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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 9

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

एपिसोड – 9 : एक धोखा, जिसने सब बदल दिया

 

कमरे में फिर से रोशनी जल चुकी थी, लेकिन आरव और आरोही के चेहरों पर अंधेरा छाया हुआ था।

 

टेबल पर रखा वह कागज अब भी उनके सामने था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

 

आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

 

उसने धीरे से आरव की तरफ देखा।

 

“आरव… इसमें लिखा है कि मेरे पापा ने तुम्हारे पापा को धोखा दिया था।”

 

आरव कुछ नहीं बोला।

 

कबीर ने कागज हाथ में लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।

 

“ये वही लिखावट है?”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या मतलब?”

 

“जिसने पहले तुम्हें धमकी दी थी, उस कागज पर भी ऐसी ही स्याही थी।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो?”

 

“मतलब ये हो सकता है कि जो हमें यहां तक लेकर आया है, वो चाहता है कि हम एक-दूसरे पर शक करें।”

 

आरोही ने तुरंत कहा,

 

“लेकिन अगर इसमें कुछ सच्चाई हुई तो?”

 

आरव उसकी तरफ मुड़ा।

 

“तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“तुम पर है।”

 

“फिर?”

 

“लेकिन अपने पापा पर नहीं।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“मैं भी अपने पिता के हर फैसले पर आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकता।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“तो हम क्या करें?”

 

आरव ने कहा,

 

“सच ढूंढें।”

 

“और अगर सच हमारे खिलाफ हुआ?”

 

आरव उसके करीब आया।

 

“तो भी साथ रहेंगे।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

 

“वादा?”

 

आरव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

 

“वादा।”

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही घंटों में उनका यह भरोसा एक ऐसे सच के सामने आने वाला था, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

 

कबीर ने लैपटॉप दोबारा खोला।

 

“वीडियो अधूरा है, लेकिन शायद उसमें बाकी डेटा छुपा हुआ हो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तुम कर सकते हो?”

 

“कोशिश कर सकता हूं।”

 

कबीर ने कुछ देर तक कंप्यूटर पर काम किया।

 

स्क्रीन पर कई फाइलें खुलीं।

 

एक फोल्डर का नाम देखकर उसकी आंखें ठहर गईं।

 

“R-27”

 

“ये क्या है?” आरोही ने पूछा।

 

कबीर ने फोल्डर खोला।

 

अंदर कई स्कैन किए हुए दस्तावेज थे।

 

पहले दस्तावेज पर लिखा था “राजवीर सिंह – व्यक्तिगत गारंटी।”

 

आरव ने दस्तावेज अपने हाथ में लिया।

 

“ये मेरे पिता के हस्ताक्षर हैं।”

 

कबीर ने दूसरा दस्तावेज खोला।

 

उसमें लिखा था कि राजवीर सिंह ने विनय मेहरा की कंपनी को आर्थिक संकट से बचाने के लिए करोड़ों रुपये की निजी गारंटी दी थी।

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“तो मेरे पापा की कंपनी डूब रही थी?”

 

“हां,” आरव ने कहा।

 

कबीर ने तीसरा दस्तावेज खोला।

 

“लेकिन ये देखो।”

 

उसमें लिखा था कि कुछ दिनों बाद वही रकम किसी तीसरे खाते में ट्रांसफर हुई थी।

 

कबीर ने खाता नंबर देखा।

 

“ये खाता किसका है?”

 

आरव ने पूछा।

 

कबीर ने कुछ सेकंड में जानकारी निकाली।

 

उसके चेहरे का रंग बदल गया।

 

“विक्रम सूद।”

 

आरोही ने गहरी सांस ली।

 

“तो उसने पैसे चुराए।”

 

“और शायद दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया,” आरव ने कहा।

 

कबीर ने सिर हिलाया।

 

“लेकिन अभी एक बात समझ नहीं आ रही।”

 

“क्या?”

 

“अगर राजवीर तुम्हारे पिता की मदद कर रहे थे, तो फिर दोनों परिवारों में दुश्मनी कैसे हुई?”

 

आरव ने कहा,

 

“शायद हमें उसी का जवाब इस पेन ड्राइव में मिलेगा।”

 

कबीर ने एक और फाइल खोली।

 

उसमें एक ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।

 

रिकॉर्डिंग का नाम था “28 March – 11:42 PM”

 

आरोही की सांस रुक गई।

 

“ये उसी रात की है?”

 

कबीर ने प्ले दबाया।

 

पहले कुछ सेकंड सिर्फ हवा की आवाज सुनाई दी।

 

फिर दो पुरुषों की आवाजें सुनाई दीं।

 

पहली आवाज विनय मेहरा की थी।

 

“राजवीर, तुम यहां क्यों आए हो?”

