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  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 26

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 26 : कमरा नंबर 17 का रहस्य

     

     

    नीलगिरी हवेली के बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज लगातार करीब आती जा रही थी।

     

    लेकिन आरव के कानों में इस वक्त कुछ भी नहीं पड़ रहा था।

     

    उसके हाथ में शेखर की दी हुई छोटी-सी चाबी थी।

     

    वही चाबी…

     

    जो कमरा नंबर 17 का दरवाजा खोलने वाली थी।

     

    आरव ने अपनी मुट्ठी कस ली।

     

    उसकी नजर सामने खड़ी माधवी पर थी।

     

    “मां…”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “हां बेटा…”

     

    “आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं…”

     

    वह कुछ कह पातीं, उससे पहले आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “पहले कमरा नंबर 17 देखते हैं। शायद वहां हमें सारे सवालों के जवाब मिल जाएं।”

     

    आरव ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    सभी लोग तेजी से हवेली के अंदर जाने लगे।

     

    शेखर को राघव और कबीर सहारा देकर ले जा रहे थे।

     

    उनके कंधे पर गोली लगी थी और खून अभी भी बह रहा था।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले शेखर का इलाज जरूरी है।”

     

    शेखर ने मना कर दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “आपकी हालत खराब है।”

     

    “जब तक आरव को सच नहीं मिल जाता, मैं अस्पताल नहीं जाऊंगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “पापा, आप मेरे लिए अपनी जान खतरे में मत डालिए।”

     

    शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारे लिए तो पच्चीस साल से खतरे में है।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “अब और नहीं।”

     

    शेखर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “बस एक आखिरी काम।”

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    “हां।”

     

    हवेली की दूसरी मंजिल बिल्कुल सुनसान थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जाले लगे थे।

     

    गलियारे में अंधेरा था।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    आखिर में एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—

     

    कमरा नंबर 17

     

    आरव उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    उसने जेब से चाबी निकाली।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “डर लग रहा है?”

     

    आरव ने सच कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “मुझे भी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी खोलेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो, तब भी मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”

     

    आरव की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “चलो।”

     

    उसने चाबी ताले में डाली।

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था।

     

    यहां धूल नहीं थी।

     

    सामान करीने से रखा हुआ था।

     

    बीच में एक बड़ी लकड़ी की मेज थी।

     

    उस पर कई पुरानी फाइलें रखी थीं।

     

    दीवार पर तस्वीरें लगी थीं।

     

    आरव ने पहली तस्वीर देखी।

     

    उसमें माधवी थीं।

     

    दूसरी में शेखर।

     

    तीसरी में नंदिनी और अर्जुन।

     

    लेकिन चौथी तस्वीर देखकर आरव की सांस रुक गई।

     

    उसमें…

     

    माधवी एक नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़ी थीं।

     

    आरव धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।

     

    “ये… मैं हूं?”

     

    माधवी पीछे से कमरे में आईं।

     

    उनका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    आरव ने तस्वीर उनकी तरफ बढ़ाई।

     

    “मां, ये तस्वीर कब की है?”

     

    माधवी ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम्हारे जन्म की।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन यहां तारीख गलत क्यों है?”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने तस्वीर ध्यान से देखी।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “बच्चे के हाथ में ये निशान देखो।”

     

    आरव ने तस्वीर को करीब किया।

     

    बच्चे की कलाई पर एक छोटा सा जन्मचिह्न था।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    उसकी कलाई पर भी वही निशान था।

     

    “ये मेरा है।”

     

    मेज पर एक लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के लायक हो जाए।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना खत था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया—

     

    “आरव,

     

    अगर तुम ये खत पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मेरे पास तुमसे सच छुपाने का कोई अधिकार नहीं बचा।

     

    तुम्हारे जन्म की रात जो हुआ, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था।

     

    उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।

     

    लेकिन तुम्हें बचा लिया गया।

     

    तुम्हें एक ऐसी जगह भेजा गया जहां कोई तुम्हें पहचान न सके।

     

    तुम्हारी मां माधवी ने तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा बचाया।

     

    लेकिन इस कहानी में एक और इंसान था…

     

    जिसने तुम्हारी जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव पढ़ते-पढ़ते रुक गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आगे क्या लिखा है?”

     

    आरव ने कांपती आवाज में पढ़ा—

     

    “वो इंसान तुम्हारा दुश्मन नहीं था।

     

    वो तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कौन?”

     

    आरव ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसके हाथ से खत लगभग गिर गया।

     

    “नंदिनी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

    आरोही ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे आगे आईं।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आपने मुझे बचाया था?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां बेटा।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”

     

    “किसने दिया था?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने जोर से पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज इस वक्त कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैंने।”

     

    आरोही पलटकर उसे देखने लगी।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही की आंखों में नफरत उतर आई।

     

    “आप मेरे पिता होकर भी इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं?”

     

    विराज कुछ नहीं बोला।

     

    आरव उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “तुमने मुझे क्यों मारना चाहा?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए खतरा थे।”

     

    “मैं तो बच्चा था।”

     

    “बच्चे नहीं… तुम्हारे नाम का अधिकार खतरा था।”

     

    विराज ने कमरे की एक तस्वीर उठाई।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारे जन्म के बाद क्या हुआ?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “शेखर ने अपनी पूरी विरासत तुम्हारे नाम कर दी।”

     

    “तो?”

     

    “और मैं उस विरासत का असली वारिस बनना चाहता था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसलिए आपने एक बच्चे को मारने का आदेश दे दिया?”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    नंदिनी चीख पड़ीं,

     

    “और मैंने उसी आदेश को नकार दिया!”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ी।”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “मैंने अपनी बेटी को बचाया।”

     

    “और मेरा बच्चा मुझसे छीन लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें बेटी नहीं चाहिए थी, विराज! तुम्हें सिर्फ अपनी ताकत चाहिए थी।”

     

    आरव ने मेज पर रखी दूसरी फाइल उठाई।

     

    उसके ऊपर लिखा था—

     

    “Project A-17”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    अंदर अस्पताल के दस्तावेज थे।

     

    एक पन्ने पर तीन नाम लिखे थे।

     

    बच्चा 1 — आरव

     

    बच्चा 2 — आरोही

     

    और…

     

    बच्चा 3 — अज्ञात

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तीसरा बच्चा!”

     

    रुद्र की बात सच थी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये बच्चा कौन था?”

     

    शेखर धीरे-धीरे कमरे में आए।

     

    उनके चेहरे पर दर्द था।

     

    “वही राज जिसे हमने सबसे ज्यादा छुपाया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था वो?”

     

    शेखर ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने फाइल का अगला पन्ना खोला।

     

    वहां बच्चे के पिता का नाम खाली था।

     

    लेकिन मां के नाम के सामने लिखा था—

     

    माधवी।

     

    आरव का दिल रुक गया।

     

    “मां?”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    आरव उनकी तरफ देखने लगा।

     

    “आपके… तीन बच्चे थे?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    “फिर?”

     

    “वो तीसरा बच्चा…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन था?”

     

    माधवी ने सिर उठाया।

     

    उनकी आंखों में ऐसा दर्द था, जिसे देखकर सब खामोश हो गए।

     

    “वो बच्चा…”

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारा जुड़वां भाई था।”

     

     

    कमरे में जैसे विस्फोट हो गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “मेरा… जुड़वां भाई?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “फिर वो कहां है?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “हमें लगा था वो मर गया।”

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    “लेकिन यहां लिखा है कि उसकी मौत की पुष्टि नहीं हुई।”

     

    माधवी चुप रहीं।

     

    आरोही ने फाइल अपने हाथ में ली।

     

    “यहां एक कोड है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “A-18।”

     

    शेखर का चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “ये कोड…”

     

    उन्होंने फाइल छीन ली।

     

    “ये संभव नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “A-18 का मतलब है… बच्चा जिंदा था।”

     

    आरव की सांसें तेज हो गईं।

     

    “तो मेरा भाई जिंदा था?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर कहां गया?”

     

    “उसे किसी ने अस्पताल से निकाल लिया।”

     

    “किसने?”

     

    शेखर चुप रहे।

     

    आरव ने उनका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पापा, बताइए।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “उसका नाम…”

     

    तभी अचानक कमरे की खिड़की टूट गई।

     

    धड़ाम!

     

    एक गोली फाइल के पास आकर लगी।

     

    सब नीचे झुक गए।

     

    कबीर ने खिड़की की तरफ गोली चलाई।

     

    बाहर से कोई भागता हुआ दिखाई दिया।

     

    आरव ने फाइल उठाई।

     

    लेकिन तभी किसी ने पीछे से आकर उसके हाथ पर वार किया।

     

    फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    आरोही चीख उठी—

     

    “आरव!”

     

    एक नकाबपोश आदमी फाइल उठाकर भागने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुको!”

     

    आरोही भी उसके पीछे भागी।

     

    गलियारे में नकाबपोश आदमी तेजी से सीढ़ियों की तरफ भाग रहा था।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।

     

    नकाबपोश ने आरव को धक्का दिया।

     

    आरव दीवार से टकराया।

     

    आरोही ने उसके हाथ से फाइल छीन ली।

     

    नकाबपोश ने आरोही को पकड़ लिया।

     

    “फाइल दो!”

     

    आरोही ने मना कर दिया।

     

    “नहीं!”

     

    आरव उठकर उसकी तरफ दौड़ा।

     

    नकाबपोश ने आरोही को छोड़ दिया और खिड़की से बाहर कूद गया।

     

    आरव खिड़की तक पहुंचा।

     

    लेकिन नीचे कोई नहीं था।

     

    सिर्फ…

     

    एक छोटा सा कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अपने जुड़वां भाई को ढूंढना है तो कल रात पुराने रेलवे स्टेशन आना।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था—

     

    “अमन।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “अमन…”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कागज उसे दिया।

     

    आरोही ने पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “क्या ये तुम्हारे भाई का नाम है?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

     

    “नहीं, आरव… अमन तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरव पलटा।

     

    “तो कौन है?”

     

    शेखर की आंखों में डर था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अमन… तुम्हारा जुड़वां भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    और तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अंधेरे में किसी की आवाज गूंजी—

     

    “भाई से मिलने के लिए तैयार हो जाओ, आरव…”

     

    “क्योंकि कल रात तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा राज तुम्हारे सामने खड़ा होगा।”

     

    जारी रहेगा…

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 5

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अंधेरा इतना गहरा था कि कबीर को अपने हाथ भी दिखाई नहीं दे रहे थे।

     

    उसके कानों में सिर्फ ट्रेन के पहियों की आवाज़ थी।

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    छुक…

     

    रोहित उसके पास था।

     

    मीरा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    “मीरा!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “रोहित?”

