“अगला यात्री… कबीर शर्मा…”
कमरे में गूँजती आवाज़ के साथ ही कबीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।
वह और रोहित किसी गहरी खाई में गिरने लगे।
कबीर ने चीखते हुए रोहित का हाथ पकड़ लिया।
कुछ सेकंड तक दोनों नीचे गिरते रहे।
फिर अचानक—
धड़ाम!
कबीर किसी कठोर चीज़ पर आकर गिरा।
उसने आँखें खोलीं।
वह एक ट्रेन के अंदर था।
रोहित उसके पास पड़ा था।
दोनों उठने की कोशिश करने लगे।
कबीर ने चारों तरफ देखा।
वह वही ट्रेन थी।
वही काली ट्रेन।
वही पीली रोशनी।
वही पुराने यात्री।
लेकिन इस बार ट्रेन चल रही थी।
खिड़की के बाहर कोई स्टेशन नहीं था।
सिर्फ घना अंधेरा।
रोहित ने काँपते हुए पूछा—
“हम कहाँ हैं?”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर सीट नंबर 13 पर गई।
सीट खाली थी।
फिर पीछे से आवाज़ आई—
“कबीर…”
वह मुड़ा।
वही बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।
रघुवीर सिंह।
लेकिन अब उसका चेहरा बूढ़ा नहीं था।
वह लगभग तीस साल का दिखाई दे रहा था।
“आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया?”
रघुवीर ने कहा—
“मैंने नहीं बुलाया।”
“तो कौन?”
रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर देखा।
“वह।”
“कौन वह?”
रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।
उसने कबीर को एक पुराना कागज़ दिया।
“इसे पढ़ो।”
कागज़ पर रघुवीर की लिखावट थी।
“मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”
कबीर ने अगली लाइन पढ़ी।
“मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”
फिर अचानक ट्रेन जोर से हिली।
सभी यात्री एक साथ अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।
उनकी आँखें बंद थीं।
रघुवीर ने फुसफुसाकर कहा—
“जब तक ट्रेन रुक न जाए, किसी यात्री से बात मत करना।”
कबीर ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि वे यात्री नहीं हैं।”
रोहित ने धीरे से पूछा—
“तो ये लोग कौन हैं?”
रघुवीर ने कहा—
“ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी का आखिरी सफर पूरा नहीं किया।”
अचानक सामने बैठे एक आदमी ने आँखें खोल दीं।
उसने कबीर को देखा।
फिर मुस्कुराया।
“तुम्हें भी देर हो गई।”
रघुवीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“चुप!”
आदमी ने अपना सिर झुका लिया।
लेकिन कुछ ही सेकंड बाद सभी यात्रियों ने अपनी आँखें खोल दीं।
एक साथ।
तेरहों की आँखें पूरी तरह काली थीं।
कबीर ने गिनना शुरू किया।
एक…
दो…
तीन…
बारह…
वह रुक गया।
सिर्फ बारह यात्री थे।
तेरहवीं सीट खाली थी।
सीट नंबर 13।
रघुवीर ने कहा—
“वह सीट हमेशा खाली रहती है।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन कोई उस पर बैठता है, ट्रेन उसे अपना बना लेती है।”
तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।
पीली रोशनी।
अंधेरा।
पीली रोशनी।
अंधेरा।
हर बार रोशनी वापस आती तो सीट नंबर 13 पर कोई अलग चीज़ दिखाई देती।
पहली बार खाली।
दूसरी बार एक लाल फ्रॉक।
तीसरी बार एक छोटी बच्ची।
मीरा।
वह सीट पर बैठी थी।
कबीर ने उसे देखते ही कहा—
“मीरा!”
रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“उससे बात मत करो!”
लेकिन मीरा ने खुद कबीर की तरफ देखा।
“भैया… पापा झूठ बोल रहे हैं।”
रघुवीर का चेहरा बदल गया।
“मीरा!”
बच्ची ने उसकी तरफ देखा।
“आपने मुझे बंद किया था।”
कबीर ने रघुवीर की तरफ देखा।
“क्या यह सच है?”
रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
रोहित ने गुस्से में पूछा—
“क्यों?”
रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।
“क्योंकि उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रेन क्या चाहती है।”
कबीर ने पूछा—
“क्या?”
“एक जीवित बच्चा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
रघुवीर ने आगे कहा—
“हर साल 15 अगस्त की रात यह ट्रेन आती थी। पहले यह सिर्फ एक यात्री ले जाती थी। फिर हर साल इसकी भूख बढ़ती गई।”
“तो मीरा?”
“मैंने उसे ट्रेन से बचाने के लिए पुराने कमरे में छिपा दिया था।”
कबीर ने कहा—
“लेकिन वह गायब कैसे हुई?”
