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  • कान्हा और मिस्री की चोरी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  — कान्हा और मिश्री की मीठी चोरी

     

    वृंदावन में उस सुबह हवा में कुछ अलग ही मिठास थी। नंद भवन की रसोई से मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। यशोदा मैया सुबह से ही एक बड़े बर्तन में दूध उबाल रही थीं। पास में मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े रखे थे।

     

    कान्हा बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, लेकिन जैसे ही मीठी खुशबू उनके पास पहुँची, उन्होंने खेलना बंद कर दिया।

     

    कान्हा ने हवा में साँस लेते हुए कहा—

     

    “कुछ मीठा बन रहा है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मेरी नाक बता रही है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “चलो पता लगाते हैं।”

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे नंद भवन की रसोई के पास पहुँच गए।

     

    खिड़की से झाँककर कान्हा ने देखा कि यशोदा मैया एक बड़ी थाली में मिश्री के टुकड़े रख रही थीं।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “मिश्री!”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “बहुत सारी है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारा कुछ नहीं मतलब हमेशा कुछ होता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उसी समय यशोदा मैया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    खिड़की के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन उन्हें पता था कि कोई न कोई जरूर वहाँ था।

     

    उन्होंने मिश्री की थाली उठाई और उसे ऊँची जगह पर रख दिया।

     

    फिर मन ही मन बोलीं—

     

    “आज देखते हैं कान्हा इसे कैसे लेते हैं।”

     

    यशोदा बाहर चली गईं।

     

    कुछ पल बाद कान्हा धीरे-धीरे अंदर आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मिश्री बहुत ऊँचाई पर रखी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब कैसे लोगे?”

     

    कान्हा ने पास पड़ी लकड़ी उठाई।

     

    “इससे।”

     

    उन्होंने लकड़ी ऊपर की तरफ बढ़ाई।

     

    लेकिन थाली दूर थी।

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    थाली हिली जरूर, लेकिन मिश्री नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये काम नहीं करेगा।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो छोड़ देते हैं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    वहाँ एक छोटी चौकी पड़ी थी।

     

    कान्हा ने उसे खींचकर दीवार के पास रखा।

     

    फिर उसके ऊपर एक और लकड़ी का पटरा रख दिया।

     

    दोस्त घबरा गया।

     

    “कान्हा, गिर जाओगे!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम पकड़कर रखना।”

     

    एक बच्चा चौकी पकड़कर खड़ा हो गया।

     

    कान्हा धीरे-धीरे ऊपर चढ़े।

     

    अब उनका हाथ थाली तक पहुँचने वाला था।

     

    उन्होंने मिश्री का एक टुकड़ा उठाया।

     

    “मिल गई!”

     

    नीचे खड़े बच्चों ने खुशी से हाथ उठाए।

     

    लेकिन तभी बाहर से यशोदा की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    उनके हाथ में मिश्री थी।

     

    दोस्तों ने चौकी छोड़ दी और भागने लगे।

     

    कान्हा जल्दी से नीचे उतरने लगे।

     

    लेकिन उनका पैर चौकी से फिसल गया।

     

    सौभाग्य से वह नीचे रखी नरम चटाई पर गिर गए।

     

    यशोदा अंदर आईं।

     

    उन्होंने देखा कि कान्हा जमीन पर बैठे हैं और उनके हाथ में मिश्री है।

     

    यशोदा ने कमर पर हाथ रखा।

     

    “तो यही हो रहा था?”

     

    कान्हा ने मिश्री पीछे छिपा ली।

     

    “क्या?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाथ पीछे क्यों कर रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “दिखाओ।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    मिश्री का टुकड़ा देखकर यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “तुम्हें इतनी मिश्री चाहिए थी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे नहीं।”

     

    “तो किसे?”

     

    कान्हा ने पीछे खड़े दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “सबको।”

     

    दोस्तों ने सिर हिलाया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “अगर तुम्हें चाहिए थी तो मुझसे माँग लेते।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “आप मना कर देतीं।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप कहतीं कि ज्यादा मीठा मत खाओ।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो तुमने चोरी करना ठीक समझा?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया।

     

    “देखो कान्हा, बिना पूछे किसी की चीज लेना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “अगर मैं माँगता तो देतीं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, लेकिन सबको बराबर देती।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो अब दे दो।”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “पहले वादा करो कि आगे से बिना पूछे नहीं लोगे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वादा।”

     

    यशोदा ने मिश्री की थाली नीचे रख दी।

     

    सभी बच्चों की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने एक-एक करके सबको मिश्री दी।

     

    कान्हा को थोड़ा ज्यादा देने लगीं तो कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। सबको जितनी दी है, मुझे भी उतनी ही दो।”

     

    यशोदा ने प्यार से उनकी तरफ देखा।

     

    “आज तो तुमने बहुत बड़ी बात कह दी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    सब बच्चे मिश्री खाने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, चोरी करने से अच्छा माँग लेना था।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब समझ आ गया।”

     

    दूसरा बच्चा बोला—

     

    “लेकिन चोरी में मजा आता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मिश्री मिलने की खुशी ज्यादा अच्छी है, चोरी की नहीं।”

     

    यशोदा यह सुनकर मुस्कुराईं।

     

    दोपहर को नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने देखा कि आँगन में बच्चे बैठे मिश्री खा रहे हैं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज किस खुशी में मिश्री बाँटी जा रही है?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज फिर एक नया कारनामा किया।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने खुद ही सारी बात बता दी।

     

    “मैंने मिश्री लेने की कोशिश की।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और पकड़े गए?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया ने सबको बराबर मिश्री दी।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो आज तुम्हारी चोरी भी काम की रही।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आप भी उसे बढ़ावा मत दीजिए।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तो बहुत मजा आया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “कल क्या मिलेगा?”

     

    कान्हा ने सोचा।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे यशोदा! तुम्हारे कान्हा ने मेरी मटकी में फूल डाल दिए!”

     

    कान्हा ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत दोस्तों की तरफ देखा।

     

    दोस्तों ने भी उन्हें देखा।

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा धीरे से बोले—

     

    “मैंने तो कुछ नहीं किया।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    “अब तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ कौन मानेगा?”

     

    कान्हा भी हँस पड़े और भागने लगे।

     

    गोपी पीछे से आवाज लगाती रही—

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कान्हा दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ के पीछे छिप गए।

     

    उनके दोस्त भी वहीं आ गए।

     

    एक ने पूछा—

     

    “तुमने सच में मटकी में फूल डाले थे?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो गोपी हमेशा अपनी मटकी को बहुत सुंदर बनाती हैं। मैंने सोचा मटकी के अंदर भी फूल होने चाहिए।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तो ये थी आज की दूसरी शरारत!”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “मैया, मैंने फूल ही तो डाले थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे!”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    फिर बोले—

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, अब उस गोपी से माफी माँगो।”

     

    कान्हा उनके साथ गए।

     

    गोपी अभी भी नाराज थी।

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    गोपी ने उन्हें देखा।

     

    “अच्छा, अब नहीं करोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं।”

     

    गोपी मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या मैं बाहर से फूल लगाऊँ?”

     

    गोपी हँस पड़ी।

     

    “हाँ, वो कर सकते हो।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ठीक है!”

     

    उस दिन कान्हा ने पहली बार समझा कि अपनी खुशी के लिए किसी की चीज से छेड़छाड़ करने से अच्छा है कि उसकी खुशी में शामिल हुआ जाए।

     

    रात को यशोदा ने कान्हा को सुलाते हुए पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

     

    “और?”

     

    “अगर किसी को खुश करना हो तो उसकी अनुमति लेकर करना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर उनके माथे को चूमा।

     

    “मेरा कान्हा सच में समझदार हो रहा है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    कुछ पल बाद धीरे से बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल फिर मिश्री मिलेगी?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “हाँ, लेकिन चोरी नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पक्का।”

     

    बाहर वृंदावन में चाँदनी फैल चुकी थी।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा के सामने मिश्री से भी बड़ी चुनौती आने वाली थी।

     

    नंद बाबा ने अपनी गायों के लिए एक नया घंटी वाला पट्टा बनवाया था।

     

    और कान्हा को देखते ही उसमें कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर उनके मन में फिर एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    •  
  • कान्हा और नन्हीं चिड़िया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  कान्हा और नन्ही चिड़िया

     

    सुबह होते ही कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँच गए। कल उन्होंने तय किया था कि आज वहाँ खूब खेलेंगे, लेकिन जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, कान्हा की नजर घास के बीच किसी छोटी सी चीज पर पड़ी।

     

    उन्होंने कदम रोक दिए।

     

    “रुको!”

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस जगह पहुँचे। वहाँ एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। वह उड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार अपने पंख समेटकर नीचे बैठ जाती।

     

    कान्हा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    चिड़िया ने गर्दन हिलाई।

     

    कान्हा ने उसे हाथ लगाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस ध्यान से देखा।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करें?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    “इसे पानी चाहिए होगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी कटोरी में थोड़ा पानी भरा और चिड़िया के पास रख दिया।

     

    चिड़िया पहले तो पीछे हट गई, लेकिन कुछ देर बाद धीरे-धीरे पानी पीने लगी।

     

    कान्हा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “देखा? इसे प्यास लगी थी।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे घर ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर इसकी माँ इसे ढूँढ़ रही होगी तो?”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    “पहले इसकी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    वे पेड़ों की तरफ देखने लगे।

     

    कान्हा ने चिड़िया की आवाज की नकल की।

     

    “चीं… चीं…”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम चिड़िया की आवाज निकाल रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अगर इससे इसकी माँ आ गई तो?”

     

    उन्होंने फिर आवाज निकाली।

     

    कुछ देर बाद ऊपर पेड़ से एक चिड़िया की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “शायद इसकी माँ है।”

     

    उन्होंने नीचे बैठी चिड़िया को देखा।

     

    वह भी ऊपर की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, यही है।”

     

    लेकिन समस्या यह थी कि छोटी चिड़िया उड़ नहीं पा रही थी।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे पेड़ के नीचे ले चलते हैं।”

     

    सब बच्चे सावधानी से उसके पास बैठ गए।

     

    कान्हा ने पत्तों की मदद से उसके लिए छोटी सी जगह बनाई।

     

    फिर बोले—

     

    “अब इसकी माँ नीचे आएगी।”

     

    कुछ देर बाद ऊपर वाली चिड़िया नीचे की डाल पर आकर बैठ गई।

     

    वह लगातार आवाज कर रही थी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “देखो, इसकी माँ इसे बुला रही है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन ये ऊपर कैसे जाएगी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जब इसके पंख ठीक होंगे, तब उड़ जाएगी। अभी इसे आराम चाहिए।”

     

    कान्हा ने पास की झाड़ियों से कुछ नरम पत्ते लाकर उसके आसपास रख दिए।

     

    फिर वह वहीं बैठ गए।

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “तुम यहीं बैठे रहोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसे डर लग रहा है।”

     

    कुछ देर बाद चिड़िया शांत हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से बांसुरी निकाली।

     

    उन्होंने बहुत धीमी धुन बजानी शुरू की।

     

    आसपास का वातावरण शांत हो गया।

     

    ऊपर बैठी चिड़िया भी कुछ देर चुप रही।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “लगता है इसे तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “शायद।”

     

    कुछ समय बाद छोटी चिड़िया ने अपने पंख हिलाए।

     

    कान्हा तुरंत खुश हो गए।

     

    “देखो! ये कोशिश कर रही है।”

     

    उसने फिर पंख फैलाए, लेकिन इस बार भी उड़ नहीं पाई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कोई बात नहीं। जल्दी नहीं करनी चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हर किसी को ठीक होने में अपना समय लगता है।”

     

    बच्चे चुप हो गए।

     

    दोपहर होने लगी।

     

    यशोदा मैया को चिंता होने लगी कि कान्हा अभी तक घर क्यों नहीं आया।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “आज फिर बहुत देर हो गई।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कान्हा कहीं न कहीं कोई नई कहानी बना रहा होगा।”

     

    उधर कान्हा अभी भी चिड़िया के पास बैठे थे।

     

    तभी एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, अब घर चलें?”

