चार दोस्तों की हँसी की दुकान
एक छोटे से गाँव में चार पक्के दोस्त रहते थे—गोलू, पप्पू, चिंटू और बंटी।
चारों की जिंदगी में कोई अपना नहीं था। न कोई बड़ा परिवार, न कोई ऐसा रिश्तेदार जो उनके सुख-दुख में हमेशा साथ खड़ा रहे। चारों ने बचपन से ही अपनी जिंदगी खुद संभाली थी।
लेकिन एक बात उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती थी।
चारों ने कभी उदास रहना सीखा ही नहीं था।
गोलू हमेशा कहता, “भाई, दुख तो मेहमान की तरह होता है। ज्यादा देर बैठने दो तो चाय भी मांगने लगता है!”
पप्पू तुरंत बोलता, “और चाय के साथ बिस्कुट भी!”
चिंटू कहता, “तो फिर दुख को दरवाजे पर ही बोल दो—बिस्कुट खत्म हैं!”
बंटी सबसे समझदार था, लेकिन उसकी समझदारी भी ज्यादा देर टिकती नहीं थी।
चारों गाँव के पुराने चबूतरे पर बैठते, बातें करते और हँसते रहते।
गाँव वालों ने उनका नाम ही रख दिया था—चार हँसोड़े।
एक दिन चारों बैठे थे कि गाँव का एक आदमी उदास चेहरा लेकर वहाँ से गुजरा।
गोलू ने उसे देखते ही पूछा, “काका, चेहरा ऐसा क्यों बना रखा है जैसे आपकी भैंस ने आपका मोबाइल चबा लिया हो?”
आदमी ने कहा, “बेटा, मेरी भैंस खो गई है।”
चारों चुप हो गए।
फिर पप्पू बोला, “अच्छा… भैंस खो गई है। कोई बात नहीं काका, हम ढूँढेंगे।”
चिंटू बोला, “लेकिन पहले भैंस का फोटो दिखाओ।”
काका ने जेब से फोटो निकाला।
बंटी ने फोटो देखा और बोला, “काका, ये भैंस है या घर का मालिक?”
काका पहली बार मुस्कुराया।
चारों दोस्त भैंस ढूँढने निकल पड़े।
करीब एक घंटे बाद भैंस खेत के पास मिल गई।
काका खुशी से बोला, “बेटा, तुम चारों न होते तो पता नहीं मैं क्या करता।”
गोलू ने कहा, “कुछ नहीं करते काका, घर जाकर भैंस को समझाते कि अगली बार बिना बताए घूमने मत जाना।”
भैंस ने उसी समय जोर से आवाज निकाली।
पप्पू बोला, “देखो, माफी भी मांग रही है!”
काका हँसते-हँसते घर चला गया।
चारों की यही आदत थी।
किसी का मन खराब हो, वे उसे हँसा देते।
किसी का काम बिगड़ जाए, वे मदद कर देते।
और अगर कोई बहुत ज्यादा उदास हो, तो चारों उसके पास बैठ जाते।
एक दिन गाँव में रहने वाला रघु चबूतरे पर अकेला बैठा था। उसके चेहरे पर बहुत चिंता थी।
बंटी ने पूछा, “क्या हुआ?”
रघु ने कहा, “मेरी दुकान में लगातार नुकसान हो रहा है। समझ नहीं आता क्या करूँ।”
गोलू बोला, “हम चारों मिलकर तुम्हारी दुकान चलाएँगे।”
रघु ने आश्चर्य से पूछा, “तुम लोगों को दुकानदारी आती है?”
चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
पप्पू बोला, “नहीं।”
रघु ने माथा पकड़ लिया।
चिंटू बोला, “लेकिन ग्राहक को हँसाना आता है।”
रघु हँस पड़ा।
अगले दिन चारों उसकी दुकान पर पहुँच गए।
गोलू ग्राहक को सामान देता, पप्पू पैसे गिनता, चिंटू सामान जमाता और बंटी बाहर खड़े होकर आवाज लगाता—
“आओ भाई आओ! ऐसी दुकान जहाँ सामान भी मिलेगा और मुफ्त में हँसी भी!”
कुछ ही दिनों में दुकान पर भीड़ बढ़ने लगी।
लोग सामान लेने से ज्यादा चारों की बातें सुनने आने लगे।
रघु की दुकान चल निकली।
रघु ने खुश होकर कहा, “तुम चारों ने मेरी जिंदगी बदल दी।”
गोलू बोला, “बस पैसे समय पर देना।”
रघु ने पूछा, “कितने?”
गोलू बोला, “चार समोसे रोज।”
रघु ने हँसकर कहा, “इतना ही?”
पप्पू बोला, “और चटनी ज्यादा।”
एक दिन चारों ने सोचा कि उन्हें अपना भी कोई काम शुरू करना चाहिए।
बंटी ने कहा, “क्यों न हम हँसी की दुकान खोलें?”
