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  • नन्हा कान्हा और यशोदा मैया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यशोदा मैया की छुपी हुई मटकी

     

    वृंदावन में उस दिन सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। कहीं मटकी में दही जम रहा था तो कहीं मक्खन निकाला जा रहा था। नंद भवन में भी यशोदा मैया सुबह से काम में लगी हुई थीं।

     

    यशोदा मैया को अब अपने कान्हा की माखन चोरी की आदत अच्छी तरह पता चल चुकी थी।

     

    इसलिए उन्होंने आज एक नई योजना बनाई।

     

    उन्होंने खूब सारा ताजा माखन निकाला और उसे एक बड़ी मटकी में भर दिया। फिर उस मटकी को घर के ऐसे कमरे में रख दिया जहाँ कान्हा की नजर आसानी से न पहुँच सके।

     

    यशोदा ने मन ही मन कहा—

     

    “आज देखती हूँ मेरा नटखट कान्हा माखन कैसे ढूँढ़ता है।”

     

    उन्हें क्या पता था कि कान्हा को रोकना इतना आसान नहीं था।

     

    उसी समय कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में खेल रहे थे।

     

    एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला—

     

    “कान्हा! आज मैया ने माखन कहीं छिपा दिया है।”

     

    कान्हा ने खेलना छोड़ दिया।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैंने देखा है। मैया मटकी लेकर अंदर गई थीं।”

     

    कान्हा ने आँखें सिकोड़कर कहा—

     

    “तो आज माखन ढूँढ़ने का खेल खेलेंगे।”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन अगर यशोदा मैया ने पकड़ लिया तो?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “पकड़ लिया तो कह देंगे हम तो छुपन-छुपाई खेल रहे थे।”

     

    सब बच्चे धीरे-धीरे घर के अंदर जाने लगे।

     

    कान्हा सबसे आगे थे।

     

    उन्होंने पहले रसोई में देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    फिर उन्होंने अनाज वाले कमरे में देखा।

     

    वहाँ भी कुछ नहीं मिला।

     

    फिर एक छोटे कमरे में गए।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “यहाँ भी नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कहीं मैया ने मटकी बाहर तो नहीं रख दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। माखन घर के अंदर ही है। मुझे इसकी खुशबू आ रही है।”

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    तभी उन्हें एक बंद दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    एक दोस्त डरते हुए बोला—

     

    “कान्हा, इसे मत खोलो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “माखन यहीं है।”

     

    उन्होंने दरवाजा खटखटाया।

     

    अंदर से कोई आवाज नहीं आई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “तुम सब पीछे हटो।”

     

    फिर उन्होंने धीरे से दरवाजे की कुंडी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    कान्हा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    एक कोने में बड़ी सी मटकी रखी थी।

     

    कान्हा के चेहरे पर चमक आ गई।

     

    “मिल गया!”

     

    सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।

     

    कान्हा मटकी के पास गए।

     

    उन्होंने ढक्कन हटाया।

     

    ताजा सफेद माखन देखकर उनकी आँखें चमकने लगीं।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, जल्दी करो। मैया आ जाएँगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पहले सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने हाथ से माखन निकाला और दोस्तों को देने लगे।

     

    तभी बाहर से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    सभी बच्चों के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कान्हा ने जल्दी से कहा—

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    कोई परदे के पीछे छिप गया।

     

    कोई संदूक के पीछे।

     

    कान्हा खुद मटकी के पीछे बैठ गए।

     

    यशोदा कमरे के पास पहुँचीं।

     

    उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।

     

    वह समझ गईं कि उनकी योजना पकड़ ली गई है।

     

    उन्होंने अंदर जाकर कहा—

     

    “कान्हा, बाहर आ जाओ।”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं हो।”

     

    फिर भी चुप्पी।

     

    यशोदा ने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “अच्छा, अगर कान्हा नहीं निकले तो मैं ये माखन किसी और को दे दूँगी।”

     

    मटकी के पीछे से तुरंत आवाज आई—

     

    “नहीं!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा धीरे-धीरे बाहर निकले।

     

    उनके हाथ और गाल माखन से भरे थे।

     

    यशोदा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।

     

    “तो तुम यहाँ माखन ढूँढ़ रहे थे?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “जी मैया।”

     

    “मैंने माखन छिपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी तुमने ढूँढ़ लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैया, आप माखन छिपा सकती हो, लेकिन उसकी खुशबू नहीं।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “और ये सारे बच्चे?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे बाहर आ गए।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, गलती हमारी नहीं थी। कान्हा हमें लेकर आए थे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “अरे! दोस्ती में सबकी गलती बराबर होती है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब दोस्ती भी याद आ रही है?”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी उठाई।

     

    “ठीक है। आज मैं तुम्हें माखन दूँगी।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “पहले तुम मेरे लिए एक काम करोगे।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    “आँगन में जो मटके पड़े हैं, उन्हें सही जगह रखना होगा।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “माखन कितना मिलेगा?”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “काम के हिसाब से।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “चलो, काम करते हैं।”

     

    बच्चे मटके उठाने लगे।

     

    कुछ ही देर में आँगन साफ हो गया।

     

    यशोदा ने देखा तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

     

    उन्होंने सब बच्चों को माखन और मिश्री दी।

     

    कान्हा ने अपना हिस्सा लिया और आधा अपने दोस्तों को दे दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम अपना माखन भी बाँट देते हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अकेले खाने में क्या मजा है?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “लेकिन ये बात मैया को मत बताना।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मैंने सुन लिया है।”

     

    सभी बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    शाम को जब नंद बाबा घर लौटे तो उन्होंने देखा कि आँगन बहुत साफ था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज माखन चुराया भी और घर का काम भी किया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “क्यों बेटा, आज क्या कारनामा किया?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “कुछ नहीं बाबा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “मटकी ढूँढ़ निकाली।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “वाह! तुम्हारी नाक तो बहुत तेज है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, माखन की खुशबू मुझे दूर से बुलाती है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    रात को कान्हा यशोदा की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

     

    यशोदा उनके बाल सहला रही थीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम इतना माखन क्यों खाते हो?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि माखन मीठा होता है।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और माँ का प्यार?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वो माखन से भी ज्यादा मीठा है।”

     

    यशोदा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को सीने से लगा लिया।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन सोने से पहले उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “कल माखन कहाँ छिपाओगी?”

     

    यशोदा ने हँसते हुए कहा—

     

    “अब तो मैं तुम्हारे सामने ही रखूँगी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर कल चोरी करने में मजा नहीं आएगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारी शरारतें भी ना!”

     

    कान्हा हँसते हुए माँ से लिपट गए।

     

    उस रात नंद भवन में शांति थी।

     

    लेकिन यशोदा जानती थीं कि अगले दिन उनका नन्हा कान्हा फिर कोई नई शरारत करने वाला है।

     

    और इस बार उसकी शरारत सिर्फ माखन की मटकी तक सीमित नहीं रहने वाली थी।

  • नन्हे कान्हा ओर माखन की मटकी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    नन्हे कान्हा और माखन की मटकी

     

    वृंदावन में सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ बज रही थीं और गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। लेकिन नंद भवन में आज यशोदा मैया कुछ ज्यादा ही परेशान थीं।

     

    उन्होंने सुबह-सुबह माखन की मटकी खोली तो उसमें माखन बहुत कम था।

     

    यशोदा ने हैरानी से मटकी देखी।

     

    “कल तो मैंने पूरी मटकी भरी थी। इतनी जल्दी माखन खत्म कैसे हो गया?”

     

    उन्होंने घर में काम करने वाली गोपी से पूछा—

     

    “तुमने माखन निकाला था?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया। मैंने तो मटकी को हाथ तक नहीं लगाया।”

     

    यशोदा कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    तभी उन्हें बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    उन्होंने धीरे से दरवाजे के पास जाकर देखा।

     

    आँगन में कान्हा अपने दोस्तों के साथ बैठे थे। सभी बच्चे कुछ खाने में व्यस्त थे।

     

    यशोदा ने ध्यान से देखा।

     

    कान्हा के हाथ में माखन था।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत माखन पीछे कर लिया।

     

    “जी मैया?”

     

    “इधर आओ।”

     

    कान्हा धीरे-धीरे उनके पास आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हारे हाथ में क्या है?”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “अच्छा? हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने धीरे से हाथ आगे किया।

     

    उसमें सफेद माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “ये क्या है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “माखन।”

     

    “और ये तुम्हारे हाथ में कैसे आया?”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, मैं तो बस देख रहा था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”

     

    यशोदा हँसते-हँसते बोलीं—

     

    “माखन देखकर हाथ में कैसे आ गया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “वो… हाथ खुद चला गया।”

     

    पास खड़े ग्वाल-बाल हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कान्हा तुरंत भाग गए।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कान्हा आँगन के एक कोने से दूसरे कोने तक भागने लगे।

     

    यशोदा उनके पीछे दौड़ती रहीं।

     

    आखिर कान्हा एक बड़े घड़े के पीछे छिप गए।

     

    यशोदा ने जानबूझकर कहा—

     

    “लगता है मेरा कान्हा कहीं चला गया।”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    यशोदा दूसरी तरफ जाने लगीं।

     

    कान्हा धीरे से बाहर निकले।

     

    जैसे ही उन्होंने भागने के लिए कदम बढ़ाया, यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “अब बताओ, माखन किसने खाया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने नहीं खाया।”

     

    “तो?”

     

    “मेरे दोस्तों ने खाया।”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा ने ही हमें बुलाया था।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी शिकायत कर दी?”

