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  • भाग 3 — माँ की आत्मा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    घर का मुख्य दरवाजा बंद था।

    पापा ने पूरी ताकत से उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का बन गया था।

    आरव रोते हुए बोला, “पापा, अब क्या होगा?”

    पापा ने कहा, “डरो मत। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

    तभी घर की सारी घड़ियां एक साथ बंद हो गईं।

    बारह बज रहे थे।

    फिर अचानक एक-एक करके सभी घड़ियां उल्टी दिशा में चलने लगीं।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी।

    बहुत धीमी।

    बहुत उदास।

    पापा ने आरव को पीछे रहने को कहा और खुद सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

    “कौन है?”

    कोई जवाब नहीं आया।

    फिर ऊपर से आवाज आई—

    “अरुण…”

    पापा रुक गए।

    यह उनकी पत्नी मीरा की आवाज थी।

    “अरुण, मुझे बचा लो…”

    पापा की आंखों में आंसू आ गए।

    उन्होंने धीरे से कहा, “मीरा?”

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

    “पापा, मत जाइए।”

    लेकिन पापा जैसे उस आवाज के जादू में आ चुके थे।

    वह सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    आरव भी उनके पीछे चला।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि कमरे का दरवाजा खुला हुआ था।

    अंदर अंधेरा था।

    फिर अचानक कमरे के बीच एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

    उस रोशनी में एक औरत खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरा शांत।

    आंखों में आंसू।

    वह मीरा थी।

    आरव दौड़कर उसकी ओर जाना चाहता था, लेकिन पापा ने उसे रोक लिया।

    “रुको।”

    औरत ने कहा—

    “आरव… मैं सच में तुम्हारी माँ हूँ।”

    आरव ने उसे ध्यान से देखा।

    इस बार उसके पैर सीधे थे।

    चेहरा भी डरावना नहीं था।

    उसने कहा, “अगर आप मेरी माँ हैं तो मुझे वह बात बताइए जो सिर्फ माँ जानती थी।”

    औरत मुस्कुराई।

    “तुम्हें बचपन में नींद नहीं आती थी। मैं तुम्हें नीले रंग की छोटी कार देती थी। तुम उसे तकिए के नीचे रखकर सोते थे।”

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

    यह बात किसी और को नहीं पता थी।

    वह आगे बढ़ा।

    “माँ…”

    औरत ने हाथ फैलाए।

    लेकिन पापा ने फिर उसे रोक दिया।

    “मीरा, अगर तुम सच में हो तो बताओ, सावित्री को कैसे रोका जा सकता है?”

    औरत का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

    “उसकी आत्मा को खत्म नहीं किया जा सकता।”

    “फिर?”

    “उसे मुक्त करना होगा।”

    पापा ने पूछा, “कैसे?”

    मीरा ने कमरे के एक कोने की तरफ इशारा किया।

    वहाँ वही पुराना लोहे का संदूक रखा था।

    “उसमें रवि की आखिरी चीज है।”

    पापा ने संदूक खोला।

    अंदर एक छोटी लाल गेंद, एक पुरानी तस्वीर और चांदी का लॉकेट था।

    मीरा ने कहा—

    “सावित्री अपने बेटे की मौत को स्वीकार नहीं कर पाई। उसका दुःख ही उसकी शक्ति बन गया। उसे लगता है कि हर बच्चा उसका रवि है। अगर रवि की आखिरी याद उसे वापस दे दी जाए, तो शायद वह मुक्त हो सके।”

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन वह मेरी माँ जैसी क्यों दिखती है?”

    मीरा ने कहा—

    “क्योंकि वह जानती है कि बच्चे अपनी माँ की आवाज पर भरोसा करते हैं। उसने तुम्हें अपने बेटे की जगह पाने के लिए मेरी शक्ल अपनाई।”

    अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।

    मीरा का चेहरा धुंधला पड़ने लगा।

    “माँ!”

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

    मीरा ने कहा—

    “मुझे अभी जाना होगा। सावित्री आ रही है।”

    तभी कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दी।

    सावित्री।

    उसकी आवाज गूंज उठी—

    “तुमने मेरा बेटा मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा मर चुका है, सावित्री। आरव तुम्हारा बेटा नहीं है।”

    सावित्री चीखी।

    कमरे की खिड़कियां टूटने लगीं।

    कांच के टुकड़े हवा में उड़ने लगे।

    पापा ने आरव को अपने पीछे कर लिया।

    सावित्री धीरे-धीरे कमरे में उतर आई।

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

    उसकी आंखें लाल थीं।

    “मेरा रवि…”

    उसने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं रवि नहीं हूँ!”

    सावित्री की आवाज बदल गई।

    “तुम्हें बनना पड़ेगा।”

    उसने हाथ घुमाया और आरव अचानक जमीन से ऊपर उठ गया।

    “पापा!”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    लेकिन वह भी धीरे-धीरे हवा में उठने लगे।

    तभी मीरा की आत्मा ने सावित्री के सामने आकर कहा—

    “उसे छोड़ दो!”

    सावित्री चीखी—

    “तुमने मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया!”

    मीरा ने कहा—

    “तुम्हारा बेटा तुम्हें किसी ने नहीं छीना था। वह हादसे में मरा था। लेकिन तुमने उसकी मौत को स्वीकार नहीं किया। तुमने अपने दुःख में निर्दोष बच्चों को कैद करना शुरू कर दिया।”

    सावित्री कुछ क्षण के लिए शांत हो गई।

    उसकी आंखों में पहली बार गुस्से की जगह दर्द दिखाई दिया।

    मीरा ने लाल गेंद उसकी तरफ बढ़ाई।

    “यह रवि की है।”

    सावित्री ने गेंद को देखा।

    उसका चेहरा बदलने लगा।

    उसे जैसे कुछ याद आ गया।

    “रवि…”

    उसकी आवाज अब डरावनी नहीं थी।

    बल्कि एक माँ की तरह थी।

    “माँ, मैं गिर गया…”

    सावित्री के चेहरे पर आंसू आ गए।

    वह जमीन पर बैठ गई।

    “रवि…”

    कमरे में अचानक बच्चे की हंसी गूंजने लगी।

    सावित्री ने ऊपर देखा।

    उसे सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह लाल गेंद लेकर खड़ा था।

    “माँ, मैं घर जाना चाहता हूँ।”

    सावित्री उसके पीछे चल पड़ी।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की ओर देखा।

    “मुझे माफ करना…”

    और फिर वह गायब हो गई।

    कमरे में शांति छा गई।

    मीरा भी धीरे-धीरे गायब होने लगी।

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “माँ, आप जा रही हो?”

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

    “बेटा, माँ कभी पूरी तरह नहीं जाती।”

    “फिर आप वापस क्यों नहीं आ सकतीं?”

    मीरा मुस्कुराई।

    “क्योंकि कुछ रिश्ते शरीर से नहीं, प्यार से जुड़े होते हैं।”

    आरव रोने लगा।

    “मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

    “मुझे भूलना मत। लेकिन मेरे लिए अपना जीवन मत रोकना।”

    मीरा की छवि धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

    आखिरी बार उसकी आवाज आई—

    “सच से कभी मत भागना, आरव।”

    और वह गायब हो गई।

    घर की सारी खिड़कियां खुल गईं।

    मुख्य दरवाजा भी खुल गया।

    सुबह की हल्की रोशनी घर में आने लगी।

    आरव और उसके पिता नीचे आ गए।

    लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

    क्योंकि जब पापा ने पुराने संदूक को दोबारा देखा, तो उसमें एक और कागज मिला।

    उस पर लिखा था—

    “सावित्री अकेली नहीं थी।”

    पापा का चेहरा फिर सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “पापा… इसका मतलब क्या है?”

    पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

    और तभी ऊपर वाले कमरे से किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी।

     

  • भाग 2 — पुरानी डायरी का राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सुबह हो चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अभी भी जिंदा था।

    पापा ने नाश्ता तक नहीं किया। वह लगातार घर के अंदर इधर-उधर घूम रहे थे। बार-बार ऊपर वाली मंजिल की तरफ देखते और फिर नजरें झुका लेते।

    आरव ने पहली बार अपने पिता के चेहरे पर इतना डर देखा था।

    उसने फिर पूछा, “पापा, मेरी माँ की मौत उस औरत की वजह से हुई थी?”

    पापा कुछ देर चुप रहे।

    फिर उन्होंने कहा, “आरव, कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जितना छिपाओ, उतना ही अच्छा लगता है।”

    “लेकिन मुझे सच जानना है।”

    पापा ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम अभी बच्चे हो।”

    “मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने कल रात उसे देखा है।”

    यह सुनते ही पापा के हाथ से गिलास गिर गया।

    गिलास फर्श पर टूट गया।

    पापा ने कांपती आवाज में पूछा, “तुमने उसे देखा?”

    आरव ने सिर हिला दिया।

    “उसका चेहरा कैसा था?”

    “माँ जैसा।”

    पापा ने आँखें बंद कर लीं।

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “आज शाम मैं तुम्हें सब बताऊंगा।”

    लेकिन शाम तक इंतजार करना आरव के लिए मुश्किल था।

    दोपहर में पापा किसी काम से बाहर गए।

    आरव अकेला था।

    तभी उसकी नजर पापा की अलमारी पर पड़ी।

    उसे याद आया कि पापा ने पिछली रात एक पुरानी तस्वीर दिखाई थी।

    उसने अलमारी खोली।

    कपड़ों के पीछे एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।

    डिब्बे पर धूल जमी थी।

    आरव ने उसे बाहर निकाला।

    अंदर कुछ तस्वीरें, पुराने कागज और एक डायरी थी।

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

    “मीरा की डायरी।”

    मीरा आरव की माँ का नाम था।

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    पहले कुछ पन्नों में सामान्य बातें थीं।

    फिर एक जगह लिखा था—

    “आज घर में फिर किसी के चलने की आवाज आई। मैंने अरुण से कहा कि घर में कोई है, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी।”

    आरव आगे पढ़ता गया।

    एक और पन्ने पर लिखा था—

    “मुझे लगता है कि यह घर खाली नहीं है। रात को कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहता है। जब मैं दरवाजा खोलती हूँ तो कोई नहीं होता।”

    अगले पन्ने पर शब्दों के बीच कई जगह स्याही फैली हुई थी।

    “कल रात उसने पहली बार मेरा नाम लिया। उसने कहा—‘मीरा, तुम मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकती।’”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    उसने अगला पन्ना पलटा।

    “आज मैंने अरुण से सच पूछा। उसने बताया कि इस घर में रहने वाली पिछली महिला का नाम सावित्री था। उसका एक बेटा था, जो बहुत कम उम्र में मर गया था। उसके बाद सावित्री पागल हो गई। वह हर बच्चे को अपना बेटा समझने लगी।”

    आरव ने पढ़ना जारी रखा।

    “लोग कहते हैं कि सावित्री ने इसी घर के ऊपर वाले कमरे में आत्महत्या की थी।”

    आरव की उंगलियां ठंडी हो गईं।

    अब उसे समझ आ रहा था कि ऊपर वाला कमरा क्यों बंद रहता था।

    लेकिन डायरी में आगे जो लिखा था, उसने उसे और डरा दिया।

    “सावित्री की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा घर में दिखाई देती रही। कई लोगों ने कहा कि वह बच्चों को बुलाती है। लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि वह अपना चेहरा उस व्यक्ति की माँ जैसा बना सकती है, जिसे वह अपने साथ ले जाना चाहती है।”

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

    उसकी सांस तेज हो गई।

    उसी समय घर के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

    ठक… ठक…

    आरव चौंक गया।

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    कोई नहीं था।

    फिर दरवाजे पर दस्तक हुई।

    ठक… ठक… ठक…

    आरव पीछे हट गया।

    तभी दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

    “बेटा…”

    आरव की आँखें फैल गईं।

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

    “दरवाजा खोलो…”

    आरव ने दरवाजा नहीं खोला।

    आवाज फिर आई—

    “आरव, मैं हूँ… तुम्हारी माँ।”

    उसकी आँखों में आंसू आ गए।

    वह अपनी माँ की आवाज पहचानता था।

    लेकिन डायरी की बात उसे याद थी।

    वह धीरे से पीछे हट गया।

    “तुम मेरी माँ नहीं हो।”

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

    फिर बाहर से धीमी हंसी सुनाई दी।

    “तुम्हें सच पता चल गया है…”

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

    “लेकिन तुम्हारे पापा ने अभी पूरा सच नहीं बताया।”

    दरवाजे के नीचे से एक काला साया दिखाई दिया।

    वह साया इंसान के पैरों जैसा नहीं था।

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से लंबा होता गया।

    आरव दौड़कर दूसरे कमरे में छिप गया।

    कुछ मिनट बाद पापा घर लौटे।

    उन्होंने आरव को डर के मारे कोने में बैठा देखा।

    आरव ने सारी बात बताई।

    पापा ने डायरी अपने हाथ में ली।

    “तुमने इसे पढ़ लिया?”

    “हाँ।”

    पापा ने गहरी सांस ली।

    “अब तुम्हें सब बताना ही पड़ेगा।”

    उन्होंने कहा—

    “सावित्री सच में इस घर में रहती थी। लेकिन वह सिर्फ पागल नहीं थी। उसका बेटा रवि एक हादसे में मरा था। सावित्री को लगता था कि उसकी मौत के लिए घर के मालिक जिम्मेदार हैं। वह बदला लेना चाहती थी।”

    “लेकिन माँ की मौत?”

    “तुम्हारी माँ ने इस घर का सच जान लिया था।”

    पापा की आवाज कांपने लगी।

    “तुम्हारी माँ को पता चला था कि सावित्री की आत्मा किसी बच्चे के शरीर पर कब्जा करने की कोशिश करती है। तुम्हारे जन्म के बाद वह तुम्हें अपना रवि समझने लगी।”

    आरव चुप रहा।

    पापा ने आगे कहा—

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाने के लिए उससे मुकाबला किया।”

    “फिर?”

    “एक रात तुम्हारी माँ ऊपर वाले कमरे में गई। सुबह वह बेहोश मिली। अस्पताल में उसकी मौत हो गई।”

    आरव की आँखों से आंसू निकलने लगे।

    “तो आपने उस कमरे को बंद क्यों कर दिया?”

    पापा ने कहा—

    “क्योंकि मुझे लगा था कि ताला लगाने से सब खत्म हो जाएगा।”

    तभी ऊपर से तेज आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों ने ऊपर देखा।

    ऊपर वाला दरवाजा अपने आप खुल चुका था।

    फिर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव के पापा का चेहरा बदल गया।

    “यह आवाज…”

    उन्होंने कांपते हुए कहा—

    “यह सावित्री के बेटे रवि की आवाज है।”

    आरव ने पूछा, “लेकिन वह तो मर चुका था।”

    पापा ने धीरे से कहा—

    “हाँ। और यही सबसे बड़ा डर है।”

    तभी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    ठक…

    ठक…

    ठक…

    एक औरत धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी।

    सफेद साड़ी।

    लंबे बाल।

    और हाथ में एक पुरानी लाल गुड़िया।

    वह आरव को देखकर मुस्कुराई।

    “रवि…”

    आरव पीछे हट गया।

    “मेरा नाम आरव है!”

    औरत ने गर्दन टेढ़ी की।

    “तुम्हारी माँ ने भी यही कहा था…”

    उसने लाल गुड़िया फर्श पर फेंकी।

    गुड़िया का सिर अपने आप घूम गया।

    और उसके मुंह से आवाज निकली—

    “आरव… ऊपर आओ।”

    पापा ने आरव का हाथ पकड़ा और उसे बाहर की ओर खींचा।

    लेकिन जैसे ही दोनों दरवाजे तक पहुंचे, मुख्य दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    घर के अंदर अंधेरा छा गया।

    और पीछे से सावित्री की आवाज आई—

    “आज कोई इस घर से बाहर नहीं जाएगा।”

     

  • भूतिया मम्मी का सच (भाग 1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा घर सफेद रोशनी से भर जाता। उसके बाद फिर वही घना अंधेरा और बारिश की आवाज।

    बारह साल का आरव अपनी किताब लेकर बिस्तर पर बैठा था। अगले दिन उसका स्कूल में टेस्ट था, लेकिन उसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

    उसका नया घर बहुत बड़ा था। शहर से दूर एक पुराने मोहल्ले में बना यह मकान उसके पिता ने कुछ ही महीने पहले खरीदा था। घर की सबसे अजीब बात थी—ऊपरी मंजिल का एक कमरा।

    उस कमरे पर हमेशा ताला लगा रहता था।

    आरव ने कई बार पापा से पूछा था, “पापा, ऊपर वाला कमरा बंद क्यों रहता है?”

    पापा हर बार एक ही जवाब देते, “वह पुराना स्टोर रूम है। उसमें बहुत बेकार सामान पड़ा है। तुम वहाँ मत जाना।”

    लेकिन आरव को लगता था कि पापा उससे कुछ छिपा रहे हैं।

    उसकी माँ की मृत्यु तीन साल पहले हो चुकी थी। आरव को अपनी माँ की बहुत कम यादें थीं। उसे बस इतना याद था कि माँ उसे रात में कहानी सुनाकर सुलाती थीं और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहती थीं—

    “आरव, चाहे दुनिया में कुछ भी हो जाए, मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँगी।”

    माँ की मृत्यु के बाद पापा ने दूसरी शादी नहीं की थी। आरव अक्सर सोचता था कि शायद पापा भी माँ को बहुत याद करते हैं।

    उस रात अचानक ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

    आरव ने किताब बंद कर दी।

    आवाज फिर आई।

    ठक… ठक… ठक…

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई धीरे-धीरे ऊपर वाले बंद कमरे के बाहर चल रहा हो।

    आरव का दिल तेज धड़कने लगा।

    उसने सोचा, शायद बिल्ली होगी।

    तभी ऊपर से एक और आवाज आई।

    “आरव…”

    वह जम गया।

    आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन वह पहचान गया था।

    वह उसकी माँ की आवाज थी।

    “आरव…”

    उसके हाथ से किताब नीचे गिर गई।

    कुछ देर तक वह हिल भी नहीं पाया।

    फिर उसने खुद को समझाया, “नहीं… यह मेरा भ्रम है। माँ तो…”

    उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

    फिर आवाज आई—

    “आरव… दरवाजा खोल दो…”

    अब आरव बिस्तर से उतर चुका था।

    वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकला। गलियारे में अंधेरा था। बिजली कुछ देर पहले ही चली गई थी। उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

    हर सीढ़ी पर उसके पैर कांप रहे थे।

    ऊपर पहुंचकर उसने देखा कि बंद कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था।

    आरव की सांस रुक गई।

    जिस कमरे पर हमेशा भारी ताला लगा रहता था, वह आज खुला था।

    दरवाजे के अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

    “आरव…”

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास सुनाई दी।

    वह डरकर पीछे मुड़ा।

    वहाँ कोई नहीं था।

    तभी कमरे के अंदर एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी अपने आप हिलने लगी।

    चर्र… चर्र…

    आरव ने मोबाइल की रोशनी कमरे में डाली।

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। एक कोने में लोहे का संदूक रखा था। सामने एक बड़ी अलमारी थी।

    और दीवार पर एक तस्वीर लगी थी।

    आरव की आँखें फैल गईं।

    वह उसकी माँ की तस्वीर थी।

    लेकिन तस्वीर में माँ मुस्कुरा नहीं रही थीं।

    उनका चेहरा उदास था और उनकी आँखें सीधी आरव को देख रही थीं।

    आरव तस्वीर के पास गया।

    तस्वीर के नीचे धूल से ढका एक छोटा-सा कागज रखा था।

    उसने उसे उठाया।

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

    “जिसे तुम अपनी माँ समझ रहे हो, उससे दूर रहना।”

    आरव के हाथ कांपने लगे।

    तभी पीछे से दरवाजा जोर से बंद हो गया।

    धड़ाम!

    आरव चीख पड़ा।

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन कुंडी बाहर से बंद थी।

    अचानक कमरे में किसी के रोने की आवाज आने लगी।

    “आरव… मुझे यहाँ से निकालो…”

    आरव ने पीछे देखा।

    कमरे के अंधेरे कोने में एक औरत खड़ी थी।

    उसके लंबे काले बाल चेहरे पर फैले हुए थे। सफेद साड़ी जमीन को छू रही थी। उसके पैर दिखाई नहीं दे रहे थे।

    आरव का शरीर सुन्न पड़ गया।

    औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

    वह चेहरा उसकी माँ का था।

    “माँ…”

    आरव के मुंह से अनायास निकला।

    औरत मुस्कुराई।

    लेकिन वह मुस्कान इंसानी नहीं थी।

    उसने अपना हाथ आरव की ओर बढ़ाया।

    “बेटा… इतने साल बाद आए हो…”

    आरव पीछे हटने लगा।

    तभी उसकी नजर औरत के पैरों पर पड़ी।

    उसके पैर उल्टे थे।

    आरव जोर से चीखा।

    और उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

    तेज हवा अंदर आई और मेज पर रखे कागज हवा में उड़ने लगे।

    उनमें से एक कागज आरव के पैरों के पास गिरा।

    उस पर लिखा था—

    “अगर वह तुम्हारी माँ जैसी दिखती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह तुम्हारी माँ है।”

    अचानक कमरे की सारी लाइटें जल उठीं।

    औरत गायब थी।

    दरवाजा खुला हुआ था।

    आरव दौड़ता हुआ नीचे आया।

    पापा अभी घर नहीं लौटे थे।

    वह पूरी रात अपने कमरे में दुबका रहा।

    सुबह पापा आए तो आरव ने पूरी घटना उन्हें बताई।

    पापा का चेहरा सुनते ही सफेद पड़ गया।

    उन्होंने तुरंत ऊपर जाकर कमरे का दरवाजा देखा।

    लेकिन अब वहाँ फिर से ताला लगा हुआ था।

    पापा कुछ देर तक चुप रहे।

    फिर उन्होंने आरव से कहा—

    “आज से तुम कभी ऊपर नहीं जाओगे।”

    आरव ने पूछा, “पापा, वह कौन थी?”

    पापा ने उसकी तरफ देखा।

    उनकी आँखों में डर था।

    “मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें यह सच कभी पता चले।”

    आरव ने पूछा, “कौन-सा सच?”

    पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।

    उन्होंने बस जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

    तस्वीर में आरव की माँ थी।

    और उसके पीछे एक दूसरी औरत खड़ी थी।

    वह बिल्कुल उसी भूत जैसी दिख रही थी।

    तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

    15 अगस्त 1998।

    आरव ने तारीख देखते ही पूछा—

    “पापा… यह औरत कौन है?”

    पापा ने धीमी आवाज में कहा—

    “यही वह राज है जिसकी वजह से तुम्हारी माँ मरी थी।”

    और तभी ऊपर से फिर वही आवाज आई—

    “आरव…”

    दोनों ने एक साथ ऊपर देखा।

    घर की छत से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज आ रही थी।

    ठक… ठक… ठक…

     

  • अधूरी इबादत भाग~53

    अधूरी इबादत भाग~53

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~53 क्या अब सब ठीक होगा? 

     

    रूहानी के हाथ में थमा चम्मच अब भी उस प्लेट में अटका हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बिल्कुल भी वहां नहीं था। अद्वैत के पूछे सवाल और उसके जवाब ने जैसे दिल के भीतर किसी पुराने दरवाज़े की चिटकनी फिर से खोल दी हो।

    “हाँ… नहीं… मेरा मतलब… अपने छोटे भाई से मिलने का तो मन बहुत है,” उसने नज़रें बचाकर कहा, “लेकिन मेरी वजह से अगर वहाँ कोई सीन create हो गया तो यश का birthday spoil हो जाएगा।”

    उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। उसमें डर नहीं था, बस एक गहरी जिम्मेदारी थी….. जैसे वो अब सिर्फ अपनी नहीं, अपने अतीत की भी रखवाली कर रही हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देख कर सिर्फ ‘ठीक है’ कहा, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, “तुम ब्रेकफास्ट कर लो, मैं तुम्हें स्टूडियो छोड़ देता हूँ।”

    रूहानी ने तुरंत मना किया, “नहीं अद्वैत, मैं cab…..”

    लेकिन अद्वैत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “तुम जब तक car चलाना सीख नहीं लेती, तब तक अगर मैं घर पर रहूँ, तो तुम्हें studio पहुँचाता रहूँगा। और तुम अपनी schedule देख लेना… ताकि मैं तुम्हें जल्दी से car drive करना सिखा दूँ।”

    इतना कहकर वो पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की ओर चला गया।

    रूहानी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गई। इस सोच में की अभी तक किसी ने उसकी इस ज़िन्दगी में self-independent होने के लिए नहीं कहा, जो किया उसने अपनी ज़िद पर। 

    “कितनी अजीब बात है…” उसने बुदबुदाते हुए खुद से कहा, “…जो इंसान कभी मेरे लिए एक राह जैसा लगा करता था, आज वही एक अस्थायी पड़ाव बन गया है। एक साल बाद… हम फिर से अजनबी हो जाएंगे और मैं नहीं चाहती कि इस एक साल की मुलाक़ात में कोई ऐसा एहसास बन जाए जो फिर से मुझे खुद को खो देना पड़े।”

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम होते ही रूहानी ने जैसे ही स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया, बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ नज़र गई और उसके क़दम ठिठक गए। 

    अद्वैत ड्राइवर सीट के बजाय कार के दरवाज़े से टिक कर खड़ा था, गहरे नीले कोट और हल्की चमकती शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन चेहरे पर वही पुराना सधा हुआ सुकून। 

    कार की पिछली सीट पर खूबसूरत बुके और कई रंग-बिरंगे गिफ्ट्स रखे थे, जैसे किसी फिल्म का सेट रियलिटी में उतर आया हो।

    रूहानी के माथे पर हल्की सी सलवट पड़ी और उसने पूछा, “ये सब क्या है अद्वैत?”

    अद्वैत ने अपने दोनों हाथों को साइन के पास बांधते हुए गाड़ी के दरवाज़े पर पीठ टिकाई और नाटकीय अंदाज़ में बोला, “मुझे मेरी प्यारी बीवी के और भी प्यारे भाई ने स्पेशली अपने बर्थडे पार्टी में invite किया है, तो मैंने सोचा क्यों न आपसे भी पूछ लूं… क्या आप मेरे साथ चलेंगी, मैडम?”

    रूहानी की आँखें बड़ी हो गईं, फिर आँखों में हल्की मुस्कान थी, लेकिन भीतर कहीं कुछ काँप रहा था। अद्वैत के शब्दों ने उसे कुछ ऐसा महसूस कराया जो उसने बहुत वक़्त से नहीं किया था, जैसे कोई सच में उसकी परवाह करता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के।

    वो बोली, “अगर मैं न आना चाहूं तो…?”

    अद्वैत ने पहले एक पल रुककर उसकी आँखों में झाँका, फिर बिना जल्दबाज़ी के कुछ कदम उसकी ओर बढ़ाया अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ बांधे हुए। 

    “आपकी इच्छा मेरे लिए हुक्म के बराबर है, मिसेज रूहानी चौहान,” अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये बंदा आपको अभी घर छोड़ सकता है… लेकिन वो क्या है ना, वहाँ कोई आपकी राह तक रहा होगा….. दस साल छोटा, प्यारा, इकलौता भाई। जिसने आज पहली बार अपनी दीदी को invite किया है, और वो भी इस अद्वैत के ज़रिए…”

    रूहानी की आँखों में कुछ चमकने लगा था। अद्वैत का ये अंदाज़…. थोड़ा चुलबुला, थोड़ा नरम, और पूरी तरह दिल से….. उसके लिए एकदम नया था। 

    वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, “ठीक है, ठीक है… इतनी ड्रामा की ज़रूरत नहीं है, मैं भी चल रही हूँ।”

    लेकिन जैसे ही उसने अपने पहनावे पर नज़र डाली…. टी-शर्ट और जींस….. उसकी मुस्कान हल्की सी सिकुड़ गई। “माँ-पापा अगर मुझे इन कपड़ों में देखेंगे तो मार ही डालेंगे।”

    अद्वैत ने फौरन जवाब दिया, “क्यों घबरा रही हो, रूहानी? वहाँ तुम मिसेज रूहानी चौहान बनकर जा रही हो और मिस्टर अद्वैत अवस्थी की पत्नी को जो अच्छा लगे वो पहने, उसे किसी के भी छोटी सोच के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”

    रूहानी की साँस जैसे थोड़ी रुक गई। उसकी नज़र अद्वैत के चेहरे पर टिक गई…. उस आवाज़ पर जिसमें न कोई बनावट थी, न कोई झूठ। “लेकिन…” उसने धीमे से कहा, “मेरे कपड़े पार्टी लुक के नहीं हैं।”

    अद्वैत ने उसकी बात बीच में काटते हुए कार का दरवाज़ा खोला, “तो चलो, अभी भी देर नहीं हुई है, खरीद लेते हैं।”

    रूहानी ने हल्का सा विरोध किया, “फिजूलखर्ची क्यों करनी? घर चलो, मैं अपने कपड़ों में से कुछ पहन लूंगी।”

    लेकिन अद्वैत ने उसकी बात सुनकर सिर हल्के से हिलाया और एक सादगी भरी गंभीरता से बोला, “तुम्हारे भाई का बर्थडे है, रूहानी… प्लीज़, चलो शॉप पर। सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, उसके लिए भी जो शायद आज तुम्हें देखकर बेइंतहा ख़ुशी महसूस करेगा।”

    वो एक पल के लिए चुप रही, फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कार में बैठ गई। उसकी आँखों में पहली बार कोई बहस नहीं थी…. सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में अद्वैत की बातों की गूंज।

    कभी-कभी कोई अजनबी एक दिन में वो भरोसा दे जाता है, जो अपनों ने सालों में नहीं दिया होता…..

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    शाम की परछाइयाँ धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं। आसमान पर फीकी नारंगी रेखाएँ नीले रंग में घुलने लगी थीं और बाज़ार की दुकानों में बत्तियाँ एक-एक कर जल उठी थीं। हल्की हवा में गुलमोहर के पत्ते सरसराते हुए जैसे किसी भूले-बिसरे गीत की धुन छेड़ रहे थे।

    रेडीमेड शॉप के बाहर खड़ी अद्वैत की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे अद्वैत के बगल वाली सीट पर रूहानी बैठी थी, जिसने एक नरम lavender shade का अनारकली सूट खरीद कर पहना था, जिसके look में उसे कोई पुराना अहसास मिल गया था।

    “तुम्हें यही पसंद आया?” अद्वैत ने पूछा, तो रूहानी ने ड्रेस पर नज़र गड़ाते हुए सिर हिलाया। 

    “हाँ… यही ठीक लगेगा आज के लिए,” उसकी आवाज़ में भावनाओं की तहें थीं…. कुछ गहरी, कुछ छुपी हुई। 

    अद्वैत ने बिना कुछ कहे गाड़ी स्टार्ट की। एक पल को दोनों खामोश रहे, जैसे किसी और की याद के लिए एक छोटा-सा मौन रख रहे हों।

    जैसे ही गाड़ी ने बाज़ार की रौशनी को पीछे छोड़ा और सड़क अब रूहानी के पापा के घर की ओर मुड़ चुकी थी, हवा थोड़ी ठंडी और एहसास थोड़ा भारी हो गया।

    रूहानी के मम्मी-पापा के घर की चौखट पर जब गाड़ी का इंजन बंद हुआ। सन्नाटा उतर आया, पर दिल की धड़कनें तेज़ थीं।

    अद्वैत ने धीरे से कहा, “चलो…?”

    रूहानी ने सिर झुकाकर कपड़े की तहें ठीक कीं, दुपट्टे पर उँगलियाँ फिराईं। 

    यश की कही बात उसका मन दोहराया जा रहा था,“तुम ethnic पहनती हो तो लगती नहीं जैसे इस दौर की हो…”

    उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा में रात की सीलन और किसी भूले अल्फाज़ की गंध थी।

    दरवाज़े तक पहुँचते हुए रूहानी का हाथ काँपा, उसके wristwatch की सूई अब भी 6:57 पर रुकी थी…. वही वक़्त जब सब थम गया था।

    अद्वैत ने दरवाज़े की घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था… “क्या तुम तैयार हो?”

    रूहानी की धड़कनों की गति बढ़ चुकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।

    और फिर… अद्वैत ने घंटी दबाई।

    —————————

    “क्या वक़्त सच में थम गया है… या आज की रात वो सूई फिर से चलने वाली है?”

    “रूहानी तैयार तो है… लेकिन किसके लिए? अपने भाई से मिलने के लिए, या उन सवालों का सामना करने के लिए जो अब तक अनकहे थे?”

  • भाग 5: आखिरी धरोहर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    रुद्रगढ़ हवेली का अधिकांश हिस्सा मलबे में बदल गया था। गाँव के लोग दूर खड़े होकर टूटे हुए महल को देख रहे थे।

     

    आरव और कबीर आँगन में खड़े थे।

     

    हरिदास कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने पूरी रात की रिकॉर्डिंग देखी।

     

    वीडियो में सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था—पश्चिमी कमरा, तहखाना, मृणालिनी की डायरी और वह अजीब काली परछाईं।

     

    लेकिन एक चीज़ देखकर उसके हाथ काँपने लगे।

     

    जहाँ उसे याद था कि मृणालिनी उसके सामने खड़ी थी, वीडियो में वहाँ कोई नहीं था।

     

    सिर्फ आरव और कबीर थे।

     

    और कैमरे के पीछे से एक बच्ची की आवाज़ आ रही थी—

     

    “सच को बाहर ले जाओ।”

     

    आरव ने वीडियो बंद कर दिया।

     

    कबीर चुपचाप खड़ा था।

     

    “तू ठीक है?” आरव ने पूछा।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे।

     

    “मुझे रात से एक ही सपना आ रहा है।”

     

    “क्या सपना?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने जेब से कुछ निकाला।

     

    वही चाँदी की पायल।

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “ये तेरे पास कैसे आई?”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “जब हम तहखाने में थे, तभी मैंने इसे उठा लिया था।”

     

    आरव ने तुरंत पायल उसके हाथ से लेने की कोशिश की।

     

    लेकिन कबीर ने हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ बदल गई थी।

     

    “ये मेरी है।”

     

    आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

     

    “कबीर, ये मृणालिनी की थी।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात आरव गाँव के एक छोटे होटल में रुका। उसने तय किया कि सुबह शहर लौट जाएगा।

     

    रात करीब दो बजे उसकी नींद खुली।

     

    कमरे में कोई खड़ा था।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर खिड़की पर दस्तक हुई।

     

    टक… टक… टक…

     

    आरव ने पर्दा हटाया।

     

    बाहर कबीर खड़ा था।

     

    लेकिन होटल की चौथी मंज़िल की खिड़की के बाहर कोई इंसान कैसे खड़ा हो सकता था?

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    कबीर ने शीशे के दूसरी तरफ से मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “दरवाज़ा खोल।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “तू वहाँ कैसे है?”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे मृणालिनी जैसा बनने लगा।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “धरोहर कभी खत्म नहीं होती। सिर्फ अपना रक्षक बदलती है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने दोबारा देखा, खिड़की के बाहर कोई नहीं था।

     

    सुबह होते ही वह कबीर को ढूँढने गया।

     

    कबीर होटल में नहीं था।

     

    उसका फोन कमरे में पड़ा था।

     

    और बिस्तर पर वही चाँदी की पायल रखी थी।

     

    आरव ने पुलिस को सूचना दी।

     

    कई घंटे तक खोजबीन हुई।

     

    लेकिन कबीर का कोई पता नहीं चला।

     

    तीन दिन बाद आरव शहर लौट आया।

     

    उसने रुद्रगढ़ हवेली पर बनाई पूरी डॉक्यूमेंट्री इंटरनेट पर डाल दी।

     

    वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो गया।

     

    लोगों ने हवेली की कहानी पर विश्वास किया।

     

    पुराने दस्तावेज़ों की जाँच हुई।

     

    राजेंद्र सिंह और मृणालिनी के बारे में रिकॉर्ड सच निकले।

     

    गाँव में मृणालिनी के नाम पर एक स्मारक बनाया गया।

     

    आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया।

     

    लेकिन ठीक एक महीने बाद उसे डाक से एक पैकेट मिला।

     

    भेजने वाले का नाम नहीं था।

     

    अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में रुद्रगढ़ हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    हवेली के सामने चार लोग खड़े थे।

     

    मृणालिनी।

     

    हरिदास।

     

    कबीर।

     

    और…

     

    आरव खुद।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1936।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर के पीछे एक और वाक्य लिखा था—

     

    “तुम दोनों कभी यहाँ पहली बार नहीं आए थे।”

     

    आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    उसी रात उसने अपने परिवार के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    उसे अपने दादा की एक डायरी मिली।

     

    उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “हर पीढ़ी में रुद्रगढ़ का एक वारिस लौटता है। उसे लगता है कि वह धरोहर देखने आया है। असल में धरोहर उसे देखने बुलाती है।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    अँधेरे में किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    ही… ही… ही…

     

    फिर वही आवाज़—

     

    “आरव…”

     

    उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    दीवार पर एक परछाईं थी।

     

    छोटी बच्ची की।

     

    लेकिन वह परछाईं अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी की परछाईं भी थी।

     

    फिर तीसरी।

     

    चौथी।

     

    दर्जनों परछाइयाँ।

     

    आरव पीछे हटता गया।

     

    दीवार पर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे—

     

    “कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    अचानक उसका फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर नाम देखकर उसके हाथ काँप गए।

     

    कबीर कॉलिंग।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    फिर कबीर की बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव… मुझे ढूँढना मत।”

     

    “तू कहाँ है?”