     

    कान्हा ने चिड़िया की तरफ देखा।

     

    “थोड़ी देर और।”

     

    अचानक छोटी चिड़िया ने अपने पंख फैलाए।

     

    वह पहले एक छोटी सी छलांग लगाकर पास की डाल तक पहुँची।

     

    कान्हा खुशी से खड़े हो गए।

     

    “उड़ गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    चिड़िया थोड़ी देर डाल पर बैठी रही।

     

    फिर उसने अपने पंख फैलाए और ऊपर अपनी माँ की तरफ उड़ गई।

     

    ऊपर बैठी बड़ी चिड़िया भी उसके साथ उड़ गई।

     

    कान्हा उन्हें देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुमने इसे बचा लिया।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। इसकी माँ ने इसे बचाया। हमने बस थोड़ा इंतजार किया।”

     

    सभी बच्चे वापस घर की तरफ चल पड़े।

     

    रास्ते में कान्हा अचानक रुक गए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम इसके लिए कुछ लेकर नहीं गए।”

     

    “क्या?”

     

    “इसके लिए दाना।”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “अब तो वो उड़ गई।”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया ने कान्हा को देखते ही पूछा—

     

    “इतनी देर कहाँ थे?”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “मैया, आज हमें एक छोटी चिड़िया मिली थी।”

     

    यशोदा का चेहरा नरम हो गया।

     

    “क्या हुआ था उसे?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ध्यान से सुनती रहीं।

     

    जब कान्हा ने बताया कि वह चिड़िया अपनी माँ के पास उड़ गई, तो यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरे कान्हा ने आज अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, वो बहुत छोटी थी। उसे अकेला देखकर अच्छा नहीं लगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें हर छोटे जीव की चिंता होती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वो बोल नहीं सकते।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “जो बोल नहीं सकता, उसके दर्द को समझना बहुत बड़ी बात है।”

     

    कान्हा माँ की तरफ देखने लगे।

     

    “मैया, अगर किसी को हमारी जरूरत हो और हम मदद न करें तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जहाँ तक हो सके, मदद करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं हमेशा करूँगा।”

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ फिर बाहर बैठे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तुमने कोई शरारत नहीं की।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम पूरा दिन चिड़िया के साथ बैठे रहे।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “हर दिन शरारत करना जरूरी है क्या?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारे लिए तो है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने अचानक मिट्टी से एक छोटी सी चिड़िया बनाई।

     

    उन्होंने उसे अपने सामने रखा।

     

    “देखो, ये हमारी दोस्त है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो मिट्टी की है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन याद तो असली वाली की दिलाएगी।”

     

    शाम की हवा चल रही थी।

     

    दूर आसमान में कई पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।

     

    कान्हा उन्हें देखते हुए मुस्कुराते रहे।

     

    तभी ऊपर से एक छोटी चिड़िया उनके पास से उड़ती हुई गुजरी।

     

    कान्हा ने उसे पहचान लिया।

     

    “देखो!”

     

    दोस्तों ने ऊपर देखा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    चिड़िया एक पल के लिए पास की डाल पर बैठी और फिर उड़ गई।

     

    कान्हा ने हाथ हिलाकर कहा—

     

    “फिर मिलना!”

     

    उस दिन कान्हा ने अपने दोस्तों को एक छोटी सी बात समझाई—

     

    “किसी की मदद करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा पानी, थोड़ा इंतजार और थोड़ा प्यार भी किसी के लिए बहुत होता है।”

     

    सभी बच्चे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे।

     

    लेकिन अगले ही पल कान्हा ने मिट्टी की चिड़िया उठाई और दोस्त के सिर पर रख दी।

     

    “अब तुम चिड़िया बनो!”

     

    दोस्त चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    कान्हा हँसते हुए भागने लगे।

     

    “पकड़ो मुझे!”

     

    सारे बच्चे उनके पीछे दौड़ पड़े।

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा और मुस्कुराईं।

     

    “मेरा कान्हा फिर अपनी शरारत पर लौट आया।”

     

    लेकिन उस दिन की शरारत में भी एक मिठास थी।

     

    क्योंकि कान्हा ने अपने दोस्तों को सिखाया था कि खेल और हँसी के साथ-साथ किसी छोटे और कमजोर जीव के लिए दया रखना भी जरूरी है।

     

    और वृंदावन की उस शाम को कान्हा की बांसुरी की आवाज के साथ पेड़ों पर बैठे पक्षी भी जैसे खुशी से चहक रहे थे।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा को एक नई परेशानी मिलने वाली थी—यशोदा मैया ने घर में बहुत सारी मिश्री बनाई थी, और कान्हा के दोस्तों को इसकी खबर लग चुकी थी।

     

    अब शुरू होने वाली थी मिश्री की सबसे मीठी चोरी!

     

  • कान्हा और जामुन के पेड़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और जामुन के पेड़ की शरारत

     

    वृंदावन की सुबह आज कुछ अलग ही थी। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए पेड़ों की पत्तियों पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। गलियों में मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी और गायें अपने बछड़ों के साथ धीरे-धीरे चरने निकल रही थीं।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ नंद भवन के बाहर बैठे थे। उनके हाथ में छोटी सी लकड़ी थी, जिससे वह मिट्टी पर तरह-तरह की आकृतियाँ बना रहे थे।

     

    तभी एक दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! मैंने कुछ देखा है!”

     

    कान्हा ने लकड़ी छोड़ दी।

     

    “क्या?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “गाँव के बाहर वाले बड़े जामुन के पेड़ पर बहुत सारे जामुन लगे हैं।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। इतने सारे कि पूरा पेड़ काला दिखाई दे रहा है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “लेकिन पेड़ बहुत ऊँचा है। हम जामुन तोड़ नहीं पाएँगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पेड़ कितना भी ऊँचा हो, जामुन नीचे तो आने ही पड़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “चलो, पेड़ के पास।”

     

    सभी बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे उस बड़े जामुन के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    सचमुच पेड़ पर इतने जामुन लगे थे कि उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “वाह!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब बताओ, इन्हें तोड़ेंगे कैसे?”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को देखा।

     

    “पहले मैं चढ़ूँगा।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम गिर गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं गिरूँगा नहीं।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने लगे।

     

    पहली डाल तक पहुँचे।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    दोस्त नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    कान्हा एक मजबूत डाल पर बैठ गए।

     

    उन्होंने जामुन तोड़े और नीचे फेंकने लगे।

     

    “पकड़ो!”

     

    नीचे खड़े बच्चे खुशी से जामुन पकड़ने लगे।

     

    किसी ने अपनी धोती में जामुन बाँध लिए।

     

    किसी ने पत्तों से छोटी टोकरी बना ली।

     

    कान्हा ऊपर से जामुन तोड़ते रहे।

     

    लेकिन तभी एक शरारती दोस्त ने नीचे से कहा—

     

    “कान्हा! सबसे बड़े जामुन तो अपने लिए रख लेना।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं! सब बराबर मिलेंगे।”

     

    उन्होंने एक बड़ा जामुन तोड़ा और नीचे फेंक दिया।

     

    एक बच्चा उसे पकड़ने के लिए दौड़ा।

     

    लेकिन जामुन उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    वह बच्चा बोला—

     

    “मेरा जामुन!”

     

    कान्हा ऊपर से बोले—

     

    “कोई बात नहीं। दूसरा दूँगा।”

     

    उन्होंने उसके लिए एक और जामुन तोड़कर नीचे फेंका।

     

    इस बार बच्चे ने दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मिल गया!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे! तुम लोग वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    बच्चे अचानक शांत हो गए।

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    एक गोपी हाथ में टोकरी लिए उनकी तरफ आ रही थी।

     

    वह बोली—

     

    “ये जामुन का पेड़ किसने तोड़ना शुरू कर दिया?”

     

    कान्हा नीचे उतरते हुए बोले—

     

    “हम तो बस कुछ जामुन ले रहे थे।”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कुछ? तुम्हारे पास तो पूरी टोकरी है!”

     

    कान्हा ने अपनी टोकरी देखी।

     

    वह सच में भर चुकी थी।

     

    उन्होंने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “हम अकेले नहीं खाएँगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    कान्हा ने आसपास के बच्चों की तरफ इशारा किया।

     

    “सबके लिए।”

     

    गोपी का गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पेड़ की डालियाँ मत तोड़ना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं तोड़ेंगे।”

     

    तभी ऊपर बैठे एक बच्चे का पैर फिसला।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    बच्चा डर गया था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “डरो मत। धीरे-धीरे नीचे आओ।”

     

    उन्होंने उसे सुरक्षित नीचे उतारा।

     

    गोपी ने यह देखा तो बोली—

     

    “कान्हा, शरारत करते हो लेकिन अपने दोस्तों का ध्यान भी रखते हो।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “दोस्त हैं तो ध्यान रखना पड़ेगा।”

     

    सभी बच्चे जामुन लेकर बैठ गए।

     

    कान्हा ने एक जामुन उठाया और खाने लगे।

     

    उनके होंठ और जीभ बैंगनी हो गए।

     

    एक दोस्त उन्हें देखकर हँस पड़ा।

     

    “कान्हा! तुम्हारी जीभ देखो!”

     

    कान्हा ने अपनी जीभ बाहर निकाली।

     

    “तुम्हारी भी तो ऐसी ही है।”

     

    सभी बच्चे अपनी-अपनी जीभ देखने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे जामुन लेकर घर की ओर लौटे।

     

    कान्हा ने सोचा कि आज यशोदा मैया को भी जामुन खिलाएँगे।

     

    घर पहुँचते ही उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “मैया!”

     

    यशोदा रसोई से बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा का चेहरा देखा और हैरान रह गईं।

     

    “ये क्या हाल बना रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जामुन खाए हैं।”

     

    यशोदा ने उनके गाल देखे।

     

    “तुम्हारा पूरा मुँह बैंगनी हो गया।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “मैया, आपको भी दूँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “पहले ये बताओ कि जामुन कहाँ से लाए?”

     

    कान्हा ने टोकरी आगे कर दी।

     

    “पेड़ से।”

     

    “किसकी अनुमति से?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा ने समझ लिया।

     

    “फिर से बिना पूछे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम बहुत सारे नहीं तोड़े।”

     

    यशोदा ने टोकरी देखी।

     

    “ये तुम्हारे हिसाब से थोड़े हैं?”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    “हमने सबमें बाँट दिए।”

     

    तभी पीछे से नंद बाबा आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या बाँटा?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपका बेटा आज जामुन का पूरा पेड़ बाँट आया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “किसी को नुकसान तो नहीं हुआ?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बाबा। हमने डालियाँ नहीं तोड़ीं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो ठीक है। लेकिन अगली बार पेड़ से फल लेने से पहले उसके मालिक से पूछ लेना।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    फिर उन्होंने टोकरी से सबसे बड़ा जामुन उठाया और नंद बाबा को दे दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    नंद बाबा ने जामुन लिया।

     

    “मेरे लिए?”

     

    “हाँ।”

     

    फिर कान्हा ने दूसरा जामुन यशोदा को दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मेरे लिए इतना बड़ा?”

     

    “आपको सबसे बड़ा मिलना चाहिए।”

     

    यशोदा ने जामुन खाया और बोलीं—

     

    “बहुत मीठा है।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना!”

     

    उस शाम कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, कल क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    कुछ देर सोचकर बोले—

     

    “कल हम नदी किनारे खेलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “वहाँ क्या करेंगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    सभी बच्चे बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर तुम सब आज ही सोचना शुरू कर दोगे।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    यशोदा दूर से बच्चों की बातें सुन रही थीं।

     

    उन्होंने कान्हा को आवाज लगाई—

     

    “अब घर आ जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आ रहा हूँ मैया।”

     

    वह दोस्तों के साथ अंदर जाने लगे।

     

    लेकिन जाते-जाते उन्होंने पीछे मुड़कर उस जामुन के पेड़ की तरफ देखा।

     

    हवा से उसकी डालियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें लगा जैसे पेड़ भी उनसे कह रहा हो—

     

    “कल फिर आना।”

     

    अगले दिन कान्हा सचमुच यमुना किनारे गए।

     

    लेकिन वहाँ उन्हें एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी, जिसे देखकर उनकी सारी शरारतें कुछ देर के लिए भूल जानी थीं।

     

    यमुना किनारे एक छोटा घायल पक्षी पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे देखा तो तुरंत अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे घर ले चलो।”

     

    और यहीं से शुरू हुई कान्हा की एक ऐसी बाल लीला, जिसमें पहली बार उनके दोस्तों ने देखा कि उनका नटखट कान्हा किसी छोटे से जीव का दर्द देखकर कितना परेशान हो जाता है।

     

  • कान्हा नंद बाबा की पगड़ी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और नंद बाबा की पगड़ी

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी। गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और यशोदा मैया रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    नंद बाबा आज गाँव के कुछ लोगों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपनी सबसे सुंदर पीली पगड़ी निकाली और उसे बड़े ध्यान से सिर पर बाँधा।

     

    कान्हा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा—

     

    “मेरे बाबा आज इतने सुंदर क्यों लग रहे हैं?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “आज उन्हें गाँव की सभा में जाना है।”

     

    कान्हा कुछ देर पगड़ी को देखते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “पगड़ी बहुत सुंदर है।”

     

    दोस्त ने तुरंत कहा—

     

    “कान्हा, इसे हाथ मत लगाना।”

     

    कान्हा ने मासूमियत से पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कुछ किया तो बाबा नाराज होंगे।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं कुछ नहीं करूँगा।”

     

    दोस्त ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन वह कान्हा को नहीं जानता था।

     

    कान्हा ने मन ही मन एक योजना बना ली थी।

     

    नंद बाबा तैयार होकर बाहर जाने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा और कहा—

     

    “आज तो आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा लगना जरूरी है। आज गाँव के बड़े लोग भी आएँगे।”

     

    कान्हा तुरंत उनके पास पहुँचे।

     

    “बाबा!”

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “आपकी पगड़ी मुझे भी पहननी है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अभी नहीं। ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ी है।”

     

    कान्हा ने पगड़ी को देखा।

     

    “मैं छोटी कर लूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “जब तुम बड़े हो जाओगे, तब अपनी पगड़ी पहनना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा बाहर चले गए।

     

    कान्हा कुछ देर उन्हें जाते देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “चलो।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “पगड़ी पहनने।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा दौड़ते हुए बाहर गए।

     

    नंद बाबा कुछ दूर ही गए थे।

     

    कान्हा उनके पीछे भागे।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा हाँफते हुए उनके पास पहुँचे।

     

    “आपकी पगड़ी ठीक नहीं है।”

     

    नंद बाबा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या खराब है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “इसमें मोरपंख नहीं है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    “पगड़ी में मोरपंख क्यों लगाऊँ?”

     

    कान्हा ने अपने सिर की तरफ इशारा किया।

     

    “मेरे सिर पर तो है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “वो तुम्हारे लिए है।”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो एक मेरे बाबा के लिए भी होना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हारा मन बहुत बड़ा है।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपना मोरपंख निकाल लिया।

     

    “ये आप लगा लो।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “नहीं बेटा, ये तुम्हें ही अच्छा लगता है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे अच्छा लगता है कि मेरे बाबा भी सुंदर लगें।”

     

    नंद बाबा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने मोरपंख लिया और अपनी पगड़ी में लगा लिया।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “अब आप बिल्कुल मेरे जैसे लग रहे हो!”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दो आदमी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी में मोरपंख देखा।

     

    एक ने मजाक में कहा—

     

    “अरे नंद जी, आज तो आप कान्हा जैसे बन गए।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लगता है कान्हा ने आपको भी अपनी टोली में शामिल कर लिया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    कान्हा गर्व से बोले—

     

    “ये मेरे बाबा हैं।”

     

    सब मुस्कुराने लगे।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गाँव की सभा में चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ वापस घर आ गए।

     

    लेकिन उनकी नजर अब भी पगड़ी पर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुमने बाबा की पगड़ी में मोरपंख तो लगा दिया, लेकिन अब आगे क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “फिर वही कुछ नहीं!”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “तुम अपने बाबा के पीछे क्यों गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    “सच बताओ।”

     

    “मैंने बाबा की पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा किया।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “आप नाराज नहीं हुईं?”

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा बहुत सुंदर लग रहे थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें अपने बाबा बहुत प्यारे हैं ना?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “बहुत।”

     

    दोपहर तक नंद बाबा वापस लौट आए।

     

    कान्हा दौड़कर उनके पास गए।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपकी पगड़ी में मोरपंख अच्छा लगा?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “सबने देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्या सबने कहा कि आप सुंदर लग रहे हो?”

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “सबने कहा कि मैं आज कान्हा जैसा लग रहा हूँ।”

     

    कान्हा खुशी से हँसने लगे।

     

    “तो फिर रोज लगाना।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “रोज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि नंद बाबा ने कान्हा की नकल करनी शुरू कर दी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कहने दो।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    शाम को नंद बाबा गायों को देखने जा रहे थे।

     

    कान्हा उनके साथ चल दिए।

     

    रास्ते में नंद बाबा ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम मुझे मोरपंख क्यों देना चाहते थे?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि मुझे अच्छा लगता है जब मेरे बाबा खुश होते हैं।”

     

    नंद बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और मुझे खुशी तब होती है जब तुम मेरे साथ होते हो।”

     

    कान्हा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों धीरे-धीरे गायों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    तभी एक गाय कान्हा के पास आ गई।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “बाबा, ये आज उदास लग रही है।”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसका बछड़ा दूसरी तरफ चला गया है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “तो उसे बुला लेते हैं।”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    कुछ ही देर में बछड़ा दौड़ता हुआ आया।

     

    गाय उसे देखते ही शांत हो गई।

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच में सबकी चिंता रहती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सब हमारे अपने हैं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “ये बात हमेशा याद रखना।”

     

    सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

     

    कान्हा और नंद बाबा वापस घर लौट रहे थे।

     

    दरवाजे पर यशोदा उनका इंतजार कर रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी देखी और मुस्कुराईं।

     

    “मोरपंख अभी तक लगा हुआ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “इसे निकालने का मन ही नहीं हुआ।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, अच्छा लगता है।”

     

    यशोदा ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “मेरे दोनों नंदलाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा हँसे।

     

    “एक ही काफी है।”

     

    कान्हा बोला—

     

    “नहीं बाबा, दो होने चाहिए।”

     

    यशोदा ने दोनों को प्यार से देखा।

     

    रात को कान्हा सोने के लिए अपनी माँ के पास गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज मैंने बाबा को सुंदर बनाया।”

     

    “कैसे?”

     

    “उनकी पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और कल?”

     

    कान्हा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कल?”

     

    “हाँ, कल क्या शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारा ये ‘कुछ नहीं’ सुनकर ही मुझे डर लगता है।”

     

    कान्हा माँ की गोद में सिर रखकर मुस्कुराने लगे।

     

    लेकिन अगले दिन उनके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था।

     

    नंद बाबा की पगड़ी के बाद अब उनकी नजर वृंदावन की सबसे ऊँची पेड़ की डाल पर लगे मीठे जामुनों पर थी।

     

    और कान्हा ने तय कर लिया था कि वह अकेले जामुन नहीं खाएँगे…

     

    पूरे ग्वाल-बालों को खिलाएँगे।

     

    लेकिन जामुन तोड़ते समय जो होने वाला था, उसका अंदाजा किसी को नहीं था।

  • कान्हा और दूध मटकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और नंद बाबा की दूध वाली मटकी

     

    अगली सुबह नंद भवन में बहुत हलचल थी। नंद बाबा ने गाँव की गायों से खूब सारा ताजा दूध इकट्ठा करवाया था। आज उन्होंने खुद दूध से दही और माखन बनाने का फैसला किया था।

     

    यशोदा मैया रसोई में थीं और नंद बाबा आँगन में बड़ी-बड़ी मटकियों को एक जगह रखवा रहे थे।

     

    उन्होंने एक बहुत बड़ी मटकी उठाई और यशोदा से कहा—

     

    “यशोदा, इसे संभालकर रखना। इसमें आज का सबसे अच्छा दूध है।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    दरवाजे के पीछे खड़ा कान्हा सब सुन रहा था।

     

    उसकी नजर तुरंत उस बड़ी मटकी पर गई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “देख रहे हो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो बड़ी वाली मटकी।”

     

    “हाँ।”

     

    “बाबा ने कहा है इसमें सबसे अच्छा दूध है।”

     

    दोस्त ने तुरंत समझ लिया।

     

    “तुम फिर कुछ करने वाले हो?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैंने अभी कुछ कहा थोड़ी है।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हारे चेहरे से सब पता चल रहा है।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को देखने बाहर चले गए।

     

    यशोदा भी रसोई के दूसरे काम में लग गईं।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस मटकी के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    फिर अपने दोस्तों को देखा।

     

    “बहुत बड़ी है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे उठाना मुश्किल होगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “उठानी ही क्यों है? बस थोड़ा दूध निकालेंगे।”

     

    उन्होंने एक छोटी कटोरी उठाई।

     

    मटकी का ढक्कन हटाया।

     

    दूध देखकर कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने कटोरी में दूध भरा।

     

    पहला घूँट लिया।

     

    “वाह!”

     

    दोस्तों ने भी दूध माँगा।

     

    कान्हा ने सबको थोड़ा-थोड़ा दूध दिया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बहुत स्वादिष्ट है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, बाबा ने सबसे अच्छा दूध रखा है।”

     

    तभी बाहर से गाय की आवाज आई।

     

    कान्हा तुरंत रुक गए।

     

    “बाबा आ गए?”

     

    सभी बच्चे डर गए।

     

    लेकिन आवाज बाहर की गायों की थी।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “अभी समय है।”

     

    उन्होंने फिर कटोरी भरनी शुरू कर दी।

     

    लेकिन तभी मटकी थोड़ी हिल गई।

     

    “अरे!”

     

    एक दोस्त ने मटकी पकड़ ली।

     

    “संभालो!”

     

    कान्हा ने जल्दी से उसे सीधा किया।

     

    “अगर ये गिर गई तो मैया हमें छोड़ेंगी नहीं।”

     

    सब बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने कहा—

     

    “बस, अब बहुत हुआ।”

     

    उन्होंने ढक्कन वापस रख दिया।

     

    बच्चे वहाँ से निकलने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने जाते-जाते मटकी की तरफ देखा।

     

    “कल फिर आएँगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कल क्यों?”

     

    सभी बच्चे जम गए।

     

    नंद बाबा दरवाजे पर खड़े थे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे पीछे मुड़े।

     

    “बाबा…”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या कर रहे थे?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    एक दोस्त पीछे हटने लगा।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “सब यहीं खड़े रहो।”

     

    कान्हा ने अपनी कटोरी छिपा ली।

     

    नंद बाबा ने देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    “कान्हा, हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    कटोरी में दूध था।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो तुमने दूध चुराया?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बाबा।”

     

    “तो ये क्या है?”

     

    “मैं चख रहा था।”

     

    “किससे पूछकर?”

     

    कान्हा ने कुछ सोचकर कहा—

     

    “गाय से।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “गाय ने अनुमति दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “अच्छा, तो अब गाय से ही पूछना पड़ेगा।”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हारा कान्हा मेरी दूध वाली मटकी तक पहुँच गया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, हमने बहुत थोड़ा सा लिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “थोड़ा?”

     

    उन्होंने मटकी देखी।

     

    “अरे, आधी कटोरी भी कम नहीं है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इतने सारे बच्चे थे ना।”

     

    यशोदा ने बाकी बच्चों को देखा।

     

    सबने सिर झुका लिया।

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “यशोदा, इन्हें डाँटो मत। बच्चों ने दूध ही तो पिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अगर दूध अच्छा है तो बच्चों को मिलना भी चाहिए।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “सुना मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हारे बाबा ने तुम्हें बचा लिया, लेकिन अगली बार पहले पूछना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा ने बच्चों को पास बुलाया।

     

    “चलो, अब सबको मैं खुद दूध पिलाता हूँ।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “बाबा, सच?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने दूध के गिलास भर दिए।

     

    सभी बच्चों ने दूध पिया।

     

    कान्हा ने अपना गिलास खत्म करके कहा—

     

    “बाबा, आज वाला दूध बहुत अच्छा था।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि गायों को आज सुबह बहुत अच्छी घास मिली थी।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या गायें भी खुश थीं?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “हाँ। जानवर खुश रहें तो उनका दूध भी अच्छा होता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो हमें गायों को भी अच्छा खाना देना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बिल्कुल।”

     

    उस दिन से कान्हा ने गायों को चारा देने की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    सुबह होते ही वह गायों के पास जाते।

     

    “आओ, तुम्हारे लिए घास लाया हूँ।”

     

    गायें उनके आसपास इकट्ठी हो जातीं।

     

    एक दिन कान्हा ने एक गाय को चारा देते हुए देखा कि वह कुछ खा नहीं रही।

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा, इसे क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसे भूख नहीं है।”

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “इसे आराम करने दो।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम अब गायों की भाषा भी समझने लगे हो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ये मेरी दोस्त हैं।”

     

    दोपहर को यशोदा ने देखा कि कान्हा बाहर गायों के बीच बैठे हैं।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा, खाना खा लो!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, पहले इन्हें खिला दूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें खुद भी तो खाना है।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “सबके बाद मैं।”

     

    यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    शाम को नंद बाबा ने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “आज से तुम्हें एक काम दूँगा।”

     

    कान्हा ने उत्सुक होकर पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर दिन गायों को चारा खिलाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “मैं जरूर करूँगा।”

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा तो उन्हें अपने बेटे पर गर्व हुआ।

     

    रात को कान्हा माँ की गोद में लेटे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज तुम्हें सबसे ज्यादा खुशी किस बात की हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा ने मुझे गायों की देखभाल का काम दिया।”

     

    “और दूध?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “वो भी अच्छा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें हर चीज में खुशी मिल जाती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मेरे पास आप हो, बाबा हैं, मेरे दोस्त हैं और मेरी गायें भी।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “भगवान तुम्हें हमेशा ऐसा ही रखे।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले ही पल उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल माखन मिलेगा?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम सुधरोगे नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “माखन से दोस्ती थोड़ी छोड़ी जाती है।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    उन्हें पता था कि उनका नन्हा कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करे, उसके मन में प्रेम और अपनापन हमेशा सबसे ऊपर रहेगा।

     

    और अगले दिन कान्हा की नजर इस बार दूध की मटकी पर नहीं, बल्कि नंद बाबा की पगड़ी पर पड़ने वाली थी।

     

     

  • कान्हा और यमुना किनारे शरारत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यमुना किनारे की शरारत

     

    अगली सुबह वृंदावन में सूरज निकलने से पहले ही कान्हा की आँख खुल गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश हल्का-हल्का नीला हो रहा था। दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।

     

    कान्हा धीरे से बिस्तर से उठे और बाहर जाने लगे।

     

    तभी पीछे से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “मैं तो बस बाहर देखने जा रहा था।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बाहर देखने के लिए इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा समझ गईं।

     

    “फिर से कोई शरारत करने का मन है?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “बिल्कुल पक्का।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया और उनके बाल ठीक करते हुए कहा—

     

    “यमुना के बहुत पास मत जाना। और अपने दोस्तों से अलग मत होना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ घर से निकल पड़े।

     

    आज उनका मन यमुना किनारे जाने का था।

     

    रास्ते में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज क्या खेलेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हम यमुना किनारे दौड़ लगाएंगे।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “और अगर तुम हार गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं कभी नहीं हारता।”

     

    तीसरा बच्चा बोला—

     

    “कल तो तुम पेड़ पर चढ़ते समय गिर गए थे।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो गिरना नहीं था। मैं नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”

     

    सभी बच्चे जोर से हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे यमुना किनारे पहुँच गए।

     

    यमुना का पानी शांत था। किनारे पर हरी घास थी और पास के पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।

     

    कान्हा ने अपनी बांसुरी निकाली और एक पत्थर पर बैठ गए।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे बांसुरी बजानी शुरू की।

     

    सभी बच्चे शांत होकर सुनने लगे।

     

    कुछ देर बाद एक मोर भी पास आ गया।

     

    कान्हा ने बांसुरी बजाना बंद किया तो मोर भी रुक गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे भी तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “ये मेरा दोस्त है।”

     

    तभी एक बच्चे ने यमुना में तैरती हुई कमल की पत्तियाँ देखीं।

     

    वह बोला—

     

    “कान्हा, देखो कितनी सुंदर पत्तियाँ हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो उन्हें देखते हैं।”

     

    सब बच्चे पानी के किनारे पहुँच गए।

     

    कान्हा ने एक छोटी लकड़ी उठाई और पानी में पड़ी पत्ती को अपनी ओर खींचने लगे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “बहुत अंदर मत जाना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं किनारे पर ही हूँ।”

     

    तभी उन्हें पानी में एक छोटी सी नाव दिखाई दी।

     

    नाव किनारे से थोड़ी दूर थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो नाव में बैठते हैं।”

     

    एक दोस्त घबरा गया।

     

    “नहीं, हमें बाबा ने पानी में जाने से मना किया है।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “ठीक है, नाव में नहीं जाएँगे।”

     

    उन्होंने पास पड़ी एक लंबी लकड़ी उठाई और नाव को किनारे की ओर खींचने लगे।

     

    बच्चे उनकी मदद करने लगे।

     

    कुछ कोशिश के बाद नाव किनारे आ गई।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखा! बिना पानी में उतरे भी नाव आ गई।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    तभी अचानक एक तेज हवा चली।

     

    कान्हा की बांसुरी उनके हाथ से छूटकर घास में गिर गई।

     

    “मेरी बांसुरी!”

     

    कान्हा उसे ढूँढ़ने लगे।

     

    सभी बच्चे अलग-अलग तरफ खोजने लगे।

     

    लेकिन बांसुरी कहीं दिखाई नहीं दी।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद हवा से आगे चली गई।”

     

    कान्हा चिंतित हो गए।

     

    “मेरी बांसुरी मुझे बहुत प्यारी है।”

     

    वे घास में झुककर खोजने लगे।

     

    तभी उन्हें दूर एक छोटी सी लड़की दिखाई दी।

     

    वह किनारे पर बैठी थी और हाथ में वही बांसुरी थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ये मेरी बांसुरी है।”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे ये घास में मिली थी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, ये मेरी है।”

     

    लड़की ने बांसुरी वापस कर दी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं अपनी माँ के साथ आई थी। वो थोड़ी दूर गई हैं।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”

     

    लड़की ने नदी की दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    कान्हा समझ गए कि वह अपनी माँ से अलग हो गई थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “हमें इसे इसकी माँ के पास पहुँचाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे लड़की के साथ चल पड़े।

     

    थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक महिला परेशान होकर इधर-उधर देखते हुए दिखाई दी।

     

    लड़की अपनी माँ को देखते ही दौड़ पड़ी।

     

    “माँ!”

     

    महिला ने उसे गले लगा लिया।

     

    उसने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी बेटी को यहाँ तक पहुँचाया?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा—

     

    “बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “आप बस इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “अब नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा वापस अपने दोस्तों के पास लौट आए।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें याद आया कि उन्हें घर भी लौटना था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब मैया डाँटेंगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमने कोई गलत काम तो किया नहीं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन हम काफी देर से यहाँ हैं।”

     

    कान्हा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज काफी ऊपर आ चुका था।

     

    “अरे! सच में बहुत देर हो गई।”

     

    सभी बच्चे तेजी से घर की तरफ भागने लगे।

     

    उधर नंद भवन में यशोदा मैया बार-बार बाहर देख रही थीं।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “कान्हा अभी तक नहीं आया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बच्चों के साथ गया है। आता होगा।”

     

    लेकिन कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ दौड़ते हुए आ गए।

     

    यशोदा ने उन्हें देखते ही पकड़ लिया।

     

    “कहाँ थे इतनी देर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “यमुना किनारे।”

     

    “मैंने कहा था ज्यादा दूर मत जाना।”

     

    “हम दूर नहीं गए थे।”

     

    “फिर इतनी देर क्यों?”

     

    कान्हा ने सारी बात बता दी।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    जब उन्हें पता चला कि कान्हा ने एक बच्ची को उसकी माँ तक पहुँचाया, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “तुमने अच्छा काम किया, लेकिन बिना बताए इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “माफ कर दो मैया।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस अगली बार मुझे बता देना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पक्का।”

     

    तभी उनके एक दोस्त ने पीछे से कहा—

     

    “मैया, कान्हा ने आज नाव भी किनारे खींची थी!”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “नाव?”

     

    कान्हा चुप।

     

    “तुमने नाव में जाने की कोशिश तो नहीं की?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। हमने नाव को खुद ही किनारे बुला लिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारी बातें भी ना!”

     

    उन्होंने कान्हा को अपने पास बैठाया और उन्हें खाना खिलाने लगीं।

     

    कान्हा खाते-खाते बोले—

     

    “मैया, आज मैंने एक बात सीखी।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसे रास्ता न मिले, उसका रास्ता दिखाना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “ये किसने सिखाया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मुझे खुद समझ आया।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “मेरे नन्हे कान्हा की शरारतों के बीच इतनी समझदारी भी छिपी है, ये तो मुझे आज पता चला।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    शाम को वह आँगन में बैठे अपनी बांसुरी बजाने लगे।

     

    वही मोर दूर पेड़ के पास आकर बैठ गया।

     

    गायें भी शांत होकर उन्हें देखने लगीं।

     

    यशोदा दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे को देख रही थीं।

     

    उन्हें लगा कि कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करें, उनके मन में दूसरों के लिए हमेशा प्यार रहता है।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा ने बांसुरी बजाते-बजाते अपने दोस्तों की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गए।

     

    कान्हा की अगली शरारत की योजना फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    और इस बार निशाना था—

     

    नंद बाबा की नई बनाई हुई दूध की बड़ी मटकी।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 8

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 8

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 8 — पापा की डायरी का राज

     

    आरोही और आरव तेज कदमों से कार की तरफ बढ़े।

     

    आरोही के हाथ में अभी भी फोन था।

     

    उसकी मां की घबराई हुई आवाज उसके कानों में गूंज रही थी “मुझे तुम्हारे पापा की डायरी मिली है।”

     

    आरोही का दिल बेचैनी से धड़क रहा था।

     

    आरव ने कार स्टार्ट की और उसकी तरफ देखा।

     

    “घबराओ मत।”

     

    आरोही ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

     

    “कैसे ना घबराऊं, आरव? इतने सालों से जिस सच की तलाश थी… शायद आज वो हमारे सामने आने वाला है।”

     

    आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम दोनों मिलकर सामना करेंगे।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हर बार ऐसा क्यों कहते हो?”

     

    “क्या?”

     

    “हम दोनों।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला,

     

    “क्योंकि अब मेरी जिंदगी में ‘मैं’ से ज्यादा ‘हम’ जरूरी लगने लगा है।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन दिल में एक डर अब भी था।

     

    अगर डायरी में ऐसा सच लिखा हुआ हुआ जिसने दोनों को अलग कर दिया तो?

     

    करीब आधे घंटे बाद दोनों घर पहुंचे।

     

    आरोही ने जैसे ही दरवाजा खोला, उसकी मां सामने खड़ी थीं।

     

    उनके हाथ में एक पुरानी काली डायरी थी।

     

    आरोही की नजर डायरी पर टिक गई।

     

    “मां… यही है?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने डायरी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन मां ने उसे रोक दिया।

     

    “पहले बैठो।”

     

    “मां, प्लीज।”

     

    “नहीं आरोही। इसे पढ़ने से पहले तुम्हें एक बात समझनी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    मां ने आरव की तरफ देखा।

     

    “ये डायरी सिर्फ तुम्हारे पिता की यादें नहीं हैं।”

     

    आरव भी गंभीर हो गया।

     

    “फिर?”

     

    “इसमें ऐसे नाम हैं, जिन्हें जानने के बाद तुम्हारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती है।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या इसमें आरव के परिवार का नाम है?”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “तो पढ़ते हैं।”

     

    मां ने डायरी आरोही के हाथ में दे दी।

     

    आरोही ने पहला पन्ना खोला।

     

    ऊपर उसके पिता की लिखावट थी।

     

    “12 मार्च”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “आज राजवीर से फिर मुलाकात हुई। हमारे बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि वो मेरी बेटी के खिलाफ कभी कुछ नहीं करेगा।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में हैरानी थी।

     

    “मेरे पिता… तुम्हारे पापा के बारे में ऐसा सोचते थे?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    अगला पन्ना।

     

    “18 मार्च”

     

    “विक्रम फिर मेरे पास आया। उसने मुझे राजवीर के खिलाफ जाने के लिए कहा। मैंने मना कर दिया।”

     

    आरव तुरंत आगे झुका।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरोही ने पन्ना पलटा।

     

    “मैंने उससे साफ कह दिया है कि मैं किसी भी कीमत पर राजवीर को धोखा नहीं दूंगा।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरोही की मां ने धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और राजवीर एक समय दुश्मन नहीं थे।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “क्या?”

     

    “वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।”

     

    आरव ने भी हैरानी से मां को देखा।

     

    “मेरे पिता ने कभी इसका जिक्र नहीं किया।”

     

    मां ने कहा,

     

    “क्योंकि बाद में सब कुछ बदल गया।”

     

    आरोही ने डायरी आगे पढ़ी।

     

    “25 मार्च”

     

    “मुझे शक है कि विक्रम दोनों परिवारों के बीच गलतफहमी पैदा कर रहा है। अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो मेरी बेटी को सच्चाई बताना।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    “मां…”

     

    मां की आंखें भर आईं।

     

    “पढ़ती जाओ।”

     

    अगला पन्ना।

     

    “28 मार्च”

     

    “आज मुझे एक ऐसा दस्तावेज मिला है जो साबित करता है कि कंपनी में करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई है। लेकिन ये काम न मेरा है और न राजवीर का।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो किसका?”

     

    आरोही ने नीचे पढ़ा।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    “तो उसने पैसे चुराए और इल्जाम दोनों परिवारों पर लगाया।”

     

    “शायद,” आरोही ने कहा।

     

    अगला पन्ना आधा फटा हुआ था।

     

    उस पर सिर्फ कुछ शब्द दिखाई दे रहे थे “अगर मैं मर जाऊं… तो M-17 में…”

     

    आरोही रुक गई।

     

    “आगे का पन्ना फटा हुआ है।”

     

    आरव ने डायरी हाथ में ली।

     

    “कोई जानबूझकर इसे फाड़कर ले गया है।”

     

    आरोही की मां ने तुरंत कहा,

     

    “तुम्हारे पापा की मौत के बाद मैंने ये डायरी बहुत ढूंढी थी। लेकिन मुझे कभी नहीं मिली।”

     

    “तो फिर ये अब कहां से आई?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “मां?”

     

    मां ने धीमे से कहा,

     

    “आज सुबह हमारे पुराने स्टोर रूम की सफाई करते समय ये एक लकड़ी के बक्से के पीछे मिली।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या बक्सा पहले से वहां था?”

     

    “हां।”

     

    “किसने रखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव और आरोही ने एक-दूसरे को देखा।

     

    रात काफी हो चुकी थी।

     

    आरव जाने के लिए उठा।

     

    आरोही उसे दरवाजे तक छोड़ने आई।

     

    दोनों कुछ पल चुप खड़े रहे।

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “आरव।”

     

    “हम्म?”

     

    “आज जो कुछ पढ़ा… उससे एक बात तो साफ है।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता और मेरे पिता दुश्मन नहीं थे।”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उन्हें दुश्मन किसने बनाया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

     

    “विक्रम।”

     

    “और अगर वही तुम्हारे पापा की मौत के पीछे है?”

     

    “तो उसे कानून के सामने लाएंगे।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोली,

     

    “एक बात पूछूं?”

     

    “पूछो।”

     

    “अगर मेरे पापा और तुम्हारे पापा दोस्त थे… तो क्या तुम्हारे पापा को मेरी मां के बारे में पता था?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “शायद।”

     

    “और मेरे बारे में?”

     

    “शायद।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा ‘शायद’ भी बहुत है।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तुमने ही सिखाया है।”

     

    दोनों हंसने लगे।

     

    कुछ पल बाद खामोशी छा गई।

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “आरोही।”

     

    “हां?”

     

    “तुम खुश हो?”

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोली,

     

    “जब तुम मेरे पास होते हो… तब।”

     

    आरव की आंखों में चमक आ गई।

     

    “तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें ज्यादा से ज्यादा खुश रखूं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “और अगर मैं तुम्हारी आदत बन गई तो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तो फिर जिंदगी भर की आदत बना लूंगा।”

     

    आरोही ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    “जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “बहुत बातें करते हो।”

     

    “ठीक है।”

     

    आरव मुड़ा।

     

    दो कदम आगे बढ़ा।

     

    फिर वापस उसकी तरफ देखा।

     

    “गुड नाइट।”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “गुड नाइट।”

     

    आरव चला गया।

     

    आरोही दरवाजे पर खड़ी उसे तब तक देखती रही जब तक उसकी कार नजरों से ओझल नहीं हो गई।

     

    लेकिन उसी रात…

     

    आरव के पिता की पुरानी स्टडी में कुछ हलचल हुई।

     

    आरव ने घर लौटकर अपने पिता की पुरानी अलमारी खोली।

     

    उसे याद था कि उसके पिता के पास भी कई पुराने दस्तावेज थे।

     

    उसने एक-एक करके फाइलें निकालनी शुरू कीं।

     

    अचानक एक पुराना लकड़ी का डिब्बा नीचे गिरा।

     

    डिब्बा खुल गया।

     

    उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें उसके पिता राजवीर और विनय मेहरा साथ खड़े थे।

     

    दोनों हंस रहे थे।

     

    पीछे एक और आदमी था।

     

    विक्रम सूद।

     

    आरव ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था “हम तीनों ने जो शुरू किया है, उसे कोई खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    “हम तीनों?”

     

    उसे कुछ समझ नहीं आया।

     

    तभी डिब्बे के अंदर एक छोटी-सी चाबी दिखाई दी।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर भी वही अक्षर खुदे थे M-17

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो मेरे पिता के पास भी इसकी चाबी थी।”

     

    उसने तुरंत कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, अभी मेरे घर आ।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे M-17 की दूसरी चाबी मिली है।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने कहा,

     

    “तो इसका मतलब…”

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हमारे पास अब दोनों चाबियां हैं।”

     

    अगली सुबह आरव और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम पहुंचे।

     

    आरोही भी उनके साथ थी।

     

    आरव ने दोनों चाबियां सामने रखीं।

     

    “एक तुम्हारे पापा की।”

     

    “और एक मेरे पापा की।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “शायद दोनों एक ही ताले के लिए हैं।”

     

    कमरे में एक पुरानी लोहे की अलमारी थी।

     

    लेकिन उस पर कोई ताला दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कबीर ने ध्यान से देखा।

     

    “रुको।”

     

    उसने अलमारी के नीचे हाथ लगाया।

     

    एक छोटा-सा छेद दिखाई दिया।

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    फिर दूसरी।

     

    दोनों चाबियां एक साथ घूमीं।

     

    क्लिक!

     

    अलमारी खुल गई।

     

    अंदर सिर्फ एक काला बॉक्स था।

     

    आरोही ने उसे बाहर निकाला।

     

    बॉक्स पर लिखा था “सच केवल उसी के लिए जो दोनों परिवारों पर भरोसा कर सके।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “इसे खोलें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    बॉक्स खुला।

     

    अंदर एक पेन ड्राइव, कुछ कागज और एक पुराना फोटो था।

     

    आरोही ने फोटो उठाया।

     

    उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

     

    फोटो में उसके पिता और आरव के पिता के साथ…

     

    आरोही की मां भी थीं।

     

    लेकिन वो तस्वीर उस समय की थी जब आरोही की मां ने हमेशा कहा था कि वह इन लोगों को जानती तक नहीं थीं।

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “मां ने हमसे झूठ बोला?”

     

    आरव ने फोटो हाथ में लिया।

     

    पीछे तारीख लिखी थी “घटना से तीन दिन पहले।”

     

    कबीर ने पेन ड्राइव उठाई।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “पता लगाते हैं।”

     

    उन्होंने लैपटॉप में पेन ड्राइव लगाई।

     

    एक वीडियो फाइल सामने आई।

     

    वीडियो चलाया गया।

     

    स्क्रीन पर विनय मेहरा दिखाई दिए।

     

    उनका चेहरा गंभीर था।

     

    वह कैमरे की तरफ देखकर बोल रहे थे “अगर ये वीडियो किसी के हाथ लगा है, तो समझ लेना कि मैं शायद जिंदा नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वीडियो में उसके पिता आगे बोले “मेरी मौत का जिम्मेदार राजवीर नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से स्क्रीन देखी।

     

    फिर विनय ने कहा “लेकिन राजवीर का बेटा… आरव… उसे बचाना बहुत जरूरी है।”

     

    वीडियो अचानक रुक गया।

     

    स्क्रीन काली हो गई।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “वीडियो क्यों रुक गया?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “शायद फाइल अधूरी है।”

     

    आरव की नजर स्क्रीन पर जमी थी।

     

    “मेरे पिता ने ऐसा क्या किया था कि मेरे पापा ने मुझे बचाने की बात कही?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमें पता करना होगा।”

     

    तभी कमरे की लाइट अचानक बंद हो गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “आरव?”

     

    “मैं यहीं हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड बाद बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    “दरवाजा बाहर से लॉक है!”

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “कोई हमें यहां बंद कर गया?”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    उसने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    अंधेरे में अचानक एक आवाज गूंजी “तुम्हें सच जानने की बहुत जल्दी थी ना?”