     

    बच्चा हँसने लगा।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “कान्हा, अगर तुम्हें माखन चाहिए तो मुझसे माँग लिया करो। चोरी क्यों करते हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “माँगने पर तो आप थोड़ा देती हो। मटकी में बहुत सारा होता है।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, तो अब मटकी खाली कर दोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    अगले दिन यशोदा ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर रख दी।

     

    उन्होंने सोचा कि अब कान्हा वहाँ तक नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन कान्हा ने मटकी देखी तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “आज मटकी बहुत ऊपर है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो आज माखन नहीं मिलेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्यों नहीं मिलेगा? बस तरीका बदलना पड़ेगा।”

     

    उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर खड़ा किया।

     

    सबसे ऊपर कान्हा चढ़ गए।

     

    कान्हा ने मटकी पकड़ ली।

     

    “देखा! मैंने कहा था ना, माखन मिलेगा।”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “लेकिन मैया पकड़ लेंगी।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “पहले माखन तो निकालो।”

     

    मटकी नीचे उतारी गई।

     

    कान्हा ने उसे खोला।

     

    माखन की खुशबू फैल गई।

     

    सभी बच्चे खुशी से झूम उठे।

     

    कान्हा ने माखन बाँटा।

     

    किसी को थोड़ा मिला, किसी को ज्यादा।

     

    तभी एक बंदर भी वहाँ आ गया।

     

    कान्हा ने उसे भी माखन दे दिया।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम बंदर को क्यों दे रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “उसे भी भूख लगी है।”

     

    बंदर माखन लेकर पेड़ पर चढ़ गया।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने सब देख लिया था।

     

    “कान्हा!”

     

    बच्चे भाग गए।

     

    कान्हा वहीं खड़े रह गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “फिर माखन चोरी?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मैया…”

     

    “आज तो तुम्हें सजा मिलेगी।”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कैसी सजा?”

     

    “आज तुम्हें मेरे साथ बैठकर पूरा माखन खाना होगा।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हें लगा मैं तुम्हें सच में सजा दूँगी?”

     

    कान्हा दौड़कर उनकी गोद में बैठ गए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी सामने रख दी।

     

    कान्हा ने पहला निवाला लिया और फिर अपनी माँ को खिलाया।

     

    “पहले आप।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि माखन आपने बनाया है।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    उस दिन शाम को कई गोपियाँ फिर शिकायत लेकर आईं।

     

    एक बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कान्हा हमारे घर की मटकी भी खाली कर गया।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और मेरे घर तो बंदरों को भी बुला लाया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की ओर देखा।

     

    कान्हा धीरे से मुस्कुराए।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लेकिन सच कहूँ तो जब से कान्हा हमारे घर आने लगा है, घर में रौनक हो गई है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “पहले हम माखन बनाकर रखती थीं, अब बनाते ही सोचती हैं कि कान्हा कब आएगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    कान्हा गोपियों की तरफ देखकर बोले—

     

    “तो कल से मैं सबके घर आऊँगा।”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ बोलीं—

     

    “नहीं!”

     

    पूरा आँगन हँसी से भर गया।

     

    कान्हा भी खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “मेरे नटखट कान्हा, तुम्हारी शरारतों से पूरा वृंदावन परेशान भी है और खुश भी।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डालकर कहा—

     

    “मैया, मैं शरारत नहीं करता। मैं तो सबको खुश करता हूँ।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    और सच ही तो था।

     

    कान्हा की माखन चोरी सिर्फ माखन की चोरी नहीं थी। उनके बहाने हर घर में हँसी पहुँचती थी, हर आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी और हर गोपी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    इसीलिए वृंदावन में जब भी कोई माखन की खाली मटकी देखता, तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहता—

     

    “लगता है कान्हा यहाँ होकर गए हैं।”

     

     

    . नन्हे कान्हा और खोया हुआ बछड़ा

     

    एक सुबह नंद बाबा ने कान्हा से कहा—

     

    “कान्हा, आज तुम अपने दोस्तों के साथ बछड़ों को चराने ले जाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच बाबा?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना। कोई बछड़ा झुंड से अलग नहीं होना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ बछड़ों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते में बच्चे खेलते रहे।

     

    कोई पेड़ से फल तोड़ता, कोई फूल इकट्ठा करता और कान्हा कभी बांसुरी बजाते तो कभी बछड़ों के साथ दौड़ते।

     

    जंगल के पास पहुँचकर उन्होंने बछड़ों को हरी घास वाले मैदान में छोड़ दिया।

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाने लगे।

     

    सभी बछड़े उनकी आवाज सुनकर शांत हो गए।

     

    कुछ देर बाद एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, चलो नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पहले बछड़ों को देख लो।”

     

    सभी बच्चों ने बछड़ों को गिना।

     

    एक कम था।

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “एक बछड़ा कहाँ गया?”

     

    सब बच्चे परेशान हो गए।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    लेकिन बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद जंगल की तरफ चला गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो, उसे ढूँढ़ते हैं।”

     

    सब बच्चे अलग-अलग दिशा में फैल गए।

     

    कान्हा ने बछड़े को आवाज दी—

     

    “आ जा… आ जा…”

     

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    तभी उन्हें झाड़ियों के पीछे से हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “कान्हा, इधर!”

     

    कान्हा दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक छोटा बछड़ा झाड़ियों में फँसा हुआ था।

     

    उसका पैर एक बेल में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठ गए।

     

    “डर मत। मैं तुम्हें निकालता हूँ।”

     

    उन्होंने बेल को सावधानी से हटाया।

     

    बछड़ा आजाद हो गया।

     

    लेकिन वह बहुत डरा हुआ था।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “अब ठीक है।”

     

    बछड़ा कान्हा के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो, इसे वापस झुंड में ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, बछड़ा एक दिशा में देखने लगा।

     

    कान्हा समझ गए कि शायद उसकी माँ उसी तरफ होगी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ को ढूँढ़ना होगा।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम ज्यादा दूर गए तो बाबा चिंता करेंगे।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम जल्दी वापस आ जाएँगे।”

     

    वे बछड़े के पीछे चल पड़े।

     

    काफी देर तक जंगल में घूमने के बाद उन्हें घंटियों की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “सुनो!”

     

    सबने ध्यान लगाया।

     

    घंटियों की आवाज लगातार आ रही थी।

     

    वे उसी दिशा में दौड़े।

     

    वहाँ गायों का एक बड़ा झुंड था।

     

    बछड़े ने अपनी माँ को देखते ही आवाज लगाई और दौड़कर उसके पास चला गया।

     

    गाय ने अपने बछड़े को प्यार से चाटा।

     

    कान्हा यह देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब इसे यहीं छोड़ दें?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। इसे अपनी माँ के साथ वापस ले चलेंगे।”

     

    वे दोनों को लेकर वापस लौटने लगे।

     

    जब वे मैदान में पहुँचे तो बाकी बछड़े भी उनके पास आ गए।

     

    लेकिन शाम होने तक कान्हा घर नहीं लौटे थे।

     

    यशोदा मैया चिंतित हो गईं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से पूछा—

     

    “कान्हा अभी तक क्यों नहीं आया?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद बच्चों के साथ खेल रहा होगा।”

     

    लेकिन थोड़ी देर बाद बच्चे वापस आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कान्हा कहाँ है?”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा एक बछड़े को उसकी माँ तक पहुँचाने गए थे।”

     

    यशोदा की चिंता और बढ़ गई।

     

    “कहाँ गए हैं?”

     

    “बस आते होंगे।”

     

    कुछ देर बाद दूर से कान्हा दिखाई दिए।

     

    उनके कपड़े मिट्टी से भरे थे।

     

    बालों में पत्ते लगे थे और कंधे पर बांसुरी लटकी हुई थी।

     

    यशोदा दौड़कर उनके पास पहुँचीं।

     

    “कहाँ चले गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, एक बछड़ा खो गया था।”

     

    “तो तुम अकेले इतनी दूर चले गए?”

     

    “मैं अकेला नहीं था। मेरे दोस्त भी थे।”

     

    यशोदा ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान थी?”

     

    कान्हा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माफ कर दो मैया। अगली बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा का गुस्सा तुरंत गायब हो गया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “बस अपना ध्यान रखा करो।”

  • मजबूरी में बनी नाचने वाली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मजबूरी में नचनिया बनी राधा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा कस्बा था, जहाँ लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। उसी कस्बे के किनारे एक पुराने से घर में राधा अपनी माँ और छोटे भाई मोहन के साथ रहती थी।

     

    राधा को बचपन से नृत्य का बहुत शौक था। जब भी मंदिर में भजन होता या किसी शादी में ढोलक बजती, उसके पैर अपने आप थिरकने लगते। उसकी माँ अक्सर मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “बेटी, तेरे पैरों में तो जैसे घुंघरू बंधे हैं।”

     

    राधा हँसकर कहती—

     

    “माँ, एक दिन मैं बहुत बड़ा मंच ढूँढ़ूँगी और वहाँ नाचूँगी।”

     

    लेकिन राधा की जिंदगी में सपनों से ज्यादा मजबूरियाँ थीं।

     

    उसके पिता पहले मजदूरी करते थे। एक दुर्घटना के बाद उनका काम छूट गया। घर की थोड़ी-सी बचत इलाज में खत्म हो गई। कुछ ही समय बाद पिता चल बसे।

     

    घर की सारी जिम्मेदारी माँ पर आ गई।

     

    माँ दूसरों के घरों में काम करने लगीं, लेकिन इतनी कम कमाई में घर चलाना मुश्किल था। ऊपर से मोहन की पढ़ाई और माँ की दवाइयों का खर्च अलग था।

     

    राधा ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

     

    माँ ने बहुत रोका।

     

    “तू पढ़ ले बेटी। तेरे पिता का सपना था कि तू खूब पढ़े।”

     

    राधा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “माँ, पहले घर संभालना जरूरी है। पढ़ाई बाद में कर लूँगी।”

     

    एक दिन कस्बे में एक कार्यक्रम हुआ। वहाँ नृत्य करने वाली लड़कियों की जरूरत थी। राधा की पड़ोसन ने उसे बताया।

     

    “राधा, तू तो अच्छा नाचती है। वहाँ काम मिल जाएगा। कुछ पैसे भी मिलेंगे।”

     

    राधा पहले झिझकी।

     

    “लेकिन मैं ऐसे कार्यक्रमों में कभी नहीं गई।”

     

    पड़ोसन ने कहा—

     

    “नाचना ही तो है। अगर इससे घर चल सकता है तो बुरा क्या है?”

