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मजबूरी में बनी नाचने वाली

पढ़ने का समय : 6 मिनट

मजबूरी में नचनिया बनी राधा

 

शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा कस्बा था, जहाँ लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। उसी कस्बे के किनारे एक पुराने से घर में राधा अपनी माँ और छोटे भाई मोहन के साथ रहती थी।

 

राधा को बचपन से नृत्य का बहुत शौक था। जब भी मंदिर में भजन होता या किसी शादी में ढोलक बजती, उसके पैर अपने आप थिरकने लगते। उसकी माँ अक्सर मुस्कुराकर कहतीं—

 

“बेटी, तेरे पैरों में तो जैसे घुंघरू बंधे हैं।”

 

राधा हँसकर कहती—

 

“माँ, एक दिन मैं बहुत बड़ा मंच ढूँढ़ूँगी और वहाँ नाचूँगी।”

 

लेकिन राधा की जिंदगी में सपनों से ज्यादा मजबूरियाँ थीं।

 

उसके पिता पहले मजदूरी करते थे। एक दुर्घटना के बाद उनका काम छूट गया। घर की थोड़ी-सी बचत इलाज में खत्म हो गई। कुछ ही समय बाद पिता चल बसे।

 

घर की सारी जिम्मेदारी माँ पर आ गई।

 

माँ दूसरों के घरों में काम करने लगीं, लेकिन इतनी कम कमाई में घर चलाना मुश्किल था। ऊपर से मोहन की पढ़ाई और माँ की दवाइयों का खर्च अलग था।

 

राधा ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

 

माँ ने बहुत रोका।

 

“तू पढ़ ले बेटी। तेरे पिता का सपना था कि तू खूब पढ़े।”

 

राधा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा—

 

“माँ, पहले घर संभालना जरूरी है। पढ़ाई बाद में कर लूँगी।”

 

एक दिन कस्बे में एक कार्यक्रम हुआ। वहाँ नृत्य करने वाली लड़कियों की जरूरत थी। राधा की पड़ोसन ने उसे बताया।

 

“राधा, तू तो अच्छा नाचती है। वहाँ काम मिल जाएगा। कुछ पैसे भी मिलेंगे।”

 

राधा पहले झिझकी।

 

“लेकिन मैं ऐसे कार्यक्रमों में कभी नहीं गई।”

 

पड़ोसन ने कहा—

 

“नाचना ही तो है। अगर इससे घर चल सकता है तो बुरा क्या है?”

 

राधा अपनी माँ की दवाइयों को देखकर चुप हो गई।

 

उसने कार्यक्रम में जाने का फैसला कर लिया।

 

उस रात उसने पहली बार मंच पर नृत्य किया।

 

लोगों ने तालियाँ बजाईं।

 

उसे पैसे मिले।

 

घर लौटकर उसने पैसे माँ के हाथ में रख दिए।

 

माँ की आँखों में आँसू आ गए।

 

“बेटी, तूने आज मेरा बोझ हल्का कर दिया।”

 

राधा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब मोहन की फीस समय पर जाएगी।”

 

धीरे-धीरे राधा को अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा।

 

लोग उसे “नचनिया” कहने लगे।

 

शुरुआत में राधा को यह शब्द बुरा लगता था।

 

कई लोग उसके काम को सम्मान की नजर से नहीं देखते थे।

 

एक दिन बाजार में किसी ने उसे देखकर अपने साथी से कहा—

 

“देखो, यही है वो नचनिया।”

 

राधा ने सुन लिया।

 

उसके कदम रुक गए।

 

घर लौटकर वह देर तक चुप बैठी रही।

 

माँ ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

राधा बोली—

 

“माँ, क्या मैं गलत काम कर रही हूँ?”

 

माँ ने तुरंत कहा—

 

“नहीं बेटी। मेहनत करके घर चलाना गलत नहीं होता। गलत तो लोगों की सोच है, जो बिना किसी की मजबूरी जाने फैसला कर देती है।”

 

राधा ने माँ की बात दिल में रख ली।

 

लेकिन कुछ समय बाद हालात और मुश्किल हो गए।

 

जिस कार्यक्रम में वह काम करती थी, वहाँ आयोजक ने उससे कहा—

 

“अब तुम्हें ज्यादा कार्यक्रम करने होंगे। तभी ज्यादा पैसे मिलेंगे।”

 

राधा ने कहा—

 

“मैं जितना काम कर सकती हूँ, करूँगी। लेकिन अपनी मर्यादा के खिलाफ कुछ नहीं करूँगी।”

 

उसने साफ मना कर दिया।

 

आयोजक नाराज हो गया।

 

“फिर तुम्हें काम नहीं मिलेगा।”

 

राधा ने शांत होकर जवाब दिया—

 

“काम जाएगा तो दूसरा ढूँढ़ लूँगी। लेकिन अपने सम्मान से समझौता नहीं करूँगी।”

 

उस दिन उसे काम नहीं मिला।

 

घर की हालत फिर खराब होने लगी।

 

लेकिन राधा ने हार नहीं मानी।

 

उसने अपने नृत्य को सिर्फ मजबूरी नहीं, अपनी कला बनाने का फैसला किया।

 

उसने पुराने गुरुजी से संपर्क किया, जो कभी मंदिर में बच्चों को नृत्य सिखाते थे।

 

“गुरुजी, क्या आप मुझे फिर से सिखाएँगे?”

