🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

Blog

  • अधूरी इबादत भाग~51

    अधूरी इबादत भाग~51

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~51 पहली बार भूली? 

     

    पिछली रात…

    रूहानी बिस्तर पर लेटी थी, पर नींद उसकी पलकों से कोसों दूर थी। तकिये पर सिर रखते ही आँखें बंद तो हो जातीं, पर भीतर चलती अशांत तस्वीरें उन्हें फिर से खोल देती थीं।

    दिन भर का हर एक लम्हा जैसे उलझ कर उसकी साँसों में अटक गया था….. अपने नए स्टूडियो की चमकती शुरुआत, फिर अचानक एकांश राठौड़ और काम्या रैना की मौजूदगी, उन दोनों के शब्दों की वह छुपी हुई नश्तर-सी चुभन, और फिर लौटते वक़्त वो सड़क पर हुआ हल्का-सा एक्सिडेंट… सब कुछ जैसे किसी भारी चादर की तरह उस पर लिपट गया था।

    पलंग पर लेटी रूहानी करवट पर करवट बदल रही थी, जैसे उसका जिस्म बिस्तर पर था, पर रूह उसके ही अंदर किसी और समय में लौट गया हो। चादर के नीचे उसकी उंगलियां एक-दूसरे में उलझी हुई थीं, और उसके सीने में बेचैनी किसी अनसुने संगीत की तरह बज रही थी। बाहर रात चुप थी, पर उसके भीतर हज़ार आवाज़ें चल रही थीं। 

    उसने आँखें बंद कीं, लेकिन उस अंधेरे में एक दृश्य चमकने लगा…. वही शाम, जब पहली बार एकांश ने उसे इस तरह छुआ था कि उसकी साँसें थम गई थीं। 

    flashback 

    India Fashion Week के सेमी-फाइनल की रात थी। होटल के उस रूम में बस सिलाई मशीन की टकटक और रूहानी की सांसों की आवाज़ थी। 

    उसके हाथ लगातार काम में लगे थे….. कभी कपड़ों की तह जांचती, तो कभी स्केच पैड पर कुछ जोड़ती घटाती। आँखों में नींद नहीं थी, बस जूनून था। 

    उसके चेहरे पर पसीने की हल्की परत थी, पर आंखों में कोई थकान नहीं…. सिर्फ़ जीत की ललक।

    उसी कमरे के एक कोने में, एकांश बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसका कैमरा हाथ में था, जिसमें वो बार-बार वो तस्वीर देख रहा था जो उसने चुपके से खींची थी…. रूहानी की। उसकी आंखें उस फोटो में कुछ ढूंढ रही थीं… शायद वो मासूमियत जो उसे रूहानी में सबसे पहले दिखी थी।

    कुछ पल बाद, वो उठकर उसके पास आया। कैमरा टेबल पर रखा और बिना कुछ कहे, धीरे से उसका हाथ थामा। रूहानी चौंकी, उसके हाथ रुक गए। उसने सिर उठाकर देखा और एक प्रश्न भरी नज़र उसकी आंखों में तैर गई।

    “थोड़ा आराम कर लो, रूहानी,” एकांश ने धीमे से कहा और उसके हाथों को पकड़कर बिस्तर तक ले आया। उसके पास बैठकर उसके गाल को अपनी हथेली से सहलाया। 

    “अब भी काफ़ी समय है,” उसकी आवाज़ में एक अजीब नरमी थी, जो रूहानी को और बेचैन कर गई।

    “नहीं, एकांश,” रूहानी ने घबराई सी आवाज़ में कहा, “ज़्यादा समय नहीं है। मुझे किसी भी हालत में ये प्रतियोगिता जीतनी है। ये मेरा सपना है… मेरा सब कुछ।”

    “रूहानी… listen… listen… मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। तुम जरूर जीतोगी। लेकिन कभी-कभी बस एक पल को जी लेना भी ज़रूरी होता है। कम से कम, इस मोड़ तक पहुँचने का एहसास तो करो।”

    वो कुछ कह नहीं पाई, बस मासूमियत से बोली, “क्या कहना चाह रहे हो, एकांश?”

    एकांश ने उसके दोनों गालों को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसकी आंखें बहुत पास थीं अब।

    “हमें मिले कितना वक़्त हो गया, रूहानी?”

    रूहानी ने धीमे से कहा, “मुझे ठीक से याद नहीं… शायद बारह या पंद्रह महीने।”

    “Do you have any feeling for me?” एकांश की आवाज़ हल्की, पर सीधी थी।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे, धीरे से हां में सिर हिला दिया और अपनी नज़रें झुका लीं। वो उसकी ज़िंदगी का पहला ऐसा इंसान था, जिसके लिए उसने इतना गहरा महसूस किया था…. दिल से, आत्मा से। 

    अगले ही पल, एकांश ने उसके चेहरे को अपने और नज़दीक खींच लिया, और उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया।

    रूहानी का शरीर अकड़ गया। उसने चादर के दोनों किनारों को कसकर पकड़ लिया। उसकी पलकों में हलचल थी, सांसें उलझी हुई, और मन भीतर से कांप उठा। 

    ये सब उसके लिए बहुत नया था… बहुत अजीब। वो न तो जवाब दे पा रही थी, न खुद को पूरी तरह उस पल में छोड़ पा रही थी।

    पर एकांश को शायद इसका एहसास नहीं था। वो बस उसी लम्हे में डूबा रहा…. बिना यह देखे कि रूहानी के होंठ सिर्फ़ चुप थे, जवाब नहीं दे रहे थे।

    वो इस खामोश असहजता को प्रेम का पल समझता रहा… और रूहानी, उस चुप्पी में खुद से कुछ खोती रही।

    कुछ देर रूहानी के होंठो को चूसने के बाद एकांश उसके गर्दन पर चला गया और अपने हाथों से रूहानी के टॉप को उसके कमर के पास से उठने लगा। 

    तभी रूहानी जैसे किसी नींद से जागी, उसने तुरंत एकांश के हाथ को अपनी कमर पर से झटके से हटाया और उठ खड़ी हुई। 

    तभी एकांश ने उसे बिस्तर पर पटक दिया, उसके ऊपर आकर बोला, “everything is fine ruhani” 

    रूहानी की आंखे भरने लगी, वो एक ही बात दोहराए जा रही थी, “नहीं एकांश, ये सही नहीं है, मैं हमारी शादी के बाद सब कुछ करूंगी लेकिन अभी नहीं……”

    एकांश बोला, “रूहानी! I’m aroused now, what should I do, please”

    और इतना बोलकर एकांश रूहानी के कॉलरबोन को चुमना शुरू कर दिया। 

    रुहानी घबराने लगी थी, उसने अपना पूरा जोर लगाकर एकांश को खुद के ऊपर से हटा दिया और एक जोरदार तमाचा एकांश के गाल पर जड़ दिया। 

    एकांश की आंखे गुस्से से लाल हो गई थी, वो जैसी ही रूहानी की तरफ बढ़ा, रूहानी बिना एक पल की देरी किए बाथरूम में घुस गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। 

    एकांश कुछ देर गेट खटखटया, लेकिन रूहानी नहीं निकली। वो पूरी रात उसके वॉशरूम में रोते-रोते सो गई थी। 

    Flashback end

    और फिर… पता नहीं कब, रूहानी करवट बदलते-बदलते उठी। आँखें अधखुली थीं, मगर बदन नींद में डूबा हुआ।

    वो बिस्तर से उतरी। नंगे पाँव, बिना किसी शोर के, जैसे कोई परछाई चल रही हो। हल्की रोशनी में उसका चेहरा थका हुआ नहीं, खोया हुआ लग रहा था। वो धीरे-धीरे बाहर निकली… और वहीं, किचन के पास, किसी को खड़ा देखा।

    उसकी आँखों ने पहचान नहीं की…. उसका दिल ही था जिसने कहा, “यश…..”

    वो चली गई उस साये की ओर और गले लग गई। जैसे किसी भुला दिए गए रिश्ते की गर्माहट तलाश रही हो। जैसे कोई बच्ची अपने पुराने तकिये को ढूँढ रही हो, जिसमें उसकी माँ की महक थी।

    उसने कसकर पकड़ लिया… और फिर वहीँ, बिना कुछ कहे, कुछ और सोचे, उसकी आँखें बंद हो गईं।

    कुछ देर ऐसे ही गुज़रा… फिर जैसे किसी डोर ने उसे वापस खींचा हो, रूहानी ने धीरे से अपनी पकड़ ढीली की, और उसी गति से वापस मुड़ गई। बिना किसी सवाल, बिना किसी आवाज़, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और वो चली गई। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    आज सुबह…

    जब अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..” तो रूहानी का गला भर आया था। 

    उसने जल्दी से “मैं फ्रेश हो कर आती हूँ” कहकर अद्वैत के चेहरे पर ही दरवाजा बंद कर लिया था। 

    उसने तुरंत बेड साइड टेबल पर से अपना मोबाइल उठाया और बिना देरी किए इंस्टाग्राम खोला और पिछले दिन की opening ceremony की कुछ तस्वीरें अपलोड कर दीं……

    studio की चमकदार तस्वीरें, cake-cutting की खुशी, gungun के साथ candid moments

    और लिखा:

    “Chapter 3 – From Ruins to Radiance ✨ #StitchAndSoul #GrandOpening”

    जैसे ही उसने पोस्ट किया, स्क्रीन पर एक reminder pop‑up आया:

    “मेरे प्यारे भाई यश का जन्मदिन”

    उसके होंठों के बीच फुसफुसाहट थी, “मुझे याद क्यों नहीं रहा?”