     

    राधा अपनी माँ की दवाइयों को देखकर चुप हो गई।

     

    उसने कार्यक्रम में जाने का फैसला कर लिया।

     

    उस रात उसने पहली बार मंच पर नृत्य किया।

     

    लोगों ने तालियाँ बजाईं।

     

    उसे पैसे मिले।

     

    घर लौटकर उसने पैसे माँ के हाथ में रख दिए।

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “बेटी, तूने आज मेरा बोझ हल्का कर दिया।”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मोहन की फीस समय पर जाएगी।”

     

    धीरे-धीरे राधा को अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा।

     

    लोग उसे “नचनिया” कहने लगे।

     

    शुरुआत में राधा को यह शब्द बुरा लगता था।

     

    कई लोग उसके काम को सम्मान की नजर से नहीं देखते थे।

     

    एक दिन बाजार में किसी ने उसे देखकर अपने साथी से कहा—

     

    “देखो, यही है वो नचनिया।”

     

    राधा ने सुन लिया।

     

    उसके कदम रुक गए।

     

    घर लौटकर वह देर तक चुप बैठी रही।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राधा बोली—

     

    “माँ, क्या मैं गलत काम कर रही हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बेटी। मेहनत करके घर चलाना गलत नहीं होता। गलत तो लोगों की सोच है, जो बिना किसी की मजबूरी जाने फैसला कर देती है।”

     

    राधा ने माँ की बात दिल में रख ली।

     

    लेकिन कुछ समय बाद हालात और मुश्किल हो गए।

     

    जिस कार्यक्रम में वह काम करती थी, वहाँ आयोजक ने उससे कहा—

     

    “अब तुम्हें ज्यादा कार्यक्रम करने होंगे। तभी ज्यादा पैसे मिलेंगे।”

     

    राधा ने कहा—

     

    “मैं जितना काम कर सकती हूँ, करूँगी। लेकिन अपनी मर्यादा के खिलाफ कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उसने साफ मना कर दिया।

     

    आयोजक नाराज हो गया।

     

    “फिर तुम्हें काम नहीं मिलेगा।”

     

    राधा ने शांत होकर जवाब दिया—

     

    “काम जाएगा तो दूसरा ढूँढ़ लूँगी। लेकिन अपने सम्मान से समझौता नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन उसे काम नहीं मिला।

     

    घर की हालत फिर खराब होने लगी।

     

    लेकिन राधा ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपने नृत्य को सिर्फ मजबूरी नहीं, अपनी कला बनाने का फैसला किया।

     

    उसने पुराने गुरुजी से संपर्क किया, जो कभी मंदिर में बच्चों को नृत्य सिखाते थे।

     

    “गुरुजी, क्या आप मुझे फिर से सिखाएँगे?”

     

    गुरुजी ने पूछा—

     

    “तुम्हें नृत्य सीखना है या सिर्फ पैसे कमाने हैं?”

     

    राधा ने कहा—

     

    “अब मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे मेरी मजबूरी से नहीं, मेरी कला से पहचानें।”

     

    गुरुजी मुस्कुराए।

     

    “तो कल से आ जाना।”

     

    राधा ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    सुबह घर का काम।

     

    दोपहर में छोटे कार्यक्रम।

     

    शाम को नृत्य की कक्षा।

     

    रात को माँ और भाई की देखभाल।

     

    कुछ महीनों बाद राधा की कला में बहुत सुधार आया।

     

    एक दिन शहर में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम होने वाला था। गुरुजी ने राधा का नाम वहाँ भेज दिया।

     

    राधा का चयन हो गया।

     

    कार्यक्रम वाले दिन वह मंच के पीछे खड़ी थी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “डर क्यों रही हो?”

     

    राधा बोली—

     

    “आज पहली बार लग रहा है कि मैं अपनी मजबूरी के लिए नहीं, अपने सपने के लिए मंच पर जा रही हूँ।”

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “यही फर्क तुम्हें आगे ले जाएगा।”

     

    राधा मंच पर पहुँची।

     

    संगीत शुरू हुआ।

     

    उसने नृत्य करना शुरू किया।

     

    इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

     

    उसके हर कदम में उसकी कहानी थी—पिता की याद, माँ की मेहनत, भाई की पढ़ाई, लोगों के ताने और उसके अपने सपने।

     

    पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

     

    कार्यक्रम के बाद एक बड़ी संस्था ने उसे अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “हम चाहते हैं कि आप बच्चों को नृत्य सिखाएँ।”

     

    राधा कुछ पल चुप रही।

     

    “क्या मैं भी बच्चों को सिखा सकती हूँ?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्यों नहीं?”

     

    उस दिन राधा की जिंदगी बदल गई।

     

    अब वह सिर्फ कार्यक्रमों में नाचने वाली लड़की नहीं थी।

     

    वह एक नृत्य शिक्षिका थी।

     

    उसने अपने कस्बे में गरीब बच्चों के लिए एक छोटी-सी नृत्य कक्षा शुरू की।

     

    एक दिन वही पड़ोसन, जिसने उसे पहली बार कार्यक्रम में भेजा था, उससे मिलने आई।

     

    उसने कहा—

     

    “राधा, मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “मैंने बस इतना सीखा है कि मजबूरी इंसान को रास्ता दिखा सकती है, लेकिन मंजिल उसे खुद चुननी पड़ती है।”

     

    कुछ समय बाद राधा ने अपने भाई मोहन की पढ़ाई पूरी करवाई।

     

    माँ की दवाइयाँ भी नियमित चलने लगीं।

     

    एक शाम माँ ने राधा को घुंघरू बाँधते हुए देखा।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “याद है, बचपन में मैं कहती थी तेरे पैरों में घुंघरू बंधे हैं?”

     

    राधा हँस पड़ी।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तब मुझे नहीं पता था कि यही घुंघरू एक दिन हमारे घर की उम्मीद बनेंगे।”

     

    राधा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने माँ को गले लगा लिया।

     

    अब जब कोई उसे “नचनिया” कहता, तो वह बुरा नहीं मानती थी।

     

    वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “हाँ, मैं नृत्य करती हूँ। क्योंकि नृत्य मेरी कला है, मेरी मेहनत है और मेरे सपनों का रास्ता है।”

     

    राधा ने अपनी मजबूरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

     

    उसने उसे अपनी ताकत बना लिया।

     

    और उसकी कहानी ने पूरे कस्बे को एक बात सिखा दी—

     

    किसी इंसान के काम को देखकर उसके चरित्र या उसकी मजबूरी का फैसला नहीं करना चाहिए। हर मेहनत के पीछे एक कहानी होती है, और हर इंसान सम्मान का हकदार होता है।

     

     

  • ज़िंदगी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 2

     

    आरव घर पहुँचा तो उसकी माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं।

     

    उसे देखते ही माँ ने पूछा—

     

    “बेटा, खाना खाएगा?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कुछ नहीं पूछा।

     

    वह समझ गई थीं कि आज उनका बेटा पहले से थोड़ा बेहतर है।

     

    रात को खाना खाने के बाद आरव अपनी माँ के पास बैठ गया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “माँ, क्या आपको कभी लगा कि मैं नाकाम हो गया हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कभी नहीं।”

     

    “लेकिन मैं तो बार-बार हार रहा हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हारने वाला इंसान वह नहीं होता जो कोशिश करके असफल हो जाए। हारने वाला वह होता है जो अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ दे।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे बहुत डर लगता है माँ।”

     

    “किस बात से?”

     

    “इस बात से कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “भविष्य की चिंता में आज की जिंदगी मत खो देना।”

     

    ये बात आरव के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन वह फिर उसी पार्क में गया।

     

    वही बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वापस आ गया।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “मुझे उम्मीद थी।”

     

    आरव उनके पास बैठ गया।

     

    “मैंने फैसला किया है कि मैं फिर कोशिश करूँगा। लेकिन इस बार सिर्फ एक परीक्षा के भरोसे नहीं बैठूँगा। मैं कोई काम भी सीखूँगा।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अब तुम सही रास्ते पर हो।”

     

    आरव ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की।

     

    सुबह पढ़ाई करता, दोपहर में एक दुकान पर काम सीखता और शाम को अपने दोस्त रोहित से मिलता।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।

     

    समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।

     

    पैसे अभी भी कम थे।

     

    परीक्षा का डर अभी भी था।

     

    लेकिन अब आरव हर समस्या को अपनी पूरी जिंदगी नहीं समझता था।

     

    एक दिन रोहित ने पूछा—

     

    “तुझे याद है कुछ महीने पहले तू कितना परेशान था?”

     

    आरव हँसते हुए बोला—

     

    “हाँ। लगता था मेरी जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “और अब?”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “अब लगता है कि जिंदगी में बहुत कुछ बाकी है।”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने अपनी मेहनत से एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया। उसे शुरुआत में बहुत कम पैसे मिले।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    उसने नई चीजें सीखीं, गलतियाँ कीं और फिर उन्हें सुधारा।

     

    एक साल बाद उसकी आमदनी इतनी हो गई कि वह घर के खर्च में माँ की मदद करने लगा।

     

    पिता भी धीरे-धीरे अपना काम शुरू करने लगे।

     

    आरव की छोटी बहन की पढ़ाई जारी रही।

     

    एक शाम आरव उसी पार्क में बैठा था।

     

    वही बुजुर्ग उसके पास आए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “अब भी लगता है कि जिंदगी बेकार है?”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “नहीं। अब तो लगता है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “यही समझ सबसे जरूरी है।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “अगर उस दिन मैं आपसे नहीं मिला होता तो शायद मैं अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता।”

     

    बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—

     

    “इसलिए हमेशा याद रखना, जब मन बहुत भारी हो जाए तो अकेले मत रहना। अपने परिवार, दोस्त, शिक्षक या किसी भरोसेमंद बड़े इंसान से बात करना। मदद माँगना कमजोरी नहीं है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि मुश्किल समय में सबसे जरूरी चीज समाधान नहीं, बल्कि साथ और बातचीत भी होती है।

     

    कुछ दिनों बाद आरव ने अपने मोहल्ले के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की कक्षा शुरू की।

     

    वह उन्हें पढ़ाने लगा।

     

    एक दिन एक बच्चा उससे बोला—

     

    “भैया, मैं गणित में बहुत कमजोर हूँ। मुझसे नहीं होगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “ऐसा मत बोलो। अभी नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि कभी नहीं आएगा।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “अगर मैं फेल हो गया तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो फिर से कोशिश करेंगे। एक नतीजा तुम्हारी पूरी जिंदगी तय नहीं करता।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    आरव ने उसे देखकर सोचा—

