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Dil sabhal ja jara part – 17

पढ़ने का समय : 7 मिनट

Part – 17 dil se dil tak 

 

 

 

 

ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला फैला था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे जल रही थी, और बाहर बर्फ की हल्की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं। घर में सब सो चुके थे। रिया अपने कमरे में, पापा और आदित्य अंकल भी। सिर्फ प्रिया और आरव जाग रहे थे। दोनों सोफे पर बैठे थे – करीब, लेकिन अभी भी एक छोटी सी दूरी। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके घाव अभी ताज़ा थे। लोग बातें कर रहे थे, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स, लेकिन दोनों ने फैसला किया था – वो चुप नहीं रहेंगे।

 

प्रिया ने चाय का मग आरव की ओर बढ़ाया। “भैया… ले। ठंड लग रही है।”

 

आरव ने मग लिया। उनकी उंगलियां छुईं। आरव ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… आजकल नींद आती है तुझे?”

 

प्रिया ने सिर झुका लिया। “नहीं भैया। हर रात सोचती हूं… हम सही कर रहे हैं ना?”

 

आरव ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया। धीरे से सहलाया। “प्रिया… मैं भी सोचता हूं। सालों तक तुझे बहन माना। तेरी हर खुशी में अपनी खुशी देखी। लेकिन जब सच पता चला… कि खून का रिश्ता नहीं… तो दिल ने कुछ और कहा। मैंने लड़ाई लड़ी खुद से। गिल्ट फील किया। सोचा कि मैं गलत हूं। लेकिन प्रिया… तुझे देखकर जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं मिलता। तू मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जो कभी खाली था।”

 

प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के करीब सरकी। “भैया… मैं भी डरती थी। तुम मेरे भाई हो। तुमने मुझे बचाया, सहारा दिया। अनाथ आश्रम से लेकर आज तक। मैंने कभी सोचा नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ और फील कर सकती हूं। लेकिन जब तुम दूर होने लगे… जब तुम्हारी नजरें बदलने लगीं… तो मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूं। तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी केयर… वो भाई वाली नहीं लगती अब। वो प्यार लगता है। गहरा, सच्चा प्यार।”

 

आरव ने उसे और करीब खींचा। प्रिया का सिर उसके सीने पर था। “प्रिया… मैंने कभी किसी को इतना प्यार नहीं किया। मम्मी के बाद तू ही मेरी दुनिया थी। लेकिन अब तू मेरी जिंदगी है। हर सांस में तू है। तेरी मुस्कान में मेरा सुकून। तेरी आंखों में मेरा भविष्य। मैं जानता हूं दुनिया क्या कहेगी। लेकिन प्रिया… दिल तो दिल है। वो नियम नहीं मानता।”

 

प्रिया ने ऊपर देखा। उसकी आंखें आरव की आंखों में डूब गईं। “भैया… मुझे डर लगता है कि अगर हम अलग हुए तो? मीडिया, लोग… सब हमें जज करेंगे। लेकिन तुम्हारे साथ हूं तो सब सह लूंगी। तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।”

 

आरव ने उसके गाल को छुआ। उंगलियां उसके होंठों पर फिसलीं। “प्रिया… तू मेरी है। हमेशा से। मैंने तुझे खोया था एक बार। अब कभी नहीं खोऊंगा। चाहे दुनिया खिलाफ हो, मैं तेरे साथ हूं। तेरी हर खुशी, हर गम में। तेरी हर सांस में।”

 

प्रिया ने उसके होंठों को छुआ – धीरे से, फिर गहराई से। वो किस लंबा था, भावनाओं से भरा। आरव ने उसे अपनी बाहों में कस लिया। “प्रिया… मैं तुझे इतना प्यार करता हूं कि शब्द कम पड़ जाते हैं। तू मेरी ताकत है, मेरी कमजोरी है। तू मेरी हर चीज है।”

 