     

    कोई आवाज़ नहीं।

     

    कबीर अकेला था।

     

    फिर सामने एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

     

    एक दरवाज़ा।

     

    दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

     

    आखिरी स्टेशन।

     

    कबीर ने दरवाज़ा खोला।

     

    सामने एक प्लेटफॉर्म था।

     

    लेकिन यह देवगढ़ स्टेशन नहीं था।

     

    प्लेटफॉर्म पर हजारों पुराने टिकट पड़े थे।

     

    दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई यात्री था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    और कुछ कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    अचानक पीछे से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया।”

     

    कबीर ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    उसके साथ रघुवीर भी था।

     

    लेकिन रोहित नहीं था।

     

    “रोहित कहाँ है?”

     

    मीरा ने नीचे देखा।

     

    “वह वापस चला गया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो हम भी वापस जा सकते हैं?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कैसे?”

     

    मीरा ने सामने एक पुराना रेलवे सिग्नल दिखाया।

     

    “उसे लाल से हरा करना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “बस इतना?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “इसके लिए किसी एक को यहाँ रहना होगा।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    रघुवीर आगे आया।

     

    “इस बार मैं रहूँगा।”

     

    मीरा ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “बहुत देर कर दी आपने।”

     

    रघुवीर की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोली।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “लेकिन इस ट्रेन को खत्म कैसे करेंगे?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ट्रेन किसी इंजन से नहीं चलती।”

     

    “फिर?”

     

    “यह डर से चलती है।”

     

    कबीर समझ नहीं पाया।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “जब कोई इंसान डरकर इसकी बात मानता है, ट्रेन मजबूत होती है। जब कोई इसके सामने खड़ा होकर कहता है कि उसे डर नहीं लगता, ट्रेन कमजोर होने लगती है।”

     

    कबीर ने सामने देखा।

     

    काली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।

     

    उसकी खिड़कियों से दर्जनों चेहरे उसे देख रहे थे।

     

    फिर वही बिना चेहरे वाली आकृति ट्रेन से बाहर निकली।

     

    वह धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ी।

     

    उसकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    उसने भारी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम वापस नहीं जा सकते।”

     

    कबीर का शरीर काँपने लगा।

     

    लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुमने मेरा टिकट स्वीकार किया।”

     

    कबीर ने अपनी जेब से टिकट निकाला।

     

    उस पर अब लिखा था—

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    लेकिन नीचे एक नई लाइन दिखाई दी—

     

    “स्थिति — मृत।”

     

    कबीर ने टिकट को देखा।

     

    फिर उस आकृति की तरफ।

     

    “अगर मैं मर चुका हूँ…”

     

    उसने टिकट फाड़ दिया।

     

    “…तो मैं डर क्यों रहा हूँ?”

     

    आकृति कुछ पल के लिए स्थिर हो गई।

     

    उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    कबीर ने जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हारा यात्री नहीं हूँ!”

     

    ट्रेन हिलने लगी।

     

    सभी खिड़कियाँ काँपने लगीं।

     

    अंदर बैठे यात्रियों की चीखें सुनाई देने लगीं।

     

    आकृति पीछे हट गई।

     

    कबीर ने और जोर से कहा—

     

    “मैं तुम्हें स्वीकार नहीं करता!”

     

    ट्रेन की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “सिग्नल!”

     

    कबीर दौड़कर सिग्नल के पास पहुँचा।

     

    लेकिन सिग्नल तक पहुँचने से पहले जमीन पर दर्जनों हाथ निकल आए।

     

    उन्होंने कबीर के पैर पकड़ लिए।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    वे सभी उसे नीचे खींच रहे थे।

     

    “हमें छोड़कर मत जाओ!”

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    “हम अकेले नहीं रहना चाहते!”

     

    कबीर ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।

     

    तभी रघुवीर दौड़कर आया।

     

    उसने उन हाथों को रोक लिया।

     

    “भागो!”

     

    कबीर ने सिग्नल पकड़ लिया।

     

    वह जाम था।

     

    उसने पूरी ताकत लगाई।

     

    सिग्नल हिला।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    फिर अचानक—

     

    क्लिक!

     

    लाल बत्ती हरी हो गई।

     

    पूरे स्टेशन में एक भयानक चीख गूँज उठी।

     

    ट्रेन के पहिए अपने आप घूमने लगे।

     

    काली आकृति चीखती हुई ट्रेन की तरफ खिंचने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    उसने कबीर की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी मीरा उसके सामने आ गई।

     

    “अब यह तुम्हारा घर नहीं है।”

     

    आकृति ने मीरा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    रघुवीर बीच में आ गया।

     

    “मेरी बेटी को छोड़ दो!”

     

    एक तेज़ रोशनी चमकी।

     

    और अगले ही पल रघुवीर और वह आकृति दोनों गायब हो गए।

     

    ट्रेन भी धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    मीरा कबीर की तरफ देखने लगी।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और तुम?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरा स्टेशन आ गया है।”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

     

    लेकिन उसका हाथ हवा से गुजर गया।

     

    मीरा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “भैया… अगर कभी रात में कोई ट्रेन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए…”

     

    “हाँ?”

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    इतना कहकर मीरा भी गायब हो गई।

     

    अचानक कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं—

     

    वह देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर पड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल रहा था।

     

    रोहित उसके पास बैठा था।

     

    “कबीर!”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। लेकिन तू पूरी रात गायब था।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    सुबह के 7:30 बजे थे।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    “ट्रेन खत्म हो गई?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “कौन-सी ट्रेन?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कुछ याद नहीं?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    कबीर ने सब कुछ बताना शुरू किया।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर प्लेटफॉर्म की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक नया पोस्टर लगा था।

     

    “देवगढ़ स्टेशन पर नया प्लेटफॉर्म नंबर 4 अगले महीने शुरू होगा।”

     

    कबीर ने पोस्टर को देखा।

     

    उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—

     

    “12:15 — पहली ट्रेन।”

     

    कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “रोहित…”

     

    “क्या?”

     

    “चल यहाँ से।”

     

    दोनों स्टेशन से बाहर निकलने लगे।

     

    तभी पीछे से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर रुक गया।

     

    रोहित ने कहा—

     

    “पीछे मत देखना।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहित कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर धीरे से मुस्कुराया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    “क्योंकि मैं भी उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    रोहित ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    उसकी हथेली पर एक पुराना टिकट था।

     

    यात्री — रोहित वर्मा

     

    सीट — 13

     

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर के चेहरे से सारी उम्मीद खत्म हो गई।

     

    दूर स्टेशन की घड़ी ने 12:15 बजाए।

     

    लेकिन सुबह के 7:30 बजे।

     

    और उसी समय प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर एक ट्रेन आकर रुकी।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर से मीरा की आवाज़ आई—

     

    “भैया… इस बार अकेले मत आना।”

     

    ट्रेन की सारी खिड़कियों में एक साथ चेहरे दिखाई दिए।

     

    उनमें एक चेहरा कबीर का था।

     

    दूसरा रघुवीर का।

     

    तीसरा मीरा का।

     

    और चौथा—

     

    रोहित का।

     

    कबीर ने आखिरी बार ट्रेन की तरफ देखा।

     

    फिर अंधेरे में एक बोर्ड चमका—

     

    “आखिरी ट्रेन कभी खत्म नहीं होती।”

     

    और ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।

     

    समाप्त।

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

     

    कमरे में गूँजती आवाज़ के साथ ही कबीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।

     

    वह और रोहित किसी गहरी खाई में गिरने लगे।

     

    कबीर ने चीखते हुए रोहित का हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों नीचे गिरते रहे।

     

    फिर अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    कबीर किसी कठोर चीज़ पर आकर गिरा।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    वह एक ट्रेन के अंदर था।

     

    रोहित उसके पास पड़ा था।

     

    दोनों उठने की कोशिश करने लगे।

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    वह वही ट्रेन थी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही पीली रोशनी।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन चल रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    रोहित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “हम कहाँ हैं?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर सीट नंबर 13 पर गई।

     

    सीट खाली थी।

     

    फिर पीछे से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    वह मुड़ा।

     

    वही बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    रघुवीर सिंह।

     

    लेकिन अब उसका चेहरा बूढ़ा नहीं था।

     

    वह लगभग तीस साल का दिखाई दे रहा था।

     

    “आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “मैंने नहीं बुलाया।”

     

    “तो कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर देखा।

     

    “वह।”

     

    “कौन वह?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने कबीर को एक पुराना कागज़ दिया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    कागज़ पर रघुवीर की लिखावट थी।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    कबीर ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    फिर अचानक ट्रेन जोर से हिली।

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।

     

    उनकी आँखें बंद थीं।

     

    रघुवीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “जब तक ट्रेन रुक न जाए, किसी यात्री से बात मत करना।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वे यात्री नहीं हैं।”

     

    रोहित ने धीरे से पूछा—

     

    “तो ये लोग कौन हैं?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी का आखिरी सफर पूरा नहीं किया।”

     

    अचानक सामने बैठे एक आदमी ने आँखें खोल दीं।

     

    उसने कबीर को देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें भी देर हो गई।”

     

    रघुवीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “चुप!”

     

    आदमी ने अपना सिर झुका लिया।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद सभी यात्रियों ने अपनी आँखें खोल दीं।

     

    एक साथ।

     

    तेरहों की आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    कबीर ने गिनना शुरू किया।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    बारह…

     

    वह रुक गया।

     

    सिर्फ बारह यात्री थे।

     

    तेरहवीं सीट खाली थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “वह सीट हमेशा खाली रहती है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस दिन कोई उस पर बैठता है, ट्रेन उसे अपना बना लेती है।”

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    हर बार रोशनी वापस आती तो सीट नंबर 13 पर कोई अलग चीज़ दिखाई देती।

     

    पहली बार खाली।

     

    दूसरी बार एक लाल फ्रॉक।

     

    तीसरी बार एक छोटी बच्ची।

     

    मीरा।

     

    वह सीट पर बैठी थी।

     

    कबीर ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मीरा!”

     

    रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उससे बात मत करो!”

     

    लेकिन मीरा ने खुद कबीर की तरफ देखा।

     

    “भैया… पापा झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रघुवीर का चेहरा बदल गया।

     

    “मीरा!”

     

    बच्ची ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मुझे बंद किया था।”

     

    कबीर ने रघुवीर की तरफ देखा।

     

    “क्या यह सच है?”

     

    रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    रोहित ने गुस्से में पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रेन क्या चाहती है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “एक जीवित बच्चा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    रघुवीर ने आगे कहा—

     

    “हर साल 15 अगस्त की रात यह ट्रेन आती थी। पहले यह सिर्फ एक यात्री ले जाती थी। फिर हर साल इसकी भूख बढ़ती गई।”

     

    “तो मीरा?”

     

    “मैंने उसे ट्रेन से बचाने के लिए पुराने कमरे में छिपा दिया था।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन वह गायब कैसे हुई?”

     

    रघुवीर की आवाज़ टूट गई।

     

    “क्योंकि ट्रेन मेरे घर तक पहुँच गई।”

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “पापा ने दरवाज़ा खोला था।”

     

    रघुवीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “और फिर?”

     

    “ट्रेन ने मीरा को ले लिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर आपने क्या किया?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने ट्रेन से सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “मैंने कहा कि अगर वह मीरा को वापस कर देगी, तो मैं हर साल एक यात्री उसे दे दूँगा।”

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “आपने लोगों को मरने के लिए भेजा?”

