बोलीं,
“महादेव को भेंट की कीमत नहीं, मन की सच्चाई दिखाई देती है।”
माधव ने माता पार्वती को प्रणाम किया।
“माता, मुझे आशीर्वाद दीजिए।”
“सदा प्रसन्न रहो।”
माधव वहीं बैठ गया। वह कुछ देर महादेव और माता पार्वती को देखता रहा।
तभी माता पार्वती ने महादेव की ओर देखा।
“महादेव, आपने आज सुबह कुछ खाया?”
महादेव ने शांत स्वर में कहा,
“नहीं देवी।”
पार्वती जी ने भौंहें चढ़ाईं।
“फिर से नहीं खाया?”
“ध्यान में समय का पता नहीं चला।”
“आपको ध्यान के अलावा कुछ याद भी रहता है?”
महादेव चुप हो गए।
माधव यह देखकर थोड़ा हैरान हुआ।
उसे लगा था कि कैलाश पर सब कुछ बहुत गंभीर और दिव्य होगा, लेकिन यहाँ तो माता पार्वती महादेव को उसी तरह डाँट रही थीं जैसे घर में कोई अपने बहुत करीबी को डाँटता है।
पार्वती जी बोलीं,
“मैंने सुबह ही कहा था कि समय पर भोजन कर लीजिए।”
महादेव बोले,
“देवी, अभी तो समय है।”
“आपके लिए हर समय ‘अभी तो समय है’ होता है।”
नंदी ने अपना सिर नीचे कर लिया ताकि उनकी हँसी दिखाई न दे।
महादेव ने नंदी की तरफ देखा।
“नंदी, तुम हँस रहे हो?”
नंदी तुरंत सीधा बैठ गया।
माधव से रहा नहीं गया। वह हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
पार्वती जी ने उसे देख लिया।
“माधव, तुम भी हँस रहे हो?”
माधव घबरा गया।
“नहीं माता… मैं तो बस…”
महादेव मुस्कुराए।
“देवी, भक्त को मत डराइए।”
पार्वती जी बोलीं,
“मैं इसे क्यों डराऊँगी? मैं तो बस पूछ रही हूँ।”
माधव ने हाथ जोड़ लिए।
“माता, मुझे पहली बार देखकर ऐसा लग रहा है कि आप दोनों के बीच भी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक होती है।”
महादेव ने कहा,
“नोक-झोंक?”
पार्वती जी तुरंत बोलीं,
“हाँ, और इसमें गलत क्या है?”
महादेव मुस्कुराकर बोले,
“कुछ भी गलत नहीं।”
माधव ने आश्चर्य से पूछा,
“लेकिन माता, आप तो महादेव को डाँट रही थीं।”
पार्वती जी हँस पड़ीं।
“बेटा, जिसे हम अपना मानते हैं, उसकी चिंता भी तो करते हैं।”
माधव चुप हो गया।
तभी महादेव बोले,
“और कभी-कभी देवी को चिंता ज्यादा हो जाती है।”
पार्वती जी ने तुरंत उनकी ओर देखा।
“ज्यादा?”
महादेव समझ गए कि बात फिर बिगड़ सकती है।
“मेरा मतलब था… आपकी चिंता बिल्कुल सही है।”
माधव फिर मुस्कुरा दिया।
पार्वती जी बोलीं,
“देखा माधव? बात बदलने में इन्हें कितना समय नहीं लगता।”
महादेव ने कहा,
“देवी, भक्त के सामने मेरी शिकायतें मत कीजिए।”
“क्यों? भक्त को भी तो पता चले कि महादेव कितने लापरवाह हैं।”
माधव हँसने लगा।
महादेव ने उसे देखा।
“तुम भी मेरी बात सुनकर हँस रहे हो?”
माधव ने सिर झुका लिया।
“प्रभु, क्षमा कीजिए।”
महादेव बोले,
“नहीं माधव, हँसो। आज कैलाश पर बहुत दिनों बाद इतनी खुलकर हँसी आई है।”
माता पार्वती भी मुस्कुरा उठीं।
कुछ देर बाद माधव ने अपनी समस्या बताई।
“माता, प्रभु, मेरे गाँव में इस साल फसल खराब हो गई है। घर में बूढ़ी माँ हैं। मैं बहुत परेशान होकर आपके पास आया हूँ। मैं धन नहीं माँगता। बस इतना चाहता हूँ कि मेरी माँ भूखी न रहे।”
महादेव ने उसकी ओर देखा।
“माधव, तुम्हारी माँ की सेवा ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूजा है।”
पार्वती जी बोलीं,
“और याद रखना, किसी की मदद करने के लिए हमेशा धन की जरूरत नहीं होती। मेहनत और सच्चे मन से किया काम भी बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।”
माधव ने सिर झुका लिया।
“लेकिन माता, मेरे पास तो…”
महादेव ने उसे रोकते हुए कहा,
“तुम्हारे पास मेहनत करने की शक्ति है।”
माधव ने पूछा,
“क्या इससे मेरी समस्या हल हो जाएगी?”
