एपिसोड – 19 : पच्चीस साल बाद मंदिर की घंटी
राजवंशी हवेली में हर कोई कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा था।
बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज अब भी आ रही थी।
टन…
फिर कुछ सेकंड की खामोशी।
टन…
आरोही ने खिड़की की तरफ देखा।
“ये आवाज सच में उसी मंदिर से आ रही है?”
देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।
“हां।”
आरव ने पूछा,
“लेकिन आपने कहा था कि मंदिर पच्चीस साल से बंद है।”
देवेंद्र की आंखें मंदिर की दिशा में टिकी थीं।
“सिर्फ बंद नहीं… वहां किसी को जाने की इजाजत भी नहीं थी।”
राघव ने गंभीर आवाज में कहा,
“क्योंकि उस मंदिर में आखिरी बार तुम्हारे असली पिता को देखा गया था।”
आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“अगर वो वहां थे… तो क्या वो आज भी…?”
राघव ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी।
“हमें वहां जाना होगा।”
आरव ने कहा,
“अभी?”
राघव ने घड़ी देखी।
“सुबह होने में ज्यादा वक्त नहीं है।”
आरोही ने तुरंत कहा,
“हम जाएंगे।”
राघव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें नहीं पता कि वहां क्या मिलेगा।”
आरोही की आंखों में दृढ़ता थी।
“मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”
आरव उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“और मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“हमेशा?”
आरव मुस्कुराया।
“हमेशा।”
कुछ देर बाद आरव, आरोही, राघव, माधवी, कबीर और अद्वैत मंदिर की तरफ निकल पड़े।
देवेंद्र भी उनके साथ था।
रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
सिर्फ गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दे रही थी।
आरोही खिड़की से बाहर देख रही थी।
उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था मेरे असली पिता कौन हैं?
कुछ देर बाद गाड़ी एक सुनसान रास्ते पर रुकी।
सामने घने पेड़ों के बीच पुराना शिव मंदिर दिखाई दे रहा था।
मंदिर के चारों तरफ बेलें उगी हुई थीं।
दरवाजे पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।
लेकिन सबसे अजीब बात…
मंदिर की घंटी लगातार हिल रही थी।
आरव ने कहा,
“हवा भी नहीं चल रही।”
कबीर ने चारों तरफ देखा।
“तो घंटी कौन बजा रहा है?”
तभी घंटी फिर बजी।
टन…
आरोही की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
वह आरव के करीब आ गई।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“डरो मत।”
“मैं डर नहीं रही।”
“झूठ।”
“थोड़ा।”
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“मैं हूं ना।”
राघव मंदिर के दरवाजे के पास गए।
उन्होंने जंजीर हटाने की कोशिश की।
जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।
सब चौंक गए।
अद्वैत ने कहा,
“ये अपने आप कैसे खुली?”
देवेंद्र ने गंभीर आवाज में कहा,
“क्योंकि कोई अंदर से हमारा इंतजार कर रहा है।”
आरोही ने पूछा,
“कौन?”
देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।
वे सभी मंदिर के अंदर गए।
अंदर धूल जमी थी।
शिवलिंग के सामने एक दीपक जल रहा था।
आरोही ने हैरानी से कहा,
“यहां तो कोई है।”
आरव ने दीपक को देखा।
“ये अभी-अभी जलाया गया है।”
तभी मंदिर की दीवार पर बनी एक पुरानी तस्वीर पर आरोही की नजर पड़ी।
वह तस्वीर के पास गई।
उसमें एक महिला एक छोटे बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी।
आरोही की सांस रुक गई।
“ये… मां हैं।”
राघव ने तस्वीर देखते ही आंखें बंद कर लीं।
“हां।”
आरोही ने पूछा,
“और ये बच्चा?”
राघव ने कहा,
“तुम।”
आरोही ने तस्वीर को छुआ।
“लेकिन ये मंदिर में कैसे?”
