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आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 2

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

कबीर कुछ देर तक प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ा रहा।

 

ट्रेन जा चुकी थी।

 

लेकिन उसके कानों में अभी भी पहियों की आवाज़ गूँज रही थी।

 

उसने अपने हाथ में पकड़े टिकट को फिर से देखा।

 

यात्री — कबीर शर्मा

सीट — 13

गंतव्य — देवगढ़

 

कबीर की उंगलियाँ काँप रही थीं।

 

“यह किसी का मज़ाक है,” उसने खुद से कहा।

 

लेकिन उसकी आवाज़ में खुद उसे भी भरोसा नहीं था।

 

कुछ देर पहले जिस बूढ़े आदमी से उसकी बात हुई थी, वह अचानक गायब हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर उसके अलावा कोई नहीं था।

 

कबीर ने मोबाइल निकाला।

 

नेटवर्क वापस आ चुका था।

 

उसने तुरंत अपने दोस्त रोहित को फोन लगाया।

 

एक बार घंटी गई।

 

दो बार।

 

तीन बार।

 

फिर कॉल उठ गई।

 

“हाँ कबीर?”

 

रोहित की आवाज़ नींद में डूबी हुई थी।

 

कबीर ने जल्दी-जल्दी सारी घटना बताई।

 

कुछ सेकंड तक रोहित चुप रहा।

 

फिर उसने पूछा, “तू अभी देवगढ़ स्टेशन पर है?”

 

“हाँ।”

 

“तुरंत वहाँ से निकल।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैंने अभी तेरे नंबर से एक फोटो रिसीव की है।”

 

कबीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

“क्या फोटो?”

 

रोहित ने जवाब नहीं दिया।

 

कुछ सेकंड बाद कबीर के मोबाइल पर वही फोटो आ गई।

 

कबीर ने फोटो खोली।

 

उसकी साँस रुक गई।

 

फोटो में वही ट्रेन थी।

 

लेकिन इस बार तस्वीर बाहर से नहीं ली गई थी।

 

तस्वीर ट्रेन के अंदर से ली गई थी।

 

और तस्वीर में सीट नंबर 13 पर कोई बैठा हुआ था।

 

कबीर।

 

वह खुद।

 

उसने वही काली जैकेट पहन रखी थी।

 

वही घड़ी।

 

वही बैग।

 

लेकिन तस्वीर में बैठा कबीर कैमरे की तरफ नहीं देख रहा था।

 

वह खिड़की के बाहर देख रहा था।

 

कबीर ने घबराकर मोबाइल नीचे कर लिया।

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

रोहित ने पूछा, “क्या हुआ?”

 

“फोटो किसने भेजी?”

 

“तेरे ही नंबर से।”

 

कबीर के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

 

तभी प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

 

ठक…

 

ठक…

 

ठक…

 

कबीर ने धीरे से सिर उठाया।

 

अंधेरे में कोई उसकी ओर आ रहा था।

 

वह बूढ़ा आदमी था।

 

कबीर पीछे हट गया।

 

“आप?”

 

बूढ़ा कुछ नहीं बोला।

 

वह उसके पास आया और धीरे से बोला—

 

“तुमने टिकट उठा लिया।”

 

कबीर ने टिकट जेब में रख लिया।

 

“आपको कैसे पता?”

 

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि अब वह तुम्हें ढूँढ रही है।”

 

“कौन?”

 

बूढ़े ने प्लेटफॉर्म के पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

 

“ट्रेन की मालकिन।”

 

कबीर ने घबराकर पूछा, “कौन है वह?”

 

बूढ़े ने जवाब देने के बजाय पूछा—

 

“तुमने ट्रेन के आखिरी डिब्बे को देखा था?”

 

कबीर ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“अच्छा हुआ।”

 

“क्यों?”

 

बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—

 

“क्योंकि वहाँ जो बैठा है, वह यात्री नहीं है।”

 

अचानक स्टेशन की सारी लाइटें फिर से बुझ गईं।

 

कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

 

बूढ़ा सामने खड़ा था।

 

लेकिन अब उसके चेहरे पर डर था।

 

“हमें यहाँ से जाना होगा।”

 

“क्यों?”

 

बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—

 

“क्योंकि अगली ट्रेन आने वाली है।”

 

कबीर ने घड़ी देखी।

 

12:28।

 

“लेकिन ट्रेन तो अभी गई है।”

 

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“वह ट्रेन नहीं थी।”

 

“क्या मतलब?”

 

“वह सिर्फ उसका रास्ता था।”

 

अचानक पटरी के नीचे से आवाज़ आई।

 

जैसे लोहे के नीचे कोई चीज़ खरोंच रही हो।

 

खर्र…

 

खर्र…

 

खर्र…

 

कबीर और बूढ़ा दोनों पीछे हट गए।

 

फिर पटरी के बीच से काला धुआँ निकलने लगा।

 

धुआँ ऊपर उठकर एक इंसानी आकार बनाने लगा।

 

धीरे-धीरे उस धुएँ में एक चेहरा दिखाई दिया।

 

एक औरत का चेहरा।

 

चेहरा सफेद था।

 

आँखें बंद थीं।

 

लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

 

वह कुछ कह रही थी।

 

कबीर ने ध्यान से सुना।

 

“सीट… नंबर… तेरह…”

 

कबीर की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

 

उसने जेब से टिकट निकालकर फाड़ना चाहा।

 

लेकिन टिकट फट नहीं रहा था।

 

उसने दोनों हाथों से जोर लगाया।

 

कुछ नहीं हुआ।

 

फिर टिकट पर लिखे शब्द बदलने लगे।

 

यात्री — कबीर शर्मा

 

धीरे-धीरे नाम गायब हुआ।

 

उसकी जगह नया नाम दिखाई दिया—

 

यात्री — रघुवीर सिंह

 

कबीर ने बूढ़े की तरफ देखा।

 

बूढ़े का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

 

“रघुवीर सिंह कौन है?”

 

बूढ़े ने कुछ नहीं कहा।

 

कबीर ने उसका कंधा पकड़ लिया।

 

“बताइए!”

 

बूढ़े ने आखिरकार कहा—

 

“इस स्टेशन का पहला स्टेशन मास्टर।”

 

“और?”

 

“पच्चीस साल पहले उसकी बेटी ट्रेन में गायब हुई थी।”

 

“कौन-सी ट्रेन में?”

 

बूढ़े ने प्लेटफॉर्म नंबर 3 की ओर देखा।

 

“इसी ट्रेन में।”

 

अचानक दूर से सीटी की आवाज़ आई।

 

फूँऽऽऽऽऽ!

 

कबीर ने देखा।

 

इस बार ट्रेन पटरी पर नहीं आ रही थी।

 

वह अंधेरे के अंदर से जैसे हवा में तैरती हुई प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही थी।

 

उसकी खिड़कियों में कोई रोशनी नहीं थी।

 

सिर्फ एक खिड़की में हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

 

सीट नंबर 13।

 

बूढ़े ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

 

“भागो!”

 

दोनों प्लेटफॉर्म से बाहर की तरफ दौड़ने लगे।

 

लेकिन कुछ कदम बाद कबीर रुक गया।

 

उसे किसी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

 

“माँ…”

 

आवाज़ प्लेटफॉर्म नंबर 3 से आ रही थी।

 

फिर वही आवाज़ आई—

 

“माँ… मुझे घर जाना है…”

 

कबीर ने पीछे देखा।

 

ट्रेन खड़ी थी।

 

उसका दरवाज़ा खुला हुआ था।

 

दरवाज़े पर लगभग आठ साल की एक बच्ची खड़ी थी।

 

उसने लाल फ्रॉक पहन रखी थी।

 

उसके हाथ में एक पुराना खिलौना था।

 

वह सीधे कबीर को देख रही थी।

 

“भैया…”

 

कबीर कुछ नहीं बोला।

 

बच्ची ने पूछा—

 

“क्या आप मुझे घर छोड़ देंगे?”