     

    रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    यात्रियों के चेहरे धीरे-धीरे बदलने लगे।

     

    उनमें से एक आदमी ने कहा—

     

    “हममें से किसी ने टिकट नहीं खरीदा था।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हमारे नाम उसने चुने थे।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हर साल एक।”

     

    कबीर को अचानक सब समझ आने लगा।

     

    यह ट्रेन यात्रियों को नहीं चुनती थी।

     

    कोई उसे यात्री देता था।

     

    और वह व्यक्ति था—

     

    रघुवीर।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो इस बार आपने मुझे चुना?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की तरफ देखा।

     

    “इस बार उसने खुद चुना है।”

     

    अचानक ट्रेन के पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    काला धुआँ पूरे डिब्बे में फैलने लगा।

     

    मीरा सीट से उतर गई।

     

    उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, हमें भागना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “ट्रेन के इंजन तक।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वहीं उसकी मौत है।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “किसकी?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    अंधेरे में एक विशाल आकृति खड़ी थी।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    लेकिन चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो लाल आँखें।

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ट्रेन की।”

     

    रघुवीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    कबीर, रोहित और मीरा आगे की ओर दौड़े।

     

    लेकिन पीछे से यात्रियों की आवाज़ आने लगी।

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    कबीर रुका।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    बारहों यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे।

     

    वे सभी अब इंसानों जैसे नहीं दिख रहे थे।

     

    उनके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    उनमें से एक ने हाथ बढ़ाया।

     

    “हमें इस ट्रेन से बाहर निकालो…”

     

    कबीर ने मीरा की तरफ देखा।

     

    मीरा रो रही थी।

     

    “भैया… अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया तो हम भी हमेशा के लिए यहीं रह जाएँगे।”

     

    तीनों इंजन की ओर दौड़े।

     

    ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक पार करते हुए वे सबसे आगे पहुँचे।

     

    इंजन के दरवाज़े पर वही काली आँखों वाला आदमी खड़ा था।

     

    कबीर रुक गया।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।

     

    फिर उसने अपना चेहरा बदला।

     

    पहले वह बूढ़ा बना।

     

    फिर मीरा।

     

    फिर रोहित।

     

    और अंत में—

     

    कबीर।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें पता है असली कबीर कौन है?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    वह नकली कबीर हँसने लगा।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि तुम असली हो?”

     

    अचानक रोहित ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात सुन।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर हम तीनों यहाँ हैं… तो बाहर कौन है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसी क्षण ट्रेन की खिड़की से बाहर उसे प्लेटफॉर्म दिखाई दिया।

     

    वहाँ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिख रहा था।

     

    और उसके हाथ में कैमरा था।

     

    वह ट्रेन की तस्वीर ले रहा था।

     

    फिर उसने कैमरा नीचे किया और सीधे खिड़की की तरफ देखा।

     

    कबीर ने पहचान लिया।

     

    वह वही कबीर था जो उसे पहले तस्वीरों में दिखाई देता था।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    और उसके हाथ में एक टिकट था।

     

    सीट नंबर 13।

     

    मीरा ने कबीर से कहा—

     

    “भैया… वह असली है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो मैं कौन हूँ?”

     

    मीरा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आप… इस ट्रेन के अगले यात्री हो।”

     

    और तभी ट्रेन की सीटी बजी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

     

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 3

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सुबह के लगभग सात बजे कबीर देवगढ़ स्टेशन से बाहर निकला, लेकिन उसके कदम आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे।

     

    उसके हाथ में अभी भी वही तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वह खुद प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा था। उसके पीछे वही रहस्यमयी ट्रेन खड़ी थी और खिड़की के अंदर लाल कपड़े पहने एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    कबीर ने तस्वीर को कई बार देखा।

     

    फिर उसने उसे डिलीट कर दिया।

     

    लेकिन कुछ सेकंड बाद वही तस्वीर दोबारा उसकी गैलरी में दिखाई देने लगी।

     

    कबीर का दिल बैठ गया।

     

    उसने फोन बंद कर दिया।

     

    “यह सब मेरे दिमाग का वहम है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन तभी उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    समय था—

     

    12:15 PM

     

    और स्क्रीन पर एक शब्द लिखा था—

     

    “आओ।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन बंद कर दिया।

     

    वह स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आया। वहाँ एक ऑटो खड़ा था।

     

    “शहर चलोगे?” कबीर ने पूछा।

     

    ऑटो वाले ने उसकी तरफ देखा और तुरंत सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    ड्राइवर ने स्टेशन की तरफ देखा।

     

    “आप रात में प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर गए थे?”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    ड्राइवर ने डरते हुए कहा—

     

    “तो फिर मेरे ऑटो में मत बैठिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ऐसे लोग ज्यादा दूर नहीं जाते।”

     

    यह सुनकर कबीर पीछे हट गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने ऑटो स्टार्ट किया और तेज़ी से वहाँ से चला गया।

     

    कबीर सड़क किनारे अकेला खड़ा रह गया।

     

    कुछ देर बाद उसे एक बस मिली और वह शहर लौट आया।

     

    घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले रोहित को बुलाया।

     

    रोहित ने कबीर को देखते ही पूछा—

     

    “तू ठीक है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “सब कुछ शुरू से बता।”

     

    कबीर ने उसे ट्रेन, बूढ़े आदमी, बच्ची और टिकट की पूरी कहानी बताई।

     

    रोहित ध्यान से सुनता रहा।

     

    फिर उसने लैपटॉप खोला।

     

    “मैंने कल रात से उस ट्रेन के बारे में खोजबीन की है।”

     

    उसने स्क्रीन पर एक पुरानी अखबार की कटिंग दिखाई।

     

    शीर्षक था—

     

    “देवगढ़ स्टेशन से 13 यात्री रहस्यमय तरीके से लापता।”

     

    खबर की तारीख थी—

     

    16 अगस्त 2001।

     

    कबीर ने खबर पढ़नी शुरू की।

     

    15 अगस्त की रात देवगढ़ स्टेशन पर एक ट्रेन आई थी।

     

    ट्रेन का कोई नंबर नहीं था।

     

    उसमें तेरह यात्री सवार हुए थे।

     

    सुबह स्टेशन पर ट्रेन तो मिली, लेकिन उसमें कोई यात्री नहीं था।

     

    सिर्फ तेरह पुराने टिकट मिले थे।

     

    रेलवे ने इसे दुर्घटना मानकर मामला बंद कर दिया।

     

    लेकिन उसी खबर में एक और बात लिखी थी।

     

    स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह की आठ वर्षीय बेटी मीरा भी उस रात गायब हुई थी।

     

    कबीर ने तुरंत पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। वही बच्ची।”

     

    “तो वह ट्रेन में गई थी?”

     

    “शायद।”

     

    रोहित ने दूसरी फाइल खोली।

     

    उसमें एक पुरानी फोटो थी।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    कबीर की साँस अटक गई।

     

    “यही है।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “इसका नाम मीरा सिंह था।”

     

    कबीर ने फोटो को ध्यान से देखा।

     

    मीरा की आँखें बिल्कुल सामान्य थीं।

     

    लेकिन फोटो के पीछे किसी ने पेंसिल से लिखा था—

     

    “मीरा कभी ट्रेन में नहीं गई थी।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “फिर?”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “यही सबसे बड़ा रहस्य है।”

     

    उसने एक और दस्तावेज़ खोला।

     

    यह पुलिस की पुरानी रिपोर्ट थी।

     

    रिपोर्ट में लिखा था कि मीरा के गायब होने से पहले स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह ने पुलिस को बताया था कि उसे कई दिनों से एक अजीब ट्रेन दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन उस समय रेलवे अधिकारियों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

     

    रघुवीर का दावा था कि ट्रेन हमेशा 12:15 पर आती थी।

     

    और हर बार उसकी खिड़की में एक बच्ची दिखाई देती थी।

     

    वही बच्ची।

     

    मीरा।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा तो पहले से गायब हो चुकी थी?”

     

    रोहित ने सिर हिलाया।

     

    “यही तो सवाल है।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर कबीर को अपने बैग में कुछ महसूस हुआ।

     

    उसने बैग खोला।

     

    अंदर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे बाहर निकाला।

     

    टिकट पर लिखा था—

     

    देवगढ़ से — अज्ञात स्थान

     

    यात्री — मीरा

     

    सीट — 13

     

    कबीर ने टिकट देखते ही उसे फेंक दिया।

     

    लेकिन टिकट जमीन पर गिरने के बजाय सीधे मेज पर जा गिरा।

     

    और उसके ऊपर एक नया शब्द उभर आया—

     

    “मुझे ढूँढो।”

     

    रोहित ने पीछे हटते हुए कहा—

     

    “इसे मत छूना।”

     

    लेकिन कबीर ने टिकट उठा लिया।

     

    अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर तेज़ हवा चलने लगी।

     

    फिर किसी बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    कबीर जम गया।

     

    आवाज़ कमरे के अंदर से आई थी।

     

    “भैया… मुझे घर जाना है।”

     

    रोहित ने काँपते हुए कहा—

     

    “कबीर… पीछे मत देखना।”

     

    लेकिन कबीर ने पीछे देख लिया।

     

    कमरे के दरवाज़े के पास मीरा खड़ी थी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    हाथ में लकड़ी का खिलौना।

     

    चेहरा सफेद।

     

    आँखें काली।

     

    कबीर ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तुम चाहती क्या हो?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे घर जाना है।”

     

    “तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    उसने हाथ उठाकर खिड़की की ओर इशारा किया।

     

    “ट्रेन में।”

     

    कबीर ने डरते हुए पूछा—

     

    “तुम ट्रेन में क्यों हो?”

     

    मीरा का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि पापा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    रोहित ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “रघुवीर ने।”

     

    कबीर को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “लेकिन रघुवीर तुम्हारे पिता थे।”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उन्होंने तुम्हें ट्रेन में क्यों बंद किया?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना खिलौना जमीन पर रख दिया।

     

    खिलौने के अंदर से एक पुरानी चाबी निकली।

     

    “प्लेटफॉर्म के नीचे कमरा है।”

     

    कबीर ने चाबी उठाई।

     

    मीरा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    “वहाँ सबूत है।”

     

    “किस चीज़ का?”

