हरिदास उस कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।उसके हाथ में तस्वीर थी और सामने आरव खड़ा था।
लेकिन वह आरव जैसा दिखते हुए भी आरव नहीं लग रहा था।
उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था। आंखें खुली थीं, मगर उनमें कोई चमक नहीं थी। उसके पीछे आठ काली परछाइयां खड़ी थीं।
हरिदास ने कांपती आवाज़ में पूछा, “आरव… तुम जिंदा हो?”
आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस अपना हाथ उठाया और दीवार की तरफ इशारा किया।
हरिदास ने पीछे देखा।
दीवार पर एक नई तस्वीर लगी थी।
उसमें देवेंद्र दिखाई दे रहा था।
वह उसी कमरे में खड़ा था।
लेकिन तस्वीर के अंदर।
हरिदास की सांस रुक गई।
“देवेंद्र!”
तभी तस्वीर के अंदर देवेंद्र ने अपना सिर उठाया।
उसके होंठ हिले।
“हरिदास… तस्वीर मत खींचना।”
अचानक तस्वीर के अंदर से चीख सुनाई दी।
और तस्वीर काली हो गई।
हरिदास पीछे हट गया।
आरव पहली बार बोला।
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
हरिदास ने उसे घूरकर देखा।
“तुम कौन हो?”
आरव मुस्कुराया।
“मैं वही हूं जिसे तुम ढूंढने आए थे।”
“आरव कहां है?”
आरव ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।
“वह अभी भी तस्वीर के अंदर है।”
हरिदास के हाथ से तस्वीर गिर गई।
“तो तुम कौन हो?”
आरव की मुस्कान गायब हो गई।
“मैं वह हूं जो हर तस्वीर के बाद पैदा होता है।”
कमरे की दीवारें अचानक कांपने लगीं।
पुरानी तस्वीरें फर्श पर गिरने लगीं।
हर तस्वीर में मौजूद लोग अब कमरे की तरफ देख रहे थे।
उनमें रघुवीर था।
मीरा थी।
तारा थी।
और कई अनजान चेहरे थे।
हरिदास ने समझ लिया कि ये सभी वही लोग थे जो वर्षों से इस घर की तस्वीरों में कैद थे।
लेकिन एक तस्वीर देखकर उसकी नजर जम गई।
उसमें उसकी पत्नी थी।
वही चेहरा।
वही साड़ी।
वही मुस्कान।
हरिदास की आंखों से आंसू निकल आए।
“सरिता…”
तस्वीर के अंदर उसकी पत्नी ने हाथ उठाया।
जैसे उसे बुला रही हो।
फिर तस्वीर के नीचे शब्द उभरने लगे—
“एक तस्वीर लो और उसे वापस ले जाओ।”
हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।
आरव ने उसे रोकना चाहा।
“ऐसा मत करना।”
हरिदास ने उसकी तरफ देखा।
“अगर मैं तस्वीर खींच लूं तो मेरी पत्नी वापस आ जाएगी?”
आरव ने कुछ नहीं कहा।
हरिदास समझ गया।
“झूठ बोल रहे हो।”
अचानक कमरे में एक और आवाज गूंजी।
“नहीं…”
आवाज़ उसकी पत्नी की थी।
“मैं सच कह रही हूं।”
हरिदास ने तस्वीर की तरफ देखा।
सरिता रो रही थी।
“बस एक तस्वीर…”
हरिदास कैमरा लेकर उसके सामने खड़ा हो गया।
उसकी उंगली शटर पर थी।
तभी उसे कुछ याद आया।
1998 की तस्वीर।
उसमें पांचवीं परछाई थी।
फिर आरव की तस्वीर में सात परछाइयां थीं।
फिर आठ।
आखिर हर तस्वीर के साथ परछाइयां बढ़ क्यों रही थीं?
हरिदास ने अचानक कैमरे की स्क्रीन देखी।
स्क्रीन पर वही पुरानी तस्वीर खुली थी।
उसने ज़ूम किया।
पहली बार उसने तस्वीर के पीछे की दीवार देखी।
वहां एक छोटा-सा आईना लगा था।
आईने में उस काली परछाई का चेहरा दिखाई दे रहा था।
लेकिन वह चेहरा किसी और का नहीं था।
वह तारा का था।
दस साल की बच्ची।
हरिदास ने देवेंद्र की बात याद की।
“तारा की मौत कमरे में हुई थी।”
उसने अचानक समझ लिया।
“तारा ही वो साया है!”
आरव ने सिर हिलाया।
“हां। लेकिन वह अकेली नहीं है।”
“तो बाकी लोग?”
“वे लोग उसके साथ फंस गए।”
हरिदास ने पूछा, “उन्हें आज़ाद कैसे करें?”
आरव ने दीवार की तरफ देखा।
“आख़िरी तस्वीर मिटानी होगी।”
“कौन-सी?”
“वह तस्वीर जो पहली तस्वीर से पहले खींची गई थी।”
हरिदास समझ नहीं पाया।
“पहली तस्वीर से पहले?”
