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महादेव का रूद्र अवतार

पढ़ने का समय : 6 मिनट

जब कैलाश पर गूंजा रुद्र का डमरू

 

हिमालय की ऊंची चोटियों पर उस दिन सब कुछ शांत था। कैलाश पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी। भगवान शिव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती उनके पास बैठी थीं। नंदी कुछ दूर शांत भाव से पहरा दे रहे थे।

 

लेकिन अचानक…

 

डम… डम… डम…

 

महादेव का डमरू अपने आप बज उठा।

 

माता पार्वती ने चौंककर महादेव की ओर देखा।

 

“स्वामी… आपने डमरू बजाया?”

 

महादेव ने धीरे से आंखें खोलीं।

 

“नहीं देवी।”

 

पार्वती जी के चेहरे पर चिंता आ गई।

 

“फिर यह अपने आप कैसे बज रहा है?”

 

महादेव कुछ पल शांत रहे। उनकी आंखों में अचानक गंभीरता उतर आई।

 

“कहीं न कहीं धरती पर अधर्म अपनी सीमा पार कर चुका है।”

 

नंदी ने भी सिर उठाकर कैलाश की ओर देखा।

 

उसी समय आकाश में काले बादल घिरने लगे। बर्फीली हवा अचानक तेज हो गई। कैलाश के आसपास घूमने वाले पक्षी घबराकर दूर उड़ गए।

 

महादेव ने अपनी आंखें बंद कीं और ध्यान लगाया।

 

उन्हें एक छोटा-सा गांव दिखाई दिया।

 

गांव का नाम था देवगिरि।

 

वहां लोग बहुत परेशान थे। गांव के पास रहने वाला एक शक्तिशाली राजा, वज्रसेन, आसपास के गांवों पर जबरन कर लगाता था। जो गरीब किसान कर नहीं दे पाते, उनसे उनकी जमीन छीन ली जाती।

 

लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वज्रसेन को भगवान शिव के मंदिर से नफरत थी।

 

गांव के बीचोंबीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। वहां रहने वाले बूढ़े पुजारी हरिदास रोज सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे।

 

वज्रसेन कई बार उन्हें मंदिर बंद करने की धमकी दे चुका था।

 

एक दिन वह अपने सैनिकों के साथ मंदिर पहुंचा।

 

“पुजारी!” उसने गुस्से में कहा, “मैंने कहा था यह मंदिर बंद कर दो।”

 

हरिदास ने शांत स्वर में कहा, “राजन, मंदिर किसी राजा का नहीं होता। यह भोलेनाथ का घर है।”

 

वज्रसेन हंस पड़ा।

 

“भोलेनाथ? अगर तुम्हारा शिव सच में है, तो उसे बुलाओ।”

 

हरिदास ने हाथ जोड़ लिए।

 

“महादेव को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती राजन। सच्ची पुकार उन तक खुद पहुंच जाती है।”

 

वज्रसेन ने गुस्से में मंदिर का दीपक बुझा दिया।

 

“आज से यहां पूजा बंद!”

 

इतना कहकर वह चला गया।

 

उस रात पूरा गांव डरा हुआ था।

 

लेकिन हरिदास मंदिर में अकेले बैठे रहे। उन्होंने शिवलिंग के सामने दीपक जलाया और आंखों में आंसू लेकर बोले,

 

“भोलेनाथ… मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं मांगता। बस इस गांव के लोगों की रक्षा कर लेना।”

 

पास ही एक छोटा बच्चा बैठा था। उसका नाम था गोपाल।

 

गोपाल ने पूछा, “बाबा, क्या महादेव हमारी मदद करेंगे?”

 

हरिदास मुस्कुराए।

 

“बेटा, जब भक्त सच्चे मन से पुकारता है, तो महादेव देर कर सकते हैं… लेकिन अंधेर नहीं करते।”

 

उधर कैलाश पर अचानक फिर डमरू बजा।

 

डम… डम… डम…

 

इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा तेज थी।

 

माता पार्वती ने महादेव को देखा।

 

“स्वामी, क्या समय आ गया है?”

 

महादेव ने धीरे से कहा,

 

“अभी नहीं देवी… लेकिन बहुत जल्द।”

 

अगली सुबह वज्रसेन ने गांव वालों को अपने महल में बुलाया।

 

उसने घोषणा की,

 

“आज से इस गांव की सारी जमीन मेरी होगी। जो मेरा आदेश नहीं मानेगा, उसे गांव छोड़ना पड़ेगा।”

 

लोग डर गए।

 

गोपाल आगे बढ़ा।

 

“राजा जी, ये जमीन हमारे खेत हैं। इन्हें हमसे मत छीनिए।”

 

वज्रसेन ने उसे घूरकर देखा।

 

“तू मुझे सिखाएगा?”

 

हरिदास तुरंत गोपाल के आगे आ गए।

 

“राजन, बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए।”

 

वज्रसेन ने सैनिकों को आदेश दिया,

 

“कल सुबह मंदिर भी गिरा देना।”

 

यह सुनते ही गांव में सन्नाटा छा गया।

 

हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

 

रात होते ही पूरा गांव मंदिर में इकट्ठा हुआ।

 

हरिदास ने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा,

 

“हे महादेव, आज आपकी परीक्षा नहीं है। आज हमारी भक्ति की परीक्षा है। अगर हमने कभी सच्चे मन से आपका नाम लिया है, तो आज अपने भक्तों की लाज रख लेना।”

 

सबने एक साथ आवाज लगाई—

 

“हर हर महादेव!”

