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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 18

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 18

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड – 18  मां सामने थी, फिर इतने सालों तक कहां थी?

     

    राजवंशी हवेली के उस कमरे में जैसे वक्त थम गया था।

     

    दरवाजे पर खड़ी उस औरत को देखकर आरव की सांसें रुक गई थीं।

     

    राघव की आंखें नम थीं।

     

    उनके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला “माधवी…”

     

    आरव ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “मां…?”

     

    उस औरत की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “हां बेटा… मैं तुम्हारी मां हूं।”

     

    आरव एक पल के लिए अपनी जगह से हिल ही नहीं पाया।

     

    जिस मां को वह पच्चीस साल पहले मर चुकी समझकर बड़ा हुआ था…

     

    वही मां आज उसके सामने जिंदा खड़ी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “आप… जिंदा थीं?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “तो आपने मुझे ढूंढा क्यों नहीं?”

     

    माधवी के होंठ कांपने लगे।

     

    “मैंने बहुत कोशिश की थी।”

     

    “फिर?”

     

    “मुझे तुम्हारे पास आने नहीं दिया गया।”

     

    आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “किसने?”

     

    माधवी ने पीछे खड़े देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    फिर माधवी ने कबीर की तरफ देखा।

     

    कबीर भी नजरें झुका चुका था।

     

    आरव की आवाज तेज हो गई।

     

    “मां, मुझे सच चाहिए।”

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “जिस रात तुम्हें मुझसे दूर किया गया था… उस रात मुझे बताया गया कि अगर मैंने तुम्हें ढूंढने की कोशिश की तो तुम्हारी जान ले ली जाएगी।”

     

    आरव की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “आपने मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मां अपने बच्चे पर भरोसा नहीं करती बेटा… मां अपने बच्चे की जिंदगी बचाती है।”

     

    आरव अब खुद को रोक नहीं पाया।

     

    वह दौड़कर अपनी मां के गले लग गया।

     

    माधवी ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “मेरा बच्चा…”

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    आरोही कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी।

     

    उसकी आंखें भी नम थीं।

     

    आरव ने इतने सालों बाद अपनी मां को पाया था।

     

    लेकिन आरोही के मन में एक सवाल था अगर आरव की मां जिंदा थीं, तो नंदिनी कहां गई थीं?

     

    कुछ देर बाद आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “मां, मुझे बताया गया था कि आपकी मौत हो गई थी।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो झूठ था।”

     

    “किसने फैलाया?”

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “पापा?”

     

    राघव आगे आए।

     

    “मुझे मजबूर होना पड़ा था।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “आप दोनों ने मिलकर मुझे इतने साल झूठ में रखा?”

     

    राघव की आंखें झुक गईं।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि उस वक्त तुम्हारी जान से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन मैं हर साल अपनी मां की मौत पर रोता रहा।”

     

    माधवी ने उसके चेहरे को छुआ।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “कैसे?”

     

    “क्योंकि मैं दूर से तुम्हें देखती थी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “आपने मुझे देखा था?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “जब तुम स्कूल जाते थे… जब तुम्हारा जन्मदिन होता था… जब तुम पहली बार कॉलेज गए… मैं तुम्हें दूर से देखती थी।”

     

    “फिर मेरे पास क्यों नहीं आईं?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे आसपास हर वक्त निगरानी रहती थी।”

     

    आरव की मुट्ठियां भींच गईं।

     

    “किसकी?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र ने नजरें फेर लीं।

     

    आरव ने देवेंद्र की तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “तुम्हारा इसमें क्या हाथ था?”

     

    देवेंद्र ने शांत स्वर में कहा,

     

    “मैं तुम्हें बचा रहा था।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “मेरी मां को मुझसे दूर रखकर?”

     

    “हां।”

     

    “इसे बचाना कहते हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम उस समय बच्चे थे। तुम्हें नहीं पता था कि तुम्हारे पीछे कितने लोग पड़े थे।”

     

    आरोही ने बीच में कहा,

     

    “और मेरे पीछे?”

     

    देवेंद्र उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हारे पीछे भी।”

     

    “क्यों?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल में जो हुआ था, उसका राज सिर्फ तुम्हारे माता-पिता नहीं जानते थे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो कौन जानता था?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “कबीर के पिता।”

     

    कबीर अचानक बोल पड़ा,

     

    “मेरे पिता उस रात वहां थे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने ये बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो तुम दोनों मुझे छोड़ दोगे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तुम्हें हमें सच बताना चाहिए था।”

     

    कबीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    अद्वैत ने गुस्से में कहा,

     

    “तो तुम जानते थे कि देवेंद्र कौन है?”

     

    “हां।”

     

    “और राघव कौन हैं?”

     

    “हां।”

     

    “और माधवी जिंदा हैं?”

     

    कबीर ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

     

    “हां।”

     

    अद्वैत ने उसे धक्का दे दिया।

     

    “तुमने हम सबके साथ झूठ किया!”

     

    कबीर ने विरोध नहीं किया।

     

    “मुझे जो आदेश मिला था, मैंने वही किया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका आदेश?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे पिता का।”

     

    राघव चौंक गए।

     

    “मेरा?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं कहा था कि आरव और आरोही से सब छुपाओ।”

     

    “आपने नहीं कहा था।”

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “उन्होंने कहा था।”

     

    आरोही ने तुरंत देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “आपने कबीर को हमारे पास क्यों भेजा?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “ताकि तुम दोनों सुरक्षित रहो।”

     

    “लेकिन हमसे इतनी बातें छुपाईं क्यों?”

     

    देवेंद्र ने गंभीर स्वर में कहा,

     

    “क्योंकि तुम दोनों जितना सच जानते, उतना ही खतरा बढ़ता।”

     

    आरोही ने अचानक पूछा,

     

    “मेरी मां नंदिनी का क्या हुआ?”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “नंदिनी आखिरी वक्त तक तुम्हें बचाने की कोशिश करती रही।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “फिर उनकी मौत कैसे हुई?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो मरी नहीं थीं।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “क्या?”

     

    “नंदिनी को भी उसी तरह गायब किया गया था जैसे मुझे।”

     

    “तो वो जिंदा हैं?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन आपने कहा कि वो मरी नहीं थीं।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि मैंने अपनी आंखों से उन्हें आखिरी बार देखा था।”

     

    “कहां?”

     

    “एक पुराने आश्रम में।”

     

    “कब?”

     

    “दस साल पहले।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वहां क्या हुआ?”

     

    माधवी की आंखों में डर उतर आया।

     

    “वहां नंदिनी किसी से मिल रही थीं।”

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा “तुम्हारे असली पिता से।”

     

    आरोही का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “अर्जुन?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन अर्जुन तो मर चुके थे।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “यही तो सवाल है।”

     

    कबीर ने तुरंत पूछा,

     

    “आप कहना क्या चाह रही हैं?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “दस साल पहले मुझे नंदिनी और अर्जुन दोनों दिखाई दिए थे।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मतलब मेरे पिता भी जिंदा थे?”

     

    “उस वक्त तक।”

     

    “फिर?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “माधवी, तुमने मुझे ये कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उसके बाद मैं खुद कैद हो गई थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

     

    “देवेंद्र के पास।”

     

    आरव का गुस्सा बढ़ गया।

     

    “तुमने मेरी मां को कैद करके रखा था?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “मैंने उन्हें कैद नहीं किया था।”

     

    माधवी बोलीं,

     

    “तुमने मुझे जाने नहीं दिया था।”

     

    देवेंद्र चुप हो गया।

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब तुम सब सच बताओ।”

     

    राघव ने अचानक कहा,

     

    “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर देवेंद्र यहां तक पहुंच सकता है, तो बाकी लोग भी पहुंच सकते हैं।”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “लेकिन फाइल?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “फाइल अभी पूरी तरह नहीं मिली है।”

     

    आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    “इसमें तो डेटा है।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “ये सिर्फ पहला हिस्सा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “दूसरा हिस्सा कहां है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नंदिनी के पास।”

     

    आरोही का दिल धड़क उठा।

     

    “अगर नंदिनी जिंदा हैं… तो उनके पास होगा?”

     

    “हां।”

     

    “तो हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “लेकिन उन्हें ढूंढना आसान नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि नंदिनी खुद नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें ढूंढे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “क्यों?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि वो तुम्हें बचाने के लिए खुद को दुनिया से छुपाए हुए हैं।”

     

    सब लोग नीचे जाने की तैयारी कर रहे थे।

     

    आरोही अकेली बालकनी में चली गई।

     

    आरव उसके पीछे आया।

     

    “क्या सोच रही हो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मेरी मां जिंदा हो सकती हैं।”

     

    “हां।”

     

    “मेरे पिता भी शायद जिंदा थे।”

     

    “हां।”

     

    “और तुम…”

     

    वह रुक गई।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मैं?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “किस बात से?”