    उसकी आँखों में guilt का कांटा घुसा, और दिल एक अजीब तरह की बेचैनी से भर गया। 

    वह खुद से बोली, “पहली बार… मैं कैसे… ये भूल गई?”

    वह इस सोच में डूब गई की अब वह अपने छोटे भाई से क्या बोलेगी?

    ——————

    क्या एकांश उस खामोशी को अब भी इश्क़ मानता है… या उसने जानबूझकर अनदेखा किया था रूहानी की कांपती रूह को?

    क्या यश सच में वहीं था… या ये सिर्फ़ रूहानी की थकी हुई तन्हाई का एक वहम था?  

    क्या वाकई गलती से भूली थी रूहानी उसका जन्मदिन… या वो कुछ ऐसा भूल जाना चाहती थी, जिसे याद करना अब सिर्फ दर्द देता है?

     

  • अधूरी इबादत भाग~50

    अधूरी इबादत भाग~50

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~50 उसने शर्ट क्यों भीगने दी? 

     

    सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी और एक तीखी हॉर्न की आवाज़ ने रात के सीने को चीरते हुए सब कुछ झकझोर दिया। 

    रुहानी ने एक झटके में आँखें बंद कर लीं और दोनों हाथों से डैशबोर्ड को पकड़ लिया। अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं, जैसे वक़्त को वहीं थाम लेना चाहता हो।

    सामने से आती गाड़ी, नशे में चूर किसी ड्राइवर के हाथों से लगभग बेकाबू थी। वो बेतहाशा झूलती हुई सीधे उनकी ओर बढ़ रही थी जैसे किस्मत ने अचानक अपनी चाल बदल ली हो। 

    रुहानी की सांस जैसे गले में अटक गई, और अद्वैत के चेहरे पर आया पसीना रात की ठंडी हवा में भी सर्द नहीं हो रहा था।

    लेकिन… ठीक उस अंतिम सेकंड में, जब दो ज़िंदगियाँ किसी अनजाने मोड़ पर थमने को थीं…. अद्वैत ने ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा और गाड़ी को एक मोड़ पर दाईं ओर घुमा दिया।

    टायरों की चीख़ती आवाज़ सड़क की रगों में उतर गई और उस दूसरी कार की हेडलाइट्स उनकी विंडशील्ड पर एक पल के लिए ठहरकर पीछे निकल गईं… बिना टकराए, बिना छुए… सिर्फ़ एक डर बनकर।

    अंदर, कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया।

    रुहानी की साँस अब भी अधूरी थी, आँखें फटी की फटी। अद्वैत की उंगलियाँ अब भी स्टीयरिंग पर जमी थीं, पर पकड़ अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही थी।

    “रुहानी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर थमी नहीं, “तुम ठीक हो?”

    रुहानी ने बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सिर हिलाया, फिर कांपते होंठों से फुसफुसाई, “बस… एक पल लगा था कि सब खत्म हो जाएगा…”

    अद्वैत ने गाड़ी को एक किनारे रोक दिया, इंजन बंद कर दिया… लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वो अब डर से नहीं, राहत से भरी थी। दो धड़कनों ने एक ही समय पर महसूस किया कि ज़िंदगी अभी बाकी है।

    अद्वैत ने देखा, रूहानी का हाथ अब भी हल्का कांप रहा था। 

    “सब ठीक हैं, रूहानी” अद्वैत ने धीमे से कहा। 

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात के ढाई बज चुके थे। घर की हर दीवार जैसे नींद में डूबी हुई थी। सिर्फ़ किचन में लगी हल्की पीली रौशनी जग रही थी… उतनी ही चुप, जितना अद्वैत का मन। 

    वो काउंटर के पास खड़ा अपनी पानी की बोतल भर रहा था, जैसे उस सन्नाटे को किसी छोटे से काम से तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।

    उसने जैसे ही फ्रिज का दरवाज़ा बंद किया, पीछे से आती किसी धीमी, नंगे पाँव की आहट ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। 

    उसने मुड़कर देखा…. रूहानी।

    वो थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे नींद में चल रही हो, या किसी भारी याद के बोझ से दब गई हो। उसकी आँखें अधखुली थीं, पाँव धीरे-धीरे फर्श पर सरकते हुए बढ़ रहे थे। कोई सजगता नहीं, कोई हड़बड़ाहट नहीं…. बस एक थकी हुई सी मौजूदगी।

    “रूहानी?” अद्वैत ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”

    कोई जवाब नहीं।

    और फिर अचानक… जैसे किसी टूटे हुए पल ने खुद को समेट लिया हो…. रूहानी उसके सीने से आकर लग गई। उसके हाथ अद्वैत की नाइट शर्ट को कस के पकड़ चुके थे, जैसे वो उसे छोड़ देगी तो गिर जाएगी, टूट जाएगी, फिर कभी उठ नहीं पाएगी।

    अद्वैत एकदम जड़ हो गया। उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली और नसें जैसे सख्त हो गईं हों। उसने खुद को पीछे हटाने की कोशिश की…. हड़बड़ाहट नहीं थी, बस उलझन थी…. पर रूहानी की पकड़ और भी मज़बूत हो गई। 

    वो काँप रही थी, उसकी साँसों में बिखरी कोई पुरानी बेचैनी थी और आँखों से आंसू लगातार उसके सीने में भीग रहे थे।

    “रूहानी… क्या हुआ?” अद्वैत ने फिर कोशिश की, आवाज़ इस बार ज़रा कम सख्त थी।

    लेकिन लब अब भी ख़ामोश थे। जैसे कोई आवाज़ थी, जो भीतर से उठ तो रही थी, पर रास्ता नहीं मिल रहा था।

    अद्वैत के भीतर जैसे कुछ खामोश सा चटक गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो लड़की, जिससे उसने सिर्फ़ साथ रहने का समझौता किया था, बिना पास आए….. किसी दिन ऐसे, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी नज़दीकियों में उतर जाएगी। 

    ये नज़दीकियाँ जिस्म की नहीं थीं… ये उस ख़ामोशी की थीं, जहाँ कोई कुछ कहे बिना सब कह जाता है। रूहानी उस पल उसकी बाहों में नहीं थी…. वो उसके अंतर्मन की चौखट पर बैठी थी, बिना इजाज़त मांगे।

    और फिर भी, वो उसे छूने से डर रहा था…. जैसे उसके दुःख को छू लेने से कहीं वो भी चुपचाप उसमें डूब न जाए।

    कुछ पलों बाद, रूहानी की उंगलियों ने उसकी शर्ट को धीरे-धीरे छोड़ा और वो उसी नंगे पाँव, उसी धीमी चाल से अपने कमरे की तरफ़ लौट गई। बिना कुछ कहे। जैसे आई थी, वैसे ही।

    अद्वैत वहीं खड़ा रहा, अपनी भीगी हुई शर्ट को देखते हुए, जैसे उसमें कोई उत्तर दर्ज हो जिसे वो पढ़ नहीं पा रहा।

    उसके ज़हन में सिर्फ़ एक सवाल अटका था….. “उसके कदमों की खामोशी ज़्यादा कह गई…. क्या वो मेरी बाँहों में सुकून ढूंढने आई थी, या अपने ही डर से छुपने?”

    और उस सवाल के जवाब में बस सन्नाटा था… लंबा, अनकहा, गहरा।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे की बत्तियाँ बुझी थीं, सवेरा हो चुका था। 

    रुहानी बिस्तर पर थी, करवट लेकर सो रही थी, पर उसे लगा जैसे वह सपने में जी रही थी।

    अचानक… एक जानी-पहचानी खुशबू ने उसे अपने आगोश में भर लिया।

    गर्म चॉकलेट की महक… पिघली हुई मिठास… हल्की-सी vanilla की परत।

    उसकी आँखे बंद थी लेकिन उसे लगा कि वो अपने पुराने घर के किचन में खड़ी थी। 

    वही टाइल्स, वही खिड़की से आती हल्की धूप और सामने उसकी माँ, apron पहने, बाल बांधे, और ओवन खोलते हुए।

    माँ का चेहरा धुंधला था, पर आवाज़ साफ़ थी, “लड़कियाँ रोज़-रोज़ मीठा खाएँगी तो मोटी हो जाएगी। चेहरे पर पिम्पल और एक्ने हो जायेंगे…. वो अलग। तुम लड़की हो और लड़कियों को control में रहना चाहिए।”

    एक अजीब-सी टीस ने रुहानी की दिल में गहराई तक जगह बना ली।

    “मम्मा, बस एक बार taste करना है…”

    “नहीं रूहानी! तुम नहीं खाओगी। ये यश के लिए है। आज उसका जन्मदिन है।”

    “मेरे जन्मदिन पर तो आप कुछ खास नहीं बनाती हो” रूहानी ने अपनी माँ से शिकायती लहजे में कहा। 

    “क्योंकि बेटी पराई अमानत होती है और हमारे यहाँ बेटियों का जन्मदिन नहीं बनाया जाता”

    माँ की बात से रूहानी की आँखे छलछला गयी थी। 

    तभी अचानक वो महक और तेज़ हो गई। रुहानी हड़बड़ा कर उठी। 

    उसकी सांस तेज़ थी, माथे पर पसीना… उसने हाथ से बिस्तर के पास की दीवार को छुआ जैसे यकीन करना चाहती हो — क्या वो अभी भी वहीं है?