 

तभी मंदिर के अंदर रखा दीपक अचानक बहुत तेज जलने लगा।

 

शिवलिंग पर चढ़ा जल अपने आप कांपने लगा।

 

और उसी क्षण…

 

दूर कैलाश पर महादेव खड़े हो गए।

 

उनके चेहरे पर अब वह शांत मुस्कान नहीं थी।

 

उनकी आंखों में अग्नि जैसी चमक थी।

 

माता पार्वती ने उन्हें देखा।

 

“स्वामी…”

 

महादेव ने कुछ नहीं कहा।

 

उन्होंने अपना डमरू उठाया।

 

डम!

 

एक ही आवाज से कैलाश की चोटियां गूंज उठीं।

 

डम! डम! डम!

 

आकाश में बिजली चमकने लगी।

 

महादेव के शरीर से एक दिव्य तेज निकलने लगा। उनकी जटाएं खुल गईं। उनके मस्तक पर तीसरा नेत्र चमक उठा।

 

यह भोलेनाथ का शांत रूप नहीं था।

 

यह था—

 

रुद्र।

 

देवगिरि गांव में अचानक तेज हवा चलने लगी।

 

वज्रसेन अपने महल में बैठा था। तभी उसके सामने रखा दीपक अपने आप बुझ गया।

 

उसने सैनिकों को बुलाया।

 

“कौन है बाहर?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर उसे दूर से डमरू की आवाज सुनाई दी।

 

डम… डम… डम…

 

वज्रसेन घबरा गया।

 

“यह आवाज… यहां कैसे?”

 

अचानक महल के दरवाजे खुल गए।

 

सामने एक विशाल तेजस्वी साधु खड़ा था।

 

शरीर पर भस्म, जटाएं खुली हुईं और आंखों में ऐसा तेज कि वज्रसेन की आवाज तक कांपने लगी।

 

साधु ने कहा,

 

“वज्रसेन।”

 

राजा पीछे हट गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

साधु ने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा,

 

“जिसे तूने बार-बार पुकारा था।”

 

वज्रसेन को मंदिर की अपनी बात याद आ गई।

 

“नहीं… यह नहीं हो सकता।”

 

साधु आगे बढ़े।

 

“तूने शक्ति को अपना अधिकार समझ लिया। तूने गरीबों से उनकी जमीन छीनी। भक्तों को डराया। मंदिर का दीपक बुझाया।”

 

वज्रसेन कांपने लगा।

 

“मुझे क्षमा कर दो!”

 

साधु की आंखों में अग्नि और तेज हो गया।

 

“क्षमा मांगने से पहले अपने कर्मों का भार समझ।”

 

तभी आकाश में जोरदार गर्जना हुई।

 

साधु का स्वर गूंजा—

 

“मैं रुद्र हूं!”

 

पूरा महल कांप उठा।

 

वज्रसेन घुटनों के बल गिर गया।

 

रुद्र ने अपनी दृष्टि उठाई।

 

“शक्ति का अर्थ दूसरों को डराना नहीं होता। शक्ति का अर्थ कमजोर की रक्षा करना होता है।”

 

वज्रसेन ने सिर झुका दिया।

 

“मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है।”

 

“तो उसका प्रायश्चित भी बड़ा होगा।”

 

रुद्र ने आदेश दिया कि जिन लोगों की जमीन छीनी गई है, वह उन्हें वापस की जाए। मंदिर को पहले से भी बड़ा बनाया जाए और गरीबों से लिया गया धन लौटा दिया जाए।

 

वज्रसेन ने सब कुछ स्वीकार कर लिया।

 

सुबह गांव वालों ने देखा कि मंदिर के सामने वही साधु खड़े हैं।

 

गोपाल दौड़कर उनके पास गया।

 

“बाबा, आप कौन हैं?”

 

साधु मुस्कुराए।

 

“जिसे तुम रातभर बुला रहे थे।”

 

गोपाल ने उनके पैरों को छूना चाहा।

 

लेकिन अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

 

सिर्फ मंदिर के सामने एक छोटा-सा डमरू पड़ा था।

 

हरिदास ने उसे उठाया और उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

 

उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा,

 

“भोलेनाथ… आपने फिर अपने भक्तों की लाज रख ली।”

 

उसी समय दूर कैलाश पर महादेव फिर अपने शांत स्वरूप में बैठे थे।

 

माता पार्वती मुस्कुराईं।

 

“स्वामी, आपका क्रोध भी अंत में किसी की रक्षा ही करता है।”

 

महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

 

“देवी, रुद्र का क्रोध विनाश के लिए नहीं… अधर्म के अंत के लिए होता है।”

 

नंदी ने प्रसन्न होकर सिर झुका दिया।

 

और उसी क्षण कैलाश की चोटियों पर एक बार फिर डमरू की मधुर आवाज गूंजी—

 

डम… डम… डम…

 

जैसे स्वयं कैलाश कह रहा हो—

 

जहां सच्ची भक्ति होगी, वहां महादेव की कृपा जरूर होगी।

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