     

    “कहीं ये सब खत्म होते-होते मैं तुम्हें खो न दूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम मुझे नहीं खोओगी।”

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “अगर हमारे परिवारों का कोई रिश्ता ऐसा निकला जिसकी वजह से हम…”

     

    आरव ने उसकी बात पूरी होने से पहले कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन अगर किस्मत ने हमें अलग कर दिया तो?”

     

    आरव ने धीरे से उसका माथा छूते हुए कहा,

     

    “किस्मत ने बहुत कोशिश कर ली।”

     

    “अब?”

     

    “अब हमारी बारी है।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुरा दी।

     

    “तुम हमेशा इतनी बड़ी-बड़ी बातें क्यों करते हो?”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “क्योंकि तुम छोटी-छोटी बातों पर रोने लगती हो।”

     

    आरोही ने उसे हल्का सा धक्का दिया।

     

    “मैं रोती नहीं हूं।”

     

    “अभी भी आंखों में आंसू हैं।”

     

    “ये खुशी के हैं।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तो इन्हें संभालकर रखना।”

     

    तभी कबीर तेजी से उनके पास आया।

     

    “आरव!”

     

    दोनों ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने फोन आगे किया।

     

    “अभी एक वीडियो आया है।”

     

    आरव ने वीडियो चलाया।

     

    स्क्रीन पर एक अंधेरा कमरा था।

     

    फिर धीरे-धीरे एक महिला कैमरे के सामने आई।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    वही चेहरा…

     

    वही आंखें…

     

    वही मां।

     

    नंदिनी।

     

    वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।

     

    “आरोही… अगर तुम ये वीडियो देख रही हो तो समझ लेना कि मैं जिंदा हूं।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    वीडियो में नंदिनी आगे बोलीं “मैं तुमसे दूर इसलिए रही क्योंकि मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

     

    फिर उन्होंने कैमरे के करीब आकर कहा,

     

    “लेकिन अब समय आ गया है कि तुम अपने जन्म का आखिरी सच जानो।”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    नंदिनी बोलीं “तुम्हारे पिता अर्जुन राजवंशी नहीं थे।”

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव भी स्तब्ध रह गया।

     

    वीडियो में नंदिनी ने कहा “अर्जुन ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह पाला था… लेकिन तुम्हारे असली पिता कोई और हैं।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मेरे असली पिता… कौन हैं?”

     

    तभी फोन पर दूसरा संदेश आया।

     

    सिर्फ एक लाइन “कल सूर्योदय से पहले पुराने शिव मंदिर पहुंचो। वहां तुम्हें अपने पिता मिलेंगे।”

     

    आरव ने संदेश पढ़ा।

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “हम जाएंगे।”

     

    राघव ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं!”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    राघव के चेहरे पर भय था।

     

    “उस मंदिर में मत जाना।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “क्योंकि वही जगह है जहां पच्चीस साल पहले तुम्हारे असली पिता को आखिरी बार देखा गया था।”

     

    और तभी…

     

    बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज सुनाई दी।

     

    एक बार…

     

    फिर दूसरी बार…

     

    फिर तीसरी बार।

     

    देवेंद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये कैसे हो सकता है…?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    देवेंद्र ने कांपते हुए कहा “क्योंकि उस मंदिर की घंटी पच्चीस साल से बंद है।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 17

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 17

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड – 17 : जिससे पापा पच्चीस साल से भाग रहे थे

     

    हवेली की सारी लाइटें जल चुकी थीं।

     

    आरव की नजर सामने खड़े उस आदमी पर जमी हुई थी।

     

    वही आदमी…

     

    जिसे देखकर उसके पिता राघव के चेहरे पर डर और गुस्सा दोनों दिखाई दे रहे थे।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव… ये कौन है?”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    “पापा, आप इसे जानते हैं?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उनकी आवाज गूंज उठी “हां बेटा… बहुत अच्छी तरह जानता हूं।”

     

    सामने खड़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    “इतने साल बाद भी तुमने मुझे नहीं भुलाया, राघव?”

     

    राघव की आंखों में नफरत उतर आई।

     

    “तुम्हें भूलना इतना आसान नहीं है, देवेंद्र।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “देवेंद्र?”

     

    आरोही ने भी उस आदमी को गौर से देखा।

     

    देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आखिर मुझे अपना नाम बताने का मौका मिल ही गया।”

     

    कबीर ने धीरे से अद्वैत से कहा,

     

    “क्या तुम इसे जानते हो?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। लेकिन पापा की डायरी में देवेंद्र नाम कई बार आया था।”

     

    देवेंद्र ने उनकी बात सुन ली।

     

    “समीर की डायरी?”

     

    अद्वैत चौंक गया।

     

    “तुम मेरे पिता को जानते थे?”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मेरे बहुत पुराने साथी थे।”

     

    अद्वैत की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “साथी या दुश्मन?”

     

    देवेंद्र हल्का सा हंसा।

     

    “ये तो तुम्हारे पिता से पूछना चाहिए था।”

     

    राघव सीढ़ियों से नीचे उतर आए।

     

    “देवेंद्र, इतने सालों बाद भी तुम्हें समझ नहीं आया कि मैं तुम्हारे सामने झुकने वाला नहीं हूं।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें झुकाना मेरा मकसद कभी था ही नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “मुझे वो चाहिए जो तुमने छुपाकर रखा है।”

     

    राघव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “वो चीज तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”

     

    देवेंद्र ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “शायद तुम भूल रहे हो कि वो चीज अब तुम्हारे पास नहीं है।”

     

    राघव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “मेरे पास?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    आरव उसके सामने आ गया।

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    देवेंद्र हंस पड़ा।

     

    “यही तो समस्या है, आरव। तुम हमेशा इसके सामने दीवार बनकर खड़े हो जाते हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे बचाना मेरा काम है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में डर के साथ-साथ एक अजीब-सी गर्माहट भी थी।

     

    देवेंद्र ने दोनों को देखते हुए कहा,

     

    “तुम दोनों को बचपन से ही एक-दूसरे के करीब रखा गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    देवेंद्र ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि राघव और नंदिनी जानते थे कि तुम दोनों के मिलने से एक दिन वो राज खुल जाएगा।”

     

    आरोही ने राघव की तरफ देखा।

     

    “क्या ये सच है?”

     

    राघव ने नजरें झुका लीं।

     

    “हां।”

     

    “तो आपने मुझे बचपन से सब क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम बहुत छोटी थीं।”

     

    “मैं बड़ी हो गई हूं।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी मुझसे सच क्यों छुपाया?”

     

    राघव ने दर्द भरी आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन झूठ बोलकर आपने मुझे हर दिन खोया है।”

     

    राघव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    आरव ने आरोही के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “अभी हमें असली सवाल का जवाब चाहिए।”

     

    वह देवेंद्र की तरफ मुड़ा।

     

    “तुम हमारे पीछे क्यों पड़े हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ धोखा किया था।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “धोखा मैंने नहीं दिया था।”

     

    “तो किसने दिया?”

     

    “तुमने खुद अपने परिवार को बेचा था।”

     

    देवेंद्र का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया।

     

    “मैंने जो किया, अपने परिवार को बचाने के लिए किया।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    देवेंद्र ने अचानक बंदूक निकाल ली।

     

    आरोही डरकर पीछे हट गई।

     

    आरव तुरंत उसके सामने आ गया।

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “अगर मुझे मारना होता तो अब तक मार चुका होता।”

     

    फिर उसने बंदूक राघव की तरफ कर दी।

     

    “मुझे सिर्फ फाइल चाहिए।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं है।”

     

    देवेंद्र ने हंसते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पास नहीं है… लेकिन तुम्हारे बेटे के पास है।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव को अचानक अपनी कलाई पर बंधी पुरानी घड़ी याद आई।

     

    वह घड़ी उसे बचपन में उसके पिता ने दी थी।

     

    राघव की नजर घड़ी पर पड़ी।

     

    उनका चेहरा बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    राघव ने धीरे से कहा,

     

    “वो घड़ी मुझे दो।”

     

    आरव ने घड़ी उतारकर उन्हें दे दी।

     

    राघव ने पीछे का छोटा ढक्कन खोला।

     

    अंदर एक बेहद छोटा-सा चिप जैसा टुकड़ा था।

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “वही फाइल।”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “आखिर मिल ही गई।”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    लेकिन तभी अद्वैत ने उस पर हमला कर दिया।

     

    बंदूक जमीन पर गिर गई।

     

    कमरे में अफरा-तफरी मच गई।

     

    देवेंद्र और अद्वैत के बीच हाथापाई शुरू हो गई।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को पीछे किया।

     

    “तुम यहां से बाहर जाओ।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “आरोही!”

