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टैग: #जादुई कहानियां

  • सुनहरी पंखों वाली

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 2

     

    सुनहरी रोशनी पूरे महल पर फैल चुकी थी।

     

    सुवर्णा अपने पंखों को देखकर खुद भी डर गई थी। उसके पंख पहले से कहीं ज्यादा चमक रहे थे।

     

    राजा वीरेंद्र ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “सुवर्णा, ध्यान से सुनो। तुम्हें उस पक्षी के पीछे नहीं जाना है।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि वह मुझे लेने आया है।”

     

    “हाँ… लेकिन मुझे नहीं पता कि वह तुम्हें कहाँ ले जाएगा।”

     

    महल के बाहर कालकेतु की सेना आगे बढ़ रही थी।

     

    राजा ने गुप्त रास्ता खोल दिया।

     

    “अब जाओ।”

     

    “और आप?”

     

    राजा मुस्कुराए।

     

    “एक पिता अपनी बेटी के लिए इतना तो कर ही सकता है।”

     

    सुवर्णा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं वापस आऊँगी।”

     

    वह गुप्त रास्ते से जंगल में निकल गई।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसके सुनहरे पंख फिर चमकने लगे।

     

    आसमान में वही विशाल पक्षी उसके ऊपर मंडराने लगा।

     

    सुवर्णा ने कहा, “अगर तुम मुझे सच में जानते हो, तो मुझे रास्ता दिखाओ।”

     

    पक्षी आगे उड़ गया।

     

    सुवर्णा उसके पीछे उड़ने लगी।

     

    काफी देर बाद वह जंगल के बीच एक पुराने मंदिर के सामने पहुँची।

     

    मंदिर के दरवाजे पर वही सुनहरा सूरज बना था।

     

    जैसे ही सुवर्णा ने दरवाजे को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।

     

    वही औरत जिसने उसे पहली बार उड़ते हुए देखा था।

     

    “तुम कौन हो?” सुवर्णा ने पूछा।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “मैं तुम्हारी दादी की रखवाली करती थी।”

     

    सुवर्णा चौंक गई।

     

    “मेरी दादी?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी असली दादी एक साधारण रानी नहीं थीं। वह सुनहरे पंखों वाले लोगों की आखिरी रानी थीं।”

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को देखा।

     

    “तो ये पंख मुझे उनसे मिले हैं?”

     

    “हाँ। लेकिन तुम्हारे पंखों की असली शक्ति अभी जागी नहीं है।”

     

    “उसे कैसे जगाया जा सकता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “शक्ति पंखों में नहीं होती, सुवर्णा। शक्ति उस दिल में होती है जो उनका इस्तेमाल करता है।”

     

    उसी समय मंदिर के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    कालकेतु वहाँ पहुँच चुका था।

     

    बूढ़ी औरत ने सुवर्णा को पीछे की तरफ ले जाकर एक गुप्त दरवाजा खोला।

     

    “तुम्हें उस पहाड़ की चोटी पर जाना होगा। वहाँ तुम्हें अपने सवालों का आखिरी जवाब मिलेगा।”

     

    “और मेरे पिता?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “अगर तुमने समय रहते अपनी शक्ति समझ ली, तो शायद तुम उन्हें बचा सको।”

     

    सुवर्णा पहाड़ की ओर उड़ चली।

     

    इधर कालकेतु ने महल पर कब्जा कर लिया था।

     

    वह राजा वीरेंद्र के सामने खड़ा था।

     

    “अब बताइए, राजकुमारी कहाँ है?”

     

    राजा ने कुछ नहीं कहा।

     

    कालकेतु ने गुस्से में कहा—

     

    “आप समझते क्यों नहीं? उसके पंखों की शक्ति से मैं पूरे संसार का सबसे ताकतवर राजा बन सकता हूँ!”

