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  • Dil sabhal ja jara part 28

    Dil sabhal ja jara part 28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 28 khushiyo ki yojnaa 

     

     

     

     

    मुंबई की वो दोपहरें प्रिया के लिए अब थोड़ी रंगीन लगने लगी थीं, लेकिन अभी भी दिल की उदासी पूरी तरह नहीं गई थी। स्कूल से लौटकर प्रिया अपार्टमेंट में आई। उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में एक हल्की सी चमक थी – बच्चों की हंसी से मिली। वो सफेद साड़ी उतारकर सलवार-कमीज में चेंज की, बाल खुले छोड़ दिए, और सोफे पर बैठ गई। रिया किचन में चाय बना रही थी, उसका चेहरा भी थका हुआ था, लेकिन वो हमेशा की तरह हंसने की कोशिश कर रही थी। “प्रिया… आज स्कूल कैसा था? बच्चे ने कोई मजाक किया?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान फीकी थी। “अच्छा था रिया। एक बच्चा बोला – ‘मैम, आपकी आंखें क्यों उदास हैं?’ मैं क्या कहती? बस हंस दी।”

     

    रिया चाय लेकर आई। “प्रिया… धीरे-धीरे सब ठीक होगा। आरव भैया चाहते होंगे तू हंसे।”

     

    प्रिया ने चाय ली। उसकी आंखें नम हो गईं। “रिया… कोशिश कर रही हूं। लेकिन हर जगह वो याद आता है। स्कूल में बच्चे देखती हूं तो सोचती हूं – हमारे बच्चे कैसे होते? आरव के साथ।”

     

    रिया का चेहरा उदास हो गया। वो प्रिया के कंधे पर हाथ रखी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी आरव भैया की याद आती है। वो मेरे लिए भाई जैसे थे। लेकिन हम मजबूत बनेंगे। साथ में।”

     

    उसी समय डोरबेल बजी। रिया ने खोला। बाहर विक्रांत खड़ा था। उसका चेहरा गंभीर था, आंखें थकी हुईं, जैसे पूरी रात सोया न हो। नीली शर्ट, जींस – कैजुअल लुक, लेकिन आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। “रिया… प्रिया घर पर है?”

     

    रिया चौंकी। “विक्रांत? तुम? अंदर आओ।”

     

    विक्रांत अंदर आया। प्रिया को देखा। उसकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिक गईं – उदासी देखकर दिल दुख गया। प्रिया ने विक्रांत को देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया, आंखें नीचे झुक गईं। “विक्रांत… तुम फिर?”

     

    विक्रांत बैठा। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर – दर्द और चिंता से भरी। “प्रिया… रिया… मैं प्रिया के लिए आया हूं। रिया, तू प्रिया की बेस्ट फ्रेंड है। मैं… मैं देख रहा हूं प्रिया कितनी उदास है। वो स्कूल में भी चुप रहती है। कुछ नहीं बोलती। हमे कुछ करना होगा। प्रिया को ऐसे उदास नहीं रहने दे सकते। वो टूट रही है।”

     

    रिया की आंखें नम हो गईं। वो विक्रांत की ओर देखी, चेहरा गंभीर। “विक्रांत… तू सही कह रहा है। प्रिया… वो बाहर से नॉर्मल लगती है, लेकिन अंदर से टूट चुकी है। हर रात रोती है। आरव भैया की याद… वो नहीं जाती। मैं भी कोशिश करती हूं, लेकिन… क्या करें?”

     

    विक्रांत का चेहरा दृढ़ हो गया। उसकी आंखें रिया पर टिकीं, आवाज में जज्बा। “रिया… हमें प्लान बनाना होगा। प्रिया को खुश करने का। वो अकेली महसूस कर रही है। हम उसे बाहर ले जाएं। कुछ नया करें। जैसे… पार्क, मूवी, या कोई ट्रिप। वो बच्चों से प्यार करती है, तो स्कूल के बच्चों के साथ कोई इवेंट। या उसकी फेवरेट चीजें – किताबें, म्यूजिक। हम मिलकर करेंगे। प्रिया को उदास नहीं रहने देंगे। वो आरव के लिए भी मजबूत बनेगी।”

     

    प्रिया चुपचाप सुन रही थी। उसका चेहरा नीचे झुका, आंखें नम, लेकिन कुछ बोली नहीं। मन में – “आरव… विक्रांत और रिया… वो मुझे खुश करना चाहते हैं। लेकिन तेरी कमी… वो कैसे भरें?”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। वो विक्रांत की ओर देखी, चेहरा उत्साहित। “विक्रांत… आईडिया अच्छा है। चलो प्लान बनाते हैं। पहले… प्रिया को सरप्राइज दें। कल शाम पार्क ले जाएं। समुद्र किनारे। वहां वो अकेली जाती है, लेकिन अब साथ जाएंगे। फिर कोई मूवी – उसकी फेवरेट। आरव भैया की तरह रोमांटिक नहीं, बल्कि हंसने वाली। फिर ट्रिप – वीकेंड पर लोनावला। वहां नेचर, पहाड़ – शिमला जैसा फील आएगा, लेकिन नया। और स्कूल में इवेंट – बच्चों का प्ले या पिकनिक। प्रिया टीचर है, वो इंजॉय करेगी।”

     

    विक्रांत ने सिर हिलाया। उसका चेहरा उत्साहित, आंखें प्रिया पर – प्यार से भरी। “हां रिया। और मैं… मैं स्कूल में हेल्प करूंगा। नानी से कहकर कोई स्पेशल डे ऑर्गनाइज करें। प्रिया को खुश देखना चाहता हूं। वो इतना दर्द सह चुकी है।”

     

    रिया ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… सुन रही है? हम तेरे लिए हैं। खुश हो ना?”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें नम, चेहरा थका, लेकिन एक हल्की मुस्कान। “रिया… विक्रांत… थैंक्स। लेकिन… मैं कोशिश करूंगी। आरव… वो चाहता होगा।”

     

    विक्रांत का दिल दुख गया। लेकिन वो मुस्कुराया। “प्रिया… हम साथ हैं।”

     

    मुंबई की वो शामें अब प्रिया के लिए थोड़ी अलग लगने लगी थीं। विक्रांत और रिया की योजना शुरू हो चुकी थी। पहला सरप्राइज – समुद्र किनारे पार्क। रिया ने प्रिया को कहा था, “चल प्रिया, आज शाम घूम आएं। तुझे अच्छा लगेगा।” प्रिया ने हां कह दिया था – बिना कुछ पूछे। वो तैयार हुई – नीली कुर्ती, बाल खुले, चेहरे पर हल्की मुस्कान। लेकिन मन में अभी भी आरव था। “आरव… अगर तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, समुद्र देख। मेरे साथ।’ लेकिन अब… रिया के साथ।”

     

    पार्क पहुंचे। समुद्र की लहरें, सूरज डूब रहा था। रिया और विक्रांत पहले से वहां थे। विक्रांत ने प्रिया को देखा – उसकी आंखें चमक उठीं। वो पास आया। “प्रिया… वेलकम। आज सिर्फ रिलैक्स। कोई उदासी नहीं।”

     

    प्रिया चौंकी। “विक्रांत… तुम भी?”

     

    रिया हंसी। “हां प्रिया। सरप्राइज! हम तीनों साथ।”

     

    प्रिया मुस्कुराई – पहली बार थोड़ी सच्ची मुस्कान। “थैंक्स गाइज़।”

     

    तीनों वॉक करने लगे। विक्रांत प्रिया के बगल में चल रहा था। उसकी नजरें प्रिया पर – वो मुस्कान देखकर दिल खुश हो रहा था। “प्रिया… तू मुस्कुरा रही है। अच्छा लग रहा है।”

     

    प्रिया ने कहा, “विक्रांत… तुम दोनों की वजह से।”

     

    विक्रांत का दिल धड़का। वो प्रिया को पसंद करने लगा था – पहले दोस्ती से, अब गहराई से। “प्रिया… मैं तुझे खुश देखना चाहता हूं। हमेशा।” उसकी आवाज में गर्माहट थी, आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार से भरी।

     

    प्रिया ने महसूस किया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। “आरव… विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश करना चाहता है। क्या मैं…?”

     

    रिया ने आइसक्रीम ली। तीनों बैठे। विक्रांत ने प्रिया की फेवरेट – चॉकलेट। “ये ले। तेरी फेवरेट ना?”

     

    प्रिया हैरान। “कैसे पता?”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “शिमला में याद है? तू हमेशा चॉकलेट मांगती थी।”

     

    प्रिया हंसी। “हां… याद है।”

     

    वो शाम अच्छी गुजरी। प्रिया घर लौटी तो मन हल्का था। “आरव… आज थोड़ा अच्छा लगा। विक्रांत… वो कोशिश कर रहा है।”

     

    अगले दिन मूवी। रिया ने टिकट्स बुक की – कॉमेडी फिल्म। विक्रांत साथ। थिएटर में प्रिया बीच में, विक्रांत और रिया साइड में। फिल्म में हंसी के सीन आए। प्रिया हंस पड़ी – पहली बार जोर से। विक्रांत ने साइड से देखा। उसका दिल खुश हो गया। “प्रिया… तेरी हंसी… कितनी सुंदर है। मैं तुझे हमेशा ऐसे हंसते देखना चाहता हूं।”

     

    प्रिया ने विक्रांत की ओर देखा। उसकी आंखों में गर्माहट थी। प्रिया का दिल थोड़ा धड़का। “विक्रांत… अच्छा लड़का है। वो मुझे समझता है। आरव… क्या तुम नाराज होगे?”

     

    वीकेंड पर ट्रिप – लोनावला। तीनों गए। पहाड़, झरने, ठंडी हवा। प्रिया ने शिमला याद किया, लेकिन विक्रांत ने उसे डिस्ट्रैक्ट किया – फोटोज, मजाक। झरने के पास विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा – गिरने से बचाने के बहाने। प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। उसका दिल थोड़ा गर्म हुआ। “विक्रांत… तुम्हारी केयर… अच्छी लगती है।”

     

    विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मैं तेरे लिए कुछ भी करूंगा। तू खुश रहे।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराया। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी केयर, उसकी समझदारी। “आरव… विक्रांत अच्छा है। क्या मैं आगे बढ़ूं?”

     

    स्कूल में इवेंट – बच्चों का प्ले। विक्रांत ने हेल्प की। प्रिया खुश थी। बच्चों के साथ डांस, गाने। विक्रांत ने प्रिया को देखा – वो हंस रही थी। “प्रिया… तू खुश है। मेरे लिए काफी है।”

     

    एक शाम पार्क में। विक्रांत और प्रिया अकेले। रिया बहाना बनाकर चली गई। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मुझे तुझसे कुछ कहना है।”

     

    प्रिया का दिल धड़का। “क्या विक्रांत?”

