एपिसोड – 10 : मौत के बाद भी जिंदा था वो
“असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”
आरोही की मां के मुंह से निकले ये शब्द सुनकर कमरे में जैसे समय थम गया।
आरव और आरोही एक-दूसरे को देखते रह गए।
कुछ सेकंड तक किसी के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली।
आखिर आरव ने पूछा,
“लेकिन… अगर विक्रम सूद मर चुका है, तो इतने सालों से हमें धमकाने वाला कौन है?”
आरोही की मां ने कांपती आवाज में कहा,
“यही तो मैं नहीं जानती।”
“आपने उसकी मौत देखी थी?”
“नहीं।”
“तो आपको कैसे पता कि वो मर चुका है?”
मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
“क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे उसकी मौत की खबर दी थी।”
आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।
“कब?”
“तुम्हारे पापा की मौत से ठीक दो दिन पहले।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“तो फिर पापा की मौत से दो दिन पहले ही विक्रम मर चुका था?”
“हां।”
“फिर मेरे पापा को किससे खतरा था?”
मां ने धीरे से कहा,
“उस आदमी से… जो विक्रम के नाम का इस्तेमाल कर रहा था।”
आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।
“क्या आपके पास कोई सबूत है?”
मां कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा,
“हां।”
“कहां?”
“तुम्हारे पापा ने मुझे एक तस्वीर दी थी।”
उन्होंने अलमारी खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।
लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।
आरव ने तस्वीर हाथ में ली।
उसमें तीन लोग खड़े थे।
राजवीर सिंह।
विनय मेहरा।
और विक्रम सूद।
लेकिन पीछे एक चौथा आदमी भी दिखाई दे रहा था।
उसका चेहरा आधा छाया में था।
आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।
“ये कौन है?”
मां ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
आरव ने तस्वीर पलट दी।
पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी “28 मार्च, रात 10:15।”
आरव अचानक ठिठक गया।
“ये वही रात है… जिस रात पापा की मौत हुई थी।”
कबीर ने तुरंत कहा,
“इस तस्वीर को स्कैन करना होगा। शायद बैकग्राउंड से कुछ पता चले।”
लेकिन तभी आरोही की नजर तस्वीर के कोने में लिखे एक छोटे-से नंबर पर पड़ी।
“17-B”
वह बोली,
“ये नंबर… M-17 से जुड़ा हो सकता है।”
आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
“हो सकता है।”
कबीर ने कहा,
“हमें पुराने रिकॉर्ड रूम में फिर जाना होगा।”
आरोही ने मां की तरफ देखा।
“मां, आप हमारे साथ चलेंगी?”
मां कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि वहां जाने का मतलब है कि दस साल पुरानी वो रात फिर से सामने आएगी।”
आरव ने कहा,
“शायद अब उसे सामने आना ही होगा।”
मां ने उसकी तरफ देखा।
“आरव, तुम्हारे पिता ने तुम दोनों को बचाने के लिए बहुत कुछ छुपाया था।”
“मुझे पता है।”
“लेकिन कुछ राज ऐसे हैं जिन्हें जानने के बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रहती।”
आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।
“हम सच से भागते-भागते थक चुके हैं।”
मां ने उसकी आंखों में देखा।
फिर धीरे से बोलीं,
“जाओ।”
“लेकिन सावधान रहना।”
कुछ घंटों बाद आरव, आरोही और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंचे।
इस बार आरव ने तस्वीर अपने साथ रखी थी।
उन्होंने उस जगह को दोबारा खंगालना शुरू किया।
कबीर ने दीवार पर लगे पुराने नंबर देखे।
“17-B…”
वह धीरे-धीरे दीवार के पास गया।
एक जगह पर लकड़ी का पैनल लगा था।
उसने उसे हटाया।
पीछे एक छोटा दरवाजा दिखाई दिया।
आरोही की सांस रुक गई।
“ये यहां पहले नहीं था।”
आरव ने कहा,
“क्योंकि इसे छुपाया गया था।”
दरवाजे पर छोटा-सा ताला लगा था।
आरव ने M-17 वाली चाबी लगाई।
ताला खुल गया।
अंदर एक बहुत छोटा कमरा था।
कमरे में सिर्फ एक टेबल, एक कुर्सी और पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।
टेबल पर एक कागज पड़ा था।
आरव ने उठाया।
उस पर लिखा था “अगर तुम यहां तक पहुंच चुके हो, तो अब तुम्हें सच जानने से कोई नहीं रोक सकता।”
आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“मुझे डर लग रहा है।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“मैं हूं।”
“तुम हर बार यही कहते हो।”
“और हर बार रहूंगा।”
आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।
कबीर ने टेप रिकॉर्डर उठाया।
“इसमें शायद रिकॉर्डिंग है।”
उसने प्ले बटन दबाया।
कुछ सेकंड शोर हुआ।
फिर विनय मेहरा की आवाज सुनाई दी।
“अगर ये रिकॉर्डिंग मेरे परिवार तक पहुंची है, तो शायद मैं जिंदा नहीं हूं।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“पापा…”
रिकॉर्डिंग आगे चली।
“राजवीर मेरा दुश्मन नहीं था। वो मेरा सबसे भरोसेमंद दोस्त था। हमने साथ मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत जमा किए थे।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“तो विक्रम…”
रिकॉर्डिंग में विनय की आवाज आई “लेकिन विक्रम अकेला नहीं था।”
कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।
“क्या?”