रघुवीर की आवाज़ टूट गई।
“क्योंकि ट्रेन मेरे घर तक पहुँच गई।”
मीरा ने धीरे से कहा—
“पापा ने दरवाज़ा खोला था।”
रघुवीर ने सिर झुका लिया।
“मैं डर गया था।”
“और फिर?”
“ट्रेन ने मीरा को ले लिया।”
कबीर ने पूछा—
“फिर आपने क्या किया?”
रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।
“मैंने ट्रेन से सौदा किया।”
“कैसा सौदा?”
“मैंने कहा कि अगर वह मीरा को वापस कर देगी, तो मैं हर साल एक यात्री उसे दे दूँगा।”
रोहित चिल्लाया—
“आपने लोगों को मरने के लिए भेजा?”
रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।
यात्रियों के चेहरे धीरे-धीरे बदलने लगे।
उनमें से एक आदमी ने कहा—
“हममें से किसी ने टिकट नहीं खरीदा था।”
दूसरे ने कहा—
“हमारे नाम उसने चुने थे।”
तीसरे ने कहा—
“हर साल एक।”
कबीर को अचानक सब समझ आने लगा।
यह ट्रेन यात्रियों को नहीं चुनती थी।
कोई उसे यात्री देता था।
और वह व्यक्ति था—
रघुवीर।
कबीर ने पूछा—
“तो इस बार आपने मुझे चुना?”
रघुवीर ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर कौन?”
रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की तरफ देखा।
“इस बार उसने खुद चुना है।”
अचानक ट्रेन के पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।
धड़ाम!
दरवाज़ा खुल गया।
काला धुआँ पूरे डिब्बे में फैलने लगा।
मीरा सीट से उतर गई।
उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया।
“भैया, हमें भागना होगा।”
कबीर ने पूछा—
“कहाँ?”
“ट्रेन के इंजन तक।”
“क्यों?”
मीरा ने कहा—
“वहीं उसकी मौत है।”
कबीर ने चौंककर पूछा—
“किसकी?”
मीरा ने पीछे देखा।
अंधेरे में एक विशाल आकृति खड़ी थी।
उसका शरीर इंसान जैसा था।
लेकिन चेहरा नहीं था।
सिर्फ दो लाल आँखें।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
“ट्रेन की।”
रघुवीर ने चिल्लाकर कहा—
“भागो!”
कबीर, रोहित और मीरा आगे की ओर दौड़े।
लेकिन पीछे से यात्रियों की आवाज़ आने लगी।
“हमें भी साथ ले चलो!”
कबीर रुका।
उसने पीछे देखा।
बारहों यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे।
वे सभी अब इंसानों जैसे नहीं दिख रहे थे।
उनके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था।
उनमें से एक ने हाथ बढ़ाया।
“हमें इस ट्रेन से बाहर निकालो…”
कबीर ने मीरा की तरफ देखा।
मीरा रो रही थी।
“भैया… अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया तो हम भी हमेशा के लिए यहीं रह जाएँगे।”
तीनों इंजन की ओर दौड़े।
ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक पार करते हुए वे सबसे आगे पहुँचे।
इंजन के दरवाज़े पर वही काली आँखों वाला आदमी खड़ा था।
कबीर रुक गया।
वह आदमी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।
फिर उसने अपना चेहरा बदला।
पहले वह बूढ़ा बना।
फिर मीरा।
फिर रोहित।
और अंत में—
कबीर।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हें पता है असली कबीर कौन है?”
कबीर पीछे हट गया।
वह नकली कबीर हँसने लगा।
“तुम्हें कैसे पता कि तुम असली हो?”
अचानक रोहित ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।
“मेरी बात सुन।”
“क्या?”
“अगर हम तीनों यहाँ हैं… तो बाहर कौन है?”
कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।
क्योंकि उसी क्षण ट्रेन की खिड़की से बाहर उसे प्लेटफॉर्म दिखाई दिया।
वहाँ एक आदमी खड़ा था।
वह बिल्कुल कबीर जैसा दिख रहा था।
और उसके हाथ में कैमरा था।
वह ट्रेन की तस्वीर ले रहा था।
फिर उसने कैमरा नीचे किया और सीधे खिड़की की तरफ देखा।
कबीर ने पहचान लिया।
वह वही कबीर था जो उसे पहले तस्वीरों में दिखाई देता था।
वह मुस्कुराया।
और उसके हाथ में एक टिकट था।
सीट नंबर 13।
मीरा ने कबीर से कहा—
“भैया… वह असली है।”
कबीर ने पूछा—
“तो मैं कौन हूँ?”
मीरा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“आप… इस ट्रेन के अगले यात्री हो।”
और तभी ट्रेन की सीटी बजी।
फूँऽऽऽऽऽ!
सारी लाइटें बंद हो गईं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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