     

    मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    “उस रात ट्रेन में कौन गया था… और कौन नहीं गया था।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    कमरे की लाइटें वापस जल गईं।

     

    रोहित ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “हमें पुलिस को बताना चाहिए।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “पहले हमें वह कमरा ढूँढना होगा।”

     

    रात तक दोनों देवगढ़ स्टेशन वापस पहुँच गए।

     

    इस बार वे प्लेटफॉर्म नंबर 3 के नीचे बने पुराने हिस्से में गए।

     

    वहाँ जंग लगा एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    कबीर ने चाबी लगाई।

     

    क्लिक!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

     

    सीढ़ियों से बदबू आ रही थी।

     

    जैसे वहाँ वर्षों से कोई बंद पड़ा हो।

     

    दोनों टॉर्च जलाकर नीचे उतरने लगे।

     

    नीचे एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में एक यात्री था।

     

    कबीर एक-एक करके तस्वीरें देखने लगा।

     

    कुछ चेहरे पुराने थे।

     

    कुछ नए।

     

    लेकिन हर तस्वीर के नीचे एक तारीख थी।

     

    2001…

     

    2005…

     

    2012…

     

    2018…

     

    2024…

     

    कबीर अचानक रुक गया।

     

    आखिरी तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक खाली कुर्सी थी।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “यात्री अभी बाकी है।”

     

    रोहित ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कबीर… इधर देख।”

     

    कमरे के दूसरे कोने में एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।

     

    कबीर ने उसे खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “इस ट्रेन में तेरह यात्री नहीं जाते।”

     

    अगली लाइन थी—

     

    “हर बार बारह जाते हैं।”

     

    कबीर ने पन्ना पलटा।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “तेरहवाँ यात्री हमेशा वही होता है जिसे ट्रेन खुद चुनती है।”

     

    कबीर की नजर आखिरी लाइन पर गई।

     

    उसका दिल रुक-सा गया।

     

    क्योंकि वहाँ आज की तारीख के सामने नाम लिखा था—

     

    कबीर शर्मा।

     

    अचानक ऊपर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “लेकिन अभी तो 11:50 हैं!”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:14।

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    दोनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

     

    ऊपर से किसी ने उसे बाहर से बंद कर दिया था।

     

    फिर कमरे में अंधेरा हो गया।

     

    कबीर ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर अंधेरे में किसी ने फुसफुसाया—

     

    “सीट नंबर 13 तैयार है।”

     

    कबीर ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कमरे के बीचों-बीच वही पुरानी कुर्सी अब मौजूद नहीं थी।

     

    उसकी जगह एक रेलवे सीट थी।

     

    और सीट पर कोई बैठा था।

     

    कबीर जैसा चेहरा।

     

    काली आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “इस बार तुम नहीं बचोगे।”

     

    ऊपर से ट्रेन की सीटी बजी।

     

    12:15।

     

    और बंद कमरे के अंदर अचानक ट्रेन चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    कबीर ने नीचे देखा।

     

    फर्श गायब हो चुका था।

     

    उसके नीचे सिर्फ काला अंधेरा था।

     

    और उसी अंधेरे से दर्जनों आवाज़ें एक साथ आईं—

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    कबीर कुछ देर तक प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ा रहा।

     

    ट्रेन जा चुकी थी।

     

    लेकिन उसके कानों में अभी भी पहियों की आवाज़ गूँज रही थी।

     

    उसने अपने हाथ में पकड़े टिकट को फिर से देखा।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

    सीट — 13

    गंतव्य — देवगढ़

     

    कबीर की उंगलियाँ काँप रही थीं।

     

    “यह किसी का मज़ाक है,” उसने खुद से कहा।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ में खुद उसे भी भरोसा नहीं था।

     

    कुछ देर पहले जिस बूढ़े आदमी से उसकी बात हुई थी, वह अचानक गायब हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर उसके अलावा कोई नहीं था।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क वापस आ चुका था।

     

    उसने तुरंत अपने दोस्त रोहित को फोन लगाया।

     

    एक बार घंटी गई।

     

    दो बार।

     

    तीन बार।

     

    फिर कॉल उठ गई।

     

    “हाँ कबीर?”

     

    रोहित की आवाज़ नींद में डूबी हुई थी।

     

    कबीर ने जल्दी-जल्दी सारी घटना बताई।

     

    कुछ सेकंड तक रोहित चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “तू अभी देवगढ़ स्टेशन पर है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तुरंत वहाँ से निकल।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैंने अभी तेरे नंबर से एक फोटो रिसीव की है।”

     

    कबीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “क्या फोटो?”

     

    रोहित ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ सेकंड बाद कबीर के मोबाइल पर वही फोटो आ गई।

     

    कबीर ने फोटो खोली।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    फोटो में वही ट्रेन थी।

     

    लेकिन इस बार तस्वीर बाहर से नहीं ली गई थी।

     

    तस्वीर ट्रेन के अंदर से ली गई थी।

     

    और तस्वीर में सीट नंबर 13 पर कोई बैठा हुआ था।

     

    कबीर।

     

    वह खुद।

     

    उसने वही काली जैकेट पहन रखी थी।

     

    वही घड़ी।

     

    वही बैग।

     

    लेकिन तस्वीर में बैठा कबीर कैमरे की तरफ नहीं देख रहा था।

     

    वह खिड़की के बाहर देख रहा था।

     

    कबीर ने घबराकर मोबाइल नीचे कर लिया।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    “फोटो किसने भेजी?”

     

    “तेरे ही नंबर से।”

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    तभी प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कबीर ने धीरे से सिर उठाया।

     

    अंधेरे में कोई उसकी ओर आ रहा था।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा कुछ नहीं बोला।

     

    वह उसके पास आया और धीरे से बोला—

     

    “तुमने टिकट उठा लिया।”

     

    कबीर ने टिकट जेब में रख लिया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अब वह तुम्हें ढूँढ रही है।”

     

    “कौन?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म के पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    “ट्रेन की मालकिन।”

     

    कबीर ने घबराकर पूछा, “कौन है वह?”

     

    बूढ़े ने जवाब देने के बजाय पूछा—

     

    “तुमने ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “अच्छा हुआ।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बैठा है, वह यात्री नहीं है।”

     

    अचानक स्टेशन की सारी लाइटें फिर से बुझ गईं।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    बूढ़ा सामने खड़ा था।

     

    लेकिन अब उसके चेहरे पर डर था।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “क्योंकि अगली ट्रेन आने वाली है।”

     

    कबीर ने घड़ी देखी।

     

    12:28।

     

    “लेकिन ट्रेन तो अभी गई है।”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वह ट्रेन नहीं थी।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “वह सिर्फ उसका रास्ता था।”

     

    अचानक पटरी के नीचे से आवाज़ आई।

     

    जैसे लोहे के नीचे कोई चीज़ खरोंच रही हो।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    कबीर और बूढ़ा दोनों पीछे हट गए।

     

    फिर पटरी के बीच से काला धुआँ निकलने लगा।

     

    धुआँ ऊपर उठकर एक इंसानी आकार बनाने लगा।

     

    धीरे-धीरे उस धुएँ में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    एक औरत का चेहरा।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    वह कुछ कह रही थी।

     

    कबीर ने ध्यान से सुना।

     

    “सीट… नंबर… तेरह…”

     

    कबीर की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    उसने जेब से टिकट निकालकर फाड़ना चाहा।

     

    लेकिन टिकट फट नहीं रहा था।

     

    उसने दोनों हाथों से जोर लगाया।

     

    कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर टिकट पर लिखे शब्द बदलने लगे।

     

    यात्री — कबीर शर्मा

     

    धीरे-धीरे नाम गायब हुआ।

     

    उसकी जगह नया नाम दिखाई दिया—

     

    यात्री — रघुवीर सिंह

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “रघुवीर सिंह कौन है?”

     

    बूढ़े ने कुछ नहीं कहा।

     

    कबीर ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “बताइए!”

     

    बूढ़े ने आखिरकार कहा—

     

    “इस स्टेशन का पहला स्टेशन मास्टर।”

     

    “और?”

     

    “पच्चीस साल पहले उसकी बेटी ट्रेन में गायब हुई थी।”

     

    “कौन-सी ट्रेन में?”

     

    बूढ़े ने प्लेटफॉर्म नंबर 3 की ओर देखा।

     

    “इसी ट्रेन में।”

     

    अचानक दूर से सीटी की आवाज़ आई।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने देखा।

     

    इस बार ट्रेन पटरी पर नहीं आ रही थी।

     

    वह अंधेरे के अंदर से जैसे हवा में तैरती हुई प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थी।

     

    उसकी खिड़कियों में कोई रोशनी नहीं थी।

     

    सिर्फ एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    बूढ़े ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर की तरफ दौड़ने लगे।

     

    लेकिन कुछ कदम बाद कबीर रुक गया।

     

    उसे किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ प्लेटफॉर्म नंबर 3 से आ रही थी।

     

    फिर वही आवाज़ आई—

     

    “माँ… मुझे घर जाना है…”

     

    कबीर ने पीछे देखा।

     

    ट्रेन खड़ी थी।

     

    उसका दरवाज़ा खुला हुआ था।

     

    दरवाज़े पर लगभग आठ साल की एक बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने लाल फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना खिलौना था।

     

    वह सीधे कबीर को देख रही थी।

     

    “भैया…”

     

    कबीर कुछ नहीं बोला।

     

    बच्ची ने पूछा—

     

    “क्या आप मुझे घर छोड़ देंगे?”

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “उसकी तरफ मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    उसके चेहरे की त्वचा धीरे-धीरे काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें खुलीं।

     

    आँखों की जगह सिर्फ गहरा अंधेरा था।

     

    और उसके मुँह से इंसानी आवाज़ नहीं निकली।

     

    एक भारी, गहरी आवाज़ आई—

     

    “सीट नंबर 13 खाली है।”

     

    ट्रेन का दरवाज़ा अचानक पूरी तरह खुल गया।

     

    अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    फिर सभी ने एक साथ कहा—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

     

    वही आदमी।

     

    जो बिल्कुल उसके जैसा दिखता था।

     

    काली आँखें।

     

    चेहरे पर मुस्कान।

     

    उसने कबीर के कान के पास आकर कहा—

     

    “एक कबीर ट्रेन में जा चुका है।”

     

    फिर उसने अपनी उंगली कबीर की ओर की।

     

    “अब दूसरे की बारी है।”

     

    कबीर चीखकर भागा।

     

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    उसके जूते के फीते नहीं थे।

     

    उनकी जगह काले बालों की लंबी लटें उसके पैरों से लिपटी थीं।

     

    वे बाल पटरी के नीचे से निकल रहे थे।

     

    कबीर ने पूरी ताकत से पैर छुड़ाया।

     

    और अचानक वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, सुबह हो चुकी थी।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 3 खाली था।

     

    ट्रेन गायब थी।

     

    बूढ़ा भी गायब था।

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    वह खड़ा हुआ और स्टेशन से बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसकी नजर स्टेशन की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में स्टेशन के पुराने कर्मचारी खड़े थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2001

     

    कबीर की नजर तस्वीर के बीच में खड़े एक आदमी पर टिक गई।

     

    वह बूढ़ा आदमी था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही कपड़े।

     

    वही आँखें।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    रघुवीर सिंह — स्टेशन मास्टर

     

    कबीर के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि तस्वीर में रघुवीर सिंह की उम्र लगभग तीस साल थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लाल स्याही से किसी ने लिखा था—

     

    “वह आज भी अपनी बेटी का इंतज़ार कर रहा है।”

     

    उसी क्षण कबीर के मोबाइल में एक नया मैसेज आया।

     

    मैसेज उसी अज्ञात नंबर से था।

     

    सिर्फ एक लाइन—

     

    “आज रात 12:15 बजे सीट नंबर 13 पर बैठना मत भूलना।”