     

    “मैं तुम्हें अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी।”

     

    आरव उसकी तरफ देखकर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम कभी मेरी बात मानती भी नहीं हो।”

     

    “कभी-कभी।”

     

    “आज नहीं?”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    अद्वैत देवेंद्र को रोकने की कोशिश कर रहा था।

     

    लेकिन देवेंद्र काफी ताकतवर था।

     

    उसने अद्वैत को धक्का दिया।

     

    अद्वैत जमीन पर गिर पड़ा।

     

    देवेंद्र ने बंदूक उठाई।

     

    “अब बहुत हो गया।”

     

    तभी राघव ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    दोनों में संघर्ष शुरू हो गया।

     

    गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    गोली दीवार में लगी।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    लेकिन उसी वक्त देवेंद्र ने राघव को जोर से धक्का दिया।

     

    राघव नीचे गिर गए।

     

    देवेंद्र ने घड़ी उठाने की कोशिश की।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “इसे हाथ मत लगाना।”

     

    देवेंद्र ने आरव की आंखों में देखा।

     

    “तुम्हें पता भी है इसमें क्या है?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर इसे बचाने की इतनी कोशिश क्यों?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने इसे मुझे सौंपा है।”

     

    देवेंद्र हंसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ नहीं बताया, आरव।”

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हें ये भी नहीं बताया कि तुम्हारी मां की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    आरव जैसे जम गया।

     

    “क्या कहा?”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां को मारा गया था।”

     

    आरव की आंखें लाल हो गईं।

     

    “किसने?”

     

    देवेंद्र ने जवाब देने के बजाय राघव की तरफ देखा।

     

    “पूछो अपने पिता से।”

     

     

    —

     

    राघव की मजबूरी

     

    आरव राघव के पास गया।

     

    “पापा… सच क्या है?”

     

    राघव की आंखों में आंसू थे।

     

    “माधवी को मैंने नहीं मारा।”

     

    “लेकिन किसने?”

     

    राघव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    देवेंद्र हंसा।

     

    “तुम्हें पता है।”

     

    राघव चुप रहे।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पापा, मेरी तरफ देखिए।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मां को किसने मारा?”

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “जिस आदमी पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    राघव ने नजरें उठाईं।

     

    “समीर।”

     

    अद्वैत जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “समीर ने माधवी को नहीं मारा था।”

     

    अद्वैत ने राहत की सांस ली।

     

    “तो?”

     

    राघव बोले,

     

    “लेकिन उसे पता था कि कौन मारने वाला है।”

     

    अद्वैत की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “फिर उसने बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि उसे डर था।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “डर नहीं था, राघव। लालच था।”

     

    अद्वैत ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “तो फिर अपने पिता की डायरी पढ़ लेना।”

     

    कबीर ने आरव की घड़ी अपने लैपटॉप से कनेक्ट की।

     

    “इसमें डेटा है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कुछ वीडियो फाइलें।”

     

    पहली फाइल खुली।

     

    स्क्रीन पर पच्चीस साल पुराना वीडियो चलने लगा।

     

    एक कमरे में अर्जुन, राघव, नंदिनी और समीर बैठे थे।

     

    आरोही ने स्क्रीन देखते ही कहा,

     

    “ये मां हैं।”

     

    वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।

     

    “अगर हमें कुछ हो गया तो बच्चों को बचाना।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हम दोनों बच्चों को अलग-अलग परिवारों में रखेंगे।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “क्योंकि दुश्मन सिर्फ मुझे नहीं ढूंढ रहा। वो दोनों बच्चों को ढूंढ रहा है।”

     

    समीर ने पूछा,

     

    “लेकिन बच्चे क्यों?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि उनके जन्म की रात जो हुआ था… उसका सबूत अस्पताल के रिकॉर्ड में है।”

     

    वीडियो अचानक रुक गया।

     

    दूसरी फाइल अपने आप खुल गई।

     

    इस बार कमरे में सिर्फ नंदिनी थीं।

     

    उनकी आंखों में आंसू थे।

     

    उन्होंने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा “अगर मेरी बेटी ये वीडियो देख रही है तो उसे एक बात जरूर बताना…”

     

    आरोही स्क्रीन के सामने आ गई।

     

    नंदिनी की आवाज कांप रही थी।

     

    “बेटा, तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारे साथ एक और बच्चा है… और उसकी जिंदगी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी हुई है।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    नंदिनी आगे बोलीं “उस बच्चे को कभी छोड़ना मत।”

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “मैं कहीं नहीं जा रहा।”

     

    अचानक देवेंद्र ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम लोग अभी भी नहीं समझे।”

     

    सभी उसकी तरफ देखने लगे।

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “मैं असली दुश्मन नहीं हूं।”

     

    आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “तो कौन है?”

     

    देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वो आदमी जो इस वक्त इस कमरे में खड़ा है।”

     

    सबकी नजरें एक-दूसरे पर घूमने लगीं।

     

    अचानक राघव का चेहरा बदल गया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “नहीं…”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “हां।”

     

    फिर उसने धीरे से उंगली उठाई।

     

    “कबीर।”

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “कबीर?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “तुम पागल हो गए हो?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “कबीर, तुम कुछ कहोगे?”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में वही अस्पताल था।

     

    पीछे एक आदमी खड़ा था।

     

    कबीर ने तस्वीर आरव की तरफ बढ़ाई।

     

    “मुझे लगता है अब तुम्हें खुद समझ जाना चाहिए।”

     

    आरव ने तस्वीर देखी।

     

    उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    क्योंकि तस्वीर में खड़ा आदमी…

     

    कबीर के पिता थे।

     

    और उनके हाथ में वही फाइल थी…

     

    जिसे पाने के लिए पच्चीस साल से इतनी हत्याएं होती आ रही थीं।

     

    आरोही ने कबीर की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें पहले से सब पता था?”

     

    कबीर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो तुम हमारे साथ इतने सालों से क्यों थे?”

     

    कबीर ने जवाब दिया “क्योंकि मैं तुम्हारा दुश्मन बनकर नहीं… तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे पास आया था।”

     

    तभी पीछे से एक और आवाज आई “लेकिन कबीर ने तुमसे एक बात और छुपाई है।”

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर…

     

    एक और शख्स खड़ा था।

     

    और उसे देखते ही राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “माधवी…?”

     

    आरव की सांसें थम गईं।

     

    उसकी मां सामने खड़ी थी।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 16

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 16

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 16 : आरव के असली पिता जिंदा हैं

     

    अंधेरे अस्पताल में गोली की आवाज गूंजते ही आरोही चीख पड़ी।

     

    “मां!”

     

    बूढ़ी नर्स जमीन पर गिर चुकी थी।

     

    आरव तुरंत उसके पास पहुंचा।

     

    “आपको गोली लगी है?”

     

    नर्स ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

     

    “नहीं… गोली मुझे नहीं लगी।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो फिर…?”

     

    नर्स ने कांपते हुए कहा,

     

    “गोली मेरे पास से निकल गई थी।”

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने अभी क्या कहा था?”

     

    नर्स ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे… असली पिता… जिंदा हैं।”

     

    आरव जैसे जम गया।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “आपको पक्का पता है?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “मैंने उन्हें अपनी आंखों से देखा था।”

     

    आरव की आवाज कांपने लगी।

     

    “कहां हैं वो?”

     

    नर्स कुछ बोल पाती, उससे पहले बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा,

     

    “कोई हमारी तरफ आ रहा है।”

     

    अद्वैत ने तुरंत कहा,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    आरव ने नर्स को सहारा दिया।

     

    “पहले इन्हें सुरक्षित जगह ले चलते हैं।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    चारों पीछे के रास्ते से बाहर निकलने लगे।

     

    अंधेरे गलियारे में सिर्फ उनके कदमों की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    आरोही बार-बार पीछे देख रही थी।

     

    “कोई हमारा पीछा तो नहीं कर रहा?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    “लेकिन आरव…”

     

    “कुछ नहीं होगा।”

     

    तभी पीछे से किसी ने गोली चलाई।

     

    धांय!

     

    गोली दीवार से टकराई।

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “तेज चलो!”

     

    वे एक पुराने स्टोर रूम में घुस गए।

     

    कबीर ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

     

    बाहर कुछ लोग उन्हें ढूंढ रहे थे।

     

    “पूरे अस्पताल को छान मारो!”

     

    आरोही की सांसें तेज हो गईं।

     

    आरव ने उसके मुंह पर हाथ रखकर धीरे से कहा,

     

    “आवाज मत करना।”

     

    कुछ सेकंड बाद कदमों की आवाज दूर चली गई।

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि आरव का हाथ अब भी उसके चेहरे के पास था।

     

    दोनों की नजरें मिलीं।

     

    कुछ पल के लिए दोनों उस डरावने माहौल को भूल गए।

     

    आरव ने धीरे से हाथ हटा लिया।

     

    “सॉरी।”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    अद्वैत ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “अगर तुम दोनों का रोमांस खत्म हो गया हो तो बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ लें?”