    कमरे के बाहर से अब भी वही महक आ रही थी…. chocolate lava cake की। इतनी सजीव, इतनी सच्ची… कि अब ये सपना नहीं लग रहा था।

    वो दरवाज़े तक पहुँची, दबे पाँव, धीरे-धीरे, जैसे अतीत की दहलीज़ पर कदम रख रही हो। दरवाज़ा हल्का खोलकर उसने hallway की ओर देखा और वहीं से उसकी नज़र किचन में गई, जहाँ मीना cake ओवन से निकाल रही थी।

    वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने हल्के से पुकारा, “रूहानी?”

    उसने पलटकर देखा… अद्वैत दरवाज़े की चौखट पर था, उसके चेहरे पर कुछ अनकहा सा था।

    “तुम ठीक हो?”

    रूहानी कुछ पल चुप रही, फिर उसके होंठ हिले, “हाँ, मुझे क्या हुआ है?”

    अद्वैत ने अपने गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, “वो कल रात…. तुम…. वो….”

    रूहानी तुरंत से बोली, “मैं क्या……?”

    अद्वैत तुरंत बात बदल कर बोला, “कुछ नहीं……. फ्रेश होकर आ जाओ। मैंने मीना से स्पेशल चॉकलेट लावा केक बनवाया है।”

    रूहानी पूछ पड़ी, “कोई खास वजह?” 

    अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..”

    एक पल को सब कुछ रुक गया। रूहानी की आँखें एकाएक नम हो गईं। 

    ———————-

    क्या ये सिर्फ़ एक तारीख थी, या उस दिन कुछ ऐसा था जो अब तक दफ़न था? क्या ये महज़ संयोग था कि उस रात भी चॉकलेट लावा केक बना था? 

    जब रात में वो उसके सीने से लिपट गई थी….. क्या वो सिर्फ़ डर था? या कोई पुरानी याद उसकी आत्मा से लिपटी हुई थी… जिसे अद्वैत छू भी नहीं पाया?

    क्या सच में रूहानी सब भूल पाई थी जो रात के सन्नाटे में उसके भीतर उतर चुका था? 

     

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 4

    No love clause 

     

    विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”

    अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।”उसकी ठंडी निगाहें सीधे विक्रम जी की आँखों में टिकी थीं।

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

    कमरे में मौजूद बाकी लोगों को शायद अग्नि की यह बेबाकी बदतमीजी लग रही थी, लेकिन विक्रम राजावत उसे बस देखते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा जरूर था, मगर आँखों में कुछ और ही था, जिसे वहाँ मौजूद कोई भी पढ़ नहीं पाया।

     

    आखिरकार उन्होंने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए कहा, “स्टडी में चलो। हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” कहकर वो हाथ पीछे बांधे आगे बढ़ गए। 

    अग्नि ने एक पल के लिए उनकी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ा।

    दोनों पहली मंजिल पर बनी स्टडी की तरफ बढ़ गए।

    कुछ ही देर में विक्रम जी ने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला और अंदर चले गए। अग्नि भी उनके पीछे कमरे में दाखिल हुआ।

    राजावत मेंशन की बाकी जगहों की तरह यह कमरा भी बेहद आलीशान था, लेकिन इसमें दिखावे से ज्यादा एक अलग तरह की गंभीरता थी।

     

    कमरे की एक पूरी दीवार पर लकड़ी की बनी खूबसूरत लाइब्रेरी थी। उसमें लगी लंबी-लंबी रैक में बिजनेस और मैनेजमेंट की किताबों से लेकर इतिहास, राजनीति, साहित्य और पुराने उपन्यास तक करीने से सजे हुए थे।

    हर किताब अपनी जगह पर थी।

     

    कुछ किताबों के किनारों पर हल्की धूल जरूर जमी थी, लेकिन उन्हें देखकर साफ पता चलता था कि इस कमरे में किताबें सिर्फ सजावट के लिए नहीं रखी गई थीं।

    लाइब्रेरी के सामने एक बड़ी-सी आरामदायक विंग चेयर रखी थी, जिसके पास एक छोटा-सा लैम्प रखा हुआ था।

    कमरे के बीचों-बीच गहरे रंग की लकड़ी की एक बड़ी मेज थी। उस पर कुछ जरूरी दस्तावेज, एक खुली हुई डायरी, चश्मे का केस और एक पुरानी चांदी की स्याहीदानी रखी थी।

     

    कमरे की दूसरी दीवार पर राजावत परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में युवा विक्रम राजावत अपने बेटे के साथ खड़े थे।

    दूसरी तस्वीर में उनकी पत्नी थीं।

     

    और एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें बहुत छोटा-सा अग्नि अपने दादा की उंगली पकड़े खड़ा था।

    अग्नि की नजर अनायास उस तस्वीर पर चली गई।

    कुछ पल के लिए उसके चेहरे की कठोरता गायब हुई।

     

    वह तस्वीर…

    उसकी जिंदगी के उन कुछ खूबसूरत पलों में से एक थी, जिन्हें वह चाहकर भी भूल नहीं पाया था।

    विक्रम जी ने उसकी नजर तस्वीर पर जाते देख ली।

    लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

    बस धीरे से अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े।

    अग्नि भी तस्वीर से नजर हटाकर उनकी तरफ देखने लगा।

     

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

    फिर अग्नि धीरे-धीरे आगे बढ़ा। और अचानक…

    वह झुक गया। उसने विक्रम राजावत के पैर छू लिए।

    विक्रम जी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गए।

    शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अग्नि, जो कुछ सेकंड पहले तक उनसे इतनी नाराज़गी से बात कर रहा था, इस तरह उनके पैर छुएगा।

     

    उनकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उन्होंने तुरंत अग्नि को उठाया और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।

    “मेरा बच्चा…” उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।

    सिर्फ़ अपनापन था।

     

    अग्नि ने भी आँखें बंद कर लीं। उस पल में वह राजावत ग्रुप का करोड़ों का मालिक या सख्त CEO नहीं था।

    वह बस अपने दादा का पोता था।

     

    वही बच्चा…

    जो कभी उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था।

     

    लेकिन अगले ही पल अग्नि के चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य हो जायेंगे। “ दादा जी, आप शादी करने के लिए मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते। शादी करना या ना करना ये मेरा निजी फैसला है।”

     

    अग्नि की बात सुनकर विक्रम जी के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, वो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “कभी कभी हमें कुछ पहले लेने से पहले समय की नजाकत को देखना होता है।”

    कहकर उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    अग्नि ने भौहें उचकाई, “ मैं आपकी शर्तें पढ़ चुका हूँ, बार बार मेरे सामने ये फाइल मत लाइए।”

     

    विक्रम जी बोले, “ ये वो फाइल नहीं है, जो तुम समझ रहे हो।”

     

    अग्नि के पहले विक्रम जी को देखा और फिर उनके हाथ में मौजूद फाइल को, फिर उसने वो फाइल अपने हाथों में पकड़ ली।

    और चेयर खींचकर उसपर बैठ गया। 

     

    अग्नि ने फाइल अपने हाथों में ली और चेयर खींचकर उस पर बैठ गया। उसने फाइल को कुछ पल तक बिना खोले देखा।

    फिर उसकी नजर अपने दादा जी पर गई। “अब इसमें और क्या है?”

     

    विक्रम जी अपनी जगह खड़े रहे। “पहले पढ़ो।”

     

    अग्नि ने हल्की-सी साँस छोड़ी और फाइल खोल दी।

    पहले पन्ने पर वही वसीयत थी, जिसे वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। उसकी नजर तेजी से उन पंक्तियों पर दौड़ी। राजावत परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने के लिए अग्नि सिंह राजावत को अपने सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले विवाह करना अनिवार्य होगा।

    अग्नि के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “मैंने कहा था ना दादा जी… मैं ये सब पहले ही पढ़ चुका हूँ।”

     

    विक्रम जी ने कोई जवाब नहीं दिया। अग्नि ने अगला पन्ना पलटा। फिर एक और फिर…

    उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।

    उसके चेहरे पर आई हल्की-सी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

    “ये क्या है?”

     

    विक्रम जी ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”

     

    अग्नि ने फाइल से नजर उठाई। “ये हिस्सा पहले इस फाइल में नहीं था।”

     

    विक्रम जी धीरे-धीरे उसके सामने रखी दूसरी चेयर पर जाकर बैठ गए। “क्योंकि तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।”

     

    अग्नि की आँखें सिकुड़ गईं। “और अब पड़ गई?”