     

    आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    आरव ने आवाज की दिशा में देखा।

     

    “सामने आ!”

     

    आवाज फिर आई “सच जानोगे… तो शायद एक-दूसरे से नफरत करने लगोगे।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “हमारा रिश्ता इतना कमजोर नहीं है।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आओयप्यारज आई “देखते हैं।”

     

    अचानक लाइट वापस जल गई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन टेबल पर एक नया कागज रखा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    आरोही ने कागज पढ़ा।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उनके बीच पहली बार डर ने जगह बना ली।

     

    क्योंकि अगर ये सच था…

     

    तो उनके पिता सिर्फ दोस्त नहीं थे।

     

    उनके बीच कोई ऐसा विश्वासघात हुआ था…

     

    जिसकी कीमत शायद उनकी अगली पीढ़ी को चुकानी थी।

     

    और उन्हें अभी नहीं पता था कि इस पूरे खेल में…

     

    आरव और आरोही का प्यार ही सबसे बड़ा हथियार बनने वाला था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 7

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 7

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 7 — पापा का आखिरी खत

     

    आरोही के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे।

     

    उसकी नजरें उस खत की पहली लाइन पर जमी थीं—

     

    “आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”

     

    उसके बाद की लाइन पढ़ते ही उसकी सांस अटक गई।

     

    “और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”

     

    आरोही के होंठ कांपने लगे।

     

    “आरव…”

     

    उसके मुंह से बस इतना ही निकला।

     

    मां चुपचाप उसके सामने बैठी थीं।

     

    उनकी आंखों में इतने सालों से छुपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    आरोही ने खत को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मां… पापा ने आरव को बचाने के लिए क्यों कहा?”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा जानते थे कि जो कुछ होने वाला है, उसमें आरव का कोई दोष नहीं था।”

     

    “लेकिन आपने तो कहा था कि आरव के परिवार की वजह से पापा की मौत हुई।”

     

    “मैंने कहा था… उसके परिवार की वजह से।”

     

    मां की आवाज भर्रा गई।

     

    “आरव की वजह से नहीं।”

     

    आरोही कुछ पल उन्हें देखती रही।

     

    “तो मुझे पूरा सच बताइए।”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “आज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये खत तुम्हें खुद सब कुछ बताएगा।”

     

    आरोही ने खत की अगली लाइन पढ़ी।

     

    “बेटी, अगर तुम मुझसे प्यार करती हो तो मेरी बात पर भरोसा करना। आरव को अपने दुश्मन की तरह मत देखना। असली दुश्मन वो है, जो हमारे दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहा है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “असली दुश्मन कौन है?”

     

    मां ने धीमे से कहा,

     

    “हमें नहीं पता।”

     

    आरोही ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन पापा को पता था?”

     

    “शायद।”

     

    “फिर उन्होंने नाम क्यों नहीं लिखा?”

     

    मां चुप रहीं।

     

    आरोही ने खत को आगे पढ़ा।

     

    लेकिन अगली लाइन देखकर उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    वहां सिर्फ लिखा था—

     

    “जिस दिन तुम्हें वो पुरानी चाबी मिलेगी, उसी दिन तुम्हें आधा सच पता चल जाएगा।”

     

    आरोही ने तुरंत डिब्बे में रखी चाबी उठाई।

     

    “ये?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “ये किसकी चाबी है?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “आपको नहीं पता?”

     

    “तुम्हारे पापा ने मरने से कुछ दिन पहले मुझे ये दी थी। बस इतना कहा था कि इसे संभालकर रखना।”

     

    आरोही चाबी को ध्यान से देखने लगी।

     

    उस पर बहुत छोटा-सा अक्षर खुदा था M-17

     

    “ये क्या है?”

     

    मां ने कहा,

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    आरोही ने खत को फिर से देखा।

     

    उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके पिता ने जाने से पहले कोई ऐसी चीज छुपाई थी, जो आज उसकी जिंदगी बदलने वाली थी।

     

    उधर आरव अपने कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने वही पुरानी फाइल खुली थी।

     

    कबीर भी उसके सामने बैठा था।

     

    “आरव, हमें ये पता लगाना होगा कि तुम्हारे पिता की कार उस रात वहां क्यों थी।”

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “और अगर मेरे पिता सच में विनय मेहरा से मिलने गए थे?”

     

    “तो?”

     

    “तो हो सकता है हादसे से पहले दोनों के बीच कोई बातचीत हुई हो।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “लेकिन CCTV फुटेज अधूरी है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “बाकी फुटेज?”

     

    “गायब।”

     

    “गायब?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “किसने मिटाई?”

     

    “यही पता करना है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने अपना फोन उठाया।

     

    आरोही को कॉल किया।

     

    फोन नहीं उठा।

     

    उसने दोबारा कॉल किया।

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    आरव के मन में बेचैनी होने लगी।

     

    “कुछ हुआ तो नहीं?”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “किसे कॉल कर रहा है?”

     

    “आरोही।”

     

    “शायद सो गई हो।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। वो ऐसे फोन नहीं छोड़ती।”

     

    तभी उसका फोन बजा।

     

    आरोही का मैसेज था “कल मिलना है। बहुत जरूरी बात करनी है।”

     

    आरव ने तुरंत जवाब दिया “अभी सब ठीक है?”

     

    कुछ देर बाद जवाब आया “हां। लेकिन कल मुझे तुमसे कुछ पूछना है।”

     

    आरव ने लिखा “जो पूछना है, सामने पूछना।”

     

    आरोही ने सिर्फ इतना लिखा “वादा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “वादा।”

     

    अगली सुबह आरोही ने मां के सामने चाबी रखी।

     

    “मां, मैं इसे लेकर जा रही हूं।”

     

    मां घबरा गईं।

     

    “कहां?”

     

    “मुझे पता करना है कि ये चाबी किसकी है।”

     

    “आरोही, अकेली मत जाना।”

     

    “मैं अकेली नहीं हूं।”

     

    मां समझ गईं।

     

    “आरव?”

     

    आरोही ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    मां कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “अगर तुम्हारे पापा ने उसे बचाने के लिए कहा था… तो शायद उस पर भरोसा किया जा सकता है।”

     

    आरोही ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मैं सच पता करके रहूंगी।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “सावधान रहना।”

     

    दोपहर में आरोही और आरव शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी लाइब्रेरी के बाहर मिले।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम मुझे यहां क्यों लाई हो?”

     

    आरोही ने चाबी उसकी तरफ बढ़ा दी।

     

    “ये मेरे पापा की है।”

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    “M-17।”

     

    “हां।”

     

    “तुम्हें ये कहां मिली?”

     

    “पापा के पुराने सामान में।”

     

    फिर आरोही ने उसे खत दिखाया।

     

    आरव ने खत पढ़ा।

     

    उसके चेहरे पर गंभीरता आ गई।

     

    “तुम्हारे पापा ने मेरे बारे में लिखा है।”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने कहा है कि मुझे बचाना।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “इसलिए मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूं।”

     

    “पूछो।”

     

    “क्या तुम्हारे पापा के पास भी ऐसी कोई चाबी थी?”

     

    आरव कुछ सोचने लगा।

     

    फिर अचानक उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “रुको।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरे पिता के स्टडी रूम में एक पुरानी अलमारी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उस पर भी एक नंबर लिखा था।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने धीरे से कहा “M-17।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    “इसका मतलब…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “दोनों परिवारों के पास एक ही जगह की चाबी थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सी जगह?”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    कबीर को फोन किया गया।

     

    कुछ मिनटों में कबीर ने पता लगा लिया कि शहर में एक पुराना रिकॉर्ड रूम था, जिसका सेक्शन M-17 कहलाता था।

     

    वह रिकॉर्ड रूम करीब दस साल से बंद था।

     

    आरोही और आरव तुरंत वहां पहुंच गए।

     

    पुरानी इमारत धूल से भरी हुई थी।

     

    दरवाजे पर जंग लगा ताला था।

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें डर नहीं लग रहा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम साथ हो।”

     

    “तो?”

     

    “डरने की जरूरत नहीं।”

     

    दोनों अंदर चले गए।

     

    कमरे में पुराने दस्तावेजों की अलमारियां थीं।

     

    दीवार पर जगह-जगह धूल जमी थी।

     

    एक कोने में लोहे की छोटी अलमारी थी।

     

    उस पर लिखा था M-17

     

    आरोही की धड़कन तेज हो गई।

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर एक पुरानी फाइल थी।

     

    फाइल के ऊपर लिखा था “मेहरा- सिंह प्रोजेक्ट।”

     

    आरोही ने फाइल उठा ली।

     

    पहला पन्ना पढ़ते ही उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “ये प्रोजेक्ट जमीन का नहीं था।”

     

    “तो?”

     

    “ये एक कंपनी के बारे में था।”

     

    “कौन सी कंपनी?”

     

    आरोही ने पन्ना पलटा।

     

    अचानक एक नाम सामने आया विक्रम सूद।

     

    दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव ने फाइल अपने हाथ में ले ली।

     

    “तो विक्रम दोनों परिवारों के बीच था।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “और शायद वही असली दुश्मन है।”

     

    तभी पीछे से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    दोनों तुरंत पलटे।

     

    दरवाजे के पास कोई नहीं था।

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे पीछे रहो।”

     

    दोनों धीरे-धीरे बाहर आए।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी “बहुत देर कर दी।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “कोई हमारे आने का इंतजार कर रहा था।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    दोनों तेजी से बाहर आए।

     

    लेकिन जैसे ही वे पार्किंग में पहुंचे, एक बाइक तेज गति से उनकी तरफ आई।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।

     

    बाइक उनके पास से गुजर गई।

     

    आरोही डर गई।

     

    “आरव!”

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने बाइक का नंबर देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन बाइक दूर निकल चुकी थी।

     

    शाम को दोनों झील के किनारे पहुंचे।

     

    आज वहां कोई मजाक नहीं था।

     

    दोनों चुप बैठे थे।

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या तुम्हें लगता है कि विक्रम सूद ने मेरे पापा को मरवाया?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मुझे अब इस पर शक नहीं… भरोसा होने लगा है।”

     

    “लेकिन सबूत?”

     

    “हमें मिलेगा।”

     

    “और अगर वो नहीं मिला?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “फिर भी मैं तुम्हारा साथ दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम मेरे लिए इतना क्यों कर रहे हो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ दोस्त नहीं हो।”

     

    आरोही की धड़कन तेज हो गई।

     

    “तो?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “शायद… मैं तुम्हें खोने से डरने लगा हूं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “और अगर मैं कहूं कि मुझे भी डर लगता है?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किस बात का?”

     

    “तुम्हें खोने का।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।

     

    “तो फिर मत खोना।”

     

    आरोही ने उसकी उंगलियां कसकर पकड़ लीं।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    लेकिन उसी पल आरोही का फोन बजा।

     

    मां का फोन था।

     

    उसने तुरंत उठाया।

     

    “हां मां?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर मां की कांपती आवाज आई “आरोही… तुम तुरंत घर आओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “मुझे अभी तुम्हारे पापा की एक और चीज मिली है।”

     

    आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा “तुम्हारे पापा की डायरी।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    “पापा की डायरी मिल गई है।”

     

    आरव ने उसका हाथ थामे रखा।

     

    “चलो।”

     

    दोनों कार की तरफ बढ़े।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था…

     

    उस डायरी में लिखा सच सिर्फ उनके परिवारों की दुश्मनी का राज नहीं था।

     

    उसमें शायद उस रात की पूरी कहानी लिखी थी…

     

    जिस रात विनय मेहरा की मौत हुई थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल क्या उस रात आरव के पिता सच में वहां मौजूद थे?