माधवी ने कहा,
“क्योंकि तुम्हारी मां ने तुम्हें यहीं आखिरी बार सुरक्षित रखा था।”
कबीर ने मंदिर की दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया।
“यहां कुछ अजीब है।”
एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा बाहर निकला हुआ था।
कबीर ने उसे दबाया।
घर्रर…
फर्श का एक हिस्सा खुल गया।
नीचे सीढ़ियां थीं।
आरव ने कहा,
“नीचे चलते हैं।”
राघव ने उसे रोकना चाहा।
“रुको।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम वो देखो।”
आरव ने पिता की आंखों में देखा।
“अब और कुछ मत छुपाइए।”
राघव चुप हो गए।
आखिरकार बोले,
“ठीक है।”
सब नीचे उतरने लगे।
नीचे एक छोटा कमरा था।
दीवारों पर पुराने दस्तावेज और तस्वीरें लगी थीं।
बीच में एक लकड़ी की मेज थी।
उस पर एक लाल कपड़ा रखा था।
आरोही ने कपड़ा हटाया।
नीचे एक पुराना डिब्बा था।
डिब्बे पर लिखा था “आरोही के लिए।”
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने डिब्बा खोला।
अंदर एक चिट्ठी थी।
आरोही ने कांपते हाथों से उसे खोला।
चिट्ठी में लिखा था “मेरी बेटी आरोही, अगर तुम ये चिट्ठी पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे सामने नहीं हूं।”
आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।
वह पढ़ती गई।
“मैं तुम्हें अपनी बेटी कहने का अधिकार रखता हूं या नहीं, ये फैसला तुम करना। लेकिन इतना जान लो कि मैंने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।”
आरोही के हाथ कांपने लगे।
अगली लाइन थी “तुम्हारी मां नंदिनी ने तुम्हें बचाने के लिए बहुत कुछ खोया है। अगर कभी तुम्हें लगे कि उसने तुम्हें छोड़ दिया, तो उस पर भरोसा करना। उसने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”
आरोही ने चिट्ठी सीने से लगा ली।
“मां…”
आरव उसके पास बैठ गया।
चिट्ठी का आखिरी हिस्सा पढ़ते हुए आरोही की आंखें फैल गईं।
“लेकिन सबसे बड़ा सच अभी बाकी है।”
“तुम्हारा जन्म जिस रात हुआ, उसी रात एक दूसरा बच्चा भी पैदा हुआ था।”
आरव ने धीमे से कहा,
“फिर वही बात…”
आरोही आगे पढ़ने लगी।
“वो बच्चा आरव था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर अगली लाइन “आरव तुम्हारा भाई नहीं है।”
आरोही ने राहत की सांस ली।
लेकिन अगली लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
“क्योंकि आरव… तुम्हारा बचपन का साथी ही नहीं, बल्कि तुम्हारी मां नंदिनी की आखिरी इच्छा से जुड़ा हुआ है।”
आरव ने पूछा,
“क्या मतलब?”
आरोही ने चिट्ठी आगे बढ़ा दी।
चिट्ठी में लिखा था “नंदिनी चाहती थी कि तुम दोनों बड़े होकर एक-दूसरे का साथ दो। उसने कहा था कि अगर दोनों बच्चे एक साथ रहे तो शायद वो राज खुल जाएगा जिसे हमने दुनिया से छुपाया है।”
आरव ने पूछा,
“कौन-सा राज?”
चिट्ठी के आखिरी शब्द थे “तुम दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी है, क्योंकि तुम दोनों के पास उस रात का आधा-आधा सच है।”
आरोही ने सिर उठाया।
“आधा-आधा सच?”
राघव ने कहा,
“हां।”
कबीर ने पूछा,
“लेकिन दूसरा आधा सच कहां है?”
तभी पीछे से किसी ने कहा “मेरे पास।”
सब पलटकर देखने लगे।
मंदिर के अंधेरे कोने से एक आदमी बाहर आया।
उसने सफेद कपड़े पहने थे।
चेहरा आधा ढका हुआ था।
आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।
“तुम कौन हो?”
वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।
“जिसका इंतजार तुम इतने सालों से कर रहे थे।”
आरोही की सांसें रुक गईं।
“पापा?”
आदमी ने चेहरा ऊपर किया।
राघव पीछे हट गए।
माधवी की आंखों में आंसू आ गए।
देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा “अर्जुन…”
आरोही उस आदमी को देखती रह गई।
उसका चेहरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा पुरानी तस्वीरों में था।
“आप… मेरे पिता हैं?”
अर्जुन की आंखें भर आईं।
“हां, बेटी।”
आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।
वह धीरे-धीरे उनके पास गई।
“आपने मुझे इतने साल अकेला क्यों छोड़ा?”
अर्जुन ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
“मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”
“फिर कहां थे?”
“तुम्हें बचा रहा था।”
“किससे?”
अर्जुन की नजर देवेंद्र पर गई।
फिर राघव पर।
फिर कबीर पर।
“उन लोगों से… जिन पर तुमने भरोसा किया।”
आरव ने पूछा,
“और मैं?”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें भी बचाया गया था।”
आरव ने कहा,
“मेरे असली माता-पिता कौन हैं?”
अर्जुन कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“तुम्हारी मां माधवी है।”
आरव ने कहा,
“और पिता?”
अर्जुन ने उसकी आंखों में देखा।
“तुम्हारे पिता…”
अर्जुन अचानक रुक गए।
“क्या हुआ?” आरव ने पूछा।
अर्जुन ने धीरे से कहा “ये सच मैं यहां नहीं बता सकता।”
आरव गुस्से में बोला,
“क्यों?”
