सुबह के लगभग सात बजे कबीर देवगढ़ स्टेशन से बाहर निकला, लेकिन उसके कदम आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे।
उसके हाथ में अभी भी वही तस्वीर थी।
तस्वीर में वह खुद प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर बैठा था। उसके पीछे वही रहस्यमयी ट्रेन खड़ी थी और खिड़की के अंदर लाल कपड़े पहने एक छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।
कबीर ने तस्वीर को कई बार देखा।
फिर उसने उसे डिलीट कर दिया।
लेकिन कुछ सेकंड बाद वही तस्वीर दोबारा उसकी गैलरी में दिखाई देने लगी।
कबीर का दिल बैठ गया।
उसने फोन बंद कर दिया।
“यह सब मेरे दिमाग का वहम है,” उसने खुद से कहा।
लेकिन तभी उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
समय था—
12:15 PM
और स्क्रीन पर एक शब्द लिखा था—
“आओ।”
कबीर ने तुरंत फोन बंद कर दिया।
वह स्टेशन से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आया। वहाँ एक ऑटो खड़ा था।
“शहर चलोगे?” कबीर ने पूछा।
ऑटो वाले ने उसकी तरफ देखा और तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
ड्राइवर ने स्टेशन की तरफ देखा।
“आप रात में प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर गए थे?”
कबीर चुप हो गया।
ड्राइवर ने डरते हुए कहा—
“तो फिर मेरे ऑटो में मत बैठिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि ऐसे लोग ज्यादा दूर नहीं जाते।”
यह सुनकर कबीर पीछे हट गया।
“आपको कैसे पता?”
ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने ऑटो स्टार्ट किया और तेज़ी से वहाँ से चला गया।
कबीर सड़क किनारे अकेला खड़ा रह गया।
कुछ देर बाद उसे एक बस मिली और वह शहर लौट आया।
घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले रोहित को बुलाया।
रोहित ने कबीर को देखते ही पूछा—
“तू ठीक है?”
“मुझे नहीं पता।”
“सब कुछ शुरू से बता।”
कबीर ने उसे ट्रेन, बूढ़े आदमी, बच्ची और टिकट की पूरी कहानी बताई।
रोहित ध्यान से सुनता रहा।
फिर उसने लैपटॉप खोला।
“मैंने कल रात से उस ट्रेन के बारे में खोजबीन की है।”
उसने स्क्रीन पर एक पुरानी अखबार की कटिंग दिखाई।
शीर्षक था—
“देवगढ़ स्टेशन से 13 यात्री रहस्यमय तरीके से लापता।”
खबर की तारीख थी—
16 अगस्त 2001।
कबीर ने खबर पढ़नी शुरू की।
15 अगस्त की रात देवगढ़ स्टेशन पर एक ट्रेन आई थी।
ट्रेन का कोई नंबर नहीं था।
उसमें तेरह यात्री सवार हुए थे।
सुबह स्टेशन पर ट्रेन तो मिली, लेकिन उसमें कोई यात्री नहीं था।
सिर्फ तेरह पुराने टिकट मिले थे।
रेलवे ने इसे दुर्घटना मानकर मामला बंद कर दिया।
लेकिन उसी खबर में एक और बात लिखी थी।
स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह की आठ वर्षीय बेटी मीरा भी उस रात गायब हुई थी।
कबीर ने तुरंत पूछा—
“मीरा?”
रोहित ने सिर हिलाया।
“हाँ। वही बच्ची।”
“तो वह ट्रेन में गई थी?”
“शायद।”
रोहित ने दूसरी फाइल खोली।
उसमें एक पुरानी फोटो थी।
एक छोटी बच्ची।
लाल फ्रॉक।
हाथ में लकड़ी का खिलौना।
कबीर की साँस अटक गई।
“यही है।”
रोहित ने कहा—
“इसका नाम मीरा सिंह था।”
कबीर ने फोटो को ध्यान से देखा।
मीरा की आँखें बिल्कुल सामान्य थीं।
लेकिन फोटो के पीछे किसी ने पेंसिल से लिखा था—
“मीरा कभी ट्रेन में नहीं गई थी।”
कबीर ने चौंककर पूछा—
“फिर?”
रोहित ने कहा—
“यही सबसे बड़ा रहस्य है।”
उसने एक और दस्तावेज़ खोला।
यह पुलिस की पुरानी रिपोर्ट थी।
रिपोर्ट में लिखा था कि मीरा के गायब होने से पहले स्टेशन मास्टर रघुवीर सिंह ने पुलिस को बताया था कि उसे कई दिनों से एक अजीब ट्रेन दिखाई दे रही थी।
लेकिन उस समय रेलवे अधिकारियों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।
रघुवीर का दावा था कि ट्रेन हमेशा 12:15 पर आती थी।
और हर बार उसकी खिड़की में एक बच्ची दिखाई देती थी।
वही बच्ची।
मीरा।
कबीर ने कहा—
“लेकिन मीरा तो पहले से गायब हो चुकी थी?”