     

    राजा ने शांत स्वर में कहा—

     

    “तुम उसकी शक्ति कभी हासिल नहीं कर पाओगे।”

     

    उधर सुवर्णा पहाड़ की चोटी पर पहुँच चुकी थी।

     

    वहाँ उसे एक विशाल पत्थर दिखाई दिया।

     

    पत्थर पर लिखा था—

     

    “जिस दिन सुनहरी राजकुमारी अपने लिए नहीं, किसी और के लिए अपने पंख खोलेगी, उसी दिन उसकी असली शक्ति जागेगी।”

     

    सुवर्णा कुछ समझ नहीं पाई।

     

    तभी उसे दूर से आवाज सुनाई दी।

     

    “सुवर्णा!”

     

    वह पलटी।

     

    एक घायल सैनिक पहाड़ पर चढ़ता हुआ आ रहा था।

     

    “राजकुमारी… राजा को कालकेतु ले गया है।”

     

    सुवर्णा के चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “मेरे पिता को?”

     

    सैनिक ने सिर हिलाया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंख फैलाए।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    वह पूरी गति से महल की ओर उड़ चली।

     

    महल पहुँचते ही उसने देखा कि कालकेतु राजा को लेकर मुख्य आंगन में खड़ा था।

     

    “आ गई मेरी सुनहरी राजकुमारी।”

     

    सुवर्णा नीचे उतरी।

     

    “मेरे पिता को छोड़ दो।”

     

    कालकेतु हँसा।

     

    “पहले अपने पंखों की शक्ति मुझे दो।”

     

    “अगर मैंने मना कर दिया?”

     

    “तो तुम्हारे पिता को नुकसान होगा।”

     

    सुवर्णा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने अपने पंख बंद कर लिए।

     

    “ठीक है।”

     

    राजा चिल्लाए—

     

    “नहीं, सुवर्णा!”

     

    सुवर्णा ने कालकेतु की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन तभी उसके पंखों से सुनहरी रोशनी निकली और पूरे आंगन में फैल गई।

     

    कालकेतु पीछे हट गया।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सुवर्णा के पंखों से निकली रोशनी किसी हथियार की तरह नहीं थी।

     

    वह महल के चारों तरफ फैल गई।

     

    जहाँ-जहाँ रोशनी पहुँची, वहाँ बंद दरवाजे खुल गए, सैनिकों के हथियार जमीन पर गिर गए और लोगों के चेहरों पर डर की जगह हिम्मत दिखाई देने लगी।

     

    कालकेतु घबरा गया।

     

    “तुमने अपनी शक्ति मुझे क्यों नहीं दी?”

     

    सुवर्णा मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि ये शक्ति किसी एक इंसान की नहीं है। ये लोगों की रक्षा के लिए है।”

     

    कालकेतु ने तलवार उठाई, लेकिन उसके अपने सैनिक उसके सामने खड़े हो गए।

     

    “हम तुम्हारे लिए अपने राजा के खिलाफ नहीं लड़ेंगे।”

     

    कालकेतु अकेला रह गया।

     

    राजा वीरेंद्र को आजाद कर दिया गया।

     

    उन्होंने अपनी बेटी को गले लगा लिया।

     

    “अब तुम सच जान चुकी हो।”

     

    सुवर्णा ने कहा—

     

    “और अब मैं अपने पंखों से डरूँगी नहीं।”

     

    कुछ महीनों बाद सूर्यगढ़ पहले से भी खुशहाल हो गया।

     

    सुवर्णा ने अपने पंखों को छिपाना छोड़ दिया।

     

    वह रोज राज्य के लोगों के बीच जाती और जरूरतमंदों की मदद करती।

     

    एक दिन वही विशाल सुनहरा पक्षी फिर महल के ऊपर आया।

     

    सुवर्णा ने आसमान की ओर देखा।

     

    पक्षी कुछ देर उसके ऊपर उड़ता रहा और फिर दूर पहाड़ों की ओर चला गया।

     

    सुवर्णा समझ गई कि उसकी कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

     

    उसने अपने पंख फैलाए और आसमान की ओर उड़ गई।

     

    नीचे खड़े राजा मुस्कुराते हुए बोले—

     

    “जाओ मेरी बेटी… अब तुम्हें किसी से छिपने की जरूरत नहीं।”

     

    सुवर्णा बादलों के पार निकल गई।

     

    • और उस दिन से लोग उसे सिर्फ सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी नहीं, बल्कि अपने राज्य की रक्षक कहने लगे।

