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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 11

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

एपिसोड – 11 : जिसे मां समझती रही

 

हरिशंकर के मुंह से निकले शब्दों ने आरोही की पूरी दुनिया हिला दी थी।

 

“जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”

 

आरोही कुछ पल तक उन्हें देखती रही।

 

उसके कानों में जैसे बाकी सारी आवाजें बंद हो गई थीं।

 

“आप… क्या कह रहे हैं?”

 

हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

 

“मैं जानता हूं ये सुनना तुम्हारे लिए आसान नहीं है।”

 

आरोही की आवाज कांप रही थी।

 

“वो मेरी मां हैं। उन्होंने मुझे पाला है। बचपन से मेरे साथ रही हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि वो मेरी मां नहीं हैं?”

 

हरिशंकर ने गहरी सांस ली।

 

“मैंने ये नहीं कहा कि उन्होंने तुम्हें प्यार नहीं किया। मैंने सिर्फ इतना कहा है कि वो तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं हैं।”

 

आरोही पीछे हट गई।

 

“नहीं…”

 

आरव तुरंत उसके पास आया।

 

“आरोही, शांत हो जाओ।”

 

“नहीं आरव।”

 

उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मेरी जिंदगी में और कितना झूठ है?”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“जब तक पूरा सच सामने नहीं आता, किसी बात पर भरोसा मत करो।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“लेकिन अगर ये सच हुआ तो?”

 

आरव ने बिना झिझक कहा,

 

“तो भी मैं तुम्हारे साथ हूं।”

 

आरोही की आंखों से आंसू और तेज बहने लगे।

 

“तुम हर बार मेरे साथ रहने की बात क्यों करते हो?”

 

आरव ने धीमे से कहा,

 

“क्योंकि जब तुम टूटती हो… तो मुझे भी दर्द होता है।”

 

आरोही ने कुछ नहीं कहा।

 

उसने बस अपना सिर आरव के कंधे पर रख दिया।

 

कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

 

लेकिन हरिशंकर उन्हें देखकर बेचैन थे।

 

उन्होंने धीरे से कहा,

 

“हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि विराज के लोग हमें ढूंढ रहे होंगे।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“पहले सुरक्षित जगह चलते हैं।”

 

तीनों एक पुराने मंदिर के पीछे बने छोटे से कमरे में पहुंचे।

 

हरिशंकर ने दरवाजा बंद किया।

 

आरोही अब भी खामोश थी।

 

कुछ देर बाद उसने पूछा,

 

“हरिशंकर जी… आपको कैसे पता कि मेरी मां मेरी असली मां नहीं हैं?”

 

हरिशंकर ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय मैं अस्पताल में था।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“आप वहां क्यों थे?”

 

“तुम्हारे पिता के साथ।”

 

“पापा के साथ?”

 

“हां।”

 

उन्होंने आगे कहा,

 

“उस रात तुम्हारे पिता बहुत परेशान थे। तुम्हारा जन्म हुआ था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद तुम्हारी जिंदगी बदल गई।”

 

आरोही ने घबराकर पूछा,

 

“क्या हुआ था?”

 

हरिशंकर ने कहा,

 

“तुम्हारी जन्म देने वाली मां…”

 

वह रुक गए।

 

“क्या हुआ था उन्हें?”

 

“उनकी मौत हो गई थी।”

 

आरोही जैसे पत्थर की हो गई।

 

“मेरी… मां मर गई थीं?”

 

“हां।”

 

उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तो फिर जिन्हें मैं मां कहती हूं…”

 

हरिशंकर ने कहा,

 

“वो तुम्हारी मां की सबसे करीबी दोस्त थीं।”

 

आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

 

“पापा ने मुझे उनसे क्यों रखा?”

 

“क्योंकि उस समय तुम्हारी जान खतरे में थी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किससे?”

 

हरिशंकर ने जवाब दिया,

 

“विराज से।”

 

आरव चुप हो गया।

 

हरिशंकर आगे बोले,

 

“विराज को पता था कि तुम्हारे पिता के पास उसके खिलाफ सबूत हैं। उसे डर था कि अगर विनय की बेटी बड़ी होकर सच जान गई, तो वो सब कुछ उजागर कर देगी।”

 

आरोही ने आंसू पोंछे।

 

“लेकिन मेरी मां…”

 

“तुम्हारे पिता ने उन्हें कहा था कि वो तुम्हें अपनी बेटी बनाकर रखें।”

 

“और उन्होंने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि उन्हें डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

 

आरोही ने धीमे से पूछा,

 

“क्या मेरे पिता ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था?”

