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  • हिमालय की शान भोले बाबा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    हिमालय का रखवाला भोले बाबा

     

    हिमालय की ऊंची पहाड़ियों के बीच एक गांव था शिवधाम। गांव छोटा था, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की आस्था बहुत बड़ी थी। गांव के चारों तरफ बर्फीले पहाड़ थे और सबसे ऊंची चोटी के पास एक पुराना शिव मंदिर था।

     

    लोग मानते थे कि उस मंदिर में विराजमान भोलेनाथ ही पूरे हिमालय की रक्षा करते हैं।

     

    मंदिर के बारे में एक पुरानी बात भी कही जाती थी।

     

    जब तक मंदिर की घंटी अपने आप बजती रहेगी, तब तक गांव पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा।

     

    लेकिन पिछले कुछ दिनों से मंदिर की घंटी बिल्कुल शांत थी।

     

    गांव का बूढ़ा पुजारी देवदत्त इस बात को लेकर परेशान था।

     

    एक सुबह गांव के कुछ लोग मंदिर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मंदिर के आसपास की बर्फ पर अजीब से पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    देवदत्त ने निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “ये इंसान के पैरों के निशान नहीं हैं,” उसने धीमे से कहा।

     

    गांव का मुखिया बोला, “फिर किसके हैं?”

     

    देवदत्त ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस शिवलिंग की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए।

     

    उसी दिन गांव में एक और अजीब घटना हुई।

     

    गांव की सबसे पुरानी नदी अचानक बहुत कम हो गई।

     

    लोग घबरा गए।

     

    अगर नदी का पानी इसी तरह कम होता रहा तो गांव में पीने के पानी की भी समस्या हो सकती थी।

     

    मुखिया ने गांव वालों की बैठक बुलाई।

     

    एक आदमी बोला, “हमें नीचे वाले गांव में जाकर पानी मांगना पड़ेगा।”

     

    दूसरा बोला, “लेकिन वहां तक जाने वाला रास्ता तो बर्फ से बंद है।”

     

    तभी एक बूढ़ी महिला ने कहा, “ये सब सामान्य नहीं है। जरूर हिमालय हमसे नाराज है।”

     

    देवदत्त ने उसकी बात सुनकर कहा, “हिमालय नाराज नहीं होता। लेकिन प्रकृति हमें चेतावनी जरूर देती है।”

     

    उसी रात देवदत्त मंदिर में अकेला बैठा था।

     

    उसने दीपक जलाया और शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “भोलेनाथ, अगर कोई संकट आने वाला है तो मुझे संकेत दीजिए।”

     

    कुछ देर तक मंदिर में बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर अचानक मंदिर की घंटी हिली।

     

    देवदत्त ने सिर उठाया।

     

    घंटी एक बार बजी।

     

    फिर दूसरी बार।

     

    और फिर तीसरी बार।

     

    देवदत्त की आंखों में चिंता उतर आई।

     

    वह तुरंत मंदिर से बाहर निकला।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था।

     

    हवा भी नहीं चल रही थी।

     

    फिर घंटी कैसे बज रही थी?

     

    अचानक उसे दूर पहाड़ की तरफ एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

     

    देवदत्त उस दिशा में बढ़ने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह आगे गया, रोशनी साफ होती गई।

     

    वहां एक साधु चट्टान पर बैठा था।

     

    लंबे बाल, माथे पर भस्म और गले में रुद्राक्ष।

     

    देवदत्त ने हाथ जोड़कर पूछा, “महाराज, आप इतनी रात में यहां?”

     

    साधु ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया।

     

    “जिसे हिमालय बुलाता है, वह रात-दिन नहीं देखता।”

     

    देवदत्त चौंक गया।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    साधु ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस सामने की पहाड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “कल सूरज निकलने से पहले गांव के लोगों को ऊंची जगह पहुंचा देना।”

     

    देवदत्त घबरा गया।

     

    “क्यों? क्या होने वाला है?”

