एपिसोड – 27 : अमन कौन है?
कमरा नंबर 17 में अचानक छाया अंधेरा सबके दिलों में डर भर रहा था।
कुछ पल पहले तक जहां आरव अपने कथित जुड़वां भाई के बारे में जानने की कोशिश कर रहा था, वहीं अब शेखर की बात ने सबको उलझा दिया था।
“अमन तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।”
आरव ने शेखर की तरफ देखा।
“पापा… आप अमन को जानते हैं?”
शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।
“आप उसे जानते हैं ना?”
शेखर ने धीरे से आंखें बंद कर लीं।
“हां।”
आरव की आवाज में बेचैनी थी।
“तो फिर वो कौन है?”
शेखर ने कहा,
“ये बात मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता था।”
“लेकिन अब मुझे जानना है।”
“आरव…”
“नहीं पापा।”
आरव ने उनकी तरफ देखते हुए कहा,
“मेरी पूरी जिंदगी झूठ में बीती है। हर बार कोई न कोई मुझे बचाने के नाम पर सच छुपाता रहा। अब और नहीं।”
आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“उसे सच बता दीजिए।”
शेखर ने आरोही की तरफ देखा।
फिर उन्होंने धीरे से कहा—
“अमन वही लड़का है जिसे मैंने पच्चीस साल पहले तुम्हारे सामने से उठा लिया था।”
आरव की सांस रुक गई।
“क्या?”
शेखर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा,
“जिस रात तुम्हारा जन्म हुआ था, उसी रात अस्पताल में एक और बच्चा था।”
आरव ने कहा,
“मेरा जुड़वां?”
“नहीं।”
“फिर?”
“वो अमन था।”
आरोही ने पूछा,
“वो अस्पताल में क्यों था?”
शेखर ने कहा,
“क्योंकि उसकी मां भी उसी अस्पताल में भर्ती थी।”
आरव ने पूछा,
“उसकी मां कौन थी?”
शेखर कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“उसका नाम था… सिया।”
आरव ने पहली बार यह नाम सुना था।
“सिया कौन थी?”
शेखर ने कहा,
“वो मेरी सबसे करीबी दोस्त थी।”
राघव ने तुरंत कहा,
“शेखर, क्या तुम सच में ये सब बताना चाहते हो?”
शेखर ने सिर हिलाया।
“अब वक्त आ गया है।”
“सिया एक बहुत बहादुर लड़की थी। उसने कई सालों तक विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”
विराज ने तुरंत कहा,
“झूठ!”
शेखर ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें डर है ना कि सिया का नाम फिर से सामने आ रहा है?”
विराज चुप हो गया।
शेखर आगे बोले,
“सिया के पास लाल फाइल थी।”
आरव चौंक गया।
“वही लाल फाइल?”
“हां।”
“तो वो फाइल उसके पास कैसे आई?”
“सिया ने उसे चुराया नहीं था।”
शेखर ने कहा,
“वो फाइल उसी ने तैयार की थी।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“मतलब उसमें विराज के सारे अपराध थे?”
“हां।”
विराज गुस्से में बोला,
“शेखर, बहुत हो गया।”
“नहीं विराज।”
शेखर की आवाज मजबूत थी।
“आज सच सामने आएगा।”
शेखर ने कहा,
“सिया उस रात अपने बच्चे को जन्म देने आई थी।”
“अमन?”
“हां।”
“फिर क्या हुआ?”
“अस्पताल में आग लग गई।”
आरोही ने धीरे से कहा,
“वही रात…”
शेखर ने सिर हिलाया।
“उसी रात।”
“सिया ने अमन को बचाने की कोशिश की।”
“क्या वो बच गई?”
शेखर की आंखें नम हो गईं।
“नहीं।”
कमरे में खामोशी छा गई।
आरव ने पूछा,
“तो अमन?”
“मैंने उसे बचाया।”
“फिर?”
“मैं उसे लेकर भाग गया।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे पता था कि अगर विराज को पता चला कि सिया का बच्चा जिंदा है, तो वो उसे भी मार देगा।”
आरव ने कहा,
“फिर आपने उसे कहां रखा?”
शेखर चुप हो गए।
“पापा?”
“मैंने उसे एक अनाथालय में भेज दिया।”
आरव ने हैरानी से पूछा,
“आपने उसे छोड़ दिया?”
शेखर ने कहा,
“मैं मजबूर था।”
“लेकिन वो बच्चा था!”
“मुझे पता है।”
“फिर?”
शेखर की आंखों में दर्द था।
“कुछ साल बाद मुझे पता चला कि अमन को एक परिवार ने गोद ले लिया था।”
आरव ने पूछा,
“कौन सा परिवार?”
