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  • सुनहरी हिरन मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सुनहरी हिरनी और मायावी शिकारी

     

    बहुत दूर, ऊँचे पहाड़ों और घने पेड़ों से घिरे एक जंगल में एक छोटी सी सुनहरी हिरनी रहती थी। उसका नाम कनक था। उसका शरीर हल्की सुनहरी रोशनी जैसा चमकता था और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में मासूमियत थी।

     

    जंगल के जानवर कहते थे कि कनक साधारण हिरनी नहीं थी। जब वह सुबह की धूप में दौड़ती, तो उसके शरीर से सुनहरी चमक फैल जाती और उसके पैरों के निशान कुछ देर तक जमीन पर चमकते रहते।

     

    लेकिन जंगल में एक मायावी शिकारी भी रहता था—मायासुर।

     

    वह किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए जंगल में नहीं रहता था, बल्कि उसे कनक की सुनहरी शक्ति चाहिए थी। उसे विश्वास था कि अगर वह कनक को पकड़ लेगा, तो उसकी जादुई शक्ति से वह पूरे जंगल पर अपना अधिकार कर सकता है।

     

    एक सुबह कनक नदी के किनारे पानी पी रही थी। अचानक उसे झाड़ियों के पीछे किसी की आहट सुनाई दी।

     

    वह चौकन्नी हुई।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा, वहाँ कोई नहीं था।

     

    कनक तेजी से जंगल की ओर भागी।

     

    उसके पीछे से एक आवाज आई, “भाग लो कनक… लेकिन मुझसे ज्यादा देर तक नहीं भाग पाओगी।”

     

    कनक समझ गई कि मायासुर फिर उसके पीछे पड़ चुका है।

     

    वह जंगल के सबसे पुराने हिस्से की ओर दौड़ी। वहाँ एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसकी जड़ों के नीचे जंगल की रक्षा करने वाली शक्ति रहती है।

     

    कनक उस पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    कुछ ही देर में मायासुर वहाँ पहुँचा।

     

    उसने चारों तरफ देखा और मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं कहीं हो।”

     

    उसने अपनी जादुई छड़ी घुमाई।

     

    अचानक जंगल की सारी पगडंडियाँ बदल गईं। जहाँ रास्ता था, वहाँ घनी झाड़ियाँ उग आईं और जहाँ झाड़ियाँ थीं, वहाँ रास्ता बन गया।

     

    कनक डर गई।

     

    मायासुर बोला, “अब देखता हूँ तुम कहाँ जाती हो।”

     

    कनक ने हिम्मत जुटाई और एक संकरी पगडंडी पर दौड़ पड़ी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति से उसके आगे एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी।

     

    कनक रुक गई।

     

    मायासुर धीरे-धीरे उसके पास आने लगा।

     

    “अब तुम बच नहीं सकती।”

     

    तभी कनक ने ऊपर देखा। पेड़ की एक मजबूत डाल ठीक उसके सिर के ऊपर थी।

     

    वह तेजी से पीछे हटी और छलांग लगाकर डाल के ऊपर चढ़ गई।

     

    मायासुर नीचे खड़ा रह गया।

     

    “तुम पेड़ पर चढ़ सकती हो?” वह गुस्से में बोला।

     

    कनक दूसरी डाल पर कूद गई और फिर पेड़ों के बीच से भागती हुई दूर निकल गई।

     

    लेकिन मायासुर ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपना रूप बदल लिया।

     

    कुछ ही क्षण में वह एक बूढ़े साधु के रूप में कनक के सामने दिखाई दिया।

     

    “बेटी, तुम बहुत डरी हुई लग रही हो। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें सुरक्षित जगह पहुँचा दूँगा।”

     

    कनक कुछ पल उसे देखती रही।

     

    तभी उसे साधु के पैरों के पास पड़ी छाया दिखाई दी। बूढ़े साधु की छाया के बजाय वहाँ किसी लंबे राक्षस जैसी आकृति थी।

     

    कनक समझ गई कि यह मायासुर है।

     

    वह बिना कुछ बोले दूसरी दिशा में भाग गई।

     

    मायासुर का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम इतनी आसानी से मेरी चाल समझ गई?”

     

    कनक जंगल के अंदर और गहराई में चली गई।

     

    भागते-भागते उसे एक घायल खरगोश दिखाई दिया।

     

    खरगोश काँटों में फँसा था।

     

    कनक रुक गई।

     

    उसने अपने सींगों से काँटों को हटाया और खरगोश को बाहर निकाला।

     

    खरगोश ने कहा, “तुम्हें रुकना नहीं चाहिए था। मायासुर तुम्हारे पीछे है।”

     

    कनक ने कहा, “अगर मैं इसे छोड़ देती तो यह मर जाता। डर के कारण किसी की मदद करना नहीं छोड़ सकती।”

     

    खरगोश ने उसे जंगल के एक गुप्त रास्ते के बारे में बताया।

     

    “उस रास्ते से पहाड़ के पीछे एक पुरानी गुफा है। वहाँ जंगल की रक्षक देवी की शक्ति है। शायद वही तुम्हारी मदद कर सके।”

     

    कनक उस रास्ते पर चल पड़ी।

     

    लेकिन मायासुर को भी उसकी दिशा का पता चल गया।

     

    वह गरजते हुए बोला, “तुम उस गुफा तक नहीं पहुँचोगी!”

     

    उसने अपने मंत्र से तेज हवा पैदा कर दी।

     

    पेड़ हिलने लगे। पत्ते उड़ने लगे।

     

    कनक कई बार गिरते-गिरते बची, लेकिन उसने दौड़ना नहीं छोड़ा।

     

    आखिरकार वह गुफा तक पहुँच गई।

     

    अंदर एक बड़ा पत्थर था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसके मन में डर से बड़ा साहस हो, वही इस शक्ति को जगा सकता है।”

     

    कनक ने पत्थर को छुआ।

     

    अचानक पूरी गुफा सुनहरी रोशनी से भर गई।

     

    एक शांत आवाज सुनाई दी, “कनक, तुम्हारी शक्ति तुम्हारे शरीर की चमक में नहीं, तुम्हारे दिल की अच्छाई में है।”

     

    कनक ने पूछा, “क्या मैं मायासुर को हरा सकती हूँ?”

     

    आवाज आई, “उसे उसकी ही माया से हराना होगा।”

     

    उसी समय मायासुर गुफा में पहुँच गया।

     

    “आखिर तुम यहाँ आ ही गई!”

     

    उसने हाथ उठाया और चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    कनक ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने डरने के बजाय अपने मन में जंगल के सभी जानवरों को याद किया—वह खरगोश जिसे उसने बचाया था, पक्षी, पेड़ और वे छोटे जीव जो हमेशा उसकी रक्षा करते थे।

     

    अचानक उसके शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

     

    मायासुर ने अपनी जादुई शक्ति बढ़ाई, लेकिन सुनहरी रोशनी उसके चारों तरफ फैल गई।

     

    उसकी बनाई हुई सारी मायावी तस्वीरें टूटने लगीं।

     

    मायासुर घबरा गया।

     

    “यह कैसे हो सकता है?”

     

    कनक ने कहा, “तुम दूसरों को डराकर शक्तिशाली बनना चाहते थे। लेकिन असली शक्ति किसी को डराने में नहीं, किसी की मदद करने में होती है।”

     

    मायासुर ने आखिरी बार हमला करने की कोशिश की।

     

    लेकिन इस बार जंगल के सारे जानवर गुफा के बाहर आ गए।

     

    हजारों पक्षी आसमान में उड़ने लगे। हिरणों का झुंड उसके सामने खड़ा हो गया और हाथियों ने जोर से चिंघाड़कर उसका रास्ता रोक दिया।

     

    मायासुर की माया कमजोर पड़ने लगी।

     

    उसकी जादुई छड़ी जमीन पर गिर गई।

     

    जैसे ही उसने उसे उठाने की कोशिश की, वह पत्थर बन गई।

     

    मायासुर की सारी शक्ति खत्म हो गई।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैं हार गया।”

     

    कनक उसके पास गई और बोली, “अगर तुम अपनी शक्ति का इस्तेमाल दूसरों की रक्षा के लिए करोगे, तो शायद जंगल तुम्हें माफ कर दे।”

     

    मायासुर ने पहली बार सिर झुका लिया।

     

    उस दिन के बाद वह जंगल छोड़कर दूर पहाड़ों में चला गया। कहते हैं कि उसने अपनी बाकी जिंदगी अपनी मायावी शक्तियों से लोगों को डराने के बजाय जरूरतमंदों की मदद करने में लगा दी।

     

    और कनक?

     

    वह जंगल की सबसे प्रिय हिरनी बन गई।

     

    अब जब वह सुबह जंगल में दौड़ती, तो उसकी सुनहरी चमक पहले से भी ज्यादा दिखाई देती।

     

    जानवर उसे देखकर कहते—

     

    “कनक सिर्फ सुनहरी हिरनी नहीं है। वह हमारे जंगल की बहादुर रक्षक है।”

     

    कनक मुस्कुराती और खुले जंगल में दौड़ जाती।

     

    उसकी चमकती हुई चाल जैसे हर किसी को एक ही बात सिखाती थी—

     

    सच्ची ताकत उस जादू में नहीं होती जो दूसरों को अपने वश में कर ले, बल्कि उस दिल में होती है जो डर के बावजूद सही काम करने का साहस रखता है।

  • राजा दुष्यंत ओर शकुंतला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राजा दुष्यंत और शकुंतला

     

    बहुत समय पहले की बात है। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत अपनी वीरता, न्याय और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। एक दिन वह शिकार के लिए वन की ओर निकले। घने जंगल में हिरण का पीछा करते-करते उनका रथ काफी दूर निकल गया।

     

    अचानक उनकी नजर एक शांत और सुंदर आश्रम पर पड़ी। वहाँ हिरण निडर होकर घूम रहे थे, पक्षियों की आवाज गूंज रही थी और ऋषियों के शिष्य अपने काम में लगे थे।

     

    राजा ने अपना धनुष नीचे रखा और आश्रम के भीतर जाने लगे।

     

    तभी उन्हें एक युवती दिखाई दी। उसके हाथ में पानी का पात्र था और वह आश्रम के पौधों में पानी डाल रही थी। उसके चेहरे पर सादगी और आँखों में अजीब सी शांति थी।

     

    वह थी शकुंतला।

     

    शकुंतला ऋषि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी थी। वह अपने सरल स्वभाव और दयालु मन के लिए जानी जाती थी।

     

    राजा दुष्यंत कुछ पल उसे देखते रहे।

     

    शकुंतला ने राजा को देखा तो विनम्रता से पूछा, “आप कौन हैं? क्या आप रास्ता भटककर यहाँ आए हैं?”