     

    साधु ने कहा, “पहाड़ कभी बिना कारण शांत नहीं होता।”

     

    इतना कहकर साधु उठ खड़ा हुआ।

     

    देवदत्त ने दो कदम आगे बढ़कर उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    अगली सुबह देवदत्त ने गांव वालों को सारी बात बताई।

     

    कुछ लोगों ने उसकी बात पर विश्वास किया, कुछ ने मजाक उड़ाया।

     

    मुखिया ने कहा, “बाबा, हम बिना वजह गांव छोड़कर कहां जाएंगे?”

     

    देवदत्त बोला, “मैं नहीं जानता वह साधु कौन था। लेकिन उसकी बात में मुझे भरोसा है।”

     

    गांव के लोग आखिरकार मंदिर के पास वाली ऊंची जगह पर जाने लगे।

     

    कुछ लोग अपने घर छोड़ने को तैयार नहीं थे।

     

    तभी दोपहर के समय पहाड़ के अंदर से जोरदार आवाज आई।

     

    धरती हिलने लगी।

     

    लोग घबरा गए।

     

    ऊपर की बर्फ खिसकने लगी।

     

    देवदत्त चिल्लाया, “सब लोग पीछे हटो!”

     

    कुछ ही पलों में पहाड़ की एक बड़ी चट्टान टूटकर नीचे गिरी।

     

    उसके साथ बर्फ का तेज बहाव भी नीचे आने लगा।

     

    गांव वाले चीखने लगे।

     

    लेकिन जिस दिशा में बर्फ बढ़ रही थी, वहां अब कोई इंसान नहीं था।

     

    गांव बच गया।

     

    कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

     

    लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    मुखिया की आंखों में पछतावा था।

     

    वह देवदत्त के पास आया और बोला, “आप सही थे।”

     

    देवदत्त ने कहा, “मैं सही नहीं था। भोलेनाथ ने हमें पहले ही सावधान कर दिया था।”

     

    सभी लोग मंदिर की तरफ चल पड़े।

     

    लेकिन वहां पहुंचकर वे हैरान रह गए।

     

    मंदिर की बंद घंटी लगातार बज रही थी।

     

    कोई उसे छू भी नहीं रहा था।

     

    मुखिया ने हाथ जोड़कर कहा, “भोले बाबा, आपने आज हमारे गांव को बचा लिया।”

     

    तभी मंदिर के पीछे से एक छोटी बच्ची की आवाज आई।

     

    “पंडित जी!”

     

    देवदत्त ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वही बच्ची एक पत्थर के पास खड़ी थी।

     

    उसने वहां से एक छोटी-सी त्रिशूल जैसी लकड़ी उठाई थी।

     

    उस पर ताजा बेलपत्र रखा था।

     

    देवदत्त ने उसे देखते ही आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे रात वाला साधु याद आ गया।

     

    वह धीरे से बोला, “वो आए थे…”

     

    मुखिया ने पूछा, “कौन?”

     

    देवदत्त ने शिवलिंग की तरफ देखते हुए कहा

    “हमारे भोले बाबा।”

     

    सभी लोग चुप हो गए।

     

    उसी समय मंदिर के दीपक की लौ अचानक तेज हो गई। किसी ने उसे छुआ नहीं था। मंदिर के भीतर हल्की-सी सुगंध फैल गई और बाहर खड़े लोगों को ऐसा लगा जैसे पहाड़ों के बीच से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा हो“डरो मत।”

     

    गांव की बूढ़ी महिला की आंखों से आंसू निकल आए। उसने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा ने हमें सिर्फ बचाया नहीं, हमें समझाया भी है कि प्रकृति का सम्मान करना ही उनकी पूजा है।”

     

    उस दिन से गांव वालों ने नदी और पहाड़ों को गंदा करना छोड़ दिया। वे जरूरत से ज्यादा पेड़ काटने से भी बचने लगे। हर परिवार ने मिलकर मंदिर के आसपास सफाई रखनी शुरू कर दी।

     

    किसी ने उस साधु को दोबारा नहीं देखा।

     

    लेकिन उसके बाद गांव में जब भी कोई बड़ा संकट आता, मंदिर की घंटी अपने आप बज उठती।

     