     

    दूसरी तरफ कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी।

     

    कबीर बोला—

     

    “मैं वहीं हूँ जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    “हवेली में?”

     

    कुछ क्षण खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ काँपने लगी।

     

    “तुम्हारे घर के नीचे।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसी क्षण उसके पैरों के नीचे फर्श से आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही तीन दस्तक।

     

    जैसी रुद्रगढ़ हवेली के पश्चिमी कमरे में सुनाई दी थी।

     

    फर्श पर एक दरार बनने लगी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    दरार के अंदर से ठंडी हवा आने लगी।

     

    और फिर एक पुरानी लकड़ी की पट्टी अपने आप हट गई।

     

    नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियों के पास एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    दीवार पर मृणालिनी की तस्वीर लगी थी।

     

    इस बार तस्वीर में वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके बगल में कबीर खड़ा था।

     

    और दूसरी तरफ…

     

    आरव।

     

    मृणालिनी की आँखें तस्वीर के अंदर से सीधे आरव को देख रही थीं।

     

    उसके होंठ धीरे-धीरे हिले।

     

    आवाज़ कमरे में नहीं आई।

     

    लेकिन आरव ने उसके शब्द साफ समझ लिए—

     

    “पुरानी धरोहर को कोई नष्ट नहीं कर सकता।”

     

    नीचे से कबीर की आवाज़ आई—

     

    “वह सिर्फ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है।”

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    और उन अँधेरी सीढ़ियों पर पहला कदम रख दिया।

     

    उसके पीछे दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अँधेरे में एक बच्ची की हँसी गूँजी।

     

    और उसी के साथ…

     

    रुद्रगढ़ की धरोहर ने अपना नया रक्षक चुन लिया।

  • भाग 4: श्राप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव और कबीर फर्श टूटने के बाद एक गहरे गड्ढे में जा गिरे।

     

    कुछ क्षण तक दोनों को कुछ समझ नहीं आया।

     

    आरव ने उठने की कोशिश की तो उसके हाथ में पत्थर की नुकीली चीज़ चुभ गई।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    वह एक विशाल भूमिगत कक्ष में था।

     

    कबीर कुछ दूरी पर गिरा पड़ा था।

     

    “कबीर!”

     

    “मैं ठीक हूँ,” उसने कराहते हुए कहा।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    जहाँ से वे गिरे थे, वहाँ अब सिर्फ काला अँधेरा था।

     

    कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी सामने दीवार पर एक अजीब आकृति चमकी।

     

    वह वही निशान था जो मृणालिनी की डायरी के आखिरी पन्ने पर बना था।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दीवार पर कई नाम लिखे थे।

     

    रुद्रगढ़ परिवार के लोगों के नाम।

     

    हर नाम के सामने एक तारीख थी।

     

    और सबसे नीचे नया नाम लिखा था—

     

    आरव।

     

    उसके सामने तारीख थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “किसी ने आज ही लिखा है।”

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों पलटे।

     

    मृणालिनी वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    उसके चेहरे पर उदासी थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम हमें मारना चाहती हो?”

     

    मृणालिनी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो फिर हमें यहाँ क्यों लाया?”

     

    मृणालिनी ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    “क्योंकि जो चीज़ इस हवेली में कैद है, वह अब जाग चुकी है।”

     

    अचानक जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से धूल गिरने लगी।

     

    दूर से किसी के भारी कदमों की आवाज़ आई।

     

    धम… धम… धम…

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “वह आ रहा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने भगवान समझकर बुलाया था।”

     

    कक्ष के दूसरे छोर पर एक विशाल दरवाज़ा था।

     

    उसके पीछे से काली धुंध बाहर आने लगी।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “लालच का रूप।”

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर कोई इंसान नहीं था।

     

    सिर्फ एक विशाल काली परछाईं।

     

    उसके भीतर कई चेहरे दिखाई दे रहे थे।

     

    बूढ़े।

     

    बच्चे।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    जिन्होंने कभी इस हवेली में प्रवेश किया था।

     

    काली परछाईं ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    तभी मृणालिनी उसके सामने आ गई।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    परछाईं से भारी आवाज़ निकली—

     

    “तुमने मुझे अस्सी वर्ष कैद रखा।”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुमने मेरे परिवार को खा लिया।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “तुम्हारे परिवार ने खुद को मुझे सौंपा था।”

     

    आरव समझ गया कि असली श्राप मृणालिनी नहीं थी।

     

    असली श्राप वह शक्ति थी, जिसे रुद्रगढ़ परिवार ने लालच के कारण बुलाया था।

     

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

     

    “मृणालिनी,” आरव ने पूछा, “तुम हमें बचाकर खुद क्यों नहीं निकल जाती?”

     

    मृणालिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि मैं इस हवेली से बंधी हूँ। मेरी आत्मा तभी मुक्त होगी जब कोई जीवित इंसान इस श्राप को तोड़ेगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “धरोहर को नष्ट करके नहीं।”

     

    उसने एक पत्थर की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “सच को बाहर लाकर।”

     

    आरव ने तुरंत समझ लिया।

     

    उसे परिवार के अपराध का सच दुनिया के सामने लाना होगा।

     

    उसने अपने कैमरे की ओर देखा।

     

    कैमरा अभी भी उसके बैग में था।

     

    लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता नहीं था।

     

    तभी कबीर ने देखा कि कमरे के एक कोने में लोहे की सीढ़ी लगी है।

     

    “उधर!”

     

    दोनों सीढ़ी की ओर भागे।

     

    काली परछाईं उनके पीछे बढ़ने लगी।

     

    मृणालिनी उसे रोक रही थी।

     

    “जल्दी करो!”

     

    आरव और कबीर ऊपर चढ़ने लगे।

     

    सीढ़ी उन्हें एक पुराने भंडारघर में ले आई।

     

    आरव ने बैग उठाया।

     

    कैमरा सुरक्षित था।

     

    उसने तुरंत रिकॉर्डिंग शुरू की।

     

    “अगर यह वीडियो किसी को मिले, तो रुद्रगढ़ हवेली के बारे में सच्चाई—”

     

    अचानक पीछे से हरिदास की आवाज़ आई।

     

    “तुम सच बाहर नहीं ले जा सकते।”

     

    आरव पलटा।

     

    हरिदास हाथ में पुरानी तलवार लिए खड़ा था।

     

    उसके पीछे मृणालिनी थी।

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यह हवेली सिर्फ रहस्य नहीं छिपाती। यह हमारे पाप छिपाती है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब ये पाप नहीं छिपेंगे।”

     

    हरिदास ने तलवार उठाई।

     

    तभी मृणालिनी ने उसे रोक लिया।

     

    “बस।”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “अस्सी साल से तुम इसी डर में जी रहे हो कि सच बाहर आ जाएगा। लेकिन सच से डरने वाला ही असली कैदी होता है।”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    उसने तलवार नीचे कर दी।

     

    और उसी क्षण पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    काली धुंध पूरे गलियारे में फैल गई।

     

    मृणालिनी ने आरव से कहा—

     

    “अब आखिरी काम बाकी है।”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली के मुख्य आँगन में जाओ। वहाँ जो पत्थर का स्तंभ है, उसके नीचे मेरे पिता की आखिरी निशानी है। उसे बाहर निकालो।”

     

    आरव और कबीर नीचे भागे।

     

    आँगन में पहुँचकर उन्होंने पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक पुराना लोहे का बक्सा था।

     

    बक्से के अंदर एक पत्र था।

     

    पत्र पढ़ते ही आरव की आँखें फैल गईं।

     

    वह पत्र राजेंद्र सिंह का था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मैंने अपनी बेटी को बलि दी, लेकिन असली बलि उस रात नहीं हुई। मैंने अपनी आत्मा उसी दिन खो दी थी।”

     

    आरव ने पत्र कैमरे के सामने पढ़ना शुरू किया।

     

    जैसे ही उसने आखिरी शब्द पढ़े—

     

    पूरी हवेली में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

     

    “अब सच पूरा हुआ।”

     

    मृणालिनी आँगन के बीच खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा अब शांत था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर उसके पीछे खड़ी काली परछाईं चीखने लगी।

     

    हवेली की दीवारें टूटने लगीं।

     

    और अगली सुबह…

     

    रुद्रगढ़ हवेली का पश्चिमी हिस्सा पूरी तरह गिर चुका था।

     

    लेकिन मलबे के बीच एक चीज़ बिल्कुल सही सलामत थी—

     

    मृणालिनी की तस्वीर।

     

    आरव ने सोचा कि श्राप खत्म हो चुका है।

     

    लेकिन जब उसने तस्वीर कैमरे में देखी…

     

    तो मृणालिनी के पास एक नया चेहरा खड़ा था।

     

    वह चेहरा…

     

    कबीर का था।

  • भाग 3: तहखाने का रहस्य

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    दरवाज़ा बंद होते ही आरव और कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा जैसे बाहर से नहीं बल्कि अंदर से बंद था।

     

    कबीर ने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया।

     

    “खुल क्यों नहीं रहा?”