     

    दुष्यंत ने मुस्कुराकर कहा, “मैं हस्तिनापुर का राजा दुष्यंत हूँ। शिकार करते हुए इस आश्रम तक आ पहुँचा।”

     

    शकुंतला ने हाथ जोड़कर कहा, “राजन, आपका आश्रम में स्वागत है। आप थक गए होंगे। कृपया कुछ देर विश्राम कीजिए।”

     

    दुष्यंत ने आश्रम में विश्राम किया, लेकिन उनका मन बार-बार शकुंतला की ओर जा रहा था।

     

    कुछ दिन तक वह किसी न किसी बहाने आश्रम के आसपास रहने लगे। शकुंतला भी राजा की बातों और उनके सरल व्यवहार से प्रभावित होने लगी।

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम हो गया।

     

    एक दिन दुष्यंत ने कहा, “शकुंतला, मैं तुम्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहता हूँ।”

     

    शकुंतला ने धीमे स्वर में पूछा, “लेकिन राजन, आपका राज्य? आपकी प्रजा? क्या आप मुझे कभी भूल तो नहीं जाएंगे?”

     

    दुष्यंत ने उसका हाथ थामकर कहा, “मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा। तुम मेरी पत्नी बनोगी और मैं तुम्हें सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले जाऊँगा।”

     

    दोनों ने गंधर्व विवाह किया।

     

    कुछ समय बाद दुष्यंत को राज्य लौटना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने शकुंतला से कहा, “मुझे राज्य के जरूरी काम निपटाने हैं। मैं जल्द ही तुम्हें लेने वापस आऊँगा।”

     

    शकुंतला ने विश्वास के साथ कहा, “मैं आपका इंतजार करूँगी।”

     

    दुष्यंत हस्तिनापुर लौट गए।

     

    इधर एक दिन शकुंतला आश्रम में बैठी राजा के बारे में सोच रही थी। तभी ऋषि दुर्वासा वहाँ आए। शकुंतला राजा की यादों में इतनी खोई हुई थी कि वह उनका स्वागत नहीं कर सकी।

     

    ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए।

     

    उन्होंने कहा, “जिसके विचारों में खोकर तुमने मेरा अपमान किया है, वही व्यक्ति तुम्हें भूल जाएगा।”

     

    शकुंतला घबरा गई।

     

    वह हाथ जोड़कर बोली, “ऋषिवर, मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दीजिए।”

     

    शकुंतला की विनती देखकर ऋषि का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्होंने कहा, “जब राजा को तुम्हारे प्रेम की कोई निशानी दिखाई जाएगी, तब उसे सब याद आ जाएगा।”

     

    शकुंतला के पास दुष्यंत की दी हुई एक अंगूठी थी।

     

    कुछ समय बाद शकुंतला गर्भवती हुई। ऋषि कण्व ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि अब उसे अपने पति के पास जाना चाहिए।

     

    शकुंतला राजा दुष्यंत से मिलने हस्तिनापुर के लिए निकल पड़ी।

     

    रास्ते में वह एक नदी के किनारे रुकी। पानी में हाथ डालते समय उसकी उंगली से राजा की दी हुई अंगूठी निकलकर नदी में गिर गई। उसे इसका पता ही नहीं चला।

     

    जब वह हस्तिनापुर पहुँची तो राजा दुष्यंत के सामने गई।

     

    राजा ने उसे देखा, लेकिन श्राप के कारण उन्हें कुछ याद नहीं था।

     

    शकुंतला की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “राजन, क्या आप मुझे पहचानते नहीं?”

     

    दुष्यंत ने गंभीर होकर कहा, “मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ। तुम कौन हो?”

     

    शकुंतला का दिल टूट गया।

     

    “मैं वही शकुंतला हूँ, जिससे आपने विवाह किया था। आपने वचन दिया था कि आप मुझे अपने साथ ले जाएंगे।”

     

    दुष्यंत परेशान हो गए। उन्हें शकुंतला की बातें समझ नहीं आ रही थीं।

     

    शकुंतला ने अपनी अंगूठी दिखाने के लिए हाथ देखा, लेकिन अंगूठी वहाँ थी ही नहीं।

     

    वह समझ गई कि शायद रास्ते में अंगूठी खो गई है।

     

    अपमान और दुख से वह वहाँ से चली गई।

     

    कुछ समय बाद एक मछुआरे को नदी में एक बड़ी मछली मिली। मछली काटने पर उसके अंदर से एक चमकती हुई अंगूठी निकली। अंगूठी पर राजा दुष्यंत का नाम खुदा था।

     

    मछुआरा वह अंगूठी लेकर राजमहल पहुँचा।

     

    जैसे ही दुष्यंत ने अंगूठी देखी, अचानक उनके मन में पुरानी सारी यादें लौट आईं।

     

    उन्हें आश्रम, शकुंतला, उनका विवाह और अपना वादा—सब कुछ याद आ गया।

     

    राजा पछतावे से भर गए।

     

    “मैंने शकुंतला के साथ क्या कर दिया?”

     

    उन्होंने तुरंत सैनिकों को उसे खोजने भेजा, लेकिन शकुंतला आश्रम छोड़ चुकी थी।

     

    कई वर्षों तक राजा उसे खोजते रहे।

     

    उधर शकुंतला ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम था भरत। बालक बचपन से ही बहुत साहसी और निडर था।

     

    एक दिन राजा दुष्यंत वन में गए। वहाँ उन्होंने एक छोटे बालक को सिंह के बच्चे के साथ निडर होकर खेलते देखा।

     

    राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    बालक ने गर्व से कहा, “मैं भरत हूँ।”

     

    दुष्यंत के मन में अजीब सी भावना उठी।

     

    उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पिता कौन हैं?”

     

    भरत ने कहा, “मेरे पिता हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत हैं।”

     

    दुष्यंत स्तब्ध रह गए।

     

    तभी सामने शकुंतला आ गई।

     

    दोनों की आँखें मिलते ही कई वर्षों की दूरी जैसे एक पल में खत्म हो गई।

     

    दुष्यंत उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

     

    “शकुंतला, मुझे क्षमा कर दो। मैंने तुम्हें कभी जानबूझकर नहीं ठुकराया था। मैं उस समय तुम्हें पहचान नहीं पा रहा था।”

     

    शकुंतला की आँखों में आँसू थे।

     

    उसने कहा, “राजन, दुख मुझे आपके भूलने का नहीं था। दुख इस बात का था कि जिस व्यक्ति पर मैंने सबसे ज्यादा विश्वास किया, उसी के सामने मुझे अपने प्रेम को साबित करना पड़ा।”

     

    दुष्यंत ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं तुम्हारा विश्वास फिर से जीतना चाहता हूँ।”

     

    शकुंतला कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, “विश्वास टूटने के बाद उसे वापस पाने में समय लगता है। लेकिन अगर आपका मन सच में बदल गया है, तो मैं अपने बेटे को उसके पिता से दूर नहीं रखूँगी।”

     

    दुष्यंत ने भरत को अपने पास बुलाया और उसे गले लगा लिया।

     

    इसके बाद राजा दुष्यंत शकुंतला और भरत को सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले गए।

     

    समय के साथ भरत बड़ा हुआ और अपनी वीरता, न्याय और साहस के लिए प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर उसी के नाम पर इस भूमि को भारतवर्ष कहा गया।

     

    राजा दुष्यंत और शकुंतला की कहानी केवल प्रेम की कहानी नहीं थी। यह विश्वास, वचन और इंतजार की कहानी थी।

     

    उनका प्रेम यह सिखाता है कि सच्चे रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि उन्हें निभाने की हिम्मत से मजबूत होते हैं।

  • घर का बंटवारा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    घर का बंटवारा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गाँव में रामदीन का बड़ा सा पुश्तैनी घर था। घर पुराना जरूर था, लेकिन उसमें परिवार की बहुत सारी यादें बसी थीं। रामदीन के दो बेटे थे—बड़ा बेटा मोहन और छोटा बेटा सोहन।

     

    दोनों भाई बचपन में एक-दूसरे के बिना नहीं रहते थे। एक ही थाली में खाना, साथ स्कूल जाना और खेतों में पिता का हाथ बँटाना—उनका बचपन ऐसे ही बीता था।

     

    लेकिन समय के साथ दोनों की सोच बदलने लगी।

     

    मोहन की शादी हो चुकी थी और उसके दो बच्चे थे। वह खेती संभालता था। सोहन शहर में नौकरी करता था और महीने में एक-दो बार ही गाँव आता था।

     

    रामदीन बूढ़े हो चुके थे। एक दिन उन्होंने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा, “बेटा, अब मेरी उम्र हो गई है। मैं चाहता हूँ कि मेरे रहते घर और खेत का बंटवारा कर दूँ, ताकि मेरे जाने के बाद तुम दोनों के बीच कोई झगड़ा न हो।”

     

    मोहन तुरंत बोला, “बाबा, मुझे बंटवारा नहीं चाहिए। हम दोनों भाई मिलकर रहेंगे।”

     

    सोहन भी मुस्कुराकर बोला, “बड़े भैया सही कह रहे हैं।”

     

    रामदीन ने दोनों की तरफ देखा और कहा, “आज तुम ऐसा कह रहे हो, लेकिन जिंदगी कब बदल जाए, कोई नहीं जानता।”

     

    कुछ महीने बाद रामदीन की तबीयत बहुत बिगड़ गई। जाते-जाते उन्होंने दोनों बेटों से सिर्फ इतना कहा, “घर चाहे बाँट लेना, लेकिन अपना रिश्ता मत बाँटना।”

     

    उनकी मृत्यु के बाद घर में शोक का माहौल था। तेरहवीं के बाद एक दिन मोहन की पत्नी ने कहा, “अब पिताजी नहीं रहे। घर और खेत का हिसाब साफ कर लेना चाहिए।”

     

    सोहन की पत्नी ने भी यही बात कही।

     

    दोनों भाइयों ने जमीन के कागज निकाले। खेत बराबर बाँट दिए गए। दुकान भी आधी-आधी हो गई।

     

    सब ठीक चल रहा था, लेकिन असली परेशानी पुश्तैनी घर को लेकर शुरू हुई।

     

    मोहन बोला, “मुझे घर का आगे वाला हिस्सा चाहिए। बच्चों के लिए जगह ज्यादा है।”

     

    सोहन ने कहा, “लेकिन आगे वाला हिस्सा सड़क से लगा है। उसकी कीमत भी ज्यादा है।”

     

    “तो तुम पीछे वाला हिस्सा ले लो और खेत में तुम्हारा हिस्सा थोड़ा बढ़ा देंगे।”

     

    “नहीं भैया, मुझे बराबर का हिस्सा चाहिए।”

     

    बात धीरे-धीरे बहस में बदल गई।

     

    मोहन गुस्से में बोला, “तुम शहर में रहते हो, तुम्हें इस घर से क्या लेना-देना?”