शेखर ने जवाब देने से पहले विराज की तरफ देखा।
विराज का चेहरा अचानक बदल गया।
“नहीं…”
शेखर ने कहा—
“विराज ने।”
आरोही ने हैरानी से विराज की तरफ देखा।
“आपने अमन को गोद लिया था?”
विराज चुप रहा।
आरव ने पूछा,
“क्यों?”
विराज ने कहा,
“मुझे नहीं पता था कि वो सिया का बच्चा है।”
शेखर हंस पड़ा।
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
“मैं सच बोल रहा हूं।”
“तुम्हें पता था।”
विराज ने गुस्से में कहा,
“अगर मुझे पता होता तो मैं उसे जिंदा क्यों रखता?”
शेखर ने कहा,
“क्योंकि तुम्हें लाल फाइल चाहिए थी।”
विराज चुप हो गया।
आरव ने पूछा,
“अमन के पास फाइल थी?”
“नहीं।”
शेखर ने कहा,
“लेकिन उसके पास एक चाबी थी।”
“किसकी?”
“उस कमरे की… जिसमें लाल फाइल छुपी थी।”
आरव की नजर कमरे के चारों तरफ घूम गई।
“तो अमन को चाबी के बारे में पता था?”
“नहीं।”
“फिर?”
“सिया ने चाबी उसके कपड़े में सिल दी थी।”
आरव ने कहा,
“अगर अमन को ये सब पता चला तो?”
शेखर ने कहा,
“वो पच्चीस साल से बदला ले रहा है।”
“किससे?”
“विराज से।”
आरोही ने कहा,
“लेकिन आपने कहा था कि अमन आरव का दुश्मन है।”
शेखर ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि अब अमन को लगता है कि आरव की वजह से उसकी मां मरी।”
आरव चौंक गया।
“मेरी वजह से?”
“अमन को बताया गया कि उस रात तुम्हारे परिवार ने उसकी मां को मरने के लिए छोड़ दिया था।”
“किसने बताया?”
शेखर ने कहा,
“विराज ने।”
विराज ने तुरंत कहा,
“मैंने सिर्फ वही बताया जो सच था।”
शेखर बोले,
“तुमने आधा सच बताया।”
आरव ने पूछा,
“पूरा सच क्या है?”
शेखर ने कहा,
“उस रात सिया को बचाने के लिए मैं गया था।”
“फिर?”
“लेकिन वहां पहले से कोई मौजूद था।”
“कौन?”
शेखर ने कहा,
“रुद्र।”
सब चौंक गए।
राघव ने कहा,
“रुद्र वहां था?”
“हां।”
“फिर?”
“उसने सिया को बचाने की कोशिश की।”
“तो सिया की मौत कैसे हुई?”
शेखर ने कहा,
“विराज के आदमियों ने अस्पताल में आग लगा दी।”
विराज चिल्लाया,
“झूठ!”
“तुम्हारे पास कोई दूसरा सच है तो बोलो।”
विराज चुप हो गया।
आरव कमरे से बाहर जाने लगा।
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कहां जा रहे हो?”
“अमन को ढूंढने।”
“अभी?”
“हां।”
“लेकिन कल रात उसने खुद बुलाया है।”
आरव ने कहा,
“अगर वो मुझे दुश्मन समझता है तो मैं उसे सच बताऊंगा।”
आरोही ने कहा,
“तुम्हें डर नहीं लगता?”
“लगता है।”
“फिर?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम साथ हो।”
आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आई।
“हां।”
तभी नंदिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक छोटी डायरी निकाली।
“आरव।”
आरव पलटा।
“ये क्या है?”
“सिया की डायरी।”
सबकी नजरें उस डायरी पर टिक गईं।
आरव ने डायरी ली।
“ये आपके पास कैसे?”
नंदिनी ने कहा,
“सिया ने मुझे दी थी।”
“कब?”
“तुम्हारे जन्म से एक दिन पहले।”
आरव ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरे बेटे अमन को सच बताना।”
आरव का दिल तेज धड़कने लगा।
आगे लिखा था—
“अमन को कभी ये मत बताना कि उसके पिता कौन हैं।”
आरव रुक गया।
आरोही ने पूछा,
“क्यों?”
आरव ने अगला पन्ना पलटा।
वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।
“शेखर।”
आरव ने चौंककर शेखर की तरफ देखा।
“पापा…”
शेखर की आंखों में आंसू आ गए।
“हां।”
आरव की आवाज कांप गई।
“क्या अमन आपका बेटा है?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विराज भी हैरान होकर शेखर को देखने लगा।
शेखर ने धीरे से सिर झुका लिया।
“हां… अमन मेरा बेटा है।”
आरोही के मुंह से निकला,
“तो अमन… आरव का भाई नहीं?”
शेखर ने कहा,
“नहीं।”
“फिर?”
“वो मेरा बेटा है… लेकिन उसकी मां सिया थी।”
आरव स्तब्ध था।
“तो आपने मुझे और उसे अलग क्यों रखा?”