    और गांव के लोग समझ जाते कि हिमालय का रखवाला उन्हें सावधान कर रहा है।

     

    देवदत्त अक्सर बच्चों से कहता था

     

    “भोलेनाथ हमेशा चमत्कार दिखाकर रक्षा नहीं करते। कभी संकेत देकर, कभी किसी इंसान के रूप में और कभी हमारी अपनी समझ के जरिए हमें बचाते हैं।”

     

    फिर वह मंदिर की तरफ देखकर मुस्कुराता और कहता

     

    “हिमालय कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसकी सबसे बड़ी शान उसकी बर्फीली चोटियां नहीं… बल्कि उन चोटियों पर विराजमान हमारे भोले बाबा हैं।”

     

    और हर शाम पूरे गांव में एक ही आवाज गूंजती

    “हर हर महादेव!”

  • Dil sabhal ja jara part – 21

    Dil sabhal ja jara part – 21

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part- 21: “टूटते रिश्ते का दर्द”

    आरव ठाकुर हाउस के गलियारे में तेज़ कदमों से चल रहा था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगता था छाती से बाहर निकल आएगी। वो कॉल… वो लिफाफा… वो शब्द – “प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।” उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहे थे। वो आदमी कौन था? वो चेहरा… वो आवाज… सब धुंधला था। लेकिन शब्द साफ थे, जैसे चाकू की धार। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया था, हाथ कांप रहे थे। वो सीढ़ियां उतरते हुए खुद से बुदबुदाया, “ये नहीं हो सकता। झूठ है। सब झूठ। प्रिया… मेरी प्रिया… मेरी पत्नी। वो मेरी बहन नहीं हो सकती।”

    लेकिन वो लेटर… वो फोटो… सब कुछ इतना असली लग रहा था। आरव कार की ओर बढ़ा। बाहर रात का सन्नाटा था, बर्फ हल्की-हल्की गिर रही थी, जैसे आसमान भी उसके दर्द पर रो रहा हो। वो कार में बैठा, इंजन स्टार्ट किया। दिमाग में तूफान था। “अगर ये सच है तो… हमारी शादी… हमारा प्यार… सब गलत। मैंने क्या कर दिया? प्रिया… वो निर्दोष है। वो नहीं जानती। मैं उसे कैसे बताऊं? कैसे सहूं?”

    आरव ने कार तेज़ चलाई। सड़कें खाली थीं, शिमला की पहाड़ी रोड्स पर बर्फ की पतली परत थी, जो गाड़ी के टायरों से चिपक रही थी। वो स्पीड बढ़ाता गया – 60, 80, 100। हवा कान में सीटी बजा रही थी। उसके दिमाग में फ्लैशबैक्स आने लगे। बचपन की वो शामें, जब प्रिया छोटी सी थी। “भैया… मुझे गोद लो ना!” वो हंसती, दौड़ती। आरव उसे उठाता, घुमाता। “प्रिया, तू मेरी छोटी राजकुमारी है।” फिर वो रात – एक्सीडेंट की खबर। “प्रिया लापता है।” सालों का दर्द, इंतजार। फिर प्रिया की वापसी। “आरव… मैं तेरी बहन हूं?” नहीं, वो राज़ खुला – खून का रिश्ता नहीं। फिर प्यार… वो किस, वो स्पर्श, वो रातें। “प्रिया… तू मेरी है।” लेकिन अब? “अगर वो मेरी असली बहन है तो… मैंने क्या कर दिया? हमने क्या कर दिया?”