     

    और उसके नीचे एक तस्वीर थी।

     

    कबीर ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वह खुद स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा हुआ था।

     

    लेकिन तस्वीर में रात नहीं थी।

     

    तस्वीर में सुबह थी।

     

    और उसके पीछे खड़ी ट्रेन की खिड़की से एक छोटी बच्ची उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।

     

     

  • आखिरी ट्रेन का यात्री (भाग 1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के बाहर एक पुराना रेलवे स्टेशन था—देवगढ़ स्टेशन।

     

    कभी इस स्टेशन पर दिन-रात यात्रियों की भीड़ रहती थी। लेकिन पिछले दस वर्षों से यहाँ सिर्फ कुछ गिनी-चुनी ट्रेनें रुकती थीं। रात होते ही स्टेशन लगभग सुनसान हो जाता था।

     

    स्टेशन की सबसे अजीब बात थी प्लेटफॉर्म नंबर 3।

     

    वहाँ अब कोई ट्रेन नहीं रुकती थी।

     

    रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक उस प्लेटफॉर्म की पटरी कई साल पहले बंद कर दी गई थी। उसके आगे की रेलवे लाइन भी टूट चुकी थी।

     

    फिर भी गाँव के लोग कहते थे कि हर रात ठीक 12:15 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर एक ट्रेन आती है।

     

    एक ऐसी ट्रेन, जिसका कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई टाइमटेबल नहीं था।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    उस ट्रेन में बैठने वाला कोई भी यात्री फिर कभी वापस नहीं आता था।

     

    लोग इसे अफवाह मानते थे।

     

    लेकिन कबीर अफवाहों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    कबीर 27 साल का एक स्वतंत्र पत्रकार था। उसे अजीब घटनाओं की सच्चाई पता लगाने का शौक था। कुछ दिनों पहले उसे देवगढ़ स्टेशन के बारे में एक ईमेल मिला था।

     

    ईमेल में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर हिम्मत है तो 15 अगस्त की रात 12:15 बजे देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आना।”

     

    नीचे कोई नाम नहीं था।

     

    कबीर ने पहले इसे मज़ाक समझा।

     

    फिर उसे उसी ईमेल के साथ एक तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में एक पुरानी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी थी।

     

    तस्वीर धुंधली थी, लेकिन ट्रेन की खिड़की के पास एक आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह आदमी सीधे कैमरे की ओर देख रहा था।

     

    कबीर को तस्वीर में कुछ अजीब लगा।

     

    उस आदमी का चेहरा बिल्कुल वैसा था जैसे कोई कई दिनों से सोया न हो।

     

    आँखें पूरी तरह काली।

     

    और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।

     

    कबीर ने तस्वीर ज़ूम की।

     

    ट्रेन के शीशे पर किसी ने उंगली से लिखा था—

     

    “अगला यात्री तुम हो।”

     

    उस रात कबीर देवगढ़ स्टेशन पहुँच गया।

     

    समय था रात के 11:40।

     

    पूरा स्टेशन सुनसान था।

     

    टिकट खिड़की बंद थी।

     

    चाय की दुकान बंद थी।

     

    स्टेशन मास्टर का कमरा भी अंधेरे में डूबा हुआ था।

     

    कबीर प्लेटफॉर्म नंबर 3 की तरफ बढ़ा।

     

    वहाँ पहुँचते ही उसे अजीब ठंड महसूस हुई।

     

    अगस्त की गर्म रात थी, लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर हवा बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    कबीर ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    उसने घड़ी देखी।

     

    11:52।

     

    अचानक पीछे से आवाज़ आई—

     

    “आप भी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं?”

     

    कबीर ने तुरंत पीछे देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा था।

     

    उसने काला कोट पहन रखा था।

     

    कबीर ने पूछा, “आप यहाँ इतनी रात को?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ सामने पटरी की ओर देखा।

     

    “पहली बार आए हो?”

     

    “हाँ।”

     

    बूढ़ा धीरे से मुस्कुराया।

     

    “तो एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जब ट्रेन आए, तो उसमें मत बैठना।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “आप भी उस ट्रेन की कहानी जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कहानी नहीं है।”

     

    उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

     

    “मैं उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

     

    कबीर की हँसी रुक गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़े ने अपनी आस्तीन ऊपर की।

     

    उसकी कलाई पर एक काला निशान था।

     

    निशान किसी टिकट की मुहर जैसा दिखाई दे रहा था।

     

    “मैं पच्चीस साल पहले उस ट्रेन में बैठा था।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने स्टेशन की घड़ी की ओर देखा।

     

    12:03।

     

    “फिर मैं वापस आया।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    “तो फिर डर किस बात का?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मेरे हिसाब से मैं सिर्फ तीन मिनट के लिए गया था।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    बूढ़े ने आगे कहा—

     

    “लेकिन जब मैं वापस आया, तब यहाँ पच्चीस साल बीत चुके थे।”

     

    कबीर के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    बूढ़ा कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्लेटफॉर्म की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरे स्टेशन पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि कबीर को अपनी साँसें सुनाई देने लगीं।

     

    फिर दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽऽऽऽ!

     

    कबीर ने पटरी की ओर देखा।

     

    दूर अंधेरे में एक छोटी-सी पीली रोशनी दिखाई दी।

     

    धीरे-धीरे वह रोशनी बड़ी होने लगी।

     

    ट्रेन आ रही थी।

     

    लेकिन उसकी आवाज़ अजीब थी।

     

    पहिए पटरी पर चलने की आवाज़ नहीं कर रहे थे।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत भारी चीज़ जमीन पर घसीटी जा रही हो।

     

    ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

     

    दरवाज़े अपने आप खुल गए।

     

    कबीर ने ट्रेन के ऊपर देखा।

     

    वहाँ कोई नंबर नहीं था।

     

    कोई नाम नहीं।

     

    सिर्फ काले रंग में एक शब्द लिखा था—

     

    “अंतिम।”

     

    कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा वहाँ नहीं था।

     

    बेंच खाली थी।

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “बाबा?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ट्रेन के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    कबीर जम गया।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “कबीर… अंदर आओ।”

     

    आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

     

    बिल्कुल उसी बूढ़े की।

     

    कबीर ने ट्रेन की खिड़की से अंदर देखा।

     

    अंदर लगभग दस यात्री बैठे थे।

     

    सभी बिल्कुल शांत।

     

    कोई मोबाइल नहीं चला रहा था।

     

    कोई बात नहीं कर रहा था।

     

    सभी की नजरें नीचे थीं।

     

    कबीर ने देखा कि हर यात्री के हाथ में एक पुराना टिकट था।

     

    फिर उसकी नजर सबसे आखिरी सीट पर गई।

     

    वहाँ वही आदमी बैठा था जो उसे उस ईमेल वाली तस्वीर में दिखाई दिया था।

     

    काली आँखें।

     

    हल्की मुस्कान।

     

    वह धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    “ट्रेन में मत बैठना।”

     

    कबीर ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन अगले ही सेकंड दूसरा मैसेज आया।

     

    “क्योंकि अगर तुम नहीं बैठे… तो वह खुद उतर जाएगी।”

     

    कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    ट्रेन की सीटी फिर बजी।

     

    फूँऽऽऽऽ!

     

    दरवाज़ा बंद होने लगा।

     

    तभी अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

     

    सभी की आँखें काली थीं।

     

    और सभी कबीर को देख रहे थे।

     

    फिर आखिरी सीट पर बैठा आदमी मुस्कुराया।

     

    उसने अपना टिकट खिड़की से बाहर फेंक दिया।

     

    टिकट कबीर के पैरों के पास आकर गिरा।

     

    कबीर ने काँपते हाथों से टिकट उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    यात्री: कबीर शर्मा

     

    सीट: 13

     

    गंतव्य: देवगढ़

     

    कबीर ने घबराकर ट्रेन की तरफ देखा।

     

    ट्रेन चलने लगी थी।

     

    लेकिन दरवाज़े के पास कोई खड़ा था।

     

    वही बूढ़ा आदमी।

     

    उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और इशारा किया—

     

    अंदर आ जाओ।

     

    और तभी कबीर ने देखा कि बूढ़े के पीछे ट्रेन के दरवाज़े पर एक और आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिखता था।

     

    उसी चेहरे के साथ।

     

    उसी कपड़ों में।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराया और होंठ हिलाए—

     

    “तुम देर कर चुके हो।”

     

    ट्रेन अंधेरे में गायब हो गई।

     

    और प्लेटफॉर्म नंबर 3 की घड़ी रुक गई।

     

    12:15।

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 3 (अंतिम भाग)” 👻

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    हरिदास उस कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।उसके हाथ में तस्वीर थी और सामने आरव खड़ा था।

     

    लेकिन वह आरव जैसा दिखते हुए भी आरव नहीं लग रहा था।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था। आंखें खुली थीं, मगर उनमें कोई चमक नहीं थी। उसके पीछे आठ काली परछाइयां खड़ी थीं।

     

    हरिदास ने कांपती आवाज़ में पूछा, “आरव… तुम जिंदा हो?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    हरिदास ने पीछे देखा।

     

    दीवार पर एक नई तस्वीर लगी थी।

     

    उसमें देवेंद्र दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसी कमरे में खड़ा था।

     

    लेकिन तस्वीर के अंदर।

     

    हरिदास की सांस रुक गई।

     

    “देवेंद्र!”

     

    तभी तस्वीर के अंदर देवेंद्र ने अपना सिर उठाया।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “हरिदास… तस्वीर मत खींचना।”

     

    अचानक तस्वीर के अंदर से चीख सुनाई दी।

     

    और तस्वीर काली हो गई।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    आरव पहली बार बोला।

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    हरिदास ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूं जिसे तुम ढूंढने आए थे।”

     

    “आरव कहां है?”

     

    आरव ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।

     

    “वह अभी भी तस्वीर के अंदर है।”

     

    हरिदास के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    “तो तुम कौन हो?”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मैं वह हूं जो हर तस्वीर के बाद पैदा होता है।”

     

    कमरे की दीवारें अचानक कांपने लगीं।

     

    पुरानी तस्वीरें फर्श पर गिरने लगीं।

     

    हर तस्वीर में मौजूद लोग अब कमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    उनमें रघुवीर था।

     

    मीरा थी।

     

    तारा थी।

     

    और कई अनजान चेहरे थे।

     

    हरिदास ने समझ लिया कि ये सभी वही लोग थे जो वर्षों से इस घर की तस्वीरों में कैद थे।

     

    लेकिन एक तस्वीर देखकर उसकी नजर जम गई।

     

    उसमें उसकी पत्नी थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही साड़ी।

     

    वही मुस्कान।

     

    हरिदास की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “सरिता…”

     

    तस्वीर के अंदर उसकी पत्नी ने हाथ उठाया।

     

    जैसे उसे बुला रही हो।

     

    फिर तस्वीर के नीचे शब्द उभरने लगे—

     

    “एक तस्वीर लो और उसे वापस ले जाओ।”

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    आरव ने उसे रोकना चाहा।

     

    “ऐसा मत करना।”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं तस्वीर खींच लूं तो मेरी पत्नी वापस आ जाएगी?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    हरिदास समझ गया।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    अचानक कमरे में एक और आवाज गूंजी।

     

    “नहीं…”

     

    आवाज़ उसकी पत्नी की थी।

     

    “मैं सच कह रही हूं।”

     

    हरिदास ने तस्वीर की तरफ देखा।

     

    सरिता रो रही थी।

     

    “बस एक तस्वीर…”

     

    हरिदास कैमरा लेकर उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    उसकी उंगली शटर पर थी।

     

    तभी उसे कुछ याद आया।

     

    1998 की तस्वीर।

     

    उसमें पांचवीं परछाई थी।

     

    फिर आरव की तस्वीर में सात परछाइयां थीं।

     

    फिर आठ।

     

    आखिर हर तस्वीर के साथ परछाइयां बढ़ क्यों रही थीं?

