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  • काला साया — भाग 1

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    उस रात बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी।आसमान लगातार गरज रहा था और बिजली की सफ़ेद चमक हर कुछ सेकंड में पूरे गाँव को ऐसे रोशन कर देती, जैसे अँधेरे में किसी ने अचानक दिन जला दिया हो। कच्ची गलियों में पानी भर चुका था। पेड़ों की डालियाँ हवा के तेज़ झोंकों से बुरी तरह हिल रही थीं और दूर पुराने पीपल के पेड़ से आती पत्तों की सरसराहट किसी धीमी फुसफुसाहट जैसी लग रही थी।

     

    बारिश से बचने के लिए आरव अपनी मोटरसाइकिल तेज़ चला रहा था।

     

    शहर से गाँव लौटते समय उसने सोचा था कि आधे घंटे में घर पहुँच जाएगा, लेकिन रास्ते में उसकी बाइक अचानक बंद हो गई। उसने कई बार किक मारी, मगर इंजन ने जवाब नहीं दिया।

     

    “इस वक्त ही खराब होना था?” आरव ने झुँझलाकर कहा।

     

    उसने मोबाइल निकाला। नेटवर्क गायब था।

     

    चारों तरफ़ सिर्फ़ बारिश थी।

     

    तभी बिजली चमकी और उसकी रोशनी में सड़क के किनारे एक पुराना, जर्जर मकान दिखाई दिया।

     

    आरव ने उस घर को पहले कभी नहीं देखा था।

     

    घर की दीवारें काली पड़ चुकी थीं। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था। सबसे अजीब बात यह थी कि इतनी तेज़ हवा और बारिश के बावजूद दरवाज़ा बिल्कुल स्थिर था।

     

    आरव ने बाइक सड़क के किनारे खड़ी की और घर की तरफ़ बढ़ गया।

     

    जैसे ही उसने दरवाज़े को धक्का दिया, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर घुप्प अँधेरा था।

     

    “कोई है?” आरव ने आवाज़ लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह मोबाइल की टॉर्च जलाकर अंदर गया। कमरे में पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी। दीवारों पर कुछ धुँधली तस्वीरें टंगी थीं। एक तस्वीर के सामने पहुँचकर आरव रुक गया।

     

    तस्वीर में एक युवती थी।

     

    काले कपड़े पहने हुए, लंबे बाल चेहरे पर आधे बिखरे हुए और आँखें बिल्कुल सीधी कैमरे की तरफ़।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—साया।

     

    आरव ने अजीब-सी बेचैनी महसूस की।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव घबरा गया।

     

    “कोई है ऊपर?”

     

    वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा। हर सीढ़ी पर उसके कदमों की आवाज़ गूँज रही थी। ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि एक पुराना कमरा खुला हुआ था।

     

    कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर काले बालों का एक गुच्छा पड़ा था।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

     

    आरव का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने घबराकर नीचे भागना चाहा, लेकिन तभी नीचे का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव सीढ़ियों पर ही रुक गया।

     

    बारिश की आवाज़ अचानक और तेज़ लगने लगी।

     

    फिर उसे नीचे से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ रही थी।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी नीचे डाली।

     

    सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक औरत खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लंबे काले बाल पूरे चेहरे को ढँके हुए थे।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    बालों के बीच से दो बिल्कुल सफ़ेद आँखें दिखाई दीं।

     

    “साया…” आरव के मुँह से अनजाने में निकला।

     

    औरत ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया।

     

    “मेरा नाम… तुम्हें किसने बताया?”

     

    आरव पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।

     

    तभी बिजली चमकी।

     

    एक पल के लिए पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

     

    और अगले ही पल वह औरत गायब थी।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन वे निशान दरवाज़े से अंदर नहीं आए थे।

     

    वे सीधे दीवार से निकलकर कमरे तक पहुँचे थे।

     

    आरव ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। इस बार दरवाज़ा आसानी से खुल गया।

     

    वह दौड़ता हुआ बाहर आया।

     

    बारिश अब भी हो रही थी।

     

    उसने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार बाइक तुरंत चालू हो गई।

     

    आरव बिना पीछे देखे गाँव की तरफ़ भागा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे महसूस हुआ कि पीछे कोई बैठा है।

     

    सीट पर किसी के बैठने का भार साफ़ महसूस हो रहा था।

     

    उसने शीशे में देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास वही फुसफुसाहट आई—

     

    “तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते…”

     

    आरव ने डरकर बाइक रोक दी।

     

    पीछे मुड़ा।

     

    सीट खाली थी।

     

    लेकिन सीट पर पानी से एक शब्द लिखा था—

     

    “वापस आना।”

     

    उस रात आरव घर तो पहुँच गया, मगर सुबह होते ही उसने देखा कि उसकी दाहिनी कलाई पर काले रंग का एक निशान बना हुआ था।

     

    वह निशान बिल्कुल किसी हाथ की उँगलियों जैसा था।

     

    और उसके कमरे की खिड़की के बाहर बारिश से भीगी दीवार पर किसी ने उँगली से लिखा था—

     

    “साया अभी जागी है।”

  • 😱 आहट 😱 (Last part-5)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव अपने पिता को सामने देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसका चेहरा वही था जिसे उसने बचपन से तस्वीरों में देखा था।

     

    वही आँखें…

     

    वही चेहरा…

     

    लेकिन उसके शरीर के चारों तरफ धुंध की एक परत थी।

     

    आरव की आवाज़ काँप गई।

     

    “पापा…?”

     

    उस आकृति ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ, बेटा।”

     

    दीनानाथ पीछे हट गया।

     

    “राघव…”

     

    आरव ने अपने पिता से पूछा—

     

    “आपने मुझे इतने सालों तक सच क्यों नहीं बताया?”

     

    राघव ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “लेकिन मैं सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाया!”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे हमेशा लगता रहा कि मेरे अंदर कुछ अधूरा है। अब पता चल रहा है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “झूठ नहीं था, बेटा। वह मेरी मजबूरी थी।”

     

    आरव ने चिट्ठी उठाई।

     

    “इसमें लिखा है कि देवेंद्र से मेरा रिश्ता मेरी सोच से ज्यादा गहरा है। इसका क्या मतलब है?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “देवेंद्र तुम्हारा चाचा नहीं था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कौन था?”

     

    राघव की आवाज़ भारी हो गई।

     

    “वह तुम्हारा पिता था।”

     

    आरव की साँस जैसे रुक गई।

     

    “नहीं…”

     

    “मीरा से तुम्हारा जन्म हुआ था। देवेंद्र तुम्हारा जैविक पिता था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो आपने मुझे क्यों पाला?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि देवेंद्र तुम्हें अपने लालच के लिए इस्तेमाल करना चाहता था। तुम्हारे दादा ने पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी। देवेंद्र तुम्हें खत्म करना चाहता था।”

     

    “और मीरा?”

     

    “मीरा ने तुम्हें बचाने के लिए अपनी जान दे दी।”

     

    आरव की आँखों के सामने सारी घटनाएँ घूमने लगीं।

     

    वह हवेली…

     

    बंद कमरा…

     

    आईना…

     

    मीरा की आत्मा…

     

    और वह आहट।

     

    तभी राघव ने कहा—

     

    “लेकिन देवेंद्र को पूरी तरह खत्म करना जरूरी था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपने उसे कैसे रोका?”

     

    “मैंने उसे उसी रात तहखाने में बंद कर दिया। लेकिन वह मरने से पहले एक श्राप छोड़ गया।”

     

    दीनानाथ ने काँपते हुए कहा—

     

    “उसने कहा था कि जब तक उसका खून इस हवेली में वापस नहीं आएगा, उसकी आत्मा मुक्त नहीं होगी।”

     

    आरव ने समझते हुए पूछा—

     

    “इसलिए उसने मुझे बुलाया?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    कब्रिस्तान की मिट्टी फटने लगी।

     

    हवा में तेज़ ठंड फैल गई।

     

    दीनानाथ चिल्लाया—

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा!”

     

    लेकिन तभी सामने की जमीन से एक काला धुआँ उठने लगा।

     

    उस धुएँ के बीच देवेंद्र की आकृति दिखाई दी।

     

    “भागोगे कहाँ?”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कब्रिस्तान में गूँज उठी।

     

    आरव ने अपने पिता की ओर देखा।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम्हें हवेली वापस जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस कहानी का अंत वहीं होगा जहाँ इसकी शुरुआत हुई थी।”

     

    कुछ ही देर बाद आरव और दीनानाथ वापस हवेली पहुँचे।

     

    हवेली पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी।

     

    खिड़कियाँ खुली थीं।

     

    दरवाज़े अपने आप हिल रहे थे।

     

    और अंदर से लगातार एक ही आवाज़ आ रही थी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    दीवार पर लगी घड़ी फिर बारह बजे पर रुक गई।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने आरव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “डरो मत।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “माँ… अब क्या करना है?”

     

    मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें उस कमरे में जाना होगा जहाँ मेरा अंत हुआ था।”

     

    आरव तीसरी मंज़िल पर पहुँचा।

     

    बंद कमरा अब खुला था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।

     

    उसके सामने देवेंद्र खड़ा था।

     

    “आ गए मेरे बेटे?”

     

    आरव ने दृढ़ आवाज़ में कहा—

     

    “मैं तुम्हारा बेटा हूँ, लेकिन तुम्हारी तरह नहीं बनूँगा।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “तुम्हारे खून में मेरा खून है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “खून इंसान को नहीं बनाता। उसके कर्म बनाते हैं।”

     

    देवेंद्र का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे खिलाफ कर दिया।”

     

    “नहीं,” आरव ने कहा, “तुम्हारे कर्मों ने किया।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    कमरे की सारी चीज़ें हवा में उठने लगीं।

     

    कुर्सी दीवार से जा टकराई।

     

    खिड़कियों के शीशे टूटने लगे।

     

    दीनानाथ बाहर से चिल्लाया—

     

    “आरव! मीरा का लॉकेट!”