     

    विक्रांत ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… मैं तुझे पसंद करता हूं। पहले दोस्ती से, अब… ज्यादा। मैं जानता हूं आरव तेरे दिल में है। लेकिन मैं इंतजार करूंगा। तेरी खुशी के लिए।”

     

    प्रिया चुप रही। आंखें नम। “विक्रांत… मुझे वक्त चाहिए। आरव… वो हमेशा रहेगा। लेकिन तू… तू अच्छा है।”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “वक्त दूंगा प्रिया। जितना चाहिए।”

     

    प्रिया ने उसका हाथ थामा। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी सच्चाई, उसकी केयर। नई उम्मीदें जाग रही थीं। आरव की यादें साथ थीं, लेकिन जिंदगी आगे बढ़ रही थी।

     

    रिया ने देखा। मुस्कुराई। “प्रिया… विक्रांत अच्छा है।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां रिया। धीरे-धीरे।”

     

    विक्रांत खुश था। प्रिया को खुश रखने की योजना काम कर रही थी। और प्रिया…

    धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी थी।

     

    लेकिन आरव की यादें? वो हमेशा साथ थीं। लेकिन अब नई उम्मीदें भी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 27

    Dil sabhal ja jara part – 27

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    part – 27 duriya badhti ja rahi thi

     

     

     

     

    मुंबई की वो रात विक्रांत के लिए कभी न खत्म होने वाली लग रही थी। उसके अपार्टमेंट में अंधेरा था, सिर्फ टेबल लैंप की हल्की रोशनी जल रही थी। विक्रांत बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद उससे कोसों दूर थी। उसकी आंखें खुली थीं, छत को घूर रही थीं, लेकिन दिमाग में बार-बार प्रिया का उदास चेहरा घूम रहा था। वो चेहरा जो आज स्कूल गेट पर देखा था – सफेद, थका हुआ, आंखें नीचे झुकी हुईं, जैसे दुनिया से कट चुकी हो। विक्रांत ने पलटा, तकिया ठीक किया, लेकिन नींद नहीं आई।

     

    उसकी आंखों में चिंता थी, चेहरा तना हुआ, जैसे कोई पुराना दर्द फिर से जाग उठा हो। वो उठा, पानी पिया, लेकिन मन बैचेन था। “प्रिया… शिमला में तू कितनी खुश थी। वो हंसी, वो चुलबुलापन। अब… अब जैसे कोई छाया है तेरे चेहरे पर।” वो बालकनी में गया, मुंबई की लाइट्स देखीं, लेकिन आंखों में प्रिया का चेहरा था – वो उदास, शांत चेहरा जो कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन सब कह रहा था। विक्रांत की उंगलियां रेलिंग पर कस गईं, आंखें बंद हो गईं, जैसे वो उस चेहरे को भूलना चाहता हो, लेकिन भूल नहीं पा रहा था। रात गुजर गई, लेकिन नींद नहीं आई।

     

    अगली सुबह विक्रांत जल्दी उठा। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन मन में एक फैसला था। वो तैयार हुआ – सफेद शर्ट, ब्लू जींस, बाल सेट किए, लेकिन आंखों में वो चिंता अभी भी थी। “मैं प्रिया से मिलूंगा। जानूंगा क्या हुआ है।” वो कार लेकर निकला। रास्ते में सोच रहा था – “प्रिया… तू मुझे दोस्त मानती है। लेकिन मैं… मैं तुझे पसंद करता हूं। शादी में गया था, लेकिन देख नहीं पाया तुझे दुल्हन बनते। आरव के साथ। इसलिए चला आया। नानी के पास। 

     

    प्रिया का अपार्टमेंट

    प्रिया के लिए अब एक रूटीन बन चुकी थीं, लेकिन हर सुबह आरव की याद से शुरू होती थी। अपार्टमेंट में सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन प्रिया का कमरा अभी भी उदासी की छाया में डूबा हुआ था। वो बिस्तर पर बैठी थी, हाथ में आरव की पुरानी शर्ट – वो शर्ट जो एक्सीडेंट से पहले उसने पहनी थी। उसकी उंगलियां शर्ट पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के स्पर्श को महसूस कर रही हो। आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो खुद को संभालने की कोशिश में लगाई गई थी। “आरव… आज फिर स्कूल जाना है। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। लेकिन तुम… तुम कहां हो? हर सुबह लगता है तुम मेरे बगल में हो, मुझे गुड मॉर्निंग कहते हो। लेकिन अब सिर्फ सन्नाटा है।” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर शर्ट पर गिर पड़े। प्रिया ने आंसू पोंछे, एक गहरी सांस ली और तैयार होने लगी। सफेद सलवार-कमीज पहनी, बाल बंधे, चेहरे पर हल्का पाउडर – खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश। लेकिन आईने में उसकी आंखें उदास थीं, मुस्कान फीकी।

     

    किचन में रिया ब्रेकफास्ट बना रही थी – टोस्ट, कॉफी। उसका चेहरा भी थका हुआ था, आंखें सूजीं, लेकिन वो हंसने की कोशिश कर रही थी। “प्रिया… आ गई? आज जल्दी निकलना है ना? स्कूल में क्या स्पेशल है?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान नहीं आई। “कुछ नहीं रिया। बस नॉर्मल दिन।”

     

    आदित्य पापा अखबार पढ़ रहे थे। उनका चेहरा प्रिया को देखकर दुख से भर गया। “बेटी… अच्छी लग रही है। स्कूल कैसा चल रहा है?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “अच्छा पापा। बच्चे अच्छे हैं।” लेकिन उसकी आवाज में जोश नहीं था, सिर्फ थकान। वो कॉफी पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। मन में आरव था – “आरव… आज अगर तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, स्कूल में बेस्ट टीचर बनो।’ लेकिन अब… अब सब सूना है।”

     

    तभी डोरबेल बजी। आदित्य उठे। “कौन होगा इतनी सुबह?”

     

    दरवाजा खोला। बाहर विक्रांत खड़ा था। उसका चेहरा गंभीर था, आंखें थकी हुईं, जैसे पूरी रात सोया न हो। सफेद शर्ट, जींस – सिम्पल लुक, लेकिन आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। “अंकल… गुड मॉर्निंग। प्रिया यहां है ना?”

     

    आदित्य चौंके। “विक्रांत? तू? यहां?”

     

    विक्रांत ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन मुस्कान में दर्द था। “हां अंकल। कल स्कूल में देखा। बात करने आया हूं।”

     

    आदित्य ने उसे अंदर बुलाया। “आ बेटा। बैठ।”

     

    प्रिया किचन से बाहर आई। विक्रांत को देखकर रुक गई। उसकी आंखें बड़ी हो गईं – हैरानी, उदासी, और थोड़ी चिढ़ से भरी। चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे कोई अनचाहा मेहमान आ गया हो। वो कुछ सेकंड्स खड़ी रही, आंखें विक्रांत पर टिकीं, लेकिन चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं – भावशून्य। “तुम… यहां क्यों आए हो?” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को कंट्रोल कर रही हो। आंखें नीचे झुक गईं, होंठ कांपे, जैसे पुरानी यादों का दर्द फिर से जाग उठा हो।

     

    विक्रांत खड़ा हो गया। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, चिंता, और पुराने प्यार से भरी। “प्रिया… मैं… मैं कल से परेशान हूं। मुझे पता नहीं था आरव के बारे में। मुझे अफसोस है।” उसकी आवाज कांप रही थी, चेहरा पीला, जैसे वो खुद दुख में डूब रहा हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन आंसू नहीं गिरने दिए। “आरव… वो… वो चला गया? कैसे? मैं… मैं शादी में आया था, लेकिन रह नहीं सका। मैंने सोचा तुम खुश हो। लेकिन अब… अब तू यहां? उदास?”

     

    प्रिया चुप रही। उसकी आंखें नीचे, चेहरा भावशून्य। वो कुछ नहीं बोली। आंखों में आंसू आ गए, लेकिन गिरने नहीं दिए। मन में तूफान – “विक्रांत… तुम्हें क्या पता? आरव चला गया। मेरी जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन अब तुम… क्यों आए? मुझे अकेला छोड़ दो।” उसके होंठ कांप रहे थे, चेहरा पीला, जैसे वो खुद को रोक रही हो। वो कुछ नहीं बोली।

     

    आदित्य ने बीच में कहा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर टिकीं – आश्चर्य और सवाल से भरी। “विक्रांत… तू कब आया मुंबई? बताया भी नहीं।”

     

    विक्रांत ने आदित्य की ओर देखा। उसका चेहरा थका हुआ, आंखें नीचे। “अंकल… प्रिया की शादी के दिन ही आ गया था। नानी मां की तबीयत खराब हो गई थी। मैं दिल्ली से सीधा यहां चला आया। शादी में… रहा नहीं।” उसकी आवाज में दर्द था, चेहरा भावुक, जैसे वो पुराना घाव खोल रहा हो। आंखें प्रिया पर टिकीं, लेकिन प्रिया ने नजरें नहीं मिलाईं। “मैं… मैं प्रिया को देख नहीं पाया किसी और के साथ। इसलिए चला आया।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। उनका चेहरा उदास था, लेकिन समझदारी भरा। “बेटा… बहुत हुआ। आरव… वो चला गया। प्रिया टूट गई है। तू आया है अच्छा है। लेकिन उसे वक्त दे।”

     

    प्रिया ने अपना बैग उठाया। उसका चेहरा अभी भी भावशून्य, आंखें नीचे। वो स्कूल जाने लगी। कदम तेज़, जैसे भाग रही हो। विक्रांत ने देखा। उसका दिल टूटा। “प्रिया… रुक।”

     

    प्रिया रुकी नहीं। लेकिन विक्रांत उसके पास आया। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, प्यार, और चिंता से भरी। “प्रिया… चलो हम साथ में स्कूल चलते हैं।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखें नीचे, चेहरा सख्त। वो बिना विक्रांत को देखे बोली, “विक्रांत… मैं अकेली जा सकती हूं। तुम जाओ। मुझे किसी के साथ नहीं जाना।” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो दर्द छिपा रही हो। आंखें नम, लेकिन चेहरा भावशून्य। मन में – “आरव… अगर मैं विक्रांत के साथ गई तो लगेगा मैं तुझे भूल रही हूं। नहीं। मैं तेरे साथ हूं। हमेशा।”

     

    विक्रांत चौंका। उसका चेहरा दुख से भर गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – हैरानी और दर्द से। “प्रिया… लेकिन हम दोनों को एक ही जगह जाना है। साथ क्यों नहीं जा सकती?”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। पहली बार विक्रांत की आंखों में देखा। उसकी आंखें लाल, चेहरा सख्त, लेकिन दर्द से भरा। वो सीधे बोली, “क्योंकि मेरे और तुम्हारे रास्ते अलग हैं। हम कभी एक रास्ते पर नहीं चल सकते हैं।” उसकी आवाज कड़ी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को रोक रही हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन वो रोई नहीं। वो ये बोलकर चली गई। कदम तेज़, आंखें नीचे। मन में – “आरव… मैं किसी के करीब नहीं जाऊंगी। तू मेरे साथ है। हमेशा।”

     

    विक्रांत देखता रह गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया, आंखें प्रिया की पीठ पर टिकीं – दर्द, हैरानी, और टूटे दिल से भरी। वो कुछ नहीं बोला। बस खड़ा रहा। मन में – “प्रिया… क्या हो गया तुझे? पहले कितनी दोस्ती थी। अब… ये दूरियां? मैंने क्या गलत किया?”

