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  • अनुसूइया और भंवरा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अनुसूइया और एक भंवरा

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक सुंदर-सा बगीचा था। उस बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले रहते थे। सुबह होते ही वहां तितलियां मंडराने लगतीं और भंवरे फूलों के आसपास गुनगुनाते रहते। उसी गांव में अनुसूइया नाम की एक सरल और दयालु लड़की रहती थी। उसे पेड़-पौधों और फूलों से बहुत प्यार था।

     

    अनुसूइया रोज सुबह उठकर अपने छोटे से बगीचे में पानी डालती और पौधों से बातें करती।

     

    एक दिन उसने देखा कि एक काला-सा भंवरा बार-बार एक ही फूल के आसपास मंडरा रहा है।

     

    अनुसूइया मुस्कुराकर बोली, “तुम रोज इसी फूल के पास क्यों आते हो?”

     

    भंवरा कुछ देर फूल पर बैठा, फिर उड़कर उसके सिर के ऊपर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया हंस पड़ी।

     

    “अच्छा! तो तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?”

     

    भंवरा फिर उसके पास आकर मंडराने लगा।

     

    उस दिन के बाद वह भंवरा रोज अनुसूइया के बगीचे में आने लगा। अनुसूइया ने उसका नाम रख दिया—भौंरा।

     

    वह जब भी बगीचे में आती, भौंरा उसके आसपास गुनगुनाता रहता।

     

    एक दिन अनुसूइया ने कहा, “भौंरा, तुम सिर्फ मेरे बगीचे में ही क्यों आते हो? पूरे गांव में इतने फूल हैं।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, भौंरा उड़कर एक सूखे पौधे के पास चला गया।

     

    अनुसूइया उसके पीछे गई।

     

    वहां उसने देखा कि उस पौधे पर एक भी फूल नहीं था।

     

    अनुसूइया बोली, “इस पौधे पर तो कुछ भी नहीं है।”

     

    भौंरा उसी पौधे के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया को कुछ समझ नहीं आया।

     

    उसने उस पौधे को ध्यान से देखा। मिट्टी बहुत सूखी थी।

     

    “ओह! तुम मुझे बता रहे हो कि इसे पानी चाहिए?”

     

    उसने तुरंत पौधे में पानी डाल दिया।

     

    कुछ दिनों तक वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी।

     

    एक सप्ताह बाद उस पर छोटी-सी कली निकल आई।

     

    अनुसूइया बहुत खुश हुई।

     

    “भौंरा! देखो, तुम्हारा पौधा फिर से खिलने वाला है।”

     

    भौंरा उसके चारों तरफ खुशी से उड़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे वह पौधा फूलों से भर गया।

     

    अनुसूइया को अब यकीन हो गया था कि भौंरा सिर्फ फूलों का रस लेने नहीं आता था। जैसे उसे भी इस बगीचे की चिंता थी।

     

    लेकिन एक दिन गांव में तेज आंधी आई।

     

    आसमान अचानक काला हो गया।

     

    अनुसूइया ने जल्दी-जल्दी बगीचे के छोटे पौधों को बचाने की कोशिश की।

     

    “हे भगवान! मेरे सारे फूल खराब न हो जाएं।”

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएं हिलने लगीं।

     

    अनुसूइया एक पौधे को सहारा दे ही रही थी कि उसे भौंरे की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चारों तरफ देखने लगी।

     

    “भौंरा? तुम कहां हो?”

     

    भौंरा एक पेड़ के नीचे फंसा हुआ था।

     

    अनुसूइया दौड़कर वहां पहुंची।

     

    हवा बहुत तेज थी, लेकिन उसने सावधानी से एक सूखी टहनी हटाई।

     

    भौंरा बाहर निकल आया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    भौंरा कुछ देर उसके हाथ के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “डर गए थे ना?”

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    अनुसूइया भौंरे को एक पत्ते के नीचे सुरक्षित जगह पर ले गई।

     

    उस रात उसने बगीचे में ही काफी देर तक पौधों को संभाला।

     

    सुबह जब बारिश रुकी, तो बगीचे की हालत खराब थी।

     

    कई फूल टूट गए थे।

     

    कुछ पौधे जमीन पर गिर गए थे।

     

    अनुसूइया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतनी मेहनत की थी… सब खराब हो गया।”

     

    तभी भौंरा उसके पास आया।

     

    वह एक फूल के ऊपर बैठा और फिर उड़कर दूसरे पौधे पर गया।

     

    अनुसूइया उसे देखते हुए बोली, “तुम कह रहे हो कि मुझे हार नहीं माननी चाहिए?”