     

    “काश मैंने ये बात खुद को भी उस समय समझाई होती।”

     

    समय बीतता गया।

     

    आरव ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी।

     

    उसके पहले पन्ने पर आज भी वही लाइन लिखी थी—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    उसने उसके नीचे एक नई लाइन जोड़ दी—

     

    “और रास्ता कितना भी मुश्किल हो, मैं अपनी जिंदगी को बेकार नहीं जाने दूँगा।”

     

    उस दिन आरव ने अपनी कहानी बच्चों को सुनाई।

     

    उसने कहा—

     

    “जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल। कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारे खिलाफ हो जाती हैं। लेकिन इन सबका मतलब ये नहीं कि हमारी जिंदगी की कीमत कम हो गई।”

     

    बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत ज्यादा परेशान हो, तो अकेले मत रहना। किसी भरोसेमंद इंसान से बात करना। अपने मन की बात कहना। मदद माँगना। एक मुश्किल दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत बनने देना।”

     

    पार्क की वही बेंच दूर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे याद आया कि कभी वह उसी बेंच पर बैठकर सोचता था कि उसकी जिंदगी में कुछ नहीं बचा।

     

    आज उसे पता था—

     

    बहुत कुछ बचा था।

     

    सपने बाकी थे।

     

    परिवार बाकी था।

     

    दोस्त बाकी थे।

     

    नई शुरुआत बाकी थी।

     

    और सबसे जरूरी—

     

    जिंदगी बाकी थी।

     

    इसलिए जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, खुद को अकेला मत समझो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करो, मदद लो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो।

     

    क्योंकि जिंदगी में बुरे दिन आ सकते हैं, लेकिन वे हमेशा नहीं रहते।

     

    जिंदगी सच में अनमोल है। इसे किसी एक हार, एक गलती या एक बुरे दौर के नाम मत कर दो।

     

    कहानी समाप्त।

  • जिंदगी अनमोल है

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 1

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का एक लड़का रहता था। आरव पढ़ाई में अच्छा था और बचपन से ही उसके बहुत सारे सपने थे। वह चाहता था कि एक दिन अपने माता-पिता के लिए एक अच्छा घर बनाएगा, अपनी छोटी बहन की पढ़ाई पूरी करवाएगा और अपनी पसंद का काम करके अपने पैरों पर खड़ा होगा।

     

    लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी जिंदगी में परेशानियाँ बढ़ती चली गईं।

     

    पिता की नौकरी चली गई।

     

    घर की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी।

     

    माँ घर चलाने के लिए सिलाई करने लगीं और आरव भी पढ़ाई के साथ छोटा-मोटा काम करने लगा।

     

    शुरुआत में आरव हर मुश्किल का सामना हँसकर करता था।

     

    वह अपनी माँ से कहता—

     

    “माँ, चिंता मत करो। ये समय भी निकल जाएगा।”

     

    माँ उसके सिर पर हाथ रखकर कहतीं—

     

    “मुझे अपने बेटे पर भरोसा है।”

     

    लेकिन कुछ महीनों बाद आरव की जिंदगी में एक और परेशानी आ गई।

     

    जिस प्रतियोगी परीक्षा की वह तैयारी कर रहा था, उसमें वह असफल हो गया।

     

    उसके कई दोस्त सफल हो गए थे।

     

    सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें देखकर आरव को लगता कि सबकी जिंदगी आगे बढ़ रही है और सिर्फ वही पीछे रह गया है।

     

    एक दिन उसका दोस्त रोहित उससे मिलने आया।

     

    “आरव, चल कहीं बाहर चलते हैं।”

     

    आरव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

     

    “मेरा मन नहीं है।”

     

    “तू कई दिनों से घर से बाहर नहीं निकला।”

     

    “तो क्या करूँ?”

     

    रोहित चुप हो गया।

     

    आरव अचानक गुस्से में बोला—

     

    “तुम लोगों को क्या पता मेरी हालत का? सबको लगता है कि बस मेहनत करो और सफलता मिल जाएगी। लेकिन अगर बार-बार हार मिले तो?”

     

    रोहित ने धीरे से कहा—

     

    “हार मिलने का मतलब ये नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारे लिए बोलना आसान है।”

     

    रोहित ने बहस नहीं की।

     

    वह जाते-जाते बस इतना कह गया—

     

    “जब भी बात करनी हो, मुझे फोन करना। मैं सुनूँगा।”

     

    लेकिन आरव ने फोन नहीं किया।

     

    वह अपने कमरे में बंद रहने लगा।

     

    उसे अपने अंदर की परेशानियाँ किसी से कहना मुश्किल लगता था।

     

    माँ कई बार उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक देतीं।

     

    “बेटा, खाना रख दूँ?”

     

    अंदर से जवाब आता—

     

    “भूख नहीं है।”

     

    “थोड़ा सा खा ले।”

     

    “माँ, बाद में।”

     

    माँ दरवाजे के बाहर कुछ देर खड़ी रहतीं और फिर चुपचाप चली जातीं।

     

    एक रात आरव अपनी पुरानी डायरी खोलकर बैठा।

     

    उसमें बचपन के सपने लिखे थे।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    आरव उस लाइन को देर तक देखता रहा।

     

    उसे अपने बचपन का चेहरा याद आया।

     

    वह बच्चा जो छोटी-सी चीज मिलने पर भी खुश हो जाता था।

     

    जिसे पतंग उड़ाने में खुशी मिलती थी।

     

    जो बारिश में भीगने के लिए माँ से डाँट खाता था।

     

    आरव की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैं इतना बदल कैसे गया?”

     

    लेकिन उसके मन का बोझ अभी भी कम नहीं हुआ।

     

    अगले दिन वह बिना किसी को बताए घर से बाहर निकल गया।

     

    वह शहर के पुराने पार्क में जाकर एक बेंच पर बैठ गया।

     

    वहाँ एक बुजुर्ग आदमी रोज की तरह बैठे अखबार पढ़ रहे थे।

     

    उन्होंने आरव को कई दिनों से वहाँ बैठे देखा था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “बेटा, परेशान लग रहे हो।”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बुजुर्ग ने अखबार मोड़कर रख दिया।

     

    “अगर बात नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं। मैं बस इतना कहूँगा कि परेशानी को अकेले उठाना बहुत भारी पड़ता है।”

     

    आरव ने पहली बार उनकी तरफ देखा।

     

    “अगर जिंदगी में कुछ भी सही न हो रहा हो तो क्या करना चाहिए?”

     

    बुजुर्ग ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक दिन का फैसला पूरे जीवन के लिए मत करना।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    बुजुर्ग बोले—

     

    “मुश्किल समय में दिमाग हमें बताता है कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन सच ये होता है कि मुश्किल समय सिर्फ एक हिस्सा होता है, पूरी जिंदगी नहीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन अगर इंसान बार-बार हारता रहे तो?”

     

    “तो अगली बार अलग तरीके से कोशिश करनी चाहिए।”

     

    “और अगर हिम्मत ही न बचे?”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “तो किसी ऐसे इंसान के पास बैठो जो तुम्हें संभाल सके। हिम्मत हमेशा अकेले पैदा नहीं करनी पड़ती। कभी-कभी दूसरे लोग हमारी हिम्मत बन जाते हैं।”

     

    आरव उनकी बातें सुनता रहा।

     

    तभी उसका फोन बजा।

     

    माँ का फोन था।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “हाँ माँ?”

     

    माँ ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “बेटा, तू ठीक है ना?”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    माँ ने फिर पूछा—

     

    “कहाँ है?”

     

    “पार्क में।”

     

    “घर आ जा बेटा। मैं इंतजार कर रही हूँ।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “माँ, मैं घर आ रहा हूँ।”

     

    फोन कट गया।

     

    वह उठने लगा।

     

    तभी उसकी नजर पार्क में खेल रहे कुछ बच्चों पर पड़ी।

     

    एक बच्चा गिर गया था।

     

    वह रोया, फिर उसके दोस्त ने हाथ बढ़ाया।

     

    “उठ, फिर से खेलते हैं।”

     

    बच्चा उठ गया।

     

    आरव कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    उसे लगा जैसे जिंदगी भी यही कह रही हो—

     

    “गिर गए हो तो उठो। खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    वह घर की ओर चल पड़ा।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि घर पहुँचने के बाद उसे अपनी जिंदगी का एक ऐसा सच पता चलने वाला था, जो उसकी सोच पूरी तरह बदल देगा।

     

     

  • साथियों से बिछड़ गया

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया 

     

    तूफान लगातार बढ़ता जा रहा था।

     

    एक तरफ बादलू था और दूसरी तरफ उसके साथी।

     

    बीच में काले बादलों और तेज हवाओं की एक बड़ी दीवार खड़ी थी।

     

    धवल बार-बार चिल्ला रहा था—

     

    “बादलू! हमारी तरफ मत आना! तूफान बहुत तेज है!”

     

    लेकिन बादलू अपने दोस्तों को देखकर रुकना नहीं चाहता था।

     

    वह बोला—

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर फिर कहीं नहीं जाऊँगा!”

     

    वह आगे बढ़ा।

     

    हवा उसे पीछे धकेल रही थी।

     

    कभी वह ऊपर चला जाता, कभी नीचे।

     

    उसने अपनी पूरी ताकत लगाई।

     

    धीरे-धीरे वह तूफान की दीवार के पास पहुँच गया।

     

    लेकिन तभी बिजली चमकी और जोरदार गरज हुई।

     

    बादलू डरकर पीछे हट गया।

     

    उसने पहली बार समझा कि सिर्फ अपने साथियों तक पहुँचने की इच्छा काफी नहीं थी। उसे सही रास्ता भी खोजना होगा।

     

    तभी उसे बूढ़े पेड़ की बात याद आई—

     

    “हवा को दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास पहुँचा सकती है।”

     

    बादलू ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने हवा को महसूस किया।

     

    एक दिशा से हवा बहुत तेज आ रही थी, लेकिन दूसरी दिशा में हवा धीरे-धीरे घूम रही थी।

     

    बादलू ने उसी दिशा को चुना।

     

    वह सीधे तूफान में जाने के बजाय उसके किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगा।

     

    कुछ देर बाद तूफान थोड़ा कमजोर हुआ।

     

    धवल ने उसे देखा।

     

    “बादलू! अब दाईं तरफ आओ!”

