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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 18

पढ़ने का समय : 10 मिनट

तेरी मेरी दास्तान

 

एपिसोड – 18  मां सामने थी, फिर इतने सालों तक कहां थी?

 

राजवंशी हवेली के उस कमरे में जैसे वक्त थम गया था।

 

दरवाजे पर खड़ी उस औरत को देखकर आरव की सांसें रुक गई थीं।

 

राघव की आंखें नम थीं।

 

उनके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला “माधवी…”

 

आरव ने कांपती आवाज में कहा,

 

“मां…?”

 

उस औरत की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“हां बेटा… मैं तुम्हारी मां हूं।”

 

आरव एक पल के लिए अपनी जगह से हिल ही नहीं पाया।

 

जिस मां को वह पच्चीस साल पहले मर चुकी समझकर बड़ा हुआ था…

 

वही मां आज उसके सामने जिंदा खड़ी थी।

 

आरव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

 

“आप… जिंदा थीं?”

 

माधवी ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“तो आपने मुझे ढूंढा क्यों नहीं?”

 

माधवी के होंठ कांपने लगे।

 

“मैंने बहुत कोशिश की थी।”

 

“फिर?”

 

“मुझे तुम्हारे पास आने नहीं दिया गया।”

 

आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

 

“किसने?”

 

माधवी ने पीछे खड़े देवेंद्र की तरफ देखा।

 

देवेंद्र चुप था।

 

फिर माधवी ने कबीर की तरफ देखा।

 

कबीर भी नजरें झुका चुका था।

 

आरव की आवाज तेज हो गई।

 

“मां, मुझे सच चाहिए।”

 

माधवी ने धीरे से कहा,

 

“जिस रात तुम्हें मुझसे दूर किया गया था… उस रात मुझे बताया गया कि अगर मैंने तुम्हें ढूंढने की कोशिश की तो तुम्हारी जान ले ली जाएगी।”

 

आरव की आंखों से आंसू गिरने लगे।

 

“आपने मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?”

 

माधवी रोते हुए बोलीं,

 

“मां अपने बच्चे पर भरोसा नहीं करती बेटा… मां अपने बच्चे की जिंदगी बचाती है।”

 

आरव अब खुद को रोक नहीं पाया।

 

वह दौड़कर अपनी मां के गले लग गया।

 

माधवी ने उसे कसकर पकड़ लिया।

 

“मेरा बच्चा…”

 

दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

आरोही कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी।

 

उसकी आंखें भी नम थीं।

 

आरव ने इतने सालों बाद अपनी मां को पाया था।

 

लेकिन आरोही के मन में एक सवाल था अगर आरव की मां जिंदा थीं, तो नंदिनी कहां गई थीं?

 

कुछ देर बाद आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़कर पूछा,

 

“मां, मुझे बताया गया था कि आपकी मौत हो गई थी।”

 

माधवी ने कहा,

 

“वो झूठ था।”

 

“किसने फैलाया?”

 

“तुम्हारे पिता ने।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा,

 

“पापा?”

 

राघव आगे आए।

 

“मुझे मजबूर होना पड़ा था।”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“आप दोनों ने मिलकर मुझे इतने साल झूठ में रखा?”

 

राघव की आंखें झुक गईं।

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

माधवी ने कहा,

 

“क्योंकि उस वक्त तुम्हारी जान से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं था।”

 

आरव ने कहा,

 

“लेकिन मैं हर साल अपनी मां की मौत पर रोता रहा।”

 

माधवी ने उसके चेहरे को छुआ।

 

“मुझे पता है।”

 

“कैसे?”

 

“क्योंकि मैं दूर से तुम्हें देखती थी।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

“आपने मुझे देखा था?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“जब तुम स्कूल जाते थे… जब तुम्हारा जन्मदिन होता था… जब तुम पहली बार कॉलेज गए… मैं तुम्हें दूर से देखती थी।”

 

“फिर मेरे पास क्यों नहीं आईं?”

 

“क्योंकि तुम्हारे आसपास हर वक्त निगरानी रहती थी।”

 

आरव की मुट्ठियां भींच गईं।

 

“किसकी?”

 

माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

 

देवेंद्र ने नजरें फेर लीं।

 

आरव ने देवेंद्र की तरफ कदम बढ़ाया।

 

“तुम्हारा इसमें क्या हाथ था?”

 

देवेंद्र ने शांत स्वर में कहा,

 

“मैं तुम्हें बचा रहा था।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“मेरी मां को मुझसे दूर रखकर?”

 

“हां।”

 

“इसे बचाना कहते हो?”

 

देवेंद्र ने कहा,

 

“तुम उस समय बच्चे थे। तुम्हें नहीं पता था कि तुम्हारे पीछे कितने लोग पड़े थे।”

 

आरोही ने बीच में कहा,

 

“और मेरे पीछे?”

 

देवेंद्र उसकी तरफ मुड़ा।

 

“तुम्हारे पीछे भी।”

 

“क्यों?”

 

देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

 

“क्योंकि तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल में जो हुआ था, उसका राज सिर्फ तुम्हारे माता-पिता नहीं जानते थे।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“तो कौन जानता था?”

 

देवेंद्र ने कहा,

 

“कबीर के पिता।”

 

कबीर अचानक बोल पड़ा,

 

“मेरे पिता उस रात वहां थे।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुमने ये बात पहले क्यों नहीं बताई?”

 

कबीर ने कहा,

 

“क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने सच बताया तो तुम दोनों मुझे छोड़ दोगे।”

 

आरोही ने कहा,

 

“तुम्हें हमें सच बताना चाहिए था।”

 

कबीर ने सिर झुका लिया।

 

“मुझे पता है।”

 

अद्वैत ने गुस्से में कहा,

 

“तो तुम जानते थे कि देवेंद्र कौन है?”

 

“हां।”

 

“और राघव कौन हैं?”

 

“हां।”

 

“और माधवी जिंदा हैं?”

 

कबीर ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

 

“हां।”

 

अद्वैत ने उसे धक्का दे दिया।

 

“तुमने हम सबके साथ झूठ किया!”

 

कबीर ने विरोध नहीं किया।

 

“मुझे जो आदेश मिला था, मैंने वही किया।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किसका आदेश?”

 

कबीर ने धीरे से कहा,

 

“तुम्हारे पिता का।”

 

राघव चौंक गए।

 

“मेरा?”

 

कबीर ने कहा,

 

“हां।”

 

“मैंने तुम्हें कभी नहीं कहा था कि आरव और आरोही से सब छुपाओ।”

 

“आपने नहीं कहा था।”

 

“फिर?”

 

कबीर ने देवेंद्र की तरफ देखा।

 

“उन्होंने कहा था।”

 

आरोही ने तुरंत देवेंद्र की तरफ देखा।

 

“आपने कबीर को हमारे पास क्यों भेजा?”

 

देवेंद्र ने कहा,

 

“ताकि तुम दोनों सुरक्षित रहो।”

 

“लेकिन हमसे इतनी बातें छुपाईं क्यों?”

 

देवेंद्र ने गंभीर स्वर में कहा,

 

“क्योंकि तुम दोनों जितना सच जानते, उतना ही खतरा बढ़ता।”

 

आरोही ने अचानक पूछा,

 

“मेरी मां नंदिनी का क्या हुआ?”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

राघव ने आंखें बंद कर लीं।

 

माधवी ने धीरे से कहा,

 

“नंदिनी आखिरी वक्त तक तुम्हें बचाने की कोशिश करती रही।”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“फिर उनकी मौत कैसे हुई?”

 

माधवी ने कहा,

 

“वो मरी नहीं थीं।”

 

आरोही स्तब्ध रह गई।

 

“क्या?”