     

    भौंरा उसके आसपास घूमने लगा।

     

    अनुसूइया ने आंसू पोंछे।

     

    “ठीक है। मैं फिर से शुरू करूंगी।”

     

    उसने अगले दिन से बगीचे को दोबारा ठीक करना शुरू किया।

     

    गांव के कुछ बच्चे भी उसकी मदद करने लगे।

     

    किसी ने पौधे लगाए, किसी ने मिट्टी ठीक की और किसी ने पानी दिया।

     

    कुछ ही दिनों में बगीचा फिर से हरा होने लगा।

     

    लेकिन उसी दौरान गांव में एक समस्या खड़ी हो गई।

     

    गांव के लोगों ने देखा कि इस साल फूलों और फलों की संख्या बहुत कम हो रही है।

     

    गांव के बुजुर्ग बोले, “लगता है मौसम ठीक नहीं है।”

     

    अनुसूइया ने अपने बगीचे में देखा।

     

    उसे याद आया कि जब भौंरे और तितलियां फूलों के पास आती हैं, तो कुछ समय बाद पौधों पर फल और बीज बनने लगते हैं।

     

    उसने गांव वालों से कहा, “हमें अपने बगीचों में ऐसे पौधे लगाने चाहिए जिन पर भंवरे और तितलियां आ सकें।”

     

    कुछ लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

     

    “एक भंवरे से गांव की खेती चलेगी क्या?”

     

    अनुसूइया चुप रही।

     

    उसने किसी से बहस नहीं की।

     

    उसने अपने बगीचे में अलग-अलग फूल लगाने शुरू कर दिए।

     

    गेंदा, सूरजमुखी, चमेली और कई दूसरे फूल।

     

    कुछ समय बाद उसके बगीचे में फिर से भंवरे और तितलियां आने लगीं।

     

    धीरे-धीरे उसके पौधों पर फल और बीज भी आने लगे।

     

    गांव के लोगों ने यह देखा तो उन्हें अपनी गलती समझ आई।

     

    एक बुजुर्ग किसान अनुसूइया के पास आए।

     

    “बेटी, तुम सही कह रही थी।”

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “मैं नहीं, भौंरा सही था।”

     

    किसान हंस पड़े।

     

    “भौंरा?”

     

    अनुसूइया ने सिर हिलाया।

     

    “हां। उसी ने मुझे सिखाया कि छोटी-सी चीज भी बड़ी मदद कर सकती है।”

     

    उस दिन से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास फूलों के पौधे लगाने शुरू कर दिए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरा गांव फूलों से भर गया।

     

    भंवरे और तितलियां हर तरफ दिखाई देने लगे।

     

    अनुसूइया का छोटा-सा बगीचा अब गांव के लिए मिसाल बन चुका था।

     

    लेकिन एक सुबह भौंरा दिखाई नहीं दिया।

     

    अनुसूइया ने पूरा बगीचा देख लिया।

     

    “भौंरा… कहां हो तुम?”

     

    वह पेड़ों के पास गई, फूलों के पास गई, लेकिन भौंरा कहीं नहीं था।

     

    दो दिन बीत गए।

     

    अनुसूइया उदास रहने लगी।

     

    तीसरे दिन सुबह वह उसी पुराने पौधे के पास गई, जिसे उसने कभी भौंरे के कहने पर पानी दिया था।

     

    वह पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका था।

     

    उस पर अनगिनत फूल खिले थे।

     

    अचानक उसे वही परिचित गुनगुनाहट सुनाई दी।

     

    “गुं… गुं…”

     

    अनुसूइया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    भौंरा उसके सामने मंडरा रहा था।

     

    उसकी आंखों में खुशी आ गई।

     

    “तुम आ गए!”

     

    भौंरा एक फूल पर बैठा और फिर उड़कर उसके कंधे के पास आ गया।

     

    अनुसूइया हंसते हुए बोली, “तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते।”

     

    भौंरा जैसे उसकी बात समझ रहा हो, फिर उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी में किसी इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी निशानी के रूप में खुशी भेजते हैं।”

     

    उसके लिए वह भंवरा सिर्फ एक कीड़ा नहीं था।

     

    वह उसका छोटा-सा दोस्त था, जिसने उसे सिखाया था कि किसी चीज को छोटा समझकर उसकी अहमियत नहीं भूलनी चाहिए।

     

    उस दिन से अनुसूइया जब भी अपने बगीचे में आती, सबसे पहले उसकी नजर फूलों पर जाती और फिर वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “भौंरा, आज फिर कुछ नया सिखाने आए हो क्या?”