     

    बादलू धवल की बताई दिशा में बढ़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच की दूरी कम होने लगी।

     

    और आखिरकार…

     

    बादलू अपने साथियों के पास पहुँच गया।

     

    धवल ने उसे देखते ही कहा—

     

    “तुम्हें पता है हमने तुम्हें कितना ढूँढ़ा?”

     

    बादलू की आँखों में खुशी थी।

     

    “मुझे लगा था मैं तुम्हें कभी नहीं देख पाऊँगा।”

     

    बाकी बादल भी उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गए।

     

    एक छोटा सा बादल बोला—

     

    “तुम बहुत बदल गए हो।”

     

    बादलू ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    छोटे बादल ने कहा—

     

    “पहले तुम्हें सिर्फ दूर-दूर घूमना था। अब तुम वापस आने की बात कर रहे हो।”

     

    सभी हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी धवल ने कहा—

     

    “हमें जल्दी आगे बढ़ना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    धवल ने नीचे धरती की तरफ इशारा किया।

     

    “देखो।”

     

    नीचे एक बहुत बड़ा इलाका सूखा पड़ा था।

     

    नदियाँ छोटी हो गई थीं।

     

    तालाब लगभग सूख चुके थे।

     

    खेतों में फसल मुरझा रही थी।

     

    बादलू को उस छोटे गांव की याद आ गई, जहाँ उसने थोड़ी-सी बारिश की थी।

     

    उसने कहा—

     

    “हमें बारिश करनी होगी।”

     

    एक बड़ा बादल बोला—

     

    “लेकिन हमारे पास इतना पानी नहीं है।”

     

    बादलू ने कहा—

     

    “अगर हम सब एक साथ मिल जाएँ तो?”

     

    धवल ने उसकी बात समझ ली।

     

    “तुम कहना चाहते हो कि हमें अपना पानी एक जगह इकट्ठा करना चाहिए?”

     

    “हाँ।”

     

    सभी बादल एक साथ आने लगे।

     

    हवा भी उनकी मदद करने लगी।

     

    धीरे-धीरे बादलों का बड़ा गुच्छा तैयार हो गया।

     

    पहले एक बूंद गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    नीचे खेतों में पानी पहुँचने लगा।

     

    सूखी नदी में हल्की धारा बहने लगी।

     

    गांव के लोग घरों से बाहर निकल आए।

     

    वही छोटी बच्ची जिसने पहले बारिश के लिए आसमान की ओर देखा था, खुशी से चिल्लाई—

     

    “बारिश आ गई!”

     

    बादलू उसे ऊपर से देख रहा था।

     

    उसके मन में एक अलग ही खुशी थी।

     

    धवल ने कहा—

     

    “अब समझ आया कि तुम उस दिन अकेले होकर भी इतने खुश क्यों थे।”

     

    बादलू ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    धवल बोला—

     

    “क्योंकि तुमने किसी की मदद की थी।”

     

    बादलू मुस्कुराया।

     

    “हाँ। उस दिन मुझे लगा था कि मैं अपने साथियों से बिछड़ गया हूँ। लेकिन शायद उसी वजह से मैं उस गांव तक पहुँच पाया।”

     

    कुछ दिनों बाद मौसम साफ हो गया।

     

    बादलों का गुच्छा फिर अपने पुराने रास्ते पर चल पड़ा।

     

    बादलू अब पहले जैसा नहीं था।

     

    उसे अभी भी नई जगहें देखना पसंद था, लेकिन अब वह बिना बताए कहीं नहीं जाता था।

     

    एक दिन उसने धवल से कहा—

     

    “अगर मैं फिर कभी दूर जाना चाहूँ तो?”

     

    धवल ने हँसकर कहा—

     

    “तो पहले हमें बताना।”

     

    “और अगर हवा मुझे उड़ा ले गई?”

     

    “तो हम तुम्हें ढूँढ़ने निकल पड़ेंगे।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    समय बीतता गया।

     

    बादलू ने कई जगहों पर बारिश की।

     

    कहीं सूखे खेतों को पानी मिला, कहीं जंगलों को नई हरियाली मिली और कहीं छोटे बच्चों ने बारिश में खेलकर खुशी मनाई।

     

    एक दिन वही बूढ़ा पेड़ दूर से बादलू को देख रहा था।

     

    बादलू ने उसे पहचान लिया।

     

    वह नीचे आया और बोला—

     

    “आपने सही कहा था। कभी-कभी रास्ता भटकना जरूरी होता है।”

     

    बूढ़ा पेड़ मुस्कुराया।

     

    “अब तुम्हें समझ आया?”

     

    बादलू ने कहा—

     

    “हाँ। मैं अपने साथियों से बिछड़ा जरूर था, लेकिन उस सफर ने मुझे अपने बारे में बहुत कुछ सिखाया।”

     

    पेड़ ने पूछा—

     

    “और सबसे बड़ी बात?”

     

    बादलू ने आसमान में अपने साथियों की ओर देखा।

     

    “कि अकेले उड़ना अच्छा लग सकता है, लेकिन अपनों के साथ लौटना उससे भी ज्यादा खूबसूरत होता है।”

     

    धवल ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “बादलू! चलो!”

     

    बादलू मुस्कुराया और अपने साथियों के पास लौट गया।

     

    उस दिन से बादलों का वह गुच्छा हमेशा साथ-साथ चलता।

     

    कभी कोई बादल थोड़ा दूर निकल जाता तो बाकी उसे आवाज देकर वापस बुला लेते।

     

    और जब भी तेज हवा चलती, बादलू सबसे पहले कहता—

     

    “सब साथ रहना!”

     

    सभी हँसते और एक-दूसरे के करीब आ जाते।

     

    कहते हैं, आसमान में बादलों के कई गुच्छे आज भी एक साथ चलते दिखाई देते हैं।

     

    शायद उनमें से कोई बादलू का परिवार भी हो।

     

    और जब कभी कोई छोटा सा बादल अपने साथियों से दूर चला जाता है, तो हवा उसके कानों में जैसे एक बात कहती है—

     

    “रास्ते कितने भी लंबे हों, अगर अपने साथ हों तो कोई भी सफर मुश्किल नहीं होता।”

     

    और बादलू की कहानी हमें यही सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी हमें अपनों से दूर जरूर ले जाती है, लेकिन अगर दिल में उनका प्यार और वापस लौटने की इच्छा हो, तो कोई दूरी हमेशा के लिए नहीं रहती।

     

    समाप्त।

  • बादलों का गुच्छा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बादलों का गुच्छा जो अपने साथियों से बिछड़ गया — भाग 1

     

    आसमान के बहुत ऊपर, नीले आकाश के बीच सफेद-सफेद बादलों का एक बड़ा सा गुच्छा रहता था। उसका नाम था बादलू। बादलू बाकी बादलों से थोड़ा अलग था। वह बहुत चंचल था, हर समय इधर-उधर घूमता रहता और नई-नई जगहें देखने का सपना देखता था।

     

    उसका सबसे अच्छा दोस्त था धवल, जो हमेशा उसे समझाता था।

     

    “बादलू, ज्यादा दूर मत जाना। हवा कभी भी अपना रुख बदल सकती है।”

     

    बादलू हँसकर कहता, “अरे धवल, मैं कोई छोटा बच्चा थोड़ी हूँ। देखना, एक दिन मैं पूरे आसमान की सैर करके आऊँगा।”

     

    उनका पूरा बादलों का परिवार एक साथ रहता था। सुबह सूरज निकलता तो बादल चमकने लगते। शाम को आसमान नारंगी हो जाता तो सभी बादल एक-दूसरे के पास आकर दिनभर की बातें करते।

     

    बादलू को अपने साथियों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता था—

     

    “आखिर आसमान के उस पार क्या है?”

     

    एक दिन हवा बहुत तेज चल रही थी।

     

    धवल ने कहा, “आज कहीं मत जाना। हवा बहुत तेज है।”

     

    बादलू बोला, “बस थोड़ी दूर तक जाऊँगा। फिर वापस आ जाऊँगा।”

     

    वह धीरे-धीरे अपने साथियों से अलग होकर आगे बढ़ने लगा।

     

    शुरुआत में सब ठीक था।

     

    हवा उसे हल्के-हल्के आगे ले जा रही थी। बादलू नीचे धरती को देखकर खुश हो रहा था।

     

    नीचे हरे-भरे खेत थे, छोटी-छोटी नदियाँ थीं और गांवों के बीच बने घर खिलौनों जैसे लग रहे थे।

     

    “वाह! दुनिया तो कितनी बड़ी है!” बादलू ने कहा।

     

    लेकिन तभी हवा अचानक बहुत तेज हो गई।

     

    बादलू संभल नहीं पाया।

     

    “अरे! रुको!”

     

    हवा उसे तेजी से अपने साथ बहाकर दूर ले गई।

     

    बादलू ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    उसके साथी अब बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे।

     

    “धवल!”

     

    उसने जोर से आवाज लगाई।

     

    लेकिन तेज हवा में उसकी आवाज कहीं खो गई।

     

    कुछ ही देर में उसके साथी पूरी तरह दिखाई देना बंद हो गए।

     

    अब बादलू अकेला था।

     

    पहली बार उसे अपने फैसले पर पछतावा हुआ।

     

    “काश मैंने धवल की बात मान ली होती।”

     

    हवा उसे एक अनजान इलाके में ले गई।

     

    वहाँ आसमान बहुत साफ था। आसपास कोई दूसरा बादल नहीं था।

     

    बादलू ने चारों तरफ देखा।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    कुछ समय बाद उसे नीचे एक छोटा सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव के लोग आसमान की ओर देख रहे थे।

     

    बादलू ने ध्यान से देखा तो खेत सूखे हुए थे।

     

    तालाब में पानी बहुत कम था।

     

    पेड़ों के पत्ते भी मुरझाए हुए थे।

     

    एक छोटी बच्ची अपने पिता से पूछ रही थी—

     

    “पिताजी, बारिश कब होगी?”