 

दूसरी आवाज राजवीर की थी।

 

“तुम्हें बचाने।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

आरव बिल्कुल स्थिर बैठा था।

 

रिकॉर्डिंग आगे चली।

 

विनय की आवाज आई “बहुत देर हो चुकी है। विक्रम सब कुछ जान चुका है।”

 

राजवीर ने कहा “हमें पुलिस के पास जाना होगा।”

 

विनय ने जवाब दिया “नहीं। अगर पुलिस के पास गए तो सिर्फ हम नहीं, हमारे परिवार भी खतरे में आ जाएंगे।”

 

फिर अचानक किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

 

रिकॉर्डिंग में शोर होने लगा।

 

और उसके बाद…

 

एक तीसरी आवाज सुनाई दी।

 

आरोही ने तुरंत कहा,

 

“ये कौन है?”

 

कबीर ने रिकॉर्डिंग रोक दी।

 

आरव ने कहा,

 

“चलाओ।”

 

रिकॉर्डिंग दोबारा शुरू हुई।

 

तीसरी आवाज साफ सुनाई दी “तुम दोनों को लगता है कि तुम मुझे रोक सकते हो?”

 

आरोही के चेहरे से खून उतर गया।

 

“विक्रम…”

 

लेकिन रिकॉर्डिंग में अगली आवाज ने सबको चौंका दिया।

 

वो आवाज विक्रम की नहीं थी।

 

वो किसी और की थी।

 

“विक्रम, इन्हें जाने दो।”

 

कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।

 

आरव ने पूछा,

 

“ये कौन था?”

 

कबीर ने कहा,

 

“पता नहीं।”

 

आरव ने गुस्से से कहा,

 

“आवाज पहचानो।”

 

कबीर ने फिर से रिकॉर्डिंग चलाई।

 

तीसरी आवाज दोबारा सुनाई दी।

 

आरोही अचानक उठ खड़ी हुई।

 

उसके चेहरे पर डर था।

 

“मैं इस आवाज को जानती हूं।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“किसकी है?”

 

आरोही की आवाज कांप रही थी।

 

“मेरी मां की।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

आरोही को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।

 

“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“शांत हो जाओ।”

 

“ये मेरी मां की आवाज है।”

 

“हमें पहले पूरी रिकॉर्डिंग सुननी होगी।”

 

कबीर ने आवाज तेज की।

 

रिकॉर्डिंग आगे चली।

 

आरोही की मां की आवाज सुनाई दी “विनय, तुम्हें अभी यहां से जाना होगा।”

 

विनय ने कहा “लेकिन राजवीर?”

 

“उसे मैं संभाल लूंगी।”

 

राजवीर की आवाज आई “तुम पर भरोसा कैसे करूं?”

 

आरोही की मां ने कहा “क्योंकि मैं आरोही की मां हूं।”

 

कुछ सेकंड खामोशी रही।

 

फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

 

आरोही ने लैपटॉप बंद कर दिया।

 

“बस!”

 

उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मां यहां क्यों थीं?”

 

आरव ने उसे संभालते हुए कहा,

 

“हमें उनसे पूछना होगा।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

घर में इंतजार करता सच

 

दोनों तुरंत आरोही के घर पहुंचे।

 

मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

 

आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

 

“तुम दोनों इतनी जल्दी कैसे आ गए?”

 

आरोही कुछ नहीं बोली।

 

उसने मोबाइल पर रिकॉर्डिंग चला दी।

 

कमरे में उसकी मां की पुरानी आवाज गूंजने लगी।

 

रिकॉर्डिंग खत्म हुई।

 

मां का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

 

उन्होंने धीरे से पूछा,

 

“तुम्हें ये कहां मिली?”

 

आरोही की आंखों में दर्द था।

 

“पापा की डायरी और पेन ड्राइव में।”

 

मां ने आंखें बंद कर लीं।

 

“मैं चाहती थी कि ये सच कभी तुम्हारे सामने न आए।”

 

आरोही की आवाज टूट गई।

 

“तो आप उस रात वहां थीं?”

 

मां ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

मां की आंखों से आंसू गिरने लगे।

 

“क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे बुलाया था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किसलिए?”

 

“उन्होंने कहा था कि उन्हें खतरा है।”

 

“किससे?”

 

मां ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा “विक्रम से।”

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

“तो आपने उन्हें बचाने की कोशिश की थी?”

 

मां ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरोही ने तुरंत पूछा,

 

“फिर पापा की मौत कैसे हुई?”

 

मां की आंखों में डर उतर आया।

 

“मैं वहां से चली गई थी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि विक्रम ने मुझे धमकी दी थी।”

 

आरोही ने रोते हुए कहा,

 

“आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

 

“क्योंकि उसने कहा था कि अगर मैंने मुंह खोला तो तुम्हें भी मार देगा।”

 

आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

 

“आपने इतने साल अकेले ये सब सहा?”

 

मां ने उसे गले लगा लिया।

 

“तुम मेरी आखिरी उम्मीद थीं।”

 

आरव चुपचाप दोनों को देख रहा था।

 

तभी मां ने अचानक आरव की तरफ देखा।

 

“तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझे एक बात कही थी।”

 

आरव आगे बढ़ा।

 

“क्या?”