     

    “हाँ।” कमरे में फिर खामोशी छा गई।

     

    अग्नि ने उस पन्ने को दोबारा पढ़ा। उसमें वसीयत की संपत्ति से ज्यादा परिवार की कुछ जिम्मेदारियों और अधिकारों का उल्लेख था।

     

    कुछ ऐसी बातें… जिन्हें पढ़कर अग्नि समझ गया था कि मामला सिर्फ़ पैसों का नहीं है। उसने फाइल बंद कर दी। “दादा जी, आप आखिर चाहते क्या हैं?”

     

    विक्रम जी ने कुछ पल तक उसे देखा। “मैं चाहता हूँ कि तुम शादी करो।”

     

    अग्नि ठंडी साँस छोड़ते हुए, “क्यों?”

     

    विक्रम जी, “क्योंकि अब समय आ गया है।”

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे

    । अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    कहानी आगे जारी रहेगी।

     

    Plz अगर आप इसी तरह अच्छी अच्छी कहानियां पढ़ना चाहते हैं तो मुझे फॉलो जरूर कीजिए।

     

     

     

     

  • समाज का आईना भाग 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कई मिनट तक उस काँच के टुकड़े को देखता रहा।

     

    उसमें दिखाई देने वाला बच्चा लगातार उसकी तरफ देख रहा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    फिर आईने में एक और दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक स्कूल।

     

    बच्चे हँस रहे थे।

     

    एक गरीब बच्चा अकेला बैठा था।

     

    बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    शिक्षक सब देख रहा था।

     

    लेकिन उसने आँखें फेर लीं।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक सड़क।

     

    एक घायल आदमी पड़ा था।

     

    लोग वीडियो बना रहे थे।

     

    लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था।

     

    दृश्य फिर बदला।

     

    एक घर।

     

    एक लड़की रो रही थी।

     

    परिवार वाले उसे चुप करा रहे थे।

     

    “लोग क्या कहेंगे?”

     

    दृश्य बदलता गया।

     

    हर जगह एक ही चीज थी—

     

    लोग गलत देख रहे थे, लेकिन चुप थे।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब उसे समझ आ चुका था कि आईना किसी भूत की कहानी नहीं था।

     

    यह इंसान की उस आदत की कहानी था जिसमें वह दूसरों के पाप देखता है, लेकिन अपने हिस्से की चुप्पी भूल जाता है।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    पहली बार वह पूरी तरह शांत लग रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या तुम्हें अब मुक्ति मिल गई?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती थी जब तक मेरी कहानी झूठ के नीचे दबाई गई थी।”

     

    “अब?”

     

    “अब सच सामने है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आईना खत्म?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आईना कभी खत्म नहीं होता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि समाज बदलता रहता है… लेकिन इंसान के भीतर का लालच, डर और अहंकार भी साथ बदलते हैं।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    अगली सुबह आरव सूरजपुर के चौक पर पहुँचा।

     

    वहाँ उसने वह बड़ा आईना लगवाया जो हवेली के टूटे हुए टुकड़ों से बचा था।

     

    लोग उसके चारों तरफ जमा हो गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यह आईना किसी को डराने के लिए नहीं है।”

     

    लोग चुप रहे।

     

    “यह हमें याद दिलाने के लिए है कि हम दूसरों को जिस नजर से देखते हैं, कभी उसी नजर से खुद को भी देखें।”

     

    एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर कोई अपना सच देखकर बदल जाए तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो आईना सफल है।”

     

    एक महिला ने पूछा—

     

    “और अगर कोई सच देखकर भी न बदले?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “तो आईना दोषी नहीं होगा।”

     

    उसी समय हवा चली।

     

    आईने की सतह पर हल्की धुंध छा गई।

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    फिर आईने में पूरे कस्बे का चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावना चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ इंसान थे।

     

    थके हुए।

     

    डरे हुए।

     

    गलतियाँ किए हुए।

     

    लेकिन सच स्वीकार करने की कोशिश करते हुए।

     

    हरिदास बाबा आगे आए।

     

    उन्होंने आईने को देखा।

     

    “अब यह शांत है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि अब लोग इससे डर नहीं रहे।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वे खुद को देखने लगे हैं।”

     

    सूरजपुर की कहानी वहीं खत्म हो गई।

     

    लेकिन आरव की नहीं।

     

    कुछ महीने बाद वह शहर चला गया।

     

    उसने एक नई किताब लिखनी शुरू की।

     

    नाम था—

     

    “समाज का आईना।”

     

    उसने किताब की शुरुआत एक लाइन से की—

     

    “हम राक्षसों को जंगलों में ढूँढते रहे, जबकि वे हमारे डर, लालच और चुप्पी के पीछे छिपे थे।”

     

    किताब के आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—

     

    “अगर कभी आपको लगे कि दुनिया बहुत बुरी हो गई है, तो दूसरों के चेहरे देखने से पहले अपना चेहरा देखिए।”

     

    उस रात आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था।

     

    उसके सामने वही काँच का छोटा टुकड़ा रखा था।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    इस बार उसमें सिर्फ उसका चेहरा था।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “सब खत्म।”

     

    तभी काँच पर एक छोटी-सी दरार पड़ी।

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    दरार धीरे-धीरे फैलने लगी।

     

    और उसके बीच एक शब्द उभरा—

     

    “नहीं।”

     

    कमरे की बत्ती अपने आप बुझ गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “आईना अभी जाग रहा है।”

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन काँच के टुकड़े में अब उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ हजारों लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    अलग-अलग शहर।

     

    अलग-अलग चेहरे।

     

    अलग-अलग कहानियाँ।

     

    और उन सबके पीछे…

     

    एक ही काली परछाईं।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आईने में परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    और पहली बार उसने साफ आवाज में जवाब दिया—

     

    “मैं समाज हूँ।”

     

    आरव के हाथ से काँच गिर गया।

     

    काँच फर्श पर टूट गया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावनी आवाज नहीं आई।

     

    सिर्फ एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “जब तक इंसान खुद को दूसरों से बेहतर समझता रहेगा… मैं जिंदा रहूँगा।”

     

    सुबह जब सूरज निकला, आरव ने खिड़की खोली।

     

    बाहर लोग अपने काम पर जा रहे थे।

     

    दुकानें खुल रही थीं।

     

    बच्चे स्कूल जा रहे थे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    लेकिन अब आरव जानता था—

     

    हर चेहरे के पीछे एक कहानी है।

     

    हर मुस्कान के पीछे एक दर्द हो सकता है।

     

    हर अच्छाई के पीछे कोई स्वार्थ छिपा हो सकता है।

     

    और हर बुरे इंसान के भीतर भी बदलने की संभावना होती है।

     

    उसने आखिरी बार आईने में खुद को देखा।

     

    इस बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा—

     

    “अगर पूरा समाज मेरा आईना है… तो मैं समाज को क्या चेहरा दिखा रहा हूँ?”

     

    आईने ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि जवाब आरव को खुद देना था।

     

    और शायद यही इस कहानी का सबसे डरावना सच था—

     

    भूतों से डरना आसान है।

    अपने असली चेहरे से डरना मुश्किल।

     

    समाप्त।

  • समाज का आईना भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सूरजपुर में सुबह किसी त्योहार की तरह नहीं, किसी शोक की तरह हुई।

     

    हर घर में लोग अपने-अपने आईने के टुकड़े को देखकर डर रहे थे।

     

    किसी को अपनी पत्नी का छिपा हुआ दुख दिखाई दे रहा था।

     

    किसी को पिता का अपराध।

     

    किसी को भाई की धोखाधड़ी।

     

    और किसी को अपना ही चेहरा इतना अजनबी लग रहा था कि वह खुद से नजरें नहीं मिला पा रहा था।

     

    देवेंद्र चौहान रातोंरात गायब हो गया।

     

    लोगों ने उसकी तलाश शुरू की।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह कहाँ होगा।

     

    पुरानी हवेली में।

     

    वही हुआ।

     

    देवेंद्र तहखाने में उस जगह बैठा था जहाँ कभी मीरा को छिपाया गया था।

     

    उसके हाथ में आईने का एक टुकड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    “यहाँ क्यों आए हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने सोचा था कि अगर आईना टूट गया तो सब खत्म हो जाएगा।”

     

    “लेकिन नहीं हुआ।”

     

    देवेंद्र हँसने लगा।

     

    “क्योंकि असली आईना शीशे का नहीं था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम्हें अब सच बोलना होगा।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी बोलोगे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम्हारा सच भी सबके सामने आएगा।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    “बहुत।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी बोलूँगा।”

     

    देवेंद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    पहली बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं था।

     

    सिर्फ थकान थी।

     

    “मैंने बहुत कुछ किया,” उसने कहा।

     

    और फिर उसने सब बता दिया।

     

    किस तरह उसने सरकारी जमीन बेचने में मदद की।

     

    किस तरह गरीबों के नाम पर आए पैसे अपने लोगों में बाँटे।

     

    किस तरह मीरा के पिता की शिकायत दबाई गई।

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    मीरा की हत्या के बाद उसने उस मामले को दबाने में मदद की थी।

     

    आरव ने उसकी पूरी बात रिकॉर्ड कर ली।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    अचानक तहखाने में वही लड़की दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “अब तुमने सच बोल दिया।”

     

    देवेंद्र रोने लगा।

     