महादेव बोले,
“रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन अगर मन सच्चा हो तो रास्ता मिलता जरूर है।”
तभी पार्वती जी ने महादेव की ओर देखा।
“और आप इसे कोई मदद नहीं करेंगे?”
महादेव बोले,
“मैं इसे आशीर्वाद दे चुका हूँ।”
“सिर्फ आशीर्वाद?”
“देवी…”
पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,
“मेरा मतलब है, इसे ऐसा विश्वास दीजिए कि यह अपने गाँव जाकर हार न माने।”
महादेव ने माधव की ओर देखा।
“तुम्हें मेरी बात याद रखनी होगी। अपने गाँव लौटो। अपनी माँ की सेवा करो। खेत में फिर मेहनत करो। गाँव के दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करो। जो तुम्हारे पास है, उसे छोटा मत समझो।”
माधव की आँखों में उम्मीद लौट आई।
“प्रभु, मैं ऐसा ही करूँगा।”
पार्वती जी ने कहा,
“और हाँ, अपनी माँ को कभी अकेला मत समझने देना।”
“जी माता।”
माधव ने दोनों को प्रणाम किया।
फिर उसने धीरे से पूछा,
“माता, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“क्या आप दोनों हमेशा ऐसे ही एक-दूसरे से नोक-झोंक करते हैं?”
महादेव मुस्कुरा दिए।
पार्वती जी ने भी हँसते हुए कहा,
“हाँ।”
माधव ने पूछा,
“फिर कभी नाराज़गी ज्यादा नहीं बढ़ती?”
महादेव बोले,
“जहाँ प्रेम हो, वहाँ नाराज़गी टिकती नहीं।”
पार्वती जी ने उनकी ओर देखकर कहा,
“लेकिन कभी-कभी इन्हें मनाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है।”
महादेव ने कहा,
“और कभी-कभी देवी को मनाने में पूरा कैलाश भी कम पड़ जाता है।”
सब हँस पड़े।
नंदी भी खुशी से सिर हिलाने लगे।
माधव ने हाथ जोड़कर कहा,
“आज मैं यहाँ एक समस्या लेकर आया था, लेकिन वापस एक सीख लेकर जा रहा हूँ।”
महादेव ने पूछा,
“क्या सीख?”
माधव बोला,
“कि भगवान से प्रेम करने का मतलब सिर्फ उनसे माँगना नहीं है। और परिवार में छोटी-सी नोक-झोंक हो जाए तो उसे मन में नहीं रखना चाहिए।”
माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा,
“तुमने बिल्कुल सही समझा।”
माधव वापस जाने लगा।
महादेव ने उसे आशीर्वाद दिया।
“जाओ माधव। तुम्हारा मन मजबूत रहे।”
पार्वती जी ने भी कहा,
“और अपनी माँ का ध्यान रखना।”
माधव मुस्कुराते हुए कैलाश से नीचे उतर गया।
उसके जाने के बाद महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा।
“देवी, अब तो आप प्रसन्न हैं?”
पार्वती जी बोलीं,
“हाँ।”
“तो क्या अब मैं ध्यान कर सकता हूँ?”
पार्वती जी ने तुरंत कहा,
“पहले भोजन कीजिए।”
महादेव कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“मैं भूल ही गया था।”
पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,
“मुझे पता था।”
नंदी फिर मुस्कुरा दिए।
महादेव ने नंदी की तरफ देखा।
“नंदी, तुम फिर हँस रहे हो?”
और इस बार पूरा कैलाश जैसे उनकी हँसी से गूँज उठा।
क्योंकि महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक में भी प्रेम था, और उस दिन एक भक्त ने सीख लिया था कि सच्चा परिवार वही है जहाँ नाराज़गी के बाद भी अपनापन कभी कम नहीं होता।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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