    आरव की आंखें नम हो गईं। वो चीखा, “नहीं! ये झूठ है!” कार और तेज़। पहाड़ी मोड़ आ रहा था, लेकिन वो ब्रेक नहीं लगाया। दिमाग में सिर्फ एक सवाल – “क्या करूं? प्रिया से कहूं? या चुप रहूं? शादी हो गई। वो मेरी पत्नी है। लेकिन अगर सच है तो… गलत है। पाप है। मैं उसे दुख नहीं दे सकता। खुद को मार लूं? या भाग जाऊं?” वो रो रहा था। आंसू गालों पर बह रहे थे, कार की विंडस्क्रीन धुंधली हो रही थी। “प्रिया… सॉरी। मैं तुझे खुश रखना चाहता था। लेकिन अब…”

    वहीं कमरे में प्रिया बिस्तर पर बैठी थी। लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मेहंदी की खुशबू कमरे में फैली हुई थी। वो इंतजार कर रही थी – आरव का। उसका दिल उछल रहा था। “आरव… जल्दी आओ ना। आज हमारी पहली रात है।” लेकिन समय गुजर रहा था। घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी। प्रिया का मन घबरा रहा था। “क्यों इतनी देर? वो कॉल… कौन था? आरव का चेहरा… कुछ गलत लग रहा था।” वो उठी, खिड़की के पास गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। दिल में एक अजीब सी बेचैनी। “कुछ गलत होने वाला है। मुझे पता है। आरव… कहां हो तुम?”

    प्रिया ने फोन उठाया। आरव को कॉल किया। रिंग जा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। “आरव… पिक करो ना।” बेचैनी बढ़ गई। वो कमरे में चक्कर लगाने लगी। मंगलसूत्र को छू रही थी। “आरव… तुम ठीक हो ना? वो कॉल… काम का था? लेकिन इतनी रात को कौन काम?” मन में बुरे ख्याल आने लगे। “कहीं कोई खतरा तो नहीं? विक्रम? या कोई और?” प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो दरवाजे की ओर गई। “आरव… जल्दी आओ। मुझे डर लग रहा है।”

    आरव की कार अब पहाड़ी रोड पर थी। स्पीड 120। मोड़ आया। वो ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन दिमाग कहीं और था। “प्रिया… अगर सच है तो मैं उसे देख नहीं सकता। मैं खुद को सजा दूंगा।” कार स्लिप हुई। बर्फ की वजह से। वो स्टियरिंग संभालने की कोशिश की, लेकिन देर हो गई। कार सड़क से उतरी, पेड़ से टकराई। धमाका। कांच टूटा, कार पलटी। आरव का सिर स्टीयरिंग से टकराया। खून बहने लगा। दर्द। अंधेरा। “प्रिया… सॉरी…”

    प्रिया कमरे में थी। फोन फिर बजाया। कोई जवाब नहीं। दिल जोरों से धड़क रहा था। “आरव… कुछ गलत हुआ है। मुझे पता है।” वो बाहर निकली। रिया के कमरे में गई। “रिया… उठ। आरव… वो कहीं गया है।”

    रिया उठी। “क्या? कहां?”

    प्रिया रो रही थी। “पता नहीं। एक कॉल आया था। उसके बाद चला गया। फोन नहीं उठा रहा।”

    रिया ने कहा, “चल, पापा को बताते हैं।”

    लेकिन तभी फोन आया। हॉस्पिटल से। “आरव ठाकुर का एक्सीडेंट हो गया है। जल्दी आएं।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। “आरव…”

     

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भक्त के सामने महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। चारों तरफ शांति थी। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। नंदी थोड़ी दूरी पर बैठे थे और गणेश जी अपने काम में व्यस्त थे।

     

    तभी कैलाश की ओर एक गरीब भक्त आया। उसका नाम माधव था। वह बहुत दूर एक छोटे से गाँव से पैदल चलकर आया था। उसके कपड़े साधारण थे और हाथ में फूलों की छोटी-सी गठरी थी।

     

    माधव कैलाश के पास पहुँचकर हाथ जोड़कर बोला,

     

    “हे महादेव, मैं आपके दर्शन करने आया हूँ। मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है, बस ये फूल हैं।”

     

    वह आगे बढ़ा और फूल महादेव के चरणों में रख दिए।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और प्रेम से उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारे फूल नहीं, तुम्हारी श्रद्धा हमारे लिए मूल्यवान है।”

     

    माधव की आँखें भर आईं।

     

    “प्रभु, मुझे लगा था कि मेरे जैसे गरीब आदमी की भेंट शायद आपको पसंद नहीं आएगी।”

     

