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  • कान्हा और यमुना किनारे शरारत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यमुना किनारे की शरारत

     

    अगली सुबह वृंदावन में सूरज निकलने से पहले ही कान्हा की आँख खुल गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश हल्का-हल्का नीला हो रहा था। दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।

     

    कान्हा धीरे से बिस्तर से उठे और बाहर जाने लगे।

     

    तभी पीछे से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “मैं तो बस बाहर देखने जा रहा था।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बाहर देखने के लिए इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा समझ गईं।

     

    “फिर से कोई शरारत करने का मन है?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “बिल्कुल पक्का।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया और उनके बाल ठीक करते हुए कहा—

     

    “यमुना के बहुत पास मत जाना। और अपने दोस्तों से अलग मत होना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ घर से निकल पड़े।

     

    आज उनका मन यमुना किनारे जाने का था।

     

    रास्ते में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज क्या खेलेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हम यमुना किनारे दौड़ लगाएंगे।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “और अगर तुम हार गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं कभी नहीं हारता।”

     

    तीसरा बच्चा बोला—

     

    “कल तो तुम पेड़ पर चढ़ते समय गिर गए थे।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो गिरना नहीं था। मैं नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”

     

    सभी बच्चे जोर से हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे यमुना किनारे पहुँच गए।

     

    यमुना का पानी शांत था। किनारे पर हरी घास थी और पास के पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।

     

    कान्हा ने अपनी बांसुरी निकाली और एक पत्थर पर बैठ गए।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे बांसुरी बजानी शुरू की।

     

    सभी बच्चे शांत होकर सुनने लगे।

     

    कुछ देर बाद एक मोर भी पास आ गया।

     

    कान्हा ने बांसुरी बजाना बंद किया तो मोर भी रुक गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे भी तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “ये मेरा दोस्त है।”

     

    तभी एक बच्चे ने यमुना में तैरती हुई कमल की पत्तियाँ देखीं।

     

    वह बोला—

     

    “कान्हा, देखो कितनी सुंदर पत्तियाँ हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो उन्हें देखते हैं।”

     

    सब बच्चे पानी के किनारे पहुँच गए।

     

    कान्हा ने एक छोटी लकड़ी उठाई और पानी में पड़ी पत्ती को अपनी ओर खींचने लगे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “बहुत अंदर मत जाना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं किनारे पर ही हूँ।”

     

    तभी उन्हें पानी में एक छोटी सी नाव दिखाई दी।

     

    नाव किनारे से थोड़ी दूर थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो नाव में बैठते हैं।”

     

    एक दोस्त घबरा गया।

     

    “नहीं, हमें बाबा ने पानी में जाने से मना किया है।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “ठीक है, नाव में नहीं जाएँगे।”

     

    उन्होंने पास पड़ी एक लंबी लकड़ी उठाई और नाव को किनारे की ओर खींचने लगे।

     

    बच्चे उनकी मदद करने लगे।

     

    कुछ कोशिश के बाद नाव किनारे आ गई।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखा! बिना पानी में उतरे भी नाव आ गई।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    तभी अचानक एक तेज हवा चली।

     

    कान्हा की बांसुरी उनके हाथ से छूटकर घास में गिर गई।

     

    “मेरी बांसुरी!”

     

    कान्हा उसे ढूँढ़ने लगे।

     

    सभी बच्चे अलग-अलग तरफ खोजने लगे।

     

    लेकिन बांसुरी कहीं दिखाई नहीं दी।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद हवा से आगे चली गई।”

     

    कान्हा चिंतित हो गए।

     

    “मेरी बांसुरी मुझे बहुत प्यारी है।”

     

    वे घास में झुककर खोजने लगे।

     

    तभी उन्हें दूर एक छोटी सी लड़की दिखाई दी।

     

    वह किनारे पर बैठी थी और हाथ में वही बांसुरी थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ये मेरी बांसुरी है।”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे ये घास में मिली थी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, ये मेरी है।”

     

    लड़की ने बांसुरी वापस कर दी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं अपनी माँ के साथ आई थी। वो थोड़ी दूर गई हैं।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”

     

    लड़की ने नदी की दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    कान्हा समझ गए कि वह अपनी माँ से अलग हो गई थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “हमें इसे इसकी माँ के पास पहुँचाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे लड़की के साथ चल पड़े।

     

    थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक महिला परेशान होकर इधर-उधर देखते हुए दिखाई दी।

     

    लड़की अपनी माँ को देखते ही दौड़ पड़ी।

     

    “माँ!”

     

    महिला ने उसे गले लगा लिया।

     

    उसने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी बेटी को यहाँ तक पहुँचाया?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा—

     

    “बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “आप बस इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “अब नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा वापस अपने दोस्तों के पास लौट आए।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें याद आया कि उन्हें घर भी लौटना था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब मैया डाँटेंगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमने कोई गलत काम तो किया नहीं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन हम काफी देर से यहाँ हैं।”

     

    कान्हा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज काफी ऊपर आ चुका था।

     

    “अरे! सच में बहुत देर हो गई।”

     

    सभी बच्चे तेजी से घर की तरफ भागने लगे।

     

    उधर नंद भवन में यशोदा मैया बार-बार बाहर देख रही थीं।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “कान्हा अभी तक नहीं आया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बच्चों के साथ गया है। आता होगा।”

     

    लेकिन कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ दौड़ते हुए आ गए।

     

    यशोदा ने उन्हें देखते ही पकड़ लिया।

     

    “कहाँ थे इतनी देर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “यमुना किनारे।”

     

    “मैंने कहा था ज्यादा दूर मत जाना।”

     

    “हम दूर नहीं गए थे।”

     

    “फिर इतनी देर क्यों?”

     

    कान्हा ने सारी बात बता दी।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    जब उन्हें पता चला कि कान्हा ने एक बच्ची को उसकी माँ तक पहुँचाया, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “तुमने अच्छा काम किया, लेकिन बिना बताए इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “माफ कर दो मैया।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस अगली बार मुझे बता देना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पक्का।”

     

    तभी उनके एक दोस्त ने पीछे से कहा—

     

    “मैया, कान्हा ने आज नाव भी किनारे खींची थी!”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “नाव?”

     

    कान्हा चुप।

     

    “तुमने नाव में जाने की कोशिश तो नहीं की?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। हमने नाव को खुद ही किनारे बुला लिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारी बातें भी ना!”

     

    उन्होंने कान्हा को अपने पास बैठाया और उन्हें खाना खिलाने लगीं।

     

    कान्हा खाते-खाते बोले—

     

    “मैया, आज मैंने एक बात सीखी।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसे रास्ता न मिले, उसका रास्ता दिखाना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “ये किसने सिखाया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मुझे खुद समझ आया।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “मेरे नन्हे कान्हा की शरारतों के बीच इतनी समझदारी भी छिपी है, ये तो मुझे आज पता चला।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    शाम को वह आँगन में बैठे अपनी बांसुरी बजाने लगे।

     

    वही मोर दूर पेड़ के पास आकर बैठ गया।

     

    गायें भी शांत होकर उन्हें देखने लगीं।

     

    यशोदा दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे को देख रही थीं।

     

    उन्हें लगा कि कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करें, उनके मन में दूसरों के लिए हमेशा प्यार रहता है।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा ने बांसुरी बजाते-बजाते अपने दोस्तों की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गए।

     

    कान्हा की अगली शरारत की योजना फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    और इस बार निशाना था—

     

    नंद बाबा की नई बनाई हुई दूध की बड़ी मटकी।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 8

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 8

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 8 — पापा की डायरी का राज

     

    आरोही और आरव तेज कदमों से कार की तरफ बढ़े।

     

    आरोही के हाथ में अभी भी फोन था।

     

    उसकी मां की घबराई हुई आवाज उसके कानों में गूंज रही थी “मुझे तुम्हारे पापा की डायरी मिली है।”

     

    आरोही का दिल बेचैनी से धड़क रहा था।

     

    आरव ने कार स्टार्ट की और उसकी तरफ देखा।

     

    “घबराओ मत।”

     

    आरोही ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

     

    “कैसे ना घबराऊं, आरव? इतने सालों से जिस सच की तलाश थी… शायद आज वो हमारे सामने आने वाला है।”

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम दोनों मिलकर सामना करेंगे।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हर बार ऐसा क्यों कहते हो?”

     

    “क्या?”

     

    “हम दोनों।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

     

    “क्योंकि अब मेरी जिंदगी में ‘मैं’ से ज्यादा ‘हम’ जरूरी लगने लगा है।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन दिल में एक डर अब भी था।

     

    अगर डायरी में ऐसा सच लिखा हुआ हुआ जिसने दोनों को अलग कर दिया तो?

     

    करीब आधे घंटे बाद दोनों घर पहुंचे।

     

    आरोही ने जैसे ही दरवाजा खोला, उसकी मां सामने खड़ी थीं।

     

    उनके हाथ में एक पुरानी काली डायरी थी।

     

    आरोही की नजर डायरी पर टिक गई।

     

    “मां… यही है?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने डायरी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन मां ने उसे रोक दिया।

     

    “पहले बैठो।”

     

    “मां, प्लीज।”

     

    “नहीं आरोही। इसे पढ़ने से पहले तुम्हें एक बात समझनी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    मां ने आरव की तरफ देखा।

     

    “ये डायरी सिर्फ तुम्हारे पिता की यादें नहीं हैं।”

     

    आरव भी गंभीर हो गया।

     

    “फिर?”

     

    “इसमें ऐसे नाम हैं, जिन्हें जानने के बाद तुम्हारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती है।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या इसमें आरव के परिवार का नाम है?”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो पढ़ते हैं।”

     

    मां ने डायरी आरोही के हाथ में दे दी।

     

    आरोही ने पहला पन्ना खोला।

     

    ऊपर उसके पिता की लिखावट थी।

     

    “12 मार्च”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “आज राजवीर से फिर मुलाकात हुई। हमारे बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि वो मेरी बेटी के खिलाफ कभी कुछ नहीं करेगा।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में हैरानी थी।

     

    “मेरे पिता… तुम्हारे पापा के बारे में ऐसा सोचते थे?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    अगला पन्ना।

     

    “18 मार्च”

     

    “विक्रम फिर मेरे पास आया। उसने मुझे राजवीर के खिलाफ जाने के लिए कहा। मैंने मना कर दिया।”

     

    आरव तुरंत आगे झुका।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरोही ने पन्ना पलटा।

     

    “मैंने उससे साफ कह दिया है कि मैं किसी भी कीमत पर राजवीर को धोखा नहीं दूंगा।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरोही की मां ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और राजवीर एक समय दुश्मन नहीं थे।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    “वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।”

     

    आरव ने भी हैरानी से मां को देखा।

     

    “मेरे पिता ने कभी इसका जिक्र नहीं किया।”

     

    मां ने कहा,

     

    “क्योंकि बाद में सब कुछ बदल गया।”

     

    आरोही ने डायरी आगे पढ़ी।

     

    “25 मार्च”

     

    “मुझे शक है कि विक्रम दोनों परिवारों के बीच गलतफहमी पैदा कर रहा है। अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो मेरी बेटी को सच्चाई बताना।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    मां की आंखें भर आईं।

     

    “पढ़ती जाओ।”

     

    अगला पन्ना।

     

    “28 मार्च”

     

    “आज मुझे एक ऐसा दस्तावेज मिला है जो साबित करता है कि कंपनी में करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई है। लेकिन ये काम न मेरा है और न राजवीर का।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो किसका?”

     

    आरोही ने नीचे पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    “तो उसने पैसे चुराए और इल्जाम दोनों परिवारों पर लगाया।”

     

    “शायद,” आरोही ने कहा।

     

    अगला पन्ना आधा फटा हुआ था।

     

    उस पर सिर्फ कुछ शब्द दिखाई दे रहे थे “अगर मैं मर जाऊं… तो M-17 में…”

     

    आरोही रुक गई।

     

    “आगे का पन्ना फटा हुआ है।”

     

    आरव ने डायरी हाथ में ली।

     

    “कोई जानबूझकर इसे फाड़कर ले गया है।”

     

    आरोही की मां ने तुरंत कहा,

     

    “तुम्हारे पापा की मौत के बाद मैंने ये डायरी बहुत ढूंढी थी। लेकिन मुझे कभी नहीं मिली।”

     

    “तो फिर ये अब कहां से आई?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “मां?”

     

    मां ने धीमे से कहा,

     

    “आज सुबह हमारे पुराने स्टोर रूम की सफाई करते समय ये एक लकड़ी के बक्से के पीछे मिली।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या बक्सा पहले से वहां था?”

     

    “हां।”

     

    “किसने रखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव और आरोही ने एक-दूसरे को देखा।

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    आरव जाने के लिए उठा।

     

    आरोही उसे दरवाजे तक छोड़ने आई।

     

    दोनों कुछ पल चुप खड़े रहे।

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “आरव।”

     

    “हम्म?”

     

    “आज जो कुछ पढ़ा… उससे एक बात तो साफ है।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता और मेरे पिता दुश्मन नहीं थे।”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उन्हें दुश्मन किसने बनाया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

     

    “विक्रम।”

     

    “और अगर वही तुम्हारे पापा की मौत के पीछे है?”

     

    “तो उसे कानून के सामने लाएंगे।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोली,

     

    “एक बात पूछूं?”

     

    “पूछो।”

     

    “अगर मेरे पापा और तुम्हारे पापा दोस्त थे… तो क्या तुम्हारे पापा को मेरी मां के बारे में पता था?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “शायद।”

     

    “और मेरे बारे में?”