     

    हरिदास ने अचानक कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर वही पुरानी तस्वीर खुली थी।

     

    उसने ज़ूम किया।

     

    पहली बार उसने तस्वीर के पीछे की दीवार देखी।

     

    वहां एक छोटा-सा आईना लगा था।

     

    आईने में उस काली परछाई का चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन वह चेहरा किसी और का नहीं था।

     

    वह तारा का था।

     

    दस साल की बच्ची।

     

    हरिदास ने देवेंद्र की बात याद की।

     

    “तारा की मौत कमरे में हुई थी।”

     

    उसने अचानक समझ लिया।

     

    “तारा ही वो साया है!”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां। लेकिन वह अकेली नहीं है।”

     

    “तो बाकी लोग?”

     

    “वे लोग उसके साथ फंस गए।”

     

    हरिदास ने पूछा, “उन्हें आज़ाद कैसे करें?”

     

    आरव ने दीवार की तरफ देखा।

     

    “आख़िरी तस्वीर मिटानी होगी।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “वह तस्वीर जो पहली तस्वीर से पहले खींची गई थी।”

     

    हरिदास समझ नहीं पाया।

     

    “पहली तस्वीर से पहले?”

     

    आरव ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक लकड़ी का पुराना संदूक पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे खोला।

     

    अंदर पुराने कैमरे, निगेटिव और सैकड़ों तस्वीरें थीं।

     

    सबसे नीचे एक काला लिफाफा रखा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तारा की आख़िरी तस्वीर।”

     

    हरिदास ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    तारा अकेली खड़ी थी।

     

    लेकिन उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    हरिदास ने गौर से देखा।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “मैंने इसे नहीं बुलाया था। उसने मुझे बुलाया था।”

     

    नीचे एक नाम लिखा था।

     

    मीरा।

     

    हरिदास चौंक गया।

     

    “मीरा?”

     

    आरव ने कहा, “तारा की मां।”

     

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

     

    दीवारों पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    औरत की चीख सुनाई दी।

     

    फिर एक बच्ची रोने लगी।

     

    “मां… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    हरिदास को सब समझ आने लगा।

     

    मीरा ने किसी पुराने तांत्रिक से मदद लेकर अपनी बेटी को मौत से वापस लाने की कोशिश की थी।

     

    लेकिन जो वापस आया था, वह तारा नहीं था।

     

    वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने तस्वीरों के जरिए लोगों की आत्माओं को कैद करना शुरू कर दिया।

     

    और हर नई तस्वीर उसे और शक्तिशाली बनाती गई।

     

    हरिदास ने तारा की तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    आरव चिल्लाया—

     

    “जल्दी करो!”

     

    हरिदास ने कैमरा उठाया।

     

    तभी काली परछाई उसके सामने आ गई।

     

    उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    पहले तारा।

     

    फिर सरिता।

     

    फिर आरव।

     

    फिर हरिदास का अपना चेहरा।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    हरिदास ने कैमरे का फ्लैश ऑन किया।

     

    “शायद नहीं…”

     

    उसने तस्वीर कैमरे के सामने रखी।

     

    “…लेकिन तुम्हें तस्वीर में कैद तो कर सकता हूं।”

     

    क्लिक!

     

    एक तेज फ्लैश हुआ।

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    सभी परछाइयां चीखने लगीं।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें एक-एक करके फटने लगीं।

     

    आरव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    देवेंद्र की तस्वीर टूटकर फर्श पर आ गिरी।

     

    फिर आख़िरी चीख सुनाई दी।

     

    तारा की।

     

    “मुझे घर जाना है…”

     

    और सब शांत हो गया।

     

    कुछ देर बाद हरिदास ने आंखें खोलीं।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    न आरव।

     

    न परछाइयां।

     

    न तस्वीरें।

     

    सिर्फ एक कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर देखी।

     

    उसमें तारा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 2026

     

    और समय—

     

    3:08 PM.

     

    हरिदास ने राहत की सांस ली।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने कहा—

     

    “काका…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर एक नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    उस तस्वीर में हरिदास खुद कमरे में खड़ा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    हरिदास ने डरते हुए तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    वह तारा नहीं थी।

     

    वह कोई और लड़की थी।

     

    नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “कहानी अभी खत्म नहीं हुई…”

     

    अगली सुबह पुलिस को पुराने घर में हरिदास मिला।

     

    वह जिंदा था।

     

    लेकिन उसे कुछ याद नहीं था।

     

    आरव का कोई पता नहीं चला।

     

    देवेंद्र भी गायब था।

     

    पुराना घर कुछ दिनों बाद तोड़ दिया गया।

     

    मजदूरों ने मलबा हटाते समय एक पुराना कैमरा पाया।

     

    पुलिस ने उसे सबूत समझकर थाने में रख दिया।

     

    तीन दिन बाद एक पुलिसकर्मी ने कैमरा चालू किया।

     

    उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।

     

    एक खाली सड़क की।

     

    सड़क के बीच एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव।

     

    उसके हाथ में कैमरा था।

     

    और उसके पीछे…

     

    सैकड़ों परछाइयां खड़ी थीं।

     

    तस्वीर के नीचे तारीख थी—

     

    18 अगस्त 2026।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर पुलिस स्टेशन के अंदर से खींची गई थी।

     

    और कैमरा…

     

    पुलिस स्टेशन की अलमारी के अंदर बंद था।

     

    उस दिन के बाद वह कैमरा हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।

     

    लेकिन कहते हैं, आज भी अगर कोई उस पुराने घर की जगह पर रात के ठीक 3:07 बजे तस्वीर खींचता है…

     

    तो तस्वीर में उसके पीछे एक छोटी बच्ची दिखाई देती है।

     

    वह मुस्कुराती है।

     

    और तस्वीर के पीछे सिर्फ एक सवाल लिखा होता है—

     

    “क्या तुम मेरी आख़िरी तस्वीर बनोगे?”

     

    End

  • आख़िरी तस्वीर — भाग 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सुबह के करीब सात बजे मकान मालिक हरिदास उस पुराने घर के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    अंदर अजीब-सी खामोशी थी।

     

    “आरव!” उसने आवाज लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर गया। फर्श पर आरव का कैमरा पड़ा था। उसके पास मोबाइल भी था, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी थी।

     

    हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।

     

    कैमरे में सिर्फ एक आख़िरी तस्वीर थी।

     

    उस तस्वीर को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    तस्वीर में आरव कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।

     

    उसके पीछे सात परछाइयां थीं।

     

    हरिदास ने कैमरा तुरंत बंद कर दिया।

     

    वह जानता था कि अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    पच्चीस साल पहले भी ऐसा ही हुआ था।

     

    लेकिन इस बार फर्क था।

     

    पहली बार उस घर ने किसी बाहरी आदमी को नहीं, बल्कि आरव को चुना था।

     

    हरिदास कैमरा लेकर सीधे घर से बाहर निकल गया।

     

    उसे आरव को ढूंढना था।

     

    लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था उस तस्वीर का सच पता लगाना।

     

    वह शहर के पुराने हिस्से में रहने वाले एक बुजुर्ग आदमी के पास गया, जिसका नाम देवेंद्र था। देवेंद्र पहले उस घर के मालिक के परिवार के लिए काम करता था।

     

    हरिदास ने कैमरा उसके सामने रख दिया।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखी।

     

    कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसने पूछा, “उसने ऊपर वाला कमरा खोल दिया था?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। कमरा बाहर से बंद था। लेकिन उसने तस्वीर खींच ली थी।”

     

    देवेंद्र ने लंबी सांस ली।

     

    “तो फिर वही हुआ जिसका डर था।”

     

    हरिदास ने बेचैनी से पूछा, “आप मुझे सब कुछ बताइए।”

     

    देवेंद्र कुर्सी पर बैठ गया।

     

    “1998 में उस घर में एक परिवार रहता था। घर का मालिक था रघुवीर। उसके साथ उसकी पत्नी मीरा, बेटा निखिल और दस साल की बेटी तारा रहती थी।”

     

    हरिदास ध्यान से सुनता रहा।

     

    “एक रात परिवार ने घर में एक तस्वीर खिंचवाई। उस तस्वीर में चार लोग थे। लेकिन तस्वीर निकलने के बाद उसमें पांचवां साया दिखाई दिया।”

     

    “वही औरत?” हरिदास ने पूछा।

     

    देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “उस रात तारा गायब हो गई।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “अगली सुबह उसका शरीर घर के ऊपर वाले कमरे में मिला। लेकिन कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।”

     

    हरिदास ने पूछा, “पुलिस?”

     

    “पुलिस आई थी। मगर उन्हें कुछ समझ नहीं आया।”

     

    देवेंद्र कुछ पल रुका।

     

    “उसके बाद रघुवीर ने उस तस्वीर को जला दिया।”

     

    “तो फिर यह तस्वीर?”

     

    “तस्वीर जली थी… लेकिन खत्म नहीं हुई।”

     

    हरिदास की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    देवेंद्र ने आगे कहा, “जिसने भी उस तस्वीर को दोबारा कैमरे में कैद किया, उसके साथ कुछ न कुछ हुआ।”

     

    हरिदास ने कैमरा कसकर पकड़ लिया।

     

    “आरव कहां है?”

     

    देवेंद्र ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “जहां बाकी लोग हैं।”

     

    “कहां?”

     

    देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय कैमरे की स्क्रीन अपने आप जल उठी।

     

    दोनों चौंक गए।

     

    स्क्रीन पर नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव।

     

    वह एक लंबे अंधेरे गलियारे में खड़ा था।

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “यह तो उस घर में नहीं है।”

     

    देवेंद्र तस्वीर के करीब गया।

     

    “यह घर के अंदर ही है।”

     

    “लेकिन ऐसा कोई गलियारा वहां नहीं है!”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    फिर उसकी नजर तस्वीर के कोने पर पड़ी।

     

    वहां दीवार पर एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी में समय था—

     

    3:07.