 

बूढ़ा चिल्लाया—

 

“उसकी तरफ मत देखो!”

 

लेकिन देर हो चुकी थी।

 

बच्ची मुस्कुराई।

 

उसके चेहरे की त्वचा धीरे-धीरे काली पड़ने लगी।

 

उसकी आँखें खुलीं।

 

आँखों की जगह सिर्फ गहरा अंधेरा था।

 

और उसके मुँह से इंसानी आवाज़ नहीं निकली।

 

एक भारी, गहरी आवाज़ आई—

 

“सीट नंबर 13 खाली है।”

 

ट्रेन का दरवाज़ा अचानक पूरी तरह खुल गया।

 

अंदर बैठे सभी यात्रियों ने एक साथ अपना सिर उठाया।

 

फिर सभी ने एक साथ कहा—

 

“कबीर…”

 

कबीर पीछे हट गया।

 

लेकिन उसके पीछे कोई खड़ा था।

 

उसने धीरे से गर्दन घुमाई।

 

वही आदमी।

 

जो बिल्कुल उसके जैसा दिखता था।

 

काली आँखें।

 

चेहरे पर मुस्कान।

 

उसने कबीर के कान के पास आकर कहा—

 

“एक कबीर ट्रेन में जा चुका है।”

 

फिर उसने अपनी उंगली कबीर की ओर की।

 

“अब दूसरे की बारी है।”

 

कबीर चीखकर भागा।

 

लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।

 

उसने नीचे देखा।

 

उसके जूते के फीते नहीं थे।

 

उनकी जगह काले बालों की लंबी लटें उसके पैरों से लिपटी थीं।

 

वे बाल पटरी के नीचे से निकल रहे थे।

 

कबीर ने पूरी ताकत से पैर छुड़ाया।

 

और अचानक वह जमीन पर गिर पड़ा।

 

जब उसने आँखें खोलीं, सुबह हो चुकी थी।

 

सूरज निकल चुका था।

 

प्लेटफॉर्म नंबर 3 खाली था।

 

ट्रेन गायब थी।

 

बूढ़ा भी गायब था।

 

कबीर ने राहत की साँस ली।

 

वह खड़ा हुआ और स्टेशन से बाहर जाने लगा।

 

तभी उसकी नजर स्टेशन की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

 

तस्वीर में स्टेशन के पुराने कर्मचारी खड़े थे।

 

नीचे तारीख लिखी थी—

 

15 अगस्त 2001

 

कबीर की नजर तस्वीर के बीच में खड़े एक आदमी पर टिक गई।

 

वह बूढ़ा आदमी था।

 

वही चेहरा।

 

वही कपड़े।

 

वही आँखें।

 

लेकिन तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

 

रघुवीर सिंह — स्टेशन मास्टर

 

कबीर के हाथ से मोबाइल गिर गया।

 

क्योंकि तस्वीर में रघुवीर सिंह की उम्र लगभग तीस साल थी।

 

और तस्वीर के पीछे लाल स्याही से किसी ने लिखा था—

 

“वह आज भी अपनी बेटी का इंतज़ार कर रहा है।”

 

उसी क्षण कबीर के मोबाइल में एक नया मैसेज आया।

 

मैसेज उसी अज्ञात नंबर से था।

 

सिर्फ एक लाइन—

 

“आज रात 12:15 बजे सीट नंबर 13 पर बैठना मत भूलना।”

 

और उसके नीचे एक तस्वीर थी।

 

कबीर ने तस्वीर खोली।

 

उसमें वह खुद स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा हुआ था।

 

लेकिन तस्वीर में रात नहीं थी।

 

तस्वीर में सुबह थी।

 

और उसके पीछे खड़ी ट्रेन की खिड़की से एक छोटी बच्ची उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।

 

 

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