🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अनुसूइया और भंवरा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

अनुसूइया और एक भंवरा

 

एक छोटे से गांव के किनारे एक सुंदर-सा बगीचा था। उस बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले रहते थे। सुबह होते ही वहां तितलियां मंडराने लगतीं और भंवरे फूलों के आसपास गुनगुनाते रहते। उसी गांव में अनुसूइया नाम की एक सरल और दयालु लड़की रहती थी। उसे पेड़-पौधों और फूलों से बहुत प्यार था।

 

अनुसूइया रोज सुबह उठकर अपने छोटे से बगीचे में पानी डालती और पौधों से बातें करती।

 

एक दिन उसने देखा कि एक काला-सा भंवरा बार-बार एक ही फूल के आसपास मंडरा रहा है।

 

अनुसूइया मुस्कुराकर बोली, “तुम रोज इसी फूल के पास क्यों आते हो?”

 

भंवरा कुछ देर फूल पर बैठा, फिर उड़कर उसके सिर के ऊपर चक्कर लगाने लगा।

 

अनुसूइया हंस पड़ी।

 

“अच्छा! तो तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?”

 

भंवरा फिर उसके पास आकर मंडराने लगा।

 

उस दिन के बाद वह भंवरा रोज अनुसूइया के बगीचे में आने लगा। अनुसूइया ने उसका नाम रख दिया—भौंरा।

 

वह जब भी बगीचे में आती, भौंरा उसके आसपास गुनगुनाता रहता।

 

एक दिन अनुसूइया ने कहा, “भौंरा, तुम सिर्फ मेरे बगीचे में ही क्यों आते हो? पूरे गांव में इतने फूल हैं।”

 

जैसे ही उसने यह कहा, भौंरा उड़कर एक सूखे पौधे के पास चला गया।

 

अनुसूइया उसके पीछे गई।

 

वहां उसने देखा कि उस पौधे पर एक भी फूल नहीं था।

 

अनुसूइया बोली, “इस पौधे पर तो कुछ भी नहीं है।”

 

भौंरा उसी पौधे के पास मंडराता रहा।

 

अनुसूइया को कुछ समझ नहीं आया।

 

उसने उस पौधे को ध्यान से देखा। मिट्टी बहुत सूखी थी।

 

“ओह! तुम मुझे बता रहे हो कि इसे पानी चाहिए?”

 

उसने तुरंत पौधे में पानी डाल दिया।

 

कुछ दिनों तक वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी।

 

एक सप्ताह बाद उस पर छोटी-सी कली निकल आई।

 

अनुसूइया बहुत खुश हुई।

 

“भौंरा! देखो, तुम्हारा पौधा फिर से खिलने वाला है।”

 

भौंरा उसके चारों तरफ खुशी से उड़ने लगा।

 

धीरे-धीरे वह पौधा फूलों से भर गया।

 

अनुसूइया को अब यकीन हो गया था कि भौंरा सिर्फ फूलों का रस लेने नहीं आता था। जैसे उसे भी इस बगीचे की चिंता थी।

 

लेकिन एक दिन गांव में तेज आंधी आई।

 

आसमान अचानक काला हो गया।

 

अनुसूइया ने जल्दी-जल्दी बगीचे के छोटे पौधों को बचाने की कोशिश की।

 

“हे भगवान! मेरे सारे फूल खराब न हो जाएं।”

 

तेज हवा चलने लगी।

 

पेड़ों की शाखाएं हिलने लगीं।

 

अनुसूइया एक पौधे को सहारा दे ही रही थी कि उसे भौंरे की आवाज सुनाई दी।

 

वह चारों तरफ देखने लगी।

 

“भौंरा? तुम कहां हो?”

 

भौंरा एक पेड़ के नीचे फंसा हुआ था।

 

अनुसूइया दौड़कर वहां पहुंची।

 

हवा बहुत तेज थी, लेकिन उसने सावधानी से एक सूखी टहनी हटाई।

 

भौंरा बाहर निकल आया।

 

“तुम ठीक हो?”

 

भौंरा कुछ देर उसके हाथ के पास मंडराता रहा।

 

अनुसूइया मुस्कुराई।

 

“डर गए थे ना?”

 

बारिश शुरू हो गई।

 

अनुसूइया भौंरे को एक पत्ते के नीचे सुरक्षित जगह पर ले गई।

 

उस रात उसने बगीचे में ही काफी देर तक पौधों को संभाला।

 

सुबह जब बारिश रुकी, तो बगीचे की हालत खराब थी।

 

कई फूल टूट गए थे।

 

कुछ पौधे जमीन पर गिर गए थे।

 

अनुसूइया की आंखों में आंसू आ गए।

 

“इतनी मेहनत की थी… सब खराब हो गया।”

 

तभी भौंरा उसके पास आया।

 

वह एक फूल के ऊपर बैठा और फिर उड़कर दूसरे पौधे पर गया।

 

अनुसूइया उसे देखते हुए बोली, “तुम कह रहे हो कि मुझे हार नहीं माननी चाहिए?”