आरव ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।
वहां एक लकड़ी का पुराना संदूक पड़ा था।
हरिदास ने उसे खोला।
अंदर पुराने कैमरे, निगेटिव और सैकड़ों तस्वीरें थीं।
सबसे नीचे एक काला लिफाफा रखा था।
उस पर लिखा था—
“तारा की आख़िरी तस्वीर।”
हरिदास ने लिफाफा खोला।
अंदर एक तस्वीर थी।
तारा अकेली खड़ी थी।
लेकिन उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।
हरिदास ने गौर से देखा।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“मैंने इसे नहीं बुलाया था। उसने मुझे बुलाया था।”
नीचे एक नाम लिखा था।
मीरा।
हरिदास चौंक गया।
“मीरा?”
आरव ने कहा, “तारा की मां।”
अचानक कमरे में तेज हवा चलने लगी।
दीवारों पर लगी सभी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।
औरत की चीख सुनाई दी।
फिर एक बच्ची रोने लगी।
“मां… तुमने ऐसा क्यों किया?”
हरिदास को सब समझ आने लगा।
मीरा ने किसी पुराने तांत्रिक से मदद लेकर अपनी बेटी को मौत से वापस लाने की कोशिश की थी।
लेकिन जो वापस आया था, वह तारा नहीं था।
वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने तस्वीरों के जरिए लोगों की आत्माओं को कैद करना शुरू कर दिया।
और हर नई तस्वीर उसे और शक्तिशाली बनाती गई।
हरिदास ने तारा की तस्वीर कैमरे के सामने रखी।
आरव चिल्लाया—
“जल्दी करो!”
हरिदास ने कैमरा उठाया।
तभी काली परछाई उसके सामने आ गई।
उसका चेहरा बदलने लगा।
पहले तारा।
फिर सरिता।
फिर आरव।
फिर हरिदास का अपना चेहरा।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”
हरिदास ने कैमरे का फ्लैश ऑन किया।
“शायद नहीं…”
उसने तस्वीर कैमरे के सामने रखी।
“…लेकिन तुम्हें तस्वीर में कैद तो कर सकता हूं।”
क्लिक!
एक तेज फ्लैश हुआ।
पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।
सभी परछाइयां चीखने लगीं।
दीवारों पर लगी तस्वीरें एक-एक करके फटने लगीं।
आरव जमीन पर गिर पड़ा।
देवेंद्र की तस्वीर टूटकर फर्श पर आ गिरी।
फिर आख़िरी चीख सुनाई दी।
तारा की।
“मुझे घर जाना है…”
और सब शांत हो गया।
कुछ देर बाद हरिदास ने आंखें खोलीं।
कमरा बिल्कुल खाली था।
न आरव।
न परछाइयां।
न तस्वीरें।
सिर्फ एक कैमरा फर्श पर पड़ा था।
हरिदास ने उसे उठाया।
उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।
उसने तस्वीर देखी।
उसमें तारा खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।
वह मुस्कुरा रही थी।
उसके पीछे कोई परछाई नहीं थी।
तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—
17 अगस्त 2026
और समय—
3:08 PM.
हरिदास ने राहत की सांस ली।
तभी उसके पीछे किसी ने कहा—
“काका…”
हरिदास जम गया।
वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
कमरे में कोई नहीं था।
उसने कैमरे की स्क्रीन देखी।
स्क्रीन पर एक नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।
उस तस्वीर में हरिदास खुद कमरे में खड़ा था।
और उसके पीछे…
एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।
हरिदास ने डरते हुए तस्वीर को ज़ूम किया।
वह तारा नहीं थी।
वह कोई और लड़की थी।
नीचे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“कहानी अभी खत्म नहीं हुई…”
अगली सुबह पुलिस को पुराने घर में हरिदास मिला।
वह जिंदा था।
लेकिन उसे कुछ याद नहीं था।
आरव का कोई पता नहीं चला।
देवेंद्र भी गायब था।
पुराना घर कुछ दिनों बाद तोड़ दिया गया।
मजदूरों ने मलबा हटाते समय एक पुराना कैमरा पाया।
पुलिस ने उसे सबूत समझकर थाने में रख दिया।
तीन दिन बाद एक पुलिसकर्मी ने कैमरा चालू किया।
उसमें सिर्फ एक तस्वीर थी।
एक खाली सड़क की।
सड़क के बीच एक आदमी खड़ा था।
आरव।
उसके हाथ में कैमरा था।
और उसके पीछे…
सैकड़ों परछाइयां खड़ी थीं।
तस्वीर के नीचे तारीख थी—
18 अगस्त 2026।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर पुलिस स्टेशन के अंदर से खींची गई थी।
और कैमरा…
पुलिस स्टेशन की अलमारी के अंदर बंद था।
उस दिन के बाद वह कैमरा हमेशा के लिए गायब कर दिया गया।
लेकिन कहते हैं, आज भी अगर कोई उस पुराने घर की जगह पर रात के ठीक 3:07 बजे तस्वीर खींचता है…
तो तस्वीर में उसके पीछे एक छोटी बच्ची दिखाई देती है।
वह मुस्कुराती है।
और तस्वीर के पीछे सिर्फ एक सवाल लिखा होता है—
“क्या तुम मेरी आख़िरी तस्वीर बनोगे?”
End

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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