शेखर की आंखों से आंसू बहने लगे।
“क्योंकि अगर विराज को पता चल जाता कि तुम दोनों मेरे बच्चे हो… तो वो तुम दोनों को मार देता।”
रात बहुत गहरी हो चुकी थी।
सभी लोग हवेली के एक सुरक्षित कमरे में बैठे थे।
आरव चुप था।
आरोही उसके पास बैठी थी।
“क्या सोच रहे हो?”
“अमन के बारे में।”
“तुम उसे क्या कहोगे?”
आरव ने कहा,
“भाई।”
आरोही मुस्कुराई।
“अगर वो तुम्हें भाई मानने से इनकार कर दे?”
“तो भी मैं उसे भाई मानूंगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसने अपनी मां खोई है।”
आरव की आवाज भर्रा गई।
“मैं नहीं चाहता कि वो अपने पिता को भी खो दे।”
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम सच में बहुत अच्छे हो।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“और तुम?”
“मैं?”
“तुम मेरे साथ कल चलोगी?”
आरोही मुस्कुराई।
“क्या तुम्हें अब भी पूछने की जरूरत है?”
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“नहीं।”
अगली रात दोनों पुराने रेलवे स्टेशन पहुंचे।
स्टेशन कई सालों से बंद था।
चारों तरफ सन्नाटा था।
टूटी हुई बेंचें, जंग लगी पटरियां और अंधेरे में जलती एक पीली लाइट…
आरव ने चारों तरफ देखा।
“कोई नहीं है।”
आरोही ने कहा,
“हमें बुलाया है, आएगा जरूर।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“मैं आ गया।”
दोनों पलटे।
एक युवक अंधेरे से बाहर आया।
लंबा कद।
काले कपड़े।
चेहरे पर हल्की दाढ़ी।
आंखों में गुस्सा।
वह धीरे-धीरे उनके सामने आकर रुका।
आरव ने पूछा,
“तुम अमन हो?”
युवक ने कहा,
“हां।”
आरव ने आगे बढ़कर कहा,
“मैं आरव हूं।”
अमन हंसा।
“मुझे पता है।”
“तुम्हें मेरे बारे में क्या पता है?”
अमन ने कहा,
“इतना कि तुम्हारी वजह से मेरी मां मरी।”
आरव चुप हो गया।
“ये सच नहीं है।”
अमन ने बंदूक निकाल ली।
आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।
“बंदूक नीचे रखो।”
अमन ने कहा,
“तुम बीच में मत आओ।”
आरव ने आरोही को पीछे किया।
“नहीं। जो कहना है मुझसे कहो।”
अमन ने बंदूक आरव की तरफ कर दी।
“तुम्हें पता है मैं कौन हूं?”
“हां।”
“कौन?”
आरव ने कहा—
“मेरे पिता का बेटा।”
अमन के चेहरे पर हैरानी फैल गई।
“तुम्हें पता चल गया?”
“हां।”
“तो फिर तुम्हें ये भी पता होगा कि हमारी मां कौन थी?”
आरव ने कहा,
“सिया।”
अमन की आंखों में आंसू आ गए।
“तुमने उसका नाम कैसे लिया?”
आरव ने डायरी आगे कर दी।
“ये उसकी डायरी है।”
अमन ने डायरी देखते ही बंदूक नीचे कर दी।
वह कांपते हाथों से डायरी लेने लगा।
लेकिन जैसे ही उसने पहला पन्ना पढ़ा…
उसकी आंखें भर आईं।
“मां…”
आरव ने धीरे से कहा,
“तुम अकेले नहीं हो।”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे भाई मत कहना।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैंने तुम्हें मारने की कसम खाई है।”
आरव चुप रहा।
अमन ने बंदूक फिर उठा ली।
“और आज वो कसम पूरी होगी।”
आरोही चिल्लाई—
“अमन!”
अमन की उंगली ट्रिगर पर थी।
लेकिन तभी पीछे से किसी ने अमन पर गोली चला दी।
धांय!
अमन के कंधे से खून निकल आया।
आरव उसे संभालने के लिए दौड़ा।
“अमन!”
अमन जमीन पर गिर पड़ा।
आरव ने ऊपर देखा।
दूर खड़ा एक नकाबपोश आदमी उन्हें देख रहा था।
उसके हाथ में बंदूक थी।
वह मुस्कुराया।
फिर उसने अपना नकाब उतार दिया।
आरव की आंखें फैल गईं।
आरोही भी स्तब्ध रह गई।
क्योंकि सामने खड़ा आदमी था—
शेखर।
आरव चीख उठा—
“पापा… आपने अमन को गोली क्यों मारी?”
शेखर ने बंदूक नीचे की।
उनके चेहरे पर दर्द था।
और उन्होंने सिर्फ इतना कहा—
“क्योंकि अमन वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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