    “क्या अब मुझे माफ करोगी?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “माफी मेरे हाथ में नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “न्याय समाज के हाथ में है।”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    अगले दिन आरव ने सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए।

     

    कस्बे में हड़कंप मच गया।

     

    पुलिस ने देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया।

     

    पुराने मामलों की जाँच फिर से शुरू हुई।

     

    मीरा की हत्या का केस दोबारा खोला गया।

     

    हरिदास बाबा ने अदालत में गवाही दी।

     

    वह जानते थे कि इससे उनका अपना अपराध भी सामने आएगा।

     

    लेकिन उन्होंने कहा—

     

    “मैंने वर्षों तक चुप रहकर अपराध किया। अब सच बोलकर जितनी सजा मिलेगी, स्वीकार करूँगा।”

     

    आरव ने अपनी पुरानी गलती भी सार्वजनिक कर दी।

     

    उसने बताया कि उसने कभी पैसे लेकर एक खबर रोक दी थी।

     

    लोगों ने उसका विरोध किया।

     

    कुछ ने उसे गालियाँ दीं।

     

    कुछ ने कहा कि वह भी बाकी लोगों जैसा है।

     

    लेकिन आरव ने पहली बार सफाई नहीं दी।

     

    उसने सिर्फ कहा—

     

    “हाँ। मैं गलत था।”

     

    धीरे-धीरे सूरजपुर बदलने लगा।

     

    लोगों ने एक-दूसरे को आईने के टुकड़े दिखाना बंद कर दिया।

     

    उन्होंने उन्हें संभालकर रखा।

     

    क्योंकि अब उन्हें समझ आ चुका था कि आईना किसी को शर्मिंदा करने के लिए नहीं था।

     

    वह खुद को देखने के लिए था।

     

    लेकिन एक रात आरव के घर के बाहर फिर एक काँच का टुकड़ा मिला।

     

    उसमें कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “एक समाज तब नहीं बदलता जब अपराधी पकड़ा जाता है… समाज तब बदलता है जब लोग अपनी चुप्पी पहचानते हैं।”

     

    आरव ने वह टुकड़ा उठाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “क्या तुम्हें लगता है सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    हरिदास बाबा खड़े थे।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “तुमने सिर्फ सूरजपुर का सच देखा है।”

     

    “और?”

     

    “यह आईना सिर्फ एक जगह का नहीं था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “तो फिर?”

     

    बाबा ने अपनी जेब से एक और काँच का टुकड़ा निकाला।

     

    उसमें सूरजपुर नहीं था।

     

    एक दूसरा शहर दिखाई दे रहा था।

     

    लखनऊ।

     

    फिर दिल्ली।

     

    फिर मुंबई।

     

    फिर हजारों अनजान चेहरे।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “यह कैसे?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि समाज हर जगह एक जैसा है।”

     

    “क्या आईना हर जगह है?”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “हर इंसान के भीतर एक आईना है।”

     

    आरव ने काँच को देखा।

     

    अचानक उसमें उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार चेहरा साफ था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तो क्या अब मैं सच से डरता नहीं?”

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।

     

    “डरते हो।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन अब भागते नहीं।”

     

    अचानक काँच का टुकड़ा गर्म होने लगा।

     

    उस पर एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “अगला।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “अगला कौन?”

     

    आईना शांत रहा।

     

    फिर उसमें एक बच्चा दिखाई दिया।

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    वह अपने कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने वही आईना था।

     

    और उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    एक काली परछाईं।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    परछाईं धीरे-धीरे मुड़ी।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    वह चेहरा…

     

    आरव का ही था।

  • अधूरी इबादत भाग~49

    अधूरी इबादत भाग~49

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~49 पहला गिफ्ट

     

    कमरे की हवा थमी हुई थी, दीवारें जैसे साँस रोक कर देख रही थीं कि अब आगे क्या होगा। 

    रूहानी की पीठ दरवाज़े से लगी थी, और उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के कांप रही थीं। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि लगता था जैसे कोई दरवाज़े के इस पार खड़ा सुन लेगा।

    एकांश ने जब अपने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे, तो वो छुअन किसी भूले हुए मौसम की तरह आई….. जानी-पहचानी, लेकिन अब अजनबी। 

    “रूहानी…” एकांश की आवाज़ में तल्ख़ी थी, “at least मेरी आंखों में तो देखकर बात करो। शायद तब तुम्हारे झूठ को भी मैं सच मान लूं।”

    रूहानी की सांस अटक गई। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन वो नमी किसी प्यार की नहीं, ठुकराए हुए भरोसे की थी। उसने धीरे से, बहुत एहतियात से, एकांश के हाथ अपने कंधों से हटा दिए। 

    और तभी…

    दरवाज़ा एक झटके में खुला — जैसे किसी ने कमरे की हदों पर शक कर लिया हो।

    काम्या…. उसकी नज़रों में संदेह नहीं, फैसला था। उसने पहले कमरे को स्कैन किया, फिर एकांश पर एक पल को ठहरकर, अपनी नज़रों की तलवारें रूहानी पर गाड़ दीं।

    “ओह… तो बंद कमरे में पुरानी इश्क लड़ाई जा रही है,” काम्या की मुस्कान तेज़ और ज़हर से भी तेज़ थी। “लगता है, अपनी डिज़ाइनिंग से ज़्यादा तुम्हारा ध्यान कुछ और ‘कनेक्शन’ बनाने पर रहता है। है ना?”

    कमरा जैसे एकाएक सन्नाटे में डूब गया। रूहानी की साँस एक लहर की तरह रुकी, और फिर एक गहरी गर्मी उसके भीतर उठने लगी…. वो गुस्सा जो खुद को लंबे समय से दबा रहा था।

    उसने सीधा खड़ा होकर काम्या की आँखों में आँखें डालीं। “काम्या, कम से कम मैं वो इंसान नहीं जो दूसरों के रिश्तों पर कीचड़ उछालकर अपनी खुद की खाली ज़िंदगी भरने की कोशिश करे।”

    उसकी आवाज़ अब कांप नहीं रही थी। “और हाँ, ‘कनेक्शन’ बनाने की बात रही… तो मैं सिर्फ अपने काम से कनेक्शन बनाती हूं, तुम्हारी तरह लोगों की पीठ पीछे छुरा घोंपकर नहीं।”

    एक पल को काम्या कुछ कह नहीं पाई…. जैसे शब्द उसकी जुबान तक आए ही नहीं।

    “और अगर तुम्हें लगता है कि एक बंद कमरा और एक पुरानी जान-पहचान ‘इश्क लड़ाई’ है, तो ये तुम्हारी छोटी सोच है, मेरी नहीं।”

    इतना कहकर रूहानी पलटी नहीं। वो सीधी दरवाज़े से बाहर चली गई, जैसे किसी courtroom से बाइज्ज़त बरी होकर निकली हो…. सिर ऊँचा, आत्मा शांत, और भीतर एक नई आग जलती हुई।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    जैसे ही रुहानी उस कमरे से बाहर आई, उसकी चाल में बेचैनी थी और आँखों में कुछ कह जाने की बेआवाज़ कोशिश। पलकें भारी, पर चेहरे पर एक नकली सामान्यता का मुखौटा। 

    ठीक उसी वक़्त अद्वैत भी अपनी कार पार्क कर चुका था और स्टूडियो की ओर बढ़ा चला आ रहा था।

    रूहानी उसकी तरफ़ बढ़ी, हल्की सांसों में एक स्थिरता लाने की कोशिश करते हुए और बिना किसी भूमिका के बोली, “अब हम भी घर चले? पार्टी वैसे भी लगभग खत्म हो चुकी है।”

    अद्वैत ने उसकी आँखों में कुछ पल देखा, जैसे किसी उलझे हुए स्केच को समझने की कोशिश कर रहा हो। फिर शांत स्वर में बोला, “पहले स्टूडियो बंद करके चाबी ले लो, फिर चलते हैं।”

    रूहानी कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से एक स्वर उभरा, हँसी और आवाज़ का एक अजीब मेल और एकांश व काम्या स्टूडियो main gate के ओर आते दिखाई दिए।

    एकांश ने आते ही अद्वैत के कंधों को पकड़ कर हल्के से गले लगाया। यह एक सामान्य सा इशारा था, मगर उसके ठीक बाद रूहानी का एक क़दम पीछे हट जाना….. नज़रें नीची कर लेना…. अद्वैत की नज़रों से छुपा नहीं था। 

    उस एक पल में जैसे कुछ अजीब सा फिसल गया हो उसके मन में। पर उसने उस क्षण को वहीं दफ़न कर दिया, कुछ न कहकर।

    काम्या को शायद उस ख़ामोशी से चिढ़ हो गई। वो एकांश का हाथ कस कर पकड़ते हुए तिरछी मुस्कान में बोली, “अब मैं अपने पति के साथ अपनी रात enjoy करने जा रही हूँ। Wish you both… अद्वैत और रूहानी…. तुम भी अपनी रात enjoy करो।”

    ताने की धार इतनी पैनी थी कि कमरे की हवा कुछ सेकंड को जैसे कट सी गई।

    अद्वैत का चेहरा सख़्त हो गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी ने उसका हाथ पकड़ कर सिर ना में हिलाया…. जैसे कह रही हो, अभी नहीं।

    पर अद्वैत ने उसका हाथ थामकर हल्के से थपथपाया…. एक सधी हुई, शांत ताक़त से भरा इशारा। फिर काम्या की ओर देखकर बोला, “Kamya, it’s my bedroom matters… and I don’t like to shamelessly public it.”