    तभी माता पार्वती मुस्कुराते हुए बोलीं,

     

    “महादेव को भेंट की कीमत नहीं, मन की सच्चाई दिखाई देती है।”

     

    माधव ने माता पार्वती को प्रणाम किया।

     

    “माता, मुझे आशीर्वाद दीजिए।”

     

    “सदा प्रसन्न रहो।”

     

    माधव वहीं बैठ गया। वह कुछ देर महादेव और माता पार्वती को देखता रहा।

     

    तभी माता पार्वती ने महादेव की ओर देखा।

     

    “महादेव, आपने आज सुबह कुछ खाया?”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “फिर से नहीं खाया?”

     

    “ध्यान में समय का पता नहीं चला।”

     

    “आपको ध्यान के अलावा कुछ याद भी रहता है?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    माधव यह देखकर थोड़ा हैरान हुआ।

     

    उसे लगा था कि कैलाश पर सब कुछ बहुत गंभीर और दिव्य होगा, लेकिन यहाँ तो माता पार्वती महादेव को उसी तरह डाँट रही थीं जैसे घर में कोई अपने बहुत करीबी को डाँटता है।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैंने सुबह ही कहा था कि समय पर भोजन कर लीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, अभी तो समय है।”

     

    “आपके लिए हर समय ‘अभी तो समय है’ होता है।”

     

    नंदी ने अपना सिर नीचे कर लिया ताकि उनकी हँसी दिखाई न दे।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम हँस रहे हो?”

     

    नंदी तुरंत सीधा बैठ गया।

     

    माधव से रहा नहीं गया। वह हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी ने उसे देख लिया।

     

    “माधव, तुम भी हँस रहे हो?”

     

    माधव घबरा गया।

     

    “नहीं माता… मैं तो बस…”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “देवी, भक्त को मत डराइए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैं इसे क्यों डराऊँगी? मैं तो बस पूछ रही हूँ।”

     

    माधव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “माता, मुझे पहली बार देखकर ऐसा लग रहा है कि आप दोनों के बीच भी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक होती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नोक-झोंक?”

     

    पार्वती जी तुरंत बोलीं,

     

    “हाँ, और इसमें गलत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराकर बोले,

     

    “कुछ भी गलत नहीं।”

     

    माधव ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “लेकिन माता, आप तो महादेव को डाँट रही थीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “बेटा, जिसे हम अपना मानते हैं, उसकी चिंता भी तो करते हैं।”

     

    माधव चुप हो गया।

     

    तभी महादेव बोले,

     

    “और कभी-कभी देवी को चिंता ज्यादा हो जाती है।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी ओर देखा।

     

    “ज्यादा?”

     

    महादेव समझ गए कि बात फिर बिगड़ सकती है।

     

    “मेरा मतलब था… आपकी चिंता बिल्कुल सही है।”

     

    माधव फिर मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “देखा माधव? बात बदलने में इन्हें कितना समय नहीं लगता।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, भक्त के सामने मेरी शिकायतें मत कीजिए।”

     

    “क्यों? भक्त को भी तो पता चले कि महादेव कितने लापरवाह हैं।”

     

    माधव हँसने लगा।

     

    महादेव ने उसे देखा।

     

    “तुम भी मेरी बात सुनकर हँस रहे हो?”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “प्रभु, क्षमा कीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “नहीं माधव, हँसो। आज कैलाश पर बहुत दिनों बाद इतनी खुलकर हँसी आई है।”

     

    माता पार्वती भी मुस्कुरा उठीं।

     

    कुछ देर बाद माधव ने अपनी समस्या बताई।

     

    “माता, प्रभु, मेरे गाँव में इस साल फसल खराब हो गई है। घर में बूढ़ी माँ हैं। मैं बहुत परेशान होकर आपके पास आया हूँ। मैं धन नहीं माँगता। बस इतना चाहता हूँ कि मेरी माँ भूखी न रहे।”

     

    महादेव ने उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारी माँ की सेवा ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूजा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “और याद रखना, किसी की मदद करने के लिए हमेशा धन की जरूरत नहीं होती। मेहनत और सच्चे मन से किया काम भी बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन माता, मेरे पास तो…”

     

    महादेव ने उसे रोकते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पास मेहनत करने की शक्ति है।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “क्या इससे मेरी समस्या हल हो जाएगी?”