 

भौंरा उसके आसपास घूमने लगा।

 

अनुसूइया ने आंसू पोंछे।

 

“ठीक है। मैं फिर से शुरू करूंगी।”

 

उसने अगले दिन से बगीचे को दोबारा ठीक करना शुरू किया।

 

गांव के कुछ बच्चे भी उसकी मदद करने लगे।

 

किसी ने पौधे लगाए, किसी ने मिट्टी ठीक की और किसी ने पानी दिया।

 

कुछ ही दिनों में बगीचा फिर से हरा होने लगा।

 

लेकिन उसी दौरान गांव में एक समस्या खड़ी हो गई।

 

गांव के लोगों ने देखा कि इस साल फूलों और फलों की संख्या बहुत कम हो रही है।

 

गांव के बुजुर्ग बोले, “लगता है मौसम ठीक नहीं है।”

 

अनुसूइया ने अपने बगीचे में देखा।

 

उसे याद आया कि जब भौंरे और तितलियां फूलों के पास आती हैं, तो कुछ समय बाद पौधों पर फल और बीज बनने लगते हैं।

 

उसने गांव वालों से कहा, “हमें अपने बगीचों में ऐसे पौधे लगाने चाहिए जिन पर भंवरे और तितलियां आ सकें।”

 

कुछ लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

 

“एक भंवरे से गांव की खेती चलेगी क्या?”

 

अनुसूइया चुप रही।

 

उसने किसी से बहस नहीं की।

 

उसने अपने बगीचे में अलग-अलग फूल लगाने शुरू कर दिए।

 

गेंदा, सूरजमुखी, चमेली और कई दूसरे फूल।

 

कुछ समय बाद उसके बगीचे में फिर से भंवरे और तितलियां आने लगीं।

 

धीरे-धीरे उसके पौधों पर फल और बीज भी आने लगे।

 

गांव के लोगों ने यह देखा तो उन्हें अपनी गलती समझ आई।

 

एक बुजुर्ग किसान अनुसूइया के पास आए।

 

“बेटी, तुम सही कह रही थी।”

 

अनुसूइया मुस्कुराई।

 

“मैं नहीं, भौंरा सही था।”

 

किसान हंस पड़े।

 

“भौंरा?”

 

अनुसूइया ने सिर हिलाया।

 

“हां। उसी ने मुझे सिखाया कि छोटी-सी चीज भी बड़ी मदद कर सकती है।”

 

उस दिन से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास फूलों के पौधे लगाने शुरू कर दिए।

 

कुछ महीनों बाद पूरा गांव फूलों से भर गया।

 

भंवरे और तितलियां हर तरफ दिखाई देने लगे।

 

अनुसूइया का छोटा-सा बगीचा अब गांव के लिए मिसाल बन चुका था।

 

लेकिन एक सुबह भौंरा दिखाई नहीं दिया।

 

अनुसूइया ने पूरा बगीचा देख लिया।

 

“भौंरा… कहां हो तुम?”

 

वह पेड़ों के पास गई, फूलों के पास गई, लेकिन भौंरा कहीं नहीं था।

 

दो दिन बीत गए।

 

अनुसूइया उदास रहने लगी।

 

तीसरे दिन सुबह वह उसी पुराने पौधे के पास गई, जिसे उसने कभी भौंरे के कहने पर पानी दिया था।

 

वह पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका था।

 

उस पर अनगिनत फूल खिले थे।

 

अचानक उसे वही परिचित गुनगुनाहट सुनाई दी।

 

“गुं… गुं…”

 

अनुसूइया ने पीछे मुड़कर देखा।

 

भौंरा उसके सामने मंडरा रहा था।

 

उसकी आंखों में खुशी आ गई।

 

“तुम आ गए!”

 

भौंरा एक फूल पर बैठा और फिर उड़कर उसके कंधे के पास आ गया।

 

अनुसूइया हंसते हुए बोली, “तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते।”

 

भौंरा जैसे उसकी बात समझ रहा हो, फिर उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

 

अनुसूइया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

 

“कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी में किसी इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी निशानी के रूप में खुशी भेजते हैं।”

 

उसके लिए वह भंवरा सिर्फ एक कीड़ा नहीं था।

 

वह उसका छोटा-सा दोस्त था, जिसने उसे सिखाया था कि किसी चीज को छोटा समझकर उसकी अहमियत नहीं भूलनी चाहिए।

 

उस दिन से अनुसूइया जब भी अपने बगीचे में आती, सबसे पहले उसकी नजर फूलों पर जाती और फिर वह मुस्कुराकर कहती—

 

“भौंरा, आज फिर कुछ नया सिखाने आए हो क्या?”

 

और बगीचे में गूंजती उसकी प्यारी-सी गुनगुनाहट जैसे जवाब देती—

 

“गुं… गुं…”

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *