एपिसोड – 26 : कमरा नंबर 17 का रहस्य
नीलगिरी हवेली के बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज लगातार करीब आती जा रही थी।
लेकिन आरव के कानों में इस वक्त कुछ भी नहीं पड़ रहा था।
उसके हाथ में शेखर की दी हुई छोटी-सी चाबी थी।
वही चाबी…
जो कमरा नंबर 17 का दरवाजा खोलने वाली थी।
आरव ने अपनी मुट्ठी कस ली।
उसकी नजर सामने खड़ी माधवी पर थी।
“मां…”
माधवी ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
“हां बेटा…”
“आप मुझसे कुछ छुपा रही हैं?”
माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।
“मैं…”
वह कुछ कह पातीं, उससे पहले आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“अभी नहीं।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
आरोही ने धीरे से कहा,
“पहले कमरा नंबर 17 देखते हैं। शायद वहां हमें सारे सवालों के जवाब मिल जाएं।”
आरव ने सिर हिला दिया।
“ठीक है।”
सभी लोग तेजी से हवेली के अंदर जाने लगे।
शेखर को राघव और कबीर सहारा देकर ले जा रहे थे।
उनके कंधे पर गोली लगी थी और खून अभी भी बह रहा था।
अर्जुन ने कहा,
“पहले शेखर का इलाज जरूरी है।”
शेखर ने मना कर दिया।
“नहीं।”
“आपकी हालत खराब है।”
“जब तक आरव को सच नहीं मिल जाता, मैं अस्पताल नहीं जाऊंगा।”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
“पापा, आप मेरे लिए अपनी जान खतरे में मत डालिए।”
शेखर हल्का सा मुस्कुराए।
“तुम्हारे लिए तो पच्चीस साल से खतरे में है।”
आरव की आंखें भर आईं।
“अब और नहीं।”
शेखर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“बस एक आखिरी काम।”
“कमरा नंबर 17?”
“हां।”
हवेली की दूसरी मंजिल बिल्कुल सुनसान थी।
पुरानी दीवारों पर जाले लगे थे।
गलियारे में अंधेरा था।
कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
आखिर में एक दरवाजा दिखाई दिया।
दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—
कमरा नंबर 17
आरव उसके सामने जाकर रुक गया।
उसने जेब से चाबी निकाली।
आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।
“डर लग रहा है?”
आरव ने सच कहा,
“हां।”
आरोही मुस्कुराई।
“मुझे भी।”
“फिर?”
“फिर भी खोलेंगे।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”
आरोही ने धीरे से कहा,
“क्योंकि जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो, तब भी मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”
आरव की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।
“चलो।”
उसने चाबी ताले में डाली।
क्लिक।
दरवाजा खुल गया।
कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था।
यहां धूल नहीं थी।
सामान करीने से रखा हुआ था।
बीच में एक बड़ी लकड़ी की मेज थी।
उस पर कई पुरानी फाइलें रखी थीं।
दीवार पर तस्वीरें लगी थीं।
आरव ने पहली तस्वीर देखी।
उसमें माधवी थीं।
दूसरी में शेखर।
तीसरी में नंदिनी और अर्जुन।
लेकिन चौथी तस्वीर देखकर आरव की सांस रुक गई।
उसमें…
माधवी एक नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़ी थीं।
आरव धीरे-धीरे तस्वीर के पास गया।
“ये… मैं हूं?”
माधवी पीछे से कमरे में आईं।
उनका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
आरव ने तस्वीर उनकी तरफ बढ़ाई।
“मां, ये तस्वीर कब की है?”
माधवी ने नजरें झुका लीं।
“तुम्हारे जन्म की।”
आरव ने पूछा,
“लेकिन यहां तारीख गलत क्यों है?”
माधवी चुप रहीं।
आरोही ने तस्वीर ध्यान से देखी।
“आरव…”
“क्या?”
