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आखिरी ट्रेन का यात्री (भाग 1)

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर के बाहर एक पुराना रेलवे स्टेशन था—देवगढ़ स्टेशन।

 

कभी इस स्टेशन पर दिन-रात यात्रियों की भीड़ रहती थी। लेकिन पिछले दस वर्षों से यहाँ सिर्फ कुछ गिनी-चुनी ट्रेनें रुकती थीं। रात होते ही स्टेशन लगभग सुनसान हो जाता था।

 

स्टेशन की सबसे अजीब बात थी प्लेटफॉर्म नंबर 3।

 

वहाँ अब कोई ट्रेन नहीं रुकती थी।

 

रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक उस प्लेटफॉर्म की पटरी कई साल पहले बंद कर दी गई थी। उसके आगे की रेलवे लाइन भी टूट चुकी थी।

 

फिर भी गाँव के लोग कहते थे कि हर रात ठीक 12:15 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर एक ट्रेन आती है।

 

एक ऐसी ट्रेन, जिसका कोई नंबर नहीं था।

 

कोई टाइमटेबल नहीं था।

 

और सबसे डरावनी बात—

 

उस ट्रेन में बैठने वाला कोई भी यात्री फिर कभी वापस नहीं आता था।

 

लोग इसे अफवाह मानते थे।

 

लेकिन कबीर अफवाहों पर विश्वास नहीं करता था।

 

कबीर 27 साल का एक स्वतंत्र पत्रकार था। उसे अजीब घटनाओं की सच्चाई पता लगाने का शौक था। कुछ दिनों पहले उसे देवगढ़ स्टेशन के बारे में एक ईमेल मिला था।

 

ईमेल में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

 

“अगर हिम्मत है तो 15 अगस्त की रात 12:15 बजे देवगढ़ स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आना।”

 

नीचे कोई नाम नहीं था।

 

कबीर ने पहले इसे मज़ाक समझा।

 

फिर उसे उसी ईमेल के साथ एक तस्वीर मिली।

 

तस्वीर में एक पुरानी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी थी।

 

तस्वीर धुंधली थी, लेकिन ट्रेन की खिड़की के पास एक आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

 

वह आदमी सीधे कैमरे की ओर देख रहा था।

 

कबीर को तस्वीर में कुछ अजीब लगा।

 

उस आदमी का चेहरा बिल्कुल वैसा था जैसे कोई कई दिनों से सोया न हो।

 

आँखें पूरी तरह काली।

 

और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।

 

कबीर ने तस्वीर ज़ूम की।

 

ट्रेन के शीशे पर किसी ने उंगली से लिखा था—

 

“अगला यात्री तुम हो।”

 

उस रात कबीर देवगढ़ स्टेशन पहुँच गया।

 

समय था रात के 11:40।

 

पूरा स्टेशन सुनसान था।

 

टिकट खिड़की बंद थी।

 

चाय की दुकान बंद थी।

 

स्टेशन मास्टर का कमरा भी अंधेरे में डूबा हुआ था।

 

कबीर प्लेटफॉर्म नंबर 3 की तरफ बढ़ा।

 

वहाँ पहुँचते ही उसे अजीब ठंड महसूस हुई।

 

अगस्त की गर्म रात थी, लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर हवा बर्फ जैसी ठंडी थी।

 

कबीर ने मोबाइल निकाला।

 

नेटवर्क गायब था।

 

उसने घड़ी देखी।

 

11:52।

 

अचानक पीछे से आवाज़ आई—

 

“आप भी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं?”

 

कबीर ने तुरंत पीछे देखा।

 

एक बूढ़ा आदमी बेंच पर बैठा था।

 

उसने काला कोट पहन रखा था।

 

कबीर ने पूछा, “आप यहाँ इतनी रात को?”

 

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

 

उसने सिर्फ सामने पटरी की ओर देखा।

 

“पहली बार आए हो?”

 

“हाँ।”

 

बूढ़ा धीरे से मुस्कुराया।

 

“तो एक बात याद रखना।”

 

“क्या?”

 

“जब ट्रेन आए, तो उसमें मत बैठना।”

 

कबीर हँस पड़ा।

 

“आप भी उस ट्रेन की कहानी जानते हैं?”

 

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“कहानी नहीं है।”

 

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

 

“मैं उस ट्रेन में जा चुका हूँ।”

 

कबीर की हँसी रुक गई।

 

“क्या मतलब?”

 

बूढ़े ने अपनी आस्तीन ऊपर की।

 

उसकी कलाई पर एक काला निशान था।

 

निशान किसी टिकट की मुहर जैसा दिखाई दे रहा था।

 

“मैं पच्चीस साल पहले उस ट्रेन में बैठा था।”

 

“फिर?”

