तीसरे कमरे का दरवाजा खुल चुका था।
आरव कुछ कदम दूर खड़ा था।
अंदर घना अंधेरा था।
मोहित, निखिल और करण उसके पीछे खड़े थे।
मीरा दरवाजे के पास जाकर रुक गई।
उसने धीरे से कहा—
“आरव… अगर तुम अंदर गए, तो तुम्हें सब याद आ जाएगा।”
आरव ने पूछा—
“और अगर नहीं गया?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“तो वह हमेशा तुम्हारे अंदर रहेगा।”
आरव ने हिम्मत जुटाई और कमरे के अंदर कदम रख दिया।
जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
“आरव!”
बाहर से निखिल की आवाज आई।
लेकिन आरव जवाब नहीं दे पाया।
कमरे के अंदर सिर्फ एक पुराना आईना था।
आईने के सामने एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
आरव धीरे-धीरे आईने के पास गया।
उसने उसमें अपना चेहरा देखा।
लेकिन कुछ गलत था।
आईने में आरव नहीं था।
वहाँ एक दस साल का बच्चा खड़ा था।
बच्चा रो रहा था।
उसके सामने वही छोटी लड़की मीरा खड़ी थी।
और पीछे एक आदमी हाथ में लालटेन लिए खड़ा था।
आरव ने आईने को छुआ।
अचानक उसकी आँखों के सामने पुरानी यादें घूमने लगीं।
वह बच्चा सच में आरव था।
पैंतीस साल पहले वह इस हवेली में आया था।
उसकी माँ इस हवेली में काम करती थी।
आरव तब सिर्फ दस साल का था।
मीरा उसी हवेली के मालिक की बेटी थी।
दोनों दोस्त बन गए थे।
लेकिन हवेली का मालिक एक अजीब आदमी था।
वह रात में तीसरे कमरे में जाकर घंटों किसी से बातें करता था।
एक दिन आरव ने चुपके से उसका पीछा किया।
उसने कमरे के अंदर एक आईना देखा।
आईने के सामने मालिक खड़ा होकर कह रहा था—
“मुझे और समय चाहिए।”
आईने के अंदर से किसी ने जवाब दिया—
“बदले में क्या दोगे?”
मालिक ने कहा—
“एक आत्मा।”
उसी समय आरव ने आवाज कर दी।
मालिक ने उसे पकड़ लिया।
मीरा भी वहाँ पहुँच गई।
मालिक ने दोनों बच्चों को कमरे में बंद कर दिया।
फिर आईने के सामने खड़े होकर बोला—
“एक को मैं दूँगा…”
मीरा ने आरव को धक्का देकर पीछे किया।
“भागो!”
लेकिन तभी आईने के अंदर से काला हाथ बाहर निकला।
उसने मीरा को पकड़ लिया।
मीरा चीखती रही।
आरव उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन मालिक ने आरव के सिर पर वार कर दिया।
आरव जमीन पर गिर गया।
उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा।
सुबह गाँव वालों ने उसे हवेली के बाहर पाया।
उसे कुछ भी याद नहीं था।
लेकिन मीरा कभी नहीं मिली।
आरव ने आईने से हाथ हटाया।
उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।
“मीरा…”
पीछे से आवाज आई—
“हाँ।”
आरव ने पलटकर देखा।
मीरा खड़ी थी।
“तुम मर गई थीं?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मैं उस दिन नहीं मरी थी।”
“फिर?”
“उस आईने ने मुझे अपने अंदर कैद कर लिया।”
आरव ने पूछा—
“और वह आदमी?”
मीरा का चेहरा अचानक डर से भर गया।
“वह भी मरा नहीं था।”
कमरे की छत से भारी आवाज आई—
“मैं कभी गया ही नहीं।”
आरव ने ऊपर देखा।
एक काली परछाईं छत से नीचे उतर रही थी।
धीरे-धीरे वह एक आदमी का रूप लेने लगी।
वही हवेली का मालिक।
उसका चेहरा सड़ा हुआ था।
आँखों की जगह दो काले गड्ढे थे।
उसने कहा—
“तुम वापस आ ही गए।”
आरव पीछे हट गया।
“तुमने मुझे क्यों बुलाया?”
वह हँसा।
“क्योंकि अधूरा सौदा पूरा होना बाकी था।”
“कौन सा सौदा?”
उसने आईने की तरफ देखा।
“तुम्हारी आत्मा के बदले मेरी आजादी।”
आरव ने पूछा—
“अगर मैं मना कर दूँ?”
उसने मुस्कुराकर कहा—
“तो तुम्हारे दोस्त बारी-बारी से मेरे साथ रहेंगे।”
अचानक कमरे के बाहर से करण की चीख सुनाई दी।
“आरव!”
फिर निखिल की आवाज आई—
“भागो!”
आरव दरवाजे की तरफ दौड़ा।
लेकिन दरवाजा बंद था।
मीरा ने कहा—
“आईना तोड़ दो!”
आरव ने पास रखी लोहे की कुर्सी उठाई।
पूरी ताकत से आईने पर मारी।
छन्न्न्न!
आईना टूट गया।
लेकिन उसके टूटते ही कमरे में सैकड़ों आवाजें गूँज उठीं।
“बचाओ…”
“हमें बाहर निकालो…”
“हमें जाने दो…”
काले मालिक की परछाईं चीखने लगी।
“नहीं!”
आईने के टुकड़ों से धुआँ निकलने लगा।
मीरा ने आरव का हाथ पकड़ा।
“भागो!”
दरवाजा अपने आप खुल गया।
आरव बाहर दौड़ा।
लेकिन गलियारा खाली था।
निखिल और करण जमीन पर बेहोश पड़े थे।
मोहित गायब था।
आरव ने चारों तरफ देखा।
फिर उसे दूर से मोहित की आवाज सुनाई दी—
“आरव…”
वह आवाज हवेली की सबसे ऊपरी मंजिल से आ रही थी।
और उसके साथ एक दूसरी आवाज भी थी—
“अब आखिरी आत्मा मेरी होगी।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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