     

    महादेव बोले,

     

    “रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन अगर मन सच्चा हो तो रास्ता मिलता जरूर है।”

     

    तभी पार्वती जी ने महादेव की ओर देखा।

     

    “और आप इसे कोई मदद नहीं करेंगे?”

     

    महादेव बोले,

     

    “मैं इसे आशीर्वाद दे चुका हूँ।”

     

    “सिर्फ आशीर्वाद?”

     

    “देवी…”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मेरा मतलब है, इसे ऐसा विश्वास दीजिए कि यह अपने गाँव जाकर हार न माने।”

     

    महादेव ने माधव की ओर देखा।

     

    “तुम्हें मेरी बात याद रखनी होगी। अपने गाँव लौटो। अपनी माँ की सेवा करो। खेत में फिर मेहनत करो। गाँव के दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करो। जो तुम्हारे पास है, उसे छोटा मत समझो।”

     

    माधव की आँखों में उम्मीद लौट आई।

     

    “प्रभु, मैं ऐसा ही करूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “और हाँ, अपनी माँ को कभी अकेला मत समझने देना।”

     

    “जी माता।”

     

    माधव ने दोनों को प्रणाम किया।

     

    फिर उसने धीरे से पूछा,

     

    “माता, एक बात पूछूँ?”

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप दोनों हमेशा ऐसे ही एक-दूसरे से नोक-झोंक करते हैं?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    पार्वती जी ने भी हँसते हुए कहा,

     

    “हाँ।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “फिर कभी नाराज़गी ज्यादा नहीं बढ़ती?”

     

    महादेव बोले,

     

    “जहाँ प्रेम हो, वहाँ नाराज़गी टिकती नहीं।”

     

    पार्वती जी ने उनकी ओर देखकर कहा,

     

    “लेकिन कभी-कभी इन्हें मनाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “और कभी-कभी देवी को मनाने में पूरा कैलाश भी कम पड़ जाता है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    नंदी भी खुशी से सिर हिलाने लगे।

     

    माधव ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “आज मैं यहाँ एक समस्या लेकर आया था, लेकिन वापस एक सीख लेकर जा रहा हूँ।”

     

    महादेव ने पूछा,

     

    “क्या सीख?”

     

    माधव बोला,

     

    “कि भगवान से प्रेम करने का मतलब सिर्फ उनसे माँगना नहीं है। और परिवार में छोटी-सी नोक-झोंक हो जाए तो उसे मन में नहीं रखना चाहिए।”

     

    माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा,

     

    “तुमने बिल्कुल सही समझा।”

     

    माधव वापस जाने लगा।

     

    महादेव ने उसे आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ माधव। तुम्हारा मन मजबूत रहे।”

     

    पार्वती जी ने भी कहा,

     

    “और अपनी माँ का ध्यान रखना।”

     

    माधव मुस्कुराते हुए कैलाश से नीचे उतर गया।

     

    उसके जाने के बाद महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा।

     

    “देवी, अब तो आप प्रसन्न हैं?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ।”

     

    “तो क्या अब मैं ध्यान कर सकता हूँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “पहले भोजन कीजिए।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मैं भूल ही गया था।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मुझे पता था।”

     

    नंदी फिर मुस्कुरा दिए।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम फिर हँस रहे हो?”

     

    और इस बार पूरा कैलाश जैसे उनकी हँसी से गूँज उठा।

     

    क्योंकि महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक में भी प्रेम था, और उस दिन एक भक्त ने सीख लिया था कि सच्चा परिवार वही है जहाँ नाराज़गी के बाद भी अपनापन कभी कम नहीं होता।

  • मां पार्वती की नाराज़गी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    ❤️ रूठी पार्वती और भोले महादेव

     

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सब कुछ शांत था। महादेव अपने स्थान पर बैठे ध्यान कर रहे थे और नंदी पास ही बैठे थे। गणेश जी भी अपने काम में लगे हुए थे। तभी माता पार्वती वहाँ आईं। उनके चेहरे पर हल्की नाराज़गी थी।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और उन्हें देखते ही बोले,

    “आइए देवी।”

     

    पार्वती जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह चुपचाप पास से निकल गईं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, देवी हमसे नाराज़ हैं क्या?”