     

    आरव ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

     

    जैसे ही उसने उसे हाथ में पकड़ा, कमरे में तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।

     

    मीरा सामने आ गई।

     

    देवेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यह लॉकेट उस रात मेरे पास था। इसमें तुम्हारी सारी ताकत नहीं, तुम्हारा सच बंद है।”

     

    आरव ने लॉकेट जमीन पर रख दिया।

     

    अचानक कमरे में मीरा, राघव और देवेंद्र तीनों दिखाई देने लगे।

     

    तीनों की आत्माएँ जैसे एक-दूसरे से जुड़ गईं।

     

    राघव ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, हमें जाने दो।”

     

    आरव समझ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं और कहा—

     

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    राघव ने भी मुस्कुराकर सिर झुका दिया।

     

    लेकिन देवेंद्र चीख रहा था।

     

    “नहीं! मैं नहीं जाऊँगा!”

     

    उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।

     

    मीरा ने उसकी ओर देखा।

     

    “अब इस घर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।”

     

    अचानक कमरे में जोरदार रोशनी हुई।

     

    देवेंद्र की परछाईं चीखते हुए दीवार में समा गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आखिरी बार आवाज़ आई।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    सुबह होने तक हवेली पूरी तरह शांत थी।

     

    आरव बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गया।

     

    पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो।

     

    दीनानाथ उसके पास आया।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    आरव ने हवेली की ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन तभी ऊपर तीसरी मंज़िल की खिड़की में उसे एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    आरव ने हाथ जोड़ दिए।

     

    अगले ही पल वह आकृति गायब हो गई।

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने हवेली को गिराने का फैसला किया।

     

    मजदूरों ने काम शुरू किया।

     

    जब तीसरी मंज़िल की दीवार तोड़ी गई, तो उसके अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर सिर्फ एक कागज़ था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “हर आहट डर की निशानी नहीं होती। कभी-कभी कोई अपना यह बताने आता है कि वह अब भी तुम्हारे साथ है।”

     

    आरव ने वह कागज़ संभालकर रख लिया।

     

    उसने हवेली को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    ठीक एक साल बाद…

     

    आरव अपने नए घर में रात को अकेला बैठा था।

     

    घड़ी में बारह बज रहे थे।

     

    अचानक उसके कमरे के बाहर से आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव की आँखें खुल गईं।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर सिर्फ एक छोटा सा लॉकेट पड़ा था।

     

    वही लॉकेट…

     

    जो उसने हवेली में छोड़ दिया था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    पीछे एक नया वाक्य खुदा हुआ था—

     

    “आरव, कहानी खत्म नहीं हुई…”

     

    उसी क्षण उसके पीछे से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    उसके गले में वही लॉकेट था।

     

    और उसकी आँखें बिल्कुल मीरा जैसी थीं।

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    और अंधेरे में आखिरी बार वही आवाज़ गूँजी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    समाप्त।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    दीनानाथ की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    “देवेंद्र वापस आ गया है… इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने दरवाज़ा बंद किया और धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुमने तहखाने में देखा, वह देवेंद्र की आत्मा थी।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैंने उसे देखा था। वह इंसान की तरह था।”

     

    “यही तो उसकी ताकत है।”

     

    दीनानाथ ने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “लेकिन अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    “कहाँ जाना है?”

     

    “तुम्हारे पिता के कमरे में।”

     

    दोनों हवेली के दूसरी मंज़िल पर पहुँचे।

     

    दीनानाथ ने एक पुराने कमरे का ताला खोला।

     

    कमरे में एक बड़ी मेज़, पुरानी किताबें और लकड़ी की अलमारी थी।

     

    आरव ने दीवार पर अपने पिता की तस्वीर देखी।

     

    उसके नीचे एक तारीख लिखी थी—

     

    18 जुलाई 1998।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मीरा को मारने की कोशिश नहीं की थी। वह उसे बचाना चाहते थे।”

     

    “तो फिर मीरा मरी कैसे?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    “उस रात देवेंद्र को पता चल गया था कि मीरा माँ बनने वाली है।”

     

    आरव ध्यान से सुनने लगा।

     

    “देवेंद्र तुम्हारे पिता का बड़ा भाई था। उसे लगता था कि परिवार की सारी संपत्ति उसी की होगी। लेकिन तुम्हारे दादा ने अपनी वसीयत बदल दी थी। उन्होंने तय किया था कि पूरी संपत्ति उस बच्चे के नाम होगी जो मीरा से पैदा होने वाला था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “इसलिए उसने बच्चे को मारने की कोशिश की?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर?”

     

    दीनानाथ ने एक पुरानी डायरी मेज़ पर रख दी।

     

    “यह तुम्हारे पिता की डायरी है।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “17 जुलाई की रात।”

     

    “आज मीरा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डॉक्टर को हवेली तक आने में देर हो रही है। देवेंद्र लगातार घर के आसपास घूम रहा है। मुझे डर है कि वह कुछ कर सकता है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रात 11:40 बजे।”

     

    “बच्चा पैदा हो चुका है। मीरा और बच्चा सुरक्षित हैं। लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।”

     

    फिर एक पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद लिखा था—

     

    “रात 12:05 बजे।”

     

    “देवेंद्र अंदर आ गया। उसने बच्चे को छीनने की कोशिश की। मीरा ने बच्चे को बचाने के लिए खुद को उसके सामने खड़ा कर दिया।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अगले शब्द पढ़ते हुए उसके हाथ काँपने लगे।

     

    “देवेंद्र ने मीरा को धक्का दिया। उसका सिर पत्थर की मेज़ से टकराया। वह वहीं गिर गई।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    “और मेरे पिता?”

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता देवेंद्र से लड़ने लगे। लेकिन तब तक मीरा की साँसें बंद हो चुकी थीं।”

     

    आरव की आँखों के सामने मीरा का चेहरा घूमने लगा।

     

    “फिर मुझे किसने बचाया?”

     

    दीनानाथ ने उत्तर दिया—

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन मेरी परवरिश तो मेरी माँ ने की थी।”

     

    दीनानाथ ने धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुम माँ समझते रहे… वह मीरा की बड़ी बहन थी।”

     

    आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    “मीरा की बहन ने तुम्हें अपना बच्चा बनाकर पाला। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी पहचान छिपा दी ताकि देवेंद्र तुम्हें कभी ढूँढ़ न सके।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    धड़ाम!

     

    दीनानाथ ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में किसी की परछाईं खड़ी थी।

     

    “वह आ गया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    वही आदमी।

     

    देवेंद्र।

     

    उसका चेहरा अब पहले से भी ज्यादा डरावना था।

     

    “तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    दीनानाथ ने बंदूक उठाई और गोली चला दी।

     

    धाँय!

     

    गोली देवेंद्र के शरीर से आर-पार निकल गई।

     

    लेकिन वह वहीं खड़ा रहा।

     

    उसने दीनानाथ की ओर देखा।

     

    “तुमने उस रात भी मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    दीनानाथ काँपने लगा।

     

    “मैंने गलती की थी।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “गलती?”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    दीनानाथ हवा में उठ गया और दीवार से जा टकराया।

     

    आरव ने चिल्लाकर कहा—

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    देवेंद्र उसकी ओर मुड़ा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे हराने की कोशिश की थी। उन्होंने मुझे इस हवेली के तहखाने में बंद कर दिया था। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि मैं मरने के बाद भी वापस आ सकता हूँ।”

     

    “तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा खून।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि संपत्ति का अधिकार तुम्हारे पास है। तुम्हारे मरते ही वह अधिकार खत्म हो जाएगा।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    आरव अचानक जमीन से उठने लगा।

     

    उसकी साँस रुकने लगी।

     

    तभी कमरे में मीरा की आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना!”

     

    देवेंद्र रुक गया।

     

    कमरे में ठंडी हवा फैल गई।

     

    मीरा की आत्मा आरव और देवेंद्र के बीच खड़ी थी।

     

    “तुमने मेरा बच्चा मुझसे छीना था।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “और अब मैं उसे भी छीन लूँगा।”

     

    मीरा की आँखें लाल हो गईं।

     

    अचानक दीवारों से कई हाथ निकलने लगे।

     

    देवेंद्र पीछे हट गया।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “भागो!”

     

    आरव ने दीनानाथ को उठाया और दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े।

     

    लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले ही मीरा ने चीखकर कहा—

     

    “आरव, अपने पिता की कब्र के नीचे देखना!”

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    आरव और दीनानाथ बाहर निकल गए।

     

    कुछ देर बाद पीछे से जोरदार धमाका हुआ।

     

    पूरी हवेली काँप उठी।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    तीसरी मंज़िल की खिड़की में मीरा खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाकर आरव को इशारा किया।

     

    फिर खिड़की के पीछे अंधेरा छा गया।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “अब तुम्हें अपने पिता की कब्र पर जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस पूरी कहानी का आखिरी सच वहीं छिपा है।”

     

    अगली सुबह दोनों कब्रिस्तान पहुँचे।

     

    आरव अपने पिता की कब्र के सामने खड़ा था।

     

    उसने मिट्टी हटानी शुरू की।

     

    कुछ देर बाद फावड़ा किसी लोहे की चीज़ से टकराया।

     

    ठन!

     

    आरव ने मिट्टी हटाई।

     

    वहाँ एक लोहे का छोटा संदूक था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के योग्य हो जाए।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर एक वीडियो कैमरा, कुछ कागज़ और एक छोटी सी चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे ऊपर एक चिट्ठी रखी थी।

     

    आरव ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई—

     

    “आरव, अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि मीरा अब तुम्हें बचाने के लिए वापस आ चुकी है।”

     

    लेकिन चिट्ठी की आखिरी लाइन ने आरव को अंदर तक हिला दिया—

     

    “देवेंद्र से तुम्हारा रिश्ता जितना तुम सोचते हो, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।”

     

    आरव ने सिर उठाकर दीनानाथ की ओर देखा।

     

    दीनानाथ के चेहरे पर डर था।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “इसका मतलब… देवेंद्र सिर्फ तुम्हारे चाचा नहीं थे।”

     

    अचानक पीछे से वही आहट सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कब्रिस्तान में कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके पिता की कब्र के पीछे एक नई कब्र दिखाई दे रही थी।

     

    उस पर नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र राघव सिंह।”

     

    और नीचे तारीख थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    आरव के हाथ से चिट्ठी गिर गई।

     

    क्योंकि उसी क्षण उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “बेटा…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    और वहाँ…

     

    उसका अपना पिता खड़ा था।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

    आरव कुछ क्षणों तक उस अंधेरी सीढ़ी के सामने खड़ा रहा। नीचे से आती कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने टॉर्च नीचे की ओर की।

     

    सीढ़ियाँ पुरानी थीं। उन पर मोटी धूल जमी हुई थी, लेकिन कुछ जगहों पर ताज़ा गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    आरव ने खुद को संभाला और नीचे उतरना शुरू किया।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    तहखाने में पहुँचते ही उसकी नाक में मिट्टी और सड़न की तेज़ गंध आई।

     

    सामने एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने लालटेन लगे थे। कुछ टूटी कुर्सियाँ और लकड़ी के बक्से इधर-उधर पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज़ कमरे के बीच में रखी एक पुरानी मेज़ थी।

     

    उस मेज़ पर एक लाल कपड़ा बिछा था।

     

    और उसके ऊपर एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।

     

    पहले सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।

     

    फिर एक आवाज़ आई।

     

    आरव ने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह उसके पिता की आवाज़ थी।

     

    “अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, आरव… तो इसका मतलब है कि तुम हवेली तक पहुँच चुके हो।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    रिकॉर्डिंग में उसके पिता बोल रहे थे—

     

    “मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें सच बताना पड़ेगा। लेकिन मैं चाहता था कि वह दिन जितना देर से आए, उतना अच्छा हो।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “मीरा की मौत के पीछे देवेंद्र था। लेकिन देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    आरव ने टेप रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “उस रात मीरा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। वह बच्चा…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    आरव ने टेप को थपथपाया।

     

    “नहीं… नहीं… आगे बोलो!”

     

    टेप फिर चला।

     

    “वह बच्चा ही इस पूरे राज़ की वजह था।”

     

    आरव के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “देवेंद्र उस बच्चे को खत्म करना चाहता था। मैंने बच्चे को बचाने की कोशिश की, लेकिन मीरा को नहीं बचा पाया।”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “अगर तुम यह सुन रहे हो तो याद रखना… तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

     

    टेप अचानक बंद हो गया।

     

    आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।

     

    “तो… मैं कौन हूँ?”

     

    तभी तहखाने के दूसरे कोने से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आरव धीरे-धीरे आवाज़ की ओर बढ़ा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।

     

    पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    आरव ने काँपते हाथ से पालने के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।

     

    अंदर कोई बच्चा नहीं था।

     

    सिर्फ एक पुराना काला लॉकेट पड़ा था।

     

    आरव ने लॉकेट उठाया।

     

    उसके पीछे एक तारीख खुदी थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कमरे में अब वह अकेला नहीं था।

     

    एक आदमी दीवार के पास खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा।

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ भारी थी।

     

    “मैं देवेंद्र हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन… देवेंद्र तो मर चुका है।”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते।”

     

    तभी कमरे की सारी लालटेन एक साथ बुझ गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ देवेंद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। लेकिन वह एक बात छिपाना भूल गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र की हँसी गूँज उठी।

     

    “तुम इस हवेली के वारिस नहीं हो… तुम इसके कैदी हो।”

     

    अचानक आरव के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।

     

    वह एक गड्ढे में गिर पड़ा।

     

    उसके सिर पर जोर से चोट लगी और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसे होश आया तो वह उसी बंद कमरे में था, जहाँ मीरा का आईना था।

     

    उसके सामने मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं…

     

    गुस्सा था।

     

    उसने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर एक-एक करके कई तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    पहली तस्वीर में उसके पिता थे।

     

    दूसरी में मीरा।

     

    तीसरी में देवेंद्र।

     

    और चौथी तस्वीर में…

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    आरव उस तस्वीर को देखते ही समझ गया।

     

    बच्चे के गले में वही लॉकेट था जो अभी उसके हाथ में था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा।”

     

    अचानक आईना टूट गया।

     

    छन्न्न!

     

    काँच के टुकड़ों के बीच एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “माँ तुम्हारी हत्या करने नहीं, तुम्हें बचाने आई है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “लेकिन मेरी माँ कौन है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने आरव की ओर देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मैं।”

     

    उसी क्षण कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    बाहर बिजली चमकी।

     

    और आरव ने पहली बार उस चेहरे को साफ देखा।

     

    वह वही महिला थी जो उसके पिता की तस्वीर में खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर मीरा उसकी माँ थी…

     

    तो फिर उसकी असली मौत कब हुई थी?

     

    और उसकी परवरिश किसने की थी?

     

    जवाब मिलने से पहले ही हवेली के नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    आवाज़ उसके पिता की थी।

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव दरवाज़े की ओर भागा।

     

    लेकिन दरवाज़े के बाहर अब वही बूढ़ा दीनानाथ खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किस लिए?”

     

    दीनानाथ की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “क्योंकि आज रात देवेंद्र वापस आ गया है।”

     

    और उसी पल हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन… टन… टन…

     

    लेकिन घड़ी की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आई—

     

    एक बच्चे की हँसी।

     

    आरव समझ गया…

     

    असली डर अब शुरू हुआ था।

  • 😱आहट😱 — उस बंद कमरे का राज़(part-2)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    हवेली के बाहर बारिश लगातार बरसती रही और अंदर पुरानी दीवारों से आती अजीब-अजीब आवाज़ें उसके डर को और बढ़ाती रहीं। कभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आहट आती, कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर आकर रुक गया हो।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर बार जब वह दरवाज़ा खोलकर देखता, वहाँ कोई नहीं होता।

     

    सुबह होते ही बारिश कुछ कम हुई।

     

    आरव ने रात वाली डायरी फिर से खोली।

     

    उसके पिता की लिखावट में कई पन्ने भरे हुए थे, लेकिन ज्यादातर जगहों पर शब्द काट दिए गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कुछ लिखने के बाद जानबूझकर उसे मिटा दिया हो।

     

    एक पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था—

     

    “17 जुलाई 1998 को जो हुआ, वह दुर्घटना नहीं थी।”

     

    आरव ने तारीख पढ़कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    वही तारीख जो उसे पिछली रात तस्वीर के पीछे लिखी मिली थी।

     

    उसने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “मीरा को मैंने नहीं मारा।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    मीरा कौन थी?

     

    क्या तस्वीर में उसके पिता के साथ खड़ी महिला का नाम मीरा था?

     

    उसने तुरंत अपना मोबाइल उठाया और गाँव में रहने वाले उस बूढ़े आदमी को फोन किया, जिसने उसे हवेली में रात न बिताने की चेतावनी दी थी।

     

    कुछ देर बाद बूढ़ा हवेली के बाहर आ गया।

     

    उसका नाम दीनानाथ था।

     

    आरव ने तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    “क्या आप इन्हें जानते हैं?”

     

    दीनानाथ ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

     

    “मैं कुछ नहीं जानता।”

     

    “झूठ मत बोलिए।”

     

    आरव की आवाज़ में गुस्सा था।

     

    “यह मेरे पिता हैं। और यह महिला कौन है?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

     

    “उसका नाम मीरा था।”

     

    “मेरे पिता उसे जानते थे?”

     

    “सिर्फ जानते नहीं थे…”

     

    दीनानाथ अचानक रुक गया।

     

    आरव ने पूछा, “क्या रिश्ता था उनका?”

     

    बूढ़े ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मीरा से शादी करना चाहते थे।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “लेकिन मेरे पिता की शादी तो मेरी माँ से हुई थी।”

     

    दीनानाथ ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मीरा शादी के दिन मर गई थी।”

     

    कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

     

    आरव ने पूछा, “कैसे?”

     

    दीनानाथ ने हवेली की तीसरी मंज़िल की ओर देखा।

     

    “उसी कमरे में।”

     

    आरव की निगाहें तुरंत सीढ़ियों की ओर चली गईं।

     

    वही कमरा…

     

    जिसके बाहर लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    “क्या हुआ था उस रात?”

     

    दीनानाथ ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह वापस जाने लगा।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    “रुकिए! मुझे सब जानना है।”

     

    दीनानाथ ने बिना पीछे देखे कहा—

     

    “अगर सच जानना है, तो आज रात बारह बजे से पहले हवेली छोड़ देना।”

     

    “और अगर मैं नहीं गया?”

     

    बूढ़ा वहीं रुक गया।

     

    उसने पलटकर आरव की आँखों में देखा।

     

    “तो फिर वह तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी।”

     

    यह कहकर वह चला गया।

     

    आरव देर तक वहीं खड़ा रहा।

     

    उसके मन में डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा सवाल थे।

     

    आखिर उसके पिता ने इतने वर्षों तक मीरा का सच उससे क्यों छिपाया?

     

    और वह हर रात हवेली में क्यों आती थी?

     

    शाम होते-होते आरव ने फैसला कर लिया।

     

    वह आज रात उस कमरे का दरवाज़ा खोलेगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे उसने टॉर्च, कैमरा और डायरी अपने बैग में रखी और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    पहली मंज़िल पार करने के बाद दूसरी मंज़िल आई।

     

    यहाँ हवा अचानक बहुत ठंडी थी।

     

    उसने हाथों से साँस की गर्मी महसूस की।

     

    तीसरी मंज़िल की सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    सीढ़ियों पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन इस बार वे निशान नीचे से ऊपर नहीं आ रहे थे।

     

    वे उसके पीछे थे।

     

    जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा होकर चल रहा हो।

     

    आरव ने अचानक पीछे मुड़कर टॉर्च जलाई।

     

    कुछ नहीं था।

     

    उसने लंबी साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    बंद कमरा सामने था।

     

    लोहे की जंजीर अब भी दरवाज़े पर बंधी थी।

     

    आरव ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    खनन!