 

“नंदिनी को भी उसी तरह गायब किया गया था जैसे मुझे।”

 

“तो वो जिंदा हैं?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरोही की सांसें तेज हो गईं।

 

“आपको नहीं पता?”

 

“नहीं।”

 

“लेकिन आपने कहा कि वो मरी नहीं थीं।”

 

माधवी ने कहा,

 

“क्योंकि मैंने अपनी आंखों से उन्हें आखिरी बार देखा था।”

 

“कहां?”

 

“एक पुराने आश्रम में।”

 

“कब?”

 

“दस साल पहले।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“वहां क्या हुआ?”

 

माधवी की आंखों में डर उतर आया।

 

“वहां नंदिनी किसी से मिल रही थीं।”

 

“किससे?”

 

माधवी ने धीरे से कहा “तुम्हारे असली पिता से।”

 

आरोही का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“अर्जुन?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव चौंक गया।

 

“लेकिन अर्जुन तो मर चुके थे।”

 

माधवी ने कहा,

 

“यही तो सवाल है।”

 

कबीर ने तुरंत पूछा,

 

“आप कहना क्या चाह रही हैं?”

 

माधवी ने कहा,

 

“दस साल पहले मुझे नंदिनी और अर्जुन दोनों दिखाई दिए थे।”

 

आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“मतलब मेरे पिता भी जिंदा थे?”

 

“उस वक्त तक।”

 

“फिर?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

राघव ने कहा,

 

“माधवी, तुमने मुझे ये कभी क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि उसके बाद मैं खुद कैद हो गई थी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कहां?”

 

माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

 

देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

 

“देवेंद्र के पास।”

 

आरव का गुस्सा बढ़ गया।

 

“तुमने मेरी मां को कैद करके रखा था?”

 

देवेंद्र ने कहा,

 

“मैंने उन्हें कैद नहीं किया था।”

 

माधवी बोलीं,

 

“तुमने मुझे जाने नहीं दिया था।”

 

देवेंद्र चुप हो गया।

 

आरव ने कहा,

 

“अब तुम सब सच बताओ।”

 

राघव ने अचानक कहा,

 

“हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर देवेंद्र यहां तक पहुंच सकता है, तो बाकी लोग भी पहुंच सकते हैं।”

 

अद्वैत ने कहा,

 

“लेकिन फाइल?”

 

राघव ने कहा,

 

“फाइल अभी पूरी तरह नहीं मिली है।”

 

आरव ने घड़ी की तरफ देखा।

 

“इसमें तो डेटा है।”

 

राघव ने सिर हिलाया।

 

“ये सिर्फ पहला हिस्सा है।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“दूसरा हिस्सा कहां है?”

 

राघव ने कहा,

 

“नंदिनी के पास।”

 

आरोही का दिल धड़क उठा।

 

“अगर नंदिनी जिंदा हैं… तो उनके पास होगा?”

 

“हां।”

 

“तो हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

 

राघव ने कहा,

 

“लेकिन उन्हें ढूंढना आसान नहीं है।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि नंदिनी खुद नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें ढूंढे।”

 

आरोही ने कहा,

 

“क्यों?”

 

राघव ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि वो तुम्हें बचाने के लिए खुद को दुनिया से छुपाए हुए हैं।”

 

सब लोग नीचे जाने की तैयारी कर रहे थे।

 

आरोही अकेली बालकनी में चली गई।

 

आरव उसके पीछे आया।

 

“क्या सोच रही हो?”

 

आरोही ने कहा,

 

“मेरी मां जिंदा हो सकती हैं।”

 

“हां।”

 

“मेरे पिता भी शायद जिंदा थे।”

 

“हां।”

 

“और तुम…”

 

वह रुक गई।

 

आरव ने पूछा,

 

“मैं?”

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“मुझे डर लग रहा है।”

 

आरव उसके करीब आया।

 

“किस बात से?”

 

“कहीं ये सब खत्म होते-होते मैं तुम्हें खो न दूं।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम मुझे नहीं खोओगी।”

 

“वादा?”