     

    देवेंद्र अचानक खड़ा हो गया।

     

    “हमें तुरंत वहां जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि 3:07 वह समय है जब वह दरवाज़ा खुलता है।”

     

    हरिदास ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    अभी सुबह के आठ बज रहे थे।

     

    “तो हमारे पास समय है।”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाई।

     

    तस्वीर में घड़ी की सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    3:03…

     

    3:04…

     

    3:05…

     

    जैसे तस्वीर के अंदर समय चल रहा हो।

     

    हरिदास की सांस अटक गई।

     

    “यह कैसे संभव है?”

     

    देवेंद्र ने कहा, “क्योंकि तस्वीर के अंदर भी समय चलता है।”

     

    दोनों तुरंत घर की ओर लौटे।

     

    ऊपर वाला कमरा अभी भी बंद था।

     

    लेकिन अब दरवाज़े के नीचे से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    हरिदास ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा, “आवाज़ का जवाब मत देना।”

     

    फिर रोने की आवाज तेज हो गई।

     

    “काका… मुझे बाहर निकालो…”

     

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तारा…”

     

    हरिदास ने उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरा खाली था।

     

    वहां सिर्फ एक पुरानी लकड़ी की मेज थी।

     

    मेज पर कई तस्वीरें रखी थीं।

     

    हर तस्वीर में अलग-अलग लोग थे।

     

    कुछ लोग परिवार के थे।

     

    कुछ अनजान।

     

    लेकिन हर तस्वीर में एक चीज समान थी।

     

    पीछे वही काली परछाई।

     

    हरिदास ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें आरव था।

     

    वह एक अंधेरे कमरे में बैठा था।

     

    उसकी आंखें बंद थीं।

     

    उसके सामने एक लड़की खड़ी थी।

     

    दस साल की।

     

    पीली फ्रॉक पहने हुए।

     

    देवेंद्र ने तस्वीर देखते ही कहा—

     

    “तारा।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे की खिड़कियां अपने आप बंद हो गईं।

     

    हरिदास ने दरवाज़ा खींचा।

     

    “खुलो!”

     

    कोई फायदा नहीं हुआ।

     

    तभी मेज पर रखी तस्वीरों में हलचल होने लगी।

     

    एक-एक करके तस्वीरों के अंदर मौजूद लोग अपना सिर घुमाने लगे।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “ये… ये जिंदा हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा, “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “ये इंतजार कर रहे हैं।”

     

    अचानक एक तस्वीर फर्श पर गिर गई।

     

    उसमें आरव दिखाई दे रहा था।

     

    इस बार उसकी आंखें खुली थीं।

     

    वह सीधे कैमरे की तरफ देख रहा था।

     

    और उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    हरिदास ने तस्वीर कान के पास कर ली।

     

    बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “मुझे यहां से निकालो।”

     

    हरिदास ने घबराकर कहा, “आरव!”

     

    देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसकी आवाज पर भरोसा मत करो।”

     

    “लेकिन वह आरव है!”

     

    “हो सकता है।”

     

    देवेंद्र ने तस्वीर को उलट दिया।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “एक को बाहर निकालोगे, तो एक को अंदर जाना होगा।”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    तभी कमरे की दीवार पर एक नई तस्वीर दिखाई देने लगी।

     

    जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दीवार पर तस्वीर चिपका दी हो।

     

    तस्वीर में हरिदास और देवेंद्र खड़े थे।

     

    उनके बीच आरव था।

     

    लेकिन आरव के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    हरिदास ने कांपते हुए कहा, “यह तस्वीर अभी खींची गई है?”

     

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी।

     

    17 अगस्त 2026।

     

    और समय था—

     

    3:07 PM.

     

    हरिदास ने अपनी घड़ी देखी।

     

    3:06 PM.

     

    सिर्फ एक मिनट बाकी था।

     

    तभी कमरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “किसे अंदर भेजोगे?”

     

    हरिदास और देवेंद्र दोनों ने पीछे देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “हरिदास…”

     

    हरिदास जम गया।

     

    आवाज़ उसकी मृत पत्नी की थी।

     

    “हरिदास… मुझे बहुत साल हो गए हैं।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    देवेंद्र ने उसे पकड़ लिया।

     

    “मत सुनो!”

     

    लेकिन आवाज अब बिल्कुल उसके कान के पास थी।

     

    “बस एक तस्वीर खिंचवा दो…”

     

    3:07.

     

    अचानक कैमरा अपने आप उठ गया।

     

    फ्लैश चमका।

     

    कमरा पूरी तरह सफेद रोशनी में डूब गया।

     

    जब रोशनी गायब हुई, देवेंद्र वहां नहीं था।

     

    हरिदास अकेला खड़ा था।

     

    मेज पर एक नई तस्वीर पड़ी थी।

     

    उसने कांपते हाथों से तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में वह खुद खड़ा था।

     

    उसके पीछे देवेंद्र था।

     

    और उनके बीच…

     

    आरव मुस्कुरा रहा था।

     

    हरिदास ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब तीसरी तस्वीर तुम्हें खींचनी है।”

     

    उसी क्षण कमरे के कोने से कैमरे की क्लिक की आवाज आई।

     

    हरिदास ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

     

    वहां आरव खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे सात नहीं…

     

    आठ परछाइयां थीं।

     

    और उनमें से एक परछाई धीरे-धीरे हरिदास की तरफ बढ़ रही थी।

  • भाग 1 — आख़िरी तस्वीर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के पुराने हिस्से में बारिश लगातार हो रही थी। सड़कें सुनसान थीं और बिजली बार-बार चमक रही थी। उसी रात आरव अपने नए किराए के घर में पहली बार अकेला था।

     

    घर बहुत पुराना था। दीवारों पर नमी के निशान थे, लकड़ी के दरवाज़े जगह-जगह से उखड़े हुए थे और ऊपर की मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा था, जिसे मकान मालिक ने साफ़ करने से मना किया था।

     

    आरव को यह बात अजीब लगी थी।

     

    जब उसने पूछा था, “वह कमरा बंद क्यों है?”

     

    मकान मालिक ने बस इतना कहा था, “पुराना सामान है। आपको उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    आरव ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    वह पेशे से फोटोग्राफर था। पुराने घरों और सुनसान जगहों की तस्वीरें लेना उसका शौक था। इसलिए घर की अजीब हालत देखकर डरने के बजाय वह उत्साहित था।

     

    रात को खाना खाने के बाद उसने अपना कैमरा निकाला और घर की तस्वीरें लेने लगा।

     

    सीढ़ियां…

     

    खिड़की…

     

    पुरानी घड़ी…

     

    फिर उसकी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहां एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में चार लोग खड़े थे—एक बुजुर्ग आदमी, एक औरत, करीब दस साल की बच्ची और एक जवान लड़का। सभी कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि तस्वीर के पीछे की तारीख साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “17 अगस्त 1998.”

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और अपने कैमरे से उसकी फोटो खींच ली।

     

    तभी ऊपर से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने ऊपर देखा।

     

    आवाज़ उसी बंद कमरे की तरफ से आई थी।

     

    कुछ सेकंड तक वह सीढ़ियों के पास खड़ा रहा। फिर उसने खुद को समझाया कि शायद कोई पुरानी चीज गिर गई होगी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाज़ा बंद था।

     

    आरव ने हैंडल घुमाया।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    अंदर से हल्की-सी खरोंचने की आवाज आ रही थी।

     

    खर्र… खर्र…

     

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “कोई है?” उसने धीरे से पूछा।

     

    आवाज़ तुरंत बंद हो गई।

     

    कुछ पल बाद उसने नीचे लौटने का फैसला किया।

     

    कमरे में वापस आकर उसने कैमरे की तस्वीरें लैपटॉप में डालनी शुरू कीं।

     

    एक-एक करके तस्वीरें सामने आने लगीं।

     

    लेकिन जब उसने उस पुरानी तस्वीर वाली फोटो खोली, तो उसकी सांस रुक गई।

     

    तस्वीर में अब चार लोग नहीं थे।

     

    उनके पीछे एक पांचवीं परछाई खड़ी थी।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने आंखें मलकर स्क्रीन को देखा।

     

    उसे लगा शायद कैमरे की रोशनी के कारण ऐसा दिख रहा है।

     

    उसने फोटो को ज़ूम किया।

     

    परछाई बिल्कुल साफ थी।

     

    काले कपड़े।

     

    लंबे बाल।

     

    और चेहरा पूरी तरह नीचे झुका हुआ।

     

    आरव ने तस्वीर सेव की और कैमरा बंद कर दिया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    तेज़ हवा अंदर आई।

     

    लाइट चली गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    खिड़की से लेकर उसके कैमरे तक।

     

    आरव धीरे-धीरे कैमरे के पास गया।

     

    कैमरा अभी बंद था।

     

    फिर भी उसकी स्क्रीन जल उठी।

     

    स्क्रीन पर एक तस्वीर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव ने उसे देखा और उसके हाथ कांपने लगे।

     

    वह तस्वीर उसी कमरे की थी।

     

    लेकिन उसमें आरव खुद खड़ा था।

     

    और उसके पीछे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह घबराकर कमरे से बाहर निकला।

     

    नीचे पहुंचकर उसने मकान मालिक को फोन किया।

     

    “आपने मुझे इस घर के बारे में सब कुछ नहीं बताया,” आरव ने गुस्से में कहा।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक चुप्पी रही।

     

    फिर मकान मालिक ने पूछा, “आपने ऊपर वाले कमरे की तस्वीर देख ली?”

     

    आरव चौंका।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    मकान मालिक की आवाज अचानक धीमी हो गई।

     

    “क्योंकि उस घर में जो भी उस तस्वीर को कैमरे में कैद करता है… वह ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहता।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    मकान मालिक ने जवाब नहीं दिया।

     

    फोन कट गया।

     

    उसी समय ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे-धीरे।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    जैसे कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा हो।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी सीढ़ियों पर डाली।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    लेकिन आवाज जारी रही।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर अचानक उसके फोन पर एक नई तस्वीर आई।

     

    अज्ञात नंबर से।

     

    आरव ने तस्वीर खोली।

     

    उसमें वही पुरानी तस्वीर थी।

     

    चार लोग…

     

    और पीछे खड़ी पांचवीं परछाई।

     

    लेकिन इस बार परछाई का चेहरा थोड़ा ऊपर उठा हुआ था।

     

    आरव ने तस्वीर को ज़ूम किया।

     

    उसका खून जम गया।

     

    चेहरा किसी औरत का नहीं था।

     

    वह चेहरा आरव की अपनी मां का था।

     

    उसकी मां की मौत छह साल पहले हो चुकी थी।

     

    तभी फोन पर एक मैसेज आया।

     

    “मुझे ढूंढना मत।”

     

    आरव ने कांपते हुए लिखा—

     

    “आप कौन हैं?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया।

     

    “मैं वो हूं… जिसकी आख़िरी तस्वीर तुमने खींची है।”

     

    आरव ने तुरंत घर छोड़ने का फैसला किया।

     

    उसने बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने चाबी घुमाई।

     

    चाबी घूम रही थी, मगर दरवाज़ा नहीं खुल रहा था।

     

    पीछे से किसी के हंसने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत करीब।

     

    आरव धीरे-धीरे मुड़ा।

     

    सीढ़ियों के नीचे वही काले कपड़ों वाली औरत खड़ी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह उसकी मां थी।

     

    लेकिन उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बेटा… एक तस्वीर और ले लो।”

     

    आरव का कैमरा अपने आप चालू हो गया।

     

    स्क्रीन पर लिखा आया—

     

    “आख़िरी तस्वीर — 17 अगस्त 2026.”

