आरव दीवार के सामने खड़ा रह गया।
उसके हाथ में टॉर्च काँप रही थी।
दीवार पर लिखा था—
“अब तुम पाँच हो।”
निखिल, करण और मोहित उसके पीछे खड़े थे।
चारों ने एक-दूसरे को देखा।
मोहित की आवाज काँप रही थी।
“हम तो चार हैं…”
करण ने तुरंत गिनती की।
“आरव… निखिल… मोहित… मैं।”
चार।
फिर उसने पीछे देखा।
गलियारा खाली था।
लेकिन उसी समय तीसरे कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज आई।
“भैया…”
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
“ये हमें डराने की कोशिश कर रही है।”
निखिल ने कहा—
“लेकिन सीढ़ियाँ कहाँ गईं?”
किसी के पास जवाब नहीं था।
वे जिस रास्ते से ऊपर आए थे, वहाँ अब एक काली दीवार खड़ी थी।
आरव ने दीवार को हाथ लगाया।
वह पत्थर की तरह ठंडी थी।
“पीछे हटो।”
उसने लोहे की टॉर्च से दीवार पर वार किया।
ठक!
दीवार पर कोई निशान नहीं पड़ा।
तभी पीछे से किसी ने धीरे से कहा—
“सीढ़ियाँ तुम्हें जाने नहीं देंगी।”
चारों एक साथ पलटे।
गलियारे के आखिर में वही छोटी लड़की खड़ी थी, जिसे उन्होंने आईने में देखा था।
इस बार वह सच में वहाँ थी।
उसने सफेद रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी।
उसके लंबे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।
आरव ने धीरे से पूछा—
“तुम कौन हो?”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह तीसरे कमरे की तरफ देखने लगी।
फिर उसने अपना हाथ उठाकर इशारा किया।
“उसके अंदर मत जाना।”
मोहित ने पूछा—
“कौन है अंदर?”
लड़की ने उसकी तरफ देखा।
“वो…”
कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा—
“जो मेरा पिता बनकर घूमता है।”
चारों के चेहरे पर डर उतर आया।
आरव ने पूछा—
“तुम्हारे पिता कौन थे?”
लड़की ने धीरे से कहा—
“इस हवेली के मालिक।”
“और उन्होंने तुम्हें कमरे में बंद किया था?”
लड़की ने सिर हिलाया।
“उन्होंने मुझे नहीं बंद किया।”
“फिर?”
लड़की ने तीसरे कमरे की तरफ देखा।
“उसने किया था।”
अचानक कमरे के अंदर से किसी आदमी की आवाज आई—
“झूठ बोल रही है।”
लड़की डरकर पीछे हट गई।
दरवाजे की जंजीर अपने आप हिलने लगी।
छन्न… छन्न…
आरव ने देखा कि जंजीर धीरे-धीरे खुल रही थी।
निखिल ने कहा—
“भागो!”
लेकिन लड़की ने जोर से चिल्लाया—
“रुको!”
जंजीर अचानक जमीन पर गिर गई।
तीसरे कमरे का दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया।
अंदर से घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।
और उस अंधेरे के बीच…
एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
आरव ने टॉर्च उसकी तरफ की।
आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा देखकर चारों के मुँह से चीख निकल गई।
चेहरा इंसान जैसा था…
लेकिन आँखें नहीं थीं।
जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काली त्वचा थी।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“अंदर आओ।”
आरव पीछे हट गया।
आदमी ने फिर कहा—
“तुम चार नहीं हो।”
उसकी आवाज पूरे गलियारे में गूँजने लगी।
“तुम पाँच हो।”
मोहित ने डरते हुए पूछा—
“पाँचवाँ कौन है?”
वह आदमी हँसने लगा।
फिर उसने उंगली आरव की तरफ कर दी।
“वही।”
आरव ने पीछे देखा।
उसके पीछे कोई नहीं था।
“मैं?”
आदमी ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे अंदर पाँचवाँ पहले से है।”
अचानक आरव को सिर में तेज दर्द हुआ।
उसे चक्कर आने लगे।
उसके कानों में फुसफुसाहट सुनाई दी—
“मुझे याद करो…”
आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।
और तभी उसे एक दृश्य दिखाई दिया।
एक छोटी बच्ची हवेली के आँगन में खेल रही थी।
उसके साथ एक लड़का भी था।
लड़के का चेहरा आरव जैसा था।
आरव डरकर जमीन पर बैठ गया।
“ये क्या है?”
लड़की उसके पास आई।
उसने पहली बार अपना नाम बताया।
“मेरा नाम मीरा है।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“और वो लड़का?”
मीरा ने कहा—
“वो मेरा भाई था।”
आरव ने पूछा—
“कहाँ है वो?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे अंदर।”
अचानक हवेली में जोर की घंटी बजने लगी।
टन… टन… टन…
कमरे के अंदर बैठा वह बिना आँखों वाला आदमी खड़ा हो गया।
“अब समय आ गया है।”
मीरा चिल्लाई—
“आरव! दरवाजा बंद करो!”
आरव ने पूरी ताकत से तीसरे कमरे का दरवाजा बंद करने की कोशिश की।
लेकिन उस आदमी ने अंदर से दरवाजा पकड़ लिया।
उसकी ताकत बहुत ज्यादा थी।
करण और निखिल भी आरव की मदद करने लगे।
मोहित पीछे खड़ा काँप रहा था।
तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा।
मोहित ने सोचा कि शायद करण है।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—
“पाँचवाँ मिल गया…”
मोहित की आँखें फैल गईं।
उधर आरव ने दरवाजा पूरी ताकत से बंद कर दिया।
तीसरा कमरा बंद हो गया।
कुछ सेकंड तक सब शांत रहा।
फिर मोहित की चीख सुनाई दी।
तीनों ने पलटकर देखा।
मोहित गलियारे के आखिरी कोने में खड़ा था।
उसकी आँखें बंद थीं।
और वह मुस्कुरा रहा था।
आरव ने पूछा—
“मोहित?”
मोहित ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
लेकिन उसकी आँखों का रंग बदल चुका था।
वे पूरी तरह काली थीं।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“तुम लोगों ने गलत दरवाजा बंद किया है।”
फिर पीछे की दीवार से आवाज आई—
ठक… ठक… ठक…
और इस बार आवाज तीसरे कमरे से नहीं…
उनके पीछे से आ रही थी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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