चिंटू बोला, “लोग पैसे देकर हँसने आएँगे?”
गोलू बोला, “क्यों नहीं? आजकल लोग बिना पैसे दिए भी रो रहे हैं।”
आखिर उन्होंने गाँव के चबूतरे के पास एक छोटा सा बोर्ड लगा दिया—
“चार दोस्तों की हँसी की दुकान—दुख लेकर आओ, मुस्कान लेकर जाओ।”
नीचे लिखा था—
“पहली हँसी मुफ्त, दूसरी भी मुफ्त, तीसरी के लिए समोसा जरूरी।”
गाँव वाले बोर्ड पढ़कर हँसने लगे।
धीरे-धीरे लोग सच में उनके पास आने लगे।
कोई घर की परेशानी बताता, कोई नौकरी की चिंता, कोई अपनी पत्नी से झगड़े की कहानी।
चारों सबकी बातें सुनते और फिर मजाक-मजाक में उसका मन हल्का कर देते।
एक दिन गाँव का सबसे गंभीर आदमी, ठाकुर साहब, उनके पास आए।
पूरे गाँव में उनकी धाक थी। उन्हें कभी हँसते हुए किसी ने नहीं देखा था।
गोलू ने उन्हें देखते ही कहा, “आज सूरज पश्चिम से कैसे निकला?”
ठाकुर साहब ने घूरकर देखा।
पप्पू ने धीरे से कहा, “भाई, लगता है आज हमारी दुकान बंद हो जाएगी।”
ठाकुर साहब बोले, “मेरी चिंता का मजाक मत बनाओ।”
बंटी तुरंत गंभीर हो गया।
“ठाकुर साहब, हम मजाक नहीं उड़ाएँगे। आप बताइए क्या परेशानी है?”
ठाकुर साहब ने बताया कि उनका बेटा शहर चला गया था और कई दिनों से फोन नहीं कर रहा था। उन्हें उसकी चिंता थी।
इस बार चारों ने कोई मजाक नहीं किया।
वे उनके पास बैठ गए।
चिंटू बोला, “आप अकेले मत सोचिए। हम आपके साथ हैं।”
अगले दिन चारों ने शहर जाकर उनके बेटे का पता लगाया। पता चला कि उसका फोन खराब हो गया था और वह काम में व्यस्त था।
जब बेटा गाँव वापस आया तो ठाकुर साहब की आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्होंने चारों को गले लगाकर कहा, “तुम लोगों के पास अपना कोई नहीं है, फिर भी तुम दूसरों को अपना बना लेते हो।”
गोलू मुस्कुराया।
“ठाकुर साहब, अपना होना खून के रिश्ते से ही थोड़ी होता है।”
पप्पू बोला, “कुछ लोग समोसे खिलाकर भी अपने बन जाते हैं।”
सब हँस पड़े।
समय बीतता गया।
चारों दोस्त अब गाँव में हर किसी के काम आने लगे थे।
किसी के घर शादी हो तो मदद करते।
किसी का बच्चा बीमार हो तो अस्पताल ले जाते।
किसी का मन दुखी हो तो उसके पास बैठ जाते।
और अपनी जिंदगी में चाहे कितनी भी परेशानी क्यों न हो, वे एक-दूसरे को हँसाना नहीं भूलते।
एक शाम चारों चबूतरे पर बैठे थे।
बंटी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, “हम चारों का अपना कोई नहीं था ना?”
गोलू ने कहा, “गलत।”
“कैसे?”
गोलू ने सामने पूरे गाँव की तरफ इशारा किया।
“देख, अब पूरा गाँव अपना है।”
पप्पू बोला, “और अगर पूरा गाँव अपना है तो शादी में खाना भी पूरा गाँव खिलाएगा।”
चिंटू ने तुरंत कहा, “तुम्हारी नजर रिश्तों पर नहीं, खाने पर रहती है।”
चारों जोर से हँस पड़े।
उसी समय एक छोटा बच्चा उनके पास आया और बोला, “चाचा, मैं भी आपके साथ बैठूँ?”
बंटी ने उसे अपने पास बैठा लिया।
गोलू ने कहा, “क्यों नहीं? हमारी हँसी की दुकान में उम्र की कोई पाबंदी नहीं।”
बच्चा भी हँसने लगा।
चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छीना जरूर था, लेकिन बदले में उन्हें एक ऐसी चीज दी थी जो बहुत कम लोगों के पास होती है—
दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की ताकत।
और उस दिन से गाँव में एक कहावत मशहूर हो गई—
“जिसके घर में चार हँसोड़े दोस्त हों, उसके दरवाजे पर दुख ज्यादा देर टिक ही नहीं सकता।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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