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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 28

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 28 : अमन आखिर है कौन?

 

पुराने रेलवे स्टेशन पर सन्नाटा पसरा हुआ था।

 

कुछ पल पहले चली गोली की आवाज अभी भी आरव के कानों में गूंज रही थी।

 

अमन जमीन पर गिरा हुआ था और उसके कंधे से खून बह रहा था।

 

आरव उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

 

“अमन!”

 

आरोही भी उसके पास आ गई।

 

“आरव, खून बहुत निकल रहा है।”

 

आरव ने अपनी शर्ट का कपड़ा फाड़कर अमन के कंधे पर दबाया।

 

“आंखें खोलो!”

 

अमन ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

 

उसकी नजर आरव पर पड़ी।

 

“तुम… मुझे बचा रहे हो?”

 

आरव ने कहा,

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुम मेरे भाई हो।”

 

अमन की आंखों में दर्द के साथ एक अजीब-सी हंसी आ गई।

 

“मैंने… तुम्हें मारने की कोशिश की।”

 

“लेकिन मैंने नहीं की।”

 

तभी पीछे से शेखर की आवाज आई—

 

“आरव, उससे दूर हटो।”

 

आरव तुरंत पलटा।

 

शेखर अभी भी बंदूक पकड़े हुए थे।

 

आरव की आंखों में अविश्वास था।

 

“पापा… आपने इसे गोली क्यों मारी?”

 

शेखर ने कहा,

 

“क्योंकि ये अमन नहीं है।”

 

आरव स्तब्ध रह गया।

 

“क्या?”

 

आरोही ने भी शेखर की तरफ देखा।

 

“आप कहना क्या चाहते हैं?”

 

शेखर धीरे-धीरे आगे बढ़े।

 

“जिसे तुम अमन समझ रहे हो… वो असली अमन नहीं है।”

 

 

आरव खड़ा हो गया।

 

“तो असली अमन कहां है?”

 

शेखर चुप रहे।

 

“पापा!”

 

“आरव, अभी तुम्हें मेरी बात माननी होगी।”

 

“नहीं।”

 

आरव की आवाज में गुस्सा था।

 

“हर बार आप मुझे यही कहते हैं कि मुझ पर भरोसा करो। लेकिन हर बार आप कोई नया राज छुपा लेते हैं।”

 

शेखर की आंखें झुक गईं।

 

“मुझे मजबूर होना पड़ा।”

 

“किसने मजबूर किया?”

 

शेखर ने विराज की तरफ देखा।

 

लेकिन वहां कोई नहीं था।

 

आरव चौंक गया।

 

“विराज कहां गया?”

 

कबीर ने चारों तरफ देखा।

 

“वो यहां नहीं है।”

 

आरव समझ गया।

 

“वो हमें यहां लाकर गायब हो गया।”

 

शेखर ने कहा,

 

“विराज नहीं…”

 

वह कुछ पल रुके।

 

“इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड कोई और है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कौन?”

 

शेखर ने जवाब नहीं दिया।

 

अमन जमीन पर पड़ा सब सुन रहा था।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“शेखर…”

 

सब उसकी तरफ देखने लगे।

 

“तुम मुझे पहचानते हो।”

 

शेखर उसके पास गए।

 

“हां।”

 

“तो फिर आरव को सच क्यों नहीं बताते?”

 

आरव ने पूछा,

 

“तुम कौन हो?”

 

अमन ने कहा,

 

“मैं…”

 

उसने आंखें बंद कर लीं।

 

“मैं वही हूं… जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

 

आरव की धड़कन तेज हो गई।

 

“मतलब?”

 

अमन ने कहा,

 

“मैं अमन हूं।”

 

शेखर अचानक चौंक गए।

 

“नहीं!”

 

अमन ने दर्द में मुस्कुराते हुए कहा,

 

“आपने मुझे पहचान लिया था।”

 

आरव ने शेखर की तरफ देखा।

 

“तो फिर आपने गोली क्यों चलाई?”

 

शेखर चुप रहे।

 

आरव ने फिर पूछा,

 

“क्यों?”

 

शेखर की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“क्योंकि…”

 

उनकी आवाज टूट गई।

 

“क्योंकि मुझे डर था कि अमन तुम्हें मार देगा।”

 

अमन ने कहा,

 

“मैं तुम्हें मारना चाहता था।”

 

आरव उसकी तरफ देखने लगा।

 

“लेकिन अब?”

 

अमन ने कहा,

 

“अब नहीं।”

 

“क्यों?”