     

    आरोही झेंप गई।

     

    “चुप करो।”

     

    आरव भी हल्का सा मुस्कुरा दिया।

     

    अस्पताल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने नर्स को एक सुरक्षित जगह पहुंचाया।

     

    नर्स अभी भी कमजोर थीं।

     

    आरव उनके सामने बैठ गया।

     

    “अब मुझे सब सच बताइए।”

     

    नर्स ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे असली पिता का नाम…”

     

    उन्होंने एक लंबी सांस ली।

     

    “राघव राजवंशी।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “राघव राजवंशी?”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या वो अर्जुन राजवंशी के भाई थे?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो मेरे पिता अर्जुन नहीं थे?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर इतने सालों तक मुझे राजवीर का बेटा क्यों माना गया?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “क्योंकि राघव को उस रात मारने की कोशिश की गई थी। तुम्हारी मां भी खतरे में थीं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरी मां कौन थीं?”

     

    नर्स कुछ पल चुप रहीं।

     

    “उनका नाम… माधवी था।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “क्या वो जिंदा हैं?”

     

    नर्स ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे पहली बार अपनी मां का नाम पता चला था।

     

    “उनके साथ क्या हुआ?”

     

    “तुम्हारे जन्म के कुछ महीनों बाद उनकी मौत हो गई।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    आरोही ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे रखा।

     

    नर्स ने कहना शुरू किया,

     

    “राघव बहुत ईमानदार आदमी थे। उन्होंने विराज और उसके साथियों के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “लेकिन फिर उन्हें गायब क्यों होना पड़ा?”

     

    “क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उनके अपने ही लोग उन्हें धोखा दे रहे हैं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    नर्स ने जवाब दिया,

     

    “समीर।”

     

    अद्वैत चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “समीर पूरी तरह गद्दार नहीं था। लेकिन उस समय वह डर गया था।”

     

    अद्वैत की आंखों में दर्द आ गया।

     

    “मेरे पिता ने क्या किया?”

     

    “उन्होंने राघव की लोकेशन दुश्मनों को बता दी थी।”

     

    अद्वैत ने सिर झुका लिया।

     

    “फिर?”

     

    “राघव वहां से बच निकले।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “तो वो अब कहां हैं?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “यही तो मुझे नहीं पता।”

     

    आरव की उम्मीद फिर टूटने लगी।

     

    “आपने कहा था कि वो जिंदा हैं।”

     

    “हां।”

     

    “फिर कहां हैं?”

     

    नर्स ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    उसमें एक छोटी चाबी थी।

     

    “उन्होंने मुझे ये चाबी दी थी।”

     

    आरव ने चाबी ले ली।

     

    “किसकी चाबी है?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “एक लॉकर की।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    नर्स ने एक नाम बताया “सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन।”

     

    अगली सुबह वे सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचे।

     

    पुराना स्टेशन अब लगभग बंद पड़ा था।

     

    लॉकर रूम स्टेशन के एक पुराने हिस्से में था।

     

    चाबी नंबर 117

     

    आरव ने ताला खोला।

     

    अंदर एक बैग रखा था।

     

    बैग में कुछ कपड़े, एक पुरानी डायरी और एक फोटो थी।

     

    आरव ने फोटो उठाई।

     

    उसमें एक आदमी एक छोटी बच्ची को गोद में लिए था।

     

    आरोही ने तस्वीर देखी।

     

    “ये बच्ची…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम हो?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन ये आदमी कौन है?”

     

    फोटो के पीछे लिखा था “राघव और छोटी आरोही।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “मैं इन्हें जानती तक नहीं थी।”

     

    नर्स ने पीछे से कहा,

     

    “तुम बहुत छोटी थीं।”

     

    आरोही ने फोटो को सीने से लगा लिया।

     

    “उन्होंने मुझे गोद में लिया था?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो राघव और आरोही का रिश्ता क्या था?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “राघव तुम्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मैं तो अर्जुन की बेटी थी?”

     

    नर्स ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही तो सबसे बड़ा रहस्य है।”

     

    कबीर ने बैग में रखी डायरी खोली।

     

    पहले कई पन्ने खाली थे।

     

    फिर एक पन्ने पर लिखा था “अगर ये डायरी किसी के हाथ लगे, तो समझ लेना कि मैं अपनी बेटी को बचाने में सफल हो गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “बेटी?”

     

    कबीर ने आगे पढ़ा।

     

    “आरोही मेरी बेटी नहीं है, लेकिन उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “हर कोई मुझे किसी न किसी का बच्चा क्यों बना रहा है?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम किसी की चीज नहीं हो।”

     

    वह उसकी आंखों में देखते हुए बोला,

     

    “तुम खुद अपनी पहचान हो।”

     

    आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    कबीर ने डायरी का अगला पन्ना पढ़ा।

     

    “जिस दिन आरोही और आरव अपने जन्म का सच जानेंगे, उस दिन उन्हें एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश की जाएगी।”

     

    आरव ने चौंककर कहा,

     

    “क्यों?”

     

    अगली लाइन थी “क्योंकि इन दोनों का मिलना उस राज को खोल देगा, जिसे हमने सालों से छुपाकर रखा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सा राज?”

     

    अगले पन्ने पर सिर्फ एक नक्शा था।

     

    नक्शे में एक जगह लाल निशान लगा था।

     

    “राजवंशी हवेली।”

     

    तभी आरव के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

     

    “अगर अपने पिता को देखना चाहते हो, तो आज रात 10 बजे अकेले राजवंशी हवेली आना।”

     

    आरव ने मैसेज पढ़कर फोन बंद कर दिया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसका मैसेज है?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुमने वादा किया था।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    उसने फोन आरोही को दे दिया।

     

    आरोही ने मैसेज पढ़ा।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    “लेकिन उन्होंने साफ लिखा है “मुझे परवाह नहीं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर मेरे पिता सच में जिंदा हैं तो?”

     

    “तो मैं भी चलूंगी।”

     

    “आरोही, ये खतरनाक हो सकता है।”

     

    “तुम्हारी जिंदगी खतरे में होगी और मैं घर पर बैठी रहूंगी?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुमने कहा था ना… हम साथ हैं।”

     

    आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “हां। साथ हैं।”

     

    रात के ठीक दस बजे आरव, आरोही, कबीर और अद्वैत राजवंशी हवेली पहुंचे।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

     

    आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “यहां कोई है।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मुझे भी ऐसा लग रहा है।”

     

    वे अंदर गए।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    “ये लॉक हो चुका है।”

     

    अचानक सामने लगी बड़ी स्क्रीन जल उठी।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    दाढ़ी बढ़ी हुई…

     

    चेहरा थोड़ा बूढ़ा…

     

    लेकिन आंखें बिल्कुल जिंदा।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “पापा…?”

     

    स्क्रीन पर मौजूद आदमी ने कहा “आरव…”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “पापा!”

     

    आरोही ने भी स्क्रीन की तरफ देखा।

     

    वो आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें देखकर अच्छा लगा, बेटा।”

     

    आरव की आवाज कांप रही थी।

     

    “आप जिंदा हैं?”

     

    उस आदमी ने कहा “हां।”

     

    “आप इतने साल कहां थे?”

     

    “तुम्हें बचाने के लिए छुपा हुआ था।”

     

    आरव रो पड़ा।

     

    “आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

     

    राघव की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हारे पास रहता… तो तुम भी मारे जाते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरी मां?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहे।

     

    “माधवी…”

     

    उनकी आवाज टूट गई।

     

    “मैं उसे बचा नहीं पाया।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    तभी राघव ने आरोही को देखा।

     

    उनकी आंखों में अजीब-सी चमक आ गई।

     

    “और तुम…”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “मैं आरोही हूं।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    “आप मुझे कैसे जानते हैं?”

     

    राघव ने जवाब दिया “क्योंकि तुम्हें तुम्हारी मां की गोद से मैंने ही उठाया था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “तो मेरी मां नंदिनी…”

     

    राघव ने कहा,

     

    “नंदिनी ने तुम्हें मुझे सौंपा था।”

     

    “क्यों?”

     

    राघव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “क्योंकि उसे पता था कि जिस इंसान से हम बच रहे हैं… वो तुम्हारे जन्म से पहले ही हमारे परिवार में घुस चुका था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    राघव ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनका चेहरा अचानक डर से भर गया।

     

    “वो अभी भी तुम्हारे आसपास है।”

     

    तभी पीछे से किसी ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    स्क्रीन टूटकर बंद हो गई।

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने उसे अपनी बांहों में खींच लिया।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “कोई हमारे साथ अंदर है!”

