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😱आहट😱 — उस बंद कमरे का राज़(part-2)

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

 

हवेली के बाहर बारिश लगातार बरसती रही और अंदर पुरानी दीवारों से आती अजीब-अजीब आवाज़ें उसके डर को और बढ़ाती रहीं। कभी ऊपर की मंज़िल से किसी के चलने की आहट आती, कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कमरे के बाहर आकर रुक गया हो।

 

लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर बार जब वह दरवाज़ा खोलकर देखता, वहाँ कोई नहीं होता।

 

सुबह होते ही बारिश कुछ कम हुई।

 

आरव ने रात वाली डायरी फिर से खोली।

 

उसके पिता की लिखावट में कई पन्ने भरे हुए थे, लेकिन ज्यादातर जगहों पर शब्द काट दिए गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कुछ लिखने के बाद जानबूझकर उसे मिटा दिया हो।

 

एक पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था—

 

“17 जुलाई 1998 को जो हुआ, वह दुर्घटना नहीं थी।”

 

आरव ने तारीख पढ़कर अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

वही तारीख जो उसे पिछली रात तस्वीर के पीछे लिखी मिली थी।

 

उसने डायरी का अगला पन्ना पलटा।

 

वहाँ लिखा था—

 

“मीरा को मैंने नहीं मारा।”

 

आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

मीरा कौन थी?

 

क्या तस्वीर में उसके पिता के साथ खड़ी महिला का नाम मीरा था?

 

उसने तुरंत अपना मोबाइल उठाया और गाँव में रहने वाले उस बूढ़े आदमी को फोन किया, जिसने उसे हवेली में रात न बिताने की चेतावनी दी थी।

 

कुछ देर बाद बूढ़ा हवेली के बाहर आ गया।

 

उसका नाम दीनानाथ था।

 

आरव ने तस्वीर उसके सामने रख दी।

 

“क्या आप इन्हें जानते हैं?”

 

दीनानाथ ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।

 

“मैं कुछ नहीं जानता।”

 

“झूठ मत बोलिए।”

 

आरव की आवाज़ में गुस्सा था।

 

“यह मेरे पिता हैं। और यह महिला कौन है?”

 

दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

 

फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

 

“उसका नाम मीरा था।”

 

“मेरे पिता उसे जानते थे?”

 

“सिर्फ जानते नहीं थे…”

 

दीनानाथ अचानक रुक गया।

 

आरव ने पूछा, “क्या रिश्ता था उनका?”

 

बूढ़े ने उसकी ओर देखा।

 

“तुम्हारे पिता मीरा से शादी करना चाहते थे।”

 

आरव जैसे पत्थर का हो गया।

 

“लेकिन मेरे पिता की शादी तो मेरी माँ से हुई थी।”

 

दीनानाथ ने सिर झुका लिया।

 

“क्योंकि मीरा शादी के दिन मर गई थी।”

 

कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

 

आरव ने पूछा, “कैसे?”

 

दीनानाथ ने हवेली की तीसरी मंज़िल की ओर देखा।

 

“उसी कमरे में।”

 

आरव की निगाहें तुरंत सीढ़ियों की ओर चली गईं।

 

वही कमरा…

 

जिसके बाहर लिखा था—

 

“इसे मत खोलना।”

 

“क्या हुआ था उस रात?”

 

दीनानाथ ने जवाब नहीं दिया।

 

वह वापस जाने लगा।

 

आरव उसके पीछे दौड़ा।

 

“रुकिए! मुझे सब जानना है।”

 

दीनानाथ ने बिना पीछे देखे कहा—

 

“अगर सच जानना है, तो आज रात बारह बजे से पहले हवेली छोड़ देना।”

 

“और अगर मैं नहीं गया?”

 

बूढ़ा वहीं रुक गया।

 

उसने पलटकर आरव की आँखों में देखा।

 

“तो फिर वह तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी।”

 

यह कहकर वह चला गया।

 

आरव देर तक वहीं खड़ा रहा।

 

उसके मन में डर था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा सवाल थे।

 

आखिर उसके पिता ने इतने वर्षों तक मीरा का सच उससे क्यों छिपाया?

 

और वह हर रात हवेली में क्यों आती थी?

 

शाम होते-होते आरव ने फैसला कर लिया।

 

वह आज रात उस कमरे का दरवाज़ा खोलेगा।

 

रात के करीब ग्यारह बजे उसने टॉर्च, कैमरा और डायरी अपने बैग में रखी और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

 

पहली मंज़िल पार करने के बाद दूसरी मंज़िल आई।

 

यहाँ हवा अचानक बहुत ठंडी थी।

 

उसने हाथों से साँस की गर्मी महसूस की।

 

तीसरी मंज़िल की सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।

 

छप… छप… छप…

 

आरव रुक गया।

 

उसने नीचे देखा।

 

सीढ़ियों पर गीले पैरों के निशान बने थे।

 

लेकिन इस बार वे निशान नीचे से ऊपर नहीं आ रहे थे।

 

वे उसके पीछे थे।

 

जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा होकर चल रहा हो।

 

आरव ने अचानक पीछे मुड़कर टॉर्च जलाई।

 

कुछ नहीं था।

 

उसने लंबी साँस ली और आगे बढ़ गया।

 

बंद कमरा सामने था।

 

लोहे की जंजीर अब भी दरवाज़े पर बंधी थी।

 

आरव ने उसे खोलने की कोशिश की।

 

जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

 

खनन!