प्रिया ने उसके सीने पर सिर रखा। आंसू बह रहे थे, लेकिन खुशी के। “भैया… तुम मेरे पहले प्यार हो। आखिरी प्यार हो। मैंने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी मुझे तुम्हारे इतना करीब लाएगी। तुम्हारा इंतजार किया सालों… बिना जानें। अब जब तुम मेरे हो… तो लगता है सब स्ट्रगल वर्थ था।”

 

आरव ने उसके बालों को चूमा। “प्रिया… हमारा प्यार कोई गलती नहीं। वो सच्चाई है। सालों की कमी का मिलन है। मैं तुझे हर खुशी दूंगा। तेरे सपनों को पूरा करूंगा। तेरे साथ हर कदम चलूंगा।”

 

प्रिया ने कहा, “भैया… मुझे तुम्हारी जरूरत है। हर पल। तुम्हारे बिना… सब खाली लगता है। तुम मेरे हो… सिर्फ मेरे।”

 

आरव ने उसे फिर किस किया – गहरा, जुनूनी। दोनों की सांसें एक हो गईं। फायरप्लेस की लौ उनकी आंखों में झलक रही थी। आरव ने उसके कान में फुसफुसाया, “प्रिया… मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा। ये वादा है। दिल से।”

 

प्रिया ने जवाब दिया, “और मैं तुझे। हमेशा।”

 

दोनों गले लगे रहे। रात गहरा गई। बाहर बर्फ गिर रही थी, लेकिन अंदर दिलों में गर्माहट थी – गहरी, अटूट। वो भावनाएं जो सालों से दबी थीं, अब बाहर आ चुकी थीं। प्यार की गहराई में डूब चुके थे दोनों। कोई डर नहीं, सिर्फ एक-दूसरे का साथ।

 

सुबह हुई। रिया ने दोनों को देखा – सोफे पर, गले लगे सो रहे। वो मुस्कुराई और चुपके से चली गई।

 

 

ठाकुर हाउस की पुरानी लाइब्रेरी में शाम का धुंधला उजाला अब और गहरा हो चुका था। फायरप्लेस की लौ धीरे-धीरे बुझ रही थी, और बाहर बर्फ की बूंदें खिड़की पर चिपककर जम रही थीं। प्रिया और आरव अभी भी सोफे पर थे – करीब, हाथ थामे। मीडिया का तूफान थम चुका था, लेकिन उसके बाद का सन्नाटा और भारी लग रहा था। घरवाले चुप थे, लेकिन उनकी नजरें सब कुछ कह रही थीं। प्रिया ने आरव का हाथ छोड़ा और उठकर खिड़की के पास चली गई। बाहर का नजारा देखा – बर्फीली पहाड़ियां, कोहरा।

 

“भैया… कभी-कभी लगता है जैसे ये सब सपना हो। हम यहां, साथ। लेकिन बचपन… वो तो यादों में ही बसा है। मुझे कुछ याद नहीं, लेकिन तुम्हें तो होगा। बताओ ना… हमारा बचपन कैसा था?”

 

आरव मुस्कुराया। वो भी उठा और प्रिया के पीछे खड़ा हो गया। उसके कंधों पर हाथ रखे। “प्रिया… बचपन? वो तो मेरी सबसे प्यारी यादें हैं। तू तब छोटी सी गुड़िया थी। चार साल की। मैं दस का। मम्मी कहती थीं, ‘आरव, अपनी छोटी को कभी अकेला मत छोड़ना।’ और मैं वादा करता – ‘मम्मी, कभी नहीं।’”

 

प्रिया ने पलटा। आंखों में चमक। “भैया… बताओ। विस्तार से। मुझे लगता है, अगर मैं यादें सुनूंगी तो शायद मेरी भी यादें लौट आएं।”

 

आरव ने प्रिया को सोफे पर फिर बिठाया। खुद उसके बगल में। फायरप्लेस में लकड़ी डाली। लौ फिर भड़क उठी। “ठीक है प्रिया। शुरू से बताता हूं। याद है वो पुराना बंगला? ठाकुर हवेली का बगीचा? वहां मम्मी हमें ले जातीं। तू छोटी-छोटी दौड़ती, फूल तोड़ती। एक बार तूने गुलाब का फूल तोड़ा, लेकिन कांटा चुभ गया। रोने लगी। मैंने तुझे गोद में उठाया। ‘भैया सब ठीक कर देंगे।’ फिर तेरी उंगली चूस ली – जैसे मम्मी करतीं। तू हंस पड़ी। ‘भैया मेरा हीरो!’”