     

    “शायद।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा ‘शायद’ भी बहुत है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुमने ही सिखाया है।”

     

    दोनों हंसने लगे।

     

    कुछ पल बाद खामोशी छा गई।

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “आरोही।”

     

    “हां?”

     

    “तुम खुश हो?”

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोली,

     

    “जब तुम मेरे पास होते हो… तब।”

     

    आरव की आंखों में चमक आ गई।

     

    “तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें ज्यादा से ज्यादा खुश रखूं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “और अगर मैं तुम्हारी आदत बन गई तो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो फिर जिंदगी भर की आदत बना लूंगा।”

     

    आरोही ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    “जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “बहुत बातें करते हो।”

     

    “ठीक है।”

     

    आरव मुड़ा।

     

    दो कदम आगे बढ़ा।

     

    फिर वापस उसकी तरफ देखा।

     

    “गुड नाइट।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “गुड नाइट।”

     

    आरव चला गया।

     

    आरोही दरवाजे पर खड़ी उसे तब तक देखती रही जब तक उसकी कार नजरों से ओझल नहीं हो गई।

     

    लेकिन उसी रात…

     

    आरव के पिता की पुरानी स्टडी में कुछ हलचल हुई।

     

    आरव ने घर लौटकर अपने पिता की पुरानी अलमारी खोली।

     

    उसे याद था कि उसके पिता के पास भी कई पुराने दस्तावेज थे।

     

    उसने एक-एक करके फाइलें निकालनी शुरू कीं।

     

    अचानक एक पुराना लकड़ी का डिब्बा नीचे गिरा।

     

    डिब्बा खुल गया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें उसके पिता राजवीर और विनय मेहरा साथ खड़े थे।

     

    दोनों हंस रहे थे।

     

    पीछे एक और आदमी था।

     

    विक्रम सूद।

     

    आरव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था “हम तीनों ने जो शुरू किया है, उसे कोई खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    “हम तीनों?”

     

    उसे कुछ समझ नहीं आया।

     

    तभी डिब्बे के अंदर एक छोटी-सी चाबी दिखाई दी।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर भी वही अक्षर खुदे थे M-17

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो मेरे पिता के पास भी इसकी चाबी थी।”

     

    उसने तुरंत कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, अभी मेरे घर आ।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे M-17 की दूसरी चाबी मिली है।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने कहा,

     

    “तो इसका मतलब…”

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हमारे पास अब दोनों चाबियां हैं।”

     

    अगली सुबह आरव और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम पहुंचे।

     

    आरोही भी उनके साथ थी।

     

    आरव ने दोनों चाबियां सामने रखीं।

     

    “एक तुम्हारे पापा की।”

     

    “और एक मेरे पापा की।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “शायद दोनों एक ही ताले के लिए हैं।”

     

    कमरे में एक पुरानी लोहे की अलमारी थी।

     

    लेकिन उस पर कोई ताला दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कबीर ने ध्यान से देखा।

     

    “रुको।”

     

    उसने अलमारी के नीचे हाथ लगाया।

     

    एक छोटा-सा छेद दिखाई दिया।

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    फिर दूसरी।

     

    दोनों चाबियां एक साथ घूमीं।

     

    क्लिक!

     

    अलमारी खुल गई।

     

    अंदर सिर्फ एक काला बॉक्स था।

     

    आरोही ने उसे बाहर निकाला।

     

    बॉक्स पर लिखा था “सच केवल उसी के लिए जो दोनों परिवारों पर भरोसा कर सके।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “इसे खोलें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    बॉक्स खुला।

     

    अंदर एक पेन ड्राइव, कुछ कागज और एक पुराना फोटो था।

     

    आरोही ने फोटो उठाया।

     

    उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

     

    फोटो में उसके पिता और आरव के पिता के साथ…

     

    आरोही की मां भी थीं।

     

    लेकिन वो तस्वीर उस समय की थी जब आरोही की मां ने हमेशा कहा था कि वह इन लोगों को जानती तक नहीं थीं।

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “मां ने हमसे झूठ बोला?”

     

    आरव ने फोटो हाथ में लिया।

     

    पीछे तारीख लिखी थी “घटना से तीन दिन पहले।”

     

    कबीर ने पेन ड्राइव उठाई।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “पता लगाते हैं।”

     

    उन्होंने लैपटॉप में पेन ड्राइव लगाई।

     

    एक वीडियो फाइल सामने आई।

     

    वीडियो चलाया गया।

     

    स्क्रीन पर विनय मेहरा दिखाई दिए।

     

    उनका चेहरा गंभीर था।

     

    वह कैमरे की तरफ देखकर बोल रहे थे “अगर ये वीडियो किसी के हाथ लगा है, तो समझ लेना कि मैं शायद जिंदा नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वीडियो में उसके पिता आगे बोले “मेरी मौत का जिम्मेदार राजवीर नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से स्क्रीन देखी।

     

    फिर विनय ने कहा “लेकिन राजवीर का बेटा… आरव… उसे बचाना बहुत जरूरी है।”

     

    वीडियो अचानक रुक गया।

     

    स्क्रीन काली हो गई।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “वीडियो क्यों रुक गया?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “शायद फाइल अधूरी है।”

     

    आरव की नजर स्क्रीन पर जमी थी।

     

    “मेरे पिता ने ऐसा क्या किया था कि मेरे पापा ने मुझे बचाने की बात कही?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमें पता करना होगा।”

     

    तभी कमरे की लाइट अचानक बंद हो गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “आरव?”

     

    “मैं यहीं हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड बाद बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    “दरवाजा बाहर से लॉक है!”

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “कोई हमें यहां बंद कर गया?”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    उसने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    अंधेरे में अचानक एक आवाज गूंजी “तुम्हें सच जानने की बहुत जल्दी थी ना?”

     

    आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    आरव ने आवाज की दिशा में देखा।

     

    “सामने आ!”

     

    आवाज फिर आई “सच जानोगे… तो शायद एक-दूसरे से नफरत करने लगोगे।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “हमारा रिश्ता इतना कमजोर नहीं है।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आओयप्यारज आई “देखते हैं।”

     

    अचानक लाइट वापस जल गई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन टेबल पर एक नया कागज रखा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    आरोही ने कागज पढ़ा।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उनके बीच पहली बार डर ने जगह बना ली।

     

    क्योंकि अगर ये सच था…

     

    तो उनके पिता सिर्फ दोस्त नहीं थे।

     

    उनके बीच कोई ऐसा विश्वासघात हुआ था…

     

    जिसकी कीमत शायद उनकी अगली पीढ़ी को चुकानी थी।

     

    और उन्हें अभी नहीं पता था कि इस पूरे खेल में…

     

    आरव और आरोही का प्यार ही सबसे बड़ा हथियार बनने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 7

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 7

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 7 — पापा का आखिरी खत

     

    आरोही के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे।

     

    उसकी नजरें उस खत की पहली लाइन पर जमी थीं—

     

    “आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”

     

    उसके बाद की लाइन पढ़ते ही उसकी सांस अटक गई।

     

    “और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”

     

    आरोही के होंठ कांपने लगे।

     

    “आरव…”

     

    उसके मुंह से बस इतना ही निकला।

     

    मां चुपचाप उसके सामने बैठी थीं।

     

    उनकी आंखों में इतने सालों से छुपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    आरोही ने खत को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मां… पापा ने आरव को बचाने के लिए क्यों कहा?”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा जानते थे कि जो कुछ होने वाला है, उसमें आरव का कोई दोष नहीं था।”

     

    “लेकिन आपने तो कहा था कि आरव के परिवार की वजह से पापा की मौत हुई।”

     

    “मैंने कहा था… उसके परिवार की वजह से।”

     

    मां की आवाज भर्रा गई।

     

    “आरव की वजह से नहीं।”

     

    आरोही कुछ पल उन्हें देखती रही।

     

    “तो मुझे पूरा सच बताइए।”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “आज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये खत तुम्हें खुद सब कुछ बताएगा।”

     

    आरोही ने खत की अगली लाइन पढ़ी।

     

    “बेटी, अगर तुम मुझसे प्यार करती हो तो मेरी बात पर भरोसा करना। आरव को अपने दुश्मन की तरह मत देखना। असली दुश्मन वो है, जो हमारे दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहा है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “असली दुश्मन कौन है?”

     

    मां ने धीमे से कहा,

     

    “हमें नहीं पता।”

     

    आरोही ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन पापा को पता था?”

     

    “शायद।”

     

    “फिर उन्होंने नाम क्यों नहीं लिखा?”

     

    मां चुप रहीं।

     

    आरोही ने खत को आगे पढ़ा।

     

    लेकिन अगली लाइन देखकर उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    वहां सिर्फ लिखा था—

     

    “जिस दिन तुम्हें वो पुरानी चाबी मिलेगी, उसी दिन तुम्हें आधा सच पता चल जाएगा।”

     

    आरोही ने तुरंत डिब्बे में रखी चाबी उठाई।

     

    “ये?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “ये किसकी चाबी है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “तुम्हारे पापा ने मरने से कुछ दिन पहले मुझे ये दी थी। बस इतना कहा था कि इसे संभालकर रखना।”

     

    आरोही चाबी को ध्यान से देखने लगी।

     

    उस पर बहुत छोटा-सा अक्षर खुदा था M-17

     

    “ये क्या है?”

     

    मां ने कहा,

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    आरोही ने खत को फिर से देखा।

     

    उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके पिता ने जाने से पहले कोई ऐसी चीज छुपाई थी, जो आज उसकी जिंदगी बदलने वाली थी।

     

    उधर आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने वही पुरानी फाइल खुली थी।

     

    कबीर भी उसके सामने बैठा था।

     

    “आरव, हमें ये पता लगाना होगा कि तुम्हारे पिता की कार उस रात वहां क्यों थी।”

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “और अगर मेरे पिता सच में विनय मेहरा से मिलने गए थे?”

     

    “तो?”

     

    “तो हो सकता है हादसे से पहले दोनों के बीच कोई बातचीत हुई हो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “लेकिन CCTV फुटेज अधूरी है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “बाकी फुटेज?”

     

    “गायब।”

     

    “गायब?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “किसने मिटाई?”

     

    “यही पता करना है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने अपना फोन उठाया।

     

    आरोही को कॉल किया।

     

    फोन नहीं उठा।

     

    उसने दोबारा कॉल किया।

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    आरव के मन में बेचैनी होने लगी।

     

    “कुछ हुआ तो नहीं?”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “किसे कॉल कर रहा है?”

     

    “आरोही।”

     

    “शायद सो गई हो।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। वो ऐसे फोन नहीं छोड़ती।”

     

    तभी उसका फोन बजा।

     

    आरोही का मैसेज था “कल मिलना है। बहुत जरूरी बात करनी है।”

     

    आरव ने तुरंत जवाब दिया “अभी सब ठीक है?”

     

    कुछ देर बाद जवाब आया “हां। लेकिन कल मुझे तुमसे कुछ पूछना है।”

     

    आरव ने लिखा “जो पूछना है, सामने पूछना।”

     

    आरोही ने सिर्फ इतना लिखा “वादा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “वादा।”

     

    अगली सुबह आरोही ने मां के सामने चाबी रखी।

     

    “मां, मैं इसे लेकर जा रही हूं।”

     

    मां घबरा गईं।

     

    “कहां?”

     

    “मुझे पता करना है कि ये चाबी किसकी है।”

     

    “आरोही, अकेली मत जाना।”

     

    “मैं अकेली नहीं हूं।”

     

    मां समझ गईं।

     

    “आरव?”

     

    आरोही ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    मां कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “अगर तुम्हारे पापा ने उसे बचाने के लिए कहा था… तो शायद उस पर भरोसा किया जा सकता है।”

     

    आरोही ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मैं सच पता करके रहूंगी।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “सावधान रहना।”

     

    दोपहर में आरोही और आरव शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी लाइब्रेरी के बाहर मिले।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम मुझे यहां क्यों लाई हो?”

     

    आरोही ने चाबी उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    “ये मेरे पापा की है।”

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    “M-17।”

     

    “हां।”

     

    “तुम्हें ये कहां मिली?”

     

    “पापा के पुराने सामान में।”

     

    फिर आरोही ने उसे खत दिखाया।

     

    आरव ने खत पढ़ा।

     

    उसके चेहरे पर गंभीरता आ गई।

     

    “तुम्हारे पापा ने मेरे बारे में लिखा है।”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने कहा है कि मुझे बचाना।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “इसलिए मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूं।”

     

    “पूछो।”

     

    “क्या तुम्हारे पापा के पास भी ऐसी कोई चाबी थी?”

     

    आरव कुछ सोचने लगा।

     

    फिर अचानक उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “रुको।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरे पिता के स्टडी रूम में एक पुरानी अलमारी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उस पर भी एक नंबर लिखा था।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने धीरे से कहा “M-17।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    “इसका मतलब…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “दोनों परिवारों के पास एक ही जगह की चाबी थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सी जगह?”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कबीर को फोन किया गया।

     

    कुछ मिनटों में कबीर ने पता लगा लिया कि शहर में एक पुराना रिकॉर्ड रूम था, जिसका सेक्शन M-17 कहलाता था।

     

    वह रिकॉर्ड रूम करीब दस साल से बंद था।

     

    आरोही और आरव तुरंत वहां पहुंच गए।

     

    पुरानी इमारत धूल से भरी हुई थी।

     

    दरवाजे पर जंग लगा ताला था।

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम साथ हो।”

     

    “तो?”