     

    सोहन को यह बात चुभ गई।

     

    “और आप गाँव में रहते हैं तो क्या पूरा घर आपका हो गया? पिताजी ने दोनों को बराबर दिया है।”

     

    उस दिन पहली बार दोनों भाइयों के बीच आवाज ऊँची हुई।

     

    अगले दिन राजमिस्त्री बुलाया गया और घर के बीच दीवार खड़ी करने की बात तय हुई।

     

    जब मजदूर दीवार बनाने लगे तो दोनों भाई दूर खड़े होकर एक-दूसरे को देखते रहे। जिस आँगन में दोनों बचपन में खेलते थे, उसी आँगन के बीच अब ईंटें रखी जा रही थीं।

     

    मोहन की बेटी रोते हुए बोली, “पापा, दादाजी के घर में दीवार क्यों बन रही है?”

     

    मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों में दीवार खड़ी हो गई।

     

    अब दोनों भाइयों के हिस्से अलग थे। रसोई अलग, आँगन अलग और दरवाजे भी अलग।

     

    एक शाम मोहन की पत्नी का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से गिरते-गिरते बची। सोहन ने आवाज सुनते ही दौड़कर उसे संभाल लिया।

     

    मोहन कुछ पल चुप रहा।

     

    “धन्यवाद,” उसने धीरे से कहा।

     

    सोहन ने बस इतना कहा, “भाभी हैं आप मेरी।”

     

    लेकिन दोनों फिर अपने-अपने हिस्से में चले गए।

     

    दिन बीतते गए। घर का बंटवारा तो हो गया था, मगर रिश्ते में आई दूरी बढ़ती गई।

     

    एक रात तेज बारिश शुरू हुई। बारिश इतनी ज्यादा थी कि पुराने घर की छत से पानी टपकने लगा। अचानक मोहन के हिस्से की पिछली दीवार कमजोर होकर गिर गई।

     

    अंदर बच्चे सो रहे थे।

     

    सोहन ने आवाज सुनी तो तुरंत दीवार के पास पहुँचा। उसने बिना कुछ सोचे बच्चों को बाहर निकाला।

     

    मोहन भी दौड़कर आया।

     

    कुछ देर दोनों भाई अपने बच्चों को सीने से लगाए खड़े रहे।

     

    मोहन की आँखों में आँसू थे।

     

    वह बोला, “सोहन… अगर तुम समय पर नहीं आते तो पता नहीं क्या होता।”

     

    सोहन ने कहा, “भैया, बच्चों की जान के सामने ये दीवार क्या मायने रखती है?”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    फिर उसकी नजर उसी दीवार पर गई, जिसे कुछ महीने पहले दोनों ने मिलकर खड़ा करवाया था।

     

    उसने कहा, “हमने घर बाँट लिया, लेकिन शायद हम ये भूल गए कि घर ईंटों से नहीं, रिश्तों से बनता है।”

     

    सोहन की आँखें भी भर आईं।

     

    “भैया, मुझे भी उस दिन की बात का अफसोस है। मुझे बराबर हिस्सा चाहिए था, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि बराबर हिस्सा जमीन का होता है, भाई का नहीं।”

     

    मोहन ने आगे बढ़कर सोहन को गले लगा लिया।

     

    दोनों काफी देर तक चुपचाप खड़े रहे।

     

    अगली सुबह मजदूर बुलाए गए।

     

    मोहन ने कहा, “यह दीवार तोड़ दो।”

     

    सोहन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पक्का?”

     

    मोहन मुस्कुराया, “हाँ। पिताजी की आखिरी बात याद है ना? उन्होंने कहा था—घर चाहे बाँट लेना, रिश्ता मत बाँटना।”

     

    दीवार टूटने लगी।

     

    हर ईंट के गिरने के साथ जैसे दोनों भाइयों के बीच की नाराजगी भी गिरती जा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद घर फिर पहले जैसा हो गया। अब रसोई अलग नहीं थी। शाम को दोनों परिवार एक साथ बैठकर खाना खाते थे। बच्चे फिर उसी आँगन में खेलने लगे।

     

    एक दिन मोहन ने पुराने संदूक से पिता की तस्वीर निकाली और आँगन में रख दी।

     

    सोहन ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, देर से सही, लेकिन आपकी बात समझ आ गई।”

     

    मोहन ने कहा, “आपने हमें जमीन नहीं, एक परिवार दिया था। हम ही उसे बाँटने चले थे।”

     

    दोनों भाइयों ने तय किया कि खेत और संपत्ति का हिसाब कागजों में चाहे अलग रहे, लेकिन घर में कभी दीवार नहीं होगी।

     

    क्योंकि उस दिन उन्हें समझ आया था कि संपत्ति का बंटवारा आसान होता है, लेकिन रिश्तों का बंटवारा इंसान को अंदर से तोड़ देता है।

     

    और पिता की सबसे बड़ी विरासत जमीन नहीं थी।

     

    वह था—दो भाइयों का साथ।

  • चार सब्जियां की लड़ाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चार सब्जियों की अनोखी लड़ाई

     

    एक छोटे से शहर में मार्था नाम की एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसका एक छोटा-सा बगीचा था, जिसमें वह तरह-तरह की सब्जियां उगाती थी। टमाटर, आलू, बैंगन, भिंडी, गाजर, मटर और कई तरह की हरी सब्जियां उसके बगीचे की शोभा बढ़ाती थीं।

     

    लेकिन उस बगीचे में चार सब्जियां ऐसी थीं, जो खुद को सबसे ज्यादा खास समझती थीं।

     

    टमाटर, आलू, बैंगन और भिंडी।

     

    चारों में हमेशा किसी न किसी बात पर बहस होती रहती थी।

     

    एक सुबह टमाटर ने अपनी लाल चमक दिखाते हुए कहा—

     

    “देखो मुझे! मैं कितनी सुंदर हूं। मेरे बिना सलाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

     

    आलू तुरंत बोला—

     

    “सुंदर होने से क्या होता है? सबसे ज्यादा काम तो मेरा आता है। सब्जी बनानी हो, पराठे हों, चाट हो या पकौड़े… हर जगह मैं काम आता हूं।”

     

    भिंडी ने गर्दन हिलाई।

     

    “तुम दोनों अपनी-अपनी तारीफ कर लो। लेकिन मेरे जैसा स्वाद किसके पास है?”

     

    बैंगन हंसते हुए बोला—

     

    “तुम तीनों भूल रहे हो कि असली सब्जियों का राजा कौन है।”

     

    टमाटर ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बैंगन ने गर्व से कहा—

     

    “मैं! मुझसे भरता बनता है, सब्जी बनती है और मसालेदार पकवान भी।”

     

    आलू ने हंसकर कहा—

     

    “तुम्हें कौन पसंद करता है? बच्चे तो तुम्हारा नाम सुनकर ही मुंह बना लेते हैं।”

     

    बैंगन गुस्से में लाल पड़ गया।

     

    “कम से कम मैं तुम्हारी तरह हर सब्जी में घुसकर अपनी पहचान नहीं खोता!”

     

    आलू ने कहा—

     

    “क्या कहा?”

     

    भिंडी बीच में बोली—

     

    “बस करो तुम दोनों!”

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “आज फैसला हो ही जाना चाहिए कि हम चारों में सबसे जरूरी कौन है।”

     

    चारों सब्जियां मान गईं।

     

    उन्होंने तय किया कि अगले दिन बगीचे में एक प्रतियोगिता होगी।

     

    जिस सब्जी को मार्था सबसे ज्यादा पसंद करेगी, वही सबसे खास मानी जाएगी।

     

    अगली सुबह मार्था बगीचे में आई।

     

    उसने टोकरी उठाई और चारों सब्जियों को देखा।

     

    सबसे पहले उसने टमाटर तोड़े।

     

    टमाटर खुशी से फूल गया।

     

    “देखा! सबसे पहले मुझे चुना।”

     

    आलू बोला—

     

    “अभी फैसला मत करो।”

     

    कुछ देर बाद मार्था ने आलू भी खोद लिए।

     

    आलू मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ, कौन ज्यादा जरूरी है?”

     

    भिंडी और बैंगन भी टोकरी में रख दिए गए।

     

    चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    टमाटर बोला—

     

    “अब तो हम सब बराबर हो गए।”

     

    आलू ने कहा—

     

    “नहीं। असली फैसला रसोई में होगा।”

     

    मार्था सब्जियां लेकर रसोई में पहुंची।

     

    उसने टमाटर से चटनी बनाई।

     

    टमाटर खुशी से बोला—

     

    “देखा! मेरा इस्तेमाल सबसे पहले हुआ।”

     

    फिर आलू की सब्जी बनी।

     

    आलू ने गर्व से कहा—

     

    “अब मेरी बारी।”

     

    इसके बाद भिंडी मसाले के साथ पकाई गई।

     

    भिंडी बोली—

     

    “अब समझ आया कि स्वाद किसमें है?”

     

    अंत में बैंगन का भरता बना।

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “अब तो सबको मानना पड़ेगा कि मैं सबसे खास हूं।”

     

    लेकिन तभी रसोई में मार्था की छोटी पोती एलीना आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “दादी, आज इतनी सारी सब्जियां?”

     

    मार्था मुस्कुराई।

     

    “हां बेटा। आज सबकी पसंद की चीज बनेगी।”

     

    एलीना ने चारों पकवान चखे।

     

    “दादी, सब बहुत अच्छे हैं!”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    लेकिन उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    टमाटर बोला—

     

    “एलीना ने पहले मेरी चटनी की तारीफ की थी।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन उसने मेरी सब्जी ज्यादा खाई।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “उसने मेरी प्लेट पूरी खत्म की।”

     

    बैंगन बोला—

     

    “और भरता दोबारा मांगा।”

     

    अब चारों फिर झगड़ने लगे।

     

    मार्था रसोई साफ करने के बाद आराम करने बैठी थी। उसने उनकी बातें सुन लीं।

     

    वह मुस्कुराई और बोली—

     

    “तुम चारों लड़ क्यों रहे हो?”

     

    सब्जियां चुप हो गईं।

     

    टमाटर बोला—

     

    “हममें से सबसे अच्छी कौन है, इसी का फैसला कर रहे हैं।”

     

    मार्था हंस पड़ी।

     

    “सबसे अच्छी?”

     

    “हां।”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “तुम चारों अलग हो। कोई सलाद में अच्छा लगता है, कोई सब्जी में, कोई भरते में और कोई अलग-अलग पकवानों में।”

     

    आलू बोला—

     

    “लेकिन सबसे जरूरी कौन है?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “अगर तुममें से एक भी न हो तो खाना थोड़ा कम स्वादिष्ट हो सकता है। लेकिन अगर तुम सब मिलकर रहो तो रसोई और भी अच्छी बनती है।”

     

    चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    फिर भी बैंगन बोला—

     

    “लेकिन क्या हम अपनी-अपनी खासियत नहीं बता सकते?”