 

“हां।”

 

हरिशंकर ने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

 

“ये तुम्हारे पिता का लिखा हुआ बयान है।”

 

आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

 

उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही को बचाने के लिए उसे सच्चाई से दूर रखना। जिस औरत को वो मां कहेगी, वो मेरी बेटी को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करेगी। लेकिन उसे सच तब तक मत बताना जब तक विराज का खतरा खत्म न हो जाए।”

 

आरोही ने कागज सीने से लगा लिया।

 

उसकी आंखों से आंसू बहते रहे।

 

“तो मां ने मुझसे झूठ बोला… लेकिन मुझे बचाने के लिए।”

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“शायद।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब मुझे उनसे सच सुनना है।”

 

 

रात होते-होते आरोही और आरव उसके घर पहुंचे।

 

मां दरवाजे के पास बैठी थीं।

 

आरोही को देखते ही उनके चेहरे पर डर और राहत दोनों दिखाई दिए।

 

“तुम ठीक हो?”

 

आरोही कुछ नहीं बोली।

 

वह सीधे उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।

 

“मां।”

 

उनकी आंखें भर आईं।

 

“हां बेटी।”

 

“मुझसे एक बात सच-सच कहिए।”

 

मां ने नजरें झुका लीं।

 

“क्या?”

 

“क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूं?”

 

कमरे में खामोशी छा गई।

 

मां की आंखों से आंसू गिर पड़े।

 

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

 

आरोही की आवाज टूट गई।

 

“बस एक बार कह दीजिए कि ये झूठ है।”

 

मां ने सिर उठाया।

 

“नहीं बेटी… ये झूठ नहीं है।”

 

आरोही जैसे अंदर से टूट गई।

 

“तो आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

 

मां उसके पास आईं।

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे वचन दिया था।”

 

“किस बात का?”

 

“तुम्हें जिंदा रखने का।”

 

आरोही पीछे हट गई।

 

“क्या मेरी असली मां…”

 

मां ने रोते हुए कहा,

 

“तुम्हारी जन्म देने वाली मां का नाम नंदिनी था।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“नंदिनी?”

 

“हां।”

 

“वो कैसी थीं?”

 

मां मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं,

 

“बहुत खूबसूरत थीं। लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“उनकी मौत कैसे हुई?”

 

मां चुप हो गईं।

 

आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, मुझे सच चाहिए।”

 

मां ने कांपती आवाज में कहा,

 

“नंदिनी की मौत… अस्पताल में नहीं हुई थी।”

 

आरोही ठिठक गई।

 

“फिर?”

 

“तुम्हारे जन्म के बाद उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाया गया था।”

 

“किसने?”

 

मां की आंखों में डर उतर आया।

 

“विराज के आदमियों ने।”

 

आरव की मुट्ठी कस गई।

 

“और फिर?”

 

“वो कभी वापस नहीं आईं।”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“तो पापा ने क्या किया?”

 

“उन्होंने विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए।”

 

“और उसी वजह से पापा की मौत हुई?”

 

मां ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव अब तक खामोश खड़ा था।

 

उसने पूछा,

 

“मेरे पिता को ये सब पता था?”

 

मां ने उसकी तरफ देखा।

 

“हां।”

 

“फिर उन्होंने हमें क्यों अलग किया?”

 

“क्योंकि विराज को पता चल चुका था कि तुम दोनों के परिवारों के बीच पुराना रिश्ता है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कौन-सा रिश्ता?”

 

मां ने कहा,

 

“तुम्हारे पिता और राजवीर ने तय किया था कि जब तुम दोनों बड़े हो जाओगे…”

 

वह रुक गईं।

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या?”

 

“तुम दोनों की शादी करेंगे।”

 

आरोही और आरव दोनों स्तब्ध रह गए।

 

“क्या?”

 

मां की आंखों में आंसू थे।

 

“तुम दोनों बचपन से एक-दूसरे के लिए तय थे।”

 

आरोही ने आरव की तरफ देखा।

 

आरव भी उसे देख रहा था।

 

उसके चेहरे पर हैरानी के साथ एक हल्की मुस्कान आ गई।

 

“तो बचपन में तुमने सच में कहा था कि मैं तुम्हें भूलूं नहीं।”

 

आरोही की आंखों में आंसू के बीच मुस्कान आ गई।

 

“मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है।”

 

“तुमने लाल पतंग उड़ाई थी।”

 

आरोही हंसते हुए रो पड़ी।

 

“और तुमने मेरी पतंग काट दी थी।”

 

आरव भी हंस पड़ा।

 

“मुझे क्या पता था कि वही लड़की एक दिन मेरी जिंदगी बन जाएगी।”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

मां उन्हें देख रही थीं।

 

उनकी आंखों में खुशी थी।

 

लेकिन उसी खुशी के पीछे डर भी था।

 

मां ने कहा,

 

“लेकिन एक बात और है।”

 

आरोही ने उनकी तरफ देखा।

 

“अब क्या?”

 

मां ने कहा,

 

“विराज सिर्फ तुम्हारे परिवार के पीछे नहीं था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तो?”

 

“वो राजवीर के परिवार को भी खत्म करना चाहता था।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि राजवीर के पास भी उसके खिलाफ सबूत थे।”

 

आरव ने पूछा,

 

“वो सबूत कहां हैं?”

 

मां ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

 

“तुम्हारे पिता ने उन्हें कहीं छुपाया था।”

 

“कहां?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

तभी आरव का फोन बजा।

 

कबीर का कॉल था।

 

“आरव, मुझे एक जरूरी जानकारी मिली है।”

 

“क्या?”