रोहित ने सिर हिलाया।
“यही तो सवाल है।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर कबीर को अपने बैग में कुछ महसूस हुआ।
उसने बैग खोला।
अंदर एक पुराना टिकट पड़ा था।
कबीर ने उसे बाहर निकाला।
टिकट पर लिखा था—
देवगढ़ से — अज्ञात स्थान
यात्री — मीरा
सीट — 13
कबीर ने टिकट देखते ही उसे फेंक दिया।
लेकिन टिकट जमीन पर गिरने के बजाय सीधे मेज पर जा गिरा।
और उसके ऊपर एक नया शब्द उभर आया—
“मुझे ढूँढो।”
रोहित ने पीछे हटते हुए कहा—
“इसे मत छूना।”
लेकिन कबीर ने टिकट उठा लिया।
अचानक कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।
खिड़की अपने आप खुल गई।
बाहर तेज़ हवा चलने लगी।
फिर किसी बच्ची की आवाज़ आई—
“भैया…”
कबीर जम गया।
आवाज़ कमरे के अंदर से आई थी।
“भैया… मुझे घर जाना है।”
रोहित ने काँपते हुए कहा—
“कबीर… पीछे मत देखना।”
लेकिन कबीर ने पीछे देख लिया।
कमरे के दरवाज़े के पास मीरा खड़ी थी।
लाल फ्रॉक।
हाथ में लकड़ी का खिलौना।
चेहरा सफेद।
आँखें काली।
कबीर ने धीरे से पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं मीरा हूँ।”
“तुम चाहती क्या हो?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“मुझे घर जाना है।”
“तुम्हारा घर कहाँ है?”
उसने हाथ उठाकर खिड़की की ओर इशारा किया।
“ट्रेन में।”
कबीर ने डरते हुए पूछा—
“तुम ट्रेन में क्यों हो?”
मीरा का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“क्योंकि पापा ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
रोहित ने पूछा—
“किसने?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“रघुवीर ने।”
कबीर को कुछ समझ नहीं आया।
“लेकिन रघुवीर तुम्हारे पिता थे।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“उन्होंने तुम्हें ट्रेन में क्यों बंद किया?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
उसने बस अपना खिलौना जमीन पर रख दिया।
खिलौने के अंदर से एक पुरानी चाबी निकली।
“प्लेटफॉर्म के नीचे कमरा है।”
कबीर ने चाबी उठाई।
मीरा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
“वहाँ सबूत है।”
“किस चीज़ का?”
मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“उस रात ट्रेन में कौन गया था… और कौन नहीं गया था।”
इतना कहकर वह गायब हो गई।
कमरे की लाइटें वापस जल गईं।
रोहित ने काँपती आवाज़ में कहा—
“हमें पुलिस को बताना चाहिए।”
कबीर ने सिर हिलाया।
“पहले हमें वह कमरा ढूँढना होगा।”
रात तक दोनों देवगढ़ स्टेशन वापस पहुँच गए।
इस बार वे प्लेटफॉर्म नंबर 3 के नीचे बने पुराने हिस्से में गए।
वहाँ जंग लगा एक छोटा दरवाज़ा था।
कबीर ने चाबी लगाई।
क्लिक!
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।
सीढ़ियों से बदबू आ रही थी।
जैसे वहाँ वर्षों से कोई बंद पड़ा हो।
दोनों टॉर्च जलाकर नीचे उतरने लगे।
नीचे एक लंबा कमरा था।
दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।
हर तस्वीर में एक यात्री था।
कबीर एक-एक करके तस्वीरें देखने लगा।
कुछ चेहरे पुराने थे।
कुछ नए।
लेकिन हर तस्वीर के नीचे एक तारीख थी।
2001…
2005…
2012…
2018…
2024…
कबीर अचानक रुक गया।
आखिरी तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—
15 अगस्त 2026।
तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ एक खाली कुर्सी थी।
उसके नीचे लिखा था—
“यात्री अभी बाकी है।”
रोहित ने फुसफुसाकर कहा—
“कबीर… इधर देख।”
कमरे के दूसरे कोने में एक पुराना रजिस्टर पड़ा था।
कबीर ने उसे खोला।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“इस ट्रेन में तेरह यात्री नहीं जाते।”
अगली लाइन थी—
“हर बार बारह जाते हैं।”
कबीर ने पन्ना पलटा।
अगले पन्ने पर लिखा था—
“तेरहवाँ यात्री हमेशा वही होता है जिसे ट्रेन खुद चुनती है।”
कबीर की नजर आखिरी लाइन पर गई।
उसका दिल रुक-सा गया।
क्योंकि वहाँ आज की तारीख के सामने नाम लिखा था—
कबीर शर्मा।
अचानक ऊपर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।
फूँऽऽऽऽऽ!
रोहित चिल्लाया—
“लेकिन अभी तो 11:50 हैं!”
कबीर ने घड़ी देखी।
12:14।
सिर्फ एक मिनट बाकी था।
दोनों सीढ़ियों की तरफ भागे।
लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।
ऊपर से किसी ने उसे बाहर से बंद कर दिया था।
फिर कमरे में अंधेरा हो गया।
कबीर ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर अंधेरे में किसी ने फुसफुसाया—
“सीट नंबर 13 तैयार है।”
कबीर ने धीरे से पीछे देखा।
कमरे के बीचों-बीच वही पुरानी कुर्सी अब मौजूद नहीं थी।
उसकी जगह एक रेलवे सीट थी।
और सीट पर कोई बैठा था।
कबीर जैसा चेहरा।
काली आँखें।
वही मुस्कान।
उसने धीरे से कहा—
“इस बार तुम नहीं बचोगे।”
ऊपर से ट्रेन की सीटी बजी।
12:15।
और बंद कमरे के अंदर अचानक ट्रेन चलने की आवाज़ आने लगी।
कबीर ने नीचे देखा।
फर्श गायब हो चुका था।
उसके नीचे सिर्फ काला अंधेरा था।
और उसी अंधेरे से दर्जनों आवाज़ें एक साथ आईं—
“अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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