     

    मार्था ने कहा—

     

    “बिल्कुल बता सकते हो। अपनी अच्छाई पर गर्व करना गलत नहीं है। लेकिन अपनी अच्छाई को दूसरों को छोटा दिखाने के लिए इस्तेमाल करना गलत है।”

     

    यह बात चारों के दिल में उतर गई।

     

    लेकिन उसी समय बगीचे से एक आवाज आई।

     

    “अरे! मेरी बात कोई नहीं कर रहा!”

     

    चारों ने पीछे देखा।

     

    वह गाजर थी।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “मैं भी तो हूं!”

     

    भिंडी हंस पड़ी।

     

    “तुम्हें तो हम भूल ही गए।”

     

    गाजर नाराज होकर बोली—

     

    “यही तो समस्या है। तुम चारों खुद को सबसे बड़ा समझते हो।”

     

    चारों चुप हो गए।

     

    गाजर ने कहा—

     

    “इस बगीचे में हर सब्जी की अपनी जगह है। किसी की जरूरत कम नहीं।”

     

    आलू ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम सही कह रही हो।”

     

    टमाटर बोला—

     

    “हम बिना वजह लड़ रहे थे।”

     

    भिंडी ने कहा—

     

    “हमें अपनी खूबियां पता हैं, लेकिन दूसरों की खूबियां देखना भूल गए।”

     

    बैंगन मुस्कुराया।

     

    “तो क्या आज से कोई नहीं लड़ेगा?”

     

    आलू ने मजाक में कहा—

     

    “अगर तुमने खुद को राजा कहना बंद कर दिया तो।”

     

    बैंगन हंस पड़ा।

     

    “ठीक है।”

     

    चारों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली।

     

    अब जब भी बगीचे में कोई सब्जी खुद को सबसे खास बताती, चारों उसे समझाते—

     

    “सबसे खास बनने की जरूरत नहीं है। अपनी जगह अच्छी तरह निभाना ही काफी है।”

     

    कुछ दिनों बाद मार्था ने बगीचे में एक बड़ा बोर्ड लगाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “इस बगीचे में कोई सब्जी छोटी-बड़ी नहीं। हर किसी की अपनी खासियत है।”

     

    चारों सब्जियां उस बोर्ड को देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    टमाटर ने कहा—

     

    “अब समझ आया, लाल होने का मतलब सिर्फ गुस्सा करना नहीं है।”

     

    आलू बोला—

     

    “और हर जगह काम आने का मतलब सबसे बड़ा होना नहीं।”

     

    भिंडी हंसी—

     

    “मेरी लंबाई ज्यादा है, इसका मतलब मैं दूसरों से बड़ी नहीं।”

     

    बैंगन ने कहा—

     

    “और मेरा भरता मशहूर है, इसका मतलब मैं सब्जियों का राजा नहीं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    उस दिन के बाद बगीचे में चारों की दोस्ती पूरे शहर में मशहूर हो गई।

     

    जब भी मार्था चारों को एक साथ रसोई में लाती, वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “लड़ाई में कोई जीतता नहीं। लेकिन जब सब मिलकर रहें, तो हर किसी की खूबसूरती और स्वाद और बढ़ जाता है।”

     

    और चारों सब्जियों ने हमेशा के लिए यह सीख याद रखी—

     

    दूसरों से बेहतर साबित होने से ज्यादा जरूरी है, अपनी खासियत को पहचानना और दूसरों की खासियत की कद्र करना।

  • तीखी मिर्ची का अनोखा राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    तीखी मिर्ची का अनोखा राज

     

    एक छोटे से गांव का नाम था हरियापुर। गांव के चारों तरफ खेत थे और उन्हीं खेतों के बीच एक बूढ़े किसान जॉर्ज का छोटा-सा खेत था। जॉर्ज के खेत में तरह-तरह की सब्जियां उगती थीं, लेकिन उसकी सबसे खास फसल थी—हरी मिर्च।

     

    जॉर्ज की मिर्चें पूरे इलाके में मशहूर थीं।

     

    लोग कहते थे कि उसकी एक मिर्च खा लो तो पानी पीते-पीते पूरा घड़ा खाली कर दो, फिर भी जीभ की जलन कम नहीं होती।

     

    लेकिन जॉर्ज को अपनी मिर्चों पर बहुत गर्व था।

     

    वह हमेशा कहता—

     

    “मेरे खेत की मिर्च सिर्फ तीखी नहीं है, इसमें मेहनत का स्वाद है।”

     

    उसका पोता लुकास शहर से छुट्टियों में गांव आया हुआ था।

     

    एक सुबह वह खेत में दादा के साथ घूम रहा था।

     

    लुकास ने एक बड़ी-सी चमकदार हरी मिर्च देखकर पूछा—

     

    “दादा, ये इतनी बड़ी और चमकदार क्यों है?”

     

    जॉर्ज ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उसे मत छूना।”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “क्यों? मिर्च है, कोई सांप थोड़ी है।”

     

    जॉर्ज ने गंभीर होकर कहा—

     

    “वह साधारण मिर्च नहीं है।”

     

    लुकास की उत्सुकता बढ़ गई।

     

    “फिर कैसी है?”

     

    जॉर्ज ने आसपास देखा और धीरे से कहा—

     

    “यह मेरे खेत की सबसे तीखी मिर्च है। इसे मैंने बीस साल पहले एक बूढ़े साधु से मिले बीज से उगाया था।”

     

    “तो?”

     

    “जिसने भी इसे खाया, उसे अपने अंदर छिपा सच बोलना पड़ा।”

     

    लुकास हंसने लगा।

     

    “दादा, आप भी ना! मिर्च खाने से कोई सच कैसे बोल सकता है?”

     

    जॉर्ज ने कुछ नहीं कहा।

     

    लुकास को लगा दादा उसे डराने की कोशिश कर रहे हैं।

     

    दोपहर को जब जॉर्ज खाना खाने घर गया, लुकास चुपके से खेत में वापस आया।

     

    उसने वही मिर्च तोड़ी।

     

    “आज पता चल ही जाएगा कि दादा सच बोल रहे थे या नहीं।”

     

    उसने मिर्च का छोटा-सा टुकड़ा मुंह में डाल लिया।

     

    पहले कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “आह! ये क्या है!”

     

    उसका मुंह जलने लगा।

     

    वह पानी की तरफ भागा।

     

    एक गिलास पानी पिया।

     

    फिर दूसरा।

     

    लेकिन जलन कम नहीं हुई।

     

    तभी उसके मुंह से अचानक निकल गया—

     

    “मैंने दादा की अलमारी से पैसे चुराए थे!”

     

    लुकास खुद चौंक गया।

     

    “मैंने ये क्या बोल दिया?”

     

    उसे पिछले साल की बात याद आ गई।

     

    उसने सच में दादा की अलमारी से कुछ पैसे लिए थे और कभी किसी को नहीं बताया था।

     

    जलन धीरे-धीरे कम हुई।

     

    लुकास डर गया।

     

    “दादा सच बोल रहे थे!”

     

    वह तुरंत घर पहुंचा और जॉर्ज के सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “दादा…”

     

    जॉर्ज ने उसे देखते ही समझ लिया।

     

    “तुमने मिर्च खा ली?”

     

    लुकास ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    लुकास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझसे गलती हुई थी। मैंने पिछले साल आपके पैसे लिए थे।”

     

    जॉर्ज कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “मुझे पता था।”

     

    लुकास ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको पता था?”

     

    “हां। लेकिन मैं चाहता था कि तुम खुद एक दिन सच बताओ।”

     

    लुकास ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे गले लगा लिया।

     

    “गलती से बड़ा इंसान होता है वह, जो अपनी गलती मान ले।”

     

    लेकिन इस अजीब मिर्च का राज जल्द ही पूरे गांव में फैल गया।

     

    गांव का दुकानदार मार्टिन सबसे पहले जॉर्ज के पास आया।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे एक मिर्च चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    मार्टिन ने हंसकर कहा—

     

    “बस मजे के लिए।”

     

    जॉर्ज ने उसे मिर्च दे दी।

     

    मार्टिन ने जैसे ही थोड़ा सा टुकड़ा खाया, उसकी आंखों से पानी निकलने लगा।

     

    “मैंने पिछले महीने तुम्हारी दुकान से उधार लिए पैसे वापस नहीं किए क्योंकि मैंने वो पैसे खुद रख लिए थे!”

     

    जॉर्ज ने माथा पकड़ लिया।

     

    गांव वाले हैरान रह गए।

     

    अब हर कोई उस मिर्च को लेकर उत्सुक हो गया।

     

    किसी ने सोचा कि इससे झूठ पकड़ना आसान होगा।

     

    किसी ने सोचा कि गांव के सारे राज सामने आ जाएंगे।

     

    लेकिन जॉर्ज ने मिर्च देना बंद कर दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “सच जानने के लिए किसी को जलाना जरूरी नहीं।”

     

    लेकिन गांव का सबसे चालाक आदमी हेनरी इस मिर्च का फायदा उठाना चाहता था।

     

    वह जॉर्ज के पास आया।

     

    “तुम्हें इस मिर्च से बहुत पैसा कमाना चाहिए।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “मैं इसे बेचने के लिए नहीं उगाता।”

     

    हेनरी ने लालच दिया—

     

    “मैं तुम्हें बहुत पैसे दूंगा।”

     

    जॉर्ज ने मना कर दिया।

     

    उस रात हेनरी चोरी-छिपे खेत में घुस गया।

     

    उसने पूरी मिर्च की बेल उखाड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने मिर्च तोड़ी, उसे तेज जलन महसूस हुई।

     

    वह चीख पड़ा—

     

    “मैंने गांव के लोगों से झूठ बोलकर उनकी जमीन के कागज हथियाने की कोशिश की है!”

     

    सुबह तक गांव वालों को सब पता चल गया।

     

    हेनरी की सारी चाल सामने आ गई।

     

    लोग जॉर्ज के पास आए।

     

    “आपने ये मिर्च बचाकर बहुत अच्छा किया।”

     

    जॉर्ज ने कहा—

     

    “नहीं। असली बात मिर्च में नहीं है।”

     

    सबने पूछा—

     

    “तो फिर?”

     

    जॉर्ज ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “मिर्च सिर्फ वही सच बाहर निकालती है, जिसे इंसान खुद अपने अंदर दबाकर बैठा होता है। सच पहले से उसके अंदर होता है।”

     

    लुकास ने दादा की बात ध्यान से सुनी।

     

    उस दिन से वह दादा के खेत में काम करने लगा।

     

    कुछ महीनों बाद एक दिन जॉर्ज ने उसे एक छोटा-सा बीज दिया।

     

    “इसे संभालकर रखना।”

     

    लुकास ने पूछा—

     

    “क्या यह उसी तीखी मिर्च का बीज है?”

     

    जॉर्ज मुस्कुराए।

     

    “हां।”

     

    “क्या मैं इसे उगा सकता हूं?”