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 6

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 6

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 6 — वो राज जो दिल तोड़ सकता था

     

    सुबह की पहली किरण खिड़की से होते हुए कमरे में आई, लेकिन आरोही की आंखें रातभर की बेचैनी के कारण अब भी भारी थीं।

     

    वह बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी के उसी पन्ने को देख रही थी, जिस पर उसने आरव के बारे में लिखा था “कुछ लोग जिंदगी में अचानक आते हैं… फिर पता ही नहीं चलता कि कब उनकी मौजूदगी आदत बन गई।”

     

    उसने उंगलियों से उन शब्दों को हल्के से छुआ।

     

    फिर उसकी आंखों के सामने मां का चेहरा आ गया।

     

    “आरव के परिवार की वजह से तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    दिल आरव पर भरोसा करना चाहता था।

     

    लेकिन दिमाग बार-बार सवाल कर रहा था अगर मां सच कह रही हैं तो?

     

    तभी फोन बजा।

     

    स्क्रीन पर आरव का नाम देखकर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    उसने कॉल उठा लिया।

     

    “हैलो।”

     

    दूसरी तरफ से आरव की आवाज आई “गुड मॉर्निंग।”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “गुड मॉर्निंग।”

     

    “सोई नहीं थी?”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “तुम्हारी आवाज बता रही है।”

     

    आरोही हल्का-सा मुस्कुरा दी।

     

    “तुम्हें हर बात कैसे पता चल जाती है?”

     

    “तुम्हारी बातें सुनते-सुनते आदत हो गई है।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “आज मिलोगे?”

     

    “जहां कहो।”

     

    “उसी झील के पास।”

     

    “छह बजे?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “पक्का।”

     

    फोन कट गया।

     

    आरोही ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

     

    पता नहीं क्यों…

     

    आरव से बात करने के बाद उसके दिल का डर थोड़ा कम हो जाता था।

     

    दूसरी तरफ आरव अपने ऑफिस में बैठा था।

     

    कबीर उसके सामने एक फाइल लेकर खड़ा था।

     

    “हमें विक्रम सूद के बारे में कुछ और पता चला है।”

     

    आरव ने फाइल ली।

     

    “क्या?”

     

    “पिछले दस सालों में उसने कई बार अपनी कंपनी का नाम बदला है।”

     

    “क्यों?”

     

    “पैसे को इधर-उधर करने के लिए।”

     

    आरव ने कागज पलटा।

     

    अचानक उसकी नजर एक तारीख पर रुक गई।

     

    “ये वही तारीख है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कौन सी?”

     

    “जिस दिन विनय मेहरा का एक्सीडेंट हुआ था।”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “इसका मतलब विक्रम वहां था?”

     

    “सीधे तौर पर नहीं। लेकिन उसकी कार उसी इलाके में देखी गई थी।”

     

    आरव कुर्सी से उठ गया।

     

    “मुझे उस एक्सीडेंट की पूरी रिपोर्ट चाहिए।”

     

    “मैंने मंगवा ली है।”

     

    कबीर ने एक फाइल उसके सामने रख दी।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था “सड़क दुर्घटना — चालक की मौके पर मौत।”

     

    लेकिन नीचे एक लाइन लाल पेन से काटी गई थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये किसने काटी?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुरानी फाइल है। शायद पुलिस विभाग ने।”

     

    आरव ने उस लाइन को ध्यान से देखा।

     

    “यहां कुछ लिखा था।”

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “हम पता कर रहे हैं।”

     

    आरव ने फाइल बंद कर दी।

     

    “मुझे आज ही जवाब चाहिए।”

     

    शाम के छह बजने वाले थे।

     

    आरोही झील के किनारे पहुंच चुकी थी।

     

    आज मौसम कुछ अलग था।

     

    आसमान पर बादल थे।

     

    हवा में बारिश की खुशबू थी।

     

    वह जेट्टी के पास खड़ी आरव का इंतजार कर रही थी।

     

    कुछ ही देर में दूर से आरव दिखाई दिया।

     

    आरोही के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    आरव उसके पास पहुंचा।

     

    “बहुत इंतजार करवाया?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “बस पांच मिनट।”

     

    “मुझे लगा तुम नाराज हो जाओगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुमसे मिलने के लिए मुझे एक जरूरी काम छोड़ना पड़ा।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “कौन सा काम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुमसे ज्यादा जरूरी कुछ नहीं।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “तुम बहुत बातें बनाने लगे हो।”

     

    “तुम्हारे साथ रहकर सीख रहा हूं।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    कुछ देर वे झील के किनारे चलते रहे।

     

    फिर आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “आरव।”

     

    “हम्म?”

     

    “अगर तुम्हें पता चले कि तुम्हारे परिवार ने कोई बहुत बड़ी गलती की है… तो क्या तुम उन्हें माफ कर पाओगे?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “गलती कितनी बड़ी है, उस पर निर्भर करता है।”

     

    “अगर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दी हो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और अगर वो गलती जानबूझकर न की गई हो?”

     

    “तो शायद।”

     

    “और अगर तुम्हें उस इंसान से प्यार हो जाए, जिसके परिवार के साथ तुम्हारे परिवार ने गलत किया हो?”

     

    आरव की चाल अचानक धीमी हो गई।

     

    उसने आरोही को देखा।

     

    “तुम ये सवाल क्यों पूछ रही हो?”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “आरोही।”

     

    “हम्म?”

     

    “तुम्हारे मन में कुछ है।”

     

    आरोही चुप रही।

     

    आरव ने धीरे से पूछा,

     

    “क्या तुम मुझसे डरने लगी हो?”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर?”

     

    “मुझे डर है कि कहीं तुम्हें खो न दूं।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम मुझे इतनी आसानी से नहीं खो सकती।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “इतना भरोसा?”

     

    “तुम पर।”

     

    आरोही की आंखों से एक आंसू गिर पड़ा।

     

    आरव ने उसे धीरे से पोंछ दिया।

     

    “रो क्यों रही हो?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुम्हें कुछ परेशान कर रहा है।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर मैं तुमसे एक बात छुपा रही हूं तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो जब मन करे बता देना।”

     

    “तुम नाराज नहीं होगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारे हर राज से ज्यादा जरूरी तुम हो।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    और उसी पल उसे महसूस हुआ…

     

    वह इस इंसान से सच में प्यार करने लगी थी।

     

    अचानक बारिश शुरू हो गई।

     

    पहले कुछ बूंदें गिरीं।

     

    फिर बारिश तेज हो गई।

     

    आरोही हंसते हुए भागने लगी।

     

    आरव भी उसके पीछे दौड़ा।

     

    दोनों एक पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए।

     

    आरोही के बाल भीग चुके थे।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा बारिश में ऐसे ही भागती हो?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बारिश में रोना आसान होता है।”

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “क्या मतलब?”

     

    आरोही ने धीमे से कहा,

     

    “बारिश आंसुओं को छुपा देती है।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “अब रोना हो तो मेरे सामने रोना।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारे आंसू बारिश के भरोसे नहीं छोड़ सकता।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    वह धीरे से उसके करीब आ गई।

     

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज थी।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “आरोही…”

     

    “हम्म?”

     

    “मुझे लगता है…”

     

    वह रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    आरव कुछ कह पाता, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    “बोल।”

     

    दूसरी तरफ से कबीर की घबराई आवाज आई “आरव, हमें विनय मेहरा की मौत के बारे में एक बड़ा सबूत मिला है।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    “उस रात की एक CCTV रिकॉर्डिंग मिली है।”

     

    “कहां?”

     

    “एक पुराने पेट्रोल पंप से।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “क्या दिख रहा है?”

     

    कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला “एक काली कार।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसकी?”

     

    कबीर की आवाज भारी हो गई।

     

    “तुम्हारे पिता की।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसने कुछ पल कुछ नहीं कहा।

     

    “कबीर… पक्का?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने फोन नीचे कर दिया।

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    लेकिन अब उसके पास एक सवाल था क्या सच में उसके पिता का आरोही के पिता की मौत से कोई संबंध था?

     

    उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक पुराना कमरा।

     

    एक आदमी लैपटॉप के सामने बैठा था।

     

    स्क्रीन पर वही CCTV फुटेज चल रही थी।

     

    उसने वीडियो रोक दिया।

     

    फ्रेम में राजवीर सिंह की कार दिखाई दे रही थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “अब खेल शुरू होगा।”

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “वो सबूत आरव तक पहुंच गया है।”

     

    दूसरी तरफ से आवाज आई—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    “लेकिन अगर उसने पूरी रिकॉर्डिंग देख ली तो?”

     

    “उसे पूरी रिकॉर्डिंग कभी नहीं मिलेगी।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “और आरोही?”

     

    “उसका क्या?”

     

    “उसे भी पता चल जाएगा।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर दूसरी तरफ से आवाज आई “नहीं। अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पहले दोनों को एक-दूसरे पर शक करना होगा।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    बारिश अब और तेज हो चुकी थी।

     

    आरोही ने आरव की आंखों में देखा।

     

    “तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो।”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्या?”

     

    “अभी नहीं बता सकता।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “फिर से?”

     

    “आरोही, मुझ पर भरोसा करो।”

     

    “मैं करती हूं।”

     

    “तो?”

     

    “लेकिन डरती भी हूं।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “मुझसे?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “उस सच से… जो शायद हम दोनों को एक-दूसरे से दूर कर दे।”

     

    आरव का दिल बैठ गया।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “अगर सच हमें अलग करने आएगा…”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    आरव ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “तो मैं सच से लड़ूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह कुछ बोलती, उससे पहले आरव ने उसके माथे पर हल्के से हाथ रखा।

     

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जो कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन उसी पल…

     

    दूर सड़क पर एक काली कार खड़ी थी।

     

    कार के अंदर बैठा इंसान उन्हें देख रहा था।

     

    उसके हाथ में आरोही के पिता की पुरानी तस्वीर थी।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था “जब बेटी को सच्चाई पता चलेगी, तब पिता का अधूरा बदला पूरा होगा।”

     

    रात को घर लौटकर आरोही ने देखा कि उसकी मां सोई नहीं थीं।

     

    वह उसी लकड़ी के डिब्बे को सामने रखकर बैठी थीं।

     

    आरोही उनके पास गई।

     

    “मां?”

     

    मां ने चौंककर डिब्बा बंद कर दिया।

     

    “तुम आ गई?”

     

    “ये क्या है?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “मां, मैंने देख लिया।”

     

    मां ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरोही ने डिब्बा उठाया।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा की आखिरी निशानी।”

     

    आरोही ने डिब्बा खोल दिया।

     

    अंदर पुराने कागज, एक चाबी और एक लिफाफा था।

     

    उसने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही के लिए।”

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “पापा ने मेरे लिए लिखा था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “आपने मुझे पहले क्यों नहीं दिया?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने कहा था… जब तक तुम सच जानने के लायक न हो जाओ, इसे मत खोलना।”

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने लिफाफा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने उसे खोला…

     

    अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं “आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”

     

    आरोही के हाथ से खत लगभग छूट गया।

     

    उसने कांपती आवाज में अगली लाइन पढ़ी “और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    उसके दिल में सिर्फ एक नाम आया आरव।

     

    लेकिन क्यों?

     

    उसके पिता ने आरव को बचाने की बात क्यों लिखी थी?

     

    और आखिर ऐसा कौन-सा सच था…

     

    जिसने दस साल पहले दो परिवारों को दुश्मन बना दिया था?

