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भाग 3: मोहित के अंदर कौन था?

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

मोहित गलियारे में खड़ा था।

 

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

आरव ने उसे देखते ही कहा—

 

“मोहित… तुम ठीक हो?”

 

मोहित मुस्कुराया।

 

लेकिन वह मुस्कान उसकी नहीं थी।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“मैं मोहित नहीं हूँ।”

 

निखिल पीछे हट गया।

 

“तो फिर कौन हो?”

 

मोहित ने सिर टेढ़ा किया।

 

“तुम्हें सच में नहीं पता?”

 

अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

 

धड़ाम!

 

हवा रुक गई।

 

टॉर्च की रोशनी भी बार-बार झपकने लगी।

 

आरव ने मीरा की तरफ देखा।

 

वह लड़की अब गलियारे के एक कोने में खड़ी काँप रही थी।

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम इसे पहचानती हो?”

 

मीरा ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

“कौन है?”

 

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

 

“वही जिसने मेरे भाई को मारा था।”

 

आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

 

उसने मोहित की तरफ देखा।

 

मोहित अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा था।

 

“तुम लोगों ने सोचा था कि तीसरा कमरा बंद करके सब खत्म हो जाएगा?”

 

उसने हँसते हुए कहा—

 

“दरवाजा सिर्फ कमरे का था।”

 

वह रुका।

 

“लेकिन रास्ता…”

 

उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

 

“…हमेशा इंसान के अंदर होता है।”

 

निखिल ने काँपते हुए पूछा—

 

“मोहित को क्या हुआ है?”

 

मीरा ने कहा—

 

“वह सिर्फ उसका शरीर है।”

 

आरव ने तुरंत मोहित की तरफ कदम बढ़ाया।

 

“मोहित! अगर तुम मेरी आवाज सुन सकते हो तो वापस आओ!”

 

कुछ पल के लिए मोहित का चेहरा बदल गया।

 

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

 

“आरव…”

 

उसकी असली आवाज वापस आ गई।

 

“मुझे बचा…”

 

आरव उसकी तरफ दौड़ा।

 

लेकिन जैसे ही उसने मोहित का हाथ पकड़ा, मोहित ने उसका गला पकड़ लिया।

 

उसकी ताकत अचानक कई गुना बढ़ गई।

 

आरव दीवार से जा टकराया।

 

“आरव!”

 

करण और निखिल ने मोहित को पीछे खींचा।

 

मोहित जोर-जोर से हँसने लगा।

 

“तुम उसे नहीं बचा सकते।”

 

अचानक तीसरे कमरे के अंदर से फिर वही आदमी की आवाज आई—

 

“आरव…”

 

आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।

 

जंजीर अपने आप उठकर दरवाजे पर लिपट गई।

 

फिर दरवाजे के बीच एक छोटी-सी दरार दिखाई दी।

 

उस दरार के पीछे एक चेहरा था।

 

आरव का चेहरा।

 

वह चेहरा अंदर से उसे देख रहा था।

 

आरव की साँस रुक गई।

 

“ये… मैं हूँ?”

 

मीरा ने कहा—

 

“नहीं।”

 

“तो कौन?”

 

“तुम्हारा भाई।”

 

आरव को अचानक अपने बचपन की एक धुंधली याद आई।

 

एक पुराना घर।

 

एक छोटी लड़की।

 

एक लड़का।

 

और एक आदमी…

 

जो किसी बच्चे को घसीटते हुए तीसरे कमरे की तरफ ले जा रहा था।

 

आरव ने सिर पकड़ लिया।

 

“मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”

 

मीरा ने कहा—

 

“क्योंकि तुम्हें याद नहीं रहने दिया गया।”

 

“किसने?”

 

मीरा ने धीरे से उस कमरे की तरफ इशारा किया।

 

“उसने।”

 

तभी हवेली की दीवारों से बच्चों के रोने की आवाज आने लगी।

 

एक नहीं।

 

दर्जनों।

 

आरव ने चारों तरफ देखा।

 

दीवारों पर लगे पुराने चित्र बदलने लगे।

 

हर चित्र में वही परिवार दिखाई दे रहा था।

 

लेकिन हर तस्वीर में लड़की मीरा थी।

 

और उसके बगल में खड़ा लड़का…

 

हर तस्वीर में थोड़ा बड़ा होता जा रहा था।

 

फिर आखिरी तस्वीर में लड़का जवान था।

 

उसका चेहरा आरव जैसा था।

 

आरव पीछे हट गया।

 

“मैं… यहाँ पहले आ चुका हूँ।”

 

मीरा ने कहा—

 

“हाँ।”

 

“कब?”

 

“पैंतीस साल पहले।”

 

आरव की आँखें फैल गईं।

 

“लेकिन मैं तो…”

 

मीरा ने कहा—

 

“तुम्हारा शरीर आज का है।”

 

वह कुछ पल रुकी।

 

“लेकिन तुम्हारी कहानी बहुत पुरानी है।”

 

अचानक मोहित जमीन पर गिर गया।

 

उसकी काली आँखें सामान्य होने लगीं।

 

वह जोर-जोर से साँस लेने लगा।

 

“आरव…”

 

“क्या?”

 

मोहित ने काँपते हुए कहा—

 

“मैंने अंदर देखा है।”

 

“क्या?”

 

“उस कमरे में…”

 

उसने दरवाजे की तरफ देखा।

 

“एक आईना है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो?”

 

मोहित की आवाज धीमी हो गई।

 

“उस आईने में हम चार नहीं…”

 

वह रुक गया।

 

“हमारे पीछे सैकड़ों लोग खड़े हैं।”

 

उसी समय गलियारे के आखिर में एक बड़ा आईना दिखाई दिया।

 

जो कुछ सेकंड पहले वहाँ नहीं था।

 

चारों धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

 

आईने में उनकी परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

 

आरव।

 

निखिल।

 

करण।

 

मोहित।

 

लेकिन उनके पीछे…

 

मीरा नहीं थी।

 

उसकी जगह एक लंबा आदमी खड़ा था।

 

वह धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

 

फिर उसने आईने के अंदर से अपना हाथ उठाया।

 

और काँच पर उंगली से लिखा—

 

“आरव, तुम्हें अपनी माँ से एक सवाल पूछना है।”

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“क्या सवाल?”

 

आईने पर अगली लाइन अपने आप लिखी गई—

 

“तुम्हारा जन्मदिन किस दिन है?”

 

आरव चुप हो गया।

 

उसे अचानक एहसास हुआ…

 

उसे अपना जन्मदिन याद ही नहीं था।

 

और उसी क्षण…

 

तीसरे कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया।

 

अंदर से किसी बच्चे की आवाज आई—

 

“भैया… घर चलो।”

 

आरव ने उस अंधेरे कमरे की तरफ देखा।

 

और पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद…

 

वह इस हवेली में भटककर नहीं आया था।

 

उसे यहाँ बुलाया गया था।

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