“क्योंकि जिसने तुम्हारे परिवार को खत्म किया, वो अभी भी जिंदा है।”
तभी मंदिर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।
अर्जुन ने तुरंत कहा,
“सब लोग पीछे हटो।”
राघव ने पूछा,
“कौन आया है?”
अर्जुन ने कहा “वही… जिसका हम पच्चीस साल से इंतजार कर रहे थे।”
अचानक बाहर से गोलियों की आवाज आने लगी।
धांय! धांय!
मंदिर की खिड़की का शीशा टूट गया।
आरव ने आरोही को नीचे झुका दिया।
“नीचे!”
अद्वैत ने दरवाजे की तरफ देखा।
“बहुत लोग हैं।”
देवेंद्र ने कहा,
“हमें पीछे वाले रास्ते से निकलना होगा।”
अर्जुन ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“अगर हम भागे तो वो मंदिर के नीचे वाला कमरा ढूंढ लेंगे।”
आरव ने पूछा,
“वहां ऐसा क्या है?”
अर्जुन ने कहा,
“तुम दोनों के जन्म का असली रिकॉर्ड।”
आरोही ने कहा,
“तो उसे लेकर चलते हैं।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“वो रिकॉर्ड सिर्फ मैं खोल सकता हूं।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसकी चाबी मेरे पास नहीं…”
उन्होंने आरोही के लॉकेट की तरफ देखा।
“तुम्हारे पास है।”
आरोही ने अपना लॉकेट पकड़ लिया।
“इसमें?”
अर्जुन मुस्कुराए।
“हां।”
आरोही ने लॉकेट खोला।
अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा-सा बटन था।
उसने बटन दबाया।
लॉकेट के अंदर से एक बेहद छोटी चाबी बाहर निकल आई।
आरव ने हैरानी से कहा,
“इतनी छोटी चाबी?”
अर्जुन ने कहा,
“यही वो चाबी है जो पच्चीस साल से छुपी हुई थी।”
आरोही ने पूछा,
“किसकी चाबी?”
अर्जुन ने मंदिर की दीवार की तरफ इशारा किया।
“उस कमरे की।”
दीवार के पीछे एक छोटा ताला था।
आरोही ने चाबी लगाई।
ताला खुल गया।
दीवार के अंदर एक लोहे का बॉक्स था।
अर्जुन ने बॉक्स खोला।
अंदर एक पुरानी फाइल थी।
उसके ऊपर लिखा था “जन्म रिकॉर्ड – गोपनीय।”
आरव और आरोही दोनों आगे बढ़े।
आरव ने पहला पन्ना खोला।
उस पर दो नाम थे बच्ची – आरोही
बच्चा – आरव
लेकिन पिता के नाम वाली जगह देखकर दोनों स्तब्ध रह गए।
आरोही के सामने लिखा था अर्जुन राजवंशी
और आरव के सामने लिखा था अज्ञात।
आरव ने धीरे से पूछा,
“मेरे पिता का नाम अज्ञात क्यों है?”
अर्जुन की आंखों में दर्द था।
“क्योंकि तुम्हारे जन्म का सच… तुम्हारी मां से भी छुपाया गया था।”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
“तो फिर मेरे पिता कौन हैं?”
अर्जुन ने होंठ खोले ही थे कि बाहर से किसी ने जोर से आवाज लगाई “अर्जुन! बाहर आ जाओ!”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
वह आवाज सुनते ही राघव ने सिर झुका लिया।
माधवी की आंखों में डर भर गया।
आरोही ने पूछा,
“कौन है?”
अर्जुन ने धीरे से कहा “तुम्हारा असली दुश्मन।”
बाहर से वही आवाज फिर आई “और अगर आज तुम बाहर नहीं आए… तो इस बार तुम्हारी बेटी नहीं बचेगी।”
आरव तुरंत आरोही के सामने खड़ा हो गया।
अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।
उनकी आंखों में पहली बार पिता वाला गर्व दिखाई दिया।
“अब समझ आया… तुम दोनों को अलग क्यों नहीं किया जा सकता।”
आरोही ने पूछा,
“क्यों?”
अर्जुन ने कहा “क्योंकि तुम दोनों सिर्फ एक-दूसरे की किस्मत नहीं हो… तुम दोनों मिलकर उस आदमी का साम्राज्य खत्म कर सकते हो।”
बाहर से एक जोरदार धमाका हुआ।
मंदिर का दरवाजा टूट गया।
और धुएं के बीच एक आदमी अंदर आया।
उसके चेहरे को देखते ही आरव के मुंह से निकला “चाचा…?”
लेकिन इस बार चाचा अकेले नहीं थे।
उनके पीछे…
विराज सूद खड़ा था।
जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।
विराज ने मुस्कुराकर कहा “बहुत ढूंढ लिया मुझे… अब मेरी बारी है तुम्हें ढूंढने की।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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