     

    आरव का दिल धड़क उठा।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    कमरे की दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक तरफ लकड़ी की अलमारी थी।

     

    दूसरी तरफ टूटा हुआ आईना।

     

    और कमरे के बीचोंबीच एक पुराना पलंग।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    अचानक दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    वह तुरंत पलटा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी आईने में उसे कुछ दिखाई दिया।

     

    उसके पीछे एक महिला खड़ी थी।

     

    सफेद साड़ी…

     

    लंबे बाल…

     

    झुका हुआ सिर…

     

    आरव ने डरते हुए पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने दोबारा आईने की तरफ देखा।

     

    महिला अब भी वहाँ थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके माथे से खून बह रहा था।

     

    और उसकी आँखें सीधे आरव को देख रही थीं।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी आईने पर अपने आप उंगली से शब्द लिखने लगे—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं मारा…”

     

    आरव की साँस अटक गई।

     

    फिर दूसरा वाक्य उभरा—

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे बचाया भी नहीं।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “किसने मारा तुम्हें?”

     

    आईने पर कुछ देर तक कोई हलचल नहीं हुई।

     

    फिर धीरे-धीरे एक नाम लिखा गया—

     

    “देवेंद्र।”

     

    आरव ने नाम पढ़ा।

     

    देवेंद्र?

     

    उसे यह नाम जाना-पहचाना लगा।

     

    तभी अलमारी के अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर पुराने कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का डिब्बा रखा था।

     

    डिब्बे पर उसके पिता के नाम का पहला अक्षर खुदा था।

     

    आरव ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक पुरानी चिट्ठी थी।

     

    चिट्ठी पर लिखा था—

     

    “राघव के लिए — मीरा।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

     

    “राघव, अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो तो समझ लेना कि मैं खतरे में हूँ। देवेंद्र को सब पता चल गया है। वह हमें अलग करना चाहता है। अगर आज रात मेरे साथ कुछ हो जाए तो आरव को कभी इस हवेली में मत लाना…”

     

    आरव आगे पढ़ ही रहा था कि अचानक कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    “माँ…”

     

    आरव जम गया।

     

    उसने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    फिर वही आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आवाज़ पलंग के नीचे से आ रही थी।

     

    आरव ने टॉर्च नीचे की।

     

    वहाँ एक छोटा सा लकड़ी का बक्सा था।

     

    उसने बक्सा बाहर खींचा।

     

    जैसे ही उसने ढक्कन खोला, अंदर एक पुरानी तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में मीरा थी।

     

    उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

     

    और बच्चे के गले में वही लॉकेट था…

     

    जो आरव बचपन से अपनी माँ के पास देखा करता था।

     

    आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    एक ठंडी फुसफुसाहट उसके कान में आई—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि तुम यहाँ क्यों बुलाए गए हो?”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    मीरा उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा भयानक नहीं था।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    उसने अपना हाथ उठाकर दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर धीरे-धीरे एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई देने लगा।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं जो नीचे की ओर जा रही थीं।

     

    और सीढ़ियों के नीचे से किसी आदमी की भारी आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव… बहुत देर कर दी तुमने।”

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव अकेला खड़ा रह गया।

     

    उसके सामने अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    और नीचे…

     

    किसी के कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने टॉर्च कसकर पकड़ी।

     

    उसे अब समझ आ चुका था—

     

    इस हवेली का सबसे बड़ा राज़ अभी बाकी था।

  • 😱आहट 😱— उस बंद कमरे का राज़ (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और आसमान में बार-बार बिजली चमक रही थी। शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर, पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी—रुद्रपुर हवेली।

     

    कई सालों से उस हवेली में कोई नहीं रहता था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय हवेली के अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आती है। कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई देती, तो कभी ऐसा लगता जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा होकर धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के मुख्य दरवाज़े पर हमेशा एक पुरानी लोहे की कुंडी लगी रहती थी।

     

    फिर भी…

     

    हर रात वहाँ से आहट आती थी।

     

    उसी हवेली को खरीदने के लिए उस रात आरव वहाँ पहुँचा था।

     

    आरव शहर का रहने वाला था और पेशे से फोटोग्राफर। कुछ महीनों पहले उसके पिता की मृत्यु हुई थी और उन्हें विरासत में रुद्रपुर हवेली मिली थी। पिता ने अपनी जिंदगी में कभी इस हवेली का ज़िक्र नहीं किया था।

     

    जब वकील ने कागज़ात देते हुए कहा था, “यह संपत्ति आपके पिता के नाम थी,” तो आरव को विश्वास ही नहीं हुआ था।

     

    उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह हवेली देखने जाएगा।

     

    गाँव में पहुँचते ही एक बूढ़े आदमी ने उसे रोक लिया।

     

    “बाबूजी, हवेली में रात मत बिताइएगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्यों? भूत है क्या?”

     

    बूढ़े के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया।

     

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “भूत होता तो अच्छा था।”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “वहाँ जो है… वह किसी को जाने नहीं देता।”

     

    आरव ने बात को मज़ाक समझकर अपनी कार आगे बढ़ा दी।

     

    कुछ देर बाद वह हवेली के सामने खड़ा था।

     

    हवेली देखकर ही उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तीन मंज़िल की विशाल इमारत, जिसकी दीवारों पर काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर एक पुरानी पत्थर की मूर्ति लगी थी।

     

    आरव ने जेब से चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में लगाते ही अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    आरव ठिठक गया।

     

    उसने दरवाज़े की ओर देखा।

     

    फिर आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई दूसरी तरफ से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

     

    आरव ने धीरे से पूछा, “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह अंदर गया।

     

    धूल से ढकी फर्श, दीवारों पर पुराने चित्र और छत से लटकता एक टूटा हुआ झूमर।

     

    हवा में एक अजीब सी गंध थी—जैसे कई वर्षों से बंद कमरे में नमी और पुराने कपड़ों की गंध मिली हुई हो।

     

    आरव ने अपना सामान नीचे रखा और हवेली का निरीक्षण करने लगा।

     

    तभी उसकी नज़र सीढ़ियों के पास टंगी एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    तस्वीर में उसके पिता खड़े थे।

     

    लेकिन उनके साथ एक महिला भी थी।

     

    आरव उस महिला को पहचानता नहीं था।

     

    तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—

     

    17 जुलाई 1998

     

    आरव के पिता उस समय अविवाहित थे।

     

    फिर यह महिला कौन थी?

     

    आरव ने तस्वीर उतारी और ध्यान से देखने लगा।

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से कुछ गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव चौंक गया।

     

    उसने टॉर्च ऊपर की ओर की।

     

    सीढ़ियों पर अंधेरा पसरा हुआ था।

     

    “शायद कोई लकड़ी गिरी होगी,” उसने खुद से कहा।

     

    वह ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंज़िल पर पहुँचते ही उसे एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दरवाज़े के ऊपर लाल रंग से कुछ लिखा था।

     

    धूल हटाने पर शब्द साफ़ दिखाई दिए—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव कुछ पल तक उस चेतावनी को देखता रहा।

     

    फिर उसने जंजीर को छुआ।

     

    उसी क्षण…

     

    उसके पीछे किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    जैसे कोई गीले पैरों से फर्श पर चल रहा हो।

     

    आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर…

     

    गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे उसकी ओर आ रहे थे।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    आरव की साँसें तेज़ हो गईं।

     

    निशान उसके ठीक सामने आकर रुक गए।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “तुम… वापस क्यों आए?”

     

    आरव के पूरे शरीर में झटका लगा।

     

    वह पीछे हट गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर नीचे से दरवाज़ा बंद होने की तेज़ आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव दौड़कर नीचे पहुँचा।

     

    मुख्य दरवाज़ा बंद था।

     

    उसने कुंडी खींची।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी उसकी नज़र सामने की दीवार पर पड़ी।

     

    वहाँ एक पुरानी घड़ी लगी थी।

     

    घड़ी की दोनों सुइयाँ बारह बजे पर अटकी हुई थीं।

     

    और तभी…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    वही आवाज़ फिर सुनाई दी।

     

    इस बार आवाज़ हवेली के अंदर से नहीं…

     

    बल्कि उसके पीछे वाले बंद कमरे से आ रही थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    उसने टॉर्च अंदर की।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    सिर्फ बीच में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक सफेद कपड़ा पड़ा था।

     

    आरव ने कपड़ा हटाया।

     

    नीचे एक पुरानी डायरी थी।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर उसके पिता की लिखावट थी।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अगर आरव कभी इस हवेली में आए, तो उसे सच मत बताना।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    उसने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “वह हर रात बारह बजे आती है।”

     

    आरव ने घड़ी की ओर देखा।

     

    बारह बजकर एक मिनट हो चुका था।

     

    अचानक पीछे से फिर आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ बहुत करीब थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

     

    दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।

     

    सफेद कपड़ों में एक औरत।

     

    उसका चेहरा लंबे काले बालों से ढका हुआ था।

     

    आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले वह औरत धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने दोबारा आँखें खोलीं…

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में पकड़ी डायरी के आखिरी पन्ने पर अब एक नई लाइन लिखी थी—

     

    “तुम्हें सच जानना है तो कल रात ऊपर वाले बंद कमरे का दरवाज़ा खोलना।”

     

    और उसके ठीक नीचे…

     

    आरव का नाम लिखा था।

     

    “आरव…”

     

    बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी।

     

    और हवेली की तीसरी मंज़िल से एक बार फिर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

     

    छप… छप… छप…

     