“बच्चे के हाथ में ये निशान देखो।”
आरव ने तस्वीर को करीब किया।
बच्चे की कलाई पर एक छोटा सा जन्मचिह्न था।
आरव ने अपनी कलाई देखी।
उसकी कलाई पर भी वही निशान था।
“ये मेरा है।”
मेज पर एक लिफाफा रखा था।
उस पर लिखा था—
“आरव के लिए — जब वह सच जानने के लायक हो जाए।”
आरव के हाथ कांपने लगे।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर एक पुराना खत था।
उसने पढ़ना शुरू किया—
“आरव,
अगर तुम ये खत पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मेरे पास तुमसे सच छुपाने का कोई अधिकार नहीं बचा।
तुम्हारे जन्म की रात जो हुआ, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था।
उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।
लेकिन तुम्हें बचा लिया गया।
तुम्हें एक ऐसी जगह भेजा गया जहां कोई तुम्हें पहचान न सके।
तुम्हारी मां माधवी ने तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा बचाया।
लेकिन इस कहानी में एक और इंसान था…
जिसने तुम्हारी जिंदगी बदल दी।”
आरव पढ़ते-पढ़ते रुक गया।
आरोही ने पूछा,
“आगे क्या लिखा है?”
आरव ने कांपती आवाज में पढ़ा—
“वो इंसान तुम्हारा दुश्मन नहीं था।
वो तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक था।”
आरोही ने कहा,
“कौन?”
आरव ने अगली लाइन पढ़ी।
उसके हाथ से खत लगभग गिर गया।
“नंदिनी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरोही ने अपनी मां की तरफ देखा।
“मां?”
नंदिनी धीरे-धीरे आगे आईं।
“हां।”
आरव ने पूछा,
“आपने मुझे बचाया था?”
नंदिनी की आंखों से आंसू निकल आए।
“हां बेटा।”
“लेकिन क्यों?”
“क्योंकि उस रात तुम्हें मारने का आदेश दिया गया था।”
“किसने दिया था?”
नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।
आरव ने जोर से पूछा,
“किसने?”
नंदिनी ने विराज की तरफ देखा।
विराज इस वक्त कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।
उसने धीरे से कहा,
“मैंने।”
आरोही पलटकर उसे देखने लगी।
“आपने?”
विराज ने कहा,
“हां।”
आरोही की आंखों में नफरत उतर आई।
“आप मेरे पिता होकर भी इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं?”
विराज कुछ नहीं बोला।
आरव उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।
“तुमने मुझे क्यों मारना चाहा?”
विराज ने कहा,
“क्योंकि तुम मेरे लिए खतरा थे।”
“मैं तो बच्चा था।”
“बच्चे नहीं… तुम्हारे नाम का अधिकार खतरा था।”
विराज ने कमरे की एक तस्वीर उठाई।
“तुम्हें पता है तुम्हारे जन्म के बाद क्या हुआ?”
आरव चुप रहा।
“शेखर ने अपनी पूरी विरासत तुम्हारे नाम कर दी।”
“तो?”
“और मैं उस विरासत का असली वारिस बनना चाहता था।”
आरोही ने कहा,
“इसलिए आपने एक बच्चे को मारने का आदेश दे दिया?”
विराज ने उसकी तरफ देखा।
“मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”
नंदिनी चीख पड़ीं,
“और मैंने उसी आदेश को नकार दिया!”
विराज ने कहा,
“तुम्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ी।”
नंदिनी ने कहा,
“मैंने अपनी बेटी को बचाया।”
“और मेरा बच्चा मुझसे छीन लिया।”
नंदिनी ने गुस्से में कहा,
“तुम्हें बेटी नहीं चाहिए थी, विराज! तुम्हें सिर्फ अपनी ताकत चाहिए थी।”
आरव ने मेज पर रखी दूसरी फाइल उठाई।
उसके ऊपर लिखा था—
“Project A-17”
कबीर ने पूछा,
“ये क्या है?”
आरव ने फाइल खोली।
अंदर अस्पताल के दस्तावेज थे।
एक पन्ने पर तीन नाम लिखे थे।
बच्चा 1 — आरव
बच्चा 2 — आरोही
और…
बच्चा 3 — अज्ञात
आरव चौंक गया।
“तीसरा बच्चा!”
रुद्र की बात सच थी।
आरोही ने पूछा,
“ये बच्चा कौन था?”
शेखर धीरे-धीरे कमरे में आए।
उनके चेहरे पर दर्द था।
“वही राज जिसे हमने सबसे ज्यादा छुपाया।”
आरव ने पूछा,
“कौन था वो?”
शेखर ने जवाब नहीं दिया।
आरव ने फाइल का अगला पन्ना खोला।
वहां बच्चे के पिता का नाम खाली था।
लेकिन मां के नाम के सामने लिखा था—
माधवी।
आरव का दिल रुक गया।
“मां?”
माधवी रोने लगीं।
आरव उनकी तरफ देखने लगा।
“आपके… तीन बच्चे थे?”
माधवी ने कांपते हुए कहा,
“नहीं बेटा।”
“फिर?”
