सुबह के करीब सात बजे मकान मालिक हरिदास उस पुराने घर के सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
दरवाज़ा खुला था।
अंदर अजीब-सी खामोशी थी।
“आरव!” उसने आवाज लगाई।
कोई जवाब नहीं आया।
वह धीरे-धीरे अंदर गया। फर्श पर आरव का कैमरा पड़ा था। उसके पास मोबाइल भी था, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी थी।
हरिदास ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया।
कैमरे में सिर्फ एक आख़िरी तस्वीर थी।
उस तस्वीर को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
तस्वीर में आरव कमरे के बीचों-बीच खड़ा था।
उसके पीछे सात परछाइयां थीं।
हरिदास ने कैमरा तुरंत बंद कर दिया।
वह जानता था कि अब बहुत देर हो चुकी थी।
पच्चीस साल पहले भी ऐसा ही हुआ था।
लेकिन इस बार फर्क था।
पहली बार उस घर ने किसी बाहरी आदमी को नहीं, बल्कि आरव को चुना था।
हरिदास कैमरा लेकर सीधे घर से बाहर निकल गया।
उसे आरव को ढूंढना था।
लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था उस तस्वीर का सच पता लगाना।
वह शहर के पुराने हिस्से में रहने वाले एक बुजुर्ग आदमी के पास गया, जिसका नाम देवेंद्र था। देवेंद्र पहले उस घर के मालिक के परिवार के लिए काम करता था।
हरिदास ने कैमरा उसके सामने रख दिया।
देवेंद्र ने तस्वीर देखी।
कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल चुप रहा।
फिर उसने पूछा, “उसने ऊपर वाला कमरा खोल दिया था?”
हरिदास ने सिर हिलाया।
“नहीं। कमरा बाहर से बंद था। लेकिन उसने तस्वीर खींच ली थी।”
देवेंद्र ने लंबी सांस ली।
“तो फिर वही हुआ जिसका डर था।”
हरिदास ने बेचैनी से पूछा, “आप मुझे सब कुछ बताइए।”
देवेंद्र कुर्सी पर बैठ गया।
“1998 में उस घर में एक परिवार रहता था। घर का मालिक था रघुवीर। उसके साथ उसकी पत्नी मीरा, बेटा निखिल और दस साल की बेटी तारा रहती थी।”
हरिदास ध्यान से सुनता रहा।
“एक रात परिवार ने घर में एक तस्वीर खिंचवाई। उस तस्वीर में चार लोग थे। लेकिन तस्वीर निकलने के बाद उसमें पांचवां साया दिखाई दिया।”
“वही औरत?” हरिदास ने पूछा।
देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।
“हां।”
“फिर?”
“उस रात तारा गायब हो गई।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“अगली सुबह उसका शरीर घर के ऊपर वाले कमरे में मिला। लेकिन कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।”
हरिदास ने पूछा, “पुलिस?”
“पुलिस आई थी। मगर उन्हें कुछ समझ नहीं आया।”
देवेंद्र कुछ पल रुका।
“उसके बाद रघुवीर ने उस तस्वीर को जला दिया।”
“तो फिर यह तस्वीर?”
“तस्वीर जली थी… लेकिन खत्म नहीं हुई।”
हरिदास की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
देवेंद्र ने आगे कहा, “जिसने भी उस तस्वीर को दोबारा कैमरे में कैद किया, उसके साथ कुछ न कुछ हुआ।”
हरिदास ने कैमरा कसकर पकड़ लिया।
“आरव कहां है?”
देवेंद्र ने उसकी आंखों में देखा।
“जहां बाकी लोग हैं।”
“कहां?”
देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।
उसी समय कैमरे की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
दोनों चौंक गए।
स्क्रीन पर नई तस्वीर दिखाई दे रही थी।
आरव।
वह एक लंबे अंधेरे गलियारे में खड़ा था।
हरिदास ने घबराकर कहा, “यह तो उस घर में नहीं है।”
देवेंद्र तस्वीर के करीब गया।
“यह घर के अंदर ही है।”
“लेकिन ऐसा कोई गलियारा वहां नहीं है!”
देवेंद्र ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
फिर उसकी नजर तस्वीर के कोने पर पड़ी।
वहां दीवार पर एक पुरानी घड़ी थी।
घड़ी में समय था—
3:07.
देवेंद्र अचानक खड़ा हो गया।
“हमें तुरंत वहां जाना होगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि 3:07 वह समय है जब वह दरवाज़ा खुलता है।”
हरिदास ने घड़ी की तरफ देखा।
अभी सुबह के आठ बज रहे थे।
“तो हमारे पास समय है।”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाई।
तस्वीर में घड़ी की सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
3:03…
3:04…
3:05…
जैसे तस्वीर के अंदर समय चल रहा हो।
हरिदास की सांस अटक गई।
“यह कैसे संभव है?”