 

“मैंने विराज के पुराने रिकॉर्ड खंगाले हैं।”

 

“और?”

 

“उसके नाम से एक बैंक लॉकर था।”

 

आरव की आंखें चमक उठीं।

 

“कहां?”

 

“शहर के पुराने बैंक में।”

 

“उसमें क्या है?”

 

कबीर ने कहा,

 

“पता नहीं। लेकिन लॉकर दस साल से बंद है।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किसके नाम पर?”

 

कबीर कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला “नंदिनी मेहरा।”

 

आरोही के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

 

“नंदिनी… मेरी असली मां?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“हमें उस लॉकर तक पहुंचना होगा।”

 

 

रात करीब बारह बजे।

 

सभी सोने की तैयारी कर रहे थे।

 

तभी घर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

 

आरव तुरंत खिड़की के पास गया।

 

बाहर एक काली कार खड़ी थी।

 

उसकी खिड़की के पीछे कोई बैठा था।

 

आरव ने कहा,

 

“सब लोग पीछे हटो।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कौन है?”

 

“पता नहीं।”

 

कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

 

आरव बाहर जाने ही वाला था कि उसके फोन पर मैसेज आया।

 

“नंदिनी का लॉकर मत खोलना।”

 

आरव ने स्क्रीन आरोही को दिखाई।

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“उसे कैसे पता कि हम लॉकर के बारे में जानते हैं?”

 

आरव ने कहा,

 

“क्योंकि कोई हमें लगातार देख रहा है।”

 

तभी दूसरा मैसेज आया—

 

“अगर लॉकर खोला, तो तुम्हारी मां अगली होंगी।”

 

आरोही के हाथ कांपने लगे।

 

उसने मां की तरफ देखा।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“डरो मत।”

 

आरोही ने कहा,

 

“मैं नहीं डर रही।”

 

“झूठ।”

 

“हां… डर रही हूं।”

 

आरव उसके करीब आया।

 

“लेकिन अब तुम अकेली नहीं हो।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

 

“अगर मुझे कुछ हो गया तो?”

 

आरव ने तुरंत कहा,

 

“ऐसा मत कहना।”

 

“लेकिन—”

 

“मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

 

आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

 

आरव ने धीरे से उसके आंसू पोंछे।

 

“हम सच तक जाएंगे।”

 

“साथ?”

 

“साथ।”

 

अगली सुबह आरव, आरोही और कबीर पुराने बैंक पहुंचे।

 

कबीर ने सारे दस्तावेज तैयार कर लिए थे।

 

बैंक मैनेजर ने रिकॉर्ड देखकर कहा,

 

“लॉकर नंबर 317।”

 

आरोही ने कांपते हाथों से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

 

तीनों लॉकर रूम में पहुंचे।

 

लोहे का छोटा दरवाजा खोला गया।

 

अंदर एक पुराना लकड़ी का बॉक्स रखा था।

 

आरोही ने उसे उठाया।

 

बॉक्स पर सिर्फ एक शब्द लिखा था “आरोही।”

 

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“मेरी मां ने मेरे लिए रखा था।”

 

उसने बॉक्स खोला।

 

अंदर कुछ तस्वीरें थीं।

 

एक लाल रंग की छोटी चूड़ी।

 

एक पुराना लॉकेट।

 

और एक पत्र।

 

आरोही ने पत्र खोला।

 

पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें भर आईं “मेरी प्यारी बेटी आरोही, अगर तुम ये पत्र पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

 

उसने कांपते हुए आगे पढ़ा “लेकिन तुम्हें एक बात जाननी होगी। तुम्हारे पिता की मौत का बदला लेने वाला इंसान विराज नहीं है।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा,

 

“क्या?”

 

आरोही ने अगली लाइन पढ़ी।

 

उसकी सांस रुक गई।

 

पत्र में लिखा था “विराज सिर्फ एक मोहरा था। असली खेल किसी और ने शुरू किया था।”

 

आरोही ने आखिरी लाइन पढ़ी “और वो इंसान… हमारे परिवार का ही है।”

 

आरोही ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

 

आरव उसे देख रहा था।

 

कबीर स्तब्ध खड़ा था।

 

तीनों के बीच खामोशी छा गई।

 

लेकिन पत्र के नीचे एक नाम लिखा था।

 

नाम देखते ही आरोही के हाथ कांपने लगे।

 

उसने धीरे से कहा “मां…”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

आरोही ने पत्र उसकी तरफ बढ़ा दिया।

 

आरव ने नाम पढ़ा।

 

उसका चेहरा भी बदल गया।

 

क्योंकि पत्र में जिस इंसान का नाम था…

 

वो वही व्यक्ति था, जिस पर दोनों परिवार पिछले दस सालों से सबसे ज्यादा भरोसा करते आए थे।

 

और अब…

 

उनकी पूरी कहानी एक ऐसे विश्वासघात की तरफ बढ़ रही थी, जहां दुश्मन बाहर नहीं… उनके अपने बीच छिपा था।

 

जारी रहेगा…

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