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जिंदगी अनमोल है

पढ़ने का समय : 5 मिनट

जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 1

 

शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का एक लड़का रहता था। आरव पढ़ाई में अच्छा था और बचपन से ही उसके बहुत सारे सपने थे। वह चाहता था कि एक दिन अपने माता-पिता के लिए एक अच्छा घर बनाएगा, अपनी छोटी बहन की पढ़ाई पूरी करवाएगा और अपनी पसंद का काम करके अपने पैरों पर खड़ा होगा।

 

लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी जिंदगी में परेशानियाँ बढ़ती चली गईं।

 

पिता की नौकरी चली गई।

 

घर की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी।

 

माँ घर चलाने के लिए सिलाई करने लगीं और आरव भी पढ़ाई के साथ छोटा-मोटा काम करने लगा।

 

शुरुआत में आरव हर मुश्किल का सामना हँसकर करता था।

 

वह अपनी माँ से कहता—

 

“माँ, चिंता मत करो। ये समय भी निकल जाएगा।”

 

माँ उसके सिर पर हाथ रखकर कहतीं—

 

“मुझे अपने बेटे पर भरोसा है।”

 

लेकिन कुछ महीनों बाद आरव की जिंदगी में एक और परेशानी आ गई।

 

जिस प्रतियोगी परीक्षा की वह तैयारी कर रहा था, उसमें वह असफल हो गया।

 

उसके कई दोस्त सफल हो गए थे।

 

सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें देखकर आरव को लगता कि सबकी जिंदगी आगे बढ़ रही है और सिर्फ वही पीछे रह गया है।

 

एक दिन उसका दोस्त रोहित उससे मिलने आया।

 

“आरव, चल कहीं बाहर चलते हैं।”

 

आरव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

 

“मेरा मन नहीं है।”

 

“तू कई दिनों से घर से बाहर नहीं निकला।”

 

“तो क्या करूँ?”

 

रोहित चुप हो गया।

 

आरव अचानक गुस्से में बोला—

 

“तुम लोगों को क्या पता मेरी हालत का? सबको लगता है कि बस मेहनत करो और सफलता मिल जाएगी। लेकिन अगर बार-बार हार मिले तो?”

 

रोहित ने धीरे से कहा—

 

“हार मिलने का मतलब ये नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई।”

 

आरव हँस पड़ा।

 

“तुम्हारे लिए बोलना आसान है।”

 

रोहित ने बहस नहीं की।

 

वह जाते-जाते बस इतना कह गया—

 

“जब भी बात करनी हो, मुझे फोन करना। मैं सुनूँगा।”

 

लेकिन आरव ने फोन नहीं किया।

 

वह अपने कमरे में बंद रहने लगा।

 

उसे अपने अंदर की परेशानियाँ किसी से कहना मुश्किल लगता था।

 

माँ कई बार उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक देतीं।

 

“बेटा, खाना रख दूँ?”

 

अंदर से जवाब आता—

 

“भूख नहीं है।”

 

“थोड़ा सा खा ले।”

 

“माँ, बाद में।”

 

माँ दरवाजे के बाहर कुछ देर खड़ी रहतीं और फिर चुपचाप चली जातीं।

 

एक रात आरव अपनी पुरानी डायरी खोलकर बैठा।

 

उसमें बचपन के सपने लिखे थे।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

 

आरव उस लाइन को देर तक देखता रहा।

 

उसे अपने बचपन का चेहरा याद आया।

 

वह बच्चा जो छोटी-सी चीज मिलने पर भी खुश हो जाता था।

 

जिसे पतंग उड़ाने में खुशी मिलती थी।

 

जो बारिश में भीगने के लिए माँ से डाँट खाता था।

 

आरव की आँखें नम हो गईं।

 

“मैं इतना बदल कैसे गया?”

 

लेकिन उसके मन का बोझ अभी भी कम नहीं हुआ।

 

अगले दिन वह बिना किसी को बताए घर से बाहर निकल गया।

 

वह शहर के पुराने पार्क में जाकर एक बेंच पर बैठ गया।

 

वहाँ एक बुजुर्ग आदमी रोज की तरह बैठे अखबार पढ़ रहे थे।

 

उन्होंने आरव को कई दिनों से वहाँ बैठे देखा था।

 

उन्होंने पूछा—

 

“बेटा, परेशान लग रहे हो।”

 

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

बुजुर्ग ने अखबार मोड़कर रख दिया।

 

“अगर बात नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं। मैं बस इतना कहूँगा कि परेशानी को अकेले उठाना बहुत भारी पड़ता है।”

 

आरव ने पहली बार उनकी तरफ देखा।

 

“अगर जिंदगी में कुछ भी सही न हो रहा हो तो क्या करना चाहिए?”

 

बुजुर्ग ने कुछ पल सोचा।

 

“एक दिन का फैसला पूरे जीवन के लिए मत करना।”

 

आरव चुप रहा।

 

बुजुर्ग बोले—

 

“मुश्किल समय में दिमाग हमें बताता है कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन सच ये होता है कि मुश्किल समय सिर्फ एक हिस्सा होता है, पूरी जिंदगी नहीं।”

 

आरव ने पूछा—

 

“लेकिन अगर इंसान बार-बार हारता रहे तो?”

 

“तो अगली बार अलग तरीके से कोशिश करनी चाहिए।”

 

“और अगर हिम्मत ही न बचे?”

 

बुजुर्ग मुस्कुराए।

 

“तो किसी ऐसे इंसान के पास बैठो जो तुम्हें संभाल सके। हिम्मत हमेशा अकेले पैदा नहीं करनी पड़ती। कभी-कभी दूसरे लोग हमारी हिम्मत बन जाते हैं।”

 

आरव उनकी बातें सुनता रहा।

 

तभी उसका फोन बजा।

 

माँ का फोन था।

 

उसने फोन उठाया।

 

“हाँ माँ?”

 

माँ ने सिर्फ इतना कहा—

 

“बेटा, तू ठीक है ना?”

 

आरव कुछ बोल नहीं पाया।

 

माँ ने फिर पूछा—

 

“कहाँ है?”

 

“पार्क में।”

 

“घर आ जा बेटा। मैं इंतजार कर रही हूँ।”

 

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“माँ, मैं घर आ रहा हूँ।”

 

फोन कट गया।

 

वह उठने लगा।

 

तभी उसकी नजर पार्क में खेल रहे कुछ बच्चों पर पड़ी।

 

एक बच्चा गिर गया था।

 

वह रोया, फिर उसके दोस्त ने हाथ बढ़ाया।

 

“उठ, फिर से खेलते हैं।”

 

बच्चा उठ गया।

 

आरव कुछ देर उन्हें देखता रहा।

 

उसे लगा जैसे जिंदगी भी यही कह रही हो—

 

“गिर गए हो तो उठो। खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

 

वह घर की ओर चल पड़ा।

 

लेकिन उसे पता नहीं था कि घर पहुँचने के बाद उसे अपनी जिंदगी का एक ऐसा सच पता चलने वाला था, जो उसकी सोच पूरी तरह बदल देगा।

 

 

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