     

    “उगा सकते हो। लेकिन याद रखना, इसकी ताकत का इस्तेमाल किसी को शर्मिंदा करने के लिए मत करना।”

     

    लुकास ने बीज संभालकर रख लिया।

     

    साल बीत गए।

     

    जॉर्ज बूढ़ा होता गया और एक दिन उसने खेती की जिम्मेदारी लुकास को सौंप दी।

     

    लुकास ने उस मिर्च की खेती जारी रखी, लेकिन उसने उसे कभी बाजार में नहीं बेचा।

     

    वह गांव के बच्चों को एक ही बात सिखाता—

     

    “सच बोलने के लिए किसी जादुई मिर्च की जरूरत नहीं होती।”

     

    एक दिन गांव में एक छोटा बच्चा उसके पास आया।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर कोई झूठ बोलता है तो क्या उसे वो मिर्च खिला देंगे?”

     

    लुकास हंस पड़ा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि सच किसी के मुंह से जबरदस्ती नहीं निकलवाना चाहिए।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “फिर मिर्च किस काम की है?”

     

    लुकास ने खेत की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “ये हमें सिर्फ एक बात याद दिलाती है।”

     

    “क्या?”

     

    लुकास मुस्कुराया।

     

    “झूठ कितना भी छिपा लो, सबसे ज्यादा मुश्किल उसे अपने ही दिल से छिपाना होता है।”

     

    उस दिन से गांव में उस मिर्च को लोग “सच वाली मिर्च” कहने लगे।

     

    लेकिन लुकास के लिए वह सिर्फ एक मिर्च थी।

     

    उसे पता था कि असली तीखापन उस मिर्च में नहीं था।

     

    असली तीखापन उस सच में था, जिसे इंसान अपने फायदे के लिए छिपाता रहता है।

     

    और यही उस छोटी-सी हरी मिर्च ने पूरे गांव को सिखाया था—

    सच कभी-कभी तीखा जरूर होता है, लेकिन झूठ से कहीं बेहतर होता है।

  • सुनसान रास्ते पर सोम्या

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुनसान रास्ते पर सोम्या

     

    शाम ढल चुकी थी। आसमान पर बादल थे और सड़क के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ खड़े थे। दूर तक कोई घर दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सोम्या अकेली उस सुनसान रास्ते पर चली जा रही थी।

     

    उसकी उम्र करीब बीस साल थी। वह शहर से अपने गांव जा रही थी, लेकिन बस उसे मुख्य सड़क से कुछ दूर छोड़कर चली गई थी। गांव तक पहुंचने के लिए उसे करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना था।

     

    सोम्या ने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “बस थोड़ा रास्ता और है,” उसने खुद से कहा।

     

    उसने बैग कंधे पर ठीक किया और आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है।

     

    उसने कदम धीमे कर दिए।

     

    पीछे से भी कदमों की आवाज धीमी हो गई।

     

    सोम्या ने अचानक पीछे मुड़कर देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    सिर्फ हवा से पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं।

     

    उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ गई।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    जैसे कोई उसके पीछे धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    सोम्या ने इस बार बिना पीछे देखे तेज कदम बढ़ा दिए।

     

    आवाज भी तेज हो गई।

     

    अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सड़क के किनारे उसे एक पुराना पत्थर दिखाई दिया। उस पर गांव का नाम लिखा था।

     

    “बस दो किलोमीटर…”

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी सामने उसे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    सोम्या कुछ पल के लिए रुक गई।

     

    बूढ़े ने पूछा—

     

    “बेटी, कहां जा रही हो?”

     

    “गांव जा रही हूं।”

     

    “इस रास्ते से?”

     

    “जी।”

     

    बूढ़े ने चिंता से कहा—

     

    “अंधेरा होने से पहले पहुंच जाओ।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “क्या इस रास्ते पर कोई परेशानी है?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “परेशानी रास्ते में नहीं है।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ा कुछ बोलता, उससे पहले दूर से किसी गाड़ी की रोशनी दिखाई दी।

     

    बूढ़ा तुरंत सड़क से हट गया।

     

    गाड़ी पास आई और बिना रुके आगे निकल गई।

     

    सोम्या ने राहत की सांस ली।

     

    जब उसने पीछे मुड़कर बूढ़े को देखना चाहा तो वहां कोई नहीं था।

     

    वह चौंक गई।

     

    “अभी तो यहीं थे…”

     

    उसने आसपास देखा।

     

    कोई दिखाई नहीं दिया।

     

    अब सोम्या के मन में डर बैठ चुका था।

     

    वह तेजी से आगे बढ़ने लगी।

     

    कुछ दूर जाकर उसे एक छोटा-सा पुराना मंदिर दिखाई दिया।

     

    मंदिर के बाहर एक लालटेन जल रही थी।

     

    सोम्या अंदर चली गई।

     

    वहां एक बुजुर्ग महिला बैठी थी।

     

    महिला ने उसे देखते ही कहा—

     

    “तुम देर से निकली हो।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “इस रास्ते से गुजरने वाले हर इंसान के चेहरे पर डर देखकर पता चल जाता है।”

     

    सोम्या बैठ गई।

     

    “मुझे लग रहा है कोई मेरा पीछा कर रहा है।”

     

    महिला ने तुरंत बाहर देखा।

     

    “किसी को देखा?”

     

    “नहीं। बस कदमों की आवाज आती है।”

     

    महिला कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “यह रास्ता पुराना है। पहले यहां से गांव के लोग पैदल आया-जाया करते थे।”

     

    “फिर अब इतना सुनसान क्यों है?”

     

    “क्योंकि लोगों ने नया रास्ता बना लिया।”

     

    सोम्या ने पूछा—

     

    “और पुराना रास्ता?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “पुराने रास्ते पर चलने वाले अक्सर अपने डर के साथ चलते हैं।”

     

    सोम्या को बात समझ नहीं आई।

     

    महिला ने उसे पानी दिया।

     

    “कुछ देर यहीं बैठ जाओ। अंधेरा थोड़ा कम होने दो।”

     

    सोम्या ने मोबाइल देखा।

     

    अचानक उसमें नेटवर्क आ गया।

     

    उसने तुरंत अपनी मां को फोन किया।

     

    “मां, मैं रास्ते में हूं।”

     

    उधर से मां की घबराई आवाज आई—

     

    “तुम अभी तक नहीं पहुंची?”

     

    “नहीं, बस थोड़ी देर में पहुंच जाऊंगी।”

     

    मां ने कहा—

     

    “सोम्या, तुम पुराने रास्ते से तो नहीं आ रही?”

     

    सोम्या चौंक गई।

     

    “हां। क्यों?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें पता नहीं इस रास्ते के बारे में?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे नाना इसी रास्ते से गांव लौटते समय कई साल पहले गायब हो गए थे।”

     

    सोम्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    “हमें बाद में उनका सामान मिला था। लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला।”

     

    सोम्या ने फोन काट दिया।

     

    उसने मंदिर में बैठी महिला की तरफ देखा।

     

    “आपको मेरे नाना के बारे में पता है?”

     

    महिला ने शांत स्वर में पूछा—

     

    “तुम्हारे नाना का नाम क्या था?”

     

    सोम्या ने नाम बताया।

     

    महिला की आंखें भर आईं।

     

    “वह मेरे भाई थे।”

     

    सोम्या जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “क्या?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “उस रात भी बहुत अंधेरा था। तुम्हारे नाना इस रास्ते से लौट रहे थे। उन्हें किसी ने रास्ते में रोक लिया था।”

     

    “कौन?”

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    सोम्या की आंखों में डर था।

     

    “फिर उनकी मौत…?”

     

    महिला ने सिर हिलाया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा कि वह मर गए थे।”

     

    सोम्या ने हैरानी से पूछा—

     

    “तो क्या वह जिंदा थे?”

     

    महिला ने मंदिर के पीछे की तरफ इशारा किया।

     

    “उनका सामान वहां मिला था। लेकिन अगले दिन से वह गायब हो गए।”

     

    अचानक मंदिर के बाहर फिर वही आवाज सुनाई दी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    सोम्या का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    महिला ने कहा—

     

    “डरो मत।”

     

    आवाज मंदिर के पास आ रही थी।

     

    फिर दरवाजे के सामने वही बूढ़ा आदमी दिखाई दिया जिसे सोम्या ने सड़क पर देखा था।

     

    सोम्या डर गई।

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “सोम्या?”

     

    सोम्या पीछे हट गई।

     

    “आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने अपना चेहरा उठाया।

     

    सोम्या की आंखें फैल गईं।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी अंगूठी थी, जो उसकी मां ने उसे अपने नाना की निशानी के रूप में दिखाई थी।

     

    बूढ़ा बोला—

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”

     

    सोम्या की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नाना…?”

     

    बूढ़े ने सिर हिला दिया।

     

    वह उसका नाना ही था।

     

    वह कई साल पहले इस रास्ते पर हुई एक घटना के बाद गांव से दूर चला गया था। उसने अपनी पहचान छिपाकर जिंदगी बिताई थी, क्योंकि उस समय कुछ गलत लोगों से उसकी दुश्मनी हो गई थी और उसे डर था कि उसकी वजह से परिवार खतरे में पड़ सकता है।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं तुम्हें अपने पास बुला नहीं सकता था। लेकिन आज जब मैंने तुम्हें इस रास्ते पर अकेले देखा, तो मैं तुम्हें यहां से सुरक्षित ले जाना चाहता था।”

     

    सोम्या रोते हुए उनके पास गई।

     

    “आप इतने साल कहां थे?”