     

    आदित्य ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर – समझदारी और दुख से भरी। “विक्रांत… उसे टाइम लगेगा। इस सब से निकलने में। वो आरव को भूल नहीं पाएगी।”

     

    विक्रांत ने सिर हिलाया। उसका चेहरा उदास था, आंखें नम। “अंकल… मैं समझता हूं। लेकिन… मैं उसकी मदद करना चाहता हूं।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा… वो मजबूत है। लेकिन दुख बड़ा है। तू दोस्त है, वक्त दे।”

     

    विक्रांत चला गया। लेकिन उसका मन बैचेन। “प्रिया… मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा। लेकिन तू… तू इतनी दूर क्यों हो गई?”

     

    प्रिया स्कूल पहुंची। क्लास में गई। लेकिन मन कहीं और था। 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 26

    Dil sabhal ja jara part – 26

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    Part – 26 ankahi mulakat 

    स्कूल की घंटी बजी। दिन खत्म हो चुका था। बच्चे चहल-पहल करते हुए गेट की ओर दौड़ रहे थे, बैग्स लहराते हुए, हंसते-खेलते। प्रिया अपनी क्लास से बाहर निकली। उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में एक हल्की सी संतुष्टि थी – बच्चों ने उसे मैम कहकर बुलाया था, उनकी मासूम बातें सुनकर मन थोड़ा हल्का हुआ था। वो अपना बैग कंधे पर टिकाया और गेट की ओर बढ़ी। सफेद सलवार-कमीज में, बाल खुले, चेहरा सादा – कोई मेकअप नहीं, सिर्फ होंठों पर हल्की लिप बाम। वो खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी चाल में एक उदासी थी, कदम भारी थे। मन में आरव की यादें घूम रही थीं – “आरव… आज बच्चों ने स्टोरी सुनी। तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, तू बेस्ट टीचर है।’”

     

    स्कूल से थोड़ा दूर, एक पेड़ की छांव में एक काली कार खड़ी थी। विक्रांत अंदर बैठा था। उसने स्कूल गेट की ओर देखा। प्रिया को आते देखा। उसका दिल धड़क गया। चेहरा देखकर चौंका – प्रिया उदास लग रही थी, पहले वाली चमक नहीं थी आंखों में। विक्रांत ने कार स्टार्ट नहीं की। वो इंतजार कर रहा था – स्कूल खत्म होने का। वो स्कूल के अंदर प्रिया से मिलना नहीं चाहता था। क्यों? क्योंकि वो खुद नहीं समझ पा रहा था कि क्या कहेगा। शिमला की यादें ताजा थीं – प्रिया का आरव के साथ होना, वो शादी जिसमें वो गया था लेकिन रह नहीं सका। वो प्रिया को पसंद करने लगा था – गहराई से। लेकिन जानता था प्रिया उसे सिर्फ दोस्त मानती है। शादी में गया था, लेकिन फेरे शुरू होने से पहले चला आया था। प्रिया की शादी किसी और के साथ देख नहीं सकता था। उसी रात मुंबई आ गया था – अपनी नानी (प्रिंसिपल मैडम) के पास। आरव की मौत की खबर उसे नहीं पता थी। वो सोचता था प्रिया और आरव खुशहाल जीवन जी रहे होंगे शिमला में। लेकिन अब प्रिया को मुंबई में देखकर हैरान था। “प्रिया यहां? स्कूल में जॉब? आरव के साथ नहीं? क्या हुआ?”

     

    विक्रांत की नजरें प्रिया पर टिकी थीं। उसका चेहरा गंभीर था, आंखों में सवालों का तूफान। वो कार से बाहर नहीं निकला। इंतजार करता रहा। प्रिया स्कूल गेट से निकली। अकेली पैदल चल रही थी – बस स्टॉप की ओर। उसका चेहरा उदास, आंखें नीचे, जैसे मन कहीं और हो। विक्रांत ने कार आगे बढ़ाई। प्रिया के ठीक आगे रोकी। शीशा नीचे किया। “प्रिया… अंदर बैठो।”

     

    प्रिया रुक गई। विक्रांत को देखकर चौंकी। उसकी आंखें बड़ी हो गईं, चेहरा सफेद पड़ गया। “विक्रांत… तुम… यहां?”

     

    विक्रांत ने दरवाजा खोला। उसकी आवाज में चिंता थी, लेकिन संयम। “हां प्रिया। बैठो। मैं ड्रॉप कर दूंगा।”

     

    प्रिया कुछ नहीं बोली। उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन आंसू नहीं बहने दिए। वो चुपचाप कार में बैठ गई। दरवाजा बंद किया। सीट बेल्ट लगाई। पूरी तरह चुप। उसका चेहरा खिड़की की ओर, बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मन में तूफान – “विक्रांत… तुम यहां? आरव के बाद… तुम्हें देखकर सब याद आ गया। शिमला, वो दिन, वो दोस्ती। लेकिन अब… अब सब खत्म।”

     

    विक्रांत ने कार स्टार्ट की। वो ड्राइव कर रहा था, लेकिन नजरें बार-बार प्रिया पर जा रही थीं। प्रिया की उदासी उसे काट रही थी। वो सोच रहा था – “प्रिया… पहले कितनी हंसती थी। आंखों में चमक थी। अब… ये उदासी क्यों? आरव के साथ खुश नहीं है? या कुछ और? शादी के बाद मुंबई क्यों? स्कूल में जॉब? आरव कहां है?” विक्रांत का दिल दुख रहा था। वो प्रिया को पसंद करता था – बहुत। लेकिन जानता था प्रिया का दिल आरव के पास था। शादी में गया था, लेकिन रह नहीं सका। “प्रिया को आरव के साथ देख नहीं सकता था। इसलिए चला आया। लेकिन अब… ये क्या हुआ?”

     

    रास्ता लंबा था। ट्रैफिक। विक्रांत ने रेडियो ऑन किया – हल्का म्यूजिक। लेकिन प्रिया चुप। विक्रांत ने हिम्मत करके पूछा, “प्रिया… सब ठीक है? तुम… यहां मुंबई में?”

     

    प्रिया चुप रही। उसकी आंखें खिड़की से बाहर। आंसू बह रहे थे, लेकिन चुपके से। वो कुछ नहीं बोली।

     

    विक्रांत का मन बैचेन हो गया। “प्रिया… बात करो ना। मैं… मैं तुम्हें देखकर हैरान हूं। शादी के बाद… आरव के साथ नहीं हो?”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। वो पलटी। विक्रांत की ओर देखा। उसकी आंखें लाल, चेहरा दर्द से भरा। लेकिन बोली नहीं। सिर्फ सिर हिलाया – ना में।

     

    विक्रांत चौंका। “क्या मतलब? आरव…?”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन बोली नहीं। वो फिर खिड़की की ओर मुड़ गई।

     

    विक्रांत को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसकी नजरें प्रिया पर टिकी थीं – वो उदासी, वो चुप्पी। “प्रिया… कुछ हुआ है? आरव ठीक है ना?”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो रो पड़ी। चुपके से, लेकिन हिचकियां लेते हुए। विक्रांत ने कार साइड में रोकी। “प्रिया… क्या हुआ? बताओ ना।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “विक्रांत… घर पहुंचकर।”

     

    विक्रांत ने फिर कार स्टार्ट की। उसका मन बैचेन। “आरव… क्या हुआ उसे? प्रिया इतनी टूट क्यों गई है?”

     

    घर पहुंचे। प्रिया कार से उतरी। विक्रांत भी उतरा। “प्रिया… मैं अंदर आऊं?”

     

    प्रिया ने कहा, “नहीं विक्रांत। कल बात करेंगे।”

     

    विक्रांत चला गया। लेकिन उसका मन बैचेन। प्रिया अंदर गई। रो पड़ी। “आरव… विक्रांत आ गया। लेकिन तुम नहीं हो।”

     

    प्रिया घर पहुंची। अपार्टमेंट में गई। आदित्य पापा ने देखा। “बेटी… क्या हुआ? चेहरा उदास क्यों?”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… विक्रांत… वो यहां है। स्कूल में।”

     

    आदित्य चौंके। “क्या? वो शिमला वाला?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “हां पापा। वो मुझसे मिला। लेकिन मैं कुछ नहीं बोली। आरव की याद… सब टूट गया।”

     

    रिया आई। “प्रिया… क्या हुआ?”

     

    प्रिया ने बताया। रिया ने गले लगाया। “प्रिया… वो पुराना दोस्त है। लेकिन तू उदास मत हो।”

     

    लेकिन प्रिया का मन टूट चुका था। विक्रांत की मुलाकात ने पुरानी यादें ताजा कर दीं। “आरव… विक्रांत आ गया। लेकिन तू कहां हो?”

     

    विक्रांत घर लौटा। नानी से कहा, “नानी… प्रिया यहां है। लेकिन बदली हुई। उदास। आरव कहां है?”

     

    नानी ने कहा, “बेटा… आरव… उसकी मौत हो गई। एक्सीडेंट में।”

     

    विक्रांत चौंका। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “क्या? मौत? कब?”

     

    नानी ने बताया। विक्रांत रो पड़ा। “प्रिया… इतना दर्द? मैं नहीं जानता था। अब… अब मैं क्या करूं?”

     

  • वो आ गया…

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    वो आ गया…

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के आखिरी छोर पर बने छोटे-से मोहल्ले में लगभग हर घर की बत्तियां बुझ चुकी थीं। सड़क बिल्कुल शांत थी। कभी-कभी किसी दूर जाती गाड़ी की आवाज आती और फिर सब कुछ पहले जैसा खामोश हो जाता।

     

    उसी मोहल्ले में आरव अपने माता-पिता और छोटी बहन रिया के साथ रहता था।

     

    उस रात उसके माता-पिता एक रिश्तेदार के घर गए हुए थे और रिया अपनी सहेली के घर रुक गई थी। घर में सिर्फ आरव था।

     

    आरव पढ़ाई कर रहा था कि अचानक बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने घड़ी देखी।

     

    “इस वक्त कौन आया?”

