आरव कुछ क्षणों तक उस अंधेरी सीढ़ी के सामने खड़ा रहा। नीचे से आती कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी।
ठक… ठक… ठक…
उसने टॉर्च नीचे की ओर की।
सीढ़ियाँ पुरानी थीं। उन पर मोटी धूल जमी हुई थी, लेकिन कुछ जगहों पर ताज़ा गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।
आरव ने खुद को संभाला और नीचे उतरना शुरू किया।
पहली सीढ़ी…
दूसरी…
तीसरी…
जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।
तहखाने में पहुँचते ही उसकी नाक में मिट्टी और सड़न की तेज़ गंध आई।
सामने एक लंबा कमरा था।
दीवारों पर पुराने लालटेन लगे थे। कुछ टूटी कुर्सियाँ और लकड़ी के बक्से इधर-उधर पड़े थे।
लेकिन सबसे अजीब चीज़ कमरे के बीच में रखी एक पुरानी मेज़ थी।
उस मेज़ पर एक लाल कपड़ा बिछा था।
और उसके ऊपर एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर रखा था।
आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।
टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।
पहले सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।
फिर एक आवाज़ आई।
आरव ने तुरंत पहचान लिया।
वह उसके पिता की आवाज़ थी।
“अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, आरव… तो इसका मतलब है कि तुम हवेली तक पहुँच चुके हो।”
आरव की आँखें फैल गईं।
रिकॉर्डिंग में उसके पिता बोल रहे थे—
“मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें सच बताना पड़ेगा। लेकिन मैं चाहता था कि वह दिन जितना देर से आए, उतना अच्छा हो।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर आवाज़ आई—
“मीरा की मौत के पीछे देवेंद्र था। लेकिन देवेंद्र अकेला नहीं था।”
आरव ने टेप रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“उस रात मीरा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। वह बच्चा…”
रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।
आरव ने टेप को थपथपाया।
“नहीं… नहीं… आगे बोलो!”
टेप फिर चला।
“वह बच्चा ही इस पूरे राज़ की वजह था।”
आरव के माथे पर पसीना आ गया।
“देवेंद्र उस बच्चे को खत्म करना चाहता था। मैंने बच्चे को बचाने की कोशिश की, लेकिन मीरा को नहीं बचा पाया।”
आरव की साँस रुक गई।
“अगर तुम यह सुन रहे हो तो याद रखना… तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”
टेप अचानक बंद हो गया।
आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।
“तो… मैं कौन हूँ?”
तभी तहखाने के दूसरे कोने से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
“माँ…”
आरव धीरे-धीरे आवाज़ की ओर बढ़ा।
वहाँ एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।
पालना अपने आप हिल रहा था।
चर्र… चर्र… चर्र…
आरव ने काँपते हाथ से पालने के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।
अंदर कोई बच्चा नहीं था।
सिर्फ एक पुराना काला लॉकेट पड़ा था।
आरव ने लॉकेट उठाया।
उसके पीछे एक तारीख खुदी थी—
17 जुलाई 1998।
अचानक उसके पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।
आरव ने पलटकर देखा।
कमरे में अब वह अकेला नहीं था।
एक आदमी दीवार के पास खड़ा था।
उसका चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।
“तुम कौन हो?” आरव ने पूछा।
आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसका चेहरा देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।
“पापा?”
आदमी मुस्कुराया।
“तुम्हारे पिता नहीं।”
उसकी आवाज़ भारी थी।
“मैं देवेंद्र हूँ।”
आरव पीछे हट गया।
“लेकिन… देवेंद्र तो मर चुका है।”
आदमी ने कहा—
“कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते।”
तभी कमरे की सारी लालटेन एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में सिर्फ देवेंद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। लेकिन वह एक बात छिपाना भूल गए।”
आरव ने पूछा—
“क्या?”
देवेंद्र की हँसी गूँज उठी।
“तुम इस हवेली के वारिस नहीं हो… तुम इसके कैदी हो।”
अचानक आरव के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।
वह एक गड्ढे में गिर पड़ा।
उसके सिर पर जोर से चोट लगी और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
जब उसे होश आया तो वह उसी बंद कमरे में था, जहाँ मीरा का आईना था।
उसके सामने मीरा खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं…
गुस्सा था।
उसने दीवार की ओर इशारा किया।
दीवार पर एक-एक करके कई तस्वीरें दिखाई देने लगीं।
पहली तस्वीर में उसके पिता थे।
दूसरी में मीरा।
तीसरी में देवेंद्र।
और चौथी तस्वीर में…
एक छोटा बच्चा।
आरव उस तस्वीर को देखते ही समझ गया।
बच्चे के गले में वही लॉकेट था जो अभी उसके हाथ में था।
मीरा ने धीरे से कहा—
“तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा।”
अचानक आईना टूट गया।
छन्न्न!
काँच के टुकड़ों के बीच एक आखिरी शब्द उभरा—
“माँ तुम्हारी हत्या करने नहीं, तुम्हें बचाने आई है।”
आरव ने काँपते हुए पूछा—
“लेकिन मेरी माँ कौन है?”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने आरव की ओर देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“मैं।”
उसी क्षण कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
बाहर बिजली चमकी।
और आरव ने पहली बार उस चेहरे को साफ देखा।
वह वही महिला थी जो उसके पिता की तस्वीर में खड़ी थी।
मीरा।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अभी बाकी था—
अगर मीरा उसकी माँ थी…
तो फिर उसकी असली मौत कब हुई थी?
और उसकी परवरिश किसने की थी?
जवाब मिलने से पहले ही हवेली के नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।
“आरव!”
आवाज़ उसके पिता की थी।
मीरा अचानक गायब हो गई।
आरव दरवाज़े की ओर भागा।
लेकिन दरवाज़े के बाहर अब वही बूढ़ा दीनानाथ खड़ा था।
उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी।
उसने आरव को देखते ही कहा—
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
आरव ने पूछा—
“किस लिए?”
दीनानाथ की आँखों से आँसू निकल आए।
“क्योंकि आज रात देवेंद्र वापस आ गया है।”
और उसी पल हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।
टन… टन… टन…
लेकिन घड़ी की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आई—
एक बच्चे की हँसी।
आरव समझ गया…
असली डर अब शुरू हुआ था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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