     

    “बहुत दूर।”

     

    “हमने आपको मरा हुआ समझ लिया था।”

     

    बूढ़े की आंखें भी नम हो गईं।

     

    “मुझे पता था।”

     

    तभी मंदिर में बैठी महिला भी उठ खड़ी हुई।

     

    वह दोनों को देखकर मुस्कुराई।

     

    “अब मेरा काम पूरा हुआ।”

     

    सोम्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    महिला ने कहा—

     

    “जिसने इतने साल तुम्हारे नाना का इंतजार किया।”

     

    वह सोम्या के नाना की बहन थी।

     

    अगली सुबह सोम्या अपने नाना के साथ गांव पहुंची।

     

    मां ने दरवाजा खोला।

     

    सामने अपने पिता को देखकर वह कुछ पल तक बोल ही नहीं पाईं।

     

    फिर वह दौड़कर उनसे लिपट गईं।

     

    घर में सालों से जमा इंतजार उस दिन आंसुओं में बह निकला।

     

    सोम्या चुपचाप यह सब देखती रही।

     

    उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी सुनसान रास्ते सिर्फ डर की तरफ नहीं ले जाते।

     

    कुछ रास्ते हमें उन लोगों तक भी पहुंचा देते हैं, जिन्हें हम जिंदगी भर खोया हुआ समझते रहे।

     

    उस दिन के बाद गांव वालों ने उस पुराने रास्ते को फिर से ठीक करवाया।

     

    लेकिन सोम्या जब भी वहां से गुजरती, कुछ पल रुकती जरूर थी।

     

    वह उस पुराने मंदिर की तरफ देखती और मुस्कुरा देती।

     

    क्योंकि उसके लिए वह सुनसान रास्ता अब डर की जगह नहीं था।

     

    वह रास्ता उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी खोई हुई खुशी तक पहुंचने का रास्ता बन चुका था।

  • दिखावे की दुनियां में शौर्य

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    दिखावे की दुनिया में शौर्य

     

    शौर्य एक छोटे से शहर में रहने वाला 21 साल का लड़का था। उसके पिता एक छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। परिवार की हालत ठीक थी, लेकिन इतनी भी नहीं कि शौर्य अपनी हर इच्छा आसानी से पूरी कर सके।

     

    लेकिन शौर्य को एक चीज बहुत पसंद थी—दिखावा।

     

    उसे हमेशा लगता था कि लोग उसे देखकर यही सोचें कि वह बहुत पैसे वाला है।

     

    महंगे ब्रांड जैसे कपड़े पहनना, दोस्तों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करना, महंगे कैफे में बैठकर तस्वीरें खींचना और सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी को किसी बड़े अमीर लड़के जैसा दिखाना—ये सब उसकी आदत बन चुकी थी।

     

    असलियत यह थी कि उसके पास जेब में कई बार सौ-दो सौ रुपये भी नहीं होते थे।

     

    एक दिन उसका दोस्त कबीर उसके घर आया।

     

    उसने शौर्य को आईने के सामने खड़े देखा।

     

    शौर्य एक महंगी दिखने वाली जैकेट पहन रहा था।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “नई जैकेट?”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हां, पंद्रह हजार की है।”

     

    कबीर ने जैकेट को गौर से देखा।

     

    “पंद्रह हजार?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं।”

     

    कबीर चुप हो गया।

     

    उसे पता था कि यह जैकेट शौर्य ने किस्तों पर खरीदी थी।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “घर में पापा की दुकान ठीक चल रही है?”

     

    शौर्य का चेहरा थोड़ा उतर गया।

     

    “बस ठीक ही है।”

     

    “तो फिर इतनी महंगी चीजें क्यों खरीदते हो?”

     

    शौर्य ने आईने में खुद को देखते हुए कहा—

     

    “लोगों को पता चलना चाहिए कि मैं कौन हूं।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन लोग वही देखते हैं जो तुम दिखाते हो।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “बस मुझे यही चाहिए।”

     

    एक दिन कॉलेज में उसके दोस्तों ने शहर के सबसे महंगे होटल में पार्टी रखने की योजना बनाई।

     

    सबने पैसे मिलाने की बात की।

     

    जब शौर्य की बारी आई तो उसने कहा—

     

    “पूरी पार्टी का खर्च मैं कर दूंगा।”

     

    दोस्तों ने तालियां बजाईं।

     

    “वाह शौर्य!”

     

    शौर्य का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

     

    लेकिन उसी रात वह घर पहुंचा तो उसके पास पैसे नहीं थे।

     

    उसने मां से कहा—

     

    “मां, मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    मां ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “दस हजार।”

     

    मां घबरा गई।

     

    “इतने पैसे किसलिए?”

     

    शौर्य ने झूठ बोला—

     

    “कॉलेज का जरूरी काम है।”

     

    मां ने अपनी बचत में से पैसे निकाल दिए।

     

    अगले दिन शौर्य ने पार्टी कर दी।

     

    दोस्तों ने उसकी खूब तारीफ की।

     

    “शौर्य, तू तो बड़ा आदमी निकला!”

     

    वह मुस्कुराता रहा।

     

    लेकिन उसे यह नहीं दिखा कि उन्हीं पैसों से उसकी मां घर का राशन खरीदने वाली थी।

     

    कुछ दिनों बाद घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया।

     

    पिता ने पूछा—

     

    “इस महीने पैसे कम पड़ रहे हैं। कुछ ज्यादा खर्च हुआ क्या?”

     

    मां चुप रही।

     

    शौर्य ने सब सुन लिया।

     

    उस रात उसे थोड़ी शर्म महसूस हुई, लेकिन अगले दिन फिर वही पुरानी आदत लौट आई।

     

    कुछ समय बाद कॉलेज में एक नई लड़की आई—आन्या।

     

    वह शांत स्वभाव की थी और पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    शौर्य को वह पसंद आ गई।

     

    उसने आन्या के सामने भी अपनी अमीरी का दिखावा शुरू कर दिया।

     

    “मेरे पास अपनी कार है।”

     

    असल में वह उसके चाचा की कार थी।

     

    “मैं हर महीने विदेश घूमने जाता हूं।”

     

    असल में वह बचपन में एक बार अपने परिवार के साथ पड़ोसी देश गया था।

     

    “हमारे पास शहर में बड़ा घर है।”

     

    असल में वह घर किराए का था।

     

    आन्या उसकी बातें सुनती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “तुम बहुत खुश रहते हो।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “मेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं है।”

     

    आन्या मुस्कुराई।

     

    “अच्छा है।”

     

    शौर्य को लगा कि वह प्रभावित हो गई है।

     

    उसने उसे महंगे रेस्तरां में ले जाना शुरू किया।

     

    हर बार बिल देखकर उसके हाथ कांपते, लेकिन वह चेहरे पर मुस्कान रखता।

     

    एक दिन आन्या ने पूछा—

     

    “तुम इतना खर्च क्यों करते हो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें अच्छी जिंदगी देना चाहता हूं।”

     

    आन्या ने कुछ नहीं कहा।

     

    कुछ दिनों बाद शौर्य के पिता की दुकान में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    घर में पैसे की जरूरत थी।

     

    पिता ने शौर्य से कहा—

     

    “बेटा, इस महीने घर में हाथ थोड़ा तंग है। अगर तुम्हारे पास पैसे हों तो मदद कर देना।”

     

    शौर्य के पास पैसे नहीं थे।

     

    लेकिन उसने पिता से कहा—

     

    “मैं देखता हूं।”

     

    उसी शाम उसके दोस्तों ने एक और पार्टी की योजना बनाई।

     

    सबने शौर्य की तरफ देखा।

     

    “इस बार भी तू ही करवा दे।”

     

    शौर्य के पास कोई रास्ता नहीं था।

     

    उसने अपने मोबाइल से एक महंगा फोन बेच दिया।

     

    पार्टी हुई।

     

    दोस्तों ने फिर कहा—

     

    “शौर्य जैसा दोस्त किस्मत वालों को मिलता है।”

     

    लेकिन उस रात घर लौटते समय उसे पहली बार अपने ही ऊपर गुस्सा आया।

     

    उसने सोचा—

     

    “मैं किसे खुश करने के लिए यह सब कर रहा हूं?”

     

    अगले दिन उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया।

     

    उसके पिता दुकान पर काम करते समय अचानक बेहोश हो गए।

     

    शौर्य उन्हें अस्पताल लेकर गया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “कुछ दिनों तक इन्हें आराम की जरूरत है।”

     

    अस्पताल का खर्च देखकर शौर्य के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने दोस्तों को फोन किया।

     

    “मुझे कुछ पैसे चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “भाई, अभी मेरे पास नहीं हैं।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “मैं अगले महीने दे दूंगा।”

     

    तीसरे ने फोन ही नहीं उठाया।

     

    शौर्य घंटों अस्पताल की कुर्सी पर बैठा रहा।

     

    तभी आन्या वहां आई।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    शौर्य ने पहली बार उससे कोई झूठ नहीं बोला।

     

    “मैं अमीर नहीं हूं।”

     

    आन्या शांत रही।

     

    “मुझे पता है।”

     

    शौर्य चौंका।

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “हां। तुम्हारी बातें बहुत बड़ी थीं, लेकिन तुम्हारी आंखों में हमेशा पैसे की चिंता दिखती थी।”

     

    शौर्य की आंखें भर आईं।

     

    “फिर तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पैसे नहीं, तुम्हारी सच्चाई देखनी थी।”

     

    शौर्य ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने पूरी जिंदगी लोगों को दिखाने में लगा दी कि मैं अमीर हूं। लेकिन जब सच में जरूरत पड़ी तो मेरे पास कुछ भी नहीं था।”

     

    आन्या ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास परिवार है। तुम्हारे पास मेहनत करने की क्षमता है। ये किसी भी दिखावे से बड़ी चीजें हैं।”

     

    उस दिन शौर्य ने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया।

     

    उसने सोशल मीडिया से अपनी झूठी अमीरी वाली तस्वीरें हटा दीं।

     

    महंगे कपड़े खरीदना बंद किया।

     

    पार्टी में पैसे उड़ाना बंद किया।

     

    और सबसे जरूरी—उसने अपने पिता से सच बोल दिया।

     

    “पापा, मैंने बहुत पैसे बर्बाद किए हैं। मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    पिता ने कुछ देर उसे देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “गलती करने वाला बेटा बुरा नहीं होता। लेकिन गलती समझ आने के बाद भी उसे दोहराना गलत होता है।”

     

    शौर्य ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

     

    उसने दुकान संभालनी शुरू की।

     

    सुबह कॉलेज और शाम दुकान।

     

    धीरे-धीरे उसने परिवार का कर्ज चुकाना शुरू किया।

     

    कई महीने बाद कबीर उससे मिला।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ? आजकल तू महंगे कपड़े नहीं पहनता?”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “अब मुझे अच्छा दिखने से ज्यादा अच्छा इंसान बनना जरूरी लगता है।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आखिर समझ गया।”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “पहले मैं लोगों को अपनी जिंदगी दिखाता था। अब मैं अपनी जिंदगी जीता हूं।”

     

    उधर आन्या अब भी उसके साथ थी।

     

    एक दिन उसने शौर्य से कहा—

     

    “तुम अब पहले से ज्यादा खुश लगते हो।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि अब मुझे किसी को साबित नहीं करना कि मैं अमीर हूं।”

     

    उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले।

     

    “देखो, आज मेरे पास सिर्फ पांच सौ रुपये हैं।”

     

    आन्या हंसने लगी।

     

    “तो?”