आरव ने कहा,
“आगे चलाओ।”
रिकॉर्डिंग फिर शुरू हुई।
“विक्रम के पीछे कोई और था। ऐसा आदमी जिसके पास हमारी कंपनी, हमारे परिवार और हमारी निजी जिंदगी की पूरी जानकारी थी।”
आरोही ने पूछा,
“कौन?”
रिकॉर्डिंग में विनय बोले “उसका नाम…”
अचानक आवाज में तेज शोर आया।
फिर रिकॉर्डिंग बंद हो गई।
कबीर ने कई बार कोशिश की।
लेकिन टेप आगे नहीं चला।
“यही हिस्सा खराब है।”
आरव ने गुस्से में टेबल पर हाथ मारा।
“हर बार नाम आने से पहले रिकॉर्डिंग क्यों रुक जाती है?”
आरोही ने धीरे से कहा,
“क्योंकि शायद कोई नहीं चाहता कि हमें उसका नाम पता चले।”
कबीर ने कमरे की तलाशी जारी रखी।
कुछ देर बाद उसने टेबल की दराज खोली।
अंदर एक पुराना मोबाइल फोन पड़ा था।
“ये देखो।”
आरव ने फोन उठाया।
फोन बंद था।
कबीर ने उसे चार्जर से जोड़ा।
कुछ मिनट बाद स्क्रीन जल उठी।
पासवर्ड मांगा गया।
आरोही ने कहा,
“शायद पापा का जन्मदिन?”
आरव ने तारीख डाली।
फोन खुल गया।
अंदर सिर्फ तीन वीडियो थे।
पहला वीडियो विनय मेहरा का था।
दूसरा राजवीर सिंह का।
और तीसरा…
किसी अनजान आदमी का।
आरव ने तीसरा वीडियो खोला।
स्क्रीन पर एक आदमी बैठा था।
चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।
उसने कहा “तुम दोनों के पिता बहुत ज्यादा सच जान चुके हैं।”
आरव का चेहरा सख्त हो गया।
वीडियो में आदमी आगे बोला “अगर उन्होंने अपना मुंह बंद नहीं किया, तो दोनों परिवारों का अंत कर दिया जाएगा।”
फिर उसने कैमरे की तरफ देखा।
उसका चेहरा कुछ सेकंड के लिए रोशनी में आया।
आरोही ने स्क्रीन को गौर से देखा।
उसकी आंखें अचानक फैल गईं।
“नहीं…”
आरव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
आरोही पीछे हट गई।
“मैं इसे जानती हूं।”
आरव और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।
“कौन है?”
आरोही की आवाज कांप रही थी।
“ये आदमी…”
उसने स्क्रीन की तरफ उंगली की।
“मैंने इसे अपनी मां के साथ देखा है।”
आरव स्तब्ध रह गया।
“कहां?”
“लगभग दो महीने पहले।”
“कहां?”
आरोही ने धीरे से कहा,
“हमारे पुराने घर के बाहर।”
आरव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।
“तुम्हारी मां ने कहा था कि उन्हें उस आदमी के बारे में कुछ नहीं पता।”
आरोही की आंखों में दर्द था।
“शायद मां मुझसे कुछ छुपा रही हैं।”
कबीर ने कहा,
“हमें अभी उनके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।”
आरव ने सिर हिलाया।
“सही।”
तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।
तीनों चुप हो गए।
कदम धीरे-धीरे कमरे के करीब आ रहे थे।
आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
आरव ने इशारे से दोनों को पीछे रहने को कहा।
दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे हिली।
फिर दरवाजा खुला।
सामने…
एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था।
उसने आरव को देखते ही कहा “तुम राजवीर के बेटे हो?”
आरव ने पूछा,
“आप कौन हैं?”
बुजुर्ग ने दरवाजा बंद किया।
“मेरा नाम हरिशंकर है।”
कबीर ने पूछा,
“आप यहां क्या कर रहे हैं?”
हरिशंकर ने कहा,
“मैं इस रिकॉर्ड रूम का पुराना चौकीदार हूं।”
आरव ने पूछा,
“आपको इस कमरे के बारे में पता था?”
“हां।”
“फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया?”
हरिशंकर ने गहरी सांस ली।
“क्योंकि मुझे डर था।”
आरोही ने पूछा,
“किससे?”
हरिशंकर ने सीधे उसकी तरफ देखा।
“उस आदमी से… जिसने तुम्हारे पिता को मरवाया।”
आरोही की आंखें नम हो गईं।
“आप उसे जानते हैं?”
“हां।”
“कौन है?”