 

गुरुजी ने पूछा—

 

“तुम्हें नृत्य सीखना है या सिर्फ पैसे कमाने हैं?”

 

राधा ने कहा—

 

“अब मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे मेरी मजबूरी से नहीं, मेरी कला से पहचानें।”

 

गुरुजी मुस्कुराए।

 

“तो कल से आ जाना।”

 

राधा ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

 

सुबह घर का काम।

 

दोपहर में छोटे कार्यक्रम।

 

शाम को नृत्य की कक्षा।

 

रात को माँ और भाई की देखभाल।

 

कुछ महीनों बाद राधा की कला में बहुत सुधार आया।

 

एक दिन शहर में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम होने वाला था। गुरुजी ने राधा का नाम वहाँ भेज दिया।

 

राधा का चयन हो गया।

 

कार्यक्रम वाले दिन वह मंच के पीछे खड़ी थी।

 

उसके हाथ काँप रहे थे।

 

गुरुजी ने कहा—

 

“डर क्यों रही हो?”

 

राधा बोली—

 

“आज पहली बार लग रहा है कि मैं अपनी मजबूरी के लिए नहीं, अपने सपने के लिए मंच पर जा रही हूँ।”

 

गुरुजी ने कहा—

 

“यही फर्क तुम्हें आगे ले जाएगा।”

 

राधा मंच पर पहुँची।

 

संगीत शुरू हुआ।

 

उसने नृत्य करना शुरू किया।

 

इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

 

उसके हर कदम में उसकी कहानी थी—पिता की याद, माँ की मेहनत, भाई की पढ़ाई, लोगों के ताने और उसके अपने सपने।

 

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

 

कार्यक्रम के बाद एक बड़ी संस्था ने उसे अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया।

 

उन्होंने कहा—

 

“हम चाहते हैं कि आप बच्चों को नृत्य सिखाएँ।”

 

राधा कुछ पल चुप रही।

 

“क्या मैं भी बच्चों को सिखा सकती हूँ?”

 

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

 

“क्यों नहीं?”

 

उस दिन राधा की जिंदगी बदल गई।

 

अब वह सिर्फ कार्यक्रमों में नाचने वाली लड़की नहीं थी।

 

वह एक नृत्य शिक्षिका थी।

 

उसने अपने कस्बे में गरीब बच्चों के लिए एक छोटी-सी नृत्य कक्षा शुरू की।

 

एक दिन वही पड़ोसन, जिसने उसे पहली बार कार्यक्रम में भेजा था, उससे मिलने आई।

 

उसने कहा—

 

“राधा, मुझे तुम पर गर्व है।”

 

राधा मुस्कुराई।

 

“मैंने बस इतना सीखा है कि मजबूरी इंसान को रास्ता दिखा सकती है, लेकिन मंजिल उसे खुद चुननी पड़ती है।”

 

कुछ समय बाद राधा ने अपने भाई मोहन की पढ़ाई पूरी करवाई।

 

माँ की दवाइयाँ भी नियमित चलने लगीं।

 

एक शाम माँ ने राधा को घुंघरू बाँधते हुए देखा।

 

उन्होंने कहा—

 

“याद है, बचपन में मैं कहती थी तेरे पैरों में घुंघरू बंधे हैं?”

 

राधा हँस पड़ी।

 

“हाँ माँ।”

 

माँ ने कहा—

 

“तब मुझे नहीं पता था कि यही घुंघरू एक दिन हमारे घर की उम्मीद बनेंगे।”

 

राधा की आँखों में आँसू आ गए।

 

उसने माँ को गले लगा लिया।

 

अब जब कोई उसे “नचनिया” कहता, तो वह बुरा नहीं मानती थी।

 

वह मुस्कुराकर कहती—

 

“हाँ, मैं नृत्य करती हूँ। क्योंकि नृत्य मेरी कला है, मेरी मेहनत है और मेरे सपनों का रास्ता है।”

 

राधा ने अपनी मजबूरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

 

उसने उसे अपनी ताकत बना लिया।

 

और उसकी कहानी ने पूरे कस्बे को एक बात सिखा दी—

 

किसी इंसान के काम को देखकर उसके चरित्र या उसकी मजबूरी का फैसला नहीं करना चाहिए। हर मेहनत के पीछे एक कहानी होती है, और हर इंसान सम्मान का हकदार होता है।

 

 

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