Part – 8 pita ki talas
ट्रेन की सीटी के साथ दिल्ली स्टेशन पर प्रिया उतरी। ठंडी हवा उसके चेहरे पर लगी, लेकिन दिल में गर्माहट नहीं थी। हाथ में मां की डायरी, जेब में पेंडेंट, और मन में सवालों का तूफान। शिमला से दिल्ली का सफर छोटा था, लेकिन प्रिया के लिए ये बीस साल पुराना राज़ खोलने वाला था। वो एक छोटे से गेस्ट हाउस में रुकी – बजट के अंदर, क्योंकि वो अभी भी अपनी स्कॉलरशिप वाली लड़की ही महसूस करती थी।
सुबह हुई। प्रिया ने सर्च किया – डॉक्टर आदित्य शर्मा, रिटायर्ड कार्डियोलॉजिस्ट। एक पुराना हॉस्पिटल का एड्रेस मिला: “सर गंगा राम हॉस्पिटल, राजिंदर नगर”। लेकिन आदित्य अब वहां नहीं थे। एक कॉन्टैक्ट नंबर मिला – एक पुराने सहकर्मी का। प्रिया ने कॉल किया। आवाज कांपी, लेकिन हिम्मत बांधी।
“हैलो… डॉक्टर आदित्य शर्मा से बात करनी है।”
दूसरी तरफ से एक बुजुर्ग आवाज आई। “बेटी, आदित्य जी तो रिटायर हो चुके हैं। अब साउथ दिल्ली में एक छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं। लेकिन… आप कौन?”
प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “एक पुरानी दोस्त की बेटी। मिलना चाहती हूं। एड्रेस?”
एड्रेस मिल गया। प्रिया ने टैक्सी ली। रास्ते में वो डायरी पढ़ती रही। मां के शब्द: “आदित्य… मेरा पहला प्यार। हमारी शादी टूट गई क्योंकि उसके परिवार ने मना कर दिया। फिर रानी बनकर राजेश से शादी की। लेकिन प्रिया… वो तेरी है।”
दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कें प्रिया को घुटन महसूस करा रही थीं। अपार्टमेंट पहुंची – पुराना, लेकिन साफ। फ्लैट नंबर 304। प्रिया ने बेल बजाई। दरवाजा खुला। सामने एक साठ के करीब आदमी खड़े थे – सफेद बाल, चश्मा, सादा कुर्ता-पायजामा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आंखें गर्म।
“जी… आप?” आदित्य ने पूछा।
प्रिया की आंखें भर आईं। “अंकल… मैं प्रिया हूं। रानी की बेटी।”
आदित्य का चेहरा सफेद पड़ गया। वो पीछे हटे, जैसे किसी पुरानी याद ने जोर का धक्का मारा हो। “प्रिया? रानी की…?” वो कमरे में चले गए। प्रिया अंदर आई। छोटा सा फ्लैट – दीवारों पर पुरानी तस्वीरें, किताबें, और एक टेबल पर मेडिकल जर्नल्स।
आदित्य ने पानी का गिलास थमाया। हाथ कांप रहे थे। “बेटी… बैठ। बताओ, कैसे पहुंची यहां?”
प्रिया ने डायरी निकाली और मां का लेटर दिखाया। आदित्य ने पढ़ा। आंसू गिर पड़े। “रानी… वो तो कहती थीं कि बच्चा राजेश का है। लेकिन… आंखें… तेरी आंखें मेरी जैसी हैं।”
प्रिया ने पूछा, “अंकल… आप मेरा पिता हैं ना?”
आदित्य ने सिर हिलाया। फिर धीरे-धीरे अपना बैकग्राउंड बताना शुरू किया। वो कुर्सी पर बैठे, जैसे बीस साल पुरानी कहानी को फिर से जी रहे हों।
“मैं आदित्य शर्मा, 1965 में जन्मा। दिल्ली के एक मिडिल क्लास परिवार में। पिता सरकारी क्लर्क थे, मां टीचर। बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहता था। एम्स से एमबीबीएस किया, फिर कार्डियोलॉजी में स्पेशलाइजेशन। 90 के दशक में सर गंगा राम हॉस्पिटल में जॉइन किया। वहां रानी से मिला। वो नर्स थी – हंसमुख, मेहनती। हमारी लव स्टोरी फिल्मी थी। हॉस्पिटल के गार्डन में कॉफी पीते, रातों को ड्यूटी के बाद बातें करते।”
प्रिया सुन रही थी। “फिर?”