     

    और बगीचे में गूंजती उसकी प्यारी-सी गुनगुनाहट जैसे जवाब देती—

     

    “गुं… गुं…”

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भक्त के सामने महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। चारों तरफ शांति थी। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। नंदी थोड़ी दूरी पर बैठे थे और गणेश जी अपने काम में व्यस्त थे।

     

    तभी कैलाश की ओर एक गरीब भक्त आया। उसका नाम माधव था। वह बहुत दूर एक छोटे से गाँव से पैदल चलकर आया था। उसके कपड़े साधारण थे और हाथ में फूलों की छोटी-सी गठरी थी।

     

    माधव कैलाश के पास पहुँचकर हाथ जोड़कर बोला,

     

    “हे महादेव, मैं आपके दर्शन करने आया हूँ। मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है, बस ये फूल हैं।”

     

    वह आगे बढ़ा और फूल महादेव के चरणों में रख दिए।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और प्रेम से उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारे फूल नहीं, तुम्हारी श्रद्धा हमारे लिए मूल्यवान है।”

     

    माधव की आँखें भर आईं।

     

    “प्रभु, मुझे लगा था कि मेरे जैसे गरीब आदमी की भेंट शायद आपको पसंद नहीं आएगी।”

     

    तभी माता पार्वती मुस्कुराते हुए बोलीं,

     

    “महादेव को भेंट की कीमत नहीं, मन की सच्चाई दिखाई देती है।”

     

    माधव ने माता पार्वती को प्रणाम किया।

     

    “माता, मुझे आशीर्वाद दीजिए।”

     

    “सदा प्रसन्न रहो।”

     

    माधव वहीं बैठ गया। वह कुछ देर महादेव और माता पार्वती को देखता रहा।

     

    तभी माता पार्वती ने महादेव की ओर देखा।

     

    “महादेव, आपने आज सुबह कुछ खाया?”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “फिर से नहीं खाया?”

     

    “ध्यान में समय का पता नहीं चला।”

     

    “आपको ध्यान के अलावा कुछ याद भी रहता है?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    माधव यह देखकर थोड़ा हैरान हुआ।

     

    उसे लगा था कि कैलाश पर सब कुछ बहुत गंभीर और दिव्य होगा, लेकिन यहाँ तो माता पार्वती महादेव को उसी तरह डाँट रही थीं जैसे घर में कोई अपने बहुत करीबी को डाँटता है।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैंने सुबह ही कहा था कि समय पर भोजन कर लीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, अभी तो समय है।”

     

    “आपके लिए हर समय ‘अभी तो समय है’ होता है।”

     

    नंदी ने अपना सिर नीचे कर लिया ताकि उनकी हँसी दिखाई न दे।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम हँस रहे हो?”

     

    नंदी तुरंत सीधा बैठ गया।

     

    माधव से रहा नहीं गया। वह हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी ने उसे देख लिया।

     

    “माधव, तुम भी हँस रहे हो?”

     

    माधव घबरा गया।

     

    “नहीं माता… मैं तो बस…”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “देवी, भक्त को मत डराइए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैं इसे क्यों डराऊँगी? मैं तो बस पूछ रही हूँ।”

     

    माधव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “माता, मुझे पहली बार देखकर ऐसा लग रहा है कि आप दोनों के बीच भी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक होती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नोक-झोंक?”

     

    पार्वती जी तुरंत बोलीं,

     

    “हाँ, और इसमें गलत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराकर बोले,

     

    “कुछ भी गलत नहीं।”

     

    माधव ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “लेकिन माता, आप तो महादेव को डाँट रही थीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “बेटा, जिसे हम अपना मानते हैं, उसकी चिंता भी तो करते हैं।”

     

    माधव चुप हो गया।

     

    तभी महादेव बोले,

     

    “और कभी-कभी देवी को चिंता ज्यादा हो जाती है।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी ओर देखा।

     

    “ज्यादा?”

