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हिमालय की शान भोले बाबा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

हिमालय का रखवाला भोले बाबा

 

हिमालय की ऊंची पहाड़ियों के बीच एक गांव था शिवधाम। गांव छोटा था, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की आस्था बहुत बड़ी थी। गांव के चारों तरफ बर्फीले पहाड़ थे और सबसे ऊंची चोटी के पास एक पुराना शिव मंदिर था।

 

लोग मानते थे कि उस मंदिर में विराजमान भोलेनाथ ही पूरे हिमालय की रक्षा करते हैं।

 

मंदिर के बारे में एक पुरानी बात भी कही जाती थी।

 

जब तक मंदिर की घंटी अपने आप बजती रहेगी, तब तक गांव पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा।

 

लेकिन पिछले कुछ दिनों से मंदिर की घंटी बिल्कुल शांत थी।

 

गांव का बूढ़ा पुजारी देवदत्त इस बात को लेकर परेशान था।

 

एक सुबह गांव के कुछ लोग मंदिर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मंदिर के आसपास की बर्फ पर अजीब से पैरों के निशान बने हुए थे।

 

देवदत्त ने निशानों को ध्यान से देखा।

 

“ये इंसान के पैरों के निशान नहीं हैं,” उसने धीमे से कहा।

 

गांव का मुखिया बोला, “फिर किसके हैं?”

 

देवदत्त ने जवाब नहीं दिया।

 

उसने बस शिवलिंग की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए।

 

उसी दिन गांव में एक और अजीब घटना हुई।

 

गांव की सबसे पुरानी नदी अचानक बहुत कम हो गई।

 

लोग घबरा गए।

 

अगर नदी का पानी इसी तरह कम होता रहा तो गांव में पीने के पानी की भी समस्या हो सकती थी।

 

मुखिया ने गांव वालों की बैठक बुलाई।

 

एक आदमी बोला, “हमें नीचे वाले गांव में जाकर पानी मांगना पड़ेगा।”

 

दूसरा बोला, “लेकिन वहां तक जाने वाला रास्ता तो बर्फ से बंद है।”

 

तभी एक बूढ़ी महिला ने कहा, “ये सब सामान्य नहीं है। जरूर हिमालय हमसे नाराज है।”

 

देवदत्त ने उसकी बात सुनकर कहा, “हिमालय नाराज नहीं होता। लेकिन प्रकृति हमें चेतावनी जरूर देती है।”

 

उसी रात देवदत्त मंदिर में अकेला बैठा था।

 

उसने दीपक जलाया और शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “भोलेनाथ, अगर कोई संकट आने वाला है तो मुझे संकेत दीजिए।”

 

कुछ देर तक मंदिर में बिल्कुल शांति रही।

 

फिर अचानक मंदिर की घंटी हिली।

 

देवदत्त ने सिर उठाया।

 

घंटी एक बार बजी।

 

फिर दूसरी बार।

 

और फिर तीसरी बार।

 

देवदत्त की आंखों में चिंता उतर आई।

 

वह तुरंत मंदिर से बाहर निकला।

 

आसमान बिल्कुल साफ था।

 

हवा भी नहीं चल रही थी।

 

फिर घंटी कैसे बज रही थी?

 

अचानक उसे दूर पहाड़ की तरफ एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

 

देवदत्त उस दिशा में बढ़ने लगा।

 

जैसे-जैसे वह आगे गया, रोशनी साफ होती गई।

 

वहां एक साधु चट्टान पर बैठा था।

 

लंबे बाल, माथे पर भस्म और गले में रुद्राक्ष।

 

देवदत्त ने हाथ जोड़कर पूछा, “महाराज, आप इतनी रात में यहां?”

 

साधु ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया।

 

“जिसे हिमालय बुलाता है, वह रात-दिन नहीं देखता।”

 

देवदत्त चौंक गया।

 

“आप कौन हैं?”

 

साधु ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसने बस सामने की पहाड़ी की तरफ इशारा किया।

 

“कल सूरज निकलने से पहले गांव के लोगों को ऊंची जगह पहुंचा देना।”

 

देवदत्त घबरा गया।

 

“क्यों? क्या होने वाला है?”

 

साधु ने कहा, “पहाड़ कभी बिना कारण शांत नहीं होता।”

 

इतना कहकर साधु उठ खड़ा हुआ।

 

देवदत्त ने दो कदम आगे बढ़कर उसे रोकना चाहा।

 

लेकिन वहां कोई नहीं था।

 

अगली सुबह देवदत्त ने गांव वालों को सारी बात बताई।

 

कुछ लोगों ने उसकी बात पर विश्वास किया, कुछ ने मजाक उड़ाया।

 

मुखिया ने कहा, “बाबा, हम बिना वजह गांव छोड़कर कहां जाएंगे?”