     

    पिता ने उदास होकर कहा—

     

    “पता नहीं बेटी। अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    बादलू को बहुत दुख हुआ।

     

    वह खुद भी बारिश का बादल था, लेकिन इस समय उसके पास बारिश करने जितना पानी नहीं था।

     

    फिर भी उसने कोशिश की।

     

    वह गांव के ऊपर जाकर रुका और अपने अंदर जमा थोड़ी-सी नमी को बूंदों में बदलने लगा।

     

    टप…

     

    एक बूंद नीचे गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    बच्ची ने आसमान की ओर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    लोग खुशी से बाहर आ गए।

     

    बादलू ने जितना पानी उसके पास था, सब बरसा दिया।

     

    लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी सारी नमी खत्म हो गई।

     

    वह फिर हल्का होकर आसमान में तैरने लगा।

     

    गांव में लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखकर उसे खुशी हुई।

     

    लेकिन उसके मन में अपने साथियों की याद और भी बढ़ गई।

     

    “अगर धवल यहाँ होता तो मैं उसे बताता कि मैंने आज किसी की मदद की।”

     

    उसी समय एक बूढ़ा पेड़ हवा में झूमते हुए बोला—

     

    “बादल, तुम उदास क्यों हो?”

     

    बादलू चौंक गया।

     

    “आपने मुझे देखा?”

     

    पेड़ हँसा।

     

    “मैंने तुम्हें आते हुए देखा था। तुम बाकी बादलों जैसे नहीं हो। तुम्हारे चेहरे पर खुशी भी है और चिंता भी।”

     

    बादलू ने अपनी पूरी कहानी पेड़ को बता दी।

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “कभी-कभी रास्ता भटकना भी जरूरी होता है। इससे हमें पता चलता है कि हम वास्तव में किसके लिए बने हैं।”

     

    बादलू बोला—

     

    “लेकिन मुझे अपने साथियों के पास वापस जाना है।”

     

    पेड़ ने कहा—

     

    “तो रास्ता खोजो। मगर याद रखना, हवा को सिर्फ दुश्मन मत समझना। वही हवा तुम्हें उनके पास भी पहुँचा सकती है।”

     

    बादलू ने उम्मीद से आसमान की तरफ देखा।

     

    उसी समय दूर से ठंडी हवा आई।

     

    बादलू ने महसूस किया कि यह हवा बाकी हवाओं से अलग थी।

     

    वह एक दिशा में लगातार बह रही थी।

     

    “शायद यही रास्ता है!”

     

    बादलू हवा के साथ आगे बढ़ गया।

     

    कई घंटे बीत गए।

     

    लेकिन उसके साथी कहीं दिखाई नहीं दिए।

     

    अचानक आसमान में काले बादल छाने लगे।

     

    बादलू डर गया।

     

    उसने देखा कि बिजली चमक रही थी।

     

    तेज हवा और गरज ने पूरे आसमान को घेर लिया।

     

    वह पीछे हटने की कोशिश करने लगा, लेकिन तूफान ने उसे अपने बीच खींच लिया।

     

    “मैं कहाँ आ गया?”

     

    बादलू चारों तरफ घूम रहा था।

     

    उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी बिजली चमकी और उसे दूर एक बड़ी सी सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह कोई पहाड़ नहीं था।

     

    वह बादलों का एक विशाल समूह था।

     

    बादलू ने उम्मीद से पुकारा—

     

    “क्या मेरे साथी वहाँ हैं?”

     

    लेकिन तूफान की आवाज इतनी तेज थी कि उसे कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह उस विशाल बादल समूह की तरफ बढ़ने लगा।

     

    जैसे ही वह पास पहुँचा, उसे एक परिचित आवाज सुनाई दी—

     

    “बादलू!”

     

    बादलू अचानक रुक गया।

     

    यह आवाज…

     

    यह तो धवल की थी!

     

    उसने पूरी ताकत से पुकारा—

     

    “धवल!”

     

    तूफान के बीच से जवाब आया—

     

    “बादलू, तुम कहाँ थे?”

     

    बादलू खुशी से भर गया।

     

    लेकिन तभी तेज हवा ने दोनों को फिर अलग-अलग दिशाओं में धकेल दिया।

     

    “धवल!”

     

    “बादलू!”

     

    दोनों एक-दूसरे को पुकारते रहे।

     

    लेकिन तूफान और तेज होता गया।

     

    और तभी बादलू ने देखा कि धवल के पीछे उसका पूरा बादलों का परिवार मौजूद था।

     

    वे सभी उसे ढूँढ़ते हुए यहाँ तक पहुँच गए थे।

     

    लेकिन उनके बीच एक बड़ी काली आँधी खड़ी थी।

     

    बादलू ने सोचा—

     

    “क्या मैं अपने साथियों तक पहुँच पाऊँगा?”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले कुछ पल उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाले थे।

     

     

  • सुनहरी पंखों वाली

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 2

     

    सुनहरी रोशनी पूरे महल पर फैल चुकी थी।

     

    सुवर्णा अपने पंखों को देखकर खुद भी डर गई थी। उसके पंख पहले से कहीं ज्यादा चमक रहे थे।

     

    राजा वीरेंद्र ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “सुवर्णा, ध्यान से सुनो। तुम्हें उस पक्षी के पीछे नहीं जाना है।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि वह मुझे लेने आया है।”

     

    “हाँ… लेकिन मुझे नहीं पता कि वह तुम्हें कहाँ ले जाएगा।”

     

    महल के बाहर कालकेतु की सेना आगे बढ़ रही थी।

     

    राजा ने गुप्त रास्ता खोल दिया।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और आप?”

     

    राजा मुस्कुराए।

     

    “एक पिता अपनी बेटी के लिए इतना तो कर ही सकता है।”

     

    सुवर्णा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं वापस आऊँगी।”

     

    वह गुप्त रास्ते से जंगल में निकल गई।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसके सुनहरे पंख फिर चमकने लगे।

     

    आसमान में वही विशाल पक्षी उसके ऊपर मंडराने लगा।

     

    सुवर्णा ने कहा, “अगर तुम मुझे सच में जानते हो, तो मुझे रास्ता दिखाओ।”

     

    पक्षी आगे उड़ गया।

     

    सुवर्णा उसके पीछे उड़ने लगी।

     

    काफी देर बाद वह जंगल के बीच एक पुराने मंदिर के सामने पहुँची।

     

    मंदिर के दरवाजे पर वही सुनहरा सूरज बना था।

     

    जैसे ही सुवर्णा ने दरवाजे को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।

     

    वही औरत जिसने उसे पहली बार उड़ते हुए देखा था।

     

    “तुम कौन हो?” सुवर्णा ने पूछा।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “मैं तुम्हारी दादी की रखवाली करती थी।”

     

    सुवर्णा चौंक गई।

     

    “मेरी दादी?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी असली दादी एक साधारण रानी नहीं थीं। वह सुनहरे पंखों वाले लोगों की आखिरी रानी थीं।”

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को देखा।

     

    “तो ये पंख मुझे उनसे मिले हैं?”

     

    “हाँ। लेकिन तुम्हारे पंखों की असली शक्ति अभी जागी नहीं है।”

     

    “उसे कैसे जगाया जा सकता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “शक्ति पंखों में नहीं होती, सुवर्णा। शक्ति उस दिल में होती है जो उनका इस्तेमाल करता है।”

     

    उसी समय मंदिर के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    कालकेतु वहाँ पहुँच चुका था।

     

    बूढ़ी औरत ने सुवर्णा को पीछे की तरफ ले जाकर एक गुप्त दरवाजा खोला।

     

    “तुम्हें उस पहाड़ की चोटी पर जाना होगा। वहाँ तुम्हें अपने सवालों का आखिरी जवाब मिलेगा।”

     

    “और मेरे पिता?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “अगर तुमने समय रहते अपनी शक्ति समझ ली, तो शायद तुम उन्हें बचा सको।”

     

    सुवर्णा पहाड़ की ओर उड़ चली।

     

    इधर कालकेतु ने महल पर कब्जा कर लिया था।

     

    वह राजा वीरेंद्र के सामने खड़ा था।

     

    “अब बताइए, राजकुमारी कहाँ है?”

     

    राजा ने कुछ नहीं कहा।

     

    कालकेतु ने गुस्से में कहा—

     

    “आप समझते क्यों नहीं? उसके पंखों की शक्ति से मैं पूरे संसार का सबसे ताकतवर राजा बन सकता हूँ!”

     

    राजा ने शांत स्वर में कहा—

     

    “तुम उसकी शक्ति कभी हासिल नहीं कर पाओगे।”

     

    उधर सुवर्णा पहाड़ की चोटी पर पहुँच चुकी थी।

     

    वहाँ उसे एक विशाल पत्थर दिखाई दिया।

     

    पत्थर पर लिखा था—

     

    “जिस दिन सुनहरी राजकुमारी अपने लिए नहीं, किसी और के लिए अपने पंख खोलेगी, उसी दिन उसकी असली शक्ति जागेगी।”

     

    सुवर्णा कुछ समझ नहीं पाई।

     

    तभी उसे दूर से आवाज सुनाई दी।

     

    “सुवर्णा!”

     

    वह पलटी।

     

    एक घायल सैनिक पहाड़ पर चढ़ता हुआ आ रहा था।

     

    “राजकुमारी… राजा को कालकेतु ले गया है।”

     

    सुवर्णा के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “मेरे पिता को?”

     

    सैनिक ने सिर हिलाया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंख फैलाए।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    वह पूरी गति से महल की ओर उड़ चली।

     

    महल पहुँचते ही उसने देखा कि कालकेतु राजा को लेकर मुख्य आंगन में खड़ा था।

     

    “आ गई मेरी सुनहरी राजकुमारी।”

     

    सुवर्णा नीचे उतरी।

     

    “मेरे पिता को छोड़ दो।”

     

    कालकेतु हँसा।

     

    “पहले अपने पंखों की शक्ति मुझे दो।”

     

    “अगर मैंने मना कर दिया?”

     

    “तो तुम्हारे पिता को नुकसान होगा।”

     

    सुवर्णा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने अपने पंख बंद कर लिए।

     

    “ठीक है।”

     

    राजा चिल्लाए—

     

    “नहीं, सुवर्णा!”

