तेरी मेरी दास्तान
एपिसोड – 17 : जिससे पापा पच्चीस साल से भाग रहे थे
हवेली की सारी लाइटें जल चुकी थीं।
आरव की नजर सामने खड़े उस आदमी पर जमी हुई थी।
वही आदमी…
जिसे देखकर उसके पिता राघव के चेहरे पर डर और गुस्सा दोनों दिखाई दे रहे थे।
आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“आरव… ये कौन है?”
आरव ने राघव की तरफ देखा।
“पापा, आप इसे जानते हैं?”
राघव कुछ पल चुप रहे।
फिर उनकी आवाज गूंज उठी “हां बेटा… बहुत अच्छी तरह जानता हूं।”
सामने खड़ा आदमी मुस्कुराया।
“इतने साल बाद भी तुमने मुझे नहीं भुलाया, राघव?”
राघव की आंखों में नफरत उतर आई।
“तुम्हें भूलना इतना आसान नहीं है, देवेंद्र।”
आरव चौंक गया।
“देवेंद्र?”
आरोही ने भी उस आदमी को गौर से देखा।
देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,
“आखिर मुझे अपना नाम बताने का मौका मिल ही गया।”
कबीर ने धीरे से अद्वैत से कहा,
“क्या तुम इसे जानते हो?”
अद्वैत ने सिर हिलाया।
“नहीं। लेकिन पापा की डायरी में देवेंद्र नाम कई बार आया था।”
देवेंद्र ने उनकी बात सुन ली।
“समीर की डायरी?”
अद्वैत चौंक गया।
“तुम मेरे पिता को जानते थे?”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता मेरे बहुत पुराने साथी थे।”
अद्वैत की आंखों में गुस्सा भर गया।
“साथी या दुश्मन?”
देवेंद्र हल्का सा हंसा।
“ये तो तुम्हारे पिता से पूछना चाहिए था।”
राघव सीढ़ियों से नीचे उतर आए।
“देवेंद्र, इतने सालों बाद भी तुम्हें समझ नहीं आया कि मैं तुम्हारे सामने झुकने वाला नहीं हूं।”
देवेंद्र ने कहा,
“तुम्हें झुकाना मेरा मकसद कभी था ही नहीं।”
“तो फिर?”
“मुझे वो चाहिए जो तुमने छुपाकर रखा है।”
राघव की आंखें सिकुड़ गईं।
“वो चीज तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”
देवेंद्र ने आरोही की तरफ देखा।
“शायद तुम भूल रहे हो कि वो चीज अब तुम्हारे पास नहीं है।”
राघव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।
आरोही घबरा गई।
“मेरे पास?”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“हां, आरोही।”
आरव उसके सामने आ गया।
“उससे दूर रहो।”
देवेंद्र हंस पड़ा।
“यही तो समस्या है, आरव। तुम हमेशा इसके सामने दीवार बनकर खड़े हो जाते हो।”
आरव ने कहा,
“क्योंकि इसे बचाना मेरा काम है।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में डर के साथ-साथ एक अजीब-सी गर्माहट भी थी।
देवेंद्र ने दोनों को देखते हुए कहा,
“तुम दोनों को बचपन से ही एक-दूसरे के करीब रखा गया।”
आरव ने पूछा,
“क्यों?”
देवेंद्र ने जवाब दिया,
“क्योंकि राघव और नंदिनी जानते थे कि तुम दोनों के मिलने से एक दिन वो राज खुल जाएगा।”
आरोही ने राघव की तरफ देखा।
“क्या ये सच है?”
राघव ने नजरें झुका लीं।
“हां।”
“तो आपने मुझे बचपन से सब क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तुम बहुत छोटी थीं।”
“मैं बड़ी हो गई हूं।”
“मुझे पता है।”
“फिर भी मुझसे सच क्यों छुपाया?”
राघव ने दर्द भरी आवाज में कहा,
“क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“लेकिन झूठ बोलकर आपने मुझे हर दिन खोया है।”
राघव के पास कोई जवाब नहीं था।
आरव ने आरोही के कंधे पर हाथ रखा।
“अभी हमें असली सवाल का जवाब चाहिए।”
वह देवेंद्र की तरफ मुड़ा।
“तुम हमारे पीछे क्यों पड़े हो?”
देवेंद्र ने कहा,
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे साथ धोखा किया था।”
राघव ने गुस्से में कहा,
“धोखा मैंने नहीं दिया था।”
“तो किसने दिया?”
“तुमने खुद अपने परिवार को बेचा था।”
देवेंद्र का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया।
“मैंने जो किया, अपने परिवार को बचाने के लिए किया।”
राघव ने कहा,
“झूठ।”
देवेंद्र ने अचानक बंदूक निकाल ली।
आरोही डरकर पीछे हट गई।
आरव तुरंत उसके सामने आ गया।
“बंदूक नीचे रखो।”
देवेंद्र ने कहा,
“अगर मुझे मारना होता तो अब तक मार चुका होता।”
फिर उसने बंदूक राघव की तरफ कर दी।
“मुझे सिर्फ फाइल चाहिए।”
राघव ने कहा,
“मेरे पास नहीं है।”
देवेंद्र ने हंसते हुए कहा,
“तुम्हारे पास नहीं है… लेकिन तुम्हारे बेटे के पास है।”
आरव चौंक गया।
“मेरे पास?”
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
“हां।”
आरव को अचानक अपनी कलाई पर बंधी पुरानी घड़ी याद आई।
वह घड़ी उसे बचपन में उसके पिता ने दी थी।
राघव की नजर घड़ी पर पड़ी।
उनका चेहरा बदल गया।
“आरव…”
“क्या हुआ पापा?”
राघव ने धीरे से कहा,
“वो घड़ी मुझे दो।”
आरव ने घड़ी उतारकर उन्हें दे दी।
राघव ने पीछे का छोटा ढक्कन खोला।
अंदर एक बेहद छोटा-सा चिप जैसा टुकड़ा था।
आरोही की आंखें फैल गईं।
“इसमें क्या है?”
राघव ने कहा,
“वही फाइल।”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“आखिर मिल ही गई।”
वह आगे बढ़ा।
लेकिन तभी अद्वैत ने उस पर हमला कर दिया।
बंदूक जमीन पर गिर गई।
कमरे में अफरा-तफरी मच गई।
देवेंद्र और अद्वैत के बीच हाथापाई शुरू हो गई।
आरव ने तुरंत आरोही को पीछे किया।
“तुम यहां से बाहर जाओ।”
आरोही ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“आरोही!”
“मैं तुम्हें अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी।”
आरव उसकी तरफ देखकर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“तुम कभी मेरी बात मानती भी नहीं हो।”
“कभी-कभी।”
“आज नहीं?”
“बिल्कुल नहीं।”
अद्वैत देवेंद्र को रोकने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन देवेंद्र काफी ताकतवर था।
उसने अद्वैत को धक्का दिया।
अद्वैत जमीन पर गिर पड़ा।
देवेंद्र ने बंदूक उठाई।
“अब बहुत हो गया।”
तभी राघव ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।
दोनों में संघर्ष शुरू हो गया।
गोली चलने की आवाज आई।
धांय!
गोली दीवार में लगी।
आरोही चीख पड़ी।
आरव ने उसे अपनी तरफ खींच लिया।
“तुम ठीक हो?”
“हां।”
लेकिन उसी वक्त देवेंद्र ने राघव को जोर से धक्का दिया।
राघव नीचे गिर गए।
देवेंद्र ने घड़ी उठाने की कोशिश की।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“इसे हाथ मत लगाना।”
देवेंद्र ने आरव की आंखों में देखा।
“तुम्हें पता भी है इसमें क्या है?”
“नहीं।”
“तो फिर इसे बचाने की इतनी कोशिश क्यों?”
आरव ने कहा,
“क्योंकि मेरे पिता ने इसे मुझे सौंपा है।”
देवेंद्र हंसा।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें बहुत कुछ नहीं बताया, आरव।”
“क्या?”
देवेंद्र ने कहा,
“तुम्हें ये भी नहीं बताया कि तुम्हारी मां की मौत हादसा नहीं थी।”
आरव जैसे जम गया।
“क्या कहा?”
देवेंद्र ने कहा,
“तुम्हारी मां को मारा गया था।”
आरव की आंखें लाल हो गईं।
“किसने?”
देवेंद्र ने जवाब देने के बजाय राघव की तरफ देखा।
“पूछो अपने पिता से।”
—
राघव की मजबूरी
आरव राघव के पास गया।
“पापा… सच क्या है?”
राघव की आंखों में आंसू थे।
“माधवी को मैंने नहीं मारा।”
“लेकिन किसने?”
राघव ने धीरे से कहा,
“मुझे नहीं पता।”
देवेंद्र हंसा।
“तुम्हें पता है।”
राघव चुप रहे।
आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा, मेरी तरफ देखिए।”
राघव ने उसकी तरफ देखा।
“मां को किसने मारा?”
राघव ने कांपती आवाज में कहा “जिस आदमी पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया था।”
आरव ने पूछा,
“कौन?”
राघव ने नजरें उठाईं।
“समीर।”
अद्वैत जैसे पत्थर का हो गया।
“मेरे पिता?”
राघव ने कहा,
“समीर ने माधवी को नहीं मारा था।”
अद्वैत ने राहत की सांस ली।
“तो?”
राघव बोले,
“लेकिन उसे पता था कि कौन मारने वाला है।”
अद्वैत की आंखों में गुस्सा आ गया।
“फिर उसने बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि उसे डर था।”
देवेंद्र ने कहा,
“डर नहीं था, राघव। लालच था।”
अद्वैत ने देवेंद्र की तरफ देखा।
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“तो फिर अपने पिता की डायरी पढ़ लेना।”
कबीर ने आरव की घड़ी अपने लैपटॉप से कनेक्ट की।
“इसमें डेटा है।”
आरव ने पूछा,
“क्या?”
“कुछ वीडियो फाइलें।”
पहली फाइल खुली।
स्क्रीन पर पच्चीस साल पुराना वीडियो चलने लगा।
एक कमरे में अर्जुन, राघव, नंदिनी और समीर बैठे थे।
आरोही ने स्क्रीन देखते ही कहा,
“ये मां हैं।”
वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।
“अगर हमें कुछ हो गया तो बच्चों को बचाना।”
अर्जुन ने कहा,
“हम दोनों बच्चों को अलग-अलग परिवारों में रखेंगे।”
राघव ने पूछा,
“लेकिन क्यों?”
अर्जुन ने कहा,
“क्योंकि दुश्मन सिर्फ मुझे नहीं ढूंढ रहा। वो दोनों बच्चों को ढूंढ रहा है।”
समीर ने पूछा,
“लेकिन बच्चे क्यों?”
अर्जुन ने जवाब दिया,
“क्योंकि उनके जन्म की रात जो हुआ था… उसका सबूत अस्पताल के रिकॉर्ड में है।”
वीडियो अचानक रुक गया।
दूसरी फाइल अपने आप खुल गई।
इस बार कमरे में सिर्फ नंदिनी थीं।
उनकी आंखों में आंसू थे।
उन्होंने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा “अगर मेरी बेटी ये वीडियो देख रही है तो उसे एक बात जरूर बताना…”
आरोही स्क्रीन के सामने आ गई।
नंदिनी की आवाज कांप रही थी।
“बेटा, तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारे साथ एक और बच्चा है… और उसकी जिंदगी तुम्हारी जिंदगी से जुड़ी हुई है।”
आरोही ने आरव की तरफ देखा।
नंदिनी आगे बोलीं “उस बच्चे को कभी छोड़ना मत।”
वीडियो बंद हो गया।
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
आरव ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं कहीं नहीं जा रहा।”
अचानक देवेंद्र ने धीमी आवाज में कहा,
“तुम लोग अभी भी नहीं समझे।”
सभी उसकी तरफ देखने लगे।
देवेंद्र ने कहा,
“मैं असली दुश्मन नहीं हूं।”
आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“तो कौन है?”
देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,
“वो आदमी जो इस वक्त इस कमरे में खड़ा है।”
सबकी नजरें एक-दूसरे पर घूमने लगीं।
अचानक राघव का चेहरा बदल गया।
उन्होंने कहा,
“नहीं…”
देवेंद्र ने कहा,
“हां।”
फिर उसने धीरे से उंगली उठाई।
“कबीर।”
सब स्तब्ध रह गए।
आरोही ने तुरंत कहा,
“कबीर?”
कबीर पीछे हट गया।
“तुम पागल हो गए हो?”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“नहीं।”
आरव ने कबीर की तरफ देखा।
“कबीर, तुम कुछ कहोगे?”
कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में वही अस्पताल था।
पीछे एक आदमी खड़ा था।
कबीर ने तस्वीर आरव की तरफ बढ़ाई।
“मुझे लगता है अब तुम्हें खुद समझ जाना चाहिए।”
आरव ने तस्वीर देखी।
उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
क्योंकि तस्वीर में खड़ा आदमी…
कबीर के पिता थे।
और उनके हाथ में वही फाइल थी…
जिसे पाने के लिए पच्चीस साल से इतनी हत्याएं होती आ रही थीं।
आरोही ने कबीर की तरफ देखा।
“तुम्हें पहले से सब पता था?”
कबीर की आंखों में आंसू आ गए।
“हां…”
आरव ने कहा,
“तो तुम हमारे साथ इतने सालों से क्यों थे?”
कबीर ने जवाब दिया “क्योंकि मैं तुम्हारा दुश्मन बनकर नहीं… तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे पास आया था।”
तभी पीछे से एक और आवाज आई “लेकिन कबीर ने तुमसे एक बात और छुपाई है।”
सबने पलटकर देखा।
दरवाजे पर…
एक और शख्स खड़ा था।
और उसे देखते ही राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।
“माधवी…?”
आरव की सांसें थम गईं।
उसकी मां सामने खड़ी थी।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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