     

    शौर्य ने कहा—

     

    “लेकिन ये पैसे मेरे हैं। मैंने खुद कमाए हैं। अब इनसे मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना।”

     

    आन्या ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब तुम सच में बड़े आदमी लगते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    उसे आखिरकार समझ आ गया था—

     

    बड़ा दिखने और बड़ा होने में बहुत फर्क होता है।

     

    दिखावे से कुछ समय के लिए लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन असली सम्मान मेहनत, सच्चाई और अपने परिवार के लिए खड़े होने से मिलता है।

     

    और शौर्य ने तय कर लिया था कि अब उसकी जिंदगी तस्वीरों में अमीर नहीं, बल्कि असल में मजबूत होगी।

  • पेसो की भूखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    पैसों की भूखी लड़की

     

    शहर में कियारा नाम की एक लड़की रहती थी। देखने में वह बहुत शांत और समझदार लगती थी, लेकिन उसके दिल में एक ही चाहत थी—बहुत सारा पैसा।

     

    कियारा का मानना था कि दुनिया में इज्जत, प्यार और रिश्ते सब पैसों से खरीदे जा सकते हैं।

     

    वह अक्सर अपनी सहेलियों से कहती—

     

    “जिसके पास पैसा है, उसी की दुनिया में कीमत है।”

     

    उसका परिवार बहुत अमीर नहीं था। पिता छोटी-सी दुकान चलाते थे और मां घर संभालती थीं। उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से कियारा को अच्छी परवरिश दी थी, लेकिन कियारा को हमेशा लगता था कि उसे इससे कहीं ज्यादा मिलना चाहिए।

     

    कॉलेज खत्म करने के बाद उसने नौकरी करने की कोशिश की, लेकिन कुछ महीनों में ही उसे नौकरी छोटी लगने लगी।

     

    तभी उसने एक अलग रास्ता चुन लिया।

     

    वह अमीर लड़कों से दोस्ती करने लगी।

     

    पहली बार उसकी मुलाकात एडवर्ड से हुई। एडवर्ड एक बड़े कारोबारी का बेटा था। महंगी कार, अच्छे कपड़े और हर समय दोस्तों से घिरा रहता था।

     

    कियारा ने उससे दोस्ती की।

     

    कुछ ही दिनों में एडवर्ड को कियारा पसंद आने लगी।

     

    एक शाम कियारा ने उदास चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मेरी मां की तबीयत बहुत खराब है।”

     

    एडवर्ड तुरंत परेशान हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “डॉक्टर ने कुछ महंगी दवाइयां लिखी हैं। लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड ने बिना ज्यादा सवाल किए पैसे दे दिए।

     

    कियारा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कुछ दिनों बाद उसने फिर पैसे मांगे।

     

    फिर एक नया बहाना।

     

    फिर एक नई जरूरत।

     

    धीरे-धीरे एडवर्ड ने कियारा पर हजारों रुपये खर्च कर दिए।

     

    एक दिन जब एडवर्ड ने उससे शादी की बात की तो कियारा ने अचानक कहा—

     

    “मुझे लगता है हम दोनों एक-दूसरे के लिए सही नहीं हैं।”

     

    एडवर्ड हैरान रह गया।

     

    “लेकिन तुम तो कहती थी कि तुम मुझे पसंद करती हो।”

     

    कियारा ने ठंडी आवाज में कहा—

     

    “पसंद करना और शादी करना अलग बातें हैं।”

     

    और अगले ही दिन वह शहर छोड़कर चली गई।

     

    एडवर्ड को बाद में समझ आया कि कियारा को उससे प्यार नहीं था।

     

    उसे सिर्फ उसके पैसे से मतलब था।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    कियारा नए शहर में पहुंची।

     

    वहां उसकी मुलाकात लियाम से हुई।

     

    लियाम एक साधारण परिवार से था। वह नौकरी करता था और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने माता-पिता को भेजता था।

     

    कियारा ने जब यह जाना कि लियाम अमीर नहीं है तो पहले उसने उससे दूरी बनाई।

     

    लेकिन लियाम का स्वभाव अच्छा था।

     

    वह हमेशा दूसरों की मदद करता।

     

    धीरे-धीरे कियारा ने सोचा—

     

    “अगर इसे मेरे लिए थोड़ा खर्च करने की आदत पड़ जाए तो?”

     

    उसने लियाम से दोस्ती शुरू कर दी।

     

    लियाम जल्दी ही उसे पसंद करने लगा।

     

    वह अपनी छोटी-सी सैलरी में भी कियारा को खुश करने की कोशिश करता।

     

    कभी उसके लिए फूल लाता।

     

    कभी छोटा-सा उपहार।

     

    कियारा को यह सब पसंद तो नहीं था, लेकिन वह उसे उम्मीद देती रही।

     

    एक दिन उसने कहा—

     

    “मेरे पास एक जरूरी काम है, लेकिन मुझे पैसे चाहिए।”

     

    लियाम ने पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “जितने तुम दे सको।”

     

    लियाम ने अपनी कई महीनों की बचत में से कुछ पैसे उसे दे दिए।

     

    उसके पास ज्यादा नहीं था, फिर भी उसने अपनी जरूरतें रोक दीं।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा ने फिर पैसे मांगे।

     

    इस बार लियाम ने कहा—

     

    “कियारा, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं।”

     

    कियारा नाराज हो गई।

     

    “तो फिर तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?”

     

    लियाम चुप हो गया।

     

    उस दिन पहली बार उसे कियारा की बातों में प्यार नहीं, लालच दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया—

     

    “शायद वह किसी परेशानी में होगी।”

     

    कुछ समय बाद कियारा ने लियाम से और पैसे मांगे।

     

    लियाम ने मना कर दिया।

     

    “मेरे पिता की दवाइयां भी चल रही हैं। मैं अभी और पैसे नहीं दे सकता।”

     

    कियारा ने बिना सोचे कहा—

     

    “तुम इतने भी अच्छे नहीं हो जितना मैं समझती थी।”

     

    लियाम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हारे लिए अपनी क्षमता से ज्यादा किया है।”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “लेकिन मुझे उससे क्या?”

     

    लियाम का दिल टूट गया।

     

    उसे समझ आ गया कि वह जिस लड़की के लिए इतना कुछ कर रहा था, उसके लिए वह सिर्फ पैसे देने वाला इंसान था।

     

    कुछ दिनों बाद कियारा वहां से भी चली गई।

     

    लेकिन इस बार वह किसी अमीर लड़के की तलाश में नहीं थी।

     

    वह एक बड़े शहर में पहुंची, जहां उसकी मुलाकात नोलन नाम के एक बहुत अमीर युवक से हुई।

     

    नोलन को कियारा बहुत पसंद आई।

     

    उसने उसे महंगे उपहार दिए।

     

    कियारा को लगा कि अब उसकी जिंदगी बदल गई है।

     

    उसने नोलन के साथ महंगे होटल, पार्टियां और यात्राएं शुरू कर दीं।

     

    लेकिन नोलन बहुत समझदार था।

     

    उसने जल्दी ही समझ लिया कि कियारा की दिलचस्पी उसमें नहीं, उसके पैसे में है।

     

    एक दिन उसने जानबूझकर कहा—

     

    “मेरे सारे पैसे खत्म हो गए हैं।”

     

    कियारा चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    “मेरी कंपनी में बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। अब मेरे पास कुछ नहीं बचा।”

     

    कियारा का व्यवहार उसी दिन बदल गया।

     

    वह बोली—

     

    “तो अब हमें अलग हो जाना चाहिए।”

     

    नोलन ने पूछा—

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    कियारा ने कहा—

     

    “मैं ऐसी जिंदगी नहीं जी सकती।”

     

    नोलन मुस्कुराया।

     

    “तो तुम्हें मुझसे नहीं, मेरे पैसों से प्यार था।”

     

    कियारा ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नोलन ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें परखने के लिए झूठ बोला था। मेरे पैसे खत्म नहीं हुए।”

     

    कियारा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं।

     

    “नोलन, मेरी बात सुनो…”

     

    “नहीं।”

     

    नोलन ने उसे रोक दिया।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम लोगों को छोड़कर आगे बढ़ रही हो। लेकिन असल में तुम हर बार अपने अंदर कुछ खोती जा रही हो।”

     

    कियारा वहां से चली गई।

     

    पहली बार उसे किसी ने उसके लालच का आईना दिखाया था।

     

    कुछ दिनों तक वह अकेली रही।

     

    उसके पास पैसे थे, कपड़े थे, गहने थे, लेकिन कोई ऐसा इंसान नहीं था जिसे वह अपना कह सके।

     

    उसे एडवर्ड याद आया।

     

    लियाम याद आया।

     

    उनकी छोटी-छोटी बातें याद आईं।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने हर रिश्ते की कीमत पैसे से लगाई थी।

     

    एक दिन उसे खबर मिली कि लियाम की मां बीमार हैं।

     

    कियारा अचानक उसके शहर पहुंच गई।

     

    लियाम ने दरवाजा खोला तो उसे देखकर हैरान रह गया।

     

    “तुम यहां?”

     

    कियारा की आंखों में आंसू थे।

     

    “मैं माफी मांगने आई हूं।”

     

    लियाम कुछ नहीं बोला।

     

    “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। तुमने मेरे लिए अपनी जरूरतें तक रोक दीं और मैंने तुम्हारे प्यार की कीमत पैसे से लगा दी।”

     

    लियाम ने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

     

    कियारा ने पूछा—

     

    “क्या तुम मुझे फिर से अपनी जिंदगी में जगह दोगे?”

     

    लियाम ने सिर हिला दिया।

     

    “माफ करना और वापस स्वीकार करना दो अलग बातें हैं।”

     

    कियारा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसे उस दिन समझ आया कि पैसा खोने का डर जितना बड़ा नहीं होता, उससे कहीं बड़ा डर होता है किसी का भरोसा खो देना।

     

    कियारा ने पहली बार खुद के लिए नौकरी शुरू की।

     

    शुरुआत में उसे छोटी नौकरी मिली।

     

    उसने शिकायत नहीं की।

     

    वह मेहनत करने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसने अपने खर्च खुद उठाने शुरू किए।

     

    अब अगर कोई उसे महंगा उपहार देता तो वह पहले पूछती—

     

    “क्यों?”

     

    उसके लिए प्यार का मतलब बदल चुका था।

     

    कई साल बाद एक दिन वह उसी शहर के एक छोटे कैफे में बैठी थी।

     

    सामने एक गरीब बच्ची अपनी मां के साथ खाना खा रही थी।

     

    बच्ची की नजर कियारा के महंगे बैग पर थी।

     

    कियारा ने अपना बैग देखा और मुस्कुराई।

     

    उसने बैग नहीं दिया।

     

    बल्कि बच्ची के लिए खाना मंगवाया।

     

    बच्ची मुस्कुराई।

     

    कियारा के मन को पहली बार किसी चीज से सुकून मिला।

     

    उसे समझ आ गया था—

     

    पैसा जिंदगी को आराम दे सकता है, लेकिन किसी के दिल में अपनी जगह नहीं खरीद सकता।

     

    और जो इंसान हर रिश्ते को पैसों के तराजू पर तौलता है, एक दिन उसके पास बहुत कुछ होते हुए भी ऐसा कुछ नहीं बचता जिसे वह अपना कह सके।

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Part 5 

    No love clause 

     

    अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”

     

    विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,

    “आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”

     

    विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”

     

    “तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

    “मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”

     

    विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।

    “और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”

    कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”

     

    अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”

     

    “नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”

     

    अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”

     

    अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”

     

    विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”

     

    विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”

     

    विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”

     

    अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”

     

    विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”

     

    अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”

     

    विक्रम जी “नहीं।”

     

    अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”

     

    विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”

     

    अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”

     

    विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”

     

    अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”

     

    विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”

     

    फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”

    अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”

     

    अग्नि “मैं जानता हूँ।”

     

    “नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”

     

    विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।

    बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”

     

    अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

    वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”

     

    उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”

     

    फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,

    “लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”

     

    विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”

     

    अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”

     

    विक्रम जी, “हूँ?”