     

    अद्वैत ने बंदूक उठाई।

     

    “किधर?”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी की आवाज आई “राघव को ढूंढने की जरूरत नहीं है…”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों पर एक परछाईं खड़ी थी।

     

    आवाज फिर आई “क्योंकि अब वो खुद तुम्हारे पास आने वाला है।”

     

    और अगले ही पल…

     

    हवेली की सारी लाइटें जल उठीं।

     

    सामने खड़ा आदमी देखकर आरव और आरोही दोनों के होश उड़ गए।

     

    क्योंकि वो आदमी राघव के बिल्कुल सामने खड़ा था… और दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    आरव ने अविश्वास से कहा “पापा… आप इसे जानते हैं?”

     

    राघव ने गंभीर आवाज में जवाब दिया “हां बेटा… यही वो आदमी है, जिससे मैं पिछले पच्चीस साल से भाग रहा हूं।”

     

    जारी रहेगा…

  • ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 15

    ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 15

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 15 : एक ही रात, दो बच्चे और एक अधूरा सच

     

    हवेली के उस बंद कमरे में अचानक जैसे सांसें थम गई थीं।

     

    आरव के हाथ में वह तस्वीर थी, जिसमें दो नवजात बच्चे एक साथ दिखाई दे रहे थे।

     

    एक बच्ची…

     

    और एक बच्चा।

     

    तस्वीर के पीछे साफ लिखा था “इन दोनों को कभी एक-दूसरे से दूर मत होने देना।”

     

    और नीचे दो नाम थे आरोही

    आरव

     

    आरव की उंगलियां कांपने लगीं।

     

    उसने तस्वीर को दोबारा देखा।

     

    फिर आरोही की तरफ।

     

    “ये… कैसे हो सकता है?”

     

    आरोही की आंखों में भी आंसू थे।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कबीर ने तस्वीर उसके हाथ से लेकर ध्यान से देखी।

     

    “तस्वीर पुरानी है। कागज भी कम से कम पच्चीस साल पुराना लग रहा है।”

     

    अद्वैत ने धीरे से कहा,

     

    “इसका मतलब तुम दोनों का रिश्ता सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की दोस्ती तक सीमित नहीं था।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो क्या मतलब है इसका?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “शायद तुम दोनों के जन्म के पीछे कोई बहुत बड़ा राज है।”

     

    आरोही ने तुरंत डायरी उठाई।

     

    “हमें पूरी डायरी पढ़नी होगी।”

     

    आरोही ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

     

    लिखा था “मेरी प्यारी बेटी आरोही, अगर कभी ये डायरी तुम्हारे हाथ लगे तो समझना कि तुम्हारे आसपास के लोग तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं बताएंगे।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह आगे पढ़ने लगी।

     

    “तुम्हारा जन्म एक साधारण रात नहीं था। उसी रात अस्पताल में दो बच्चों का जन्म हुआ था। एक तुम थीं और दूसरा राजवीर का बेटा आरव।”

     

    आरव अचानक पीछे हट गया।

     

    “लेकिन मेरे पिता ने हमेशा कहा था कि मैं उनके इकलौते बच्चे था।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या तुम्हारी मां को तुम्हारे जन्म की तारीख याद है?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “हां।”

     

    उसने अपना फोन निकाला।

     

    “मेरा जन्म भी उसी तारीख को हुआ था।”

     

    आरोही ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “तो हम दोनों…”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “एक ही रात पैदा हुए थे।”

     

    डायरी में आगे लिखा था “उन दोनों बच्चों को अलग रखना जरूरी था, क्योंकि विराज और उसके पीछे छिपे लोग दोनों बच्चों को ढूंढ रहे थे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “दोनों को क्यों?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि शायद हम दोनों के परिवारों से जुड़ा कोई सबूत हमारे जन्म से जुड़ा था।”

     

    कबीर ने डायरी का पन्ना पलटा।

     

    अगली लाइन देखकर उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “असली रहस्य बच्चों में नहीं, उनके जन्म प्रमाणपत्र में छुपाया गया है।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “जन्म प्रमाणपत्र?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “अगर वो मिल जाए तो शायद हमें पता चल जाएगा कि हमारे साथ बचपन में क्या हुआ था।”

     

    आरोही ने डायरी के अगले पन्ने पलटे।

     

    एक जगह अस्पताल का नाम लिखा था।

     

    “सूर्या नर्सिंग होम।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “वही अस्पताल जहां नंदिनी ने तुम्हें जन्म दिया था?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “मां ने हमेशा कहा था कि मेरा जन्म शहर के सरकारी अस्पताल में हुआ था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तो ये भी झूठ था।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “मेरी जिंदगी में कितने झूठ हैं?”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “सच मिलने तक हमें हर झूठ के पीछे जाना होगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम मेरे साथ रहोगे?”

     

    “जब तक तुम चाहोगी।”

     

    “और उसके बाद?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “उसके बाद भी।”

     

    आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन तभी अद्वैत ने कहा,

     

    “हमें अस्पताल जाना होगा।”

     

    दोपहर तक वे सभी पुराने अस्पताल पहुंच गए।

     

    अस्पताल अब बंद हो चुका था।

     

    इमारत जर्जर थी।

     

    दीवारों पर पुरानी पेंट की परतें उखड़ रही थीं।

     

    कबीर ने पुराने रिकॉर्ड रूम का दरवाजा खोला।

     

    “यहां कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।”

     

    उन्होंने पुराने रजिस्टर खंगालने शुरू किए।

     

    करीब आधे घंटे बाद आरोही को एक मोटी फाइल मिली।

     

    उस पर लिखा था “जन्म रिकॉर्ड – 2002”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने फाइल खोली।

     

    एक पन्ने पर नाम था नंदिनी राजवंशी – बेटी।

     

    नाम देखकर आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “यही मेरी मां हैं।”

     

    उसके नीचे बच्चे का नाम था आरोही।

     

    लेकिन पिता के नाम वाली जगह खाली थी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “यहां पिता का नाम क्यों नहीं है?”

     

    कबीर ने पन्ना पलटा।

     

    अगले रिकॉर्ड में एक लड़के का नाम था।

     

    आरव सिंह।

     

    पिता राजवीर सिंह।

     

    मां अनामिका सिंह।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “अनामिका?”

     

    “मेरी मां का नाम तो सिया था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तो यहां भी रिकॉर्ड बदला गया है।”

     

    अद्वैत ने दोनों रिकॉर्ड देखे।

     

    “लेकिन असली सवाल ये है कि दोनों रिकॉर्ड एक ही रजिस्टर में क्यों हैं।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई “क्योंकि दोनों बच्चों का जन्म एक ही कमरे में हुआ था।”

     

    चारों पलटकर देखने लगे।

     

    दरवाजे पर एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में पुरानी चाबियों का गुच्छा था।

     

    “आप कौन हैं?” आरव ने पूछा।

     

    महिला ने कहा,

     

    “मैं इस अस्पताल की आखिरी नर्स हूं।”

     

    आरोही उसके पास गई।

     

    “क्या आप मुझे जानती हैं?”

     

    महिला ने उसे गौर से देखा।

     

    फिर उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम… नंदिनी की बेटी हो।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “आप मेरी मां को जानती थीं?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    “मेरे जन्म के समय क्या हुआ था?”

     

    बूढ़ी नर्स कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली “उस रात तुम्हारी मां ने तुम्हें जन्म दिया था।”

     

    “और आरव?”

     

    “उसी समय दूसरे कमरे में राजवीर का बेटा पैदा हुआ था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर दोनों को अलग क्यों किया गया?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “क्योंकि उस रात अस्पताल में कोई ऐसा आदमी मौजूद था, जो दोनों बच्चों को मारना चाहता था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “मैं उसका चेहरा नहीं जानती थी।”

     

    “लेकिन?”

     

    “उसकी आवाज आज भी याद है।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “क्या कहा था उसने?”

     

    नर्स की आंखों में डर आ गया।

     

    “उसने कहा था…”

     

    वह रुक गई।

     

    “बोलिए।”

     

    नर्स ने धीमे से कहा “दोनों बच्चों को खत्म कर दो। बड़े होकर ये दोनों सब कुछ बर्बाद कर देंगे।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “लेकिन आप दोनों को बचा पाईं?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “नंदिनी ने मुझे तुम्हें बचाने के लिए कहा था।”

     

    “और आरव?”

     

    “राजवीर ने उसे मेरे भरोसे छोड़ दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो फिर हमें अलग क्यों किया गया?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “क्योंकि हम दोनों बच्चों को एक साथ नहीं रख सकते थे।”

     

    “कहां ले गए थे मुझे?”