     

    और कैमरे ने खुद ही तस्वीर खींच ली।

     

    फ्लैश चमका।

     

    उस एक पल में आरव ने देखा कि उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े थे।

     

    सबके चेहरे पहचान में नहीं आ रहे थे।

     

    और सबसे आगे वही चार लोग खड़े थे, जो पुरानी तस्वीर में थे।

     

    फिर अंधेरा छा गया।

     

    सुबह जब मकान मालिक घर पहुंचा, तो दरवाज़ा खुला था।

     

    आरव कहीं नहीं था।

     

    सिर्फ उसका कैमरा फर्श पर पड़ा था।

     

    कैमरे में आख़िरी तस्वीर मौजूद थी।

     

    उस तस्वीर में आरव अकेला खड़ा था।

     

    लेकिन उसके पीछे एक नहीं…

     

    सात परछाइयां थीं।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 25

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 25 : जिसे देखकर विराज भी डर गया

     

    समुद्र किनारे उस सुनसान जगह पर एक पल के लिए सब कुछ थम गया था।

     

    शेखर जमीन पर पड़े थे।

     

    आरव उनके पास घुटनों के बल बैठा हुआ था।

     

    उनकी सफेद शर्ट पर खून फैलता जा रहा था।

     

    “पापा…!”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आंखें खोलिए… पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    शेखर ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हां पापा, मैं यहीं हूं।”

     

    “तुम… यहां से चले जाओ।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

     

    तभी पीछे से बंदूक पकड़े वह आदमी आगे आया।

     

    उसके चेहरे पर ठंडी मुस्कान थी।

     

    विराज उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “तुम…?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विराज। मैं।”

     

    अभय ने भी उसे पहचान लिया।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये यहां कैसे…?”

     

    राघव ने घबराकर पूछा,

     

    “कौन है ये?”

     

    किसी के मुंह से जवाब नहीं निकला।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “मेरा नाम सुनने के बाद शायद तुम्हें अपने पुराने पाप याद आ जाएंगे।”

     

    आरव ने गुस्से में उसकी तरफ बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “और अगली गोली तुम्हारे लिए है।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उसे गोली मत मारना!”

     

    आदमी ने आरोही को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे घूरता रहा।

     

    फिर उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तुम…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    उस आदमी ने धीरे से कहा—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    नंदिनी की आंखें फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    अभय ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम जिंदा कैसे हो?”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगा था कि तुमने मुझे खत्म कर दिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “इस परिवार के लोगों ने मुझे कई बार मारने की कोशिश की।”

     

    फिर उसने अपनी बंदूक आरव की तरफ कर दी।

     

    “लेकिन मैं हर बार वापस आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताओ अपना।”

     

    आदमी ने कहा,

     

    “तुम्हें मेरा नाम जानकर क्या मिलेगा?”

     

    “सच।”

     

    “सच?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सच सुनने के लिए तैयार नहीं हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं सब सुनूंगा।”

     

    उस आदमी ने कहा—

     

    “मेरा नाम रुद्र है।”

     

    माधवी के हाथ कांपने लगे।

     

    राघव ने उन्हें संभाला।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आप मुझे मेरी मां जैसा क्यों कह रहे थे?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्योंकि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता था।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “रुद्र, मेरी बेटी से दूर रहो।”

     

    रुद्र हंसा।

     

    “अब भी डरती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैं जानती हूं तुम क्या कर सकते हो।

     

    आरव ने शेखर के घाव पर हाथ दबाया।

     

    “किसी को डॉक्टर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत फोन निकाला।

     

    “मैं एंबुलेंस बुलाता हूं।”

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    “अस्पताल मत ले जाना।”

     

    “लेकिन गोली लगी है।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा,

     

    “वहां… उनके लोग हैं।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “तो फिर हम आपको सुरक्षित जगह ले जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “मेरे पास एक पुराना फार्महाउस है।”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “वहीं चलो।”

     

    राघव और कबीर ने शेखर को उठाया।

     

    लेकिन तभी रुद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम्हें पहले मुझसे गुजरना होगा।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “यही तो चाहता हूं।”

     

    आरव ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे पिता को गोली मारी है।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो तुम्हारे पिता हैं?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम्हें भी मरना होगा।”

     

    आरोही चिल्लाई,

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत आओ।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं आरव को कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तुम्हें पता है तुम किसे बचा रही हो?”

     

    “आरव को।”

     

    “वही आरव जिसने तुम्हारे परिवार की पूरी विरासत अपने नाम कर रखी है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मुझे उसकी संपत्ति नहीं चाहिए।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “फिर भी तुम उसके साथ हो।”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूं।”

     

    चारों तरफ खामोशी छा गई।

     

    आरव ने भी उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने पहली बार सबके सामने अपने दिल की बात कह दी थी।

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “और यही हमारा सबसे बड़ा हथियार भी है।”

     

    विराज ने अचानक रुद्र से कहा,

     

    “तुम्हारा असली मकसद क्या है?”

     

    रुद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें पता होना चाहिए।”

     

    “नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच कह रहा हूं।”

     

    रुद्र ने बंदूक नीचे की।

     

    “तुम्हें याद है वो रात?”

     

    विराज का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सी रात?”

     

    “अस्पताल वाली।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “जिस रात दो बच्चों का जन्म हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “उस रात तुमने आदेश दिया था कि दोनों बच्चों को खत्म कर दिया जाए।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    विराज चिल्लाया,

     

    “झूठ!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी ने एक बच्चे को बचा लिया।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां माधवी आरव को लेकर भाग गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    “और नंदिनी आरोही को लेकर।”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तीसरा आदमी कौन था?”

     

    सब चौंक गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तीसरा?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस रात वहां एक और बच्चा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “ये झूठ है।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम जानते हो कि मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तीसरा बच्चा कौन था?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वही बच्चा जिसकी वजह से आज तुम दोनों की जिंदगी उलझी हुई है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सीधे-सीधे बताओ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “उस बच्चे की पहचान कभी सामने नहीं आई।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके रिकॉर्ड बदल दिए गए थे।”

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने विराज की तरफ देखा।

     

    विराज चुप रहा।

     

    रुद्र बोला,

     

    “विराज ने।”

     

    आरोही ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैंने किसी बच्चे को नहीं छुआ।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुमने आदेश दिया था।”

     

    विराज चुप रहा।

     

    आरव ने कहा,

     

    “उस बच्चे का क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “वो बच्चा…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे सामने खड़ा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें हमेशा बताया गया कि तुम माधवी के बेटे हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड नकली है।”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “नहीं!”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला जरूर है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    रुद्र ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने हैरानी से अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “आरव…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “आप…?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “क्या आप मेरी मां हैं?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही जैसे पत्थर बन गई।

     

    “तो…”

     

    उसकी नजर आरव पर गई।

     

    “आरव मेरे भाई हैं?”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अब समझ आया?”

    आरोही धीरे-धीरे आरव से दूर होने लगी।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो।”

     

    “नहीं!”

     

    “हम दोनों के बीच…”

     

    उसकी आवाज रुक गई।

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”

     

    आरव ने चौंककर उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरी मां हैं।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “मैं तुम्हारी जैविक मां नहीं हूं।”

     

    रुद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो फिर?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए कहा,

     

    “मैंने तुम्हें सिर्फ उस रात बचाया था।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो मेरी असली मां कौन है?”

     

    नंदिनी ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी रो रही थीं।

     

    “माधवी ही तुम्हारी मां है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन रुद्र हंस पड़ा।

     

    “अभी कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “अब क्या?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मैं यहां सिर्फ तुम्हें डराने आया हूं?”

     

    उसने अपनी जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी अचानक चौंक गईं।

     

    “ये…”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “पहचानती हो?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “ये मेरे बेटे का था।”

     

    आरव ने लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “मेरे पास भी बिल्कुल ऐसा ही लॉकेट था।”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि ये तुम्हारा था।”

     

    आरव ने लॉकेट अपने हाथ में लिया।

     

    उसके पीछे एक छोटा सा निशान बना था।

     

    ‘A.R.’

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “इसका मतलब?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “आरव राजवंशी।”

     

    रुद्र ने अचानक बंदूक नीचे कर दी।

     

    “मैं तुम्हें मारने नहीं आया।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो?”

     

    “मैं तुम्हें सच बताने आया हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ भी धोखा किया था।”

     

    शेखर ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “रुद्र…”

     

    रुद्र उनकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम चुप रहो।”

     

    “तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं पता।”

     

    “मुझे सब पता है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    रुद्र चिल्लाया,

     

    “तो बताओ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी बहन की मौत… मेरी वजह से नहीं हुई थी।”

     

    रुद्र के चेहरे पर गुस्सा जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “उसकी हत्या विराज ने नहीं की थी।”

     

    विराज ने भी हैरानी से शेखर की तरफ देखा।

     

    “तो किसने?”

     

    शेखर ने कांपते हुए कहा “तुमने खुद।”

     

    रुद्र की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन उस रात तुम नशे में थे।”

     

    रुद्र पीछे हट गया।

     

    “झूठ!”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और तुम्हें सच बताने के लिए मैंने तुम्हारी याददाश्त से जुड़े सारे दस्तावेज छुपाए थे।”

     

    रुद्र का हाथ कांपने लगा।

     

    “नहीं…”

     

    अचानक दूर से पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुलिस आ रही है।”

     

    रुद्र ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं…”

     

    विराज ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

     

    अभय ने मौका देखकर नंदिनी और माधवी को दूसरी तरफ भेज दिया।

     

    आरव ने शेखर को संभाला।

     

    “चलो पापा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरव… लाल फाइल।”

     

    “वो कहां है?”

     

    शेखर ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

     

    “नीलगिरी हवेली… कमरा नंबर 17।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जिंदगी का आखिरी राज।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    तभी रुद्र ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “अगर कमरा नंबर 17 खोला…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा धोखा किसने दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    रुद्र ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां…?”

     

    माधवी कुछ नहीं बोलीं।

     

    आरव की आंखों में शक उतर आया।

     

    और उसी समय…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा… हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर सच ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तो मैं उस सच को ही गलत साबित कर दूंगी।”

     

    दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गए।

     

    पीछे समुद्र की लहरें जोर-जोर से चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    और नीलगिरी हवेली के अंदर…

     

    कमरा नंबर 17 का दरवाजा पहली बार खुलने वाला था।

     

    लेकिन उस कमरे के अंदर क्या था?

     

    एक तस्वीर… एक खून से लिखा खत… और ऐसा राज, जो आरव और आरोही के पूरे रिश्ते को बदलने वाला था।

     

    जारी रहेगा…