     

    वह कुर्सी से उठा और दरवाजे के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज पहले से थोड़ी तेज थी।

     

    आरव ने दरवाजे की छोटी खिड़की से बाहर देखा।

     

    सामने का बरामदा खाली था।

     

    “शायद कोई शरारत कर रहा है।”

     

    वह वापस कमरे में चला गया।

     

    लेकिन जैसे ही उसने किताब खोली, उसका फोन बज उठा।

     

    स्क्रीन पर रिया का नाम था।

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    “हां, बोल।”

     

    रिया की आवाज बहुत धीमी थी—

     

    “भैया… दरवाजा मत खोलना।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी सहेली के घर के बाहर कोई बहुत देर से खड़ा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    “पता नहीं। वो बस सड़क की तरफ देख रहा है।”

     

    आरव खिड़की के पास गया।

     

    बाहर फिर वही सुनसान सड़क थी।

     

    “तुम घबराओ मत। अपनी सहेली के घर में ही रहना।”

     

    “भैया…”

     

    “हां?”

     

    रिया कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन अचानक फोन कट गया।

     

    आरव ने दोबारा फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    उसने बेचैनी में मोबाइल मेज पर रखा।

     

    तभी उसके घर के बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया।

     

    आवाज बहुत धीमी थी।

     

    लेकिन वह साफ सुन सकता था।

     

    किसी ने उसका नाम लिया था।

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज घर के पीछे से आई थी।

     

    आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    घर के पीछे वाला कमरा कई महीनों से बंद पड़ा था। वहां पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

     

    उस कमरे का दरवाजा अचानक अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसने हिम्मत करके दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “बस बहुत हो गया।”

     

    वह अपने कमरे में लौट आया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “ऊपर तो कोई नहीं है…”

     

    वह सीढ़ियों के पास पहुंचा।

     

    ऊपर पूरा अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    सीढ़ियों पर एक-एक कदम रखते हुए ऊपर जाने लगा।

     

    पहली मंजिल पर पहुंचकर उसने देखा कि गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    यह कमरा उसके दादा का था।

     

    दादा की मृत्यु को कई साल हो चुके थे और तब से कमरा लगभग बंद ही रहता था।

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    कमरे में रखी पुरानी अलमारी खुली हुई थी।

     

    फर्श पर कुछ पुराने कागज बिखरे थे।

     

    एक कागज पर उसकी नजर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जब वह आए, तो उसका नाम मत लेना।”

     

    आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    “वह कौन?”

     

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    आरव ने झटके से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने तुरंत कमरे से बाहर निकलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    उसने हैंडल घुमाया।

     

    “खुलो!”

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    फिर कमरे की खिड़की पर किसी की परछाईं दिखाई दी।

     

    आरव कुछ कदम पीछे हट गया।

     

    परछाईं धीरे-धीरे खिड़की से हट गई।

     

    फिर कमरे के बाहर से कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने सांस रोक ली।

     

    कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई।

     

    कुछ सेकंड बाद किसी ने दरवाजे पर हाथ रखा।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश नहीं की।

     

    तभी बाहर से एक आवाज आई—

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे यहां आने से रोका था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “लेकिन अब वो नहीं हैं।”

     

    अचानक दरवाजा खुल गया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    गलियारा खाली था।

     

    वह भागकर सीढ़ियों की तरफ आया।

     

    तभी नीचे से मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज आई।

     

    चर्ररर…

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    दरवाजे के पास एक लंबी परछाईं दिखाई दी।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर आ रही थी।

     

    आरव ने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर के पास बैठ गया।

     

    उसका फोन फिर बजा।

     

    इस बार रिया का फोन था।

     

    “भैया!”

     

    “रिया! तुम ठीक हो?”

     

    “हां, लेकिन आप घर में अकेले हो?”

     

    “हां।”

     

    रिया कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “भैया… अभी मैं घर के बाहर खड़ी हूं।”

     

    आरव का दिल जैसे रुक गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैं अभी घर पहुंची हूं।”

     

    आरव ने घबराकर पूछा—

     

    “लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम अपनी सहेली के घर हो!”

     

    रिया बोली—

     

    “मैं थी। लेकिन मुझे लगा कोई मुझे घर तक छोड़ने आया है।”

     

    “कौन?”

     

    रिया ने धीरे से कहा—

     

    “वही आदमी जो हमारे घर के बाहर खड़ा है।”

     

    आरव ने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

     

    सड़क पर रिया खड़ी थी।

     

    उसके पीछे एक लंबी परछाईं थी।

     

    आरव ने घबराकर दरवाजा खोला और बाहर जाने लगा।

     

    तभी उसके दादा के कमरे से फिर वही आवाज आई—

     

    “उसे अंदर मत आने देना।”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    कमरे के अंदर रखी पुरानी मेज पर एक डायरी खुली हुई थी।

     

    वह दौड़कर उसके पास गया।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “वो इंसान नहीं है। वह उन लोगों के घर आता है, जहां पुराने घर का एक राज छिपा हो। उसे रोकने का एक ही तरीका है—उस राज को स्वीकार करना।”

     

    आरव ने तेजी से पुराने कागज देखे।

     

    उसे पता चला कि वर्षों पहले उनके घर की जमीन को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ था। उसके दादा ने किसी निर्दोष परिवार को उनका हक दिलाने की कोशिश की थी, लेकिन वह परिवार गांव छोड़कर चला गया था।

     

    शायद उसी अधूरे अन्याय की वजह से यह रहस्य इतने वर्षों से घर से जुड़ा था।

     

    आरव ने डायरी हाथ में ली और बाहर आ गया।

     

    सामने वह परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “मैं सच जानता हूं।”

     

    परछाईं रुक गई।

     

    “मेरे दादा ने जो गलती की थी, मैं उसे छिपाऊंगा नहीं।”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर वह परछाईं धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    रिया दौड़कर आरव के पास आ गई।

     

    “भैया!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    परछाईं सड़क के आखिरी छोर तक गई और अचानक गायब हो गई।

     

    सुबह मोहल्ले के बुजुर्गों को सारी बात बताई गई।

     

    पुराने कागजों की जांच हुई और सच सामने आया कि कई साल पहले जमीन का अधिकार वास्तव में दूसरे परिवार का था।

     

    आरव के परिवार ने वह जमीन उन्हें वापस कर दी।

     

    उस दिन के बाद घर में कभी कोई अजीब आवाज नहीं आई।

     

    कई महीनों बाद आरव उसी कमरे में बैठा दादा की डायरी पढ़ रहा था।

     

    अचानक खिड़की से ठंडी हवा आई।

     

    डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।

     

    उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

     

    “अब मैं जा रहा हूं।”

     

    आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    बस दूर सड़क पर एक परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

    और उस रात के बाद मोहल्ले में किसी ने उसे दोबारा नहीं देखा।

     

    लेकिन आज भी जब कभी उस पुराने घर के पास रात में हवा अचानक ठंडी हो जाती है, लोग कहते हैं—

     

    “डरना मत… वो आ गया था, अपना सच लेने… और सच मिलते ही चला गया।”

  • Dil sabhal ja jara part – 25

    Dil sabhal ja jara part – 25

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part  – 25 “स्कूल की नई शुरुआत और छिपा हुआ दर्द”

     

    मुंबई की सुबहें अब प्रिया के लिए एक नई रूटीन बन चुकी थीं। अपार्टमेंट से निकलकर लोकल ट्रेन, फिर बस, और आखिरकार साउथ मुंबई के उस छोटे से स्कूल तक पहुंचना जहां उसे टीचर की जॉब मिल गई थी। स्कूल का नाम था “सेंट मेरीज़ प्राइमरी स्कूल” – पुरानी बिल्डिंग, हरा-भरा कंपाउंड, और बच्चों की चहल-पहल। प्रिया ने पहला दिन सफेद सलवार-कमीज में शुरू किया था, बाल बंधे हुए, चेहरे पर हल्का मेकअप – खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश। आईने में देखकर खुद से कहा था, “प्रिया… मुस्कुरा। आरव यही चाहता होगा।” लेकिन आईने में उसकी आंखें उदास थीं, मुस्कान नकली लग रही थी।

     

    स्कूल पहुंचते ही गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने स्माइल दी। “मैम, गुड मॉर्निंग। न्यू टीचर हो ना?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। “हां… गुड मॉर्निंग।”

     

    अंदर स्टाफ रूम में गई। कुछ टीचर्स पहले से थे। एक मैम ने वेलकम किया। “प्रिया जी, वेलकम। क्लास 5 की इंग्लिश हैंडल करोगी। बच्चे बहुत अच्छे हैं।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “थैंक यू मैम।”

     

    क्लासरूम में घुसी। बच्चे कुर्सियों पर बैठे थे – 30-35 छोटे-छोटे चेहरे, उत्सुक आंखें। प्रिया ने बोर्ड पर अपना नाम लिखा। “गुड मॉर्निंग चिल्ड्रन। मैं आपकी नई टीचर प्रिया मैम हूं।”

     

    बच्चों ने कोरस में कहा, “गुड मॉर्निंग मैम!”

     

    प्रिया मुस्कुराई – इस बार थोड़ी सच्ची मुस्कान। बच्चों की मासूमियत उसे अच्छी लग रही थी। वो पढ़ाने लगी – एक छोटी सी स्टोरी। बच्चे ध्यान से सुन रहे थे। एक बच्ची ने हाथ उठाया। “मैम, आप शिमला से हो ना? वहां बर्फ गिरती है?”

     

    प्रिया का दिल धड़का। शिमला… आरव की याद। लेकिन वो खुद को संभाला। “हां बेटा। बहुत बर्फ गिरती है।”

     

    बच्चे उत्साहित हो गए। “मैम, फोटो दिखाओ ना!”

     

    प्रिया ने हंसकर कहा, “अगले दिन लाऊंगी।”

     

    वो खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश कर रही थी – हंस रही थी, बच्चों से बात कर रही थी, लेकिन उसका दिल ही जानता था कि वो अंदर से टूट चुकी थी। हर हंसी के पीछे दर्द छिपा था। ब्रेक में स्टाफ रूम में अकेली बैठी चाय पी रही थी। एक बच्चे की हंसी सुनकर आरव की याद आई – वो कैसे उसे चिढ़ाता था। आंखें भर आईं। वो जल्दी से आंसू पोंछे। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। लेकिन तुम्हारी कमी… हर पल खलती है।”

     

    लंच ब्रेक में सीनियर टीचर, मिसेज गुप्ता (50 के करीब, सख्त लेकिन केयरिंग), प्रिया के पास आईं। “प्रिया बेटी, कैसा लगा पहला दिन?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा मैम। बच्चे बहुत क्यूट हैं।”

     

    मिसेज गुप्ता ने प्रिया के चेहरे पर उदासी पढ़ ली। लेकिन कुछ नहीं बोलीं। फिर अचानक स्टाफ रूम में अनाउंसमेंट जैसा बोलीं, “सुनो सब! आज हमारे स्कूल में एक स्पेशल गेस्ट आ रहा है। प्रिंसिपल मैडम का नाती। दिल्ली से आ रहा है। बड़ा होशियार लड़का है। सब लोग अच्छे से रहना। कोई शरारत नहीं। क्लास में डिसिप्लिन बनाए रखना।”

     

    सब टीचर्स मुस्कुराईं। एक जूनियर टीचर ने कहा, “मैम, प्रिंसिपल मैडम का नाती? वो तो बहुत अमीर फैमिली से है ना?”

