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आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 5

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

अंधेरा इतना गहरा था कि कबीर को अपने हाथ भी दिखाई नहीं दे रहे थे।

 

उसके कानों में सिर्फ ट्रेन के पहियों की आवाज़ थी।

 

छुक…

 

छुक…

 

छुक…

 

रोहित उसके पास था।

 

मीरा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

 

“मीरा!”

 

कोई जवाब नहीं।

 

“रोहित?”

 

कोई आवाज़ नहीं।

 

कबीर अकेला था।

 

फिर सामने एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

 

वह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

 

एक दरवाज़ा।

 

दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

 

आखिरी स्टेशन।

 

कबीर ने दरवाज़ा खोला।

 

सामने एक प्लेटफॉर्म था।

 

लेकिन यह देवगढ़ स्टेशन नहीं था।

 

प्लेटफॉर्म पर हजारों पुराने टिकट पड़े थे।

 

दीवारों पर सैकड़ों तस्वीरें थीं।

 

हर तस्वीर में कोई न कोई यात्री था।

 

कुछ लोग रो रहे थे।

 

कुछ चिल्ला रहे थे।

 

और कुछ कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

 

कबीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

अचानक पीछे से मीरा की आवाज़ आई—

 

“भैया।”

 

कबीर ने पलटकर देखा।

 

मीरा खड़ी थी।

 

उसके साथ रघुवीर भी था।

 

लेकिन रोहित नहीं था।

 

“रोहित कहाँ है?”

 

मीरा ने नीचे देखा।

 

“वह वापस चला गया।”

 

कबीर ने राहत की साँस ली।

 

“तो हम भी वापस जा सकते हैं?”

 

मीरा ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“कैसे?”

 

मीरा ने सामने एक पुराना रेलवे सिग्नल दिखाया।

 

“उसे लाल से हरा करना होगा।”

 

कबीर ने पूछा—

 

“बस इतना?”

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

मीरा ने कहा—

 

“इसके लिए किसी एक को यहाँ रहना होगा।”

 

कबीर चुप हो गया।

 

रघुवीर आगे आया।

 

“इस बार मैं रहूँगा।”

 

मीरा ने अपने पिता की तरफ देखा।

 

“बहुत देर कर दी आपने।”

 

रघुवीर की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“मुझे माफ कर दो।”

 

मीरा कुछ नहीं बोली।

 

कबीर ने पूछा—

 

“लेकिन इस ट्रेन को खत्म कैसे करेंगे?”

 

रघुवीर ने कहा—

 

“ट्रेन किसी इंजन से नहीं चलती।”

 

“फिर?”

 

“यह डर से चलती है।”

 

कबीर समझ नहीं पाया।

 

रघुवीर ने कहा—

 

“जब कोई इंसान डरकर इसकी बात मानता है, ट्रेन मजबूत होती है। जब कोई इसके सामने खड़ा होकर कहता है कि उसे डर नहीं लगता, ट्रेन कमजोर होने लगती है।”

 

कबीर ने सामने देखा।

 

काली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।

 

उसकी खिड़कियों से दर्जनों चेहरे उसे देख रहे थे।

 

फिर वही बिना चेहरे वाली आकृति ट्रेन से बाहर निकली।

 

वह धीरे-धीरे कबीर की तरफ बढ़ी।

 

उसकी लाल आँखें चमक रही थीं।

 

उसने भारी आवाज़ में कहा—

 

“तुम वापस नहीं जा सकते।”

 

कबीर का शरीर काँपने लगा।

 

लेकिन उसने खुद को संभाला।

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुमने मेरा टिकट स्वीकार किया।”

 

कबीर ने अपनी जेब से टिकट निकाला।

 

उस पर अब लिखा था—

 

यात्री — कबीर शर्मा

 

लेकिन नीचे एक नई लाइन दिखाई दी—

 

“स्थिति — मृत।”

 

कबीर ने टिकट को देखा।

 

फिर उस आकृति की तरफ।

 

“अगर मैं मर चुका हूँ…”

 

उसने टिकट फाड़ दिया।

 

“…तो मैं डर क्यों रहा हूँ?”

 

आकृति कुछ पल के लिए स्थिर हो गई।

 

उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

 

कबीर ने जोर से कहा—

 

“मैं तुम्हारा यात्री नहीं हूँ!”

 

ट्रेन हिलने लगी।

 

सभी खिड़कियाँ काँपने लगीं।

 

अंदर बैठे यात्रियों की चीखें सुनाई देने लगीं।

 

आकृति पीछे हट गई।

 

कबीर ने और जोर से कहा—

 

“मैं तुम्हें स्वीकार नहीं करता!”

 

ट्रेन की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

 

मीरा चिल्लाई—

 

“सिग्नल!”

 

कबीर दौड़कर सिग्नल के पास पहुँचा।

 

लेकिन सिग्नल तक पहुँचने से पहले जमीन पर दर्जनों हाथ निकल आए।

 

उन्होंने कबीर के पैर पकड़ लिए।

 

वही पुराने यात्री।

 

वे सभी उसे नीचे खींच रहे थे।

 

“हमें छोड़कर मत जाओ!”