     

    आरव ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नज़र कमरे के बीचोंबीच पड़े लोहे के संदूक पर थी।

     

    वही संदूक जिसका ज़िक्र मृणालिनी की डायरी में था।

     

    संदूक के ऊपर लाल धागा बंधा था।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    जैसे ही उसने धागे को छुआ, कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    तभी कमरे की दीवार से धीमी आवाज़ आई—

     

    “खोलो…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “संदूक खोलो…”

     

    कबीर बोला, “ये मत करना।”

     

    लेकिन आरव ने संदूक खोल दिया।

     

    अंदर पुराने कागज़, कुछ चाँदी के सिक्के और एक लोहे की चाबी थी।

     

    चाबी के साथ एक छोटा-सा कागज़ था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “नीचे जाओ। जवाब वहीं है।”

     

    फर्श के नीचे से अचानक आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने कमरे की फर्श देखी।

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से अलग था।

     

    दोनों ने मिलकर उसे हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियाँ अँधेरे तहखाने में जा रही थीं।

     

    “यह हवेली के नक्शे में नहीं था,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “क्या हमें सच में नीचे जाना चाहिए?”

     

    आरव ने चाबी जेब में रखी।

     

    “अगर मृणालिनी की मौत का सच जानना है, तो हाँ।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे नीचे जाते, हवा ठंडी होती जाती।

     

    कुछ सीढ़ियाँ नीचे जाने के बाद उन्हें दीवारों पर पुराने चित्र दिखाई दिए।

     

    हर चित्र में रुद्रगढ़ परिवार का एक सदस्य था।

     

    लेकिन हर चित्र में एक बात समान थी।

     

    सबकी आँखें काली कर दी गई थीं।

     

    सबसे आखिरी चित्र में मृणालिनी थी।

     

    उसकी आँखें बाकी चित्रों की तरह काली नहीं थीं।

     

    उसकी आँखों पर लाल रंग लगा था।

     

    चित्र के नीचे लिखा था—

     

    “जिसे बलि दी गई, वही अब रक्षक है।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “आरव, मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    दोनों पलटे।

     

    सीढ़ियाँ खाली थीं।

     

    लेकिन आवाज़ लगातार करीब आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई लकड़ी की छड़ी लेकर सीढ़ियाँ उतर रहा हो।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “हरिदास?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    दोनों नीचे पहुँचे।

     

    वहाँ एक विशाल तहखाना था।

     

    बीच में पत्थर का चबूतरा था।

     

    उस पर पुराने कपड़े, सूखी हुई चूड़ियाँ और एक छोटी-सी चाँदी की पायल रखी थी।

     

    आरव ने पायल उठाई।

     

    उसे छूते ही अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुम बहुत देर से आए।”

     

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में पकड़ी पायल अब गर्म हो चुकी थी।

     

    अचानक तहखाने की दीवार पर एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    आरव ने चाबी लगाई।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे में पुराने दस्तावेज़ रखे थे।

     

    आरव ने एक दस्तावेज़ उठाया।

     

    उसमें लिखा था कि 1936 में रुद्रगढ़ परिवार पर आर्थिक संकट था। परिवार के मुखिया राजेंद्र सिंह ने गाँव की जमीन बेचकर हवेली बचाने की कोशिश की थी। लेकिन गाँव वालों ने विरोध किया।

     

    तभी परिवार के तांत्रिक ने एक भयानक उपाय बताया।

     

    उसने कहा कि हवेली के नीचे एक “रक्षक शक्ति” है। अगर परिवार अपनी संतान की बलि देगा तो धन वापस आ जाएगा और परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।

     

    राजेंद्र सिंह ने अपनी बेटी मृणालिनी को चुन लिया।

     

    लेकिन दस्तावेज़ के आखिरी हिस्से में एक रहस्य था।

     

    मृणालिनी की बलि के बाद धन तो आया…

     

    लेकिन परिवार का कोई सदस्य सात दिन से ज्यादा जीवित नहीं रहा।

     

    एक-एक करके सभी की मौत होने लगी।

     

    सिर्फ एक व्यक्ति बचा।

     

    हरिदास।

     

    कबीर ने दस्तावेज़ पढ़कर कहा—

     

    “तो हरिदास ने सब देखा था?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    तभी तहखाने के बाहर से आवाज़ आई—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों जम गए।

     

    हरिदास अँधेरे से बाहर आया।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा वैसा नहीं था।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    “मैंने सिर्फ देखा नहीं था,” उसने कहा।

     

    “मैंने ही वह अनुष्ठान कराया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    हरिदास हँसा।

     

    “हरिदास तो बहुत पहले मर गया था।”

     

    उसका चेहरा अचानक बदलने लगा।

     

    झुर्रियाँ गायब हुईं।

     

    बाल काले हो गए।

     

    कुछ ही सेकंड में सामने एक जवान आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने तस्वीर याद की।

     

    वही चेहरा।

     

    1936 की तस्वीर वाला हरिदास।

     

    उसने कहा—

     

    “मृणालिनी को हमने बलि दी थी, लेकिन उसने मरने से पहले श्राप दे दिया। इस हवेली में जो भी लालच लेकर आएगा, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाएगी।”

     

    कबीर काँप रहा था।

     

    “तो तुम यहाँ क्यों हो?”

     

    जवान हरिदास मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं पहला कैदी हूँ।”

     

    तभी तहखाने में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

     

    “झूठ।”

     

    अँधेरे से मृणालिनी बाहर आई।

     

    उसने हरिदास की ओर देखा।

     

    “पहला कैदी मैं नहीं हूँ।”

     

    हरिदास का चेहरा डर से बदल गया।

     

    मृणालिनी ने आरव की ओर इशारा किया।

     

    “जिसे हवेली ने बुलाया है… वह अगला रक्षक बनेगा।”

     

    आरव पीछे हटते हुए बोला—

     

    “मैं यहाँ से नहीं रुकूँगा।”

     

    मृणालिनी ने शांत स्वर में कहा—

     

    “तुम्हें जाने की अनुमति किसने दी?”

     

    उसी क्षण तहखाने की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    अँधेरे में सिर्फ एक आवाज़ सुनाई दी—

     

    “अब असली दरवाज़ा खुलेगा।”

     

    और फर्श अचानक टूट गया।

     

    आरव और कबीर नीचे गिरने लगे।

  • मृणालिनी का कमरा (part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था।

     

    लकड़ी के पुराने पल्ले की आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज रही थी।

     

    कrrrr…

     

    आरव और कबीर पीछे हट गए।

     

    दरवाज़ा पूरी तरह खुला तो अंदर घना अँधेरा दिखाई दिया। आरव ने टॉर्च जलाई, लेकिन रोशनी कुछ ही फीट आगे जाकर जैसे निगल ली गई।

     

    “अंदर मत जाना,” कबीर ने कहा।

     

    लेकिन आरव के भीतर का जिज्ञासु इंसान डर से ज्यादा ताकतवर था।

     

    वह कमरे के अंदर चला गया।

     

    कबीर मजबूरी में उसके पीछे आया।

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था। वहाँ धूल तो थी, लेकिन सामान अपनी जगह पर रखा हुआ था। एक पुराना लकड़ी का पलंग, एक मेज, दीवार पर कुछ चित्र और कमरे के कोने में एक छोटी-सी गुड़िया।

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, लेकिन चेहरे पर धूल नहीं थी।

     

    “अजीब है,” आरव ने कहा।

     

    तभी कबीर ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “इधर देख।”

     

    दीवार पर दर्जनों तारीखें लिखी थीं।

     

    1898…

     

    1899…

     

    1900…

     

    फिर अचानक—

     

    1936

     

    और उसके बाद कोई तारीख नहीं।

     

    आरव ने कैमरा दीवार की ओर किया।

     

    “लगता है किसी ने यहाँ साल गिने थे।”

     

    कबीर ने पूछा, “किसलिए?”

     

    तभी मेज की दराज़ अपने आप खुल गई।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    आरव धीरे से मेज के पास गया।

     

    दराज़ में एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    उसके ऊपर लाल स्याही से लिखा था—

     

    “मृणालिनी की डायरी। जिसे पढ़ना नहीं चाहिए।”

     

    आरव ने डायरी खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम मृणालिनी है। मैं रुद्रगढ़ की बेटी हूँ। पिता कहते हैं कि यह हवेली हमारे पूर्वजों की शान है। लेकिन मुझे लगता है कि हवेली के अंदर कोई और भी रहता है।”

     

    आरव आगे पढ़ता गया।

     

    मृणालिनी ने लिखा था कि बचपन से उसे पश्चिमी कमरे से आवाज़ें सुनाई देती थीं। कभी कोई उसे बुलाता था, कभी रोता था। उसके पिता उसे हमेशा उस कमरे से दूर रहने को कहते थे।

     

    एक रात उसने देखा कि उसकी माँ आधी रात को पश्चिमी कमरे में गई थी।

     

    मृणालिनी उसके पीछे चली गई।

     

    कमरे के अंदर उसकी माँ एक पुराने पत्थर के चबूतरे के सामने खड़ी थी।

     

    चबूतरे पर एक लोहे का संदूक रखा था।

     

    उसकी माँ रो रही थी।

     

    मृणालिनी ने पूछा—

     

    “माँ, आप यहाँ क्यों आती हैं?”

     

    उसकी माँ ने पलटकर कहा—

     

    “अगर कभी यह कमरा खुल जाए… तो हवेली छोड़ देना। पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    डायरी का अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर अगला पन्ना—

     

    “आज पिता ने मुझे बताया कि हमारे परिवार ने बहुत बड़ा पाप किया था। उन्होंने कहा कि इस हवेली की जमीन के नीचे एक ऐसी चीज़ दफन है, जिसे बाहर नहीं आना चाहिए।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    तभी कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया फर्श पर गिर गई।

     

    ठक!