 

अमन ने अपनी मुट्ठी में पकड़ी डायरी दिखाई।

 

“क्योंकि मेरी मां ने मुझे कुछ और सिखाया था।”

 

अमन ने डायरी खोली।

 

“मेरी मां ने लिखा था…”

 

वह पढ़ने लगा।

 

“‘अमन, अगर कभी तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन है, तो अपने दिल से पूछना कि सच में तुम्हें किसने नुकसान पहुंचाया।’”

 

अमन की आवाज भर्रा गई।

 

“मैंने कभी नहीं पूछा।”

 

आरव उसके पास बैठ गया।

 

“अब पूछो।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“मैंने सालों तक तुम्हें अपना दुश्मन समझा।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि विराज ने मुझे बताया कि मेरी मां की मौत तुम्हारे परिवार की वजह से हुई।”

 

आरव ने कहा,

 

“तुम्हारी मां को मेरे परिवार ने नहीं मारा।”

 

अमन ने कहा,

 

“अब मुझे समझ आ रहा है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“तुम्हें कैसे?”

 

अमन ने डायरी का आखिरी पन्ना दिखाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“मेरी मौत का जिम्मेदार वह नहीं है जिसे तुम अपना दुश्मन समझोगे।”

 

नीचे एक नाम आधा लिखा हुआ था।

 

सिर्फ अक्षर दिखाई दे रहे थे—

 

“वि…”

 

अमन ने कहा,

 

“मैंने हमेशा इसे विराज समझा।”

 

आरव ने कहा,

 

“लेकिन?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“लेकिन यहां नाम पूरा नहीं है।”

आरोही ने डायरी हाथ में ली।

 

“ये देखो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या?”

 

“स्याही का रंग अलग है।”

 

“मतलब?”

 

“पहली लाइन पुरानी है। लेकिन ये नाम बाद में लिखा गया है।”

 

शेखर ने तुरंत डायरी छीन ली।

 

“इसे मुझे दो।”

 

आरव ने कहा,

 

“नहीं।”

 

शेखर ने पहली बार गुस्से में कहा,

 

“आरव!”

 

आरव पीछे हट गया।

 

“आप इतना डर क्यों रहे हैं?”

 

शेखर की आंखों में बेचैनी थी।

 

“क्योंकि अगर ये नाम गलत हाथों में चला गया… तो कई लोगों की जान जा सकती है।”

 

आरोही ने कहा,

 

“किसका नाम है इसमें?”

 

शेखर चुप रहे।

 

आरव ने कहा,

 

“आपको पता है।”

 

शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

अमन की हालत बिगड़ने लगी।

 

उसका चेहरा पीला पड़ गया।

 

आरव ने कहा,

 

“पहले इसे अस्पताल ले चलते हैं।”

 

शेखर ने मना किया।

 

“अस्पताल सुरक्षित नहीं है।”

 

“तो क्या करें?”

 

अर्जुन, जो कुछ दूरी पर खड़े थे, आगे आए।

 

“मेरे पुराने डॉक्टर को बुलाता हूं।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“जल्दी कीजिए।”

 

आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम ठीक हो जाओगे।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम आरोही हो?”

 

“हां।”

 

“आरव तुमसे बहुत प्यार करता है।”

 

आरोही चौंक गई।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

अमन हल्का सा मुस्कुराया।

 

“उसकी आंखों से।”

 

आरव ने कहा,

 

“तुम अभी भी बातें कर रहे हो?”

 

अमन ने कहा,

 

“मरने से पहले कुछ अच्छी बातें कर लेने में क्या बुराई है?”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“मरने की बात मत करो।”

 

अमन पहली बार मुस्कुराया।

 

“ठीक है… भाई।”

 

आरव की आंखें भर आईं।

 

उसने अमन का हाथ पकड़ लिया।

 

“फिर से बोलो।”

 

अमन ने कहा,

 

“भाई।”

 

आरव ने उसे गले लगा लिया।

 

दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

आरोही उन्हें देखती रही।

 

तभी आरव के फोन पर कॉल आया।

 

स्क्रीन पर नाम देखकर वह चौंक गया।

 

मां।

 

उसने फोन उठाया।

 

“हां मां?”

 

दूसरी तरफ माधवी की घबराई हुई आवाज थी।

 

“आरव, तुम जहां भी हो, तुरंत वहां से निकल जाओ।”

 

“क्यों?”

 

“विराज तुम्हें ढूंढ रहा है।”

 

“उसे ढूंढने दो।”

 

“नहीं बेटा!”