 

बूढ़े ने स्टेशन की घड़ी की ओर देखा।

 

12:03।

 

“फिर मैं वापस आया।”

 

कबीर ने राहत की साँस ली।

 

“तो फिर डर किस बात का?”

 

बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

 

“क्योंकि मेरे हिसाब से मैं सिर्फ तीन मिनट के लिए गया था।”

 

कबीर चुप हो गया।

 

बूढ़े ने आगे कहा—

 

“लेकिन जब मैं वापस आया, तब यहाँ पच्चीस साल बीत चुके थे।”

 

कबीर के चेहरे का रंग बदल गया।

 

“यह कैसे संभव है?”

 

बूढ़ा कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्लेटफॉर्म की सारी लाइटें बुझ गईं।

 

अंधेरा।

 

पूरे स्टेशन पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि कबीर को अपनी साँसें सुनाई देने लगीं।

 

फिर दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

 

फूँऽऽऽऽऽऽ!

 

कबीर ने पटरी की ओर देखा।

 

दूर अंधेरे में एक छोटी-सी पीली रोशनी दिखाई दी।

 

धीरे-धीरे वह रोशनी बड़ी होने लगी।

 

ट्रेन आ रही थी।

 

लेकिन उसकी आवाज़ अजीब थी।

 

पहिए पटरी पर चलने की आवाज़ नहीं कर रहे थे।

 

ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत भारी चीज़ जमीन पर घसीटी जा रही हो।

 

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

 

दरवाज़े अपने आप खुल गए।

 

कबीर ने ट्रेन के ऊपर देखा।

 

वहाँ कोई नंबर नहीं था।

 

कोई नाम नहीं।

 

सिर्फ काले रंग में एक शब्द लिखा था—

 

“अंतिम।”

 

कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

 

बूढ़ा वहाँ नहीं था।

 

बेंच खाली थी।

 

कबीर घबरा गया।

 

“बाबा?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

फिर ट्रेन के अंदर से आवाज़ आई—

 

“कबीर…”

 

कबीर जम गया।

 

उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

 

फिर आवाज़ आई—

 

“कबीर… अंदर आओ।”

 

आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी।

 

बिल्कुल उसी बूढ़े की।

 

कबीर ने ट्रेन की खिड़की से अंदर देखा।

 

अंदर लगभग दस यात्री बैठे थे।

 

सभी बिल्कुल शांत।

 

कोई मोबाइल नहीं चला रहा था।

 

कोई बात नहीं कर रहा था।

 

सभी की नजरें नीचे थीं।

 

कबीर ने देखा कि हर यात्री के हाथ में एक पुराना टिकट था।

 

फिर उसकी नजर सबसे आखिरी सीट पर गई।

 

वहाँ वही आदमी बैठा था जो उसे उस ईमेल वाली तस्वीर में दिखाई दिया था।

 

काली आँखें।

 

हल्की मुस्कान।

 

वह धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा।

 

कबीर पीछे हट गया।

 

तभी उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

 

“ट्रेन में मत बैठना।”

 

कबीर ने राहत की साँस ली।

 

लेकिन अगले ही सेकंड दूसरा मैसेज आया।

 

“क्योंकि अगर तुम नहीं बैठे… तो वह खुद उतर जाएगी।”

 

कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

ट्रेन की सीटी फिर बजी।

 

फूँऽऽऽऽ!

 

दरवाज़ा बंद होने लगा।

 

तभी अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

 

सभी की आँखें काली थीं।

 

और सभी कबीर को देख रहे थे।

 

फिर आखिरी सीट पर बैठा आदमी मुस्कुराया।

 

उसने अपना टिकट खिड़की से बाहर फेंक दिया।

 

टिकट कबीर के पैरों के पास आकर गिरा।

 

कबीर ने काँपते हाथों से टिकट उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

यात्री: कबीर शर्मा

 

सीट: 13

 

गंतव्य: देवगढ़

 

कबीर ने घबराकर ट्रेन की तरफ देखा।

 

ट्रेन चलने लगी थी।

 

लेकिन दरवाज़े के पास कोई खड़ा था।

 

वही बूढ़ा आदमी।

 

उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और इशारा किया—

 

अंदर आ जाओ।

 

और तभी कबीर ने देखा कि बूढ़े के पीछे ट्रेन के दरवाज़े पर एक और आदमी खड़ा था।

 

वह बिल्कुल कबीर जैसा दिखता था।

 

उसी चेहरे के साथ।

 

उसी कपड़ों में।

 

लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

वह मुस्कुराया और होंठ हिलाए—

 

“तुम देर कर चुके हो।”

 

ट्रेन अंधेरे में गायब हो गई।

 

और प्लेटफॉर्म नंबर 3 की घड़ी रुक गई।

 

12:15।

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