     

    “डरने की जरूरत नहीं।”

     

    दोनों अंदर चले गए।

     

    कमरे में पुराने दस्तावेजों की अलमारियां थीं।

     

    दीवार पर जगह-जगह धूल जमी थी।

     

    एक कोने में लोहे की छोटी अलमारी थी।

     

    उस पर लिखा था M-17

     

    आरोही की धड़कन तेज हो गई।

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर एक पुरानी फाइल थी।

     

    फाइल के ऊपर लिखा था “मेहरा- सिंह प्रोजेक्ट।”

     

    आरोही ने फाइल उठा ली।

     

    पहला पन्ना पढ़ते ही उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “ये प्रोजेक्ट जमीन का नहीं था।”

     

    “तो?”

     

    “ये एक कंपनी के बारे में था।”

     

    “कौन सी कंपनी?”

     

    आरोही ने पन्ना पलटा।

     

    अचानक एक नाम सामने आया विक्रम सूद।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव ने फाइल अपने हाथ में ले ली।

     

    “तो विक्रम दोनों परिवारों के बीच था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “और शायद वही असली दुश्मन है।”

     

    तभी पीछे से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    दोनों तुरंत पलटे।

     

    दरवाजे के पास कोई नहीं था।

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे पीछे रहो।”

     

    दोनों धीरे-धीरे बाहर आए।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी “बहुत देर कर दी।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “कोई हमारे आने का इंतजार कर रहा था।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    दोनों तेजी से बाहर आए।

     

    लेकिन जैसे ही वे पार्किंग में पहुंचे, एक बाइक तेज गति से उनकी तरफ आई।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।

     

    बाइक उनके पास से गुजर गई।

     

    आरोही डर गई।

     

    “आरव!”

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने बाइक का नंबर देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन बाइक दूर निकल चुकी थी।

     

    शाम को दोनों झील के किनारे पहुंचे।

     

    आज वहां कोई मजाक नहीं था।

     

    दोनों चुप बैठे थे।

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या तुम्हें लगता है कि विक्रम सूद ने मेरे पापा को मरवाया?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मुझे अब इस पर शक नहीं… भरोसा होने लगा है।”

     

    “लेकिन सबूत?”

     

    “हमें मिलेगा।”

     

    “और अगर वो नहीं मिला?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “फिर भी मैं तुम्हारा साथ दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम मेरे लिए इतना क्यों कर रहे हो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ दोस्त नहीं हो।”

     

    आरोही की धड़कन तेज हो गई।

     

    “तो?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “शायद… मैं तुम्हें खोने से डरने लगा हूं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “और अगर मैं कहूं कि मुझे भी डर लगता है?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किस बात का?”

     

    “तुम्हें खोने का।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।

     

    “तो फिर मत खोना।”

     

    आरोही ने उसकी उंगलियां कसकर पकड़ लीं।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    लेकिन उसी पल आरोही का फोन बजा।

     

    मां का फोन था।

     

    उसने तुरंत उठाया।

     

    “हां मां?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर मां की कांपती आवाज आई “आरोही… तुम तुरंत घर आओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “मुझे अभी तुम्हारे पापा की एक और चीज मिली है।”

     

    आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा “तुम्हारे पापा की डायरी।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “पापा की डायरी मिल गई है।”

     

    आरव ने उसका हाथ थामे रखा।

     

    “चलो।”

     

    दोनों कार की तरफ बढ़े।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था…

     

    उस डायरी में लिखा सच सिर्फ उनके परिवारों की दुश्मनी का राज नहीं था।

     

    उसमें शायद उस रात की पूरी कहानी लिखी थी…

     

    जिस रात विनय मेहरा की मौत हुई थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल क्या उस रात आरव के पिता सच में वहां मौजूद थे?

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 6

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 6

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 6 — वो राज जो दिल तोड़ सकता था

     

    सुबह की पहली किरण खिड़की से होते हुए कमरे में आई, लेकिन आरोही की आंखें रातभर की बेचैनी के कारण अब भी भारी थीं।

     

    वह बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी के उसी पन्ने को देख रही थी, जिस पर उसने आरव के बारे में लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं… फिर पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

     

    उसने उंगलियों से उन शब्दों को हल्के से छुआ।

     

    फिर उसकी आंखों के सामने मां का चेहरा आ गया।

     

    “आरव के परिवार की वजह से तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    दिल आरव पर भरोसा करना चाहता था।

     

    लेकिन दिमाग बार-बार सवाल कर रहा था अगर मां सच कह रही हैं तो?

     

    तभी फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर आरव का नाम देखकर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने कॉल उठा लिया।

     

    “हैलो।”

     

    दूसरी तरफ से आरव की आवाज आई “गुड मॉर्निंग।”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “गुड मॉर्निंग।”

     

    “सोई नहीं थी?”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “तुम्हारी आवाज बता रही है।”

     

    आरोही हल्का-सा मुस्कुरा दी।

     

    “तुम्हें हर बात कैसे पता चल जाती है?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनते-सुनते आदत हो गई है।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “आज मिलोगे?”

     

    “जहां कहो।”

     

    “उसी झील के पास।”

     

    “छह बजे?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “पक्का।”

     

    फोन कट गया।

     

    आरोही ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

     

    पता नहीं क्यों…

     

    आरव से बात करने के बाद उसके दिल का डर थोड़ा कम हो जाता था।

     

    दूसरी तरफ आरव अपने ऑफिस में बैठा था।

     

    कबीर उसके सामने एक फाइल लेकर खड़ा था।

     

    “हमें विक्रम सूद के बारे में कुछ और पता चला है।”

     

    आरव ने फाइल ली।

     

    “क्या?”

     

    “पिछले दस सालों में उसने कई बार अपनी कंपनी का नाम बदला है।”

     

    “क्यों?”

     

    “पैसे को इधर-उधर करने के लिए।”

     

    आरव ने कागज पलटा।

     

    अचानक उसकी नजर एक तारीख पर रुक गई।

     

    “ये वही तारीख है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कौन सी?”

     

    “जिस दिन विनय मेहरा का एक्सीडेंट हुआ था।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “इसका मतलब विक्रम वहां था?”

     

    “सीधे तौर पर नहीं। लेकिन उसकी कार उसी इलाके में देखी गई थी।”

     

    आरव कुर्सी से उठ गया।

     

    “मुझे उस एक्सीडेंट की पूरी रिपोर्ट चाहिए।”

     

    “मैंने मंगवा ली है।”

     

    कबीर ने एक फाइल उसके सामने रख दी।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था “सड़क दुर्घटना — चालक की मौके पर मौत।”

     

    लेकिन नीचे एक लाइन लाल पेन से काटी गई थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये किसने काटी?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुरानी फाइल है। शायद पुलिस विभाग ने।”

     

    आरव ने उस लाइन को ध्यान से देखा।

     

    “यहां कुछ लिखा था।”

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “हम पता कर रहे हैं।”

     

    आरव ने फाइल बंद कर दी।

     

    “मुझे आज ही जवाब चाहिए।”

     

    शाम के छह बजने वाले थे।

     

    आरोही झील के किनारे पहुंच चुकी थी।

     

    आज मौसम कुछ अलग था।

     

    आसमान पर बादल थे।

     

    हवा में बारिश की खुशबू थी।

     

    वह जेट्टी के पास खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

     

    कुछ ही देर में दूर से आरव दिखाई दिया।

     

    आरोही के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    आरव उसके पास पहुंचा।

     

    “बहुत इंतजार करवाया?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “बस पांच मिनट।”

     

    “मुझे लगा तुम नाराज हो जाओगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुमसे मिलने के लिए मुझे एक जरूरी काम छोड़ना पड़ा।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “कौन सा काम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुमसे ज्यादा जरूरी कुछ नहीं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम बहुत बातें बनाने लगे हो।”

     

    “तुम्हारे साथ रहकर सीख रहा हूं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    कुछ देर वे झील के किनारे चलते रहे।

     

    फिर आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “आरव।”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे परिवार ने कोई बहुत बड़ी गलती की है… तो क्या तुम उन्हें माफ कर पाओगे?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “गलती कितनी बड़ी है, उस पर निर्भर करता है।”

     

    “अगर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दी हो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और अगर वो गलती जानबूझकर न की गई हो?”

     

    “तो शायद।”

     

    “और अगर तुम्हें उस इंसान से प्यार हो जाए, जिसके परिवार के साथ तुम्हारे परिवार ने गलत किया हो?”

     

    आरव की चाल अचानक धीमी हो गई।

     

    उसने आरोही को देखा।

     

    “तुम ये सवाल क्यों पूछ रही हो?”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “आरोही।”

     

    “हम्म?”

     

    “तुम्हारे मन में कुछ है।”

     

    आरोही चुप रही।

     

    आरव ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या तुम मुझसे डरने लगी हो?”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “मुझे डर है कि कहीं तुम्हें खो न दूं।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम मुझे इतनी आसानी से नहीं खो सकती।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “इतना भरोसा?”

     

    “तुम पर।”

     

    आरोही की आंखों से एक आंसू गिर पड़ा।

     

    आरव ने उसे धीरे से पोंछ दिया।

     

    “रो क्यों रही हो?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुम्हें कुछ परेशान कर रहा है।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर मैं तुमसे एक बात छुपा रही हूं तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो जब मन करे बता देना।”

     

    “तुम नाराज नहीं होगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे हर राज से ज्यादा जरूरी तुम हो।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    और उसी पल उसे महसूस हुआ…

     

    वह इस इंसान से सच में प्यार करने लगी थी।

     

    अचानक बारिश शुरू हो गई।

     

    पहले कुछ बूंदें गिरीं।

     

    फिर बारिश तेज हो गई।

     

    आरोही हंसते हुए भागने लगी।

     

    आरव भी उसके पीछे दौड़ा।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए।

     

    आरोही के बाल भीग चुके थे।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा बारिश में ऐसे ही भागती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बारिश में रोना आसान होता है।”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “बारिश आंसुओं को छुपा देती है।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “अब रोना हो तो मेरे सामने रोना।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारे आंसू बारिश के भरोसे नहीं छोड़ सकता।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    वह धीरे से उसके करीब आ गई।

     

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “आरोही…”

     

    “हम्म?”

     

    “मुझे लगता है…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव कुछ कह पाता, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    “बोल।”

     

    दूसरी तरफ से कबीर की घबराई आवाज आई “आरव, हमें विनय मेहरा की मौत के बारे में एक बड़ा सबूत मिला है।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    “उस रात की एक CCTV रिकॉर्डिंग मिली है।”

     

    “कहां?”

     

    “एक पुराने पेट्रोल पंप से।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “क्या दिख रहा है?”

     

    कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला “एक काली कार।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसकी?”

     

    कबीर की आवाज भारी हो गई।

     

    “तुम्हारे पिता की।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसने कुछ पल कुछ नहीं कहा।

     

    “कबीर… पक्का?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने फोन नीचे कर दिया।

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    लेकिन अब उसके पास एक सवाल था क्या सच में उसके पिता का आरोही के पिता की मौत से कोई संबंध था?

     

    उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक पुराना कमरा।

     

    एक आदमी लैपटॉप के सामने बैठा था।

     

    स्क्रीन पर वही CCTV फुटेज चल रही थी।

     

    उसने वीडियो रोक दिया।

     

    फ्रेम में राजवीर सिंह की कार दिखाई दे रही थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “अब खेल शुरू होगा।”

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “वो सबूत आरव तक पहुंच गया है।”

     

    दूसरी तरफ से आवाज आई—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    “लेकिन अगर उसने पूरी रिकॉर्डिंग देख ली तो?”

     

    “उसे पूरी रिकॉर्डिंग कभी नहीं मिलेगी।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “और आरोही?”

     

    “उसका क्या?”

     

    “उसे भी पता चल जाएगा।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर दूसरी तरफ से आवाज आई “नहीं। अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पहले दोनों को एक-दूसरे पर शक करना होगा।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    बारिश अब और तेज हो चुकी थी।

     

    आरोही ने आरव की आंखों में देखा।

     

    “तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो।”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “अभी नहीं बता सकता।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “फिर से?”

     

    “आरोही, मुझ पर भरोसा करो।”

     

    “मैं करती हूं।”

     

    “तो?”

     

    “लेकिन डरती भी हूं।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “मुझसे?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “उस सच से… जो शायद हम दोनों को एक-दूसरे से दूर कर दे।”

     

    आरव का दिल बैठ गया।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “अगर सच हमें अलग करने आएगा…”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “तो मैं सच से लड़ूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह कुछ बोलती, उससे पहले आरव ने उसके माथे पर हल्के से हाथ रखा।

     

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जो कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन उसी पल…

     

    दूर सड़क पर एक काली कार खड़ी थी।

     

    कार के अंदर बैठा इंसान उन्हें देख रहा था।

     

    उसके हाथ में आरोही के पिता की पुरानी तस्वीर थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था “जब बेटी को सच्चाई पता चलेगी, तब पिता का अधूरा बदला पूरा होगा।”

     

    रात को घर लौटकर आरोही ने देखा कि उसकी मां सोई नहीं थीं।

     

    वह उसी लकड़ी के डिब्बे को सामने रखकर बैठी थीं।

     

    आरोही उनके पास गई।

     

    “मां?”

     

    मां ने चौंककर डिब्बा बंद कर दिया।

     

    “तुम आ गई?”