     

    सुवर्णा ने कालकेतु की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी उसके पंखों से सुनहरी रोशनी निकली और पूरे आंगन में फैल गई।

     

    कालकेतु पीछे हट गया।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सुवर्णा के पंखों से निकली रोशनी किसी हथियार की तरह नहीं थी।

     

    वह महल के चारों तरफ फैल गई।

     

    जहाँ-जहाँ रोशनी पहुँची, वहाँ बंद दरवाजे खुल गए, सैनिकों के हथियार जमीन पर गिर गए और लोगों के चेहरों पर डर की जगह हिम्मत दिखाई देने लगी।

     

    कालकेतु घबरा गया।

     

    “तुमने अपनी शक्ति मुझे क्यों नहीं दी?”

     

    सुवर्णा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि ये शक्ति किसी एक इंसान की नहीं है। ये लोगों की रक्षा के लिए है।”

     

    कालकेतु ने तलवार उठाई, लेकिन उसके अपने सैनिक उसके सामने खड़े हो गए।

     

    “हम तुम्हारे लिए अपने राजा के खिलाफ नहीं लड़ेंगे।”

     

    कालकेतु अकेला रह गया।

     

    राजा वीरेंद्र को आजाद कर दिया गया।

     

    उन्होंने अपनी बेटी को गले लगा लिया।

     

    “अब तुम सच जान चुकी हो।”

     

    सुवर्णा ने कहा—

     

    “और अब मैं अपने पंखों से डरूँगी नहीं।”

     

    कुछ महीनों बाद सूर्यगढ़ पहले से भी खुशहाल हो गया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को छिपाना छोड़ दिया।

     

    वह रोज राज्य के लोगों के बीच जाती और जरूरतमंदों की मदद करती।

     

    एक दिन वही विशाल सुनहरा पक्षी फिर महल के ऊपर आया।

     

    सुवर्णा ने आसमान की ओर देखा।

     

    पक्षी कुछ देर उसके ऊपर उड़ता रहा और फिर दूर पहाड़ों की ओर चला गया।

     

    सुवर्णा समझ गई कि उसकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

     

    उसने अपने पंख फैलाए और आसमान की ओर उड़ गई।

     

    नीचे खड़े राजा मुस्कुराते हुए बोले—

     

    “जाओ मेरी बेटी… अब तुम्हें किसी से छिपने की जरूरत नहीं।”

     

    सुवर्णा बादलों के पार निकल गई।

     

    • और उस दिन से लोग उसे सिर्फ सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी नहीं, बल्कि अपने राज्य की रक्षक कहने लगे।

     

    कहते हैं, आज भी जब किसी जरूरतमंद के लिए आसमान में अचानक सुनहरी रोशनी दिखाई देती है, तो लोग कहते हैं—

     

    “राजकुमारी सुवर्णा अभी भी अपने पंखों के साथ हमारी रक्षा कर रही है।”

     

    समाप्त।

  • सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 1

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक खूबसूरत राज्य था—सूर्यगढ़। उस राज्य की सबसे बड़ी खासियत उसका महल नहीं, बल्कि वहां रहने वाली एक राजकुमारी थी, जिसका नाम था सुवर्णा।

     

    सुवर्णा बाकी राजकुमारियों जैसी नहीं थी। उसके लंबे काले बाल थे, चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती थी और उसकी सबसे बड़ी खासियत थी उसके सुनहरी पंख।

     

    जब वह छोटी थी, तभी उसके माता-पिता को पता चल गया था कि उसकी पीठ पर दो छोटे-छोटे सुनहरे पंख हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, पंख भी बड़े होते गए। सूरज की रोशनी पड़ते ही वे ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    राजा वीरेंद्र अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, लेकिन उन्हें हमेशा एक डर सताता था।

     

    “सुवर्णा, तुम्हें अपने पंख किसी के सामने नहीं दिखाने हैं,” राजा ने एक दिन कहा।

     

    सुवर्णा ने हैरानी से पूछा, “लेकिन पिता जी, क्यों?”

     

    राजा कुछ पल चुप रहे।

     

    “क्योंकि हर कोई खूबसूरत चीज की कद्र नहीं करता। कुछ लोग उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

     

    सुवर्णा ने पिता की बात मान ली।

     

    लेकिन महल की ऊँची दीवारों के बीच रहने से उसका मन घुटता था। उसे आसमान देखना बहुत पसंद था। रात में वह महल की छत पर जाकर तारों को देखती और सोचती कि आखिर उसके पंख उसे किस जगह ले जाना चाहते हैं।

     

    एक रात चाँदनी बहुत तेज थी। सुवर्णा चुपके से महल की छत पर पहुँची। उसने चारों तरफ देखा और धीरे-धीरे अपने सुनहरे पंख फैला दिए।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    और अगले ही पल वह हवा में थी।

     

    सुवर्णा हँस पड़ी।

     

    “तो ये है उड़ने की आज़ादी!”

     

    वह बादलों के बीच उड़ती हुई महल से बहुत दूर निकल गई।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि जंगल के दूसरी तरफ कोई उसे देख रहा था।

     

    एक काले पत्थर की पहाड़ी पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पुरानी किताब थी।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “आखिरकार… सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी जाग गई।”

     

    अगली सुबह सुवर्णा वापस महल आ गई।

     

    लेकिन महल में कुछ अजीब था।

     

    सभी सैनिक परेशान थे। राजा अपने कमरे में किसी से जोर-जोर से बात कर रहे थे।

     

    सुवर्णा ने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना।

     

    “वह वापस आ गया है,” राजा कह रहे थे।

     

    सुवर्णा अंदर चली गई।

     

    “कौन वापस आ गया है, पिता जी?”

     

    राजा अचानक चुप हो गए।

     

    “कोई नहीं। तुम अपने कमरे में जाओ।”

     

    “आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “सुवर्णा, आज रात तुम महल से बाहर नहीं निकलोगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    “लेकिन—”

     

    “ये मेरा आदेश है!”

     

    राजा पहली बार उससे इतने कठोर स्वर में बोले थे।

     

    सुवर्णा चुप होकर कमरे में चली गई।

     

    रात होते ही महल के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    सैनिक दौड़ते हुए मुख्य द्वार की तरफ गए।

     

    कुछ देर बाद महल में एक अजनबी आदमी दाखिल हुआ। उसने काले कपड़े पहन रखे थे और उसके साथ कई सैनिक थे।

     

    उसका नाम था कालकेतु।

     

    वह पड़ोसी राज्य का शासक था और अपनी ताकत के लिए पूरे इलाके में मशहूर था।

     

    कालकेतु ने राजा से कहा—

     

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारे पास छिपा है।”

     

    राजा ने जवाब दिया, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।”

     

    कालकेतु मुस्कुराया।

     

    “आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”

     

    राजा का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी बेटी को भूल जाओ।”

     

    कालकेतु की आँखों में लालच चमक उठा।

     

    “उसके सुनहरे पंख सिर्फ सुंदर नहीं हैं, वीरेंद्र। उनमें ऐसी शक्ति है जिससे पूरा राज्य बदला जा सकता है।”

     

    “मैं अपनी बेटी को तुम्हारे हवाले कभी नहीं करूँगा।”

     

    कालकेतु ने तलवार की मूठ पकड़ ली।

     

    उसी समय ऊपर खिड़की के पीछे खड़ी सुवर्णा ने सब कुछ सुन लिया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि उसके पिता उसके पंखों को छिपाने के लिए इतने डरे हुए क्यों रहते थे।

     

    लेकिन असली रहस्य अभी बाकी था।

     

    उसी रात महल के पुराने हिस्से में सुवर्णा को एक बंद कमरा दिखाई दिया। उसके पिता ने उस कमरे में जाने से हमेशा मना किया था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो उसके पंखों पर था—एक सुनहरा सूरज।

     

    सुवर्णा ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर धूल से ढकी एक पुरानी किताब रखी थी।

     

    उसने किताब खोली तो पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी का जन्म हर सौ साल में होता है। लेकिन उसकी शक्ति तभी पूरी होती है, जब वह अपने असली वंश का सच जान ले।”

     

    सुवर्णा के हाथ काँपने लगे।

     

    “असली वंश?”

     

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

     

    “अब तुम्हें सब पता चल ही गया है।”

     

    सुवर्णा ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर राजा वीरेंद्र खड़े थे।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “पिता जी… मैं कौन हूँ?”

     

    राजा कुछ नहीं बोले।

     

    सुवर्णा ने फिर पूछा—

     

    “मैं आपकी बेटी हूँ या नहीं?”

     

    राजा धीरे-धीरे उसके पास आए।

     

    उन्होंने किताब उठाई और बोले—

     

    “तुम मेरी बेटी हो… लेकिन तुम्हारी कहानी मेरे जन्म से भी बहुत पहले शुरू हुई थी।”

     

    अचानक महल के बाहर जोरदार धमाका हुआ।

     

    सैनिकों की आवाजें आने लगीं।

     

    कालकेतु ने महल पर हमला कर दिया था।

     

    राजा ने सुवर्णा का हाथ पकड़ा।

     

    “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। तुम्हें यहां से जाना होगा।”

     

    “लेकिन मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

     

    “तुम्हें जाना ही होगा!”

     

    राजा ने उसे महल के पीछे बने गुप्त रास्ते की ओर धकेला।

     

    सुवर्णा रोते हुए बोली—

     

    “आपने मुझसे इतने सालों तक सच क्यों छिपाया?”

     

    राजा ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें सच पता चल जाता… तो वे तुम्हें ढूँढ़ लेते।”

     

    सुवर्णा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    महल की दीवारें हिल रही थीं।

     

    और तभी उसकी नजर आसमान पर पड़ी।

     

    बादलों के बीच एक विशाल सुनहरा पक्षी उड़ रहा था।

     

    उसने सुवर्णा की तरफ देखा और जोर से आवाज की।

     

    राजा ने घबराकर कहा—

     

    “नहीं… इतनी जल्दी नहीं!”