     

    कहते हैं, आज भी जब किसी जरूरतमंद के लिए आसमान में अचानक सुनहरी रोशनी दिखाई देती है, तो लोग कहते हैं—

     

    “राजकुमारी सुवर्णा अभी भी अपने पंखों के साथ हमारी रक्षा कर रही है।”

     

    समाप्त।

  • सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी — भाग 1

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक खूबसूरत राज्य था—सूर्यगढ़। उस राज्य की सबसे बड़ी खासियत उसका महल नहीं, बल्कि वहां रहने वाली एक राजकुमारी थी, जिसका नाम था सुवर्णा।

     

    सुवर्णा बाकी राजकुमारियों जैसी नहीं थी। उसके लंबे काले बाल थे, चेहरे पर हमेशा हल्की मुस्कान रहती थी और उसकी सबसे बड़ी खासियत थी उसके सुनहरी पंख।

     

    जब वह छोटी थी, तभी उसके माता-पिता को पता चल गया था कि उसकी पीठ पर दो छोटे-छोटे सुनहरे पंख हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, पंख भी बड़े होते गए। सूरज की रोशनी पड़ते ही वे ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    राजा वीरेंद्र अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, लेकिन उन्हें हमेशा एक डर सताता था।

     

    “सुवर्णा, तुम्हें अपने पंख किसी के सामने नहीं दिखाने हैं,” राजा ने एक दिन कहा।

     

    सुवर्णा ने हैरानी से पूछा, “लेकिन पिता जी, क्यों?”

     

    राजा कुछ पल चुप रहे।

     

    “क्योंकि हर कोई खूबसूरत चीज की कद्र नहीं करता। कुछ लोग उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

     

    सुवर्णा ने पिता की बात मान ली।

     

    लेकिन महल की ऊँची दीवारों के बीच रहने से उसका मन घुटता था। उसे आसमान देखना बहुत पसंद था। रात में वह महल की छत पर जाकर तारों को देखती और सोचती कि आखिर उसके पंख उसे किस जगह ले जाना चाहते हैं।

     

    एक रात चाँदनी बहुत तेज थी। सुवर्णा चुपके से महल की छत पर पहुँची। उसने चारों तरफ देखा और धीरे-धीरे अपने सुनहरे पंख फैला दिए।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    और अगले ही पल वह हवा में थी।

     

    सुवर्णा हँस पड़ी।

     

    “तो ये है उड़ने की आज़ादी!”

     

    वह बादलों के बीच उड़ती हुई महल से बहुत दूर निकल गई।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि जंगल के दूसरी तरफ कोई उसे देख रहा था।

     

    एक काले पत्थर की पहाड़ी पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पुरानी किताब थी।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—

     

    “आखिरकार… सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी जाग गई।”

     

    अगली सुबह सुवर्णा वापस महल आ गई।

     

    लेकिन महल में कुछ अजीब था।

     

    सभी सैनिक परेशान थे। राजा अपने कमरे में किसी से जोर-जोर से बात कर रहे थे।

     

    सुवर्णा ने दरवाजे के बाहर खड़े होकर सुना।

     

    “वह वापस आ गया है,” राजा कह रहे थे।

     

    सुवर्णा अंदर चली गई।

     

    “कौन वापस आ गया है, पिता जी?”

     

    राजा अचानक चुप हो गए।

     

    “कोई नहीं। तुम अपने कमरे में जाओ।”

     

    “आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “सुवर्णा, आज रात तुम महल से बाहर नहीं निकलोगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    “लेकिन—”

     

    “ये मेरा आदेश है!”