    आरव समझ चुका था…

     

    वह हवेली में अकेला नहीं था।

  • Dil sabhal ja jara part – 20

    Dil sabhal ja jara part – 20

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 20 rat ka rahasya me call 

     

     

     

    शिमला की वो रात खास थी। ठाकुर हाउस की हर दीवार पर खुशियों की चमक थी, लेकिन बाहर की बर्फीली हवा में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी। शादी का दिन गुजर चुका था – मंडप की घंटियां, फेरों की धुन, विदाई की रस्में सब बीत चुकी थीं। प्रिया अब श्रीमती प्रिया आरव ठाकुर थी। घरवाले थककर सो चुके थे, मेहमान जा चुके थे, और ठाकुर हाउस अब शांत हो चुका था। सिर्फ कुछ लाइट्स जल रही थीं – हॉल की, और ऊपर के कमरों की।

     

    आरव सीढ़ियां चढ़ रहा था। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। शेरवानी अभी भी पहनी थी, पगड़ी उतार चुका था। बालों में थोड़ी सी बर्फ की बूंदें लगी थीं, जो बाहर से आते वक्त गिरी थीं। वो कमरे की ओर जा रहा था – अपना और प्रिया का कमरा। आज पहली रात थी – वो रात जो हर नए जोड़े के लिए यादगार होती है। आरव की आंखों में खुशी थी, लेकिन थोड़ी घबराहट भी। “प्रिया… मेरी पत्नी। आज से हम एक हैं,” वो मन ही मन सोच रहा था। उसके कदम धीमे थे, जैसे वो हर पल को जीना चाहता हो।

     

    कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी – कैंडल्स की। आरव ने दरवाजा धक्का दिया। प्रिया अंदर थी, बिस्तर पर बैठी। लाल साड़ी में, माथे पर सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, हाथों में मेहंदी। वो इंतजार कर रही थी – शर्म से झुकी आंखों से, मुस्कुराहट दबाए होंठों से। कमरा सजा हुआ था – गुलाब की पंखुड़ियां बिस्तर पर बिखरीं, कैंडल्स की लौ कमरे को गर्माहट दे रही थी, और हवा में हल्की सी खुशबू – जूही की।

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आरव को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। “आरव… आ गए?”

     

    आरव मुस्कुराया। दरवाजा बंद किया और उसके पास आया। “हां प्रिया… तेरी पहली रात का इंतजार कर रहा था।”

     

    प्रिया शर्मा गई। वो उठी और आरव के करीब आई। “आरव… आज से हमारा नया जीवन शुरू।”

     

    आरव ने उसके हाथ थामे। “हां प्रिया। तू मेरी पत्नी है। मेरी हमसफर। मैं तुझे हमेशा खुश रखूंगा।”

     

    दोनों की नजरें मिलीं। आरव ने प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया। वो हल्का सा किस – माथे पर। फिर गाल पर। प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो आरव की शेरवानी के बटन खोलने लगी। “आरव… आज रात सिर्फ हमारी है।”

     

    आरव ने उसे बिस्तर की ओर ले जाया। “हां प्रिया। सिर्फ हमारी।”

     

    दोनों करीब आए। आरव ने प्रिया की साड़ी का पल्लू सरकाया। प्रिया की आंखें बंद हो गईं। वो पल… वो पहला पल जो दोनों के लिए खास था। लेकिन तभी… आरव का फोन बज उठा। कमरे में सन्नाटा था, और फोन की रिंग उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।

     

    आरव रुक गया। “कौन होगा इतनी रात को?”

     

    प्रिया ने कहा, “आरव… छोड़ो। साइलेंट कर दो।”

     

    आरव ने फोन देखा। अनजान नंबर। वो इग्नोर करने वाला था, लेकिन फिर रिंग आई। वो उठा। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, अजनबी आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन रात अभी पूरी नहीं हुई। अगर मेरे बारे में जानना चाहते हो कि मैं कौन हूं, तो अभी के अभी मेरे बताए पते पर पहुंचो। अकेले। वरना… प्रिया की खुशी छिन जाएगी। पता है – पुरानी हवेली के पीछे वाला जंगल, वो टूटा हुआ पुल। दस मिनट में।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। “कौन बोल रहा है? क्या चाहते हो?”

     

    आवाज हंसी। “समय कम है। आओ तो जानोगे। और हां, किसी को मत बताना। पुलिस या कोई और… तो खेल खत्म।”

     

    फोन कट गया। आरव कांप रहा था। प्रिया ने पूछा, “आरव… क्या हुआ? कौन था?”

     

    आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “कुछ नहीं प्रिया। काम का कॉल। मैं थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    प्रिया ने रोकना चाहा। “आरव… रात के दो बजे? कौन काम?”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “ट्रस्ट मी प्रिया। सब ठीक होगा। तू इंतजार कर।”

     

    आरव कमरे से निकला। दिल तेज़ धड़क रहा था। वो नीचे गया, कार की चाबी ली। बाहर बर्फ गिर रही थी, रात का सन्नाटा। वो पुरानी हवेली की ओर चला। रास्ते में सोच रहा था – “कौन हो सकता है? विक्रम? या कोई और? प्रिया को खतरा?”

     

    हवेली पहुंचा। पीछे जंगल। टूटा पुल। अंधेरा था। आरव ने फोन की लाइट जलाई। “कौन है? दिखो!”

     

    एक छाया आगे आई। एक आदमी – चेहरा ढका हुआ। “आरव… वेलकम। अब सुनो। मैं कौन हूं? वो जो सालों से इंतजार कर रहा था। तेरी शादी… लेकिन ये नहीं चलेगी।”

     

    आरव ने पूछा, “क्यों? क्या चाहते हो?”

     

    आदमी ने मास्क उतारा। वो… कोई अनजान था। लेकिन उसके हाथ में एक पुराना लेटर। “ये पढ़। फिर पता चलेगा।”

     

    आरव ने लेटर लिया। अंदर लिखा था – “आरव, प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।”

     

    आरव चौंका। “ये झूठ है!”

     

    आदमी हंसा। “नहीं। और अगर शादी जारी रही तो… प्रिया को पता चलेगा। और सब खत्म।”

     

    आरव का दिल बैठ गया। सस्पेंस गहरा हो गया। वो कौन था? और क्या सच में…?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 19

    Dil sabhal ja jara part – 19

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 19 Dulhan ki tyari or chhupa huaa khatra 

     

     

     

    ठाकुर हाउस में शादी का दिन आ चुका था। मार्च की सुबह थी, हवा में हल्की ठंडक, लेकिन धूप खिली हुई थी। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था – लाल और गोल्डन फूलों की मालाएं, लाइट्स की चमक, और बाहर मंडप तैयार। मेहमानों की भीड़ थी, लेकिन सबकी नजरें दुल्हन पर थीं। प्रिया अपने कमरे में थी। कमरा फूलों से सजा था, आईने के सामने कुर्सी लगी थी। शिमला की बेस्ट पार्लर टीम आ चुकी थी – चार लड़कियां, मेकअप किट्स, हेयर स्टाइल टूल्स लेकर।

     

    पार्लर की लीड आर्टिस्ट, नेहा, प्रिया के बाल संभाल रही थी। “मैम, आपके बाल तो सिल्क जैसे हैं। आज ओपन रखेंगे या बन?”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “बन। ट्रेडिशनल लुक।”

     

    दूसरी लड़की, सोनिया, मेहंदी चेक कर रही थी। “वाह मैम, मेहंदी का कलर तो डार्क आया है। दूल्हा बहुत प्यार करते हैं।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “हां… बहुत।”

     

    तीसरी आर्टिस्ट, रिया (नाम संयोग से), मेकअप शुरू कर रही थी। “मैम, आईलाइनर थिक रखें? आंखें बड़ी हैं आपकी, हाइलाइट होंगी।”

     

    प्रिया ने हां कहा। चौथी लड़की ज्वेलरी सेट कर रही थी – मांगटीका, नथ, कान के झुमके।

     

    कमरे में रिया (प्रिया की बेस्ट फ्रेंड) भी थी। वो एक्साइटेड। “प्रिया यार, आज तू दुल्हन बनेगी। आरव भैया… मतलब आरव… तो दूल्हा। मैं अभी भी बिलीव नहीं कर पा रही!”

     

    प्रिया हंसी। “रिया, मैं भी कभी-कभी सपना लगता है।”

     

    पार्लर वाली नेहा ने बालों में फूल लगाते हुए कहा, “मैम, आपकी स्टोरी तो फिल्म जैसी है। पहले भाई-बहन जैसे, अब शादी। लोग बातें कर रहे थे, लेकिन आज देखकर सब चुप हो जाएंगे। आप कितनी खूबसूरत जोड़ी लग रहे हो।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “थैंक्स नेहा। प्यार होता है तो सब मुमकिन है।”

     

    मेकअप चल रहा था। फाउंडेशन, ब्लश, लिपस्टिक – रेड, मैचिंग लहंगे से। लहंगा हैवी था – रेड वेलवेट, गोल्डन एम्ब्रॉयडरी, दुपट्टा लंबा। प्रिया आईने में खुद को देख रही थी। “लग रही हूं दुल्हन?”