 

माधवी की आवाज कांप रही थी।

 

“तुम्हें समझ नहीं आ रहा। विराज से भी ज्यादा खतरनाक कोई और है।”

 

आरव चुप हो गया।

 

“कौन?”

 

माधवी ने कहा,

 

“जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद इंसान समझते हो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन?”

 

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

 

फिर फोन कट गया।

 

आरव ने तुरंत वापस कॉल किया।

 

फोन बंद था।

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

आरव ने कहा,

 

“मां ने कहा है कि हमारे बीच कोई ऐसा है जिस पर हमें सबसे ज्यादा भरोसा है… लेकिन वही सबसे बड़ा दुश्मन है।”

 

आरोही ने चारों तरफ देखा।

 

अर्जुन, शेखर, कबीर, राघव…

 

सब एक-दूसरे को देख रहे थे।

 

अमन ने कमजोर आवाज में कहा,

 

“आरव…”

 

“हां?”

 

“तुम्हारी मां सही कह रही हैं।”

 

“तुम्हें पता है कौन है?”

 

अमन ने आंखें बंद कर लीं।

 

“हां।”

 

आरव उसके पास झुक गया।

 

“कौन?”

 

अमन ने धीरे से कहा—

 

“जिसके पास…”

 

वह अचानक रुक गया।

 

“क्या?”

 

“लाल फाइल।”

 

आरव ने कहा,

 

“लाल फाइल तो हमारे पास है।”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

“क्या मतलब?”

 

अमन ने कहा,

 

“तुम्हारे पास सिर्फ उसकी कॉपी है।”

 

आरव और आरोही दोनों चौंक गए।

 

“क्या?”

 

“असली लाल फाइल…”

 

अमन ने आंखें खोलीं।

 

“उस इंसान के पास है।”

 

“किस इंसान के?”

 

अमन ने चारों तरफ देखा।

 

उसकी नजर अचानक…

 

कबीर पर जाकर रुक गई।

 

कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

आरव ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

 

“कबीर?”

 

कबीर पीछे हट गया।

 

“अमन क्या बकवास कर रहा है?”

 

अमन ने कहा,

 

“तुम्हें पता है… मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

 

कबीर ने बंदूक निकाल ली।

 

आरव ने भी तुरंत अपनी बंदूक निकाल ली।

 

“बंदूक नीचे रखो।”

 

कबीर ने कहा,

 

“आरव, मेरी बात सुनो।”

 

“पहले बंदूक नीचे।”

 

कबीर ने बंदूक जमीन पर रख दी।

 

“मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं।”

 

अमन हंसा।

 

“फिर तुम्हारी जेब में ये क्या है?”

 

कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

अमन ने कहा—

 

“लाल फाइल की चाबी।”

 

आरव ने कबीर की तरफ देखा।

 

“कबीर…”

 

कबीर चुप था।

 

आरव ने आगे बढ़कर उसकी जेब से चाबी निकाल ली।

 

चाबी पर वही निशान था—

 

A-17

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“ये वही चाबी है जो कमरे नंबर 17 की थी!”

 

कबीर ने अचानक कहा—

 

“रुको!”

 

आरव पलटा।

 

कबीर की आंखों में आंसू थे।

 

“मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया।”

 

“तो फिर ये चाबी?”

 

“मुझे ये विराज ने दी थी।”

 

सब चौंक गए।

 

“विराज ने?”

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

कबीर ने कहा,

 

“क्योंकि उसने मुझे आदेश दिया था कि अगर तुम लाल फाइल तक पहुंच जाओ…”

 

वह रुक गया।

 

आरव ने पूछा,

 

“तो?”

 

कबीर ने कांपती आवाज में कहा—

 

“तो मुझे तुम्हें खत्म कर देना था।”

 

आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

अमन उठने की कोशिश करने लगा।

 

तभी स्टेशन के बाहर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

 

कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

 

उसका चेहरा बदल गया।

 

“वो आ गए।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन?”

 

कबीर ने धीमे से कहा—

 

“विराज के लोग नहीं…”

 

“तो कौन?”

 

कबीर ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—

 

“शेखर के लोग।”

 

आरव धीरे-धीरे अपने पिता की तरफ मुड़ा।

 

शेखर के चेहरे पर अजीब-सी खामोशी थी।

 

और उसी वक्त…

 

बाहर से एक आदमी ने चिल्लाकर कहा—

 

“आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो… वरना ये पूरा स्टेशन उड़ा दिया जाएगा!”

 

आरव ने अमन की तरफ देखा।

 

अमन ने धीरे से कहा—

 

“अब समझे… असली खेल किसका है?”

 

जारी है।

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