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 5

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 5 — एक सच, दो दिल

     

    आरोही अपनी मां के सामने बिल्कुल खामोश बैठी थी।

     

    मां के मुंह से निकले शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे “आरव के परिवार की वजह से ही तुम्हारे पापा की मौत हुई थी।”

     

    आरोही को लग रहा था जैसे उसके आसपास की सारी आवाजें अचानक बंद हो गई हों।

     

    उसने मां की तरफ देखा।

     

    “मां… आप क्या कह रही हैं?”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं वही कह रही हूं जो इतने सालों से अपने दिल में दबाकर बैठी हूं।”

     

    “लेकिन पापा की मौत तो एक एक्सीडेंट में हुई थी।”

     

    “हां… यही मैंने तुम्हें बताया था।”

     

    “तो फिर सच क्या है?”

     

    मां की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “सच ये है कि तुम्हारे पापा का एक्सीडेंट करवाया गया था।”

     

    आरोही की सांस अटक गई।

     

    “किसने?”

     

    मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “मां!”

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच जानना है।”

     

    मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम्हारे पापा और आरव के पिता के बीच बहुत पुरानी दुश्मनी थी।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “बिजनेस।”

     

    “बस बिजनेस के लिए कोई किसी को मार देगा?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “बात सिर्फ बिजनेस की नहीं थी।”

     

    आरोही ध्यान से उनकी तरफ देखने लगी।

     

    “तो फिर?”

     

    मां कुछ कहने ही वाली थीं कि अचानक उनकी नजर दरवाजे की तरफ चली गई।

     

    वह तुरंत चुप हो गईं।

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “आप कुछ छुपा रही हैं।”

     

    “आरोही, मेरी बात सुन।”

     

    मां ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

     

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मैं ऐसा नहीं कर सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    उसके पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह कैसे कहती कि आरव अब उसके लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं था?

     

    कि उसकी आवाज सुनते ही उसके दिल की धड़कन बदल जाती थी।

     

    कि उसके साथ बिताया हर पल उसे याद रहता था।

     

    कि आज पहली बार जब आरव ने कहा था “तुम मेरे लिए बहुत खास हो।”

     

    तो उसके दिल ने उसी पल उसे अपना मान लिया था।

     

    मां उसकी खामोशी समझ गईं।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “तुम उससे प्यार करने लगी हो?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    उसने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

     

    मां ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    “नहीं…”

     

    आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, प्यार को मैं आदेश देकर खत्म नहीं कर सकती।”

     

    “लेकिन ये प्यार तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर देगा।”

     

    “अगर आरव दोषी नहीं हुआ तो?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “आपने कहा कि उसके परिवार की वजह से पापा की मौत हुई। लेकिन क्या आरव उस वक्त वहां था?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर उसकी क्या गलती है?”

     

    मां के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    आरोही उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई।

     

    दरवाजे पर पहुंचकर वह रुकी।

     

    “मां।”

     

    “हां?”

     

    “मैं आरव से दूर नहीं जाऊंगी… जब तक मुझे खुद ये यकीन न हो जाए कि वो मेरे पापा की मौत के लिए जिम्मेदार है।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम नहीं जानती कि तुम किस आग से खेल रही हो।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    फिर वह कमरे में चली गई।

     

    अपने कमरे में पहुंचते ही आरोही ने दरवाजा बंद कर लिया।

     

    उसने खुद को आईने में देखा।

     

    आंखों में आंसू थे।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का नाम स्क्रीन पर था।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही।

     

    फिर कॉल कर दिया।

     

    पहली घंटी।

     

    दूसरी घंटी।

     

    तीसरी घंटी।

     

    आरव ने फोन उठा लिया।

     

    “आरोही?”

     

    उसकी आवाज सुनते ही आरोही की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “हां।”

     

    आरव तुरंत समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “तुम कहां हो?”

     

    “घर पर।”

     

    “मुझसे मिलोगे?”

     

    कुछ पल की खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “अभी?”

     

    “हां।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरोही ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “मैं आ रहा हूं।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरव अपनी कार लेकर आरोही के घर के बाहर पहुंच गया।

     

    आरोही पहले से बाहर खड़ी थी।

     

    उसने आरव को देखते ही महसूस किया कि उसके अंदर का सारा डर अचानक थोड़ा कम हो गया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह कुछ बोल नहीं पाई।

     

    फिर अचानक उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव घबरा गया।

     

    “आरोही!”

     

    वह उसके करीब आया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “क्या तुम्हारे परिवार ने मेरे पापा को मारा था?”

     

    आरव बिल्कुल जम गया।

     

    उसने उसे देखा।

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “मेरी मां ने कहा है कि मेरे पापा की मौत के पीछे तुम्हारे परिवार का हाथ था।”

     

    आरव ने धीरे से सांस छोड़ी।

     

    “मुझे इसका अंदाजा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “तुम्हें पता था?”

     

    “आज ही कुछ बातें पता चली थीं।”

     

    “और तुमने मुझे बताया नहीं?”

     

    “मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता था।”

     

    “लेकिन मुझे सच जानने का हक था।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे बताना चाहिए था।”

     

    आरोही ने आंसू पोंछे।

     

    “अब बताओ।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पापा की मौत के पीछे कौन था।”

     

    “लेकिन?”

     

    “इतना जरूर जानता हूं कि मेरे पिता और तुम्हारे पिता के बीच बहुत बड़ा विवाद था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    “आरव!”

     

    “एक प्रोजेक्ट को लेकर।”

     

    “कौन सा प्रोजेक्ट?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “एक ऐसी जमीन का मामला था जिस पर दोनों परिवारों की नजर थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और मेरे पापा हार गए?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव की आवाज भारी हो गई।

     

    “तुम्हारे पापा ने वो जमीन मेरे पिता से बचा ली थी।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “उसके कुछ ही दिन बाद उनका एक्सीडेंट हुआ।”

     

    दोनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “तो क्या मेरे पापा को तुम्हारे पिता ने मरवाया?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं नहीं जानता।”

     

    “लेकिन शक है?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    कुछ पल बाद उसने पूछा,

     

    “और अगर सच में ऐसा हुआ?”

     

    आरव की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर अपने परिवार का बचाव नहीं करूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    “अगर मेरे परिवार ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है… तो मैं उसका हिस्सा नहीं बनूंगा।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगे?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सच के खिलाफ नहीं जा सकता।”

     

    आरोही उसके पास आ गई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझसे नाराज हो सकती हो।”

     

    “हम्म।”

     

    “मुझसे दूर भी जा सकती हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “मुझ पर उस गलती की सजा मत देना जो मैंने की ही नहीं।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसने बस अपना हाथ उसके हाथ में रहने दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी।

     

    अचानक आरोही के फोन पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “अगर आरव पर भरोसा किया, तो अपनी मां को खो दोगी।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन उसे दिखा दिया।

     

    मैसेज पढ़ते ही आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “ये नंबर मुझे दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मैं पता लगाऊंगा कि ये कौन है।”

     

    आरव ने नंबर अपने फोन में सेव कर लिया।

     

    तभी पीछे से एक कार तेजी से उनके पास से गुजरी।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।

     

    “सावधान!”

     

    कार कुछ दूर जाकर रुक गई।

     

    दोनों ने उसकी तरफ देखा।

     

    कार की खिड़की थोड़ी खुली।

     

    अंदर कोई बैठा था।

     

    लेकिन चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “तुम अंदर जाओ।”

     

    “लेकिन”

     

    “आरोही, अभी।”

     

    उसकी आवाज में ऐसी सख्ती थी कि आरोही बिना कुछ कहे घर के अंदर चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा कार को जाते हुए देखता रहा।

     

    उसने नंबर नोट करने की कोशिश की।

     

    लेकिन कार इतनी दूर निकल चुकी थी कि नंबर साफ नहीं दिखा।

     

    उसने कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे अभी तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आरोही को धमकी मिल रही है।”

     

    “क्या?”

     

    “और कोई हमारा पीछा कर रहा है।”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    “मैं अभी आता हूं।”

     

    रात के करीब ग्यारह बजे।

     

    आरोही अपने कमरे में बैठी थी।

     

    मां सो चुकी थीं।

     

    लेकिन आरोही की आंखों में नींद नहीं थी।

     

    वह बार-बार आरव के बारे में सोच रही थी।

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    आरव का मैसेज था “सो जाना। मैं हूं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया “तुम हमेशा रहोगे?”

     

    कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया “अगर तुमने साथ दिया तो।”

     

    आरोही के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    उसने लिखा “और अगर मैंने साथ नहीं दिया?”

     

    आरव का जवाब आया “फिर भी।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने फोन सीने से लगा लिया।

     

    उसे अब खुद से सच स्वीकार करना पड़ा।

     

    वह आरव से प्यार करने लगी थी।

     

    लेकिन उसी प्यार के साथ एक डर भी था।

     

    अगर उसकी मां की बात सच हुई…

     

    अगर सच में आरव के परिवार ने उसके पिता को मारा था…

     

    तो क्या उनका प्यार इस सच के सामने टिक पाएगा?

     

    उधर आरव और कबीर एक सुनसान ऑफिस में बैठे थे।

     

    कबीर ने लैपटॉप पर कुछ तस्वीरें खोल रखी थीं।

     

    “ये देख।”

     

    आरव स्क्रीन के करीब आया।

     

    एक पुरानी फोटो थी।

     

    उसमें आरव के पिता राजवीर सिंह और आरोही के पिता विनय मेहरा एक साथ खड़े थे।

     

    लेकिन फोटो के पीछे एक तीसरा आदमी भी था।

     

    आरव ने उसे गौर से देखा।

     

    “इसे मैं पहचानता हूं।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “मेरे पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर… विक्रम सूद।”

     

    कबीर ने दूसरी फाइल खोली।

     

    “और सबसे बड़ी बात?”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद कंपनी का सबसे बड़ा फायदा इसी आदमी को हुआ था।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हो सकता है हम इतने सालों से गलत इंसान पर शक कर रहे हों।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “अगर विक्रम सूद ने ये सब किया है… तो उसने मेरे परिवार और आरोही के परिवार के बीच दुश्मनी क्यों पैदा की?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “यही पता करना होगा।”

     

    आरव ने कुर्सी से उठते हुए कहा,

     

    “कल से नहीं।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “अभी से।”

     

    उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में एक आलीशान घर के अंदर एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही तस्वीर थी जिसमें आरव और आरोही कैफे में बैठे थे।

     

    वह तस्वीर को देखकर मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों जितना करीब आओगे…”

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे लिए खेल उतना ही आसान होता जाएगा।”

     

    तभी पीछे से एक आदमी ने पूछा,

     

    “सर, क्या करें?”

     

    उसने तस्वीर टेबल पर रख दी।

     

    “पहले आरव को उसके पिता के खिलाफ करो।”

     

    “और लड़की?”

     

    उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “आरोही को उसके पिता के सच तक पहुंचने दो।”

     

    “अगर वो सच तक पहुंच गई तो?”

     

    उस आदमी की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “तभी तो असली खेल शुरू होगा।”

     

    अगली सुबह आरोही की मां अपने कमरे में पुरानी अलमारी खोल रही थीं।

     

    अचानक उन्हें नीचे रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने उसे बाहर निकाला।

     

    डिब्बे में कुछ पुराने कागज और एक चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे नीचे एक लिफाफा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था “आरोही के लिए जब उसे सच्चाई जानने का समय आए।”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उन्होंने लिफाफा हाथ में लिया।

     

    “शायद अब वो समय आ गया है।”

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था उस लिफाफे के अंदर सिर्फ आरोही के पिता की मौत का राज नहीं था।

     

    उसमें एक ऐसा सच था जो आरव और आरोही के रिश्ते की पूरी नींव हिला देने वाला था।

     

    और शायद उस सच के सामने आने के बाद दोनों के लिए एक-दूसरे से प्यार करना सबसे मुश्किल काम होने वाला था।

     

    जारी रहेगा…