     

    कबीर ने डरकर पीछे देखा।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    लेकिन गलियारे में अब कोई रोशनी नहीं थी।

     

    “आरव…”

     

    कबीर की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “क्या?”

     

    “दरवाज़े के पास कौन खड़ा है?”

     

    आरव ने धीरे से टॉर्च घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    और झुका हुआ सिर।

     

    आरव ने कहा—

     

    “मृणालिनी?”

     

    बच्ची ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बहुत पीला था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    बच्ची अचानक पीछे मुड़ी और गलियारे में भाग गई।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    लेकिन गलियारा खाली था।

     

    सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों की ओर जा रहे थे।

     

    आरव नीचे पहुँचा तो उसे हरिदास दिखाई दिया।

     

    बूढ़ा हवेली के आँगन में खड़ा था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आपको सब पता था?”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “मृणालिनी कौन है?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मृणालिनी इस हवेली की बेटी थी। लेकिन उसकी मौत अस्सी साल पहले नहीं हुई थी।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “वह मरी थी… लेकिन उसकी आत्मा नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा, “उसके साथ क्या हुआ था?”

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “1936 में रुद्रगढ़ परिवार ने एक अनुष्ठान किया था। उनका विश्वास था कि हवेली के नीचे दबे खजाने की रक्षा एक अदृश्य शक्ति करती है। उस शक्ति को शांत करने के लिए परिवार ने अपनी ही बेटी को बलि के लिए चुना।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “मृणालिनी को उसी पश्चिमी कमरे में बंद कर दिया गया था।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “तीन दिन बाद दरवाज़ा खोला गया। अंदर लड़की नहीं थी। सिर्फ उसकी चूड़ियाँ थीं… और दीवार पर खून से लिखा था—”

     

    हरिदास रुक गया।

     

    “क्या लिखा था?”

     

    बूढ़े ने आरव की आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “मैं अकेली नहीं मरूँगी।”

     

    उसी समय हवेली की ऊपरी मंज़िल से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पश्चिमी कमरे की खिड़की में वही बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने हाथ में कुछ पकड़ा हुआ था।

     

    आरव ने कैमरे का ज़ूम बढ़ाया।

     

    वह एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मृणालिनी खड़ी थी।

     

    उसके साथ एक आदमी था।

     

    हरिदास का चेहरा देखकर आरव समझ गया कि कुछ बहुत गलत था।

     

    क्योंकि तस्वीर में वह आदमी…

     

    हरिदास था।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे साल लिखा था—

     

    1936।

     

    आरव ने घबराकर बूढ़े की ओर देखा।

     

    “आप… तब भी जिंदा थे?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई।

     

    और फिर उसने कहा—

     

    “मैंने कहा था ना… हवेली कहानी नहीं सुनाती। वह अपने कैदियों की तलाश करती है।”

     

    अचानक आरव के पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    हरिदास गायब था।

     

    और पश्चिमी कमरे से फिर वही बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “अब तीसरा कौन होगा?”

  • बंद दरवाज़ा (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरुआ के बाहर, घने पीपल और बरगद के पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। गाँव वाले उसे रुद्रगढ़ हवेली कहते थे। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी वह हवेली अब खंडहर में बदल चुकी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी, छत का एक हिस्सा टूट चुका था और लकड़ी के दरवाज़े इतने पुराने हो चुके थे कि हवा चलने पर अपने आप कराहने लगते थे।

     

    लेकिन हवेली की सबसे डरावनी बात उसका उजाड़ होना नहीं था।

     

    उसका सबसे डरावना रहस्य था—पश्चिमी कमरे का बंद दरवाज़ा।

     

    कहा जाता था कि उस कमरे को पिछले अस्सी वर्षों से किसी ने नहीं खोला था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि आधी रात के बाद उस कमरे के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी। कभी-कभी खिड़की पर किसी बूढ़ी औरत की परछाईं दिखाई देती थी। और जो भी उस कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करता, वह अगले दिन गाँव छोड़कर चला जाता।

     

    इन बातों को सुनकर शहर में रहने वाला आरव हमेशा हँसता था।

     

    आरव पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाता था। जब उसके दादा की मृत्यु के बाद उसे पता चला कि रुद्रगढ़ हवेली उसकी पुश्तैनी संपत्ति है, तो उसने फैसला किया कि वह गाँव जाकर हवेली की हालत देखेगा।

     

    उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी आया।

     

    शाम के करीब चार बजे दोनों हवेली के सामने खड़े थे।

     

    “यार, तू सच में यहाँ रात बिताने वाला है?” कबीर ने टूटी हुई दीवार को देखते हुए पूछा।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “यही तो मज़ा है। ऐसी जगहों की कहानी रिकॉर्ड करनी चाहिए।”

     

    तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज़ आई।

     

    “कहानी रिकॉर्ड करने आए हो… या अपनी कहानी लिखवाने?”

     

    दोनों ने पलटकर देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी हाथ में लकड़ी की छड़ी लिए खड़ा था। उसका नाम हरिदास था। गाँव में लोग उसे हवेली का आखिरी रखवाला कहते थे।

     

    आरव ने नमस्ते की।

     

    “आपको हमारे आने का पता था?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “जिसे हवेली बुलाती है, उसके आने का पता सबको चल जाता है।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बाबा, आप भी गाँव वालों की तरह डरावनी बातें करते हैं?”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    “डरावनी बातें मैं नहीं करता बेटा। हवेली करती है।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसी गंभीरता थी कि कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    हरिदास ने उन्हें हवेली की चाबी दी।

     

    “ऊपर के कमरों में जा सकते हो। आँगन देख सकते हो। पुराने कागज़ भी मिल जाएँगे। लेकिन पश्चिमी हिस्से में मत जाना।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा, “क्यों?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बंद है… वह दरवाज़ा नहीं है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    आरव और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब था उसका?” कबीर ने पूछा।

     

    “बूढ़े लोग रहस्य बनाए बिना नहीं रह सकते,” आरव ने कहा।

     

    दोनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के भीतर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ तस्वीरों में रुद्रगढ़ परिवार के लोग दिखाई दे रहे थे। एक तस्वीर में लगभग दस साल की लड़की खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें बेहद अजीब थीं।

     

    ऐसा लगता था जैसे वह तस्वीर से बाहर निकलकर उन्हें देख रही हो।

     

    आरव ने कैमरा निकाला और तस्वीर रिकॉर्ड करने लगा।

     

    तभी कबीर ने कहा—

     

    “आरव… ये लड़की कौन है?”

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “मृणालिनी देवी — 1891”

     

    आरव ने मोबाइल से फोटो खींची।

     

    “शायद हवेली के मालिक की बेटी थी।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    रात होने लगी।

     

    करीब साढ़े दस बजे वे नीचे वाले बड़े कमरे में बैठे खाना खा रहे थे। अचानक ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने चौंककर आरव को देखा।

     

    “ऊपर कोई है?”

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर गए।

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यही पश्चिमी कमरा होगा।”

     

    तभी अंदर से बहुत हल्की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    किसी ने दरवाज़े पर तीन बार दस्तक दी।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “चल वापस चलते हैं।”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    फिर अंदर से आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    दोनों के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “इसने तेरा नाम कैसे लिया?”

     

    आरव के हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई।

     

    अंदर से फिर वही आवाज़ आई।

     

    इस बार थोड़ी स्पष्ट—

     

    “आरव… दरवाज़ा खोलो…”

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    उसने जंजीर को छुआ।

     

    तभी अचानक पीछे से किसी के भागने की आवाज़ आई।

     

    दोनों पलटे।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान गलियारे से आते हुए सीधे बंद दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    दरवाज़े के नीचे से एक कागज़ बाहर सरक आया।

     

    आरव ने काँपते हाथों से कागज़ उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम धरोहर समझ रहे हो, वह असल में कैद है।”

     

    आरव ने कागज़ को देखा।

     

    और उसी क्षण पश्चिमी कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा। अभी।”

     

    लेकिन आरव की नज़र दरवाज़े पर थी।

     

    क्योंकि जंजीर अपने आप धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    छन्न…

     

    और दरवाज़ा…

     

    अंदर की तरफ खुलने लगा।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 13

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 13

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 13 : वो राज़ जो दस साल से दफन था

     

    दरवाजे पर खड़ा वह आदमी लगातार मुस्कुरा रहा था।

     

    उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो कुछ देर पहले नंदिनी के लॉकर से मिला था।

     

    आरोही की नजर उस लॉकेट पर टिक गई।

     

    उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

     

    “तुम…?”

     

    आरव भी उसे देखकर हैरान था।

     

    “तुम यहां कैसे आए?”

     

    वो आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

     

    “जिस सच की तलाश में तुम दोनों इतने दिनों से भटक रहे हो, शायद अब वो सच खुद तुम्हारे सामने आ गया है।”

     

    कबीर ने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “तुम अकेले आए हो?”

     

    वह आदमी हंस पड़ा।

     

    “अगर अकेला होता, तो तुम तीनों इतनी आसानी से मुझसे सवाल नहीं कर रहे होते।”

     

    आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “मेरी मां कहां है?”

     

    आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “जिसे तुम मां कहते हो, वो सुरक्षित है।”

     

    आरोही ने गुस्से में कहा,

     

    “अगर उन्हें कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं।”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

     

    आरोही ठिठक गई।

     

    “तुम नंदिनी को जानते थे?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    “तो फिर बताओ, मेरी मां की मौत कैसे हुई?”