     

    महादेव समझ गए कि बात फिर बिगड़ सकती है।

     

    “मेरा मतलब था… आपकी चिंता बिल्कुल सही है।”

     

    माधव फिर मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “देखा माधव? बात बदलने में इन्हें कितना समय नहीं लगता।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, भक्त के सामने मेरी शिकायतें मत कीजिए।”

     

    “क्यों? भक्त को भी तो पता चले कि महादेव कितने लापरवाह हैं।”

     

    माधव हँसने लगा।

     

    महादेव ने उसे देखा।

     

    “तुम भी मेरी बात सुनकर हँस रहे हो?”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “प्रभु, क्षमा कीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “नहीं माधव, हँसो। आज कैलाश पर बहुत दिनों बाद इतनी खुलकर हँसी आई है।”

     

    माता पार्वती भी मुस्कुरा उठीं।

     

    कुछ देर बाद माधव ने अपनी समस्या बताई।

     

    “माता, प्रभु, मेरे गाँव में इस साल फसल खराब हो गई है। घर में बूढ़ी माँ हैं। मैं बहुत परेशान होकर आपके पास आया हूँ। मैं धन नहीं माँगता। बस इतना चाहता हूँ कि मेरी माँ भूखी न रहे।”

     

    महादेव ने उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारी माँ की सेवा ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूजा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “और याद रखना, किसी की मदद करने के लिए हमेशा धन की जरूरत नहीं होती। मेहनत और सच्चे मन से किया काम भी बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन माता, मेरे पास तो…”

     

    महादेव ने उसे रोकते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पास मेहनत करने की शक्ति है।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “क्या इससे मेरी समस्या हल हो जाएगी?”

     

    महादेव बोले,

     

    “रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन अगर मन सच्चा हो तो रास्ता मिलता जरूर है।”

     

    तभी पार्वती जी ने महादेव की ओर देखा।

     

    “और आप इसे कोई मदद नहीं करेंगे?”

     

    महादेव बोले,

     

    “मैं इसे आशीर्वाद दे चुका हूँ।”

     

    “सिर्फ आशीर्वाद?”

     

    “देवी…”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मेरा मतलब है, इसे ऐसा विश्वास दीजिए कि यह अपने गाँव जाकर हार न माने।”

     

    महादेव ने माधव की ओर देखा।

     

    “तुम्हें मेरी बात याद रखनी होगी। अपने गाँव लौटो। अपनी माँ की सेवा करो। खेत में फिर मेहनत करो। गाँव के दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करो। जो तुम्हारे पास है, उसे छोटा मत समझो।”

     

    माधव की आँखों में उम्मीद लौट आई।

     

    “प्रभु, मैं ऐसा ही करूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “और हाँ, अपनी माँ को कभी अकेला मत समझने देना।”

     

    “जी माता।”

     

    माधव ने दोनों को प्रणाम किया।

     

    फिर उसने धीरे से पूछा,

     

    “माता, एक बात पूछूँ?”

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप दोनों हमेशा ऐसे ही एक-दूसरे से नोक-झोंक करते हैं?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    पार्वती जी ने भी हँसते हुए कहा,

     

    “हाँ।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “फिर कभी नाराज़गी ज्यादा नहीं बढ़ती?”

     

    महादेव बोले,

     

    “जहाँ प्रेम हो, वहाँ नाराज़गी टिकती नहीं।”

     

    पार्वती जी ने उनकी ओर देखकर कहा,

     

    “लेकिन कभी-कभी इन्हें मनाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “और कभी-कभी देवी को मनाने में पूरा कैलाश भी कम पड़ जाता है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    नंदी भी खुशी से सिर हिलाने लगे।

     

    माधव ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “आज मैं यहाँ एक समस्या लेकर आया था, लेकिन वापस एक सीख लेकर जा रहा हूँ।”

     

    महादेव ने पूछा,

     

    “क्या सीख?”

     

    माधव बोला,

     

    “कि भगवान से प्रेम करने का मतलब सिर्फ उनसे माँगना नहीं है। और परिवार में छोटी-सी नोक-झोंक हो जाए तो उसे मन में नहीं रखना चाहिए।”

     

    माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा,

     

    “तुमने बिल्कुल सही समझा।”

     

    माधव वापस जाने लगा।

     

    महादेव ने उसे आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ माधव। तुम्हारा मन मजबूत रहे।”

     

    पार्वती जी ने भी कहा,

     

    “और अपनी माँ का ध्यान रखना।”

     

    माधव मुस्कुराते हुए कैलाश से नीचे उतर गया।

     

    उसके जाने के बाद महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा।

     

    “देवी, अब तो आप प्रसन्न हैं?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ।”

     

    “तो क्या अब मैं ध्यान कर सकता हूँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “पहले भोजन कीजिए।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मैं भूल ही गया था।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मुझे पता था।”

     

    नंदी फिर मुस्कुरा दिए।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम फिर हँस रहे हो?”