     

    अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।

    “तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”

     

    विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।

    उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।

     

    छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।

    विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।

    उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।

    अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।

    अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।

     

    अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।

    “अग्नि…”

     

    सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी। 

     

    उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”

     

    अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,

    “माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”

     

    अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”

     

    सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”

    उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”

     

    अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”

     

    सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया। 

     

    “अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।

     

    लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।

    उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।

     

    लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”

     

    सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”

     

    सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”

     

    सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”

     

    सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।

    लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था। 

     

    वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।

     

    ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”

     

    अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़

    एक ही बात घूम रही थी… शादी।

    कहानी आगे जारी रहेगी।

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  • अधूरी इबादत भाग~52

    अधूरी इबादत भाग~52

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~52 गुलाब जैसा केक

    रूहानी धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी, उसके बाल अभी तक भीगे थे, जैसे उसके भीतर की हलचल अब भी सिमटी हो आँखों के कोनों में। 

    अद्वैत टेबल के पास बैठा था, उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक अजीब सी बेचैनी जो किसी अनकहे इंतज़ार को ओढ़े हुए थी।

    “गुड मॉर्निंग…” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

    “गुड मॉर्निंग,” रूहानी ने जवाब दिया, अपनी नज़र उसके चेहरे पर टिकाए रखी। उसने अपना पर्स कुर्सी पर रखा और पूछा, “मीना दिखाई नहीं दे रही?”

    अद्वैत ने अपनी कुहनी टेबल पर टिकाई और गर्दन हल्की सी झुकाकर कहा, “थोड़ी देर पहले ही गई है… अपना काम खत्म करके।”

    रूहानी की आवाज़ में अचानक एक संकोच की परत उभर आई, “उसे ये तो पता था न कि मैं नीचे वाले कमरे में अकेली थी… और तुम….”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में ही थाम ली, उसकी आँखों में एक सच्ची सी तसल्ली थी, “घबराओ मत… मैं मीना के आने से पहले ही जाग गया था। और उसे कह दिया है कि नीचे वाला कमरा और first floor पर मेरा कमरा और स्टडी रूम छोड़कर बाकी सब साफ कर ले। काम आसान रहेगा उसका।”

    उसकी आवाज़ में कोई दावा नहीं था, कोई बचाव नहीं… बस एक खामोश समझ थी, जैसे वो उसकी उलझन को बिना कहे समझ गया हो।

    फिर बिना किसी और शब्द के, वो उठा और किचन की ओर गया। कुछ पल बाद वो एक प्लेट में गरम-गरम चॉकलेट लावा केक लेकर आया… उसकी खुशबू हवा में जैसे किसी भूली हुई याद की तरह घुल गई।

    उसने केक रूहानी के सामने रख दिया, उसकी आँखों में कुछ चमक जैसी थी, वह dining chair पर बैठते हुए बोला, “टेस्ट तो करो… बताओ कैसा बना है?”

    रूहानी कुछ पल उसे देखती रही, उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी चुप्पी ने उसे छुआ। जैसे हर परत उस लावा केक की तरह थी, बाहर से सलीकेदार, अंदर से पिघली हुई। 

    रूहानी की नज़रें उस गुलाब की पंखुड़ियों जैसे सजे हुए केक पर टिकी थीं। जैसे हर क्रीम की परत में कोई भूला हुआ एहसास दफ़न था। उसकी साँसें हल्की-हल्की तेज़ हो रही थीं, और आँखें नमी से भरने लगी थीं। उस शांत कमरे में अचानक बहुत कुछ बोलता हुआ सा लग रहा था।

    अद्वैत ने जब देखा कि रूहानी एकटक उस केक को देखे जा रही है, उसके होठ ज़रा भी नहीं हिले, बस पलकों की कोर हल्की सी चमक रही थी, वो समझ गया, ये स्वाद भर का मामला नहीं, ये यादों का कोई भारी झोंका है।

    वो उसके पास जाकर धीरे से उसकी आँखों के सामने उँगलियाँ चटकाया, “कहाँ खो गई हो?”

    रूहानी चौंक सी गई, जैसे किसी पुराने ख्वाब से अचानक बाहर आई हो। “कहीं नहीं… बस… ये केक गुलाब के फूल जैसा क्यों है?”

    अद्वैत कुछ याद करते हुए मुस्कुराया, “ये मेरी माँ का signature style है। जब भी कोई खुशी का पल होता था तो मां जरूर बनाती थी… खैर….. तुम taste तो करो।”

    उसने धीरे से केक काटा और एक छोटा सा टुकड़ा उसकी प्लेट में रख दिया। रूहानी ने उस टुकड़े को चम्मच से उठाया और जैसे ही मुँह में डाला… उसकी पलके अपने आप बंद हो गईं। 

    स्वाद जैसे उसके भीतर किसी भूले हुए आलिंगन की तरह समा गया हो। और फिर… एक गर्म आँसू पलकों से निकलकर गाल पर बह निकला।

    उसे याद आया… उसके पापा का घर, जहाँ बेटी को मीठा और चॉकलेट खाते वक्त भी टोकी जाती थीं। और यहाँ… एक अनजान घर में, बिना कोई रोक, बिना कोई सवाल, ये मीठा जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुपचाप गले लगा रहा था।

    अद्वैत ने तुरंत पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया, “क्या हुआ? अच्छा नहीं बना क्या? मीठा कम हो गया या… कुछ ज़्यादा ही कड़वा?”

    रूहानी ने थोड़ा पानी पीते हुए धीमे स्वर में कहा, “नहीं, बहुत अच्छा बना है… तुम्हारी माँ को भी यही पसंद था?”

    अद्वैत की आँखें हल्का सा धुंधला गईं, “मुझे उतना ठीक से याद नहीं… पर जब भी मैं कुछ अचीव करता था, माँ यही केक बनाती थीं… कहती थीं जीत का स्वाद ज़ुबान से पहले दिल में जाना चाहिए।”

    रूहानी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन आँखों में एक टीस सी उतर आई, “लेकिन आज तो कोई खुशी का दिन नहीं… आज तो तुम्हारी माँ की बरसी…..”

    उसकी आवाज़ टूट गई। वाक्य अधूरा रह गया।

    और उसी पल, उसकी जेब में रखा मोबाइल काँपने लगा।

    रूहानी ने कॉल उठाया और अपनी वो मासूम, चुलबुली आवाज़ जिसमें हर बार एक नया रंग भरता था, गुनगुनाने लगी, “हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… माय लवली ब्रदर यशवर्धन…” वो सुर में नहीं थी, फिर भी दिल से थी।

    फोन की दूसरी तरफ यश की आवाज़ आई, थोड़ी नखरे से भरी हुई, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं दीदी, आपने इस बार मुझे सबसे पहले विश नहीं किया।”

    रूहानी का चेहरा एकदम से उतर गया, जैसे सच में गलती कर दी हो। उसने एक हाथ से कान पकड़कर बोला, “सॉरी यशु… अपनी दीदी को माफ कर दो इस बार, अब से कभी ऐसा नहीं होगा। सच में भूल गई थी… पर अब नहीं भूलूंगी, वादा।”

    वो मुस्कुरा रही थी और मुस्कराहट उसके गालों से झलक रही थी। पर उसे एहसास नहीं था कि उसके सामने बैठा अद्वैत बड़ी देर से उसे ऐसे देख रहा था…. उसकी आंखों में राहत का एक साया था कि रूहानी के चेहरे पर छाई मुस्कुराहट की वजह आखिरकार वो था।

    यश ने कॉल पर ही कहा, “मैंने आपका इंस्टा पोस्ट देखा था… आपके कमबैक के लिए… congratulations didi.”

    रूहानी ने थोड़ी भावुकता में कहा, “Thank you so much Yash.”

    फिर यश की आवाज़ हल्की शरारत से भरी हुई आई, “जीजू हैं आपके बगल में?”

    रूहानी ने एक पल को अद्वैत की ओर देखा, उसने पलके झपकीं और धीमे से कहा, “हां… यहीं हैं।”

    “उन्हें दीजिए ना… उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा, आप ही को याद नहीं था तो…” यश ने छेड़ते हुए कहा।

    रूहानी हँसी और बोली, “ठीक है, देती हूं।”

    अद्वैत ने मोबाइल हाथ में लिया और आवाज़ में वही ठहराव रखा जो उसकी आदत बन चुका था, “Happy birthday champ. So, what’s the plan for today?”

    यश ने कहा, “thank you जीजू, अभी तो कोचिंग आया हूं। मम्मी-पापा ने कहा है पढ़ाई पर फोकस करो, 10वीं का बोर्ड है ना इस बार। लेकिन फिर भी छोटी सी पार्टी तो रखी है… और… मैं पूछना चाहता हूं दीदी से… लेकिन मम्मी-पापा के कारण पूछ नहीं पा रहा कि वो आएगी या नहीं।”

    अद्वैत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, मैं बात करता हूं उससे।”

    कॉल कटते ही सन्नाटा सा छा गया। 

    रूहानी अब टेबल के किनारे रखे केक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धीरे-धीरे खा रही थी। उसके चेहरे पर नज़ाकत थी… लेकिन कहीं गहराई में एक हिचक भी छिपी थी।

    अद्वैत कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर उसी नरम आवाज़ में बोला, “है तो आज खुशी का दिन… क्या तुम जाना चाहती हो यश से मिलने?”

    रूहानी के चम्मच की चाल एक पल को रुक गई… उसने अद्वैत को देखा और सोच में पड़ गई।

    ———-

    क्या रूहानी के चेहरे पर फैली वो मुस्कान सिर्फ यश की मासूमियत के लिए थी… या किसी बीती टीस को छिपाने की आख़िरी कोशिश?

    और अद्वैत की आँखों में जो ठहराव था, क्या वो वाक़ई सुकून था… या किसी इंतज़ार की थकी हुई चुप्पी?

    क्या ये सिर्फ एक सुबह थी… या किसी अधूरी कहानी की शुरुआत फिर से हो रही थी?