 

मां की आंखें नम थीं।

 

“उन्होंने कहा था…”

 

वह रुक गईं।

 

“क्या कहा था?”

 

“अगर कभी आरव और आरोही एक-दूसरे के करीब आएं… तो उन्हें अलग मत करना।”

 

आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

 

“क्यों?” आरव ने पूछा।

 

मां ने धीरे से कहा “क्योंकि तुम दोनों का मिलना शायद कोई संयोग नहीं था।”

 

एक पुराना रिश्ता

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“इसका क्या मतलब है?”

 

मां ने कुछ नहीं कहा।

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या हमारे परिवार के बीच पहले से कोई रिश्ता था?”

 

मां की आंखें झुक गईं।

 

“हां।”

 

आरोही ने कहा,

 

“कैसा रिश्ता?”

 

मां ने अलमारी से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर में दो छोटे बच्चे थे।

 

एक लड़का…

 

और एक छोटी लड़की।

 

आरोही ने तस्वीर हाथ में ली।

 

उसने लड़की को देखा।

 

फिर लड़के को।

 

उसकी आंखें फैल गईं।

 

“ये… मैं हूं।”

 

आरव ने तस्वीर ली।

 

“और ये… मैं?”

 

मां ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

 

आरोही की आवाज कांप रही थी।

 

“लेकिन हम बचपन में मिले थे?”

 

मां ने कहा,

 

“हां। तुम्हारे पिता और आरव के पिता बहुत करीबी दोस्त थे। तुम दोनों बचपन में कई बार साथ खेले हो।”

 

आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

 

उसे अचानक कुछ धुंधली यादें आने लगीं।

 

एक छोटी लड़की…

 

दो चोटी…

 

उसके हाथ में लाल रंग की पतंग…

 

और उसकी आवाज “तुम बड़े होकर मुझे भूल मत जाना।”

 

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

 

“मुझे याद आ रहा है…”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मुझे भी।”

 

दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

 

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके बीच जो रिश्ता आज बना था…

 

क्या वो वास्तव में आज से शुरू हुआ था?

 

या उनकी कहानी बहुत पहले लिखी जा चुकी थी?

 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था

 

मां ने अचानक कहा,

 

“एक बात और है।”

 

आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ देखने लगे।

 

“क्या?”

 

मां ने कहा,

 

“तुम्हारे पापा की मौत के बाद राजवीर ने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“मुझे?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि विक्रम तुम्हें भी खत्म करना चाहता था।”

 

आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

 

“तो मेरे पिता ने क्या किया?”

 

मां ने कहा,

 

“उन्होंने तुम्हें और आरोही को अलग-अलग शहरों में भेज दिया।”

 

आरव स्तब्ध रह गया।

 

“इसलिए मुझे अपने बचपन की बहुत-सी बातें याद नहीं हैं?”

 

“हां।”

 

आरोही की आंखों में आंसू थे।

 

“तो इतने सालों से हम एक-दूसरे से दूर क्यों थे?”

 

मां ने जवाब दिया,

 

“तुम दोनों को बचाने के लिए।”

 

कमरे में खामोशी छा गई।

 

आरव ने धीरे से आरोही की तरफ देखा।

 

“तो हमारी कहानी…”

 

आरोही ने उसकी बात पूरी की “शायद आज से नहीं शुरू हुई थी।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“बहुत पहले शुरू हो गई थी।”

 

आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

लेकिन तभी…

 

मां का फोन बजा।

 

उन्होंने फोन उठाया।

 

दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।

 

फिर एक भारी आवाज आई “तुमने उन्हें सच बता दिया?”

 

मां के हाथ कांपने लगे।

 

“तुम कौन हो?”

 

आवाज हंसी।

 

“जिसे तुम दस साल से मरा हुआ समझ रही हो।”

 

मां की आंखें फैल गईं।

 

फोन उनके हाथ से लगभग गिर गया।

 

आरोही ने घबराकर पूछा,

 

“मां, कौन था?”

 

मां ने कांपते हुए आरव और आरोही की तरफ देखा।

 

उनके होंठों से सिर्फ एक नाम निकला “विक्रम…”

 

आरव के चेहरे पर गुस्सा आ गया।

 

“लेकिन विक्रम तो जिंदा है!”

 

मां ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“क्या?”

 

मां की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“जिस विक्रम को तुम जानते हो… वो असली विक्रम नहीं है।”

 

आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

 

मां ने कांपती आवाज में कहा “असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

अगर ये सच था…

 

तो पिछले दस सालों से उनके परिवारों को कौन चला रहा था?

 

कौन था वो आदमी जो विक्रम के नाम पर सबको धमका रहा था?

 

और सबसे बड़ा सवाल विनय मेहरा की मौत की असली साजिश आखिर किसने रची थी?

 

जारी रहेगा…

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