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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 16

पढ़ने का समय : 10 मिनट

एपिसोड – 16 : आरव के असली पिता जिंदा हैं

 

अंधेरे अस्पताल में गोली की आवाज गूंजते ही आरोही चीख पड़ी।

 

“मां!”

 

बूढ़ी नर्स जमीन पर गिर चुकी थी।

 

आरव तुरंत उसके पास पहुंचा।

 

“आपको गोली लगी है?”

 

नर्स ने मुश्किल से आंखें खोलीं।

 

“नहीं… गोली मुझे नहीं लगी।”

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

“तो फिर…?”

 

नर्स ने कांपते हुए कहा,

 

“गोली मेरे पास से निकल गई थी।”

 

आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“आपने अभी क्या कहा था?”

 

नर्स ने आरव की तरफ देखा।

 

“तुम्हारे… असली पिता… जिंदा हैं।”

 

आरव जैसे जम गया।

 

“क्या?”

 

“हां।”

 

“आपको पक्का पता है?”

 

नर्स ने सिर हिलाया।

 

“मैंने उन्हें अपनी आंखों से देखा था।”

 

आरव की आवाज कांपने लगी।

 

“कहां हैं वो?”

 

नर्स कुछ बोल पाती, उससे पहले बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

 

कबीर ने फुसफुसाकर कहा,

 

“कोई हमारी तरफ आ रहा है।”

 

अद्वैत ने तुरंत कहा,

 

“हमें यहां से निकलना होगा।”

 

आरव ने नर्स को सहारा दिया।

 

“पहले इन्हें सुरक्षित जगह ले चलते हैं।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

चारों पीछे के रास्ते से बाहर निकलने लगे।

 

अंधेरे गलियारे में सिर्फ उनके कदमों की आवाज सुनाई दे रही थी।

 

आरोही बार-बार पीछे देख रही थी।

 

“कोई हमारा पीछा तो नहीं कर रहा?”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मैं हूं ना।”

 

“लेकिन आरव…”

 

“कुछ नहीं होगा।”

 

तभी पीछे से किसी ने गोली चलाई।

 

धांय!

 

गोली दीवार से टकराई।

 

अद्वैत ने कहा,

 

“तेज चलो!”

 

वे एक पुराने स्टोर रूम में घुस गए।

 

कबीर ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

 

बाहर कुछ लोग उन्हें ढूंढ रहे थे।

 

“पूरे अस्पताल को छान मारो!”

 

आरोही की सांसें तेज हो गईं।

 

आरव ने उसके मुंह पर हाथ रखकर धीरे से कहा,

 

“आवाज मत करना।”

 

कुछ सेकंड बाद कदमों की आवाज दूर चली गई।

 

आरोही ने राहत की सांस ली।

 

लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि आरव का हाथ अब भी उसके चेहरे के पास था।

 

दोनों की नजरें मिलीं।

 

कुछ पल के लिए दोनों उस डरावने माहौल को भूल गए।

 

आरव ने धीरे से हाथ हटा लिया।

 

“सॉरी।”

 

आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

 

“कोई बात नहीं।”

 

अद्वैत ने उन्हें देखकर कहा,

 

“अगर तुम दोनों का रोमांस खत्म हो गया हो तो बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ लें?”

 

आरोही झेंप गई।

 

“चुप करो।”

 

आरव भी हल्का सा मुस्कुरा दिया।

 

अस्पताल से बाहर निकलने के बाद उन्होंने नर्स को एक सुरक्षित जगह पहुंचाया।

 

नर्स अभी भी कमजोर थीं।

 

आरव उनके सामने बैठ गया।

 

“अब मुझे सब सच बताइए।”

 

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारे असली पिता का नाम…”

 

उन्होंने एक लंबी सांस ली।

 

“राघव राजवंशी।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

“राघव राजवंशी?”

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्या वो अर्जुन राजवंशी के भाई थे?”

 

नर्स ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा,

 

“तो मेरे पिता अर्जुन नहीं थे?”

 

“नहीं।”

 

“फिर इतने सालों तक मुझे राजवीर का बेटा क्यों माना गया?”

 

नर्स ने कहा,

 

“क्योंकि राघव को उस रात मारने की कोशिश की गई थी। तुम्हारी मां भी खतरे में थीं।”

 

आरव ने पूछा,

 

“मेरी मां कौन थीं?”

 

नर्स कुछ पल चुप रहीं।

 

“उनका नाम… माधवी था।”

 

आरव की आंखें भर आईं।

 

“क्या वो जिंदा हैं?”

 

नर्स ने धीरे से कहा,

 

“नहीं।”

 

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

 

उसे पहली बार अपनी मां का नाम पता चला था।

 

“उनके साथ क्या हुआ?”

 

“तुम्हारे जन्म के कुछ महीनों बाद उनकी मौत हो गई।”

 

आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

आरोही ने बिना कुछ कहे उसका हाथ थामे रखा।

 

नर्स ने कहना शुरू किया,

 

“राघव बहुत ईमानदार आदमी थे। उन्होंने विराज और उसके साथियों के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“लेकिन फिर उन्हें गायब क्यों होना पड़ा?”

 

“क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि उनके अपने ही लोग उन्हें धोखा दे रहे हैं।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन?”

 

नर्स ने जवाब दिया,

 

“समीर।”

 

अद्वैत चौंक गया।

 

“मेरे पिता?”

 

नर्स ने कहा,

 

“समीर पूरी तरह गद्दार नहीं था। लेकिन उस समय वह डर गया था।”

 

अद्वैत की आंखों में दर्द आ गया।

 

“मेरे पिता ने क्या किया?”

 

“उन्होंने राघव की लोकेशन दुश्मनों को बता दी थी।”

 

अद्वैत ने सिर झुका लिया।

 

“फिर?”

 

“राघव वहां से बच निकले।”

 

आरव ने तुरंत पूछा,

 

“तो वो अब कहां हैं?”

 

नर्स ने कहा,

 

“यही तो मुझे नहीं पता।”

 

आरव की उम्मीद फिर टूटने लगी।

 

“आपने कहा था कि वो जिंदा हैं।”

 

“हां।”

 

“फिर कहां हैं?”

 

नर्स ने अपनी मुट्ठी खोली।

 

उसमें एक छोटी चाबी थी।

 

“उन्होंने मुझे ये चाबी दी थी।”

 

आरव ने चाबी ले ली।

 

“किसकी चाबी है?”

 

नर्स ने कहा,

 

“एक लॉकर की।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“कहां?”

 

नर्स ने एक नाम बताया “सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन।”

 

अगली सुबह वे सूर्यगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचे।

 

पुराना स्टेशन अब लगभग बंद पड़ा था।

 

लॉकर रूम स्टेशन के एक पुराने हिस्से में था।

 

चाबी नंबर 117

 

आरव ने ताला खोला।

 

अंदर एक बैग रखा था।

 

बैग में कुछ कपड़े, एक पुरानी डायरी और एक फोटो थी।

 

आरव ने फोटो उठाई।

 

उसमें एक आदमी एक छोटी बच्ची को गोद में लिए था।

 

आरोही ने तस्वीर देखी।

 

“ये बच्ची…”

 

आरव ने कहा,

 

“तुम हो?”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“लेकिन ये आदमी कौन है?”

 

फोटो के पीछे लिखा था “राघव और छोटी आरोही।”

 

आरोही स्तब्ध रह गई।

 

“मैं इन्हें जानती तक नहीं थी।”

 

नर्स ने पीछे से कहा,

 

“तुम बहुत छोटी थीं।”

 

आरोही ने फोटो को सीने से लगा लिया।

 

“उन्होंने मुझे गोद में लिया था?”

 

“हां।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तो राघव और आरोही का रिश्ता क्या था?”

 

नर्स ने कहा,

 

“राघव तुम्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे।”

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“लेकिन मैं तो अर्जुन की बेटी थी?”

 

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

 

“यही तो सबसे बड़ा रहस्य है।”

 

कबीर ने बैग में रखी डायरी खोली।

 

पहले कई पन्ने खाली थे।

 

फिर एक पन्ने पर लिखा था “अगर ये डायरी किसी के हाथ लगे, तो समझ लेना कि मैं अपनी बेटी को बचाने में सफल हो गया।”

 

आरव ने पूछा,

 

“बेटी?”

 

कबीर ने आगे पढ़ा।

 

“आरोही मेरी बेटी नहीं है, लेकिन उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है।”

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“हर कोई मुझे किसी न किसी का बच्चा क्यों बना रहा है?”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम किसी की चीज नहीं हो।”

 

वह उसकी आंखों में देखते हुए बोला,

 

“तुम खुद अपनी पहचान हो।”

 

आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

 

कबीर ने डायरी का अगला पन्ना पढ़ा।

 

“जिस दिन आरोही और आरव अपने जन्म का सच जानेंगे, उस दिन उन्हें एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश की जाएगी।”

 

आरव ने चौंककर कहा,

 

“क्यों?”

 

अगली लाइन थी “क्योंकि इन दोनों का मिलना उस राज को खोल देगा, जिसे हमने सालों से छुपाकर रखा है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कौन-सा राज?”

 

अगले पन्ने पर सिर्फ एक नक्शा था।

 

नक्शे में एक जगह लाल निशान लगा था।

 

“राजवंशी हवेली।”

 

तभी आरव के फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

 

“अगर अपने पिता को देखना चाहते हो, तो आज रात 10 बजे अकेले राजवंशी हवेली आना।”

 

आरव ने मैसेज पढ़कर फोन बंद कर दिया।

 

आरोही ने पूछा,

 

“किसका मैसेज है?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“कुछ नहीं।”

 

आरोही ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुमने वादा किया था।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“हां।”

 

उसने फोन आरोही को दे दिया।

 

आरोही ने मैसेज पढ़ा।

 

उसका चेहरा बदल गया।

 

“तुम अकेले नहीं जाओगे।”

 

“लेकिन उन्होंने साफ लिखा है “मुझे परवाह नहीं।”

 

आरव ने कहा,

 

“अगर मेरे पिता सच में जिंदा हैं तो?”