     

    “ये क्या है?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “मां, मैंने देख लिया।”

     

    मां ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरोही ने डिब्बा उठाया।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा की आखिरी निशानी।”

     

    आरोही ने डिब्बा खोल दिया।

     

    अंदर पुराने कागज, एक चाबी और एक लिफाफा था।

     

    उसने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही के लिए।”

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “पापा ने मेरे लिए लिखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “आपने मुझे पहले क्यों नहीं दिया?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने कहा था… जब तक तुम सच जानने के लायक न हो जाओ, इसे मत खोलना।”

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने लिफाफा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे खोला…

     

    अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं “आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”

     

    आरोही के हाथ से खत लगभग छूट गया।

     

    उसने कांपती आवाज में अगली लाइन पढ़ी “और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    उसके दिल में सिर्फ एक नाम आया आरव।

     

    लेकिन क्यों?

     

    उसके पिता ने आरव को बचाने की बात क्यों लिखी थी?

     

    और आखिर ऐसा कौन-सा सच था…

     

    जिसने दस साल पहले दो परिवारों को दुश्मन बना दिया था?

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 5 — एक सच, दो दिल

     

    आरोही अपनी मां के सामने बिल्कुल खामोश बैठी थी।

     

    मां के मुंह से निकले शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही को लग रहा था जैसे उसके आसपास की सारी आवाजें अचानक बंद हो गई हों।

     

    उसने मां की तरफ देखा।

     

    “मां… आप क्या कह रही हैं?”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं वही कह रही हूं जो इतने सालों से अपने दिल में दबाकर बैठी हूं।”

     

    “लेकिन पापा की मौत तो एक एक्सीडेंट में हुई थी।”

     

    “हां… यही मैंने तुम्हें बताया था।”

     

    “तो फिर सच क्या है?”

     

    मां की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “सच ये है कि तुम्हारे पापा का एक्सीडेंट करवाया गया था।”

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “किसने?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मां!”

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच जानना है।”

     

    मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम्हारे पापा और आरव के पिता के बीच बहुत पुरानी दुश्मनी थी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “बिजनेस।”

     

    “बस बिजनेस के लिए कोई किसी को मार देगा?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “बात सिर्फ बिजनेस की नहीं थी।”

     

    आरोही ध्यान से उनकी तरफ देखने लगी।

     

    “तो फिर?”

     

    मां कुछ कहने ही वाली थीं कि अचानक उनकी नजर दरवाजे की तरफ चली गई।

     

    वह तुरंत चुप हो गईं।

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “आप कुछ छुपा रही हैं।”

     

    “आरोही, मेरी बात सुन।”

     

    मां ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

     

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं ऐसा नहीं कर सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह कैसे कहती कि आरव अब उसके लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं था?

     

    कि उसकी आवाज सुनते ही उसके दिल की धड़कन बदल जाती थी।

     

    कि उसके साथ बिताया हर पल उसे याद रहता था।

     

    कि आज पहली बार जब आरव ने कहा था “तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”

     

    तो उसके दिल ने उसी पल उसे अपना मान लिया था।

     

    मां उसकी खामोशी समझ गईं।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “तुम उससे प्यार करने लगी हो?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    उसने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

     

    मां ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “नहीं…”

     

    आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, प्यार को मैं आदेश देकर खत्म नहीं कर सकती।”

     

    “लेकिन ये प्यार तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगा।”

     

    “अगर आरव दोषी नहीं हुआ तो?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “आपने कहा कि उसके परिवार की वजह से पापा की मौत हुई। लेकिन क्या आरव उस वक्त वहां था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर उसकी क्या गलती है?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    आरोही उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई।

     

    दरवाजे पर पहुंचकर वह रुकी।

     

    “मां।”

     

    “हां?”

     

    “मैं आरव से दूर नहीं जाऊंगी… जब तक मुझे खुद ये यकीन न हो जाए कि वो मेरे पापा की मौत के लिए जिम्मेदार है।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम नहीं जानती कि तुम किस आग से खेल रही हो।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    फिर वह कमरे में चली गई।

     

    अपने कमरे में पहुंचते ही आरोही ने दरवाजा बंद कर लिया।

     

    उसने खुद को आईने में देखा।

     

    आंखों में आंसू थे।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का नाम स्क्रीन पर था।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही।

     

    फिर कॉल कर दिया।

     

    पहली घंटी।

     

    दूसरी घंटी।

     

    तीसरी घंटी।

     

    आरव ने फोन उठा लिया।

     

    “आरोही?”

     

    उसकी आवाज सुनते ही आरोही की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “हां।”

     

    आरव तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “तुम कहां हो?”

     

    “घर पर।”

     

    “मुझसे मिलोगे?”

     

    कुछ पल की खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “मैं आ रहा हूं।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरव अपनी कार लेकर आरोही के घर के बाहर पहुंच गया।

     

    आरोही पहले से बाहर खड़ी थी।

     

    उसने आरव को देखते ही महसूस किया कि उसके अंदर का सारा डर अचानक थोड़ा कम हो गया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह कुछ बोल नहीं पाई।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव घबरा गया।

     

    “आरोही!”

     

    वह उसके करीब आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “क्या तुम्हारे परिवार ने मेरे पापा को मारा था?”

     

    आरव बिल्कुल जम गया।

     

    उसने उसे देखा।

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “मेरी मां ने कहा है कि मेरे पापा की मौत के पीछे तुम्हारे परिवार का हाथ था।”

     

    आरव ने धीरे से सांस छोड़ी।

     

    “मुझे इसका अंदाजा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “आज ही कुछ बातें पता चली थीं।”

     

    “और तुमने मुझे बताया नहीं?”

     

    “मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता था।”

     

    “लेकिन मुझे सच जानने का हक था।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे बताना चाहिए था।”

     

    आरोही ने आंसू पोंछे।

     

    “अब बताओ।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पापा की मौत के पीछे कौन था।”

     

    “लेकिन?”

     

    “इतना जरूर जानता हूं कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता के बीच बहुत बड़ा विवाद था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “आरव!”

     

    “एक प्रोजेक्ट को लेकर।”

     

    “कौन सा प्रोजेक्ट?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “एक ऐसी जमीन का मामला था जिस पर दोनों परिवारों की नजर थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और मेरे पापा हार गए?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज भारी हो गई।

     

    “तुम्हारे पापा ने वो जमीन मेरे पिता से बचा ली थी।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “उसके कुछ ही दिन बाद उनका एक्सीडेंट हुआ।”

     

    दोनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “तो क्या मेरे पापा को तुम्हारे पिता ने मरवाया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं नहीं जानता।”

     

    “लेकिन शक है?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने पूछा,

     

    “और अगर सच में ऐसा हुआ?”

     

    आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर अपने परिवार का बचाव नहीं करूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    “अगर मेरे परिवार ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है… तो मैं उसका हिस्सा नहीं बनूंगा।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सच के खिलाफ नहीं जा सकता।”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझसे नाराज हो सकती हो।”

     

    “हम्म।”

     

    “मुझसे दूर भी जा सकती हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “मुझ पर उस गलती की सजा मत देना जो मैंने की ही नहीं।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसने बस अपना हाथ उसके हाथ में रहने दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी।

     

    अचानक आरोही के फोन पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “अगर आरव पर भरोसा किया, तो अपनी मां को खो दोगी।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन उसे दिखा दिया।

     

    मैसेज पढ़ते ही आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “ये नंबर मुझे दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मैं पता लगाऊंगा कि ये कौन है।”

     

    आरव ने नंबर अपने फोन में सेव कर लिया।

     

    तभी पीछे से एक कार तेजी से उनके पास से गुजरी।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “सावधान!”

     

    कार कुछ दूर जाकर रुक गई।

     

    दोनों ने उसकी तरफ देखा।

     

    कार की खिड़की थोड़ी खुली।

     

    अंदर कोई बैठा था।

     

    लेकिन चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “तुम अंदर जाओ।”

     

    “लेकिन”

     

    “आरोही, अभी।”

     

    उसकी आवाज में ऐसी सख्ती थी कि आरोही बिना कुछ कहे घर के अंदर चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा कार को जाते हुए देखता रहा।

     

    उसने नंबर नोट करने की कोशिश की।

     

    लेकिन कार इतनी दूर निकल चुकी थी कि नंबर साफ नहीं दिखा।

     

    उसने कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे अभी तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आरोही को धमकी मिल रही है।”

     

    “क्या?”

     

    “और कोई हमारा पीछा कर रहा है।”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “मैं अभी आता हूं।”

     

    रात के करीब ग्यारह बजे।

     

    आरोही अपने कमरे में बैठी थी।

     

    मां सो चुकी थीं।

     

    लेकिन आरोही की आंखों में नींद नहीं थी।

     

    वह बार-बार आरव के बारे में सोच रही थी।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का मैसेज था “सो जाना। मैं हूं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “तुम हमेशा रहोगे?”

     

    कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “अगर तुमने साथ दिया तो।”

     

    आरोही के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    उसने लिखा “और अगर मैंने साथ नहीं दिया?”

     

    आरव का जवाब आया “फिर भी।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने फोन सीने से लगा लिया।

     

    उसे अब खुद से सच स्वीकार करना पड़ा।

     

    वह आरव से प्यार करने लगी थी।

     

    लेकिन उसी प्यार के साथ एक डर भी था।

     

    अगर उसकी मां की बात सच हुई…

     

    अगर सच में आरव के परिवार ने उसके पिता को मारा था…

     

    तो क्या उनका प्यार इस सच के सामने टिक पाएगा?

     

    उधर आरव और कबीर एक सुनसान ऑफिस में बैठे थे।

     

    कबीर ने लैपटॉप पर कुछ तस्वीरें खोल रखी थीं।

     

    “ये देख।”

     

    आरव स्क्रीन के करीब आया।

     

    एक पुरानी फोटो थी।

     

    उसमें आरव के पिता राजवीर सिंह और आरोही के पिता विनय मेहरा एक साथ खड़े थे।

     

    लेकिन फोटो के पीछे एक तीसरा आदमी भी था।

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    “इसे मैं पहचानता हूं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर… विक्रम सूद।”

     

    कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

     

    “और सबसे बड़ी बात?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद कंपनी का सबसे बड़ा फायदा इसी आदमी को हुआ था।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हो सकता है हम इतने सालों से गलत इंसान पर शक कर रहे हों।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “अगर विक्रम सूद ने ये सब किया है… तो उसने मेरे परिवार और आरोही के परिवार के बीच दुश्मनी क्यों पैदा की?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “यही पता करना होगा।”

     

    आरव ने कुर्सी से उठते हुए कहा,

     

    “कल से नहीं।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “अभी से।”

     

    उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक आलीशान घर के अंदर एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही तस्वीर थी जिसमें आरव और आरोही कैफे में बैठे थे।

     

    वह तस्वीर को देखकर मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों जितना करीब आओगे…”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे लिए खेल उतना ही आसान होता जाएगा।”

     

    तभी पीछे से एक आदमी ने पूछा,

     

    “सर, क्या करें?”

     

    उसने तस्वीर टेबल पर रख दी।

     

    “पहले आरव को उसके पिता के खिलाफ करो।”

     

    “और लड़की?”

     

    उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “आरोही को उसके पिता के सच तक पहुंचने दो।”

     

    “अगर वो सच तक पहुंच गई तो?”

     

    उस आदमी की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “तभी तो असली खेल शुरू होगा।”

     

    अगली सुबह आरोही की मां अपने कमरे में पुरानी अलमारी खोल रही थीं।

     

    अचानक उन्हें नीचे रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने उसे बाहर निकाला।

     

    डिब्बे में कुछ पुराने कागज और एक चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे नीचे एक लिफाफा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था “आरोही के लिए जब उसे सच्चाई जानने का समय आए।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्होंने लिफाफा हाथ में लिया।

     

    “शायद अब वो समय आ गया है।”

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था उस लिफाफे के अंदर सिर्फ आरोही के पिता की मौत का राज नहीं था।

     

    उसमें एक ऐसा सच था जो आरव और आरोही के रिश्ते की पूरी नींव हिला देने वाला था।

     

    और शायद उस सच के सामने आने के बाद दोनों के लिए एक-दूसरे से प्यार करना सबसे मुश्किल काम होने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 4

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 4

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 4 — एक अनकहा एहसास

     

    आरव कुछ देर तक अपने हाथ में पकड़ी तस्वीर को देखता रहा।

     

    तस्वीर में वह और आरोही आमने-सामने बैठे थे।

     

    दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था कि दोनों के बीच कुछ खास है।

     

    लेकिन आरव की नजर तस्वीर पर नहीं, उसके पीछे लिखे शब्दों पर अटक गई थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

     

    उसकी मुट्ठी कस गई।

     

    “कबीर ने जो कहा… उसका मतलब क्या है?”

     

    आरव ने तुरंत अपना फोन उठाया और कबीर को कॉल किया।

     

    “कबीर, तुम अभी कहां हो?”

     

    “अपने ऑफिस में।”

     

    “मैं आ रहा हूं।”

     

    “आरव, अकेले मत आना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जो पता चला है, वो थोड़ा गंभीर है।”

     

    आरव ने बिना कुछ कहे फोन काट दिया।

     

    वह कुर्सी से उठा और ऑफिस से बाहर निकल गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह लिफ्ट की तरफ बढ़ा, उसके फोन पर आरोही का मैसेज आया।

     

    “आज शाम झील चलोगे?”

     

    आरव के कदम रुक गए।

     

    कुछ सेकंड तक वह उस मैसेज को देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर तनाव के बीच हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने जवाब लिखा “तुम बुलाओ और मैं ना आऊं, ऐसा हो सकता है?”

     

    कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “तो फिर शाम 6 बजे।”

     

    आरव ने लिखा “पक्का।”

     

    फोन जेब में रखते ही उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसे कबीर से मिलने जाना था।

     

    क्योंकि अब उसे जानना था आखिर आरोही कौन थी?