     

    नर्स ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें एक महिला के पास भेजा गया था।”

     

    आरोही का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी मां?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “वो तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं थीं।”

     

    “लेकिन जिन्होंने मुझे पाला…”

     

    “हां। उन्हें नंदिनी ने चुना था।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “और आरव?”

     

    नर्स ने आरव की तरफ देखा।

     

    “उसे भी उसी रात अस्पताल से बाहर ले जाया गया था।”

     

    “कहां?”

     

    नर्स ने एक नाम लिया “सिंघानिया हवेली।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “सिंघानिया?”

     

    “हां।”

     

    कबीर ने तुरंत पूछा,

     

    “लेकिन आरव का परिवार तो सिंह परिवार है।”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “रिकॉर्ड में बहुत कुछ बदला गया था।”

     

    आरव के चेहरे पर बेचैनी थी।

     

    “तो क्या मेरा नाम भी बदला गया?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “मेरा असली नाम क्या था?”

     

    नर्स ने जवाब देने से पहले डायरी का एक पुराना पन्ना निकाला।

     

    उस पर लिखा था “बच्चा – आरव राजवंशी।”

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “राजवंशी?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब…”

     

    अद्वैत ने धीरे से कहा,

     

    “तुम दोनों एक ही परिवार से जुड़े हो।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उसने नर्स की तरफ देखा।

     

    “मुझे पूरी सच्चाई चाहिए।”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “आरव, तुम राजवीर के बेटे थे… लेकिन राजवीर तुम्हारे जन्मदाता पिता नहीं थे।”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो मेरे असली पिता कौन थे?”

     

    नर्स ने धीरे से कहा “अर्जुन राजवंशी।”

     

    आरोही ने जैसे सांस लेना भूल गई।

     

    “अर्जुन… मेरे पिता?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    दोनों के चेहरे पर एक ही सवाल था।

     

    अगर दोनों के पिता एक ही थे…

     

    तो उनका रिश्ता क्या था?

     

    आरव ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “क्या आरोही और मैं… भाई-बहन हैं?”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरव ने तुरंत नर्स की तरफ देखा।

     

    “जवाब दीजिए!”

     

    नर्स ने कुछ नहीं कहा।

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “रुको। हो सकता है मामला इतना सीधा न हो।”

     

    नर्स ने आखिरकार सिर उठाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो फिर?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “अर्जुन राजवंशी तुम्हारे पिता थे, आरोही। लेकिन आरव…”

     

    वह रुक गई।

     

    “आरव का रिश्ता अर्जुन से खून का नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो फिर मेरा पिता कौन था?”

     

    नर्स ने धीरे से कहा “ये राजवीर खुद भी नहीं जानता था।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “क्या?”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “तुम्हें राजवीर ने अपना बेटा मानकर पाला। लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड बदल दिया गया था।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नर्स ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जिसने उस रात दोनों बच्चों को बदल दिया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “बच्चे बदल दिए थे?”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “तो क्या मैं…”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “तुम्हें तुम्हारी मां के पास ही भेजा गया था।”

     

    “और आरव?”

     

    नर्स ने आंखें झुका लीं।

     

    “आरव को किसी और बच्चे की जगह रखा गया था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “किस बच्चे की?”

     

    नर्स ने कहा “विराज सूद के बेटे की।”

     

    कमरे में जैसे बिजली गिर गई।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “क्या?”

     

    अद्वैत भी स्तब्ध था।

     

    “इसका मतलब…”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरव ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “मैं… विराज सूद का बेटा था?”

     

    “नहीं।”

     

    नर्स ने तुरंत कहा।

     

    “तुम्हें उसके बेटे की जगह रखा गया था।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तो मेरा असली परिवार कौन था?”

     

    नर्स ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “इसमें तुम्हारे जन्म का असली रिकॉर्ड है।”

     

    आरव ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    एक आदमी और एक महिला।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था “आरव, तुम्हारे असली माता-पिता।”

     

    आरव ने तस्वीर देखते ही सांस रोक ली।

     

    आरोही ने भी तस्वीर देखी।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “ये…”

     

    आरव ने धीमे से पूछा,

     

    “तुम इन्हें जानती हो?”

     

    आरोही ने कांपते हुए कहा “हां।”

     

    “कौन हैं?”

     

    आरोही ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

     

    “ये वही लोग हैं… जिनकी तस्वीर मैंने बचपन में मां के पुराने कमरे में देखी थी।”

     

    नर्स ने कहा,

     

    “अब तुम्हें समझ आया?”

     

    आरव ने धीरे से सिर उठाया।

     

    “मेरे असली माता-पिता कौन हैं?”

     

    नर्स ने जवाब देने के बजाय अस्पताल के पुराने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “उनका नाम बताने से पहले हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    नर्स के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    “क्योंकि वो लोग हमें ढूंढते हुए यहां पहुंच चुके हैं।”

     

    उसी समय बाहर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “बहुत सारी गाड़ियां हैं।”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “हमें निकलना होगा।”

     

    आरव ने नर्स का हाथ पकड़ा।

     

    “आप हमारे साथ चलेंगी।”

     

    नर्स ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    वे बाहर निकलने ही वाले थे कि अचानक बिजली चली गई।

     

    पूरा अस्पताल अंधेरे में डूब गया।

     

    फिर बाहर से एक आवाज गूंजी “आरव! आरोही! तुम दोनों जहां हो, वहीं रुक जाओ।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “डरो मत।”

     

    लेकिन तभी अंधेरे में किसी ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    नर्स जमीन पर गिर पड़ी।

     

    आरोही चीख उठी “मां!”

     

    लेकिन नर्स ने गिरते-गिरते सिर्फ एक बात कही “आरव… तुम्हारे असली पिता जिंदा हैं…”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    और अगले ही पल नर्स बेहोश हो गई।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 14

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 14

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 14 : मेरे खून में छुपा राज

     

    आरोही के हाथ से वह कागज नीचे गिर चुका था।

     

    उसकी आंखें सामने खड़े अपने चाचा पर टिकी थीं।

     

    कुछ पल तक उसके मुंह से कोई शब्द ही नहीं निकला।

     

    फिर उसने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपने… क्या कहा?”

     

    चाचा ने शांत स्वर में दोहराया,

     

    “तुम विनय मेहरा की बेटी नहीं हो।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “झूठ…”

     

    उसने सिर हिलाया।

     

    “ये झूठ है।”

     

    आरव तुरंत उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “आरोही, उसकी बातों पर भरोसा मत करो।”

     

    चाचा हंस पड़ा।

     

    “तुम हमेशा इसकी रक्षा करते रहे हो, आरव। लेकिन आज सच से इसकी रक्षा नहीं कर पाओगे।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “चुप रहिए!”

     

    “क्यों? डर लग रहा है कि कहीं तुम्हारा प्यार भी झूठ न निकल जाए?”

     

    आरोही ने तुरंत आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी तरफ देखो। चाहे कुछ भी हो, तुम मेरे लिए वही हो।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन अगर मैं वो नहीं हूं जो मैं समझती रही?”

     

    आरव ने बिना एक पल गंवाए कहा,

     

    “तो भी तुम आरोही हो। मेरे लिए इतना ही काफी है।”

     

    आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

     

    “मां… सच क्या है?”

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    उन्होंने काफी देर तक कुछ नहीं कहा।

     

    फिर धीरे से बोलीं,

     

    “तुम्हारे चाचा सच बोल रहे हैं।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “क्या?”

     

    “तुम विनय की जन्म देने वाली बेटी नहीं थीं।”

     

    “तो मेरे पिता कौन थे?”

     

    मां ने कांपते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे असली पिता का नाम…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “कौन?”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “अर्जुन राजवंशी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “अर्जुन राजवंशी?”

     

    चाचा मुस्कुराया।

     

    “अब समझ आया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अर्जुन राजवंशी कौन था?”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “वो आदमी जिसने दस साल पहले विराज सूद के पूरे नेटवर्क को खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और मेरी मां?”

     

    मां ने कहा,

     

    “मैं अर्जुन की पत्नी थी।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो नंदिनी कौन थीं?”

     

    मां चुप रहीं।

     

    चाचा ने जवाब दिया,

     

    “नंदिनी तुम्हारी असली मां थीं।”

     

    आरोही ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन आपने अभी कहा कि मेरे पिता अर्जुन राजवंशी थे!”

     

    “हां।”

     

    “तो नंदिनी और अर्जुन…?”

     

    “पति-पत्नी थे।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “फिर पापा?”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “विनय मेहरा ने तुम्हें अपनी बेटी बनाकर इसलिए पाला क्योंकि अर्जुन और नंदिनी दोनों की मौत के बाद तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    आरोही का दिल टूट रहा था।

     

    “तो विनय मेरे पिता नहीं थे?”