     

    सोनिया ने कहा, “मैम, परी जैसी। दूल्हा देखकर बेहोश हो जाएगा।”

     

    सब हंस पड़े। रिया ने फोटोज लीं। “ये आरव को नहीं दिखाऊंगी। सरप्राइज रहेगा।”

     

    तैयारियां पूरी होने में दो घंटे लगे। आखिर में दुपट्टा सेट किया गया। प्रिया खड़ी हुई। आईने में खुद को देखा। आंखें नम हो गईं। “मां… देख रही हो ना? आज तेरी बेटी दुल्हन बन रही है।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… तू सबसे खूबसूरत दुल्हन है।”

     

    दूसरी तरफ, आरव अपने कमरे में तैयार हो रहा था। शेरवानी – क्रिम कलर, गोल्डन बटन, मैचिंग पगड़ी। उसका बेस्ट फ्रेंड, विक्रांत (अब अच्छा दोस्त बन चुका था), मदद कर रहा था। “आरव यार, तू तो राजकुमार लग रहा है। प्रिया देखकर पिघल जाएगी।”

     

    आरव मुस्कुराया। “विक्रांत, थैंक्स यार। तूने बहुत सपोर्ट किया।”

     

    विक्रांत ने पगड़ी सेट की। “यार, तुम्हारी स्टोरी इंस्पायरिंग है। मैं खुश हूं तुम दोनों के लिए।”

     

    आरव तैयार हो गया। आईने में खुद को देखा। “आज प्रिया मेरी हो जाएगी। हमेशा के लिए।”

     

    तभी उसका फोन बजा। अनजान नंबर। आरव ने रिसीव किया। “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ से भारी, विकृत आवाज आई। “आरव ठाकुर? बधाई हो शादी की। लेकिन आज का दिन तुम्हारा आखिरी खुशी का दिन होगा। प्रिया को कुछ नहीं होगा, लेकिन तू… तुझे सजा मिलेगी। पुरानी साजिशों की।”

     

    आरव चौंका। “कौन बोल रहा है?”

     

    आवाज हंसी। “विक्रम नहीं। कोई और। जो सालों से इंतजार कर रहा था। ठाकुर और राठौर की दुश्मनी… वो अभी खत्म नहीं हुई। आज मंडप में देखना।”

     

    फोन कट गया। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रांत ने पूछा, “क्या हुआ यार?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं। गलत नंबर।”

     

    लेकिन अंदर से डर गया। वो पापा के पास गया। “पापा… सिक्योरिटी चेक करो। कुछ अनजान कॉल आया।”

     

    पापा ने कहा, “बेटा, चिंता मत कर। सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन था।

     

    नीचे मंडप में मेहमान इकट्ठे हो रहे थे। कुछ ताने फिर शुरू। एक अंकल ने दूसरे से कहा, “देखो, भाई-बहन जैसे थे, अब शादी। पैसों का खेल है।”

     

    लेकिन ज्यादातर मेहमान खुश थे। रिया ने म्यूजिक शुरू करवाया।

     

    प्रिया तैयार हो चुकी थी। दुल्हन बनकर नीचे आने वाली थी। रिया ने कहा, “प्रिया… तैयार? दूल्हा इंतजार कर रहा है।”

     

    प्रिया ने आईने में आखिरी बार देखा। “हां रिया। तैयार हूं।”

     

    बारात आने वाली थी – नहीं, घर में ही शादी थी। आरव नीचे मंडप में जाएगा। प्रिया को दुल्हन बनकर लाया जाएगा।

     

    आरव मंडप में खड़ा था। घोड़ी पर नहीं, लेकिन दूल्हा बनकर। मन बैचेन। वो कॉल… कौन था? विक्रम तो जेल में था। कोई और?

     

    प्रिया ऊपर से नीचे आ रही थी। दुपट्टा सिर पर, लड़कियां सहारा दे रही थीं। सबकी नजरें उस पर। “वाह… कितनी खूबसूरत।”

     

    आरव ने देखा। उसकी सांस रुक गई। प्रिया… उसकी दुल्हन।

     

    प्रिया मंडप में आई। आरव के पास बैठी। पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे।

     

    लेकिन आरव का फोन वाइब्रेट कर रहा था। अनजान मैसेज – “अब देखो।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा। मेहमानों में कोई अनजान चेहरा? सिक्योरिटी थी, लेकिन…

     

    फेरे शुरू हुए। प्रिया और आरव हाथ थामे घूम रहे थे। प्रिया मुस्कुरा रही थी। आरव भी, लेकिन अंदर डर।

     

    आखिरी फेरे में अचानक लाइट्स चली गईं। अंधेरा। चीखें।

     

    लाइट्स आईं। मंडप में एक लिफाफा पड़ा था। आरव ने उठाया। अंदर फोटो – प्रिया की पुरानी, आश्रम की। और चिट – “ये शादी नहीं होगी। प्रिया को ले जाऊंगा।”

     

    आरव चौंका। प्रिया ने देखा। “आरव… क्या है?”

     

    आरव ने कहा, “कुछ नहीं प्रिया।”

     

    लेकिन उसकी आंखें डर गईं। कौन था वो? विक्रम? या कोई नया दुश्मन?

     

    शादी जारी थी। सिंदूर डाला गया। मंगलसूत्र पहनाया गया। सब तालियां बजा रहे थे।

     

    लेकिन आरव का मन बैचेन। वो कॉल… वो लिफाफा… खतरा अभी बाकी था।

     

    शादी पूरी हुई। प्रिया और आरव पति-पत्नी बन गए। 

     

    रात को विदाई के समय प्रिया रो रही थी। आरव ने गले लगाया। “प्रिया… 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 18

    Dil sabhal ja jara part – 18

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    Part – 18 hamara ghar 

     

     

     

     

    शिमला की सर्दियां अब अपने चरम पर थीं। जनवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ की मोटी चादर जम गई थी। मीडिया का शोर धीरे-धीरे कम हो रहा था – लोग नई खबरों में व्यस्त हो गए थे। लेकिन प्रिया और आरव के लिए ये समय सबसे खूबसूरत था। वो समय जब उनका प्यार अब छिपा नहीं, बल्कि खुलकर जीया जा रहा था। घरवाले ने अपनाया था, रिया सबसे बड़ी सपोर्टर बनी थी, और दोनों अब एक-दूसरे के साथ हर पल को जी रहे थे।

     

    एक सुबह प्रिया किचन में थी। वो आरव के लिए उसकी फेवरेट कॉफी बना रही थी – ब्लैक, बिना शुगर। आरव पीछे से आया, उसकी कमर में हाथ डाले। “गुड मॉर्निंग, मेरी जान।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। पीछे मुड़ी और उसके होंठों पर हल्का सा किस किया। “गुड मॉर्निंग भैया… नहीं, अब तो सिर्फ आरव।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठा लिया। “हां, सिर्फ तेरा आरव।”

     

    रिया किचन में आई। “ओये होये! सुबह-सुबह रोमांस? मैं अंदर जा रही हूं।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने प्रिया को नीचे उतारा। “रिया, आज प्लान है। हम तीनों बाहर जाएंगे। जाखू टेंपल। बर्फ देखने।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “सच? चलो!”

     

    तीनों बाहर निकले। कार में आरव ड्राइव कर रहा था, प्रिया उसके बगल में, रिया पीछे। रास्ते में पुरानी गानों की प्लेलिस्ट चल रही थी। प्रिया ने आरव का हाथ थामा। आरव ने उसकी उंगलियों को चूमा। रिया ने पीछे से कहा, “यार, तुम दोनों अब कपल गो्ल्स हो।”

     

    जाखू टेंपल पहुंचे। ऊपर बर्फ की चादर, बंदर घूम रहे थे, हवा ठंडी लेकिन साफ। तीनों टहलने लगे। प्रिया ने बर्फ का गोला बनाया और आरव पर फेंका। आरव ने पकड़ा और प्रिया को गले लगा लिया। “पकड़ी गई!”

     

    रिया फोटोज ले रही थी। “ये फोटोज मैं सेव करूंगी। ब्लैकमेल के लिए।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया, तू सबसे बेस्ट है।”

     

    शाम को घर लौटे। पापा और आदित्य अंकल टीवी देख रहे थे। पापा ने कहा, “बच्चो, आज न्यूज में तुम्हारी स्टोरी फिर आई। लेकिन पॉजिटिव। लोग कह रहे हैं – प्यार जीत गया।”

     

    प्रिया और आरव मुस्कुराए। आदित्य अंकल ने कहा, “बेटी, मैं गर्व करता हूं तुम पर। तुमने स्ट्रगल किया, और सच्चा प्यार पाया।”

     

    रात को डिनर के बाद प्रिया और आरव पुरानी हवेली गए – जो अब रेनोवेट हो रही थी। वो हवेली जो मम्मी की फेवरेट थी। अब वो उनका स्पेशल प्लेस बन गई थी। हवेली के बगीचे में बर्फ जमी थी। दोनों हाथ थामे टहल रहे थे।

     

    आरव ने कहा, “प्रिया… ये हवेली हमारा घर बनेगी। हमारा अपना। जहां सिर्फ हम होंगे।”

     

    प्रिया ने उसे गले लगाया। “हां आरव। हमारा घर। जहां हमारी यादें होंगी। हमारे बच्चे खेलेंगे।”

     

    आरव ने उसे किस किया। “हां प्रिया। हमारे बच्चे। तेरी आंखें, मेरी मुस्कान।”

     

    दोनों बगीचे के झूले पर बैठे। आरव ने प्रिया को गोद में लिया। “प्रिया… याद है बचपन में मैं तुझे झूला झुलाता था?”

     

    प्रिया ने कहा, “अब मैं बड़ी हो गई। लेकिन तुम्हारी गोद में अभी भी छोटी लगती हूं।”

     

    आरव ने उसके होंठों को गहराई से चूमा। “प्रिया… तू हमेशा मेरी छोटी राजकुमारी रहेगी। मेरी पत्नी बनेगी एक दिन।”

     

    प्रिया ने जवाब में किस किया। “हां आरव। तेरी पत्नी। तेरी हमसफर।”

     

    रात गहरा गई। दोनों हवेली के एक कमरे में रुके। फायरप्लेस जलाया। प्रिया आरव की बाहों में थी। “आरव… आज सबसे खुश हूं।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… मैं भी। तूने मुझे पूरा किया।”

     

    दोनों सो गए – गले लगे। पहली बार पूरी रात साथ। कोई डर नहीं, कोई गिल्ट नहीं। सिर्फ प्यार।

     

    सुबह हुई। घर लौटे। रिया ने चिढ़ाया, “कहां थे रात भर? हवेली में?”

     

    प्रिया शर्मा गई। आरव ने कहा, “रिया, जलन हो रही है?”