    एकांश ने धीमे स्वर में कहा, “भाई! काम्या की तरफ से मैं माफ़ी मांगता हूँ, you’re right.”

    अद्वैत ने रूहानी की ओर देखा, “सब चले ही गए हैं, स्टाफ्स को पेमेंट कर दो, फिर हम भी निकलते हैं।”

    थोड़ी देर बाद काम्या और एकांश निकल गए। 

    स्टूडियो का सन्नाटा अब एक भारी सी चुप्पी बनकर रह गया था। रूहानी ने काम निपटाया और फिर अद्वैत की कार की ओर चली। 

    जब वह बैठी, उसकी उंगलियाँ अब भी सिहर रही थीं। पूरा दिन, वो कमरा, वो सारे पुराने लम्हे… सब उसके मन में घूम रहे थे। 

    जैसे ही अद्वैत ने ड्राइविंग सीट पर आकर दरवाज़ा बंद किया, एक तेज़ आवाज़ के साथ, रूहानी हल्की सी कांप गई।

    अद्वैत ने तुरंत उसकी ओर देखा, “Are you okay, Ruhani?”

    रूहानी ने अपनी दोनों बाहों को अपनी हथेलियों से रगड़ा और जबरदस्ती मुस्कराते हुए बोली, “हाँ, ठीक हूँ… बस थक गई हूँ।”

    कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, अद्वैत ने जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

    रूहानी ने आश्चर्य से पूछा, “मेरे लिए?”

    अद्वैत ने सीधे शब्दों में बोला, “हाँ… तुम्हारे स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी पर मेरी तरफ़ से छोटा सा gift।”

    रूहानी ने धीरे से बॉक्स खोला।

    अंदर एक चाबी थी, लेकिन कोई साधारण चाबी नहीं। वो एक कीचेन से जुड़ी थी जो एक छोटे, चमकते हुए गाउन के आकार का था। सुनहरे धागों जैसी डिज़ाइन, बारीक नक्काशी, छोटे-छोटे embedded stones जैसे हर मोड़ कोई कहानी कहता हो और उस कीचेन से जुड़ा टैग “Stitch and Soul” का लोगो।

    उसकी आँखों में पानी तैरने लगा। वो खिड़की की तरफ़ चेहरा मोड़कर जल्दी से आँखें पोछने लगी। फिर मुड़कर धीमे से पूछा, “ये किस चीज़ की चाबी है?”

    अद्वैत ने उसकी ओर देखकर सहजता से कहा, “तुम्हारी कार की।”

    रूहानी ने चौंक कर देखा, “मेरी… कार?”

    “हाँ,” अद्वैत ने सिर हिलाया, “रोज़-रोज़ कैब से कितना ट्रैवल करोगी? तुम्हारा बजट और समय दोनों ही ज़्यादा जा रहा है। और फ्यूल की चिंता मत करो, I’ll make sure it’s always full.”

    रूहानी ने धीरे से सिर ना में हिलाया, “पर मुझे तो कार चलाना नहीं आता।”

    अद्वैत ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए कहा, “अगर तुम comfortable हो, तो मैं सिखा दूँगा।”

    वो एक पल था, छोटा, शांत, लेकिन भीतर बहुत कुछ कहता हुआ। दोनों के बीच की अजनबीयत कुछ कम हुई थी, लेकिन उसका वज़न अभी भी मौजूद था।

    पर शायद यही एक शुरुआत थी…. जहाँ दो अनजाने लोग, एक contract marriage की ज़िद और ज़रूरत से परे, इंसान की तरह एक-दूसरे को समझने की शुरुआत कर रहे थे।

    तभी, सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी, और एक तेज़ हॉर्न की आवाज़ से पूरी रात चीख़ उठी… 

    ——————–

    क्या वो तेज़ रोशनी महज़ एक संयोग थी… या किसी आने वाले तूफ़ान की पहली दस्तक?

    उस हॉर्न की चीख़ में छुपा था कोई इत्तिफ़ाक या कोई इरादा?

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच की ये नज़दीकी किसी तीसरे की नज़र में खटकने लगी थी…? 

  • समाज का आईना भाग 4

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    सूरजपुर का प्रधान देवेंद्र चौहान बाहर से बहुत सम्मानित आदमी था।

     

    हर धार्मिक आयोजन में सबसे आगे।

     

    गरीबों के लिए भाषण।

     

    बेटियों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावे।

     

    और हर चुनाव में एक ही वादा—

     

    “मैं इस कस्बे को बदल दूँगा।”

     

    लेकिन लाल डायरी में उसका नाम देखकर आरव को यकीन हो गया कि असली कहानी कुछ और थी।

     

    डायरी में लिखा था—

     

    “देवेंद्र ने ठाकुर के बाद भी वही खेल जारी रखा। जमीनें हड़पीं। सरकारी पैसे खाए। गरीबों को कागजों में मरा हुआ दिखाकर योजनाओं का पैसा खाया।”

     

    आरव ने दस्तावेजों की तस्वीरें खींच लीं।

     

    उसने तय किया कि अब वह सबके सामने सच लाएगा।

     

    लेकिन उसी शाम पूरे कस्बे में एक खबर फैल गई—

     

    आरव झूठी खबरें फैलाकर लोगों को बदनाम कर रहा है।

     

    कुछ ही घंटों में उसके खिलाफ लोग जमा हो गए।

     

    जो लोग कल तक उसे ईमानदार पत्रकार कहते थे, वही आज उसे गालियाँ दे रहे थे।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “देख रहा है? यही समाज है।”

     

    आरव ने भीड़ की तरफ देखा।

     

    उसे लगा जैसे हर चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा छिपा है।

     

    फिर अचानक उसे कुछ दिखाई दिया।

     

    भीड़ के बीच एक आदमी था।

     

    उसकी परछाईं बाकी सबकी तुलना में बहुत बड़ी थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    वह देवेंद्र नहीं था।

     

    वह एक साधारण आदमी था—रमेश, जो रोज मंदिर में दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता था।

     

    लेकिन उसकी परछाईं के हाथ में पत्थर था।

     

    आरव समझ गया।

     

    समाज हमेशा अपराधी को अकेले पैदा नहीं करता।

     

    कई बार समाज अपराधी को भीड़ देता है।

     

    रात में आरव फिर हवेली पहुँचा।

     

    इस बार उसके साथ कबीर, हरिदास बाबा और कुछ अन्य लोग भी थे।

     

    आईना कमरे के बीच में था।

     

    हरिदास बाबा बोले—

     

    “अब यह सिर्फ तुम्हारा मामला नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो इसे खत्म कैसे करेंगे?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “आईने को तोड़कर नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “सच बोलकर।”

     

    अचानक हवेली में तेज हवा चली।

     

    आईने पर धुंध जम गई।

     

    फिर उस धुंध में एक-एक करके लोगों के चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    सबसे पहले देवेंद्र।

     

    फिर शंभूनाथ।

     

    फिर ठाकुर।

     

    फिर हरिदास।

     

    फिर कबीर।

     

    और अंत में आरव।

     

    हर व्यक्ति के पीछे उसके कर्मों की तस्वीरें चलने लगीं।

     

    देवेंद्र पैसे लेते हुए।

     

    शंभूनाथ मजदूरों को डाँटते हुए।

     

    ठाकुर जमीन हड़पते हुए।

     

    हरिदास चुप खड़े हुए।

     

    कबीर किसी पुराने झगड़े में झूठ बोलते हुए।

     

    और आरव—

     

    वह खुद को पैसे लेकर खबर रोकते हुए देख रहा था।

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ,” उसने कहा। “मैं भी दोषी हूँ।”

     

    आईने की सतह काँपने लगी।

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “बस यही चाहिए था।”

     

    “क्या?”

     

    “स्वीकार करना।”

     

    अचानक हवेली के बाहर हजारों लोगों की आवाज सुनाई दी।

     

    पूरा कस्बा वहाँ जमा था।

     

    देवेंद्र भी।

     

    उसने चिल्लाकर कहा—

     

    “यह सब जादू है! इसे बंद करो!”

     

    आईने ने अचानक उसकी तरफ रुख किया।

     

    देवेंद्र की परछाईं उसके पीछे खड़ी थी।

     

    वह परछाईं धीरे-धीरे उससे अलग होने लगी।

     

    देवेंद्र चीख पड़ा।

     

    “नहीं!”

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    वह देवेंद्र जैसा ही था।

     

    लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

     

    उसने कहा—

     

    “तुमने मुझे बनाया है।”

     

    देवेंद्र जमीन पर गिर पड़ा।

     

    “मैंने कुछ नहीं किया!”