     

    मिसेज गुप्ता ने कहा, “हां। लेकिन बहुत अच्छा लड़का है। नाम है… विक्रांत राठौर।”

     

    प्रिया का हाथ कांप गया। चाय का कप टेबल पर गिरते-गिरते बचा। “विक्रांत… राठौर?”

     

    मिसेज गुप्ता ने कहा, “हां बेटी। तुम जानती हो क्या?”

     

    प्रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। विक्रांत… शिमला वाला विक्रांत? वो जो उसका दोस्त था, जो उसे पसंद करता था। क्या वही? मुंबई में? प्रिंसिपल का नाती?

     

    प्रिया की सांस तेज़ हो गई। “मैम… वो… कितने साल का है?”

     

    “22-23 का होगा। कॉलेज कंपलीट करके आया है। प्रिंसिपल मैडम चाहती हैं वो यहां कुछ समय स्पेंड करे, स्कूल को समझे।”

     

    प्रिया का दिल धड़कने लगा। “आरव… क्या ये संयोग है? या कुछ और?”

     

    बच्चों की घंटी बजी। प्रिया क्लास की ओर गई, लेकिन मन कहीं और था। “विक्रांत… अगर वही है तो… यहां क्यों?”

     

    स्कूल के गेट पर एक कार रुकी। बाहर निकला एक लड़का – लंबा, हैंडसम, मुस्कुराता हुआ। विक्रांत। प्रिंसिपल मैडम उसे गले लगाईं। “मेरा पोता… आ गया।”

     

    विक्रांत ने स्कूल देखा। उसकी नजर प्रिया पर पड़ी – दूर क्लासरूम की खिड़की से। वो चौंका। “प्रिया… यहां?”

     

    प्रिया की आंखें बड़ी हो गईं। दिल में तूफान। “विक्रांत… मुंबई में? प्रिंसिपल का नाती?”

     

    कौन है ये विक्रांत? शिमला वाला वही? या संयोग? जाने के लिए बने रहिए । 

     

  • डरावनी आत्मा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    डरावनी आत्मा का बंद कमरा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। हवेली कई सालों से बंद पड़ी थी। उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे। गांव के लोग शाम होते ही उस रास्ते से गुजरना बंद कर देते थे।

     

    कहा जाता था कि हवेली में एक डरावनी आत्मा रहती है।

     

    लोगों का कहना था कि आधी रात के बाद हवेली की ऊपरी मंजिल से किसी लड़की के रोने की आवाज आती थी।

     

    किसी ने उसे देखा नहीं था, लेकिन कई लोगों ने उसके कदमों की आवाज जरूर सुनी थी।

     

    उसी गांव में एलेक्स नाम का बीस साल का लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक शाम उसके दोस्त नोलन ने उसे चुनौती दी।

     

    “अगर तुम्हें इतना ही भरोसा है कि वहां कोई आत्मा नहीं है, तो आज रात हवेली में जाकर दिखाओ।”

     

    एलेक्स ने हंसकर कहा—

     

    “मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना।”

     

    नोलन बोला—

     

    “डर गए?”

     

    एलेक्स तुरंत बोला—

     

    “ठीक है। आज रात चला जाऊंगा।”

     

    रात करीब दस बजे एलेक्स टॉर्च लेकर हवेली की तरफ निकल पड़ा।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    उसने उसे धक्का दिया।

     

    चर्ररर…

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    एलेक्स ने खुद को संभाला।

     

    “पुरानी हवेली है, हवा तो चलेगी।”

     

    वह अंदर चला गया।

     

    फर्श पर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    जैसे ही उसने टॉर्च एक चित्र पर डाली, उसे लगा कि चित्र में बनी लड़की की आंखें उसकी तरफ देख रही हैं।

     

    एलेक्स कुछ पल रुका।

     

    फिर हंस पड़ा।

     

    “डराने की कोशिश कर रही हो?”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    अचानक पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    एलेक्स पलटा।

     

    “हवा होगी।”

     

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    अब उसे थोड़ी चिंता हुई।

     

    उसने फोन निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “कमाल है।”

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    एलेक्स ने सिर उठाकर देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की सीढ़ियां अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    आवाज फिर आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम रखा, ऊपर से एक धीमी आवाज आई—

     

    “मत आओ…”

     

    एलेक्स वहीं रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    एलेक्स का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    लेकिन उसने हिम्मत करके ऊपर जाना जारी रखा।

     

    ऊपरी मंजिल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    दरवाजे पर पुराने ताले के निशान थे।

     

    एलेक्स ने टॉर्च उस दरवाजे पर डाली।

     

    अचानक दरवाजे के अंदर से किसी ने धीरे से तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    एलेक्स पीछे हट गया।

     

    “अंदर कौन है?”

     

    कुछ देर बाद आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    “जिसका इंतजार कोई नहीं कर रहा।”

     

    एलेक्स का डर बढ़ गया।

     

    फिर भी उसने पूछा—

     

    “तुम यहां कब से हो?”

     

    अंदर से आवाज आई—

     

    “बहुत सालों से।”

     

    एलेक्स ने दरवाजे के नीचे से देखा।

     

    अंदर से हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    “तुम इंसान हो?”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “अब नहीं।”

     

    एलेक्स समझ गया।

     

    वह वही आत्मा थी, जिसकी बातें गांव वाले करते थे।

     

    वह भागने के लिए मुड़ा।

     

    लेकिन गलियारे का रास्ता अचानक गायब था।

     

    वह जहां सीढ़ियां थीं, वहां अब सिर्फ दीवार थी।

     

    एलेक्स घबरा गया।

     

    “मुझे जाने दो!”

     

    आत्मा की आवाज आई—

     

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका।”

     

    “तो रास्ता कहां है?”

     

    “जिस कमरे में तुमने कभी आने की हिम्मत नहीं की, वही रास्ता दिखाएगा।”

     

    एलेक्स ने बंद कमरे की तरफ देखा।

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर एक पुरानी मेज, एक टूटी कुर्सी और दीवार पर कई तस्वीरें थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर एलेक्स के कदम रुक गए।

     

    उस तस्वीर में एक युवा लड़की थी।

     

    उसके साथ एक छोटा लड़का खड़ा था।

     

    लड़का बिल्कुल एलेक्स जैसा दिखता था।

     

    उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “ये… कौन है?”

     

    आत्मा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    अब उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वह एक शांत चेहरे वाली लड़की थी। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि बहुत गहरा दुख था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा के छोटे भाई की बेटी।”

     

    एलेक्स हैरान रह गया।

     

    “मेरा परिवार?”

     

    आत्मा ने सिर हिलाया।

     

    “मेरा नाम एलिसा था।”

     

    उसने बताया कि कई साल पहले हवेली में रहने वाले परिवार में जमीन को लेकर विवाद हुआ था। एलिसा ने एक पुराने दस्तावेज के बारे में सच जान लिया था, जिससे परिवार के एक लालची सदस्य का झूठ सामने आ सकता था।

     

    लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    उसे इसी कमरे में बंद कर दिया गया था।

     

    “मैंने बहुत देर तक मदद के लिए पुकारा,” एलिसा ने कहा।

     

    “लेकिन कोई नहीं आया।”

     

    एलेक्स की आंखें नम हो गईं।

     

    “फिर?”

     

    “कुछ दिनों बाद मुझे इसी कमरे में मेरी डायरी मिली। उसमें मैंने सब सच लिख दिया था।”

     

    एलिसा ने मेज की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    एलेक्स ने उसे उठाया।

     

    उसमें पूरे परिवार का सच लिखा था।

     

    आखिरी पन्ने पर एक नाम था।

     

    एलेक्स के परदादा का।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी, मगर देर हो चुकी थी।”

     

    एलेक्स स्तब्ध रह गया।

     

    उसे समझ आया कि उसके परिवार ने एलिसा को नुकसान नहीं पहुंचाया था। बल्कि उसके परदादा ने उसे बचाने की कोशिश की थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम अब तक यहां क्यों हो?”

     

    एलिसा ने धीमे से कहा—

     

    “क्योंकि मेरा सच किसी ने दुनिया तक नहीं पहुंचाया।”

     

    एलेक्स ने डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    “मैं तुम्हारा सच सबको बताऊंगा।”

     

    एलिसा की आंखों में पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    तभी हवेली में तेज हवा चलने लगी।

     

    खिड़कियां खुल गईं।

     

    दीवारों पर टंगी तस्वीरें हिलने लगीं।

     

    एलिसा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मुझे जाने का रास्ता मिल गया है।”

     

    कमरे में अचानक तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    एलेक्स ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं तो कमरा खाली था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गलियारा भी वापस आ चुका था।

     

    वह तेजी से नीचे आया।

     

    मुख्य दरवाजा इस बार आसानी से खुल गया।

     

    बाहर नोलन और गांव के कुछ लोग खड़े थे।

     

    नोलन घबराकर बोला—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “हां। लेकिन मुझे तुम सबको कुछ बताना है।”

     

    अगले दिन एलेक्स ने पूरी डायरी गांव के बुजुर्गों के सामने रखी।

     

    जैसे-जैसे पन्ने पढ़े गए, एलिसा की पुरानी कहानी सामने आती गई।

     

    गांव के बुजुर्गों ने उस हवेली के बारे में पहली बार सच जाना।

     

    उन्होंने एलिसा के नाम से हवेली के पास एक छोटा-सा स्मारक बनवाया।

     

    उस दिन के बाद हवेली से कभी रोने की आवाज नहीं आई।

     

    लेकिन एलेक्स जब भी उस रास्ते से गुजरता, उसे हवेली की ऊपरी खिड़की में एक हल्की रोशनी दिखाई देती।

     

    एक बार उसने ऊपर देखा।

     

    खिड़की पर एलिसा खड़ी थी।

     

    उसने दूर से हाथ हिलाया।

     

    एलेक्स ने भी हाथ हिला दिया।

     

    अगले ही पल रोशनी गायब हो गई।

     

    उस दिन एलेक्स समझ गया कि हर डरावनी आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएं सिर्फ इसलिए भटकती हैं क्योंकि उनकी अधूरी कहानी कोई सुनने वाला नहीं होता।

     

    और जब सच आखिरकार सामने आ जाता है…

     

    तो सबसे डरावनी आत्मा भी शांति पा सकती है।

  • Dil sabhal ja jara part – 24

    Dil sabhal ja jara part – 24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 24: “नई शुरुआत की राह”

    मुंबई की वो शामें प्रिया के लिए कभी न खत्म होने वाली रातों जैसी लगती थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, लेकिन उन लहरों की आवाज प्रिया को आरव की हंसी की याद दिलाती थी। वो हंसी जो कभी शिमला के ठाकुर हाउस में गूंजती थी। प्रिया बालकनी में खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी फोटो – वो शादी वाली फोटो जहां आरव उसे रिंग पहना रहा था। उसकी आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो दर्द छिपाने की कोशिश में लगाई गई थी, लेकिन आंखों से झलकता दुख उसे धोखा दे रहा था। प्रिया की उंगलियां फोटो पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के चेहरे को छू रही हो। “आरव… कितनी खुश थी मैं उस दिन। तुम्हारी आंखों में वो चमक… वो प्यार। अब वो चमक कहां है? मैं यहां अकेली हूं, और तुम… तुम कहां हो?” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर फोटो पर गिर पड़े।

     

    अंदर से आदित्य पापा की आवाज आई। “प्रिया बेटी… शाम हो गई। अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। एक गहरी सांस ली और मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वो मुस्कान नकली थी, आंखों तक नहीं पहुंच रही थी। वो अंदर आई। लिविंग रूम में आदित्य पापा सोफे पर बैठे थे, चाय का ट्रे रखा था। उनका चेहरा प्रिया को देखकर और उदास हो गया। आदित्य की आंखें प्रिया के थके चेहरे पर टिक गईं – वो आंखें जो एक पिता की तरह दुख महसूस कर रही थीं। “बेटी… आज फिर बालकनी में खड़ी थी? कितना सोचेगी आरव के बारे में? कितना रोएगी?”