     

    कबीर के ऑफिस में पहुंचते ही आरव ने बिना समय गंवाए पूछा,

     

    “क्या पता चला?”

     

    कबीर ने दरवाजा बंद किया।

     

    फिर टेबल पर एक फाइल रख दी।

     

    “पहले बैठ।”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    अंदर कुछ पुराने दस्तावेज और तस्वीरें थीं।

     

    सबसे ऊपर एक तस्वीर लगी थी।

     

    एक छोटी बच्ची की।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में उठाई।

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “आरोही।”

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    बच्ची की आंखें बिल्कुल वैसी ही थीं।

     

    “ये कितने साल पुरानी है?”

     

    “लगभग बीस साल।”

     

    आरव ने अगला कागज उठाया।

     

    “यहां नाम… आरोही मेहरा लिखा है।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आरोही ने मुझे बताया था कि उसका नाम आरोही शर्मा है।”

     

    “यही तो समस्या है।”

     

    कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

     

    “लगभग दस साल पहले उसके पिता की मौत एक कार दुर्घटना में हुई थी। उसके बाद उसकी मां उसे लेकर शहर छोड़कर चली गईं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “फिर कुछ साल बाद दोनों वापस आईं। लेकिन उन्होंने अपना सरनेम बदल लिया।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “यही हमें पता नहीं।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    कबीर ने एक और फोटो उसके सामने रखी।

     

    आरव की आंखें अचानक ठहर गईं।

     

    फोटो में एक आदमी था।

     

    वह आदमी उसे पहचानता था।

     

    “ये…”

     

    “हां।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “इसी आदमी का नाम पिछले कई सालों से तुम्हारे परिवार के दुश्मनों की लिस्ट में है।”

     

    आरव ने फोटो को कसकर पकड़ लिया।

     

    “लेकिन इसका आरोही से क्या संबंध है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “यही सबसे बड़ा सवाल है।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे आरोही से मिलना होगा।”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, सोच-समझकर।”

     

    “मैं सोच चुका हूं।”

     

    “तू भावनाओं में फैसला मत ले।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर वो इस सब में फंसी है, तो मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

     

    कबीर ने गहरी सांस ली।

     

    “और अगर वही इस कहानी की वजह निकली तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तो सच सामने आने तक मैं उसका साथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शाम के छह बजने में कुछ मिनट बाकी थे।

     

    आरोही झील के किनारे खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

     

    आज उसने हल्के गुलाबी रंग का सूट पहना था।

     

    उसके हाथ में वही डायरी थी।

     

    वह बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “छह बजने वाले हैं…”

     

    उसने धीरे से कहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “किसका इंतजार हो रहा है?”

     

    आरोही ने पलटकर देखा।

     

    आरव खड़ा था।

     

    सफेद शर्ट और काली जींस में।

     

    चेहरे पर वही मुस्कान थी।

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    “आपका।”

     

    आरव ने भौंह उठाई।

     

    “इतनी आसानी से मान लिया?”

     

    “क्या?”

     

    “कि आप मेरा इंतजार कर रही थीं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आपको कोई गलतफहमी है तो मैं जा सकती हूं।”

     

    वह जाने के लिए मुड़ी ही थी कि आरव ने कहा,

     

    “रुको।”

     

    आरोही रुक गई।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मजाक कर रहा था।”

     

    “बहुत खराब मजाक है आपका।”

     

    “लेकिन तुम मुस्कुरा रही हो।”

     

    आरोही ने महसूस किया कि सच में उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “आपको हर चीज कैसे पता चल जाती है?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें देखकर पता चल जाता है।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    दोनों झील के किनारे चलने लगे।

     

    कुछ दूर जाने के बाद आरोही ने अपनी डायरी आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “ये पढ़ोगे?”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तुम्हारी डायरी?”

     

    “हां।”

     

    “मैं तुम्हारी निजी बातें नहीं पढ़ूंगा।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “जिस पन्ने पर मैंने तुम्हारे बारे में लिखा है, वो पढ़ सकते हो।”

     

    आरव ने डायरी ले ली।

     

    पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं।

    पहले अजनबी लगते हैं,

    फिर दोस्त बन जाते हैं।

    और पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

     

    आरव ने पढ़ना बंद कर दिया।

     

    उसने धीरे से पूछा,

     

    “ये मेरे बारे में है?”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “शायद।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा ये ‘शायद’ बहुत खतरनाक है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर बार मुझे उम्मीद दे देता है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किस चीज की उम्मीद?”

     

    आरव कुछ बोलने ही वाला था कि उसका फोन बज उठा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    आरव ने फोन देखा और कॉल काट दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसका फोन था?”

     

    “कबीर का।”

     

    “उठाया क्यों नहीं?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “तुम्हें कभी लगता है कि हम बहुत जल्दी करीब आ रहे हैं?”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    “हां।”

     

    “और डर नहीं लगता?”

     

    “किससे?”

     

    “कि अगर ये रिश्ता टूट गया तो?”

     

    आरव की आंखों में अचानक गंभीरता आ गई।

     

    “हर खूबसूरत चीज के खत्म होने का डर होता है।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी इंसान उसे जीता है।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “तुम बहुत अजीब हो।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम भी।”

     

    तभी अचानक तेज हवा चली।

     

    आरोही के हाथ से डायरी छूटकर नीचे गिर गई।

     

    आरव उसे उठाने झुका।

     

    लेकिन उसी वक्त उसे डायरी के अंदर से एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    एक आदमी और एक छोटी बच्ची।

     

    आरव की नजर उस आदमी के चेहरे पर पड़ी।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    वही आदमी।

     

    वही चेहरा।

     

    जो कुछ देर पहले कबीर की फाइल में था।

     

    आरोही के पिता।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में उठा ली।

     

    “ये कौन हैं?”

     

    आरोही अचानक घबरा गई।

     

    उसने तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

     

    “मेरे पापा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हारे पापा का नाम क्या था?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “विनय मेहरा।”

     

    आरव के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारा सरनेम मेहरा है।”

     

    आरोही का चेहरा उतर गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव… तुम्हें क्या पता चला है?”

     

    आरव उसे देखता रहा।

     

    वह सच बताना चाहता था।

     

    लेकिन उसी वक्त उसका फोन फिर बजा।

     

    इस बार एक अनजान नंबर था।

     

    आरव ने कॉल उठाई।

     

    “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ वही भारी आवाज थी।

     

    “मैंने कहा था ना… लड़की से दूर रहो।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम हो कौन?”

     

    “जिस सच की तलाश तुम कर रहे हो, वो तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा।”

     

    “सामने आकर बात करो।”

     

    “जल्द ही।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    आरव ने फोन नीचे किया।

     

    “कोई नहीं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “झूठ मत बोलो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरोही…”

     

    “तुम कुछ जानते हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तुम्हारे पिता के बारे में।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे पापा?”

     

    “हां।”

     

    “क्या हुआ था उन्हें?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मुझे अभी पूरी बात नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन तुम कुछ जानते हो।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “इतना जानता हूं कि तुम्हारे पापा की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं थी।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे शक है कि उनकी मौत के पीछे वही लोग हैं जो आज हमें धमका रहे हैं।”

     

    आरोही ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “नहीं…”

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    वह पीछे हट गई।

     

    “मेरी मां ने हमेशा कहा था कि वो हादसा था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हो सकता है उन्हें भी पूरी सच्चाई न पता हो।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो इतने सालों से… मैं जिस सच को मानती आई… वो झूठ था?”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने बिना सोचे जवाब दिया,

     

    “क्योंकि अब तुम सिर्फ मेरी दोस्त नहीं हो।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “तो क्या हूं?”

     

    आरव कुछ पल उसकी आंखों में देखता रहा।

     

    उसके पास जवाब था।

     

    लेकिन शब्द नहीं थे।

     

    वह बस इतना कह पाया “तुम… मेरे लिए बहुत खास हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “बस खास?”

     

    आरव भी मुस्कुरा दिया।

     

    “शायद उससे भी ज्यादा।”

     

    दोनों के बीच कुछ पल की खामोशी छा गई।

     

    इस बार वह खामोशी अजीब नहीं थी।

     

    उसमें एक नया एहसास था।

     

    एक ऐसा एहसास जिसे दोनों महसूस कर रहे थे…

     

    लेकिन कोई नाम नहीं दे रहा था।

     

    उसी रात आरोही घर पहुंची तो उसकी मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

     

    “कहां थी?”

     

    “झील के पास।”

     

    मां का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “किसके साथ?”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “आरव के साथ।”

     

    मां के हाथ से चाय का कप लगभग गिर गया।

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “आप भी यही क्यों कह रही हैं?”

     

    मां की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “क्योंकि मैं उसे जानती हूं।”

     

    “कैसे?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही उनके पास आकर बैठ गई।

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही जैसे सुनकर जम गई।

     

    “क्या?”

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “तुम्हें उससे दूर रहना होगा।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने सिर्फ इतना कहा “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारे पापा और आरव के परिवार के बीच क्या हुआ था… तो तुम खुद उससे नफरत करने लगोगी।”

     

    आरोही की आंखों के सामने आरव का चेहरा घूमने लगा।

     

    उसकी मुस्कान…

     

    उसकी बातें…

     

    उसका हाथ पकड़कर कहना “मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    और अब…

     

    उसके पिता की मौत का संबंध उसी परिवार से था।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने खुद से पूछा “क्या मैं आरव से प्यार करने लगी हूं?”

     

    और इस सवाल का जवाब…

     

    उसके दिल ने बिना किसी झिझक के दे दिया।

     

    “हां।”

     

    लेकिन अब एक नई मुश्किल सामने थी।

     

    जिस इंसान से उसका दिल प्यार करने लगा था… शायद उसी के परिवार ने उसके पिता को उससे छीन लिया था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 3 — वो लड़की कुछ अलग थी

     

    रात काफी गहरा चुकी थी।

     

    शहर की सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी, लेकिन आरव के कमरे की बालकनी में अभी भी रोशनी जल रही थी।

     

    वह रेलिंग के सहारे खड़ा था।

     

    हाथ में मोबाइल था और स्क्रीन पर वही अनजान नंबर मौजूद था, जिससे कुछ देर पहले उसे धमकी भरी कॉल आई थी।

     

    “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के दिमाग में बार-बार वही आवाज गूंज रही थी।

     

    उसने नंबर पर दोबारा कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    आरव ने जबड़े भींच लिए।

     

    “आखिर कौन हो तुम?”

     

    उसने खुद से कहा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई।

     

    “किससे बात कर रहा है?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “कोई नहीं।”

     

    कबीर उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “आरव, मैं तुझे बचपन से जानता हूं। जब तू परेशान होता है ना, तो ‘कोई नहीं’ बोलता है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    कबीर ने उसके हाथ से मोबाइल लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने सारी बात बता दी।

     

    कबीर का चेहरा भी गंभीर हो गया।

     

    “आरोही को जानता है वो?”

     

    “उसने उसका नाम लिया था।”

     

    “फिर मामला साधारण नहीं है।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    “आरोही के बारे में कुछ पता किया?”

     

    “नहीं।”

     

    “करना चाहिए।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उसने कुछ छुपाया है तो शायद उसकी कोई वजह होगी।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तुझे उसकी इतनी चिंता कब से होने लगी?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई… तू फंस चुका है।”

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “बकवास बंद कर।”

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर हंसते हुए बोला,

     

    “लेकिन एक बात याद रखना—जिस लड़की के आने से तेरे चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान आई है, उसे खोने की गलती मत करना।”

     

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मैं उसे खोना नहीं चाहता।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव खुद अपनी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने पहली बार किसी के लिए ये शब्द कहे थे।

     

    मैं उसे खोना नहीं चाहता।

     

    अगली सुबह।

     

    आरोही ऑफिस पहुंची तो नैना पहले से उसका इंतजार कर रही थी।

     

    जैसे ही आरोही अपनी सीट पर बैठी, नैना उसके पास आ गई।

     

    “तो?”

     

    आरोही ने लैपटॉप खोला।

     

    “तो क्या?”

     

    “कल क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झील गई थी?”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां।”

     

    “आरव मिला?”

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “कॉफी पी।”

     

    नैना की आंखें चमक उठीं।

     

    “अकेले?”

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “और कुछ नहीं।”

     

    नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारी आवाज बता रही है कि कुछ तो है।”

     

    “हम दोस्त बन गए।”

     

    “बस?”

     

    “बस।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    नैना ने लंबी सांस ली।

     

    “चलो, कम से कम शुरुआत तो हुई।”

     

    आरोही ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “किसकी शुरुआत?”

     

    “दोस्ती की।”

     

    नैना ने आंख मारी।

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसी समय उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उसने मैसेज दोबारा पढ़ा।

     

    नैना ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन लॉक कर दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “किसका मैसेज था?”

     

    “कोई गलत नंबर होगा।”

     

    नैना ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल शुरू हो चुकी थी।

     

    उसे पहली बार डर लगा।

     

    कौन था ये इंसान?

     

    और उसे आरव के बारे में कैसे पता था?

     

    दोपहर के समय आरव की कंपनी में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी।

     

    कांच की बड़ी टेबल के आसपास कई लोग बैठे थे।

     

    आरव अपनी फाइल देख रहा था।

     

    लेकिन उसका ध्यान काम पर नहीं था।

     

    उसके सामने लैपटॉप पर एक ही सवाल घूम रहा था “आरोही को भी धमकी मिली होगी?”