 

देवदत्त बोला, “मैं नहीं जानता वह साधु कौन था। लेकिन उसकी बात में मुझे भरोसा है।”

 

गांव के लोग आखिरकार मंदिर के पास वाली ऊंची जगह पर जाने लगे।

 

कुछ लोग अपने घर छोड़ने को तैयार नहीं थे।

 

तभी दोपहर के समय पहाड़ के अंदर से जोरदार आवाज आई।

 

धरती हिलने लगी।

 

लोग घबरा गए।

 

ऊपर की बर्फ खिसकने लगी।

 

देवदत्त चिल्लाया, “सब लोग पीछे हटो!”

 

कुछ ही पलों में पहाड़ की एक बड़ी चट्टान टूटकर नीचे गिरी।

 

उसके साथ बर्फ का तेज बहाव भी नीचे आने लगा।

 

गांव वाले चीखने लगे।

 

लेकिन जिस दिशा में बर्फ बढ़ रही थी, वहां अब कोई इंसान नहीं था।

 

गांव बच गया।

 

कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

 

लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

 

मुखिया की आंखों में पछतावा था।

 

वह देवदत्त के पास आया और बोला, “आप सही थे।”

 

देवदत्त ने कहा, “मैं सही नहीं था। भोलेनाथ ने हमें पहले ही सावधान कर दिया था।”

 

सभी लोग मंदिर की तरफ चल पड़े।

 

लेकिन वहां पहुंचकर वे हैरान रह गए।

 

मंदिर की बंद घंटी लगातार बज रही थी।

 

कोई उसे छू भी नहीं रहा था।

 

मुखिया ने हाथ जोड़कर कहा, “भोले बाबा, आपने आज हमारे गांव को बचा लिया।”

 

तभी मंदिर के पीछे से एक छोटी बच्ची की आवाज आई।

 

“पंडित जी!”

 

देवदत्त ने पीछे मुड़कर देखा।

 

वही बच्ची एक पत्थर के पास खड़ी थी।

 

उसने वहां से एक छोटी-सी त्रिशूल जैसी लकड़ी उठाई थी।

 

उस पर ताजा बेलपत्र रखा था।

 

देवदत्त ने उसे देखते ही आंखें बंद कर लीं।

 

उसे रात वाला साधु याद आ गया।

 

वह धीरे से बोला, “वो आए थे…”

 

मुखिया ने पूछा, “कौन?”

 

देवदत्त ने शिवलिंग की तरफ देखते हुए कहा

“हमारे भोले बाबा।”

 

सभी लोग चुप हो गए।

 

उसी समय मंदिर के दीपक की लौ अचानक तेज हो गई। किसी ने उसे छुआ नहीं था। मंदिर के भीतर हल्की-सी सुगंध फैल गई और बाहर खड़े लोगों को ऐसा लगा जैसे पहाड़ों के बीच से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा हो“डरो मत।”

 

गांव की बूढ़ी महिला की आंखों से आंसू निकल आए। उसने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा ने हमें सिर्फ बचाया नहीं, हमें समझाया भी है कि प्रकृति का सम्मान करना ही उनकी पूजा है।”

 

उस दिन से गांव वालों ने नदी और पहाड़ों को गंदा करना छोड़ दिया। वे जरूरत से ज्यादा पेड़ काटने से भी बचने लगे। हर परिवार ने मिलकर मंदिर के आसपास सफाई रखनी शुरू कर दी।

 

किसी ने उस साधु को दोबारा नहीं देखा।

 

लेकिन उसके बाद गांव में जब भी कोई बड़ा संकट आता, मंदिर की घंटी अपने आप बज उठती।

 

और गांव के लोग समझ जाते कि हिमालय का रखवाला उन्हें सावधान कर रहा है।

 

देवदत्त अक्सर बच्चों से कहता था

 

“भोलेनाथ हमेशा चमत्कार दिखाकर रक्षा नहीं करते। कभी संकेत देकर, कभी किसी इंसान के रूप में और कभी हमारी अपनी समझ के जरिए हमें बचाते हैं।”

 

फिर वह मंदिर की तरफ देखकर मुस्कुराता और कहता

 

“हिमालय कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसकी सबसे बड़ी शान उसकी बर्फीली चोटियां नहीं… बल्कि उन चोटियों पर विराजमान हमारे भोले बाबा हैं।”

 

और हर शाम पूरे गांव में एक ही आवाज गूंजती

“हर हर महादेव!”

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