     

    नंदी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    महादेव ने कुछ सोचा और फिर बोले,

    “लेकिन क्यों?”

     

    नंदी के पास इसका जवाब नहीं था।

     

    थोड़ी देर बाद महादेव ने पार्वती जी को फिर देखा। वह कैलाश के एक कोने में बैठी थीं और फूलों की माला बना रही थीं।

     

    महादेव उनके पास गए।

     

    “देवी।”

     

    पार्वती जी चुप रहीं।

     

    “आप मुझसे बात नहीं करेंगी?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव उनके सामने बैठ गए।

     

    “क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”

     

    पार्वती जी ने धीरे से कहा,

    “आपको नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने मुँह फेर लिया।

     

    “यही तो बात है।”

     

    महादेव थोड़ा उलझ गए।

     

    “क्या बात?”

     

    “आपको कुछ पता ही नहीं चलता।”

     

    महादेव शांत बैठे रहे।

     

    “देवी, आप बता देंगी तो मुझे पता चल जाएगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अगर हर बात मुझे ही बतानी पड़े तो फिर आपको खुद समझने की जरूरत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराने लगे।

     

    “आप सही कह रही हैं।”

     

    “अब मुस्कुराइए मत।”

     

    महादेव ने तुरंत अपनी मुस्कान रोक ली।

     

    “ठीक है।”

     

    पार्वती जी फिर फूलों की माला बनाने लगीं।

     

    महादेव कुछ देर उनके पास बैठे रहे। फिर उठकर चले गए।

     

    नंदी ने सोचा कि शायद महादेव अब समझ गए होंगे।

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद महादेव वापस आए।

     

    उनके हाथ में एक सुंदर फूल था।

     

    उन्होंने फूल पार्वती जी की तरफ बढ़ाया।

     

    “देवी, यह आपके लिए।”

     

    पार्वती जी ने फूल देखा।

     

    “फूल देने से गलती खत्म नहीं होगी।”

     

    “तो गलती क्या है?”

     

    पार्वती जी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको सच में नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने गहरी साँस ली।

     

    “कल मैंने आपसे कहा था कि आज मेरे साथ कुछ समय बिताइए।”

     

    महादेव बोले,

    “हाँ।”

     

    “और आपने क्या कहा था?”

     

    महादेव सोचने लगे।

     

    “मैंने कहा था कि बाद में।”

     

    “और वह ‘बाद में’ कब आया?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “पूरा दिन बीत गया और आपको याद ही नहीं आया।”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “देवी, मैं ध्यान में था।”

     

    “मुझे पता है। आप हमेशा ध्यान में रहते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “मैंने सोचा था कि आप समझ जाएँगी।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “और मैं सोच रही थी कि आप समझेंगे।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर महादेव बोले,

    “तो हम दोनों ही एक-दूसरे के समझने का इंतजार करते रहे।”

     

    पार्वती जी का चेहरा थोड़ा नरम हुआ।

     

    “शायद।”

     

    महादेव उनके पास बैठ गए।

     

    “देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “इतनी आसानी से नहीं।”

     

    “तो क्या करना होगा?”

     

    “आपको खुद पता लगाना होगा।”

     

    महादेव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोले,

    “ठीक है। आज पूरा दिन मैं आपके साथ रहूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    “ध्यान नहीं करेंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “किसी और काम के लिए नहीं जाएंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “नंदी के साथ भी नहीं जाएंगे?”