     

    रिया हंसी। “नहीं भैया। खुश हूं। तुम दोनों परफेक्ट हो।”

     

    लेकिन बाहर विक्रम बाहर आ चुका था। वो अवनी से मिला। “अवनी, अब आखिरी वार। प्रिया और आरव को अलग कर दूंगा। पुराना प्रूफ है – रानी की डायरी का दूसरा पेज। जहां लिखा है कि प्रिया राजेश की बेटी नहीं। अगर फैमिली को पता चला तो…”

     

    अवनी मुस्कुराई। “करो।”

     

    लेकिन प्रिया और आरव तैयार थे। उनका प्यार अब इतना मजबूत था कि कोई साजिश नहीं तोड़ सकती।

     

    शाम को दोनों छत पर थे। बर्फ देख रहे थे। आरव ने प्रिया को रिंग दी – सिंपल, लेकिन डायमंड वाली। “प्रिया… विल यू मैरी मी?”

     

    प्रिया रो पड़ी। “यस आरव। हजार बार यस।”

     

    दोनों गले लगे। किस किया। हमारा घर – अब सच होने वाला था।

     

    प्यार की जीत हो चुकी थी। बचपन से शुरू हुआ सफर अब शादी तक पहुंच रहा था।

     

     

    ठाकुर हाउस में अब खुशियों का माहौल था। फरवरी की शुरुआत हो चुकी थी, और शिमला की बर्फ अब पिघलने लगी थी – जैसे प्रिया और आरव के प्यार के आगे सारी ठंडक गायब हो रही हो। शादी की तारीख फिक्स हो चुकी थी – मार्च के पहले हफ्ते में। हवेली को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था। फूलों की मालाएं, लाइट्स, डेकोरेटर्स की टीम दिन-रात लगी हुई थी। प्रिया की शादी की शॉपिंग चल रही थी – लहंगे, ज्वेलरी, मेहंदी की डिजाइन। रिया सबसे एक्टिव थी – वो प्रिया की बेस्ट फ्रेंड और सिस्टर-इन-लॉ दोनों बनने वाली थी।

     

    एक सुबह ठाकुर हाउस में मेहमान आने शुरू हो गए। दूर के रिश्तेदार, पापा के बिजनेस पार्टनर्स, पुराने फैमिली फ्रेंड्स। हाउस में रौनक थी। प्रिया रेड लहंगे में ट्रायल कर रही थी। आरव बाहर मेहमानों का स्वागत कर रहा था।

     

    पहले मेहमान आए – पापा के पुराने दोस्त, अंकल वर्मा और उनकी पत्नी। अंकल वर्मा ने आरव को गले लगाया। “बेटा, बधाई हो। शादी की खबर सुनी।”

     

    फिर आंटी ने प्रिया को देखा। मुस्कुराई, लेकिन आंखों में कुछ और था। “प्रिया बेटी… बहुत खूबसूरत लग रही हो। लेकिन… सुना है तुम दोनों… पहले भाई-बहन जैसे थे?”

     

    प्रिया थोड़ा असहज हो गई। आरव ने बीच में कहा, “आंटी, हमारा रिश्ता सच्चा है। प्यार है।”

     

    आंटी ने हल्के से तंज कसा। “हां बेटा, प्यार तो अंधा होता है। लेकिन लोग क्या कहेंगे? पहले भाई कहकर बुलाती थी, अब पति?”

     

    रिया ने बीच में कट किया। “आंटी, प्यार में क्या पुराना-नया। जो दिल कहे वही सही।”

     

    आंटी चुप हो गईं, लेकिन फुसफुसाहट शुरू हो गई।

     

    दूसरे मेहमान – चाची जी (दूर की रिश्तेदार)। वो प्रिया के पास आईं। लहंगा देखा। “वाह बेटी, दुल्हन तो बन गई। लेकिन आरव तो तेरा भाई था ना? अब पति? अजीब नहीं लगता?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “चाची जी, रिश्ते दिल से होते हैं। हमारा प्यार सालों पुराना है।”

     

    चाची जी ने ताना मारा। “हां हां, सालों पुराना। पहले भाई-बहन वाला, अब पति-पत्नी। समाज क्या कहेगा? लोग तो कह रहे हैं – ठाकुर फैमिली में क्या हो रहा है?”

     

    आरव ने सुना। वो पास आया। “चाची जी, समाज जो कहे कहे। हम खुश हैं। हमारा प्यार सच्चा है।”

     

    चाची जी हंसकर टाल गईं, लेकिन दूसरे मेहमानों से फुसफुसाने लगीं।

     

    शाम को मेहंदी की रस्म थी। प्रिया हाथों में मेहंदी लगवा रही थी। लड़कियां गाना गा रही थीं। आरव दूर खड़ा देख रहा था। एक पुरानी सहेली – नेहा – प्रिया के पास आई। “प्रिया यार, बधाई हो। लेकिन सच बता… आरव को भाई मानती थी ना? अब…?”

     

    प्रिया ने हंसकर कहा, “नेहा, प्यार होता है। रिश्ते बदलते हैं।”

     

    नेहा ने तंज कसा। “हां, बदलते हैं। लेकिन इतना जल्दी? लोग तो कह रहे हैं – भाई से पति? ड्रामा किंग-क्वीन हो तुम दोनों।”

     

    रिया ने फिर बचाया। “नेहा, जलन हो रही है? प्रिया और आरव का प्यार परफेक्ट है। तू अपनी शादी देख।”

     

    नेहा चली गई। लेकिन ताने जारी थे। कुछ मेहमान खुले में, कुछ पीठ पीछे। “अरे, पहले तो भाई-बहन कहते थे, अब शादी? पैसों की वजह से?” “नहीं यार, प्यार है। लेकिन अजीब लगता है।”

     

    प्रिया का मन भारी हो गया। वो बाहर बालकनी में गई। आरव पीछे आया। “प्रिया… ताने सुनकर दुखी है?”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “आरव… लोग क्या-क्या कह रहे हैं। पहले भाई-बहन, अब पति-पत्नी। लगता है हम गलत हैं।”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… लोग हमेशा बोलते हैं। लेकिन हमारा प्यार सच्चा है। तूने मुझे चुना, मैंने तुझे। सालों की कमी पूरी हुई है। ये ताने कुछ दिन के हैं। हमारी जिंदगी हमारी है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। “आरव… तुम सही कहते हो। मैं तुम्हारे साथ हूं। ताने सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसके होंठ चूमे। “प्रिया… तू मेरी बहादुर लड़की है। हम साथ हैं।”

     

    रात को सगाई की रिंग सेरेमनी थी। प्रिया और आरव ने रिंग्स पहनाईं। मेहमान तालियां बजा रहे थे, लेकिन कुछ की आंखें तंज भरी थीं। एक अंकल ने पापा से कहा, “राजेश भाई, बधाई। लेकिन ये रिश्ता… पहले भाई-बहन जैसे थे ना?”

     

    पापा ने मुस्कुराकर कहा, “प्यार होता है भाई साहब। बच्चे खुश हैं। बस।”

     

    सेरेमनी के बाद प्रिया और आरव हवेली के बगीचे में अकेले थे। प्रिया ने कहा, “आरव… ताने सुनकर अच्छा नहीं लगता। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी।”

     

    आरव ने उसे गोद में उठाया। “प्रिया… ताने देने वाले हमारी खुशी नहीं देख सकते। लेकिन हम जीएंगे – अपना प्यार, अपनी जिंदगी। तू मेरी दुल्हन बनेगी। मेरी पत्नी। हमारा घर बनेगा।”

     

    प्रिया ने उसे किस किया। “हां आरव। हमारा घर। हमारी जिंदगी।”

     

    दोनों गले लगे। बर्फ गिर रही थी, लेकिन उनके प्यार में गर्मी थी। ताने थे, लेकिन प्यार मजबूत था।

     

    अगले दिन शादी की तैयारियां और तेज हो गईं। डेकोरेशन, कार्ड्स, डांस प्रैक्टिस। रिया ने कहा, “प्रिया, ताने देने वाले शादी में आएंगे तो डांस करेंगे। हम दिखाएंगे हम कितने खुश हैं।”

     

    प्रिया हंसी। “हां रिया। हम जीतेंगे।”

     

    आरव ने प्रिया को रिंग पहनाई फिर से – प्राइवेट में। “प्रिया… जल्दी दुल्हन बन जा मेरी।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां आरव। तेरी दुल्हन। हमेशा।”

     

    शादी की तैयारियां चल रही थीं। ताने थे, लेकिन प्यार उनसे बड़ा था। प्रिया और आरव का सफर अब शादी तक पहुंच चुका था।

     

    विक्रम दूर से देख रहा था। उसका प्लान फेल हो गया। अब वो हार मान चुका था।

     

    शादी का दिन करीब था। खुशियां थीं। प्यार की जीत थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 17

    Dil sabhal ja jara part – 17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 17 dil se dil tak 

     

     

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला फैला था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे जल रही थी, और बाहर बर्फ की हल्की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं। घर में सब सो चुके थे। रिया अपने कमरे में, पापा और आदित्य अंकल भी। सिर्फ प्रिया और आरव जाग रहे थे। दोनों सोफे पर बैठे थे – करीब, लेकिन अभी भी एक छोटी सी दूरी। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके घाव अभी ताज़ा थे। लोग बातें कर रहे थे, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स, लेकिन दोनों ने फैसला किया था – वो चुप नहीं रहेंगे।

     

    प्रिया ने चाय का मग आरव की ओर बढ़ाया। “भैया… ले। ठंड लग रही है।”

     

    आरव ने मग लिया। उनकी उंगलियां छुईं। आरव ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… आजकल नींद आती है तुझे?”

