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सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी

पढ़ने का समय : 6 मिनट

सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 1

 

बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक खूबसूरत राज्य था—सूर्यगढ़। उस राज्य की सबसे बड़ी खासियत उसका महल नहीं, बल्कि वहां रहने वाली एक राजकुमारी थी, जिसका नाम था सुवर्णा।

 

सुवर्णा बाकी राजकुमारियों जैसी नहीं थी। उसके लंबे काले बाल थे, चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती थी और उसकी सबसे बड़ी खासियत थी उसके सुनहरी पंख।

 

जब वह छोटी थी, तभी उसके माता-पिता को पता चल गया था कि उसकी पीठ पर दो छोटे-छोटे सुनहरे पंख हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, पंख भी बड़े होते गए। सूरज की रोशनी पड़ते ही वे ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

 

राजा वीरेंद्र अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, लेकिन उन्हें हमेशा एक डर सताता था।

 

“सुवर्णा, तुम्हें अपने पंख किसी के सामने नहीं दिखाने हैं,” राजा ने एक दिन कहा।

 

सुवर्णा ने हैरानी से पूछा, “लेकिन पिता जी, क्यों?”

 

राजा कुछ पल चुप रहे।

 

“क्योंकि हर कोई खूबसूरत चीज की कद्र नहीं करता। कुछ लोग उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

 

सुवर्णा ने पिता की बात मान ली।

 

लेकिन महल की ऊँची दीवारों के बीच रहने से उसका मन घुटता था। उसे आसमान देखना बहुत पसंद था। रात में वह महल की छत पर जाकर तारों को देखती और सोचती कि आखिर उसके पंख उसे किस जगह ले जाना चाहते हैं।

 

एक रात चाँदनी बहुत तेज थी। सुवर्णा चुपके से महल की छत पर पहुँची। उसने चारों तरफ देखा और धीरे-धीरे अपने सुनहरे पंख फैला दिए।

 

अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

 

और अगले ही पल वह हवा में थी।

 

सुवर्णा हँस पड़ी।

 

“तो ये है उड़ने की आज़ादी!”

 

वह बादलों के बीच उड़ती हुई महल से बहुत दूर निकल गई।

 

लेकिन उसे नहीं पता था कि जंगल के दूसरी तरफ कोई उसे देख रहा था।

 

एक काले पत्थर की पहाड़ी पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पुरानी किताब थी।

 

उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

 

“आखिरकार… सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी जाग गई।”

 

अगली सुबह सुवर्णा वापस महल आ गई।

 

लेकिन महल में कुछ अजीब था।

 

सभी सैनिक परेशान थे। राजा अपने कमरे में किसी से जोर-जोर से बात कर रहे थे।

 

सुवर्णा ने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना।

 

“वह वापस आ गया है,” राजा कह रहे थे।

 

सुवर्णा अंदर चली गई।

 

“कौन वापस आ गया है, पिता जी?”

 

राजा अचानक चुप हो गए।

 

“कोई नहीं। तुम अपने कमरे में जाओ।”

 

“आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।”

 

राजा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

 

“सुवर्णा, आज रात तुम महल से बाहर नहीं निकलोगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

 

“लेकिन—”

 

“ये मेरा आदेश है!”

 

राजा पहली बार उससे इतने कठोर स्वर में बोले थे।

 

सुवर्णा चुप होकर कमरे में चली गई।

 

रात होते ही महल के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

 

सैनिक दौड़ते हुए मुख्य द्वार की तरफ गए।

 

कुछ देर बाद महल में एक अजनबी आदमी दाखिल हुआ। उसने काले कपड़े पहन रखे थे और उसके साथ कई सैनिक थे।

 

उसका नाम था कालकेतु।

 

वह पड़ोसी राज्य का शासक था और अपनी ताकत के लिए पूरे इलाके में मशहूर था।

 

कालकेतु ने राजा से कहा—

 

“मुझे वह चाहिए जो तुम्हारे पास छिपा है।”

 

राजा ने जवाब दिया, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।”

 

कालकेतु मुस्कुराया।

 

“आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”

 

राजा का चेहरा बदल गया।

 

“मेरी बेटी को भूल जाओ।”

 

कालकेतु की आँखों में लालच चमक उठा।

 

“उसके सुनहरे पंख सिर्फ सुंदर नहीं हैं, वीरेंद्र। उनमें ऐसी शक्ति है जिससे पूरा राज्य बदला जा सकता है।”

 

“मैं अपनी बेटी को तुम्हारे हवाले कभी नहीं करूँगा।”

 

कालकेतु ने तलवार की मूठ पकड़ ली।

 

उसी समय ऊपर खिड़की के पीछे खड़ी सुवर्णा ने सब कुछ सुन लिया।

 

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

उसे पहली बार समझ आया कि उसके पिता उसके पंखों को छिपाने के लिए इतने डरे हुए क्यों रहते थे।

 

लेकिन असली रहस्य अभी बाकी था।

 

उसी रात महल के पुराने हिस्से में सुवर्णा को एक बंद कमरा दिखाई दिया। उसके पिता ने उस कमरे में जाने से हमेशा मना किया था।

 

दरवाजे पर वही निशान बना था जो उसके पंखों पर था—एक सुनहरा सूरज।

 

सुवर्णा ने दरवाजा खोला।

 

अंदर धूल से ढकी एक पुरानी किताब रखी थी।

 

उसने किताब खोली तो पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी का जन्म हर सौ साल में होता है। लेकिन उसकी शक्ति तभी पूरी होती है, जब वह अपने असली वंश का सच जान ले।”

 

सुवर्णा के हाथ काँपने लगे।

 

“असली वंश?”

 

तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

 

“अब तुम्हें सब पता चल ही गया है।”

 

सुवर्णा ने पलटकर देखा।

 

दरवाजे पर राजा वीरेंद्र खड़े थे।

 

उनकी आँखों में आँसू थे।

 

“पिता जी… मैं कौन हूँ?”

 

राजा कुछ नहीं बोले।

 

सुवर्णा ने फिर पूछा—

 

“मैं आपकी बेटी हूँ या नहीं?”

 

राजा धीरे-धीरे उसके पास आए।

 

उन्होंने किताब उठाई और बोले—

 

“तुम मेरी बेटी हो… लेकिन तुम्हारी कहानी मेरे जन्म से भी बहुत पहले शुरू हुई थी।”

 

अचानक महल के बाहर जोरदार धमाका हुआ।

 

सैनिकों की आवाजें आने लगीं।

 

कालकेतु ने महल पर हमला कर दिया था।

 

राजा ने सुवर्णा का हाथ पकड़ा।

 

“अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। तुम्हें यहां से जाना होगा।”

 

“लेकिन मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

 

“तुम्हें जाना ही होगा!”

 

राजा ने उसे महल के पीछे बने गुप्त रास्ते की ओर धकेला।

 

सुवर्णा रोते हुए बोली—

 

“आपने मुझसे इतने सालों तक सच क्यों छिपाया?”

 

राजा ने सिर्फ इतना कहा—

 

“क्योंकि अगर तुम्हें सच पता चल जाता… तो वे तुम्हें ढूँढ़ लेते।”

 

सुवर्णा ने पीछे मुड़कर देखा।

 

महल की दीवारें हिल रही थीं।

 

और तभी उसकी नजर आसमान पर पड़ी।

 

बादलों के बीच एक विशाल सुनहरा पक्षी उड़ रहा था।

 

उसने सुवर्णा की तरफ देखा और जोर से आवाज की।

 

राजा ने घबराकर कहा—

 

“नहीं… इतनी जल्दी नहीं!”

 

सुवर्णा ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

राजा ने उसकी ओर देखा।

 

“वह तुम्हें लेने आया है।”

 

और उसी पल सुवर्णा के सुनहरे पंख अपने आप फैल गए।

 

आसमान में बिजली चमकी।

 

महल के ऊपर सुनहरी रोशनी फैल गई।

 

लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह विशाल पक्षी दोस्त था… या दुश्मन।

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