     

    आईने से आवाज आई—

     

    “यही तो तुम्हारा सबसे बड़ा झूठ है।”

     

    अचानक पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

     

    लोगों ने अपनी-अपनी परछाइयाँ देखीं।

     

    किसी ने अपने बेटे से झूठ बोला था।

     

    किसी ने पड़ोसी की जमीन हड़पी थी।

     

    किसी ने दहेज के लिए बहू को सताया था।

     

    किसी ने गरीब को अपमानित किया था।

     

    किसी ने अन्याय देखा था और चुप रहा था।

     

    और कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए किसी को बुरा कहा था क्योंकि भीड़ ऐसा कह रही थी।

     

    हर कोई डरने लगा।

     

    किसी ने आईना तोड़ने के लिए पत्थर उठाया।

     

    हरिदास चिल्लाए—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन पत्थर आईने पर जा चुका था।

     

    काँच में दरार पड़ गई।

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी दीवारें हिलने लगीं।

     

    मीरा की आवाज पूरे कस्बे में गूँज उठी—

     

    “तुमने आईना तोड़ दिया… अब तुम्हारा सच कहाँ छिपेगा?”

     

    एक तेज चीख सुनाई दी।

     

    आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

     

    लेकिन हर टुकड़े में किसी न किसी इंसान का चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    अब आईना एक नहीं था।

     

    पूरा कस्बा आईना बन चुका था।

     

    और अगले दिन सूरजपुर में जो हुआ, उसने सबकी नींद उड़ा दी।

     

    हर घर के दरवाजे पर एक काँच का छोटा टुकड़ा पड़ा मिला।

     

    हर टुकड़े में घर के किसी सदस्य का ऐसा सच दिखाई दे रहा था जिसे वह वर्षों से छिपा रहा था।

     

    अब डर हवेली में नहीं था।

     

    डर लोगों के अपने घरों में पहुँच चुका था।

  • समाज का आईना भाग 3

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह आरव सीधे पुराने मंदिर पहुँचा।

     

    हरिदास बाबा मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे थे।

     

    आरव ने उनके सामने लाल डायरी रख दी।

     

    बाबा ने डायरी देखते ही आँखें बंद कर लीं।

     

    “तुमने इसे खोल लिया।”

     

    “आप जानते थे इसके बारे में?”

     

    बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने कठोर आवाज में पूछा—

     

    “इसमें आपका नाम क्यों है?”

     

    काफी देर तक चुप रहने के बाद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि मैं भी दोषी हूँ।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “किस चीज का?”

     

    बाबा ने मंदिर के पीछे बने छोटे कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “वहाँ एक पुराना संदूक है। उसे खोलो।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर दर्जनों पुराने कागज थे।

     

    जमीन के कागज।

     

    शिकायतें।

     

    पुराने अखबार।

     

    और कई तस्वीरें।

     

    एक तस्वीर में ठाकुर रघुवीर सिंह था।

     

    उसके पास एक युवा हरिदास खड़ा था।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    “आप ठाकुर के साथ थे?”

     

    बाबा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैं उसका मुंशी था।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    “मैंने उसकी बहुत मदद की,” बाबा बोले। “गरीबों की जमीन के कागज बदले। झूठे दस्तावेज बनाए। लोगों को धमकाया। और हर बार खुद को समझाया कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन मैंने उस आईने को देखा।”

     

    बाबा की आवाज काँपने लगी।

     

    “ठाकुर ने मुझे उसके कमरे में बुलाया था। उसने कहा था कि आईना मुझे मेरा भविष्य दिखाएगा।”

     

    “और आपने क्या देखा?”

     

    बाबा ने सिर उठाया।

     

    “मैंने खुद को देखा… लेकिन बूढ़ा नहीं। एक लाश के पास खड़ा देखा।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “किसकी लाश?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “एक लड़की की।”

     

    कुछ पल के लिए मंदिर में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।

     

    “उस लड़की का नाम मीरा था। वह किसान की बेटी थी। उसके पिता ने ठाकुर की जमीन हड़पने की कोशिश का विरोध किया था।”

     

    “क्या हुआ उसके साथ?”

     

    बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मीरा ने सबूत इकट्ठा कर लिए थे। वह शहर जाकर शिकायत करने वाली थी। लेकिन वह कभी शहर नहीं पहुँच पाई।”

     

    आरव समझ गया।

     

    “उसे मार दिया गया?”

     

    बाबा ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    “और आपने?”

     

    “मैंने सब देखा।”

     

    “फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    यही वह बात थी जिसे समाज बार-बार दोहराता है।

     

    अन्याय देखकर चुप रहना।

     

    गलत देखकर आँखें बंद कर लेना।

     

    और फिर खुद को निर्दोष समझना।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मीरा की लाश कहाँ है?”

     

    बाबा ने धीरे से कहा—

     

    “हवेली के नीचे।”

     

    उसी रात आरव और कबीर हवेली पहुँचे।

     

    हरिदास बाबा ने उन्हें एक पुराना नक्शा दिया था।

     

    हवेली के तहखाने में जाने का रास्ता एक टूटी हुई दीवार के पीछे था।

     

    दोनों नीचे उतरे।

     

    सीढ़ियाँ इतनी पुरानी थीं कि हर कदम पर धूल उड़ रही थी।

     

    नीचे पहुँचकर उन्हें एक कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवार पर दर्जनों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नाम मिटाए गए थे।

     

    कुछ के नीचे लाल निशान थे।

     

    बीच में एक बड़ा आईना लगा था।

     

    आरव ने उसमें देखा।

     

    इस बार उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा।

     

    उसे पूरा सूरजपुर दिखाई दिया।

     

    लोगों के घर।

     

    गलियाँ।

     

    मंदिर।

     

    बाजार।

     

    और हर व्यक्ति के पीछे उसकी एक काली परछाईं।

     

    किसी की परछाईं लालच थी।

     

    किसी की झूठ।

     

    किसी की हिंसा।

     

    किसी की चुप्पी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “तुम्हें लगता है राक्षस बाहर है?”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “राक्षस कौन है?”

     

    आईने से जवाब आया—

     

    “जिस दिन इंसान गलत देखकर भी चुप रहता है, उसी दिन उसके भीतर राक्षस पैदा होता है।”

     

    अचानक कबीर चीख पड़ा।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने देखा—कबीर आईने के सामने खड़ा था।

     

    आईने में कबीर का चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ कबीर किसी आदमी पर हमला कर रहा था।

     

    आरव ने उसे पीछे खींच लिया।

     

    “तूने क्या देखा?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “मैंने… अपना सच देखा।”

     

    “क्या सच?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी तहखाने में किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    बहुत दूर से।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    आरव ने आवाज का पीछा किया।

     

    दीवार के पीछे एक बंद जगह थी।

     

    उसने पत्थर हटाया।

     

    अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर कपड़े का एक टुकड़ा और एक पुरानी चूड़ी थी।

     

    कपड़े पर खून के धब्बे थे।

     

    और नीचे एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैं मीरा हूँ। अगर यह कागज किसी को मिले, तो समझ लेना कि मुझे समाज ने नहीं, समाज की चुप्पी ने मारा है।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    कबीर ने जोर से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    आईने में मीरा दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा डरावना नहीं था।

     

    वह सिर्फ दुखी थी।

     

    उसने आरव की तरफ देखकर कहा—

     

    “मुझे न्याय नहीं चाहिए… मुझे सच चाहिए।”

     

    फिर आईने की सतह पर एक नया नाम उभरा—

     

    “सूरजपुर का प्रधान।”

     

    आरव समझ गया।

     

    अगला चेहरा सिर्फ एक आदमी का नहीं था।

     

    यह चेहरा पूरे समाज के सामने आने वाला था।

     

    और शायद इस बार आईना किसी एक इंसान को नहीं, पूरे कस्बे को दिखाने वाला था।

  • समाज का आईना भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ही कमरे में मौजूद वह रहस्यमयी औरत गायब हो गई।

     

    उसके हाथ में पकड़ी लाल डायरी फर्श पर पड़ी थी।

     

    आरव ने डायरी उठाई।

     

    उसका पहला पन्ना खाली था।

     

    दूसरा पन्ना भी खाली।

     

    तीसरे पन्ने पर केवल एक तारीख लिखी थी—

     

    17 अगस्त 1986।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “जिस दिन पहला झूठ बोला गया, उसी दिन आईना बना।”

     

    आरव ने पन्ना पलटा।

     

    अब उस पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    “हर समाज अपने लिए कुछ चेहरे चुनता है। किसी को अच्छा आदमी कहता है, किसी को बुरा। लेकिन असली सच उन चेहरों के पीछे छिपा रहता है।”

     

    आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।

     

    अचानक हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई दरवाजे के पास आकर रुक गया।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    दरवाजे पर उसका दोस्त कबीर खड़ा था।

     

    “तू यहाँ क्या कर रहा है?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने राहत की साँस ली।

     

    “तू मेरा पीछा कर रहा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ। मुझे लगा तू अकेला यहाँ आकर कोई बेवकूफी करेगा।”

     

    दोनों हवेली से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन आरव ने लाल डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    अगली सुबह उसने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी में सूरजपुर के कई लोगों के बारे में लिखा था।

     

    सबसे पहला नाम था—

     

    शंभूनाथ।

     

    शंभूनाथ कस्बे का सबसे बड़ा व्यापारी था। बाहर से वह बहुत धार्मिक और दयालु माना जाता था। मंदिर में रोज पूजा करता और गरीबों को खाना बाँटता।

     

    लेकिन डायरी में लिखा था कि वह मजदूरों को महीनों की मजदूरी नहीं देता था।

     

    आरव ने उसी दिन शंभूनाथ से मिलने का फैसला किया।

     

    शंभूनाथ ने उसे बड़े प्यार से बैठाया।

     

    “बेटा, पत्रकार हो। चाय पियोगे?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप अपने मजदूरों को समय पर पैसा क्यों नहीं देते?”