     

    आदमी ने लॉकेट मेज पर रख दिया।

     

    “यही जानने के लिए तो तुम्हें यहां लाया गया है।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “मुझे?”

     

    वह हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ वो चाहिए जो तुम्हारे पिता ने छुपाकर रखा था।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या?”

     

    “एक फाइल।”

     

    “कौन-सी फाइल?”

     

    “वही… जिसके अंदर तुम्हारे दोनों परिवारों को खत्म कर देने वाला सच है।”

     

    कबीर ने ध्यान से उसे देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    वह कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “अद्वैत।”

     

    आरव चौंका।

     

    “अद्वैत…?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “हां। अद्वैत मल्होत्रा।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “मल्होत्रा?”

     

    “हां।”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “समीर मल्होत्रा का बेटा?”

     

    अद्वैत मुस्कुराया।

     

    “आखिर किसी को याद तो आया।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “तो तुम समीर के बेटे हो?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन तुम्हारे पिता तो इस पूरे मामले में शामिल बताए जा रहे हैं।”

     

    अद्वैत की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    वह हंस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मेरे पिता इस सबके मास्टरमाइंड हैं?”

     

    “तो कौन है?”

     

    अद्वैत ने जवाब देने के बजाय जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में राजवीर, विनय, नंदिनी और समीर एक साथ खड़े थे।

     

    लेकिन पीछे एक छोटा बच्चा भी दिखाई दे रहा था।

     

    आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये बच्चा कौन है?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “मैं।”

     

    आरव ने तस्वीर उसके हाथ से ली।

     

    “लेकिन तुम तो उस समय बहुत छोटे रहे होंगे।”

     

    “हां।”

     

    “फिर तुम्हें ये सब कैसे पता?”

     

    अद्वैत की आवाज धीमी हो गई।

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने मरने से पहले मुझे सब बता दिया था।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “समीर की मौत?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “मेरे पिता की मौत भी उसी खेल का हिस्सा थी।”

     

    अद्वैत ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया।

     

    “दस साल पहले की वो रात सिर्फ तुम्हारे पिता की जिंदगी खत्म होने की रात नहीं थी।”

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उस रात मेरी जिंदगी भी खत्म हो गई थी।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “कैसे?”

     

    “मेरे पिता ने मुझे घर से बाहर भेज दिया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ लोग उन्हें मारने आने वाले हैं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन लोग?”

     

    “वही लोग जो आज भी तुम्हारा पीछा कर रहे हैं।”

     

    “विराज?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “विराज सिर्फ एक नाम था।”

     

    आरव चौंका।

     

    “फिर असली आदमी कौन था?”

     

    अद्वैत ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता के सबसे करीब रहने वाला इंसान।”

     

    आरव के चेहरे पर तनाव आ गया।

     

    “समीर?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    अद्वैत ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही ने बेचैनी से पूछा,

     

    “तुम बार-बार यही क्यों कह रहे हो कि समीर दोषी नहीं है?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने आखिरी वक्त में यही कहा था।”

     

    उसने जेब से एक छोटी रिकॉर्डिंग डिवाइस निकाली।

     

    “उन्होंने अपनी मौत से पहले इसे रिकॉर्ड किया था।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “क्या इसमें उस आदमी का नाम है?”

     

    “शायद।”

     

    अद्वैत ने रिकॉर्डिंग चला दी।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ सांसों की आवाज सुनाई दी।

     

    फिर समीर की आवाज आई “अगर अद्वैत ये रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो समझ लेना कि मैं उसे बचा नहीं पाया।”

     

    अद्वैत की आंखें भर आईं।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    “मैंने जो कुछ किया, वो अपने बेटे और नंदिनी की बेटी को बचाने के लिए किया।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “मेरे लिए?”

     

    रिकॉर्डिंग में समीर बोले “लेकिन जिस इंसान ने ये सब शुरू किया है, वो आज भी जिंदा है।”

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    अद्वैत ने सिर झुका लिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आगे की रिकॉर्डिंग?”

     

    “नष्ट कर दी गई।”

     

    “किसने?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही ने अचानक पूछा,

     

    “मेरी मां कहां हैं?”

     

    अद्वैत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां सुरक्षित हैं।”

     

    “मैं उनसे मिलना चाहती हूं।”

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम उनसे मिलीं, तो तुम्हारी मां तुम्हें वो सच बता देंगी जिसे सुनने के बाद शायद तुम मुझ पर भी भरोसा नहीं करोगी।”

     

    आरोही ने गुस्से में कहा,

     

    “मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव। हर कोई मुझसे कुछ ना कुछ छुपा रहा है।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “पहले पापा… फिर मां… अब तुम भी शायद कुछ छुपा रहे हो।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुमसे क्या छुपाया?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “मैंने तुमसे सिर्फ एक बात छुपाई थी।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    आरव ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला।

     

    “मुझे ये तीन दिन पहले मिला था।”

     

    आरोही ने कागज लिया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर आरोही को सच्चाई बताओगे, तो उसकी जान चली जाएगी।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुमने मुझे ये क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    “तुम?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पहली बार अपनी कमजोरी स्वीकार की।

     

    “मुझे डर था कि तुम्हें खो दूंगा।”

     

    आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर धीरे से बोली,

     

    “मुझे सच से ज्यादा तुम्हारा झूठ डराता है।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कुछ नहीं छुपाऊंगा।”

     

    आरोही ने सिर हिला दिया।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    तभी अद्वैत का फोन बजा।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से किसी ने कुछ कहा।

     

    उसका चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    कुछ सेकंड बाद उसने फोन काट दिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां…”

     

    आरोही का दिल धड़क उठा।

     

    “क्या हुआ मां को?”

     

    “उन्हें दूसरी जगह ले जाया गया है।”

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “तुमने कहा था कि वो सुरक्षित हैं।”

     

    “थीं।”

     

    “अब?”

     

    अद्वैत चुप रहा।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अभी।”

     

    कबीर ने अपना लैपटॉप निकाला।

     

    “मैं उनका फोन ट्रैक करने की कोशिश करता हूं।”

     

    कुछ मिनट बाद लोकेशन सामने आई।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुराना मिल गोदाम।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “चलो।”

     

    रात के करीब ग्यारह बजे चारों पुराने मिल गोदाम पहुंचे।

     

    चारों तरफ अंधेरा था।

     

    आरोही की धड़कन तेज थी।

     

    आरव ने उसे पीछे रहने को कहा।

     

    “तुम मेरे साथ रहोगी।”

     

    “हां।”

     

    अंदर से आवाजें आ रही थीं।

     

    एक आदमी कह रहा था,

     

    “फाइल कहां है?”

     

    दूसरी आवाज आरोही की मां की थी।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “झूठ बोल रही हो।”

     

    “मुझे सच में नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मां!”

     

    वह आगे बढ़ने लगी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    लेकिन तभी अंदर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    “मां!”

     

    वह आरव का हाथ छुड़ाकर अंदर दौड़ गई।

     

    कमरे में उसकी मां जमीन पर बैठी थीं।

     

    उनके पास खून था…

     

    लेकिन उन्हें गोली नहीं लगी थी।

     

    गोली उनके पीछे रखी लकड़ी की मेज में लगी थी।

     

    सामने एक आदमी बंदूक लिए खड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा “समीर!”

     

    समीर ने बंदूक नीचे कर दी।

     

    उसकी आंखों में थकान थी।

     

    “आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।”

     

    आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

     

    “मां!”

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम यहां क्यों आई?”

     

    “आपको लेने।”

     

    समीर ने कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुमने इन्हें यहां क्यों लाया?”

     

    समीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे इन्हें बचाना था।”

     

    आरव ने व्यंग्य से कहा,

     

    “बचाना?”

     

    “हां।”

     

    “तुम पर इतना भरोसा कैसे करें?”

     

    समीर ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारे पिता का कातिल नहीं हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो कौन है?”

     

    समीर ने जवाब देने से पहले चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीरे से कहा “तुम्हारे पिता को मारने का आदेश… तुम्हारे पिता के अपने ही घर से गया था।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जिसे तुम अपने परिवार का हिस्सा समझते हो… वही असली गद्दार है।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    मां की आंखों में डर था।

     

    समीर ने कहा,

     

    “और वो इंसान आज भी तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

     

    उसका चेहरा रोशनी में आया।

     

    आरव उसे देखते ही स्तब्ध रह गया।

     

    आरोही के मुंह से चीख निकल गई “चाचा!”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत साल हो गए, बच्चों।”

     

    आरव ने अविश्वास से कहा,

     

    “आप?”

     

    समीर ने धीरे से कहा “यही है वो आदमी… जिसने दस साल पहले सब कुछ शुरू किया था।”

     

    आरोही के चाचा की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “अब तुम दोनों बड़े हो गए हो।”

     

    उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “और अब वक्त आ गया है कि तुम्हें पता चले… तुम्हारे पिता की मौत क्यों हुई थी।”

     

    आरव उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “अगर तुम्हें लगता है कि हम डर जाएंगे, तो तुम गलत हो।”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “डरना तुम्हें नहीं चाहिए, आरव।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि असली खतरा तुम्हारी जिंदगी में नहीं… तुम्हारे खून में है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे खून में?”

     

    चाचा मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    उसने कागज आरोही की तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं।

     

    उस पर लिखा था “आरोही मेहरा, असल में विनय मेहरा की बेटी नहीं है।”

     

    आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    और उसी पल…

     

    उनकी पूरी कहानी का सबसे बड़ा राज उनके सामने खड़ा था।

     

    जारी रहेगा…