 

आरव का दिल धड़क उठा।

 

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

 

अंदर घुप अंधेरा था।

 

उसने टॉर्च जलाई।

 

कमरे की दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

 

एक तरफ लकड़ी की अलमारी थी।

 

दूसरी तरफ टूटा हुआ आईना।

 

और कमरे के बीचोंबीच एक पुराना पलंग।

 

आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

 

अचानक दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

वह तुरंत पलटा।

 

“कौन है?”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

 

दरवाज़ा नहीं खुला।

 

तभी आईने में उसे कुछ दिखाई दिया।

 

उसके पीछे एक महिला खड़ी थी।

 

सफेद साड़ी…

 

लंबे बाल…

 

झुका हुआ सिर…

 

आरव ने डरते हुए पीछे देखा।

 

कोई नहीं था।

 

उसने दोबारा आईने की तरफ देखा।

 

महिला अब भी वहाँ थी।

 

लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

 

वह मीरा थी।

 

उसके माथे से खून बह रहा था।

 

और उसकी आँखें सीधे आरव को देख रही थीं।

 

आरव पीछे हट गया।

 

तभी आईने पर अपने आप उंगली से शब्द लिखने लगे—

 

“तुम्हारे पिता ने मुझे नहीं मारा…”

 

आरव की साँस अटक गई।

 

फिर दूसरा वाक्य उभरा—

 

“लेकिन उन्होंने मुझे बचाया भी नहीं।”

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“किसने मारा तुम्हें?”

 

आईने पर कुछ देर तक कोई हलचल नहीं हुई।

 

फिर धीरे-धीरे एक नाम लिखा गया—

 

“देवेंद्र।”

 

आरव ने नाम पढ़ा।

 

देवेंद्र?

 

उसे यह नाम जाना-पहचाना लगा।

 

तभी अलमारी के अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

 

आरव ने अलमारी खोली।

 

अंदर पुराने कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का डिब्बा रखा था।

 

डिब्बे पर उसके पिता के नाम का पहला अक्षर खुदा था।

 

आरव ने डिब्बा खोला।

 

उसमें एक पुरानी चिट्ठी थी।

 

चिट्ठी पर लिखा था—

 

“राघव के लिए — मीरा।”

 

आरव के हाथ काँपने लगे।

 

उसने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

 

“राघव, अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो तो समझ लेना कि मैं खतरे में हूँ। देवेंद्र को सब पता चल गया है। वह हमें अलग करना चाहता है। अगर आज रात मेरे साथ कुछ हो जाए तो आरव को कभी इस हवेली में मत लाना…”

 

आरव आगे पढ़ ही रहा था कि अचानक कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

 

“माँ…”

 

आरव जम गया।

 

उसने धीरे से पूछा—

 

“कौन है?”

 

फिर वही आवाज़ आई।

 

“माँ…”

 

आवाज़ पलंग के नीचे से आ रही थी।

 

आरव ने टॉर्च नीचे की।

 

वहाँ एक छोटा सा लकड़ी का बक्सा था।

 

उसने बक्सा बाहर खींचा।

 

जैसे ही उसने ढक्कन खोला, अंदर एक पुरानी तस्वीर मिली।

 

तस्वीर में मीरा थी।

 

उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

 

और बच्चे के गले में वही लॉकेट था…

 

जो आरव बचपन से अपनी माँ के पास देखा करता था।

 

आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

 

तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

एक ठंडी फुसफुसाहट उसके कान में आई—

 

“अब तुम्हें समझ आया कि तुम यहाँ क्यों बुलाए गए हो?”

 

आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

 

मीरा उसके सामने खड़ी थी।

 

इस बार उसका चेहरा भयानक नहीं था।

 

उसकी आँखों में आँसू थे।

 

उसने अपना हाथ उठाकर दीवार की ओर इशारा किया।

 

दीवार पर धीरे-धीरे एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई देने लगा।

 

दरवाज़ा खुला।

 

अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं जो नीचे की ओर जा रही थीं।

 

और सीढ़ियों के नीचे से किसी आदमी की भारी आवाज़ सुनाई दी—

 

“आरव… बहुत देर कर दी तुमने।”

 

मीरा अचानक गायब हो गई।

 

आरव अकेला खड़ा रह गया।

 

उसके सामने अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।

 

और नीचे…

 

किसी के कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरव ने टॉर्च कसकर पकड़ी।

 

उसे अब समझ आ चुका था—

 

इस हवेली का सबसे बड़ा राज़ अभी बाकी था।

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