 

प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो आरव के हाथ को कसकर पकड़ लिया। “भैया… लगता है जैसे मैं देख रही हूं। तू कितना केयरिंग था।”

 

आरव ने उसके हाथ को चूमा। “हां प्रिया। तू मेरी जिम्मेदारी थी। मम्मी रानी… वो तुझे कितना प्यार करतीं। शाम को झूला झुलातीं। तू झूले पर चढ़ती, मैं पीछे धक्का मारता। ‘और तेज भैया!’ तू चिल्लाती। मम्मी हंसतीं। ‘आरव, धीरे। छोटी गिर जाएगी।’ लेकिन तू कभी नहीं गिरती। हम तीनों साथ खेलते। मम्मी गाना गातीं – ‘तेरे आने से पहले… जिंदगी सूनी थी।’ तू मेरी गोद में सो जाती। मैं तुझे कमरे में ले जाता। तेरा सिर सहलाता। लगता था तू मेरी बेटी जैसी।”

 

प्रिया रो पड़ी। “मम्मी… कितनी खुश थीं ना? और पापा?”

 

आरव ने गहरी सांस ली। “पापा व्यस्त रहते। होटल्स का काम। लेकिन जब आते, तो तुझे गोद में उठाते। ‘मेरी राजकुमारी!’ कहते। तू उनकी मूंछें खींचती। सब हंसते। लेकिन प्रिया… घर में तनाव भी था। विक्रम की मां… वो जलती थीं। मम्मी को नीचा दिखातीं। लेकिन मम्मी कभी नहीं बोलीं। तुझे बचाने के लिए सब सहती रहीं।”

 

प्रिया ने आरव के सीने पर सिर रखा। “भैया… अगर मुझे याद होता तो… मैं मम्मी को कभी न जाने देती।”

 

आरव ने उसके बाल सहलाए। “प्रिया… तू न गई होती तो आज ये प्यार न होता। तू लौटी तो सब लौट आया। बचपन की वो यादें… अब हमारे प्यार का हिस्सा हैं।”

 

प्रिया ने ऊपर देखा। “भैया… और क्या? कोई मजेदार याद?”

 

आरव हंसा। “हां। एक बार तूने मम्मी की साड़ी पहन ली। घूंघट ओढ़ा। ‘मैं दुल्हन हूं!’ चिल्लाई। मैं दूल्हा बना। मम्मी ने शादी की रस्में कीं। तू मेरी गोद में बैठी, मैं तुझे घुमाता। मम्मी फोटो खींचतीं। वो फोटो अभी भी है – अलमारी में। तू हंस रही थी, मैं शर्मा रहा था। मम्मी कहतीं, ‘एक दिन असली शादी होगी।’”

 

प्रिया शर्मा गई। “भैया… लगता है मम्मी जानती थीं।”

 

आरव ने उसके गाल को छुआ। “शायद प्रिया। वो हमेशा कहतीं, ‘आरव, प्रिया को कभी मत छोड़ना। वो तेरी जिंदगी है।’ मैं समझा नहीं था। लेकिन अब… अब समझ आया।”

 

प्रिया ने उसके होंठों को छुआ। “भैया… तू मेरी जिंदगी है। बचपन से। अनजाने में।”

 

आरव ने उसे किस किया – गहरा, भावुक। “प्रिया… तू मेरी छोटी थी। अब मेरी सब कुछ है। वो झूला, वो फूल, वो हंसी… सब अब हमारे प्यार में है।”

 

प्रिया ने कहा, “भैया… अगर मैं वापस न आती तो?”

 

आरव ने उसे कस लिया। “तब भी तुझे खोजता। हर जन्म में। तू मेरी हो प्रिया। बचपन से।”

 

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