     

    मीटिंग खत्म होते ही उसने अपना फोन उठाया और आरोही को कॉल किया।

     

    फोन बजता रहा।

     

    आरोही ने फोन नहीं उठाया।

     

    आरव ने दोबारा कॉल किया।

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    उसने मैसेज किया “सब ठीक है?”

     

    कुछ देर बाद जवाब आया “हां।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा “पक्का?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया “हां, पक्का।”

     

    आरव ने फोन नीचे रख दिया।

     

    लेकिन उसका मन नहीं माना।

     

    उसे लग रहा था कि आरोही कुछ छुपा रही है।

     

    शाम को ऑफिस से निकलते समय आरोही पार्किंग में अपनी कार के पास पहुंची।

     

    उसने कार खोली।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आरोही।”

     

    वह तुरंत पलटी।

     

    एक अनजान आदमी कुछ दूरी पर खड़ा था।

     

    काले कपड़े, काली टोपी और चेहरे पर मास्क।

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    वह आदमी कुछ कदम आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें मैसेज मिला था।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “आपने किया था?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस इतना समझ लो कि आरव तुम्हारे लिए सही नहीं है।”

     

    आरोही ने हिम्मत जुटाकर पूछा,

     

    “आप आरव को कैसे जानते हैं?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “आरव को मैं जितना जानता हूं… उतना शायद तुम कभी नहीं जान पाओगी।”

     

    आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    “आप कहना क्या चाहते हैं?”

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    “नहीं।”

     

    आदमी चौंका।

     

    आरोही ने पहली बार दृढ़ आवाज में कहा,

     

    “वो मेरा दोस्त है।”

     

    “दोस्त?”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “तुम्हें पता भी है वो कौन है?”

     

    “हां।”

     

    “नहीं। तुम कुछ नहीं जानती।”

     

    वह मुड़ा और वहां से जाने लगा।

     

    आरोही ने पीछे से पूछा,

     

    “रुकिए!”

     

    लेकिन वह बिना रुके आगे बढ़ता गया।

     

    कुछ ही सेकंड में वह पार्किंग से बाहर निकल गया।

     

    आरोही वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    इस बार आरव ने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया।

     

    “हैलो?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “आरव…”

     

    आरव तुरंत गंभीर हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे… अभी किसी ने धमकी दी।”

     

    कुछ सेकंड तक आरव बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसकी आवाज आई,

     

    “तुम वहीं हो?”

     

    “हां।”

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। कार में बैठो और तुरंत घर जाओ।”

     

    “लेकिन—”

     

    “आरोही!”

     

    उसकी आवाज में इतनी चिंता थी कि आरोही चुप हो गई।

     

    “हां।”

     

    “घर पहुंचकर मुझे कॉल करना।”

     

    “ठीक है।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरोही घर पहुंची।

     

    उसने जैसे ही कमरे का दरवाजा बंद किया, फोन पर आरव का कॉल आ गया।

     

    “पहुंच गई?”

     

    “हां।”

     

    “अकेली हो?”

     

    “मां घर पर हैं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “ठीक है।”

     

    आरोही कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “वो आदमी तुम्हारे बारे में कुछ कह रहा था।”

     

    आरव की आंखें बंद हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा कि तुम वो नहीं हो जो मैं समझ रही हूं।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    “सच क्या है?”

     

    लंबी खामोशी।

     

    आरोही की आवाज थोड़ी कांप गई।

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “क्या तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर सामने देखा।

     

    वह जानता था कि एक दिन ये सवाल उससे जरूर पूछा जाएगा।

     

    लेकिन इतनी जल्दी?

     

    “हां।”

     

    आरोही का दिल बैठ गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने तुमसे कुछ बातें नहीं बताईं।”

     

    “कौन सी?”

     

    “मेरी जिंदगी के बारे में।”

     

    आरोही चुप रही।

     

    आरव ने आगे कहा,

     

    “लेकिन मैं तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहता।”

     

    “तो सच बताओ।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मैं सिर्फ एक साधारण बिजनेसमैन नहीं हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “मेरी कंपनी के अलावा… मेरे परिवार का एक बहुत पुराना दुश्मन है।”

     

    “कौन?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हें नहीं पता?”

     

    “नहीं।”

     

    “और वो मुझे क्यों धमका रहा है?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

     

    “क्योंकि शायद उसे लगता है कि तुम मेरे लिए खास हो।”

     

    आरोही का दिल एक पल को रुक-सा गया।

     

    “मैं… खास?”

     

    आरव ने महसूस किया कि उसके मुंह से क्या निकल गया था।

     

    वह तुरंत बोला,

     

    “मेरा मतलब… दोस्त के तौर पर।”

     

    आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “सिर्फ दोस्त?”

     

    आरव चुप।

     

    आरोही ने पहली बार उसे छेड़ा,

     

    “बोलिए।”

     

    “हां… फिलहाल।”

     

    “फिलहाल?”

     

    “हां।”

     

    आरोही की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव का चेहरा नरम पड़ गया।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन”

     

    “जब तक मैं हूं, तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “इतना भरोसा है खुद पर?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खुद पर नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “तुम पर।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उस रात पहली बार उसे लगा…

     

    कि शायद आरव सिर्फ उसका दोस्त नहीं रहा था।

     

    शायद उसके दिल में उसके लिए कुछ और बनने लगा था।

     

    अगली सुबह आरव अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके टेबल पर एक लिफाफा पड़ा मिला।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक फोटो थी।

     

    फोटो देखकर आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    वो उसकी और आरोही की थी।

     

    कल शाम की।

     

    जब दोनों कैफे में बैठे थे।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    उसी समय उसका फोन बजा।

     

    कबीर का फोन था।

     

    “आरव, तुरंत मेरे ऑफिस वाले कमरे में आ।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर की आवाज गंभीर थी।

     

    “मुझे आरोही के बारे में कुछ पता चला है।”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने धीमे से कहा “उसका पूरा नाम आरोही शर्मा नहीं है।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    कबीर बोला,

     

    “उसके बारे में जो जानकारी हमें मिली है… उसके मुताबिक उसकी असली पहचान कुछ और है।”

     

    आरव ने फोटो को फिर से देखा।

     

    उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।

     

    एक तरफ आरोही थी…

     

    दूसरी तरफ उसका रहस्यमयी अतीत।

     

    और अब पहली बार आरव को एहसास हुआ जिस लड़की को वह एक मासूम, शांत और उदास लड़की समझ रहा था… शायद उसकी कहानी भी उतनी ही रहस्यमयी थी जितनी उसकी अपनी।

     

    लेकिन इस राज की सबसे बड़ी कीमत…

     

    शायद दोनों को अपने प्यार से चुकानी थी।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    एपिसोड 2 — अजनबी से दोस्ती तक

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से होते हुए कमरे में दाखिल हो रही थी।

     

    आरोही अभी तक अपने बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी को देख रही थी।

     

    रात में उसने जो कुछ लिखा था, वो बार-बार उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।

     

    “आज एक अजनबी मिला। नाम आरव।”

     

    आरोही ने डायरी बंद की और खुद से बोली,

     

    “पता नहीं मैं भी ना… किसी अजनबी के बारे में इतनी क्यों सोच रही हूं?”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “आरोही, उठ गई बेटा?”

     

    मां की आवाज सुनकर आरोही ने जल्दी से डायरी तकिए के नीचे रख दी।

     

    “हां मां, उठ गई।”

     

    दरवाजा खुला और उसकी मां कमरे में आ गईं।

     

    “आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?”

     

    “जाना है मां।”

     

    “तो फिर इतनी देर से यहां बैठी क्या कर रही हो?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    मां ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “कुछ नहीं?”

     

    “हां।”

     

    “चेहरा तो कुछ और ही बता रहा है।”

     

    आरोही का दिल एक पल के लिए धड़क उठा।

     

    “मां… आप भी ना!”

     

    मां मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा चल, जल्दी तैयार हो जा। नाश्ता लगा दिया है।”

     

    मां के जाते ही आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    उसने फिर तकिए के नीचे से डायरी निकाली।

     

    कुछ सेकंड उसे देखा और फिर बैग में रख लिया।

     

    पता नहीं क्यों…

     

    आज उसे लग रहा था कि शायद वो झील के किनारे फिर जाएगी।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया “नहीं! मैं सिर्फ कल की वजह से वहां नहीं जाने वाली।”

     

    उधर दूसरी तरफ…

     

    आरव अपने कमरे की बालकनी में खड़ा कॉफी पी रहा था।

     

    उसके हाथ में मोबाइल था।

     

    स्क्रीन पर उसके दोस्त कबीर का नाम चमक रहा था।

     

    कबीर ने वीडियो कॉल किया।

     

    आरव ने कॉल उठाते ही कहा,

     

    “बोल।”

     

    दूसरी तरफ से कबीर की आवाज आई,

     

    “भाई, आज ऑफिस आ रहा है या फिर अपनी नई मोहब्बत के साथ झील किनारे बैठने का प्लान है?”

     

    आरव ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “कौन सी मोहब्बत?”

     

    कबीर जोर से हंसा।

     

    “कल जिस लड़की से तू मिला था।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “वो मोहब्बत नहीं है।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उसका नाम याद है?”

     

    आरव चुप।

     

    कबीर ने तुरंत कहा,

     

    “समझ गया।”

     

    “क्या समझ गया?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “बोल।”

     

    “तुझे लड़की पसंद आ गई।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    “तो उसका नाम बता।”

     

    आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “आरोही।”

     

    कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “भाई, तू गया।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “पागल है क्या?”

     

    “नहीं। लेकिन तेरे चेहरे पर जो मुस्कान आई है, वो मैंने पिछले कई महीनों से नहीं देखी।”

     

    आरव की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।

     

    कबीर ने भी उसकी खामोशी महसूस कर ली।

     

    “आरव…”

     

    “हम्म।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरव ने सामने आसमान की तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर समझ गया।

     

    वो जानता था कि आरव के अतीत में कुछ ऐसा था जिसके बारे में आरव बात नहीं करना चाहता था।

     

    इसलिए उसने बात बदल दी।

     

    “चल, ऑफिस निकल। आज मीटिंग है।”

     

    “हां।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव ने मोबाइल टेबल पर रखा।

     

    फिर कुछ देर बाद खुद से बोला “आरोही…”

     

    और उसके चेहरे पर फिर वही हल्की मुस्कान लौट आई।

     

     

    दोपहर के करीब आरोही ऑफिस पहुंची।

     

    लेकिन आज उसका मन काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

     

    कंप्यूटर स्क्रीन पर फाइल खुली थी।

     

    लेकिन उसकी नजर बार-बार स्क्रीन से हटकर खिड़की के बाहर चली जाती।

     

    उसकी दोस्त नैना काफी देर से उसे देख रही थी।

     

    आखिर उसने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने चौंककर कहा,

     

    “क्या?”

     

    “तू सुबह से मुस्कुरा रही है।”

     

    “मैं?”

     

    “हां, तू।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना चेहरा सामान्य किया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    नैना उसकी कुर्सी के पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “कुछ तो हुआ है।”

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    “कल शाम कहां गई थी?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    नैना ने आंखें छोटी करते हुए पूछा,

     

    “झील के पास?”

     

    आरोही ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “वहां कोई मिला?”

     

    आरोही ने फाइल उठाकर पढ़ने का नाटक किया।

     

    “नहीं।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “झूठ बोलते समय तू बहुत खराब एक्टिंग करती है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है, एक लड़का मिला था।”

     

    “ओहो!”

     

    नैना की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास बैठे लोग उनकी तरफ देखने लगे।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “धीरे बोल!”

     

    नैना कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गई।

     

    “नाम?”

     

    “आरव।”

     

    “क्या करता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “कहां रहता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “नंबर?”

     

    आरोही चुप।

     

    नैना ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    “मतलब तुझे उसका सिर्फ नाम पता है?”

     

    “हां।”

     

    “और तू उसके बारे में सोच रही है?”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “मैं उसके बारे में नहीं सोच रही।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “अच्छा।”

     

    “सच में।”

     

    “ठीक है। नहीं सोच रही।”

     

    कुछ पल बाद नैना ने पूछा,

     

    “फिर आज झील के पास जाने का प्लान किसका है?”

     

    आरोही ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा मैं जा रही हूं?”

     

    “तेरी आंखों ने।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    शाम हुई।

     

    ऑफिस से निकलते समय आरोही काफी देर तक अपनी कार के पास खड़ी रही।

     

    उसने कार का दरवाजा खोला।

     

    फिर बंद कर दिया।

     

    उसने खुद से कहा,

     

    “घर जाना है।”

     

    कुछ सेकंड बाद उसने मोबाइल निकाला।

     

    समय देखा।

     

    फिर झील की तरफ जाने वाली सड़क को देखा।

     

    “बस पांच मिनट।”

     

    उसने खुद को समझाया।

     

    “मैं सिर्फ झील देखने जा रही हूं।”

     

    और फिर कार उसी रास्ते पर चल पड़ी।

     

    उधर आरव भी उसी झील के पास पहुंच चुका था।

     

    वह खुद से भी यही कह रहा था कि वह वहां सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि उसे शाम का मौसम पसंद है।

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    वह किसी का इंतजार कर रहा था।

     

    वह लड़की…

     

    जिसका नाम कल ही जाना था।

     

    आरोही।

     

    आरव जेट्टी के पास खड़ा झील को देख रहा था।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आप यहां क्या कर रहे हैं?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    आरोही सामने खड़ी थी।

     

    सफेद कुर्ती और हल्के नीले रंग की चुन्नी हवा में लहरा रही थी।

     

    आरव के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

     

    “मुझे लगा था आप नहीं आएंगी।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “आप मेरा इंतजार कर रहे थे?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “मैं झील का इंतजार कर रहा था।”

     

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

     

    “बहुत मजाक करते हैं आप।”

     

    “आप आई हैं, तो मजाक तो बनता है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “आप रोज यहां आते हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आज क्यों?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “शायद किस्मत ने बुलाया।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “आप हर बात में किस्मत को क्यों ले आते हैं?”