     

    मां ने तुरंत कहा,

     

    “जन्म देने वाले नहीं… लेकिन तुम्हारे पिता से कम भी नहीं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “उन्होंने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया।”

     

    “क्योंकि वो तुमसे बहुत प्यार करते थे।”

     

    आरव अब तक चुप था।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब बेचैनी थी।

     

    उसने पूछा,

     

    “अगर आरोही अर्जुन राजवंशी की बेटी है… तो उसे मारने की इतनी कोशिश क्यों हुई?”

     

    चाचा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अर्जुन के पास एक ऐसी चीज थी, जो अगर दुनिया के सामने आ जाती तो कई बड़े लोगों का साम्राज्य खत्म हो जाता।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “क्या चीज?”

     

    “एक रिकॉर्ड।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “किसका?”

     

    चाचा ने जवाब दिया,

     

    “उन सभी लोगों का, जिन्होंने मिलकर गैरकानूनी कारोबार चलाया था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वो रिकॉर्ड कहां है?”

     

    चाचा मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुमसे जानना है।”

     

    आरव तुरंत उसके सामने आ गया।

     

    “तुम्हें लगता है आरोही को कुछ पता है?”

     

    “उसे नहीं।”

     

    चाचा ने आरव की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “लेकिन उसके पास वो चीज है।”

     

    आरोही ने अपने गले में पड़े लॉकेट को छुआ।

     

    अचानक उसे याद आया कि नंदिनी के लॉकर से मिला लॉकेट अब उसके गले में था।

     

    “ये?”

     

    चाचा की नजर लॉकेट पर टिक गई।

     

    “हां।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “इस लॉकेट में क्या है?”

     

    चाचा बोला,

     

    “तुम्हें खुद नहीं पता।”

     

     

    कबीर ने लॉकेट को ध्यान से देखा।

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर पहले की तरह नंदिनी की छोटी तस्वीर थी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक बेहद छोटा-सा नंबर दिखाई दिया।

     

    A-27-09.

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये कोई कोड है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम इसे डिकोड कर सकते हो?”

     

    “कोशिश कर सकता हूं।”

     

    चाचा ने अचानक कहा,

     

    “तुम्हें पता भी है कि तुम किस चीज से खेल रहे हो?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जो भी है, अब हम उसे खत्म करके रहेंगे।”

     

    चाचा हंस पड़ा।

     

    “तुम्हें लगता है ये सिर्फ एक पुरानी फाइल का मामला है?”

     

    वह आरोही की तरफ देखकर बोला,

     

    “तुम्हारी असली मां की मौत इसी कोड की वजह से हुई थी।”

     

    आरोही का चेहरा बदल गया।

     

    “नंदिनी मां की मौत…?”

     

    “हां।”

     

    “क्या उन्होंने इसे छुपाया था?”

     

    “उन्होंने इसे तुम्हारे पास छोड़ दिया था।”

     

    “मेरे पास?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मुझे तो कुछ पता ही नहीं।”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हें बचपन में ही भूलने के लिए मजबूर कर दिया गया था।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “किसने?”

     

    चाचा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हां।”

     

    आरोही अचानक सिर पकड़कर बैठ गई।

     

    उसके दिमाग में कुछ धुंधली तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक बड़ा कमरा…

     

    एक महिला रो रही थी…

     

    एक आदमी उसे गोद में लेकर भाग रहा था…

     

    और एक छोटी बच्ची लगातार कह रही थी “मुझे मां के पास जाना है।”

     

    आरोही ने आंखें खोल दीं।

     

    “मुझे कुछ याद आ रहा है।”

     

    आरव उसके पास बैठ गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने… नंदिनी मां को देखा था।”

     

    मां ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें याद है?”

     

    आरोही ने आंखें बंद कीं।

     

    “बहुत थोड़ा।”

     

    “वो मुझे गोद में लेकर रो रही थीं।”

     

    फिर उसने अपने सिर पर हाथ रखा।

     

    “और एक आदमी…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    आरोही की सांस तेज हो गई।

     

    “वो आदमी… जिसने मुझे उनसे दूर किया था।”

     

    चाचा का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “तुम्हें उसका चेहरा याद है?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    फिर कुछ पल बाद उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन… उसकी आवाज याद है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या कह रहा था?”

     

    आरोही ने कांपते हुए कहा,

     

    “वो कह रहा था…”

     

    उसकी आवाज अचानक धीमी हो गई।

     

    “अगर बच्ची जिंदा रही, तो सब बर्बाद हो जाएगा।”

     

    कमरे में मौजूद सभी लोग चुप हो गए।

     

    अद्वैत ने अचानक कहा,

     

    “मेरे पास एक और रिकॉर्डिंग है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मेरे पिता की।”

     

    उसने फोन में एक ऑडियो फाइल खोली।

     

    आवाज आई “अर्जुन की बेटी को बचाना जरूरी है। अगर वो जिंदा रही तो एक दिन सच सामने आएगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    फिर रिकॉर्डिंग में एक दूसरी आवाज सुनाई दी।

     

    सिर्फ दो शब्द “उसे खत्म करो।”

     

    आरोही कांप गई।

     

    “ये आवाज…”

     

    उसने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने ये आवाज पहले सुनी है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “मेरे सपने में।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    आरव ने चाचा की तरफ देखा।

     

    “अब सब सच बताइए।”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तो बंदूक लेकर यहां क्यों आए?”

     

    “क्योंकि मुझे पता था कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे।”

     

    “और मेरी मां को?”

     

    “उन्हें सिर्फ इसलिए लाया ताकि वो तुम्हें यहां तक ला सकें।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आपने मां को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया?”

     

    चाचा की आंखों में दर्द आ गया।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने भी कभी मुझे बचाया था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपका उनसे क्या रिश्ता है?”

     

    चाचा ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह बस इतना बोला “कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते।”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अब तुम्हें एक और सच जानना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद… उन्होंने तुम्हारे नाम पर एक संपत्ति छोड़ी थी।”

     

    “कौन-सी?”

     

    “एक पुरानी हवेली।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कहां?”

     

    चाचा ने एक पता बताया।

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “ये वही हवेली है… जिसे मेरे पिता ने कभी बेचने से मना किया था।”

     

    “हां।”

     

    “वहां क्या है?”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “अर्जुन राजवंशी की आखिरी डायरी।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “मेरे पिता की?”

     

    “हां।”

     

    “और उसमें?”

     

    चाचा ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “उस आदमी का नाम है जिसने नंदिनी, अर्जुन, विनय और राजवीर… चारों की जिंदगी बर्बाद की।”

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    आरव ने फैसला किया कि सुबह होते ही वे हवेली जाएंगे।

     

    लेकिन आरोही को नींद नहीं आ रही थी।

     

    वह घर की छत पर खड़ी आसमान देख रही थी।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “सोई नहीं?”

     

    “नहीं।”

     

    “बहुत कुछ बदल गया ना?”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “मेरी पूरी पहचान बदल गई।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हारी पहचान नहीं बदली।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम अभी भी वही आरोही हो, जिसे मैं बचपन से जानता हूं।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर मैं किसी और की बेटी हूं तो?”

     

    “तो क्या हुआ?”

     

    “तुम्हारे परिवार वाले मुझे स्वीकार करेंगे?”

     

    आरव ने बिना सोचे कहा,

     

    “मुझे अपने परिवार से ज्यादा तुम्हारी जरूरत है।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम इतना प्यार कैसे कर लेते हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “शायद ये भी हमारे माता-पिता की साजिश है।”

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    “कैसी साजिश?”

     

    “उन्होंने बचपन में ही तय कर दिया था कि तुम मुझे परेशान करोगी।”

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर तुम भी कम नहीं थे।”

     

    दोनों हंसने लगे।

     

    लेकिन अगले ही पल आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात का वादा करो।”

     

    “क्या?”

     

    “जो भी सच सामने आए… तुम मेरा हाथ नहीं छोड़ोगी।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम भी मेरा हाथ मत छोड़ना।”

     

    “कभी नहीं।”

     

    अगली सुबह आरव, आरोही, कबीर और अद्वैत पुरानी हवेली पहुंचे।

     

    हवेली सालों से बंद थी।

     

    दरवाजा खोलते ही धूल की मोटी परत हवा में उड़ने लगी।

     

    दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    आरव एक तस्वीर के सामने रुक गया।

     

    उसमें उसके पिता, विनय, नंदिनी और अर्जुन साथ खड़े थे।

     

    आरोही तस्वीर को देखकर भावुक हो गई।

     

    “मेरी मां…”

     

    तभी कबीर ने कहा,

     

    “यहां कुछ अजीब है।”

     

    दीवार के नीचे एक निशान था।

     

    A-27-09

     

    वही कोड।

     

    आरव ने दीवार को दबाया।

     

    एक छिपा हुआ दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    बीच में एक मेज।

     

    मेज पर एक डायरी रखी थी।

     

    आरोही ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही के लिए।”

     

    उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “आरोही मेरी बेटी है… लेकिन उसका जन्म जिस रात हुआ, उस रात एक और बच्चा भी पैदा

    हुआ था।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “एक और बच्चा?”