“वो तीसरा बच्चा…”
वह रुक गईं।
आरव ने पूछा,
“कौन था?”
माधवी ने सिर उठाया।
उनकी आंखों में ऐसा दर्द था, जिसे देखकर सब खामोश हो गए।
“वो बच्चा…”
उन्होंने धीरे से कहा—
“तुम्हारा जुड़वां भाई था।”
कमरे में जैसे विस्फोट हो गया।
“क्या?”
आरव पीछे हट गया।
“मेरा… जुड़वां भाई?”
माधवी ने सिर झुका लिया।
“हां।”
आरव की आवाज कांप रही थी।
“फिर वो कहां है?”
माधवी रोते हुए बोलीं,
“मुझे नहीं पता।”
“आपको नहीं पता?”
“हमें लगा था वो मर गया।”
आरव ने फाइल उठाई।
“लेकिन यहां लिखा है कि उसकी मौत की पुष्टि नहीं हुई।”
माधवी चुप रहीं।
आरोही ने फाइल अपने हाथ में ली।
“यहां एक कोड है।”
कबीर ने पूछा,
“क्या?”
आरोही ने कहा,
“A-18।”
शेखर का चेहरा बदल गया।
“नहीं…”
आरव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
शेखर ने कहा,
“ये कोड…”
उन्होंने फाइल छीन ली।
“ये संभव नहीं है।”
आरव ने पूछा,
“क्या?”
शेखर ने कांपती आवाज में कहा—
“A-18 का मतलब है… बच्चा जिंदा था।”
आरव की सांसें तेज हो गईं।
“तो मेरा भाई जिंदा था?”
शेखर ने सिर हिलाया।
“हां।”
“फिर कहां गया?”
“उसे किसी ने अस्पताल से निकाल लिया।”
“किसने?”
शेखर चुप रहे।
आरव ने उनका कंधा पकड़ लिया।
“पापा, बताइए।”
शेखर ने कहा,
“उसका नाम…”
तभी अचानक कमरे की खिड़की टूट गई।
धड़ाम!
एक गोली फाइल के पास आकर लगी।
सब नीचे झुक गए।
कबीर ने खिड़की की तरफ गोली चलाई।
बाहर से कोई भागता हुआ दिखाई दिया।
आरव ने फाइल उठाई।
लेकिन तभी किसी ने पीछे से आकर उसके हाथ पर वार किया।
फाइल जमीन पर गिर गई।
आरोही चीख उठी—
“आरव!”
एक नकाबपोश आदमी फाइल उठाकर भागने लगा।
आरव उसके पीछे दौड़ा।
“रुको!”
आरोही भी उसके पीछे भागी।
गलियारे में नकाबपोश आदमी तेजी से सीढ़ियों की तरफ भाग रहा था।
आरव ने उसे पकड़ लिया।
दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।
नकाबपोश ने आरव को धक्का दिया।
आरव दीवार से टकराया।
आरोही ने उसके हाथ से फाइल छीन ली।
नकाबपोश ने आरोही को पकड़ लिया।
“फाइल दो!”
आरोही ने मना कर दिया।
“नहीं!”
आरव उठकर उसकी तरफ दौड़ा।
नकाबपोश ने आरोही को छोड़ दिया और खिड़की से बाहर कूद गया।
आरव खिड़की तक पहुंचा।
लेकिन नीचे कोई नहीं था।
सिर्फ…
एक छोटा सा कागज पड़ा था।
आरव ने उसे उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“अपने जुड़वां भाई को ढूंढना है तो कल रात पुराने रेलवे स्टेशन आना।”
नीचे एक नाम लिखा था—
“अमन।”
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“अमन…”
आरोही उसके पास आ गई।
“क्या हुआ?”
आरव ने कागज उसे दिया।
आरोही ने पढ़ा।
उसकी आंखें फैल गईं।
“क्या ये तुम्हारे भाई का नाम है?”
आरव ने धीरे से कहा,
“शायद।”
तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—
“नहीं, आरव… अमन तुम्हारा भाई नहीं है।”
आरव पलटा।
“तो कौन है?”
शेखर की आंखों में डर था।
उन्होंने कहा—
“अमन… तुम्हारा जुड़वां भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”
आरव स्तब्ध रह गया।
और तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।
अंधेरे में किसी की आवाज गूंजी—
“भाई से मिलने के लिए तैयार हो जाओ, आरव…”
“क्योंकि कल रात तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा राज तुम्हारे सामने खड़ा होगा।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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