     

    प्रिया सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखें नीचे थीं, उंगलियां चाय के मग से खेल रही थीं। “पापा… क्या करूं? आरव… वो हर पल याद आता है। यहां मुंबई में आई हूं, लेकिन दिल शिमला में अटका है। वो ठाकुर हाउस, वो बर्फीली रातें, वो आरव की हंसी… सब मुझे सताता है। मैं भूलना चाहती हूं, लेकिन भूलती नहीं।”

     

    आदित्य ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं – वो लकीरें जो एक पिता के दिल का दर्द बयां कर रही थीं। वो प्रिया के करीब सरके और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो स्पर्श गर्म था, सहारे वाला। “प्रिया… मैं देख रहा हूं तुझे। रोज उदास रहती है। घर में अकेली बैठी, कुछ नहीं करती। बस यादों में खोई रहती है। बेटी, जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए। आरव चला गया, लेकिन तू तो है। तू क्यूं खुद को कैद करके रख रही है? तू कोई जॉब क्यों नहीं कर लेती? बाहर निकल, लोगों से मिल, काम कर। ऐसे घर में अकेली रहोगी तो कभी आरव को भूल नहीं पाओगी।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक जिद थी – वो जिद जो दर्द से पैदा हुई थी। वो मग रखी और आवाज कांपते हुए बोली, “पापा… जॉब? बाहर निकलूं? लेकिन पापा, मैं कहीं भी रहूं तो भी आरव को नहीं भूल सकती हूं। वो मेरी सांसों में है, मेरी हर याद में है। जॉब करूंगी तो क्या? दिन भर काम, लेकिन शाम को घर लौटूंगी तो फिर वही अकेलापन। आरव की यादें मुझे छोड़ेंगी नहीं। मैं भूलना भी नहीं चाहती। वो मेरा प्यार था, मेरा पति था। उसे भूलकर कैसे जिऊं?”

     

    आदित्य का चेहरा और गंभीर हो गया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकी थीं – वो आंखें जो एक पिता का दर्द और समझदारी दोनों बयां कर रही थीं। वो प्रिया का हाथ थामे। “बेटी… मैंने नहीं कहा भूल जा। ठीक है, मत भूलो। आरव को याद रखो। लेकिन क्या तू चाहती है कि आरव तुझे ऐसे उदास देखकर वो भी उदास रहे? क्योंकि आरव जहां भी होगा, तुझे देख रहा होगा। वो तेरी खुशी चाहता था, तेरी मुस्कान। अगर तू ऐसे उदास रही, तो उसकी आत्मा को दुख होगा। तू उसके लिए खुश होने की कोशिश कर। जॉब कर, नई जिंदगी बना। आरव को भूल मत, लेकिन उसके लिए जी।”

     

    प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। वो चुप हो गई। आदित्य की बातें उसके दिल में उतर रही थीं – धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से। उसका चेहरा उदास था, लेकिन अब उसमें एक सोच थी। वो मग उठाई और चाय पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। “पापा… आप सही कहते हैं। आरव… वो मुझे उदास नहीं देखना चाहते होंगे। वो कहते थे – ‘प्रिया, तू स्ट्रॉन्ग है।’ मैं कोशिश करूंगी। लेकिन पापा, आसान नहीं है। हर पल लगता है वो मेरे साथ है।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, आसान नहीं है। लेकिन शुरू कर। मैं तेरे साथ हूं। NGO में आ, काम कर। या कोई और जॉब ढूंढ। बाहर निकल।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में अब एक फैसला था – दर्द भरी, लेकिन मजबूत। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। आरव के लिए।”

     

    उसी समय दरवाजा खुला। रिया अंदर आई। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें सूजी। वो प्रिया के पास बैठी। “प्रिया… क्या बात हो रही है?”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… पापा कह रहे हैं जॉब कर लूं। उदास रहने से बेहतर है।”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था। वो आदित्य की ओर देखी। “हां प्रिया… अंकल सही कह रहे हैं। तू घर में बैठकर क्या करेगी? यादों में डूबकर खुद को तोड़ेगी? आरव भैया… वो चाहते होंगे हम आगे बढ़ें। मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जॉब ढूंढेंगे।”

     

    प्रिया ने रिया की आंखों में देखा। रिया हंस रही थी, लेकिन आंखें नम थीं। “रिया… तू भी उदास है ना? आरव… वो तेरे लिए भी भाई था। तू कहती नहीं, लेकिन मैं जानती हूं। रातों में रोती है ना?”

     

    रिया की आंखों से आंसू गिर पड़े। वो चुप हो गई। फिर बोली, “हां प्रिया… उदास हूं। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई जैसे थे। उनकी मौत… मुझे भी तोड़ गई। मैं हंसती हूं, लेकिन अंदर से खाली हूं। लेकिन मैं तेरे लिए स्ट्रॉन्ग बन रही हूं। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। आदित्य ने उन्हें देखा, उनका दिल भी भर आया। “बेटियों… रोओ नहीं। आगे बढ़ो। आरव की यादें साथ रखो, लेकिन जिंदगी जीओ।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब तय था। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। लेकिन रिया… तू भी। हम साथ करेंगे।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। साथ।”

     

    अगले दिन से प्रिया और रिया जॉब ढूंढने लगीं। प्रिया ने अपना रिज्यूम बनाया – कॉलेज की पढ़ाई, स्कॉलरशिप, NGO का एक्सपीरियंस। वो ऑनलाइन सर्च कर रही थी – टीचिंग जॉब्स, NGO पोजीशंस, काउंसलिंग। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन मन अभी भी आरव में था। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। तेरे लिए।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… ये जॉब देख। मुंबई में एक स्कूल में टीचर की वैकेंसी। तू बच्चों से प्यार करती है।”

     

    प्रिया ने देखा। उसकी आंखें चमकीं – पहली बार। “हां रिया… अप्लाई करती हूं।”

     

    आदित्य ने देखा। वो खुश हुए। “बेटी… अच्छा है। आगे बढ़ रही हो।”

     

     

    लेकिन शाम को प्रिया फिर उदास। बालकनी में खड़ी आरव की फोटो देख रही थी। “आरव… जॉब मिल जाएगी। लेकिन तू नहीं मिलेगा।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… चल, बाहर घूम आएं।”

     

    दोनों बाहर निकलीं। मुंबई की सड़कें – भीड़, लाइट्स। लेकिन प्रिया को आरव की कमी खल रही थी। “आरव… यहां सब भाग रहे हैं। लेकिन मेरा दिल रुका हुआ है।”

     

    धीरे-धीरे प्रिया इंटरव्यू देने लगी। पहला इंटरव्यू – NGO में। वो तैयार हुई – सादे कपड़े, बाल बंधे। इंटरव्यूअर ने पूछा, “आपका एक्सपीरियंस?”

     

    प्रिया ने कहा, “मैंने शिमला में NGO में काम किया। बच्चों को पढ़ाया।” लेकिन उसकी आवाज में दर्द था।

     

    इंटरव्यू के बाद प्रिया रो पड़ी। “रिया… मैं नहीं कर पाऊंगी। हर जगह आरव याद आता है।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… कोशिश कर। आरव चाहते होंगे।”

     

    प्रिया ने फिर कोशिश की। दूसरा इंटरव्यू – स्कूल में। वो बच्चों को देखकर मुस्कुराई – पहली बार सच्ची मुस्कान। “आरव… बच्चों में तुम्हारी हंसी है।”

     

    इंटरव्यूअर ने कहा, “आप सिलेक्टेड हैं।”

     

    प्रिया खुश हुई। लेकिन घर लौटकर रो पड़ी। “आरव… मैं जी रही हूं। लेकिन तेरे बिना।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जीएंगे।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 23

    Dil sabhal ja jara part – 23

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 23 nai jagah ka akela pan 

     

    मुंबई की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। अप्रैल की गर्म हवा प्रिया और रिया के चेहरों पर लगी। शिमला की ठंडक से बिल्कुल उलट – यहां उमस थी, भीड़ थी, शोर था। प्रिया ने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। सफेद सलवार-कमीज पहनी थी – विधवा की तरह नहीं, लेकिन दिल से वो खुद को विधवा ही महसूस कर रही थी। गले में मंगलसूत्र अभी भी था, लेकिन वो अब यादों का बोझ लगता था। रिया उसके बगल में थी – उसका सूटकेस, और प्रिया का सहारा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और प्लेटफॉर्म से बाहर निकलीं।

     

    आदित्य पापा बाहर कार लेकर इंतजार कर रहे थे। उन्हें देखकर प्रिया की आंखें फिर भर आईं। वो दौड़ी और पापा से लिपट गई। “पापा…”

     

    आदित्य ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें भी नम थीं। “बेटी… आ गई। अब सब ठीक होगा।”

     

    रिया ने भी गले लगाया। “अंकल… थैंक्स कि हमें अपनाया।”

     

    कार में बैठे। मुंबई की सड़कें – ट्रैफिक, हॉर्न, ऊंची इमारतें। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसका मन शिमला में था – ठाकुर हाउस में, आरव के साथ। “आरव… तुम कहां हो? मुझे अकेला छोड़कर…”

     

    आदित्य पापा का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – छोटा, लेकिन आरामदायक। दो बेडरूम, बालकनी से समुद्र दिखता था। प्रिया को एक कमरा दिया गया। रिया को दूसरा। सामान रखते वक्त प्रिया ने अपना सूटकेस खोला। अंदर आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – जो एक्सीडेंट में बच गया था। प्रिया ने उसे छुआ और रो पड़ी। “आरव… तुम्हारी खुशबू अभी भी है।”