 

“वादा।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

 

“अगर हमारे परिवारों का कोई रिश्ता ऐसा निकला जिसकी वजह से हम…”

 

आरव ने उसकी बात पूरी होने से पहले कहा,

 

“तो भी मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूंगा।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“लेकिन अगर किस्मत ने हमें अलग कर दिया तो?”

 

आरव ने धीरे से उसका माथा छूते हुए कहा,

 

“किस्मत ने बहुत कोशिश कर ली।”

 

“अब?”

 

“अब हमारी बारी है।”

 

आरोही हल्का सा मुस्कुरा दी।

 

“तुम हमेशा इतनी बड़ी-बड़ी बातें क्यों करते हो?”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“क्योंकि तुम छोटी-छोटी बातों पर रोने लगती हो।”

 

आरोही ने उसे हल्का सा धक्का दिया।

 

“मैं रोती नहीं हूं।”

 

“अभी भी आंखों में आंसू हैं।”

 

“ये खुशी के हैं।”

 

“अच्छा?”

 

“हां।”

 

आरव ने धीरे से कहा,

 

“तो इन्हें संभालकर रखना।”

 

तभी कबीर तेजी से उनके पास आया।

 

“आरव!”

 

दोनों ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

कबीर ने फोन आगे किया।

 

“अभी एक वीडियो आया है।”

 

आरव ने वीडियो चलाया।

 

स्क्रीन पर एक अंधेरा कमरा था।

 

फिर धीरे-धीरे एक महिला कैमरे के सामने आई।

 

आरोही की सांस रुक गई।

 

वही चेहरा…

 

वही आंखें…

 

वही मां।

 

नंदिनी।

 

वीडियो में नंदिनी रो रही थीं।

 

“आरोही… अगर तुम ये वीडियो देख रही हो तो समझ लेना कि मैं जिंदा हूं।”

 

आरोही के हाथ कांपने लगे।

 

“मां…”

 

वीडियो में नंदिनी आगे बोलीं “मैं तुमसे दूर इसलिए रही क्योंकि मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

 

फिर उन्होंने कैमरे के करीब आकर कहा,

 

“लेकिन अब समय आ गया है कि तुम अपने जन्म का आखिरी सच जानो।”

 

आरोही की सांसें तेज हो गईं।

 

नंदिनी बोलीं “तुम्हारे पिता अर्जुन राजवंशी नहीं थे।”

 

आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“क्या?”

 

आरव भी स्तब्ध रह गया।

 

वीडियो में नंदिनी ने कहा “अर्जुन ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह पाला था… लेकिन तुम्हारे असली पिता कोई और हैं।”

 

वीडियो अचानक बंद हो गया।

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मेरे असली पिता… कौन हैं?”

 

तभी फोन पर दूसरा संदेश आया।

 

सिर्फ एक लाइन “कल सूर्योदय से पहले पुराने शिव मंदिर पहुंचो। वहां तुम्हें अपने पिता मिलेंगे।”

 

आरव ने संदेश पढ़ा।

 

उसने आरोही की तरफ देखा।

 

“हम जाएंगे।”

 

राघव ने तुरंत कहा,

 

“नहीं!”

 

सब उसकी तरफ देखने लगे।

 

राघव के चेहरे पर भय था।

 

“उस मंदिर में मत जाना।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

राघव ने कांपती आवाज में कहा “क्योंकि वही जगह है जहां पच्चीस साल पहले तुम्हारे असली पिता को आखिरी बार देखा गया था।”

 

और तभी…

 

बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज सुनाई दी।

 

एक बार…

 

फिर दूसरी बार…

 

फिर तीसरी बार।

 

देवेंद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

 

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“ये कैसे हो सकता है…?”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

देवेंद्र ने कांपते हुए कहा “क्योंकि उस मंदिर की घंटी पच्चीस साल से बंद है।”

 

जारी रहेगा…

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