     

    “क्योंकि कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।”

     

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “कॉफी?”

     

    आरोही ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कॉफी पीएंगी?”

     

    “आप हर लड़की को ऐसे कॉफी के लिए बुलाते हैं?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बाकी लड़कियों जैसी नहीं हैं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये लाइन आपने कल भी मारी थी।”

     

    “काम कर गई थी।”

     

    “किसने कहा?”

     

    “आप आज फिर यहां आई हैं।”

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    दोनों झील के पास बने छोटे-से कैफे की तरफ चल पड़े।

     

    कैफे बहुत छोटा था।

     

    लकड़ी की मेजें थीं और खिड़की से झील का खूबसूरत नजारा दिखाई देता था।

     

    दोनों सामने-सामने बैठे।

     

    वेटर ने पूछा,

     

    “मैडम, क्या लेंगी?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कॉफी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे लिए भी।”

     

    वेटर चला गया।

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “आप क्या करती हैं?”

     

    “एक कंपनी में काम करती हूं।”

     

    “मतलब?”

     

    “मार्केटिंग।”

     

    “अच्छा।”

     

    “और आप?”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुराया।

     

    “मैं भी काम करता हूं।”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “ये कौन सा जवाब है?”

     

    “सही जवाब है।”

     

    “किस तरह का काम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “बिजनेस।”

     

    “किस चीज का?”

     

    “कई चीजों का।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “आप बहुत रहस्यमयी हैं।”

     

    “और आप बहुत सवाल करती हैं।”

     

    “क्योंकि मैं अजनबियों पर भरोसा नहीं करती।”

     

    आरव गंभीर हो गया।

     

    “मत कीजिए।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मुझ पर भी भरोसा मत कीजिए।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला,

     

    “क्योंकि भरोसा बहुत खूबसूरत चीज है… लेकिन टूट जाए तो इंसान अंदर से बदल जाता है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में कुछ देखा।

     

    शायद दर्द।

     

    उसने धीरे से पूछा,

     

    “आपका भरोसा टूटा है?”

     

    आरव ने नजरें झुका लीं।

     

    “कभी।”

     

    आरोही ने आगे सवाल नहीं किया।

     

    वेटर कॉफी रख गया।

     

    दोनों चुपचाप कॉफी पीने लगे।

     

    कुछ देर बाद आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “अगर कभी मन हो तो बता सकते हैं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “जिसने आपका भरोसा तोड़ा… उसके बारे में।”

     

    आरव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,

     

    “शायद किसी दिन।”

     

    आरोही ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    उस शाम दोनों ने बहुत सारी बातें कीं।

     

    पसंद-नापसंद से लेकर बचपन की यादों तक।

     

    आरव को पता चला कि आरोही को बारिश बहुत पसंद थी।

     

    आरोही को पता चला कि आरव को पहाड़ पसंद थे।

     

    आरोही को किताबें पढ़ना अच्छा लगता था।

     

    आरव को रात में लंबी ड्राइव करना।

     

    दोनों की पसंद अलग थी।

     

    फिर भी बातचीत खत्म नहीं हो रही थी।

     

    जब कैफे बंद होने का समय हुआ, तो आरोही उठ खड़ी हुई।

     

    “मुझे जाना चाहिए।”

     

    आरव भी खड़ा हो गया।

     

    “कल मिलें?”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    “शायद?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आपको ‘शायद’ बहुत पसंद है ना?”

     

    “हां।”

     

    “तो जवाब भी वही है।”

     

    “मतलब?”

     

    “शायद।”

     

    आरोही वहां से जाने लगी।

     

    आरव ने आवाज दी,

     

    “आरोही!”

     

    वह पलटी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर मुस्कुराकर बोली,

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरव ने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच कुछ नहीं था।

     

    न कोई प्यार।

     

    न कोई रिश्ता।

     

    सिर्फ एक नई दोस्ती की शुरुआत।

     

    लेकिन दोनों में से कोई नहीं जानता था…

     

    कि यही दोस्ती धीरे-धीरे उनके दिलों की सबसे खूबसूरत जरूरत बनने वाली थी।

     

    आरोही ने हाथ पीछे खींच लिया।

     

    “अब चलती हूं।”

     

    “ठीक है।”

     

    वह कार की तरफ चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

     

    कार दूर निकल गई।

     

    आरव ने अपनी हथेली की तरफ देखा।

     

    जहां कुछ पल पहले आरोही का हाथ था।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “सिर्फ दोस्ती…”

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “देखते हैं, मैडम… ये दोस्ती कितनी दूर तक जाती है।”

     

    कार चलाते हुए आरोही के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उसने रेडियो बंद कर दिया।

     

    आज उसे किसी गाने की जरूरत नहीं थी।

     

    उसके दिमाग में बस आरव की बातें घूम रही थीं।

     

    उसकी मुस्कान…

     

    उसकी आंखों में छिपा दर्द…

     

    और जाते समय उसका वो सवाल “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हां आरव… दोस्ती।”

     

    लेकिन दिल ने चुपके से एक और शब्द जोड़ दिया “शायद…”

     

    उसी वक्त आरव के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    उसने कार किनारे लगाई और कॉल उठाया।

     

    “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक भारी आवाज आई “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “कौन?”

     

    “आरोही।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    सामने से सिर्फ इतना कहा गया “अगर तुमने उससे दोस्ती जारी रखी… तो इस बार नुकसान सिर्फ तुम्हारा नहीं होगा।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव कुछ सेकंड मोबाइल को देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर उस सड़क पर चली गई जिस तरफ आरोही की कार गई थी।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसे नहीं पता था कि आरोही के अतीत में क्या छिपा था।

     

    और उसे ये भी नहीं पता था…

     

    कि उनकी नई-नई शुरू हुई दोस्ती के रास्ते में कोई ऐसा इंसान खड़ा था…

     

    जो दोनों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1 — पहली मुलाकात

    शाम का वक्त था।

    सूरज धीरे-धीरे झील के उस पार डूब रहा था। आसमान पर नारंगी और गुलाबी रंग ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे किसी चित्रकार ने अपनी पूरी जिंदगी की खूबसूरत यादें एक ही कैनवास पर उतार दी हों।

     

    झील का पानी बिल्कुल शांत था।

    हल्की-सी ठंडी हवा चल रही थी और हवा के साथ पेड़ों से टूटकर कुछ पीले पत्ते उड़ते हुए पानी की सतह पर आकर ठहर जाते।

     

    झील के किनारे बनी लकड़ी की छोटी-सी जेट्टी पर एक लड़की अकेली खड़ी थी।

     

    उसका नाम था आरोही।

    सफेद रंग की लंबी ड्रेस हवा में लहरा रही थी। उसके खुले बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे और वह उन्हें कान के पीछे करते हुए सामने डूबते सूरज को देख रही थी।

    उसकी आंखों में एक अजीब-सी उदासी थी।

    ऐसी उदासी जिसे देखकर कोई भी समझ सकता था कि लड़की मुस्कुराना जानती जरूर है, लेकिन पिछले कुछ समय से उसने दिल से मुस्कुराना भूल दिया है।

    आरोही ने अपनी आंखें बंद कीं।

    “काश… जिंदगी भी इस झील की तरह शांत होती।”

    उसने धीरे से कहा।

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई।

    “अगर जिंदगी झील जैसी शांत हो गई ना, तो शायद जिंदगी कहलाएगी ही नहीं।”

    आरोही ने चौंककर पीछे देखा।

    कुछ दूरी पर एक लड़का खड़ा था।

    सफेद शर्ट की आस्तीनें उसकी कोहनियों तक मुड़ी हुई थीं। काले बाल हवा में हल्के-से बिखरे हुए थे। चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी और आंखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास।

    उसका नाम था आरव।

    आरोही ने उसे कुछ पल देखा, फिर भौंहें सिकोड़ लीं।

    “आप मेरी बातें सुन रहे थे?”

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    “मैंने आपकी बातें सुनी ही नहीं।”

    आरोही ने हैरानी से उसे देखा।

    “अभी आपने जो कहा…”

    “वो मैंने नहीं कहा था।”

    आरोही कुछ समझ नहीं पाई।

    आरव हंस पड़ा।

    “आपने कहा था जिंदगी झील जैसी शांत होनी चाहिए। मैंने बस उसके जवाब में अपनी राय दी।”

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

    “आप हर अजनबी को ऐसे जवाब देते हैं?”

    “नहीं।”

    “तो मुझे क्यों?”

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

    फिर उसने बहुत सहजता से कहा,

    “शायद इसलिए क्योंकि आप बाकी अजनबियों जैसी नहीं लगीं।”

    आरोही कुछ बोल नहीं पाई।

    उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    “अजीब इंसान हैं आप।”

    “धन्यवाद।”

    “मैंने तारीफ नहीं की।”

    “मुझे पता है।”

    आरव की मुस्कान और गहरी हो गई।

    आरोही चाहकर भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाई।

    लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।

    “आपको हर बात में मजाक सूझता है?”

    “और आपको हर बात में नाराजगी।”

    “मैं नाराज नहीं हूं।”

    “तो मुस्कुरा क्यों नहीं रही?”

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

    “क्योंकि हर वक्त मुस्कुराना जरूरी नहीं होता।”

    आरव की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

    उसने पहली बार आरोही की आंखों को ध्यान से देखा।

    वहां सचमुच कोई गहरी तकलीफ थी।

    “सही कहा।”

    आरव ने धीमी आवाज में कहा।

    “हर इंसान जो मुस्कुराता है, जरूरी नहीं कि वो खुश भी हो।”

    आरोही ने उसे देखा।

    इस बार उसकी आंखों में नाराजगी नहीं थी।

    बस एक सवाल था।

    “आपको कैसे पता?”

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

    फिर झील की तरफ देखते हुए बोला,

    “क्योंकि मैं भी हमेशा खुश नहीं रहता।”

    आरोही पहली बार चुप हो गई।

    दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

    अजीब बात थी।

    दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।

    फिर भी उस खामोशी में एक अजीब-सी सहजता थी।

    जैसे दोनों के बीच कोई पुराना रिश्ता हो।

    जैसे दोनों की खामोशियां एक-दूसरे की भाषा समझती हों।

    तभी अचानक तेज हवा चली।

    आरोही के हाथ में पकड़ी डायरी नीचे गिर गई।

    “ओह!”

    वह डायरी उठाने के लिए झुकी ही थी कि हवा के झोंके से उसके कुछ पन्ने उड़ गए।

    “मेरी डायरी!”

    आरोही घबराकर पन्नों के पीछे भागी।

    आरव भी तुरंत उसकी मदद करने लगा।

    एक पन्ना उड़ते-उड़ते झील के किनारे बने पेड़ की शाखा में अटक गया।

    आरव ने उसे निकाल लिया।

    लेकिन जैसे ही उसने पन्ने को देखा, उसकी नजर उस पर लिखी कुछ पंक्तियों पर पड़ी।

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में देर से आते हैं, लेकिन आते ही हमारी पूरी जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरव ने पन्ना आरोही की तरफ बढ़ाते हुए कहा,

    “शायद ये पन्ना सच कहता है।”

    आरोही ने पन्ना उसके हाथ से लिया।

    “क्या?”

    “कुछ लोग देर से आते हैं…”

    आरव मुस्कुराया।

    “लेकिन जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “आपको हर चीज में डायलॉग क्यों दिखता है?”

    “क्योंकि जिंदगी खुद एक कहानी है।”

    “और आप?”

    आरव ने कुछ पल सोचा।

    “शायद अभी तक अपनी कहानी का हीरो बनने की कोशिश कर रहा हूं।”

    आरोही हंस पड़ी।

    “बहुत घमंड है आपको।”

    “और आपको?”

    “मुझे क्या?”

    “आप अपनी कहानी की हीरोइन हैं?”

    आरोही कुछ बोलती, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

    उसने स्क्रीन पर नजर डाली।

    उसके चेहरे की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

    “मां का फोन है।”

    उसने फोन उठाया।

    “हां मां… मैं बस थोड़ी देर में घर आ रही हूं।”

    कुछ देर सुनने के बाद उसने कहा,

    “नहीं मां, मैं ठीक हूं।”

    फिर फोन काट दिया।

    आरव ने पूछा,

    “सब ठीक है?”

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “हां।”

    “पक्का?”

    “आपको हर बात पर शक होता है?”

    “नहीं। बस आपकी आंखें आपकी बातों पर भरोसा नहीं करतीं।”

    आरोही उसकी तरफ देखती रह गई।

    कोई पहली बार उससे इतनी आसानी से उसके दिल की बात कैसे समझ सकता था?

    उसने धीरे से कहा,

    “आप अजीब हैं।”

    आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

    “और आप खूबसूरत हैं।”

    आरोही के चेहरे पर अचानक शर्म उतर आई।

    “क्या?”

    आरव ने तुरंत बात संभाल ली।

    “मेरा मतलब… आपकी डायरी की लिखावट खूबसूरत है।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “झूठ बोल रहे हैं।”

    “थोड़ा।”

    दोनों हंस पड़े।

    शाम अब रात में बदलने लगी थी।

    आरोही ने अपनी डायरी बैग में रखी।

    “मुझे जाना चाहिए।”

    “ठीक है।”

    वह कुछ कदम आगे बढ़ी।

    फिर अचानक रुक गई।

    पीछे मुड़कर आरव को देखा।

    आरव अभी भी वहीं खड़ा था।

    आरोही ने पूछा,

    “आपका नाम क्या है?”