हरिशंकर कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक बाहर गोली चलने की आवाज आई।
धांय!
आरोही चीख पड़ी।
आरव ने तुरंत उसे अपनी तरफ खींच लिया।
कबीर ने दरवाजा बंद कर दिया।
हरिशंकर घबराकर बोले,
“वो आ गया।”
आरव ने पूछा,
“कौन?”
हरिशंकर की आंखों में डर था।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा “विक्रम नहीं…”
“तो कौन?”
हरिशंकर ने धीरे से कहा “विक्रम का मालिक।”
बाहर कदमों की आवाज आने लगी।
कबीर ने खिड़की देखी।
“हमें यहां से निकलना होगा।”
हरिशंकर ने कमरे की पिछली दीवार की तरफ इशारा किया।
“वहां एक रास्ता है।”
आरव ने दीवार का पैनल हटाया।
पीछे एक संकरा रास्ता था।
“पहले आरोही।”
आरोही अंदर जाने लगी।
तभी बाहर से दरवाजे पर जोरदार चोट हुई।
धड़ाम!
आरव ने दरवाजा संभाल लिया।
“जाओ!”
कबीर और हरिशंकर अंदर चले गए।
आरव भी अंदर जाने ही वाला था कि दरवाजा टूट गया।
एक आदमी अंदर घुसा।
उसके हाथ में बंदूक थी।
आरव उससे भिड़ गया।
दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।
आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।
“आरव!”
आरव ने चिल्लाकर कहा,
“भागो!”
आरोही वहीं रुक गई।
लेकिन तभी उस आदमी ने आरव को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।
बंदूक उसकी तरफ उठी।
आरोही ने बिना सोचे पास पड़ी लोहे की छड़ उठाई और उस आदमी पर हमला कर दिया।
बंदूक नीचे गिर गई।
आरव ने तुरंत उसे पकड़ लिया।
“आरोही, तुम ठीक हो?”
“हां।”
“तुमने ऐसा क्यों किया?”
आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,
“क्योंकि मैंने कहा था ना… तुम्हें खोने से डरती हूं।”
आरव कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसका हाथ पकड़ लिया।
“चलो।”
दोनों सुरंग में भागने लगे।
कुछ देर बाद वे सुरंग से बाहर निकले।
हरिशंकर भी उनके साथ थे।
आरव ने पूछा,
“अब बताइए। आप किसे जानते हैं?”
हरिशंकर ने पीछे देखा।
फिर धीमी आवाज में कहा “वो आदमी विक्रम सूद नहीं था।”
“कौन था?”
“विक्रम का छोटा भाई।”
आरव और आरोही चौंक गए।
“विक्रम का भाई?”
हरिशंकर ने कहा,
“हां। उसका नाम था… विराज सूद।”
आरोही ने पूछा,
“लेकिन उसने विक्रम का नाम क्यों इस्तेमाल किया?”
हरिशंकर ने कहा,
“क्योंकि असली विक्रम की मौत के बाद सारी संपत्ति और कंपनी पर विराज का कब्जा हो गया था।”
आरव ने पूछा,
“और हमारे परिवार?”
हरिशंकर की आवाज भारी हो गई।
“विराज ने राजवीर और विनय के बीच गलतफहमियां पैदा कीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि उन दोनों के पास उसके खिलाफ सबूत था।”
आरोही ने पूछा,
“और पापा?”
हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।
“विनय ने मरने से पहले मुझे एक चीज दी थी।”
“क्या?”
उन्होंने जेब से एक छोटा लिफाफा निकाला।
“ये।”
आरोही ने लिफाफा लिया।
उस पर लिखा था “मेरी बेटी के लिए।”
आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर सिर्फ एक पन्ना था।
उस पर लिखा था “बेटी, जिस दिन तुम्हें ये खत मिलेगा, उस दिन तुम आरव से मिल चुकी होगी। उस पर भरोसा करना। लेकिन उसके करीब आने वाले हर इंसान पर भरोसा मत करना।”
आरोही ने आगे पढ़ा।
अगली लाइन ने उसकी सांस रोक दी “क्योंकि तुम्हारे सबसे करीब रहने वाला कोई व्यक्ति ही हमारे खिलाफ है।”
आरोही ने तुरंत आरव की तरफ देखा।
आरव की आंखों में भी चिंता थी।
कौन?
कौन था वो इंसान…
जो उनके सबसे करीब रहकर दस साल से उन्हें धोखा दे रहा था?
तभी हरिशंकर ने कांपती आवाज में कहा “मैं जानता हूं वो कौन है।”
आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ मुड़े।
हरिशंकर ने धीरे से कहा “वो तुम्हारी मां के बहुत करीब है।”
आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“मेरी मां?”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“हां… लेकिन वो तुम्हारी मां नहीं है।”
आरोही की आंखें फैल गईं।
“क्या?”
हरिशंकर ने कहा “जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”
आरोही के हाथ से खत नीचे गिर गया।
और पहली बार…
उसे अपनी पूरी जिंदगी पर शक होने लगा।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

प्रातिक्रिया दे