देवेंद्र ने कहा, “क्योंकि तस्वीर के अंदर भी समय चलता है।”
दोनों तुरंत घर की ओर लौटे।
ऊपर वाला कमरा अभी भी बंद था।
लेकिन अब दरवाज़े के नीचे से हल्की नीली रोशनी बाहर आ रही थी।
हरिदास ने दरवाज़े पर हाथ रखा।
अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।
“मुझे बाहर निकालो…”
हरिदास पीछे हट गया।
देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा, “आवाज़ का जवाब मत देना।”
फिर रोने की आवाज तेज हो गई।
“काका… मुझे बाहर निकालो…”
देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।
“तारा…”
हरिदास ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा खोल दिया।
कमरा खाली था।
वहां सिर्फ एक पुरानी लकड़ी की मेज थी।
मेज पर कई तस्वीरें रखी थीं।
हर तस्वीर में अलग-अलग लोग थे।
कुछ लोग परिवार के थे।
कुछ अनजान।
लेकिन हर तस्वीर में एक चीज समान थी।
पीछे वही काली परछाई।
हरिदास ने एक तस्वीर उठाई।
उसमें आरव था।
वह एक अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसकी आंखें बंद थीं।
उसके सामने एक लड़की खड़ी थी।
दस साल की।
पीली फ्रॉक पहने हुए।
देवेंद्र ने तस्वीर देखते ही कहा—
“तारा।”
अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।
धड़ाम!
कमरे की खिड़कियां अपने आप बंद हो गईं।
हरिदास ने दरवाज़ा खींचा।
“खुलो!”
कोई फायदा नहीं हुआ।
तभी मेज पर रखी तस्वीरों में हलचल होने लगी।
एक-एक करके तस्वीरों के अंदर मौजूद लोग अपना सिर घुमाने लगे।
हरिदास पीछे हट गया।
“ये… ये जिंदा हैं।”
देवेंद्र ने कहा, “नहीं।”
“तो फिर?”
“ये इंतजार कर रहे हैं।”
अचानक एक तस्वीर फर्श पर गिर गई।
उसमें आरव दिखाई दे रहा था।
इस बार उसकी आंखें खुली थीं।
वह सीधे कैमरे की तरफ देख रहा था।
और उसके होंठ हिल रहे थे।
हरिदास ने तस्वीर कान के पास कर ली।
बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—
“मुझे यहां से निकालो।”
हरिदास ने घबराकर कहा, “आरव!”
देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“उसकी आवाज पर भरोसा मत करो।”
“लेकिन वह आरव है!”
“हो सकता है।”
देवेंद्र ने तस्वीर को उलट दिया।
पीछे लिखा था—
“एक को बाहर निकालोगे, तो एक को अंदर जाना होगा।”
दोनों चुप हो गए।
तभी कमरे की दीवार पर एक नई तस्वीर दिखाई देने लगी।
जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दीवार पर तस्वीर चिपका दी हो।
तस्वीर में हरिदास और देवेंद्र खड़े थे।
उनके बीच आरव था।
लेकिन आरव के चेहरे पर मुस्कान थी।
हरिदास ने कांपते हुए कहा, “यह तस्वीर अभी खींची गई है?”
देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।
क्योंकि तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी।
17 अगस्त 2026।
और समय था—
3:07 PM.
हरिदास ने अपनी घड़ी देखी।
3:06 PM.
सिर्फ एक मिनट बाकी था।
तभी कमरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“किसे अंदर भेजोगे?”
हरिदास और देवेंद्र दोनों ने पीछे देखा।
वहां कोई नहीं था।
फिर वही आवाज आई—
“हरिदास…”
हरिदास जम गया।
आवाज़ उसकी मृत पत्नी की थी।
“हरिदास… मुझे बहुत साल हो गए हैं।”
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
देवेंद्र ने उसे पकड़ लिया।
“मत सुनो!”
लेकिन आवाज अब बिल्कुल उसके कान के पास थी।
“बस एक तस्वीर खिंचवा दो…”
3:07.
अचानक कैमरा अपने आप उठ गया।
फ्लैश चमका।
कमरा पूरी तरह सफेद रोशनी में डूब गया।
जब रोशनी गायब हुई, देवेंद्र वहां नहीं था।
हरिदास अकेला खड़ा था।
मेज पर एक नई तस्वीर पड़ी थी।
उसने कांपते हाथों से तस्वीर उठाई।
तस्वीर में वह खुद खड़ा था।
उसके पीछे देवेंद्र था।
और उनके बीच…
आरव मुस्कुरा रहा था।
हरिदास ने तस्वीर पलटी।
पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“अब तीसरी तस्वीर तुम्हें खींचनी है।”
उसी क्षण कमरे के कोने से कैमरे की क्लिक की आवाज आई।
हरिदास ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
वहां आरव खड़ा था।
लेकिन उसके पीछे सात नहीं…
आठ परछाइयां थीं।
और उनमें से एक परछाई धीरे-धीरे हरिदास की तरफ बढ़ रही थी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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