 

“हमें भी साथ ले चलो!”

 

“हम अकेले नहीं रहना चाहते!”

 

कबीर ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।

 

तभी रघुवीर दौड़कर आया।

 

उसने उन हाथों को रोक लिया।

 

“भागो!”

 

कबीर ने सिग्नल पकड़ लिया।

 

वह जाम था।

 

उसने पूरी ताकत लगाई।

 

सिग्नल हिला।

 

एक बार।

 

दो बार।

 

फिर अचानक—

 

क्लिक!

 

लाल बत्ती हरी हो गई।

 

पूरे स्टेशन में एक भयानक चीख गूँज उठी।

 

ट्रेन के पहिए अपने आप घूमने लगे।

 

काली आकृति चीखती हुई ट्रेन की तरफ खिंचने लगी।

 

“नहीं!”

 

उसने कबीर की तरफ हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन तभी मीरा उसके सामने आ गई।

 

“अब यह तुम्हारा घर नहीं है।”

 

आकृति ने मीरा को पकड़ने की कोशिश की।

 

रघुवीर बीच में आ गया।

 

“मेरी बेटी को छोड़ दो!”

 

एक तेज़ रोशनी चमकी।

 

और अगले ही पल रघुवीर और वह आकृति दोनों गायब हो गए।

 

ट्रेन भी धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

 

मीरा कबीर की तरफ देखने लगी।

 

“अब जाओ।”

 

“और तुम?”

 

मीरा मुस्कुराई।

 

“मेरा स्टेशन आ गया है।”

 

कबीर ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

 

लेकिन उसका हाथ हवा से गुजर गया।

 

मीरा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

 

“भैया… अगर कभी रात में कोई ट्रेन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए…”

 

“हाँ?”

 

“पीछे मत देखना।”

 

इतना कहकर मीरा भी गायब हो गई।

 

अचानक कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

जब उसने आँखें खोलीं—

 

वह देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर पड़ा था।

 

सुबह हो चुकी थी।

 

सूरज निकल रहा था।

 

रोहित उसके पास बैठा था।

 

“कबीर!”

 

कबीर ने उसे देखा।

 

“तू ठीक है?”

 

रोहित ने सिर हिलाया।

 

“हाँ। लेकिन तू पूरी रात गायब था।”

 

कबीर ने घड़ी देखी।

 

सुबह के 7:30 बजे थे।

 

उसने राहत की साँस ली।

 

“ट्रेन खत्म हो गई?”

 

रोहित ने कहा—

 

“कौन-सी ट्रेन?”

 

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुझे कुछ याद नहीं?”

 

रोहित ने सिर हिलाया।

 

कबीर ने सब कुछ बताना शुरू किया।

 

लेकिन तभी उसकी नजर प्लेटफॉर्म की दीवार पर पड़ी।

 

वहाँ एक नया पोस्टर लगा था।

 

“देवगढ़ स्टेशन पर नया प्लेटफॉर्म नंबर 4 अगले महीने शुरू होगा।”

 

कबीर ने पोस्टर को देखा।

 

उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—

 

“12:15 — पहली ट्रेन।”

 

कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“रोहित…”

 

“क्या?”

 

“चल यहाँ से।”

 

दोनों स्टेशन से बाहर निकलने लगे।

 

तभी पीछे से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

 

फूँऽऽऽऽऽ!

 

कबीर रुक गया।

 

रोहित ने कहा—

 

“पीछे मत देखना।”

 

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुझे कैसे पता?”

 

रोहित कुछ सेकंड चुप रहा।

 

फिर धीरे से मुस्कुराया।

 

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

“क्योंकि मैं भी उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

 

कबीर पीछे हट गया।

 

रोहित ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया।

 

उसकी हथेली पर एक पुराना टिकट था।

 

यात्री — रोहित वर्मा

 

सीट — 13

 

गंतव्य — देवगढ़

 

कबीर के चेहरे से सारी उम्मीद खत्म हो गई।

 

दूर स्टेशन की घड़ी ने 12:15 बजाए।

 

लेकिन सुबह के 7:30 बजे।

 

और उसी समय प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर एक ट्रेन आकर रुकी।

 

दरवाज़ा खुला।

 

अंदर से मीरा की आवाज़ आई—

 

“भैया… इस बार अकेले मत आना।”

 

ट्रेन की सारी खिड़कियों में एक साथ चेहरे दिखाई दिए।

 

उनमें एक चेहरा कबीर का था।

 

दूसरा रघुवीर का।

 

तीसरा मीरा का।

 

और चौथा—

 

रोहित का।

 

कबीर ने आखिरी बार ट्रेन की तरफ देखा।

 

फिर अंधेरे में एक बोर्ड चमका—

 

“आखिरी ट्रेन कभी खत्म नहीं होती।”

 

और ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ गई।

 

समाप्त।

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