     

    रिया ने उसे गले लगाया। “प्रिया… रो मत। हम साथ हैं।”

     

    लेकिन रात हुई तो अकेलापन शुरू हो गया। प्रिया अपने कमरे में थी। नई जगह – नई दीवारें, नई छत, नई हवा। लेकिन दिल पुराना था। वो बिस्तर पर लेटी, छत को देख रही थी। आंसू बह रहे थे। “आरव… यहां सब नया है। लेकिन तुम नहीं हो। मुझे तुम्हारी कमी हर पल खल रही है। शिमला में तुम्हारी यादें थीं – वो लॉन जहां हम बर्फ में खेलते थे, वो हवेली जहां हमारा घर बनने वाला था, वो कमरा जहां हमारी पहली रात… लेकिन यहां? यहां सिर्फ अकेलापन है।”

     

    प्रिया उठी। बालकनी में गई। मुंबई की लाइट्स चमक रही थीं, दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। लेकिन प्रिया को शिमला की बर्फ याद आ रही थी। “आरव… याद है? वो रात जब तुमने मुझे प्रपोज किया था। बर्फ गिर रही थी, तुमने रिंग दी। मैं कितनी खुश थी। अब वो रिंग हाथ में है, लेकिन तुम नहीं।” प्रिया ने रिंग को चूमा। आंसू गिर पड़े। वो फर्श पर बैठ गई, घुटने मुंह से लगाए रोने लगी। “आरव… मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई देती है। ‘प्रिया… मेरी जान।’ लेकिन अब वो आवाज सिर्फ याद है।”

     

    रिया कमरे में आई। प्रिया को बालकनी में रोते देखा। वो पास बैठी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी नींद नहीं आ रही। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई थे। उनकी हंसी, उनकी चिढ़ाना… सब याद आता है।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “रिया… यहां सब नया है। लेकिन दिल पुराना दर्द लिए बैठा है। मैं सोचती हूं – आरव अगर होते तो क्या कहते? ‘प्रिया, मुंबई एंजॉय कर। मैं तेरे साथ हूं।’ लेकिन वो नहीं हैं।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन नहीं मान रहा था। वो रात भर जागती रही। आरव की यादें उसे सताती रहीं – वो पहली मुलाकात कॉलेज में, वो डांस पार्टी, वो हवेली की रातें, वो किस, वो गले लगना। “आरव… तुमने कहा था हमारा घर बनेगा। बच्चे होंगे। लेकिन अब? अब सिर्फ मैं हूं। अकेली।”

     

    सुबह हुई। आदित्य पापा NGO ले गए। ‘हृदय सेवा’ – गरीब बच्चों और दिल के मरीजों के लिए। प्रिया ने काम शुरू किया – बच्चों को पढ़ाना, मरीजों से बात करना। लेकिन हर चेहरे में आरव दिखता। एक बच्चा हंसा तो आरव की हंसी याद आई। प्रिया रो पड़ी। आदित्य ने पूछा, “बेटी… क्या हुआ?”

     

    “पापा… सबमें आरव दिखता है।”

     

    आदित्य ने गले लगाया। “समय लगेगा बेटी। लेकिन तू मजबूत है।”

     

    रिया भी NGO में मदद करने लगी। दोनों शाम को घर लौटतीं। मुंबई की भीड़ में खो जातीं, लेकिन अकेलापन नहीं जाता। प्रिया समुद्र किनारे जाती। लहरें देखती। “आरव… शिमला में बर्फ थी, यहां लहरें।

    लेकिन तुम्हारी कमी हर जगह है।”

     

  • नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नंदी की वजह से महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। माता पार्वती पूजा की तैयारी कर रही थीं। गणेश जी पास में बैठे मोदक खा रहे थे और कार्तिकेय जी अपने काम में व्यस्त थे। वहीं नंदी हमेशा की तरह महादेव के पास बैठे उनकी सेवा में लगे थे।

     

    महादेव ध्यान में बैठे थे।

     

    माता पार्वती ने पूजा की सारी तैयारी पूरी की और महादेव को आवाज दी,

     

    “महादेव, पूजा का समय हो गया है।”

     

    महादेव ने आँखें खोलीं।

     

    “अभी आया देवी।”

     

    लेकिन तभी नंदी महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने नंदी को देखा और फिर महादेव की तरफ।

     

    “आप पहले नंदी के साथ बैठेंगे या मेरे साथ पूजा करने आएँगे?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, नंदी तो मेरे पास आए हैं। इन्हें कैसे भेज दूँ?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “जब भी मैं आपको बुलाती हूँ, नंदी बीच में आ जाते हैं।”

     

    नंदी ने यह सुना तो तुरंत उठकर दूसरी तरफ जाने लगे।

     

    महादेव बोले,

     

    “अरे नंदी, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “देखा! मैंने कहा था ना?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    “देवी, नंदी ने तो कुछ किया ही नहीं।”

     

    “इसीलिए तो कह रही हूँ। आप ही उन्हें हर बार बुलाते हैं।”

     

    नंदी चुपचाप खड़े रहे।

     

    गणेश जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने हँसते हुए कहा,

     

    “माता, आज तो नंदी फँस गए।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “बिल्कुल।”

     

    महादेव बोले,

     

    “गणेश, तुम भी अपनी माता का साथ दे रहे हो?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “मैं तो सच का साथ दे रहा हूँ पिता।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    पूजा के बाद माता पार्वती भोजन बनाने चली गईं। उन्होंने सोचा कि आज महादेव को अपने हाथों से भोजन खिलाएँगी। उन्होंने प्रेम से भोजन तैयार किया।

     

    उन्होंने महादेव को बुलाया,

     

    “महादेव, भोजन तैयार है।”

     

    महादेव आने ही वाले थे कि नंदी उनके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नंदी, तुम भी भोजन करना चाहते हो?”

     

    पार्वती जी ने दूर से यह देखा।

     

    “फिर से!”

     

    महादेव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ देवी?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    महादेव समझ गए कि कुछ तो हुआ है।

     

    “देवी, आप नाराज़ हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “जब आप ‘कुछ नहीं’ कहती हैं, तब अक्सर कुछ न कुछ जरूर होता है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको सब पता है फिर भी पूछते हैं।”

     

    महादेव नंदी की ओर देखने लगे।

     

    “क्या नंदी की वजह से?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    नंदी ने तुरंत अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव बोले,

     

    “बेचारे नंदी को क्यों दोष दे रही हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “मैं नंदी को दोष नहीं दे रही। मैं आपको कह रही हूँ।”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको पता है मैंने कितने प्रेम से भोजन बनाया है?”

     

    “हाँ देवी।”

     

    “फिर भी आप नंदी को देखते ही सब भूल जाते हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “ऐसा नहीं है।”

     

    “तो फिर?”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “मैं आपको भी उतना ही महत्व देता हूँ और नंदी को भी।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मुझे नंदी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि आप उनके साथ इतना समय बिताते हैं कि मेरे लिए समय ही नहीं बचता।”

     

    महादेव ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    फिर बोले,

     

    “देवी, आपने कभी सोचा है कि नंदी मेरे लिए क्या हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ, मैं जानती हूँ। वह आपके भक्त हैं, आपके वाहन हैं और आपके बहुत प्रिय हैं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और आप?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं?”

     

    “आप तो मेरे हृदय में हैं।”

     

    पार्वती जी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनकी नाराज़गी थोड़ी कम हो गई।

     

    तभी नंदी धीरे-धीरे उनके पास आए और अपना सिर माता पार्वती के चरणों के पास रख दिया।

     

    पार्वती जी ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “अरे नंदी, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।”

     

    नंदी ने जैसे राहत की साँस ली।

     

    महादेव हँसते हुए बोले,

     

    “देखा नंदी, तुम्हारी माता तुम्हें कितना प्रेम करती हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ, लेकिन तुम मेरी शिकायत महादेव से मत करना।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, नंदी आपकी शिकायत करेंगे भी तो मैं आपकी ही बात मानूँगा।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    नंदी ने महादेव की ओर देखा।

     

    महादेव बोले,

     

    “नंदी, आज से तुम्हें देवी की अनुमति के बिना मुझे कहीं भी ले जाने की जरूरत नहीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “मैंने ऐसा कब कहा कि नंदी आपको कहीं ले जाते हैं?”

     

    महादेव बोले,

     

    “आपने तो कहा था कि वह हर बार बीच में आ जाते हैं।”

     

    “वो तो मैंने मजाक में कहा था।”

     

    “तो फिर मैं भी मजाक कर रहा था।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    लेकिन नंदी अचानक महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “देखिए, फिर आ गए।”

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम आज सच में मेरी परीक्षा ले रहे हो।”

     

    गणेश जी हँसते हुए बोले,

     

    “पिता, नंदी तो कुछ नहीं कर रहे। असली समस्या तो आप दोनों की नोक-झोंक है।”

     

    कार्तिकेय जी भी वहाँ आ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “आज नंदी माता और पिता के बीच फँस गए हैं।”

     

    कार्तिकेय जी हँस पड़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तुम दोनों हँसो मत।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, अब तो पूरा परिवार हमारी बात सुन रहा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तो अच्छी बात है। सबको पता चले कि आप कितने भोले हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और सबको यह भी पता चले कि आप कितनी जल्दी नाराज़ हो जाती हैं।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं जल्दी नाराज़ होती हूँ?”

     

    “हाँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर आज मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने तुरंत कहा,

     

    “देवी, मैंने तो मजाक किया था।”

     

    पार्वती जी दूसरी तरफ देखने लगीं।

     

    गणेश जी ने धीरे से महादेव से कहा,

     

    “पिता, अब आपको ही संभालना होगा।”

     

    महादेव पार्वती जी के पास गए।

     

    “देवी, क्षमा कीजिए।”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “मैंने मजाक किया था।”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, अब तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    नंदी माता पार्वती के पास जाकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी नंदी को देखकर मुस्कुरा दीं।

     

    महादेव बोले,

     

    “देखा, नंदी ने भी मेरी मदद कर दी।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “नंदी अच्छे हैं, इसलिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आप भी बुरे नहीं हैं।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “बस इतना ही?”