     

    प्रिया ने सिर झुका लिया। “नहीं भैया। हर रात सोचती हूं… हम सही कर रहे हैं ना?”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया। धीरे से सहलाया। “प्रिया… मैं भी सोचता हूं। सालों तक तुझे बहन माना। तेरी हर खुशी में अपनी खुशी देखी। लेकिन जब सच पता चला… कि खून का रिश्ता नहीं… तो दिल ने कुछ और कहा। मैंने लड़ाई लड़ी खुद से। गिल्ट फील किया। सोचा कि मैं गलत हूं। लेकिन प्रिया… तुझे देखकर जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं मिलता। तू मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जो कभी खाली था।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के करीब सरकी। “भैया… मैं भी डरती थी। तुम मेरे भाई हो। तुमने मुझे बचाया, सहारा दिया। अनाथ आश्रम से लेकर आज तक। मैंने कभी सोचा नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ और फील कर सकती हूं। लेकिन जब तुम दूर होने लगे… जब तुम्हारी नजरें बदलने लगीं… तो मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूं। तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी केयर… वो भाई वाली नहीं लगती अब। वो प्यार लगता है। गहरा, सच्चा प्यार।”

     

    आरव ने उसे और करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर था। “प्रिया… मैंने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया। मम्मी के बाद तू ही मेरी दुनिया थी। लेकिन अब तू मेरी जिंदगी है। हर सांस में तू है। तेरी मुस्कान में मेरा सुकून। तेरी आंखों में मेरा भविष्य। मैं जानता हूं दुनिया क्या कहेगी। लेकिन प्रिया… दिल तो दिल है। वो नियम नहीं मानता।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। उसकी आंखें आरव की आंखों में डूब गईं। “भैया… मुझे डर लगता है कि अगर हम अलग हुए तो? मीडिया, लोग… सब हमें जज करेंगे। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी। तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। उंगलियां उसके होंठों पर फिसलीं। “प्रिया… तू मेरी है। हमेशा से। मैंने तुझे खोया था एक बार। अब कभी नहीं खोऊंगा। चाहे दुनिया खिलाफ हो, मैं तेरे साथ हूं। तेरी हर खुशी, हर गम में। तेरी हर सांस में।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ – धीरे से, फिर गहराई से। वो किस लंबा था, भावनाओं से भरा। आरव ने उसे अपनी बाहों में कस लिया। “प्रिया… मैं तुझे इतना प्यार करता हूं कि शब्द कम पड़ जाते हैं। तू मेरी ताकत है, मेरी कमजोरी है। तू मेरी हर चीज है।”

     

    प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। आंसू बह रहे थे, लेकिन खुशी के। “भैया… तुम मेरे पहले प्यार हो। आखिरी प्यार हो। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी मुझे तुम्हारे इतना करीब लाएगी। तुम्हारा इंतजार किया सालों… बिना जानें। अब जब तुम मेरे हो… तो लगता है सब स्ट्रगल वर्थ था।”

     

    आरव ने उसके बालों को चूमा। “प्रिया… हमारा प्यार कोई गलती नहीं। वो सच्चाई है। सालों की कमी का मिलन है। मैं तुझे हर खुशी दूंगा। तेरे सपनों को पूरा करूंगा। तेरे साथ हर कदम चलूंगा।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… मुझे तुम्हारी जरूरत है। हर पल। तुम्हारे बिना… सब खाली लगता है। तुम मेरे हो… सिर्फ मेरे।”

     

    आरव ने उसे फिर किस किया – गहरा, जुनूनी। दोनों की सांसें एक हो गईं। फायरप्लेस की लौ उनकी आंखों में झलक रही थी। आरव ने उसके कान में फुसफुसाया, “प्रिया… मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा। ये वादा है। दिल से।”

     

    प्रिया ने जवाब दिया, “और मैं तुझे। हमेशा।”

     

    दोनों गले लगे रहे। रात गहरा गई। बाहर बर्फ गिर रही थी, लेकिन अंदर दिलों में गर्माहट थी – गहरी, अटूट। वो भावनाएं जो सालों से दबी थीं, अब बाहर आ चुकी थीं। प्यार की गहराई में डूब चुके थे दोनों। कोई डर नहीं, सिर्फ एक-दूसरे का साथ।

     

    सुबह हुई। रिया ने दोनों को देखा – सोफे पर, गले लगे सो रहे। वो मुस्कुराई और चुपके से चली गई।

     

     

    ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला अब और गहरा हो चुका था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे बुझ रही थी, और बाहर बर्फ की बूंदें खिड़की पर चिपककर जम रही थीं। प्रिया और आरव अभी भी सोफे पर थे – करीब, हाथ थामे। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके बाद का सन्नाटा और भारी लग रहा था। घरवाले चुप थे, लेकिन उनकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। प्रिया ने आरव का हाथ छोड़ा और उठकर खिड़की के पास चली गई। बाहर का नजारा देखा – बर्फीली पहाड़ियां, कोहरा।

     

    “भैया… कभी-कभी लगता है जैसे ये सब सपना हो। हम यहां, साथ। लेकिन बचपन… वो तो यादों में ही बसा है। मुझे कुछ याद नहीं, लेकिन तुम्हें तो होगा। बताओ ना… हमारा बचपन कैसा था?”

     

    आरव मुस्कुराया। वो भी उठा और प्रिया के पीछे खड़ा हो गया। उसके कंधों पर हाथ रखे। “प्रिया… बचपन? वो तो मेरी सबसे प्यारी यादें हैं। तू तब छोटी सी गुड़िया थी। चार साल की। मैं दस का। मम्मी कहती थीं, ‘आरव, अपनी छोटी को कभी अकेला मत छोड़ना।’ और मैं वादा करता – ‘मम्मी, कभी नहीं।’”

     

    प्रिया ने पलटा। आंखों में चमक। “भैया… बताओ। विस्तार से। मुझे लगता है, अगर मैं यादें सुनूंगी तो शायद मेरी भी यादें लौट आएं।”

     

    आरव ने प्रिया को सोफे पर फिर बिठाया। खुद उसके बगल में। फायरप्लेस में लकड़ी डाली। लौ फिर भड़क उठी। “ठीक है प्रिया। शुरू से बताता हूं। याद है वो पुराना बंगला? ठाकुर हवेली का बगीचा? वहां मम्मी हमें ले जातीं। तू छोटी-छोटी दौड़ती, फूल तोड़ती। एक बार तूने गुलाब का फूल तोड़ा, लेकिन कांटा चुभ गया। रोने लगी। मैंने तुझे गोद में उठाया। ‘भैया सब ठीक कर देंगे।’ फिर तेरी उंगली चूस ली – जैसे मम्मी करतीं। तू हंस पड़ी। ‘भैया मेरा हीरो!’”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के हाथ को कसकर पकड़ लिया। “भैया… लगता है जैसे मैं देख रही हूं। तू कितना केयरिंग था।”

     

    आरव ने उसके हाथ को चूमा। “हां प्रिया। तू मेरी जिम्मेदारी थी। मम्मी रानी… वो तुझे कितना प्यार करतीं। शाम को झूला झुलातीं। तू झूले पर चढ़ती, मैं पीछे धक्का मारता। ‘और तेज भैया!’ तू चिल्लाती। मम्मी हंसतीं। ‘आरव, धीरे। छोटी गिर जाएगी।’ लेकिन तू कभी नहीं गिरती। हम तीनों साथ खेलते। मम्मी गाना गातीं – ‘तेरे आने से पहले… जिंदगी सूनी थी।’ तू मेरी गोद में सो जाती। मैं तुझे कमरे में ले जाता। तेरा सिर सहलाता। लगता था तू मेरी बेटी जैसी।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “मम्मी… कितनी खुश थीं ना? और पापा?”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “पापा व्यस्त रहते। होटल्स का काम। लेकिन जब आते, तो तुझे गोद में उठाते। ‘मेरी राजकुमारी!’ कहते। तू उनकी मूंछें खींचती। सब हंसते। लेकिन प्रिया… घर में तनाव भी था। विक्रम की मां… वो जलती थीं। मम्मी को नीचा दिखातीं। लेकिन मम्मी कभी नहीं बोलीं। तुझे बचाने के लिए सब सहती रहीं।”

     

    प्रिया ने आरव के सीने पर सिर रखा। “भैया… अगर मुझे याद होता तो… मैं मम्मी को कभी न जाने देती।”

     

    आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… तू न गई होती तो आज ये प्यार न होता। तू लौटी तो सब लौट आया। बचपन की वो यादें… अब हमारे प्यार का हिस्सा हैं।”

     

    प्रिया ने ऊपर देखा। “भैया… और क्या? कोई मजेदार याद?”

     

    आरव हंसा। “हां। एक बार तूने मम्मी की साड़ी पहन ली। घूंघट ओढ़ा। ‘मैं दुल्हन हूं!’ चिल्लाई। मैं दूल्हा बना। मम्मी ने शादी की रस्में कीं। तू मेरी गोद में बैठी, मैं तुझे घुमाता। मम्मी फोटो खींचतीं। वो फोटो अभी भी है – अलमारी में। तू हंस रही थी, मैं शर्मा रहा था। मम्मी कहतीं, ‘एक दिन असली शादी होगी।’”

     

    प्रिया शर्मा गई। “भैया… लगता है मम्मी जानती थीं।”

     

    आरव ने उसके गाल को छुआ। “शायद प्रिया। वो हमेशा कहतीं, ‘आरव, प्रिया को कभी मत छोड़ना। वो तेरी जिंदगी है।’ मैं समझा नहीं था। लेकिन अब… अब समझ आया।”

     

    प्रिया ने उसके होंठों को छुआ। “भैया… तू मेरी जिंदगी है। बचपन से। अनजाने में।”

     

    आरव ने उसे किस किया – गहरा, भावुक। “प्रिया… तू मेरी छोटी थी। अब मेरी सब कुछ है। वो झूला, वो फूल, वो हंसी… सब अब हमारे प्यार में है।”

     

    प्रिया ने कहा, “भैया… अगर मैं वापस न आती तो?”

     

    आरव ने उसे कस लिया। “तब भी तुझे खोजता। हर जन्म में। तू मेरी हो प्रिया। बचपन से।”