     

    शंभूनाथ का चेहरा बदल गया।

     

    “किसने कहा तुमसे?”

     

    “बस सवाल पूछा है।”

     

    वह हँसने लगा।

     

    “आजकल के पत्रकार भी न… गरीबों के नाम पर कहानी बनाते हैं।”

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    वह आदमी बाहर से जितना शांत था, भीतर से उतना ही बेचैन।

     

    शाम को आरव को अपने कमरे में वही आवाज सुनाई दी—

     

    “पहला चेहरा देख लिया?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने आईने के सामने जाकर खुद को देखा।

     

    लेकिन आईने में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे शंभूनाथ खड़ा था।

     

    आरव पलटा।

     

    कमरा खाली था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    इस बार शंभूनाथ का चेहरा बदल रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    मुँह से खून बहने लगा।

     

    और फिर आईने में लिखा दिखाई दिया—

     

    “झूठ का पहला चेहरा।”

     

    अगली सुबह पूरे कस्बे में खबर फैल गई।

     

    शंभूनाथ रात में अपने घर के कमरे में मृत पाया गया था।

     

    उसके सामने एक बड़ा आईना रखा था।

     

    और आईने पर उंगली से लिखा था—

     

    “मजदूरी का हिसाब बाकी है।”

     

    पुलिस ने इसे हत्या माना।

     

    कस्बे में डर फैल गया।

     

    लोग कहने लगे कि ठाकुर की हवेली का श्राप लौट आया है।

     

    लेकिन आरव को यकीन था कि यह सिर्फ श्राप नहीं था।

     

    किसी को उन लोगों के राज पता थे।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तू इस मामले से दूर क्यों नहीं हो जाता?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कोई लोगों को मार नहीं रहा… कोई उन्हें उनके किए का हिसाब दिखा रहा है।”

     

    “और अगर अगला नाम तेरा हुआ तो?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    उसी रात उसने लाल डायरी फिर खोली।

     

    एक नया पन्ना अपने आप खुल गया।

     

    उस पर उसका नाम लिखा था।

     

    आरव मिश्रा।

     

    उसके नीचे—

     

    “सच लिखने वाला आदमी भी सच से भागता है।”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसे अपने जीवन की एक घटना याद आई।

     

    तीन साल पहले उसने एक बड़े उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार की खबर लिखी थी।

     

    लेकिन जब उस उद्योगपति ने उसे पैसे देने की पेशकश की थी, आरव ने खबर रोक दी थी।

     

    उसने खुद को समझाया था कि परिवार की जरूरत थी।

     

    मगर वह भी तो एक झूठ था।

     

    वह भी तो बिक गया था।

     

    आईने में उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

     

    एक आदमी दिखाई दिया जो नोटों का बंडल हाथ में लिए खड़ा था।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    आईने वाला आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दूसरों का सच लिखते हो… अपना कब लिखोगे?”

     

    आरव ने आईने पर मुक्का मारा।

     

    शीशा नहीं टूटा।

     

    बल्कि उसके अंदर से आवाज आई—

     

    “समाज का सबसे खतरनाक झूठ वह होता है जिसे इंसान खुद से बोलता है।”

     

    अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई।

     

    अंधेरे में लाल डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    फिर एक नाम पर आकर रुक गए।

     

    हरिदास बाबा।

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    वही बाबा जिन्होंने उसे हवेली से दूर रहने को कहा था।

     

    अब सवाल यह था—

     

    क्या हरिदास बाबा भी किसी सच को छिपा रहे थे?

     

    आरव को नहीं पता था कि इस सवाल का जवाब उसे सूरजपुर के सबसे पुराने मंदिर में मिलने वाला था।

     

    और वहाँ उसका सामना उस आदमी से होने वाला था, जो पिछले चालीस सालों से आईने का रहस्य छिपाए बैठा था।

  • समाज का आईना” (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन शाम ढलते ही यह जगह किसी अंधेरी दुनिया में बदल जाती थी। कस्बे के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “आईने वाली हवेली” कहते थे।

     

    हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी ऊँची दीवारों पर काई जम चुकी थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लगी लोहे की जंजीर हमेशा हवा के साथ खड़खड़ाती रहती थी।

     

    लोग कहते थे कि उस हवेली में एक बहुत बड़ा आईना था।

     

    ऐसा आईना, जिसमें इंसान अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना असली चेहरा देखता था।

     

    कस्बे के बुजुर्गों का कहना था कि कई साल पहले हवेली का मालिक ठाकुर रघुवीर सिंह था। वह पूरे इलाके में बहुत सम्मानित आदमी माना जाता था। मंदिर में सबसे बड़ा दान वही देता था, गरीबों के सामने खुद को उनका मसीहा बताता था और हर साल बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाएँ करवाता था।

     

    लेकिन उसकी हवेली के अंदर कुछ और ही कहानी थी।

     

    कहा जाता था कि ठाकुर गरीब किसानों की जमीन हड़पता था। जो उसके खिलाफ आवाज उठाता, उसे धमकाया जाता। मगर बाहर की दुनिया में ठाकुर को लोग “धर्मात्मा” कहते थे।

     

    एक रात ठाकुर ने उसी रहस्यमयी आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसके हाथ खून से सने थे।

     

    ठाकुर घबरा गया।

     

    उसने आईना तोड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी आईने के अंदर से किसी औरत की आवाज आई—

     

    “दुनिया से झूठ बोल सकते हो ठाकुर… अपने आप से नहीं।”

     

    अगली सुबह ठाकुर अपनी हवेली के अंदर मृत मिला।

     

    उसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कोई भयानक चीज देखी हो।

     

    तब से हवेली बंद कर दी गई।

     

    लेकिन असली कहानी वर्षों बाद शुरू हुई।

     

    सूरजपुर में रहने वाला आरव शहर से अपने कस्बे वापस आया था। वह पत्रकार था और समाज में फैले अंधविश्वास और अपराध पर लिखता था।

     

    उसे अपने दादा की पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन समाज अपने चेहरे से पर्दा हटाएगा, आईना फिर जाग जाएगा।”

     

    आरव ने उस लाइन को कई बार पढ़ा।

     

    उसे लगा कि शायद उसके दादा भी उसी हवेली की कहानी से परिचित थे।

     

    अगले दिन उसने कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, हरिदास बाबा, से इस बारे में पूछा।

     

    बाबा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “उस हवेली का नाम दोबारा मत लेना।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि वहाँ आईना है।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “आईना तो हर घर में होता है बाबा।”

     

    हरिदास बाबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “हर आईना चेहरा दिखाता है बेटा… लेकिन वह आईना नीयत दिखाता है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    बाबा ने आगे कहा—

     

    “वह आईना किसी बुरे आदमी को नहीं मारता। वह सिर्फ उसे उसका सच दिखाता है। डर इस बात का है कि इंसान अपना सच देखकर क्या करता है।”

     

    उस रात आरव ने तय किया कि वह हवेली जाएगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे वह टॉर्च लेकर हवेली के सामने पहुँचा।

     

    हवा बहुत तेज थी।

     

    दरवाजा बिना छुए ही धीरे-धीरे खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    अंदर धूल और सड़ांध की गंध थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। हर चित्र में ठाकुर परिवार के लोग मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि जैसे-जैसे आरव आगे बढ़ता, उसे लगता कि उन चित्रों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।

     

    वह एक बड़े कमरे में पहुँचा।

     

    कमरे के बीचोंबीच एक विशाल आईना कपड़े से ढका हुआ था।

     

    आरव ने धीरे से कपड़ा हटाया।

     

    आईना काला था।

     

    उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।

     

    फिर अचानक आईने की सतह पर हल्की-सी लहर उठी।

     

    और उसके सामने उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन वह मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    आईने वाला आरव उसे घूर रहा था।

     

    फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    आरव ने हाथ नहीं उठाया था।

     

    आईने के अंदर का आरव मुस्कुराया और उसके होंठ हिले—

     

    “तुम सच जानना चाहते हो?”

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    टॉर्च बुझ गई।

     

    और अंधेरे में एक फुसफुसाहट गूँजी—

     

    “तो पहले अपना सच देखो…”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लाल डायरी थी।

     

    और वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी औरत ने कहा—

     

    “यह आईना समाज का है… और इसमें हर किसी का चेहरा है।”

     

    अचानक आईने में कई चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    पुलिस वाले।

     

    नेता।

     

    पुजारी।

     

    व्यापारी।

     

    शिक्षक।

     

    गरीब।

     

    अमीर।

     

    और उन सबके चेहरों के पीछे एक दूसरा चेहरा छिपा था।

     

    एक ऐसा चेहरा जो दुनिया से छिपाया गया था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    यह सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं थी।

     

    यह पूरे समाज का आईना था।

     

    और आईना अब जाग चुका था।