     

    “अभी इतना ही।”

     

    फिर माता पार्वती ने नंदी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “नंदी, आज से तुम जब चाहो महादेव के पास आ सकते हो। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    “आपको भी अनुमति है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    उस दिन कैलाश पर एक छोटी-सी बात ने सबको हँसा दिया। नंदी के कारण शुरू हुई नोक-झोंक आखिर में माता पार्वती और महादेव की मुस्कान में बदल गई।

     

    महादेव ने नंदी को प्यार से देखा और बोले,

     

    “नंदी, आज तुम्हारी वजह से मुझे देवी को मनाने का अवसर मिला।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “और मेरी वजह से आपको यह याद रहा कि मुझे समय देना भी जरूरी है।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह बात मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    नंदी ने खुशी से अपना सिर झुका दिया।

     

    और कैलाश पर फिर वही शांति लौट आईजहाँ महादेव का भोला स्वभाव, माता पार्वती की प्यारी नाराज़गी और नंदी की भक्ति मिलकर एक ऐसा परिवार बनाते थे, जहाँ छोटी-सी नोक-झोंक भी अंत में प्रेम की मुस्कान बन जाती थी।

  • Dil sabhal ja jara part – 22

    Dil sabhal ja jara part – 22

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 22: “अंत की शुरुआत”

     

    शिमला का अस्पताल रात के तीन बजे भी जगमगा रहा था। इमरजेंसी वार्ड की लाइट्स कड़क थीं, और हवा में दवाइयों और डिसइन्फेक्टेंट की तेज़ महक फैली थी। प्रिया, रिया, राजेश पापा और आदित्य अंकल हॉस्पिटल के गलियारे में दौड़ते हुए आए थे। प्रिया की लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मंगलसूत्र गले में लटक रहा था, लेकिन चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ कांप रहे थे, आंखें सूजी हुईं। वो रोते हुए चीख रही थी, “आरव… आरव कहां है?”

     

    रिया उसे सहारा दे रही थी। “प्रिया… शांत हो। वो ठीक होगा।”

     

    राजेश पापा डॉक्टर से बात कर रहे थे। डॉक्टर – मिडिल एज, सफेद कोट, थका हुआ चेहरा – ने गहरी सांस ली। “मिस्टर ठाकुर… बहुत अफसोस की बात है। पेशेंट को हम बचा नहीं पाए। एक्सीडेंट बहुत गंभीर था। कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हेड इंजरी, इंटरनल ब्लीडिंग… हमने पूरी कोशिश की, लेकिन…”

     

    प्रिया की चीख गलियारे में गूंज गई। “नहीं! ये झूठ है! आरव… वो मर नहीं सकता! वो मुझसे वादा करके गया था!”

     

    वो डॉक्टर के सामने गिर पड़ी। रिया ने उसे संभाला। राजेश पापा का चेहरा पत्थर हो गया। आदित्य अंकल रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    डॉक्टर ने कहा, “और एक बात… एक्सीडेंट इतना भयानक था कि पेशेंट का चेहरा… पूरी तरह खराब हो गया है। पहचानना मुश्किल है। सिर्फ कपड़ों और कार से हमने कन्फर्म किया। बॉडी… देखना चाहेंगे?”

     

    प्रिया चीखी, “नहीं! मैं नहीं देखूंगी! आरव जिंदा है! वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    लेकिन राजेश पापा ने कहा, “देखना पड़ेगा।”

     

    वे सब मोर्चरी की ओर गए। ठंडी, सफेद जगह। एक बॉडी ट्रॉली पर पड़ी थी, सफेद चादर से ढकी। डॉक्टर ने चादर हटाई। चेहरा… कुचला हुआ, खून से सना, पहचान के बाहर। सिर्फ शेरवानी के टुकड़े, पगड़ी का हिस्सा।

     

    प्रिया ने देखा और बेहोश हो गई। रिया ने पकड़ा। “प्रिया!”

     

    राजेश पापा रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    आदित्य अंकल ने चादर फिर ढकी। “ये आरव है।”

     

    सब रो रहे थे। प्रिया को व्हीलचेयर पर बिठाया गया। वो बुदबुदा रही थी, “आरव… तुम वादा करके गए थे। आज हमारी पहली रात थी। तुम मुझे छोड़कर कैसे चले गए?”

     

    रिया रोते हुए बोली, “प्रिया… संभल। आरव भैया… वो हमें देख रहे होंगे।”

     

    घर लौटे। ठाकुर हाउस अब सूना लग रहा था। प्रिया अपने कमरे में थी – वही कमरा जो कल तक खुशियों से भरा था। अब वो बिस्तर पर लेटी रो रही थी। “आरव… तुम झूठे हो। वादा किया था ना… हमेशा साथ रहने का।”

     

    रिया उसके पास बैठी। “प्रिया… भगवान की मर्जी। लेकिन आरव भैया की आत्मा को शांति मिलेगी अगर तू स्ट्रॉन्ग रहेगी।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… वो कॉल… वो कुछ गलत था। आरव परेशान था। किसी ने बुलाया था उसे।”

     

    राजेश पापा कमरे में आए। “प्रिया बेटी… आरव का फोन मिला है कार में। अनजान कॉल्स थे। पुलिस जांच कर रही है।”

     

    प्रिया उठी। “पापा… ये एक्सीडेंट नहीं। मर्डर है। कोई साजिश है।”

     

    लेकिन सब थके हुए थे। रात गुजर गई। सुबह हुई। अंतिम संस्कार की तैयारियां। प्रिया सफेद साड़ी में। चेहरा सूजा हुआ। वो अर्थी के पास खड़ी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर।”

     

    अग्नि जली। सब रो रहे थे। प्रिया ने चंदन की लकड़ी डाली। “आरव… मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी?”

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल – “क्या सच में आरव था वो? चेहरा… पहचान नहीं हो रही थी।”

     

     

     

    ठाकुर हाउस अब सूना और उदास लग रहा था। वो घर जो कल तक शादी की रौनक से गूंज रहा था, आज मातम में डूबा हुआ था। दीवारों पर अभी भी फूलों की मालाएं लटक रही थीं, लेकिन उनकी खुशबू अब दर्द की तरह चुभ रही थी। हॉल में आरव की बड़ी सी फोटो लगी थी – शादी वाली, मुस्कुराते हुए। उसके सामने अगरबत्ती जल रही थी, और फूल चढ़ाए गए थे। प्रिया सफेद साड़ी में, सिर पर पल्लू, फोटो के सामने बैठी थी। उसकी आंखें सूजी हुईं, चेहरा सफेद, होंठ कांप रहे थे। वो घंटों से वहीं बैठी थी, जैसे कोई प्रतिमा। हाथ में आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – वो जो एक्सीडेंट से बचकर मिला था। वो उसे छाती से लगाए बैठी थी, आंसू लगातार बह रहे थे, लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर। हमारी शादी… हमारी पहली रात… सब अधूरा रह गया।”

     

    रिया उसके पास बैठी थी। उसकी आंखें भी लाल थीं, लेकिन वो खुद को संभाल रही थी – प्रिया के लिए। वो प्रिया का हाथ थामे थी। “प्रिया… कुछ खा ले। कल से कुछ नहीं खाया तूने।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। सिर्फ आंसू। रिया की आंखें भी भर आईं। “आरव भैया… वो हमें देख रहे हैं। वो नहीं चाहेंगे कि तू ऐसे टूट जाए।”

     

    लेकिन प्रिया का दिल मान नहीं रहा था। वो फोटो को देख रही थी। “रिया… वो झूठ बोलकर गया था। कहा था काम का कॉल। लेकिन वो… वो किसी खतरे में गया। और मैं रोक नहीं पाई।”

     

    आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा उदास था, लेकिन आंखों में दृढ़ता। वो प्रिया के पास बैठे। “बेटी… मैं जानता हूं दर्द क्या होता है। रानी को खोया था मैंने। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं। तू मेरे साथ मुंबई चल। वहां नई शुरुआत करेंगे। मैं अकेला हूं, तू अकेली। साथ रहेंगे।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आंखें नम, लेकिन आवाज में कमजोरी। “पापा… मैं यहां से नहीं जा सकती। ये घर… आरव का घर है। यहां उसकी हर याद है। मैं कैसे छोड़ दूं?”

     

    आदित्य अंकल ने उसका कंधा थामा। “बेटी… यादें दिल में रहती हैं। यहां रहकर तू खुद को और दुख देगी। मुंबई में नया जीवन। मैं तेरी देखभाल करूंगा। तू मेरी इकलौती बेटी है।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… मैं टूट गई हूं। आरव के बिना… कुछ नहीं बचा। लेकिन यहां उसकी खुशबू है, उसकी यादें हैं। मैं नहीं जा पाऊंगी।”

     

    राजेश पापा (आरव के पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा बुझा हुआ था। वो प्रिया के सामने बैठे। “प्रिया बेटी… आदित्य जी सही कह रहे हैं। यहां रहकर तू खुद को सजा देगी। आरव नहीं चाहेगा कि तू ऐसे जिए।”

     

    प्रिया ने राजेश पापा की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “पापा… आप भी मुझे छोड़ देंगे? ये घर… आरव का घर। मैं अकेली कैसे रहूंगी?”

     

    राजेश पापा की आंखें भर आईं। वो प्रिया को गले लगा लिया। “बेटी… तू मेरी बेटी है। हमेशा रहेगी। लेकिन आदित्य जी तेरे असली पिता हैं। उनके साथ जा। नई जिंदगी शुरू कर। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”

     

    प्रिया सिसकियां ले रही थी। “पापा… मैं अकेली नहीं जा सकती। रिया… रिया भी मेरे साथ जाएगी। वो भी टूट गई है। आरव उसका भी भाई था। वो बाहर से मजबूत दिखाती है, लेकिन अंदर से… वो भी रो रही है हर रात।”

     

    सबने रिया की ओर देखा। रिया की आंखें नीची थीं। वो चुप थी, लेकिन कंधे कांप रहे थे। राजेश पापा ने रिया के पास जाकर कहा, “रिया बेटी… सच्च है?”

     

    रिया ने सिर उठाया। आंसू बह रहे थे। “पापा… हां। आरव भैया मेरे भी भाई थे। प्रिया की तरह। मैं मजबूत दिखाती हूं, लेकिन अंदर से… सब खाली हो गया।”

     

    राजेश पापा ने रिया को गले लगाया। “बेटी… अगर प्रिया जाना चाहती है तो तू भी जा। दोनों साथ रहोगी। मैं अकेला रह लूंगा। लेकिन तुम्हारी खुशी महत्वपूर्ण है।”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… चल ना। मुंबई। नई शुरुआत। यहां हर कोना आरव की याद दिलाता है। हम साथ रहेंगे।”

     

    रिया ने प्रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “हां प्रिया… चलते हैं। लेकिन दिल यहां रह जाएगा।”

     

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटियां… मैं खुश हूं। मुंबई में हमारा घर तुम्हारा घर है।”

     

    राजेश पापा ने कहा, “ठीक है। पैकिंग शुरू करो। मैं टिकट बुक करवाता हूं।”

     

    प्रिया उठी। कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… मैं जा रही हूं। लेकिन तू मेरे दिल में है। हमेशा।”

     

    रिया ने सामान पैक करना शुरू किया। दोनों साथ थीं। टूटे हुए, लेकिन एक-दूसरे का सहारा।

     

    घर अब और सूना हो गया। राजेश पापा अकेले हॉल में बैठे। आरव की फोटो देख रहे थे। “आरव… प्रिया… माफ करना। मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    प्रिया और रिया मुंबई जाने वाली थीं। नई जिंदगी। लेकिन दिलों में आरव की याद हमेशा रहेगी।