 

“तो मैं भी चलूंगी।”

 

“आरोही, ये खतरनाक हो सकता है।”

 

“तुम्हारी जिंदगी खतरे में होगी और मैं घर पर बैठी रहूंगी?”

 

आरव चुप हो गया।

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“तुमने कहा था ना… हम साथ हैं।”

 

आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

 

“हां। साथ हैं।”

 

रात के ठीक दस बजे आरव, आरोही, कबीर और अद्वैत राजवंशी हवेली पहुंचे।

 

हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

 

अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

 

आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“यहां कोई है।”

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“मुझे भी ऐसा लग रहा है।”

 

वे अंदर गए।

 

तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

 

“ये लॉक हो चुका है।”

 

अचानक सामने लगी बड़ी स्क्रीन जल उठी।

 

स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

 

दाढ़ी बढ़ी हुई…

 

चेहरा थोड़ा बूढ़ा…

 

लेकिन आंखें बिल्कुल जिंदा।

 

आरव की सांस रुक गई।

 

“पापा…?”

 

स्क्रीन पर मौजूद आदमी ने कहा “आरव…”

 

आरव की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“पापा!”

 

आरोही ने भी स्क्रीन की तरफ देखा।

 

वो आदमी मुस्कुराया।

 

“तुम्हें देखकर अच्छा लगा, बेटा।”

 

आरव की आवाज कांप रही थी।

 

“आप जिंदा हैं?”

 

उस आदमी ने कहा “हां।”

 

“आप इतने साल कहां थे?”

 

“तुम्हें बचाने के लिए छुपा हुआ था।”

 

आरव रो पड़ा।

 

“आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

 

राघव की आंखें नम हो गईं।

 

“क्योंकि अगर मैं तुम्हारे पास रहता… तो तुम भी मारे जाते।”

 

आरव ने पूछा,

 

“मेरी मां?”

 

राघव कुछ पल चुप रहे।

 

“माधवी…”

 

उनकी आवाज टूट गई।

 

“मैं उसे बचा नहीं पाया।”

 

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

 

आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

 

तभी राघव ने आरोही को देखा।

 

उनकी आंखों में अजीब-सी चमक आ गई।

 

“और तुम…”

 

आरोही ने धीमे से कहा,

 

“मैं आरोही हूं।”

 

राघव ने कहा,

 

“मुझे पता है।”

 

“आप मुझे कैसे जानते हैं?”

 

राघव ने जवाब दिया “क्योंकि तुम्हें तुम्हारी मां की गोद से मैंने ही उठाया था।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“क्या?”

 

“हां।”

 

“तो मेरी मां नंदिनी…”

 

राघव ने कहा,

 

“नंदिनी ने तुम्हें मुझे सौंपा था।”

 

“क्यों?”

 

राघव की आवाज गंभीर हो गई।

 

“क्योंकि उसे पता था कि जिस इंसान से हम बच रहे हैं… वो तुम्हारे जन्म से पहले ही हमारे परिवार में घुस चुका था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन?”

 

राघव ने कैमरे की तरफ देखा।

 

उनका चेहरा अचानक डर से भर गया।

 

“वो अभी भी तुम्हारे आसपास है।”

 

तभी पीछे से किसी ने गोली चला दी।

 

धांय!

 

स्क्रीन टूटकर बंद हो गई।

 

आरोही चीख पड़ी।

 

आरव ने उसे अपनी बांहों में खींच लिया।

 

कबीर ने कहा,

 

“कोई हमारे साथ अंदर है!”

 

अद्वैत ने बंदूक उठाई।

 

“किधर?”

 

तभी ऊपर की मंजिल से किसी की आवाज आई “राघव को ढूंढने की जरूरत नहीं है…”

 

सबने ऊपर देखा।

 

सीढ़ियों पर एक परछाईं खड़ी थी।

 

आवाज फिर आई “क्योंकि अब वो खुद तुम्हारे पास आने वाला है।”

 

और अगले ही पल…

 

हवेली की सारी लाइटें जल उठीं।

 

सामने खड़ा आदमी देखकर आरव और आरोही दोनों के होश उड़ गए।

 

क्योंकि वो आदमी राघव के बिल्कुल सामने खड़ा था… और दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

 

आरव ने अविश्वास से कहा “पापा… आप इसे जानते हैं?”

 

राघव ने गंभीर आवाज में जवाब दिया “हां बेटा… यही वो आदमी है, जिससे मैं पिछले पच्चीस साल से भाग रहा हूं।”

 

जारी रहेगा…

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