     

    राजा पहली बार उससे इतने कठोर स्वर में बोले थे।

     

    सुवर्णा चुप होकर कमरे में चली गई।

     

    रात होते ही महल के बाहर घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

     

    सैनिक दौड़ते हुए मुख्य द्वार की तरफ गए।

     

    कुछ देर बाद महल में एक अजनबी आदमी दाखिल हुआ। उसने काले कपड़े पहन रखे थे और उसके साथ कई सैनिक थे।

     

    उसका नाम था कालकेतु।

     

    वह पड़ोसी राज्य का शासक था और अपनी ताकत के लिए पूरे इलाके में मशहूर था।

     

    कालकेतु ने राजा से कहा—

     

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारे पास छिपा है।”

     

    राजा ने जवाब दिया, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।”

     

    कालकेतु मुस्कुराया।

     

    “आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”

     

    राजा का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी बेटी को भूल जाओ।”

     

    कालकेतु की आँखों में लालच चमक उठा।

     

    “उसके सुनहरे पंख सिर्फ सुंदर नहीं हैं, वीरेंद्र। उनमें ऐसी शक्ति है जिससे पूरा राज्य बदला जा सकता है।”

     

    “मैं अपनी बेटी को तुम्हारे हवाले कभी नहीं करूँगा।”

     

    कालकेतु ने तलवार की मूठ पकड़ ली।

     

    उसी समय ऊपर खिड़की के पीछे खड़ी सुवर्णा ने सब कुछ सुन लिया।

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि उसके पिता उसके पंखों को छिपाने के लिए इतने डरे हुए क्यों रहते थे।

     

    लेकिन असली रहस्य अभी बाकी था।

     

    उसी रात महल के पुराने हिस्से में सुवर्णा को एक बंद कमरा दिखाई दिया। उसके पिता ने उस कमरे में जाने से हमेशा मना किया था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो उसके पंखों पर था—एक सुनहरा सूरज।

     

    सुवर्णा ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर धूल से ढकी एक पुरानी किताब रखी थी।

     

    उसने किताब खोली तो पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “सुनहरी पंखों वाली राजकुमारी का जन्म हर सौ साल में होता है। लेकिन उसकी शक्ति तभी पूरी होती है, जब वह अपने असली वंश का सच जान ले।”

     

    सुवर्णा के हाथ काँपने लगे।

     

    “असली वंश?”

     

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

     

    “अब तुम्हें सब पता चल ही गया है।”

     

    सुवर्णा ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर राजा वीरेंद्र खड़े थे।

     

    उनकी आँखों में आँसू थे।

     

    “पिता जी… मैं कौन हूँ?”

     

    राजा कुछ नहीं बोले।

     

    सुवर्णा ने फिर पूछा—

     

    “मैं आपकी बेटी हूँ या नहीं?”

     

    राजा धीरे-धीरे उसके पास आए।

     

    उन्होंने किताब उठाई और बोले—

     

    “तुम मेरी बेटी हो… लेकिन तुम्हारी कहानी मेरे जन्म से भी बहुत पहले शुरू हुई थी।”

     

    अचानक महल के बाहर जोरदार धमाका हुआ।

     

    सैनिकों की आवाजें आने लगीं।

     

    कालकेतु ने महल पर हमला कर दिया था।

     

    राजा ने सुवर्णा का हाथ पकड़ा।

     

    “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। तुम्हें यहां से जाना होगा।”

     

    “लेकिन मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

     

    “तुम्हें जाना ही होगा!”

     

    राजा ने उसे महल के पीछे बने गुप्त रास्ते की ओर धकेला।

     

    सुवर्णा रोते हुए बोली—

     

    “आपने मुझसे इतने सालों तक सच क्यों छिपाया?”

     

    राजा ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें सच पता चल जाता… तो वे तुम्हें ढूँढ़ लेते।”

     

    सुवर्णा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    महल की दीवारें हिल रही थीं।

     

    और तभी उसकी नजर आसमान पर पड़ी।

     

    बादलों के बीच एक विशाल सुनहरा पक्षी उड़ रहा था।

     

    उसने सुवर्णा की तरफ देखा और जोर से आवाज की।

     

    राजा ने घबराकर कहा—

     

    “नहीं… इतनी जल्दी नहीं!”

     

    सुवर्णा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा।

     

    “वह तुम्हें लेने आया है।”

     

    और उसी पल सुवर्णा के सुनहरे पंख अपने आप फैल गए।

     

    आसमान में बिजली चमकी।

     

    महल के ऊपर सुनहरी रोशनी फैल गई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह विशाल पक्षी दोस्त था… या दुश्मन।

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