     

    आरोही ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहां लिखा था “और उस बच्चे का संबंध आज तुम्हारी जिंदगी से है।”

     

    आरोही ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसकी नजर आरव पर गई।

     

    आरव भी उसे देख रहा था।

     

    दोनों के दिल में एक ही सवाल उठा वो दूसरा बच्चा कौन था?

     

    तभी डायरी के आखिरी पन्ने से एक तस्वीर नीचे गिरी।

     

    तस्वीर में दो नवजात बच्चे थे।

     

    एक बच्ची…

     

    और एक बच्चा।

     

    पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “इन दोनों को कभी एक-दूसरे से दूर मत होने देना।”

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे नाम पर पड़ी।

     

    उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

     

    क्योंकि उस बच्चे का नाम था “आरव।”

     

    जारी रहेगा…

     

     

  • सुनसान रास्ता..(part-6)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव और कबीर जंगल से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए।

     

    सुबह होने वाली थी।

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    उसने कबीर को गले लगा लिया।

     

    लेकिन कबीर बिल्कुल चुप था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने सड़क के किनारे लगे बोर्ड की तरफ इशारा किया।

     

    वहां फिर वही शब्द लिखे थे—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    आरव ने डरते हुए कहा—

     

    “अब तो हम बाहर आ गए हैं।”

     

    कबीर ने धीरे से उसकी तरफ देखा और कहा—

     

    “हम दोनों नहीं आए हैं।”

     

    आरव ने उसकी बात का मतलब नहीं समझा।

     

    तभी सड़क पर एक ट्रक आया और उसकी हेडलाइट की रोशनी दोनों पर पड़ी।

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    कबीर की परछाई वहां थी।

     

    लेकिन आरव की परछाई…

     

    नहीं थी।

     

    उसका दिल बैठ गया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    वही गीले पैरों की आवाज।

     

    कबीर ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “भैया… जो भी हो, पीछे मत देखना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कान के पास वही आवाज आई—

     

    “बहुत अच्छा… तुमने पीछे नहीं देखा।”

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब कोई और देख चुका है।”

     

    आरव ने धीरे से सामने देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह उनकी तरफ देख रहा था।

     

    उस आदमी ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    और उसी पल उसकी परछाई जमीन से गायब हो गई।

     

    आरव समझ गया…

     

    ये कहानी खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसी समय उसकी जेब में रखा मोबाइल अपने आप बजने लगा।

     

    स्क्रीन पर एक मैसेज था—

     

    “अगला नंबर तुम्हारा नहीं… उस आदमी का है।”

     

    और नीचे लिखा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    End

  • सुनसान रास्ता..(part-5)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कंधे पर रखा हाथ धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा था।

     

    कबीर सामने खड़ा चिल्लाया—

     

    “भैया! पीछे मत देखना!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कबीर, ये औरत कौन है?”

     

    कबीर ने जवाब दिया—

     

    “ये कोई औरत नहीं है।”

     

    आरव की सांस अटक गई।

     

    कबीर बोला—

     

    “ये उस मकान की रखवाली करने वाली आत्मा है। जो भी इंसान इसे पीछे मुड़कर देखता है, उसकी परछाई उससे अलग हो जाती है।”

     

    आरव ने नीचे जमीन की तरफ देखा।

     

    उसकी अपनी परछाई वहां नहीं थी।

     

    वह गायब हो चुकी थी।

     

    तभी पीछे खड़ी चीज ने हंसते हुए कहा—

     

    “अब तुम मेरे हो।”

     

    आरव ने अचानक जेब से मोबाइल निकाला और कैमरा ऑन कर दिया।

     

    मोबाइल की स्क्रीन में उसने देखा…

     

    उसके पीछे कोई बूढ़ी औरत नहीं थी।

     

    बल्कि एक बहुत लंबी, काली आकृति खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

     

    आरव ने हिम्मत करके आंखें बंद कीं और कबीर की तरफ दौड़ पड़ा।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों मकान से बाहर भागने लगे।

     

    जैसे ही वे दरवाजे से बाहर निकले, पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी—

     

    “आरव… तुम जा सकते हो, लेकिन अपनी परछाई यहीं छोड़कर!”

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    उसकी परछाई अब भी मकान के अंदर खड़ी थी।

     

    और वह…

     

    उसे हाथ हिला रही थी।

  • सुनसान रास्ता..(part-4)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव सीढ़ियों के पास खड़ा कांप रहा था।

     

    अचानक ऊपर से एक पुरानी गेंद नीचे आकर उसके पैरों से टकराई।

     

    गेंद पर लाल रंग से लिखा था—

     

    “आरव भैया।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    यह वही गेंद थी जो उसने अपने छोटे भाई कबीर को दस साल पहले दी थी।

     

    तभी ऊपर से बच्चे की आवाज आई—

     

    “भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों भाग गए थे?”

     

    आरव को सब याद आने लगा।

     

    दस साल पहले वह और कबीर इसी जंगल में खेल रहे थे।

     

    अचानक उन्हें वही पुराना मकान मिला था।

     

    कबीर अंदर चला गया था।

     

    आरव डरकर बाहर भाग गया था।

     

    उसने कभी किसी को यह नहीं बताया कि कबीर आखिरी बार इसी मकान में गया था।

     

    आरव ने कांपते हुए कहा—

     

    “कबीर… मुझे माफ कर दो।”

     

    ऊपर से हंसी की आवाज आई।

     

    “मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल आवाज बदल गई।

     

    अब वह बूढ़ी औरत की आवाज थी—

     

    “लेकिन उसने नहीं किया।”

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर कबीर खड़ा था।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    और उसके पीछे वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    कबीर ने उंगली अपने होंठों पर रखी और धीरे से कहा—

     

    “भैया… पीछे मत देखना।”

     

    आरव समझ नहीं पाया।

     

    तभी उसके पीछे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

     

    और कान में फुसफुसाया—

     

    “अब तुम्हारी बारी है।”

  • सुनसान रास्ता..(part-3]

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव बाइक लेकर उस पुराने मकान के सामने रुक गया।

     

    उसे लगा कि शायद अंदर कोई इंसान होगा जो उसकी मदद कर सकता है।

     

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, दरवाजा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    दीवारों पर पुराने परिवार की तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर आरव के कदम रुक गए।

     

    तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।

     

    बीच में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर के एक कोने में…

     

    आरव खुद खड़ा था।

     

    उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    आरव डरते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर सीढ़ी पर किसी के पैरों के निशान थे।

     

    गीले पैरों के निशान।

     

    और वे निशान ऊपर से नीचे की तरफ आ रहे थे।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    तभी पीछे से वही आवाज आई—

     

    “तुम आखिर वापस आ ही गए।”

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “जिसे तुमने दस साल पहले जंगल में छोड़ दिया था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसे अचानक अपने बचपन की एक घटना याद आ गई।

     

    दस साल पहले इसी जंगल में उसका छोटा भाई गायब हुआ था।

     

    लेकिन आरव को याद था…

     

    उसका भाई कभी मिला ही नहीं था।

  • सुनसान रास्ता…(part-2)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव ने कॉल तुरंत काट दिया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।

     

    उसे महसूस हो रहा था कि बाइक की पिछली सीट पर कोई बैठा है।

     

    सीट थोड़ी नीचे दबी हुई थी।

     

    लेकिन आरव ने पीछे देखने की हिम्मत नहीं की।

     

    उसने बाइक तेज कर दी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसके कान के पास फिर वही फुसफुसाहट आई—

     

    “आरव… मुझे घर जाना है।”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक उसकी बाइक की हेडलाइट बंद हो गई।

     

    सड़क पूरी तरह अंधेरे में डूब गई।

     

    तभी सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    उसने सफेद साड़ी पहन रखी थी और उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    बूढ़ी औरत ने हाथ उठाकर बाइक रोकने का इशारा किया।

     

    आरव किसी तरह उसके पास से बाइक निकालकर आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुछ मीटर आगे जाकर शीशे में देखा…

     

    वही बूढ़ी औरत बाइक की पिछली सीट पर बैठी थी।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    वह पीछे मुड़ने ही वाला था कि बूढ़ी औरत ने उसके कान में कहा—

     

    “अगर पीछे देखा… तो अगली सुबह तुम्हारी नहीं होगी।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं और बाइक दौड़ाता रहा।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक पुराना मकान दिखाई दिया।

     

    मकान के बाहर वही बोर्ड लगा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    और इस बार उसके नीचे खून से लिखा था—

     

    “वो घर तक साथ आती है।”