     

    और इस बार पूरा कैलाश जैसे उनकी हँसी से गूँज उठा।

     

    क्योंकि महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक में भी प्रेम था, और उस दिन एक भक्त ने सीख लिया था कि सच्चा परिवार वही है जहाँ नाराज़गी के बाद भी अपनापन कभी कम नहीं होता।

  • मां पार्वती की नाराज़गी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    ❤️ रूठी पार्वती और भोले महादेव

     

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सब कुछ शांत था। महादेव अपने स्थान पर बैठे ध्यान कर रहे थे और नंदी पास ही बैठे थे। गणेश जी भी अपने काम में लगे हुए थे। तभी माता पार्वती वहाँ आईं। उनके चेहरे पर हल्की नाराज़गी थी।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और उन्हें देखते ही बोले,

    “आइए देवी।”

     

    पार्वती जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह चुपचाप पास से निकल गईं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, देवी हमसे नाराज़ हैं क्या?”

     

    नंदी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    महादेव ने कुछ सोचा और फिर बोले,

    “लेकिन क्यों?”

     

    नंदी के पास इसका जवाब नहीं था।

     

    थोड़ी देर बाद महादेव ने पार्वती जी को फिर देखा। वह कैलाश के एक कोने में बैठी थीं और फूलों की माला बना रही थीं।

     

    महादेव उनके पास गए।

     

    “देवी।”

     

    पार्वती जी चुप रहीं।

     

    “आप मुझसे बात नहीं करेंगी?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव उनके सामने बैठ गए।

     

    “क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”

     

    पार्वती जी ने धीरे से कहा,

    “आपको नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने मुँह फेर लिया।

     

    “यही तो बात है।”

     

    महादेव थोड़ा उलझ गए।

     

    “क्या बात?”

     

    “आपको कुछ पता ही नहीं चलता।”

     

    महादेव शांत बैठे रहे।

     

    “देवी, आप बता देंगी तो मुझे पता चल जाएगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अगर हर बात मुझे ही बतानी पड़े तो फिर आपको खुद समझने की जरूरत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराने लगे।

     

    “आप सही कह रही हैं।”

     

    “अब मुस्कुराइए मत।”

     

    महादेव ने तुरंत अपनी मुस्कान रोक ली।

     

    “ठीक है।”

     

    पार्वती जी फिर फूलों की माला बनाने लगीं।

     

    महादेव कुछ देर उनके पास बैठे रहे। फिर उठकर चले गए।

     

    नंदी ने सोचा कि शायद महादेव अब समझ गए होंगे।

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद महादेव वापस आए।

     

    उनके हाथ में एक सुंदर फूल था।

     

    उन्होंने फूल पार्वती जी की तरफ बढ़ाया।

     

    “देवी, यह आपके लिए।”

     

    पार्वती जी ने फूल देखा।

     

    “फूल देने से गलती खत्म नहीं होगी।”

     

    “तो गलती क्या है?”

     

    पार्वती जी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको सच में नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने गहरी साँस ली।

     

    “कल मैंने आपसे कहा था कि आज मेरे साथ कुछ समय बिताइए।”

     

    महादेव बोले,

    “हाँ।”

     

    “और आपने क्या कहा था?”

     

    महादेव सोचने लगे।

     

    “मैंने कहा था कि बाद में।”

     

    “और वह ‘बाद में’ कब आया?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “पूरा दिन बीत गया और आपको याद ही नहीं आया।”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “देवी, मैं ध्यान में था।”

     

    “मुझे पता है। आप हमेशा ध्यान में रहते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “मैंने सोचा था कि आप समझ जाएँगी।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “और मैं सोच रही थी कि आप समझेंगे।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर महादेव बोले,

    “तो हम दोनों ही एक-दूसरे के समझने का इंतजार करते रहे।”

     

    पार्वती जी का चेहरा थोड़ा नरम हुआ।

     

    “शायद।”

     

    महादेव उनके पास बैठ गए।

     

    “देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “इतनी आसानी से नहीं।”

     

    “तो क्या करना होगा?”

     

    “आपको खुद पता लगाना होगा।”

     

    महादेव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोले,

    “ठीक है। आज पूरा दिन मैं आपके साथ रहूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    “ध्यान नहीं करेंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “किसी और काम के लिए नहीं जाएंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “नंदी के साथ भी नहीं जाएंगे?”