“हम शादी करना चाहते थे। लेकिन मेरा परिवार… ब्राह्मण, और रानी का बैकग्राउंड अलग। उसके पिता ने भी मना किया। फिर राजेश ठाकुर आया – अमीर, प्रभावशाली। रानी ने मजबूरी में शादी कर ली। मैंने हार मान ली। हॉस्पिटल छोड़ दिया, प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की। लेकिन दिल टूटा। सालों तक सिंगल रहा। फिर 2005 में एक छोटी सी NGO शुरू की – ‘हृदय सेवा’। गरीबों के लिए फ्री हार्ट चेकअप। आज भी चल रही है, लेकिन छोटे स्तर पर।”
प्रिया ने पूछा, “मां के बारे में… एक्सीडेंट?”
आदित्य की आंखें नम हो गईं। “रानी ने कभी नहीं बताया कि तू मेरी बेटी है। लेकिन एक्सीडेंट की खबर सुनी तो… टूट गया। राजेश ने कहा बच्ची भी मर गई। मैंने विश्वास कर लिया। उसके बाद जीवन… बस चलता रहा। कोई शादी नहीं, कोई बच्चे नहीं। बस काम। अब रिटायर्ड हूं, पेंशन पर जीता हूं। NGO को देखता हूं।”
प्रिया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। “अंकल… पापा… अब मैं हूं ना।”
आदित्य रो पड़े। “प्रिया… तू… मेरी बेटी। रानी की तरह स्ट्रॉन्ग। लेकिन ठाकुर फैमिली? राजेश?”
प्रिया ने सब बताया – आश्रम, शिमला, आरव, विक्रम की साजिश। आदित्य सुनते रहे। फिर बोले, “बेटी, मैं तेरे साथ हूं। लेकिन राजेश को क्या कहेंगे? वो तुझे अपना मानते हैं।”
“पापा… राजेश अंकल ने मुझे अपनाया। लेकिन सच तो सच है।”
दोपहर को दोनों NGO गए। ‘हृदय सेवा’ एक छोटा सा क्लिनिक था – गरीब इलाके में। आदित्य ने प्रिया को दिखाया – मरीजों की लाइन, फ्री मेडिसिन। “ये मेरा परिवार था। अब तू भी इसमें शामिल हो।”
प्रिया को अच्छा लगा। वो एक छोटी बच्ची का चेकअप करने में मदद की। आदित्य मुस्कुराए। “तू डॉक्टर बनेगी?”
“शायद। लेकिन पहले कॉलेज कंपलीट।”
शाम को प्रिया ने फैसला लिया – अभी शिमला लौटेगी। लेकिन आदित्य को साथ ले जाएगी। “पापा, शिमला चलिए। आरव से मिलिए। सबको बताएंगे।”
आदित्य हिचकिचाए। “बेटी, अचानक… राजेश क्या कहेंगे?”
“वो समझेंगे। वो अच्छे हैं।”
ट्रेन में दोनों बैठे। आदित्य ने पुरानी तस्वीरें दिखाईं – रानी के साथ। प्रिया ने देखा। “मां कितनी खूबसूरत।”
“हां… और तू वैसी ही।”
शिमला पहुंचे। ठाकुर हाउस में आरव इंतजार कर रहा था। प्रिया की चिट मिलने के बाद वो चिंतित था। रिया भी। दरवाजा खुला तो आरव ने प्रिया को गले लगाया। “कहां गई थी? डर गया था।”
प्रिया ने आदित्य को इंट्रोड्यूस किया। “भैया… ये आदित्य शर्मा। मेरा… असली पिता।”
आरव चौंका। रिया की आंखें बड़ी हो गईं। “क्या?”
प्रिया ने डायरी दिखाई। सबने सुना। आरव ने आदित्य को देखा। पहले शॉक, फिर मुस्कुराहट। “अंकल… वेलकम। चाहे खून का हो या न हो, प्रिया हमारी बहन है। आप भी फैमिली।”
पापा राजेश आए। आदित्य से मिले। दोनों पुराने दोस्त जैसे बात की। राजेश ने कहा, “आदित्य जी, प्रिया ने मुझे भी अपनाया। आप भी आइए।”
रिया ने कहा “अब दो पापा? प्रिया, तू लकी है! लेकिन भैया, अब प्रिया को दो गुना प्रोटेक्ट करना पड़ेगा।”
सब हंसे। लेकिन प्रिया का दिल हल्का था। रोमांस? अभी दूर। विक्रांत का मैसेज आया – “लौट आई? कॉफी?” प्रिया ने सिर्फ “हां, कल” लिखा। धीरे-धीरे।
रात को प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी। दो पिता, एक भाई, दोस्त। जिंदगी पूरी हो रही थी। लेकिन अवनी का वो तंज – “कुछ राज़ बाकी” – अभी गूंज रहा था। क्या और कुछ छिपा है?

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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