     

    सुवर्णा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा।

     

    “वह तुम्हें लेने आया है।”

     

    और उसी पल सुवर्णा के सुनहरे पंख अपने आप फैल गए।

     

    आसमान में बिजली चमकी।

     

    महल के ऊपर सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह विशाल पक्षी दोस्त था… या दुश्मन।

    •  
  • हँसी की दुकान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चार दोस्तों की हँसी की दुकान

     

    एक छोटे से गाँव में चार पक्के दोस्त रहते थे—गोलू, पप्पू, चिंटू और बंटी।

     

    चारों की जिंदगी में कोई अपना नहीं था। न कोई बड़ा परिवार, न कोई ऐसा रिश्तेदार जो उनके सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहे। चारों ने बचपन से ही अपनी जिंदगी खुद संभाली थी।

     

    लेकिन एक बात उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती थी।

     

    चारों ने कभी उदास रहना सीखा ही नहीं था।

     

    गोलू हमेशा कहता, “भाई, दुख तो मेहमान की तरह होता है। ज्यादा देर बैठने दो तो चाय भी मांगने लगता है!”

     

    पप्पू तुरंत बोलता, “और चाय के साथ बिस्कुट भी!”

     

    चिंटू कहता, “तो फिर दुख को दरवाजे पर ही बोल दो—बिस्कुट खत्म हैं!”

     

    बंटी सबसे समझदार था, लेकिन उसकी समझदारी भी ज्यादा देर टिकती नहीं थी।

     

    चारों गाँव के पुराने चबूतरे पर बैठते, बातें करते और हँसते रहते।

     

    गाँव वालों ने उनका नाम ही रख दिया था—चार हँसोड़े।

     

    एक दिन चारों बैठे थे कि गाँव का एक आदमी उदास चेहरा लेकर वहाँ से गुजरा।

     

    गोलू ने उसे देखते ही पूछा, “काका, चेहरा ऐसा क्यों बना रखा है जैसे आपकी भैंस ने आपका मोबाइल चबा लिया हो?”

     

    आदमी ने कहा, “बेटा, मेरी भैंस खो गई है।”

     

    चारों चुप हो गए।

     

    फिर पप्पू बोला, “अच्छा… भैंस खो गई है। कोई बात नहीं काका, हम ढूँढेंगे।”

     

    चिंटू बोला, “लेकिन पहले भैंस का फोटो दिखाओ।”

     

    काका ने जेब से फोटो निकाला।

     

    बंटी ने फोटो देखा और बोला, “काका, ये भैंस है या घर का मालिक?”

     

    काका पहली बार मुस्कुराया।

     

    चारों दोस्त भैंस ढूँढने निकल पड़े।

     

    करीब एक घंटे बाद भैंस खेत के पास मिल गई।

     

    काका खुशी से बोला, “बेटा, तुम चारों न होते तो पता नहीं मैं क्या करता।”

     

    गोलू ने कहा, “कुछ नहीं करते काका, घर जाकर भैंस को समझाते कि अगली बार बिना बताए घूमने मत जाना।”

     

    भैंस ने उसी समय जोर से आवाज निकाली।

     

    पप्पू बोला, “देखो, माफी भी मांग रही है!”

     

    काका हँसते-हँसते घर चला गया।

     

    चारों की यही आदत थी।

     

    किसी का मन खराब हो, वे उसे हँसा देते।

     

    किसी का काम बिगड़ जाए, वे मदद कर देते।

     

    और अगर कोई बहुत ज्यादा उदास हो, तो चारों उसके पास बैठ जाते।

     

    एक दिन गाँव में रहने वाला रघु चबूतरे पर अकेला बैठा था। उसके चेहरे पर बहुत चिंता थी।

     

    बंटी ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    रघु ने कहा, “मेरी दुकान में लगातार नुकसान हो रहा है। समझ नहीं आता क्या करूँ।”

     

    गोलू बोला, “हम चारों मिलकर तुम्हारी दुकान चलाएँगे।”

     

    रघु ने आश्चर्य से पूछा, “तुम लोगों को दुकानदारी आती है?”

     

    चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    पप्पू बोला, “नहीं।”

     

    रघु ने माथा पकड़ लिया।

     

    चिंटू बोला, “लेकिन ग्राहक को हँसाना आता है।”

     

    रघु हँस पड़ा।

     

    अगले दिन चारों उसकी दुकान पर पहुँच गए।

     

    गोलू ग्राहक को सामान देता, पप्पू पैसे गिनता, चिंटू सामान जमाता और बंटी बाहर खड़े होकर आवाज लगाता—

     

    “आओ भाई आओ! ऐसी दुकान जहाँ सामान भी मिलेगा और मुफ्त में हँसी भी!”

     

    कुछ ही दिनों में दुकान पर भीड़ बढ़ने लगी।

     

    लोग सामान लेने से ज्यादा चारों की बातें सुनने आने लगे।

     

    रघु की दुकान चल निकली।

     

    रघु ने खुश होकर कहा, “तुम चारों ने मेरी जिंदगी बदल दी।”

     

    गोलू बोला, “बस पैसे समय पर देना।”

     

    रघु ने पूछा, “कितने?”

     

    गोलू बोला, “चार समोसे रोज।”

     

    रघु ने हँसकर कहा, “इतना ही?”

     

    पप्पू बोला, “और चटनी ज्यादा।”

     

    एक दिन चारों ने सोचा कि उन्हें अपना भी कोई काम शुरू करना चाहिए।

     

    बंटी ने कहा, “क्यों न हम हँसी की दुकान खोलें?”

     

    चिंटू बोला, “लोग पैसे देकर हँसने आएँगे?”

     

    गोलू बोला, “क्यों नहीं? आजकल लोग बिना पैसे दिए भी रो रहे हैं।”

     

    आखिर उन्होंने गाँव के चबूतरे के पास एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया—

     

    “चार दोस्तों की हँसी की दुकान—दुख लेकर आओ, मुस्कान लेकर जाओ।”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “पहली हँसी मुफ्त, दूसरी भी मुफ्त, तीसरी के लिए समोसा जरूरी।”

     

    गाँव वाले बोर्ड पढ़कर हँसने लगे।

     

    धीरे-धीरे लोग सच में उनके पास आने लगे।

     

    कोई घर की परेशानी बताता, कोई नौकरी की चिंता, कोई अपनी पत्नी से झगड़े की कहानी।

     

    चारों सबकी बातें सुनते और फिर मजाक-मजाक में उसका मन हल्का कर देते।

     

    एक दिन गाँव का सबसे गंभीर आदमी, ठाकुर साहब, उनके पास आए।

     

    पूरे गाँव में उनकी धाक थी। उन्हें कभी हँसते हुए किसी ने नहीं देखा था।

     

    गोलू ने उन्हें देखते ही कहा, “आज सूरज पश्चिम से कैसे निकला?”

     

    ठाकुर साहब ने घूरकर देखा।

     

    पप्पू ने धीरे से कहा, “भाई, लगता है आज हमारी दुकान बंद हो जाएगी।”

     

    ठाकुर साहब बोले, “मेरी चिंता का मजाक मत बनाओ।”

     

    बंटी तुरंत गंभीर हो गया।

     

    “ठाकुर साहब, हम मजाक नहीं उड़ाएँगे। आप बताइए क्या परेशानी है?”

     

    ठाकुर साहब ने बताया कि उनका बेटा शहर चला गया था और कई दिनों से फोन नहीं कर रहा था। उन्हें उसकी चिंता थी।

     

    इस बार चारों ने कोई मजाक नहीं किया।

     

    वे उनके पास बैठ गए।

     

    चिंटू बोला, “आप अकेले मत सोचिए। हम आपके साथ हैं।”

     

    अगले दिन चारों ने शहर जाकर उनके बेटे का पता लगाया। पता चला कि उसका फोन खराब हो गया था और वह काम में व्यस्त था।

     

    जब बेटा गाँव वापस आया तो ठाकुर साहब की आँखों में खुशी के आँसू थे।

     

    उन्होंने चारों को गले लगाकर कहा, “तुम लोगों के पास अपना कोई नहीं है, फिर भी तुम दूसरों को अपना बना लेते हो।”

     

    गोलू मुस्कुराया।

     

    “ठाकुर साहब, अपना होना खून के रिश्ते से ही थोड़ी होता है।”

     

    पप्पू बोला, “कुछ लोग समोसे खिलाकर भी अपने बन जाते हैं।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    समय बीतता गया।

     

    चारों दोस्त अब गाँव में हर किसी के काम आने लगे थे।

     

    किसी के घर शादी हो तो मदद करते।

     

    किसी का बच्चा बीमार हो तो अस्पताल ले जाते।

     

    किसी का मन दुखी हो तो उसके पास बैठ जाते।

     

    और अपनी जिंदगी में चाहे कितनी भी परेशानी क्यों न हो, वे एक-दूसरे को हँसाना नहीं भूलते।

     

    एक शाम चारों चबूतरे पर बैठे थे।

     

    बंटी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, “हम चारों का अपना कोई नहीं था ना?”

     

    गोलू ने कहा, “गलत।”

     

    “कैसे?”

     

    गोलू ने सामने पूरे गाँव की तरफ इशारा किया।

     

    “देख, अब पूरा गाँव अपना है।”

     

    पप्पू बोला, “और अगर पूरा गाँव अपना है तो शादी में खाना भी पूरा गाँव खिलाएगा।”

     

    चिंटू ने तुरंत कहा, “तुम्हारी नजर रिश्तों पर नहीं, खाने पर रहती है।”

     

    चारों जोर से हँस पड़े।

     

    उसी समय एक छोटा बच्चा उनके पास आया और बोला, “चाचा, मैं भी आपके साथ बैठूँ?”

     

    बंटी ने उसे अपने पास बैठा लिया।

     

    गोलू ने कहा, “क्यों नहीं? हमारी हँसी की दुकान में उम्र की कोई पाबंदी नहीं।”

     

    बच्चा भी हँसने लगा।

     

    चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छीना जरूर था, लेकिन बदले में उन्हें एक ऐसी चीज दी थी जो बहुत कम लोगों के पास होती है—

     

    दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की ताकत।

     

    और उस दिन से गाँव में एक कहावत मशहूर हो गई—

     

    “जिसके घर में चार हँसोड़े दोस्त हों, उसके दरवाजे पर दुख ज्यादा देर टिक ही नहीं सकता।”