     

    दूर खड़े नंदी ने यह सुनते ही अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “नंदी भी हमारे साथ रहेगा।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन तभी महादेव बोले,

    “लेकिन एक बात है।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर आप नाराज़ न होतीं तो मुझे यह सब करने का मौका भी नहीं मिलता।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “मतलब अब गलती मेरी?”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “नहीं, नहीं। मैंने ऐसा नहीं कहा।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना, कभी-कभी अपनी बातों में खुद ही फँस जाते हैं।”

     

    महादेव भी मुस्कुराने लगे।

     

    तभी गणेश जी वहाँ आए।

     

    उन्होंने दोनों को साथ बैठे देखा तो बोले,

    “माता, अब आपका गुस्सा खत्म हो गया?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अभी थोड़ा बाकी है।”

     

    महादेव ने गणेश जी की तरफ देखा।

     

    “पुत्र, तुम मेरी सहायता करोगे?”

     

    गणेश जी हँसकर बोले,

    “पिता, इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूँगा। माता के सामने आपकी कोई नहीं चलती।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    महादेव ने गणेश जी से कहा,

    “तुम भी अपनी माता का पक्ष ले रहे हो?”

     

    गणेश जी बोले,

    “पिता, मैं तो सच का पक्ष ले रहा हूँ।”

     

    “और सच क्या है?”

     

    “यह कि माता आपसे नाराज़ हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “यह तो मुझे भी पता है।”

     

    कुछ देर बाद सभी कैलाश के पास बैठे थे। पार्वती जी फूलों की माला बना रही थीं और महादेव उनके लिए फूल चुनकर ला रहे थे।

     

    एक फूल लाकर महादेव ने पूछा,

    “यह अच्छा है?”

     

    पार्वती जी ने देखा।

     

    “हाँ।”

     

    महादेव दूसरा फूल लाए।

     

    “और यह?”

     

    “यह भी अच्छा है।”

     

    महादेव तीसरा फूल लाए।

     

    पार्वती जी ने हँसकर कहा,

    “महादेव, आपको फूल चुनना नहीं आता।”

     

    “तो आप ही चुन लीजिए।”

     

    “नहीं। आज आप चुनेंगे।”

     

    महादेव एक-एक करके फूल लाते रहे।

     

    कुछ देर बाद पार्वती जी ने कहा,

    “अब समझे कि मुझे कल कैसा लगा था?”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हाँ देवी।”

     

    “क्या समझे?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “कभी-कभी जिसे हम बहुत प्रेम करते हैं, उसे हमारी चीजों की नहीं, बस हमारे समय की जरूरत होती है।”

     

    पार्वती जी की आँखों में हल्की चमक आ गई।

     

    “और?”

     

    महादेव बोले,

    “और यह कि प्रेम में बड़ी-बड़ी चीजें जरूरी नहीं होतीं। साथ बैठना भी काफी होता है।”

     

    पार्वती जी मुस्कुरा दीं।

     

    “अब आप समझे।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हाँ देवी।”

     

    पार्वती जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन एक बात याद रखिएगा।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर अगली बार फिर मुझे यूँ इंतजार करवाया…”

     

    महादेव ने तुरंत पूछा,

    “तो?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “तो मैं आपसे तीन दिन तक बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “तीन दिन?”

     

    गणेश जी हँसने लगे।

     

    नंदी भी खुशी से अपनी पूँछ हिलाने लगे।

     

    महादेव ने कहा,

    “देवी, एक दिन की नाराज़गी ही मेरे लिए बहुत थी। तीन दिन का दंड मत दीजिए।”

     

    पार्वती जी हँसते हुए बोलीं,

    “तो फिर मुझे इंतजार मत करवाइए।”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखकर कहा,

    “वचन है।”

     

    फिर दोनों साथ बैठ गए।

     

    कैलाश की हवा धीरे-धीरे चल रही थी। आसपास शांति थी। महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा और मुस्कुराए।

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “अब क्या देख रहे हैं?”

     

    महादेव बोले,

    “सोच रहा हूँ कि आज अगर आप रूठती नहींं, तो मुझे यह याद कैसे रहता कि आपके साथ बिताया हुआ एक छोटा-सा पल भी मेरे लिए कितना खास है।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

    “और मुझे यह याद रहेगा कि मेरे भोले महादेव को कभी-कभी बात समझाने के लिए थोड़ा रूठना भी पड़ता है।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    और इस तरह कैलाश पर हुई छोटी-सी नाराज़गी फिर से मुस्कान में बदल गई।

     

    क्योंकि जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ रूठना भी रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं होता—बल्कि एक-दूसरे को थोड़ा और समझने के लिए होता है।