    आरव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “आपने आखिर पूछ ही लिया।”

    “बस नाम पूछा है।”

    “आरव।”

    “आरोही।”

    आरव ने उसका नाम दोहराया।

    “आरोही…”

    पता नहीं क्यों, अपने ही नाम को उसकी आवाज में सुनकर आरोही के दिल की धड़कन कुछ तेज हो गई।

    उसने नजरें झुका लीं।

    “ठीक है… चलती हूं।”

    “फिर मिलेंगे?”

    आरोही ने बिना पीछे देखे कहा,

    “शायद।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मैं इस ‘शायद’ को ‘हां’ मान लेता हूं।”

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

    “इतना भरोसा?”

    “आप पर नहीं।”

    “तो?”

    आरव ने झील की तरफ देखते हुए कहा,

    “किस्मत पर।”

    आरोही बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

    आरव उसे जाते हुए देखता रहा।

    कुछ ही देर में वह रास्ते के मोड़ के पीछे गायब हो गई।

    लेकिन उसके जाने के बाद भी आरव की नजर उसी रास्ते पर टिकी रही।

    उसने खुद से कहा,

    “अजीब लड़की है।”

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

    “लेकिन अच्छी है।”

    उधर घर जाते हुए आरोही बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।

    वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि वह ऐसा क्यों कर रही है।

    आज से पहले उसने किसी अजनबी से इतनी बातें नहीं की थीं।

    और सबसे अजीब बात…

    उसे उस अजनबी की बातें बुरी भी नहीं लगी थीं।

    उसने चलते-चलते अपनी डायरी निकाली।

    एक खाली पन्ना खोला।

    कुछ पल तक कलम उसके हाथ में रुकी रही।

    फिर उसने लिखा—

    “आज एक अजनबी मिला।

    नाम—आरव।

    पता नहीं क्यों, उसकी बातें दिल में उतर गईं।

    शायद वो सिर्फ एक अजनबी था…

    या शायद मेरी कहानी का कोई नया किरदार।”

    आरोही ने डायरी बंद कर दी।

    लेकिन उसे नहीं पता था…

    कि आज की ये छोटी-सी मुलाकात आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली थी।

    क्योंकि कुछ मुलाकातें सिर्फ मुलाकातें नहीं होतीं।

    वो किस्मत का पहला पन्ना होती हैं।

    और आरोही की जिंदगी में…

    आरव उस पन्ने पर लिखा पहला नाम था।

    जारी रहेगा…. 

  • इकलौता वारिस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अगस्त्या—इकलौता वारिस

     

    अगस्त्या कपूर नाम ही काफी था। देश की सबसे बड़ी कंपनियों में गिनी जाने वाली कपूर एंड संस का इकलौता वारिस था वह। करोड़ों की संपत्ति, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियां और हर कदम पर लोगों की भीड़—उसकी जिंदगी में ऐसी कोई चीज नहीं थी जो वह खरीद नहीं सकता था।

     

    लेकिन एक चीज थी जिसे वह बिल्कुल नहीं चाहता था—शादी।

     

    अगस्त्या की उम्र तीस साल थी। देखने में शांत, गंभीर और हमेशा अपने काम में डूबा रहने वाला लड़का। सुबह से रात तक कंपनी के काम में लगा रहता। मीटिंग, बिजनेस डील और विदेशों के दौरे उसकी जिंदगी का हिस्सा थे।

     

    उसके पिता, राजीव कपूर, कई बार उससे कह चुके थे—

     

    “बेटा, अब कंपनी की जिम्मेदारियां संभालने के साथ अपनी जिंदगी के बारे में भी सोचो।”

     

    अगस्त्या बिना सिर उठाए फाइल देखता और कहता—

     

    “पापा, मेरी जिंदगी बिल्कुल ठीक चल रही है।”

     

    “लेकिन शादी?”

     

    “नहीं करनी।”

     

    राजीव कपूर हर बार चुप हो जाते।

     

    मां सुमन कपूर भी कई रिश्ते लेकर आईं।

     

    “अगस्त्या, लड़की बहुत अच्छी है। पढ़ी-लिखी है, समझदार है।”

     

    “मां, मुझे शादी नहीं करनी।”

     

    “कम से कम एक बार मिल तो लो।”

     

    “मिलने के बाद भी मेरा जवाब यही रहेगा।”

     

    सुमन परेशान होकर पति से कहतीं—

     

    “समझ नहीं आता इसे शादी से इतनी परेशानी क्यों है।”

     

    राजीव धीरे से कहते—

     

    “किसी पुराने जख्म की वजह होगी।”

     

    दरअसल अगस्त्या के मन में शादी को लेकर एक डर था।

     

    बचपन में उसने अपने माता-पिता के बीच कई बार झगड़े देखे थे। उसके पिता काम में इतने व्यस्त रहते कि मां अक्सर अकेली पड़ जातीं। घर में पैसा बहुत था, लेकिन साथ बैठकर बात करने का समय बहुत कम।

     

    अगस्त्या ने मन ही मन तय कर लिया था—

     

    अगर रिश्ते में प्यार से ज्यादा जिम्मेदारियां और उम्मीदें होती हैं, तो वह ऐसा रिश्ता कभी नहीं बनाएगा।

     

    उसका मानना था कि शादी के बाद इंसान अपनी आजादी खो देता है।

     

    एक दिन कंपनी की बड़ी मीटिंग के बाद राजीव कपूर ने उसे अपने कमरे में बुलाया।

     

    “अगस्त्या, मैं तुम पर शादी का दबाव नहीं डालना चाहता। लेकिन एक बात जरूर कहना चाहता हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “हर रिश्ता तुम्हारे बचपन जैसा नहीं होता।”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “तुमने हमारे बीच जो देखा, वह हमारी कहानी थी। जरूरी नहीं कि तुम्हारी कहानी भी वैसी ही हो।”

     

    अगस्त्या ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद कपूर एंड संस ने राजस्थान के एक छोटे शहर में नई शाखा खोलने का फैसला किया। कंपनी की एक सामाजिक परियोजना भी वहां चल रही थी, जिसके लिए अगस्त्या को खुद जाना पड़ा।

     

    वहां उसकी मुलाकात मायरा से हुई।

     

    मायरा कंपनी के प्रोजेक्ट से जुड़े एक छोटे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी।

     

    पहली मुलाकात बिल्कुल साधारण थी।

     

    अगस्त्या ने स्कूल का निरीक्षण करते हुए पूछा—

     

    “यहां बच्चों की संख्या कितनी है?”

     

    मायरा ने रजिस्टर बंद किया।

     

    “लगभग दो सौ।”

     

    “और शिक्षक?”

     

    “सिर्फ पांच।”

     

    अगस्त्या ने हैरानी से कहा—

     

    “इतने कम?”

     

    मायरा मुस्कुराई।

     

    “कम हैं, लेकिन कोशिश ज्यादा है।”

     

    अगस्त्या पहली बार उसकी बात पर मुस्कुराया।

     

    “आप हमेशा इतनी सकारात्मक रहती हैं?”

     

    “नहीं। कभी-कभी मैं भी परेशान होती हूं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर किसी बच्चे की मुस्कान देख लेती हूं।”

     

    अगस्त्या उसे कुछ पल देखता रहा।

     

    मायरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन उस दिन के बाद वह मायरा को याद करने लगा।

     

    मायरा को अगस्त्या की दौलत से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसे यह भी नहीं पता था कि वह कपूर एंड संस का वारिस है।

     

    एक दिन उसने अगस्त्या से कहा—

     

    “आप हर वक्त इतने गंभीर क्यों रहते हैं?”

     

    “काम की वजह से।”

     

    “काम के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    मायरा हंस पड़ी।

     

    “तो आप बहुत गरीब हैं।”

     

    अगस्त्या चौंका।

     

    “गरीब?”

     

    “हां। जिसके पास पैसा बहुत हो लेकिन खुश रहने का समय न हो, वह मेरे हिसाब से गरीब ही है।”

     

    उस दिन अगस्त्या काफी देर तक उसकी बात सोचता रहा।

     

    धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी।

     

    अगस्त्या को पहली बार महसूस हुआ कि किसी के साथ बैठकर बिना किसी काम के बात करना भी अच्छा लग सकता है।

     

    एक शाम मायरा ने पूछा—

     

    “आप शादी क्यों नहीं करना चाहते?”

     

    अगस्त्या कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने अपने बचपन की बातें बता दीं।

     

    मायरा ने ध्यान से सुना।

     

    उसने कोई सलाह नहीं दी।

     

    बस इतना कहा—

     

    “आपको शादी से नहीं, अपने पुराने डर से परेशानी है।”

     

    अगस्त्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “शायद।”

     

    “तो फैसला डर के आधार पर मत कीजिए।”

     

    उसके शब्द अगस्त्या के दिल में उतर गए।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती।

     

    अगस्त्या को अचानक मुंबई वापस बुला लिया गया। कंपनी में एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी।

     

    जाने से पहले वह मायरा से मिलने गया।

     

    “मुझे जाना होगा।”

     

    मायरा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तो जाइए। काम जरूरी है।”

     

    “मैं वापस आऊंगा।”

     

    मायरा ने मजाक में कहा—

     

    “क्यों? यहां कोई काम रह गया है?”

     

    अगस्त्या पहली बार खुलकर मुस्कुराया।

     

    “शायद।”

     

    वह मुंबई लौट आया।

     

    कुछ हफ्तों तक दोनों फोन पर बात करते रहे।

     

    लेकिन अगस्त्या की मां को जब उसके और मायरा के बारे में पता चला तो उन्होंने तुरंत पूछा—

     

    “क्या तुम उसे पसंद करते हो?”

     

    अगस्त्या चुप रहा।

     

    “अगस्त्या?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    सुमन के चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    लेकिन फिर अगस्त्या ने कहा—

     

    “लेकिन मैं अभी भी शादी के लिए तैयार नहीं हूं।”

     

    मां ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, शादी तभी करना जब तुम्हें लगे कि तुम तैयार हो। सिर्फ इसलिए मत करना कि हम चाहते हैं।”

     

    उसी रात अगस्त्या ने मायरा को फोन किया।

     

    “मायरा, अगर मैं तुमसे कहूं कि मैं तुम्हें पसंद करता हूं, लेकिन शादी से डरता हूं तो?”

     

    मायरा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “तो मैं तुम्हें शादी के लिए मजबूर नहीं करूंगी।”

     

    अगस्त्या ने राहत की सांस ली।

     

    “सच?”

     

    “हां। रिश्ता दो लोगों का होता है। फैसला भी दोनों का होना चाहिए।”

     

    “और अगर मुझे बहुत समय लग गया तो?”

     

    “मैं इंतजार करने का वादा नहीं कर रही।”

     

    अगस्त्या चुप हो गया।

     

    मायरा हंसकर बोली—

     

    “लेकिन अगर तुम सच में मेरे साथ रहना चाहते हो तो मुझे तुम्हारे डर से लड़ने में कोई परेशानी नहीं।”

     

    उस रात अगस्त्या ने पहली बार समझा कि शादी का मतलब अपनी आजादी खोना नहीं होता।

     

    सही इंसान के साथ शादी का मतलब शायद ऐसा साथी पाना होता है, जिसके सामने अपने डर भी रखे जा सकें।

     

    कुछ महीनों बाद अगस्त्या फिर उस छोटे शहर में गया।

     

    वह सीधे उसी स्कूल पहुंचा।

     

    मायरा बच्चों को पढ़ा रही थी।

     

    कक्षा खत्म होने के बाद अगस्त्या उसके सामने खड़ा था।

     

    मायरा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “अब किस काम से आए हैं कपूर साहब?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “एक जरूरी बात कहनी है।”

     

    “कहिए।”

     

    “मैं अभी भी शादी से थोड़ा डरता हूं।”

     

    मायरा चुप रही।

     

    अगस्त्या ने आगे कहा—

     

    “लेकिन अब मुझे तुमसे दूर रहने से ज्यादा डर लगता है।”

     

    मायरा की आंखों में मुस्कान आ गई।

     

    “तो?”

     

    अगस्त्या ने कहा—

     

    “तो मैं शादी करना चाहता हूं। लेकिन तुम्हारे साथ। और इस बार किसी डर की वजह से नहीं, अपनी इच्छा से।”

     

    मायरा ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस मुस्कुराकर बोली—

     

    “अब आप थोड़े कम गरीब लग रहे हैं।”

     

    अगस्त्या हंस पड़ा।

     

    उसने समझ लिया था कि जिंदगी सिर्फ कंपनी, पैसा और विरासत का नाम नहीं है।

     

    कपूर एंड संस का वारिस होना उसकी पहचान थी, लेकिन मायरा के साथ उसे जो अपनापन मिला, वही उसकी असली दौलत बन गया।

     

    और जिस लड़के ने कभी कहा था कि वह जिंदगी में कभी शादी नहीं करेगा, वही एक दिन अपने पिता के सामने खड़ा होकर बोला—

     

    “पापा, अब शादी की तैयारी शुरू कर दीजिए।”

     

    राजीव कपूर मुस्कुराए।

     

    “लड़की कौन है?”

     

    अगस्त्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वही, जिसने मुझे समझाया कि शादी बंधन नहीं… सही इंसान के साथ एक खूबसूरत साथ हो सकती है।”