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शौर्य की नादानियां

पढ़ने का समय : 5 मिनट

शौर्य की नादानियां — पार्ट 1: एक नादान लड़का

 

शहर के किनारे बने एक बड़े से पुराने बंगले में शौर्य अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता था। उम्र उसकी करीब बाईस साल थी, लेकिन हरकतें ऐसी कि घर में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था।

 

शौर्य दिल का बहुत अच्छा था, बस उसकी एक आदत खराब थी—वह बिना सोचे कोई भी काम कर देता था।

 

कभी किसी की मदद करने के चक्कर में खुद मुसीबत में फंस जाता, तो कभी दोस्तों के साथ मजाक करते-करते घर में हंगामा खड़ा कर देता।

 

उस सुबह भी उसकी मां रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

 

“शौर्य! उठ गया क्या?” मां ने आवाज लगाई।

 

अंदर से आवाज आई, “हां मां!”

 

मां ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन अगले ही पल ऊपर से जोरदार आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

“शौर्य!”

 

मां दौड़कर सीढ़ियों के पास पहुंचीं। शौर्य नीचे खड़ा था और उसके हाथ में टूटा हुआ फूलदान था।

 

“ये कैसे टूटा?”

 

शौर्य ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “मां, मैंने नहीं तोड़ा।”

 

“तो फिर?”

 

“वो खुद गिर गया।”

 

तभी उसकी छोटी बहन रिया पीछे से बोली, “मां, भैया ने गेंद से निशाना लगाया था।”

 

शौर्य ने रिया को घूरकर देखा।

 

“तुम मेरी बहन हो या पड़ोसियों की गवाह?”

 

रिया हंसने लगी।

 

मां ने माथा पकड़ लिया।

 

“तुम दोनों मुझे एक दिन पागल कर दोगे।”

 

नाश्ते के बाद शौर्य अपने दोस्त कबीर से मिलने निकल गया। रास्ते में उसे एक बुजुर्ग आदमी सड़क किनारे परेशान खड़ा दिखाई दिया।

 

“बाबा, क्या हुआ?”

 

बुजुर्ग बोले, “बेटा, मेरी साइकिल की चेन उतर गई है।”

 

शौर्य तुरंत नीचे बैठ गया।

 

“अरे इसमें क्या है? मैं ठीक कर देता हूं।”

 

कबीर बोला, “तू रहने दे। पिछली बार तूने मेरी साइकिल ठीक की थी और उसके बाद वो उल्टी दिशा में चलने लगी थी।”

 

“चुप कर।”

 

शौर्य ने बड़ी मेहनत से चेन ठीक की।

 

बुजुर्ग ने साइकिल चलाई और मुस्कुराते हुए बोले, “बिल्कुल ठीक हो गई।”

 

शौर्य गर्व से मुस्कुराया।

 

कबीर ने धीरे से कहा, “आज तो बच गया।”

 

शौर्य ने उसे कोहनी मारी।

 

दोनों आगे बढ़े ही थे कि शौर्य की नजर सड़क के दूसरी तरफ खड़ी एक लड़की पर पड़ी। लड़की अपने हाथ में कुछ कागज लिए परेशान दिखाई दे रही थी।

 

“वो शायद किसी को ढूंढ रही है।”

 

कबीर बोला, “तुझे हर जगह किसी की मदद करने की पड़ी रहती है।”

 

“तो?”

 

“तो एक दिन किसी मुसीबत में फंस जाएगा।”

 

शौर्य हंस पड़ा।

 

“मेरी जिंदगी में मुसीबत खुद चलकर आती है।”

 

वह लड़की के पास पहुंचा।

 

“आपको किसी मदद की जरूरत है?”

 

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

 

“जी… मेरा नाम अनाया है। मुझे इस इलाके में एक घर ढूंढना है, लेकिन पता समझ नहीं आ रहा।”

 

शौर्य ने कागज देखा।

 

“ये तो मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है।”

 

“सच?”

 

“हां। चलिए, मैं रास्ता बता देता हूं।”

 

कबीर पीछे से बोला, “अब तू गाइड भी बनेगा?”

 

शौर्य ने अनदेखा कर दिया।

 

रास्ते में अनाया ने बताया कि वह अपने पिता के पुराने दोस्त से मिलने आई थी। उसके पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे और उनके जाने के बाद अनाया को एक पुरानी चिट्ठी मिली थी।

 

उस चिट्ठी में इसी इलाके के एक पुराने घर का जिक्र था।

 

शौर्य अचानक गंभीर हो गया।

 

“कौन सा घर?”

 

अनाया ने पता दिखाया।

 

शौर्य का चेहरा बदल गया।

 

“ये घर…?”

 

“हां। जानते हो?”

 

शौर्य कुछ पल चुप रहा।

 

“वो घर कई सालों से बंद है।”

 

अनाया ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

 

“पता नहीं। बचपन से उसे बंद ही देखा है।”

 

कबीर बोला, “चल वापस चलते हैं।”

 

लेकिन अनाया की आंखों में सवाल थे।

 

शौर्य ने कहा, “मैं तुम्हें वहां तक छोड़ देता हूं।”

 

पुराने घर के सामने पहुंचकर तीनों रुक गए।

 

बड़ा लोहे का दरवाजा जंग लगा हुआ था। अंदर पेड़ों की सूखी डालियां दिखाई दे रही थीं।

 

अनाया ने अपनी जेब से वही पुरानी चिट्ठी निकाली।

 

“यही जगह है।”

 

शौर्य ने दरवाजा धकेला।

 

किर्रर्र…

 

दरवाजा खुल गया।

 

कबीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“भाई, नादानी मत कर।”

 

शौर्य मुस्कुराया।

 

“डर गया?”

 

“हां।”

 

“मैं हूं ना।”

 

तीनों अंदर चले गए।

 

घर के अंदर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। अचानक अनाया की नजर एक तस्वीर पर पड़ी।

 

वह वहीं रुक गई।

 

“ये… मेरे पिता हैं।”

 

शौर्य और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

 

तस्वीर में अनाया के पिता एक आदमी के साथ खड़े थे।

 

शौर्य ने तस्वीर में दूसरे आदमी को देखा और चौंक गया।

 

“इन्हें मैं जानता हूं।”

 

“कौन हैं?”

 

शौर्य ने धीरे से कहा, “मेरे पापा।”

 

अनाया के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

 

“क्या?”

 

शौर्य भी समझ नहीं पा रहा था कि उसके पिता और अनाया के पिता का इस घर से क्या रिश्ता था।

 

तभी ऊपर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

कबीर बोला, “अब मैं सच में जा रहा हूं।”

 

शौर्य ने कहा, “रुक।”

 

तीनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

 

ऊपर एक कमरा बंद था।

 

दरवाजे पर वही निशान बना था जो अनाया की चिट्ठी के पीछे बना हुआ था।

 

अनाया ने कांपते हाथों से चिट्ठी पलटी।

 

उसके पीछे लिखा था—

 

“सच जानना हो तो उस कमरे का दरवाजा खोलना।”

 

शौर्य ने दरवाजे की तरफ देखा।

 

उसकी नादानियां उसे यहां तक तो ले आई थीं।

 

लेकिन उसे नहीं पता था कि यह नादानी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज खोलने वाली थी।

 

और जैसे ही शौर्य ने दरवाजे की कुंडी पकड़ी…

 

अंदर से किसी ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

 

तीनों के चेहरे पर डर छा गया।

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