     

    दूर खड़े नंदी ने यह सुनते ही अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “नंदी भी हमारे साथ रहेगा।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन तभी महादेव बोले,

    “लेकिन एक बात है।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर आप नाराज़ न होतीं तो मुझे यह सब करने का मौका भी नहीं मिलता।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “मतलब अब गलती मेरी?”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “नहीं, नहीं। मैंने ऐसा नहीं कहा।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना, कभी-कभी अपनी बातों में खुद ही फँस जाते हैं।”

     

    महादेव भी मुस्कुराने लगे।

     

    तभी गणेश जी वहाँ आए।

     

    उन्होंने दोनों को साथ बैठे देखा तो बोले,

    “माता, अब आपका गुस्सा खत्म हो गया?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अभी थोड़ा बाकी है।”

     

    महादेव ने गणेश जी की तरफ देखा।

     

    “पुत्र, तुम मेरी सहायता करोगे?”

     

    गणेश जी हँसकर बोले,

    “पिता, इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूँगा। माता के सामने आपकी कोई नहीं चलती।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    महादेव ने गणेश जी से कहा,

    “तुम भी अपनी माता का पक्ष ले रहे हो?”

     

    गणेश जी बोले,

    “पिता, मैं तो सच का पक्ष ले रहा हूँ।”

     

    “और सच क्या है?”

     

    “यह कि माता आपसे नाराज़ हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “यह तो मुझे भी पता है।”

     

    कुछ देर बाद सभी कैलाश के पास बैठे थे। पार्वती जी फूलों की माला बना रही थीं और महादेव उनके लिए फूल चुनकर ला रहे थे।

     

    एक फूल लाकर महादेव ने पूछा,

    “यह अच्छा है?”

     

    पार्वती जी ने देखा।

     

    “हाँ।”

     

    महादेव दूसरा फूल लाए।

     

    “और यह?”

     

    “यह भी अच्छा है।”

     

    महादेव तीसरा फूल लाए।

     

    पार्वती जी ने हँसकर कहा,

    “महादेव, आपको फूल चुनना नहीं आता।”

     

    “तो आप ही चुन लीजिए।”

     

    “नहीं। आज आप चुनेंगे।”

     

    महादेव एक-एक करके फूल लाते रहे।

     

    कुछ देर बाद पार्वती जी ने कहा,

    “अब समझे कि मुझे कल कैसा लगा था?”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हाँ देवी।”

     

    “क्या समझे?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “कभी-कभी जिसे हम बहुत प्रेम करते हैं, उसे हमारी चीजों की नहीं, बस हमारे समय की जरूरत होती है।”

     

    पार्वती जी की आँखों में हल्की चमक आ गई।

     

    “और?”

     

    महादेव बोले,

    “और यह कि प्रेम में बड़ी-बड़ी चीजें जरूरी नहीं होतीं। साथ बैठना भी काफी होता है।”

     

    पार्वती जी मुस्कुरा दीं।

     

    “अब आप समझे।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हाँ देवी।”

     

    पार्वती जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन एक बात याद रखिएगा।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर अगली बार फिर मुझे यूँ इंतजार करवाया…”

     

    महादेव ने तुरंत पूछा,

    “तो?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “तो मैं आपसे तीन दिन तक बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “तीन दिन?”

     

    गणेश जी हँसने लगे।

     

    नंदी भी खुशी से अपनी पूँछ हिलाने लगे।

     

    महादेव ने कहा,

    “देवी, एक दिन की नाराज़गी ही मेरे लिए बहुत थी। तीन दिन का दंड मत दीजिए।”

     

    पार्वती जी हँसते हुए बोलीं,

    “तो फिर मुझे इंतजार मत करवाइए।”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखकर कहा,

    “वचन है।”

     

    फिर दोनों साथ बैठ गए।

     

    कैलाश की हवा धीरे-धीरे चल रही थी। आसपास शांति थी। महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा और मुस्कुराए।

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “अब क्या देख रहे हैं?”

     

    महादेव बोले,

    “सोच रहा हूँ कि आज अगर आप रूठती नहींं, तो मुझे यह याद कैसे रहता कि आपके साथ बिताया हुआ एक छोटा-सा पल भी मेरे लिए कितना खास है।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

    “और मुझे यह याद रहेगा कि मेरे भोले महादेव को कभी-कभी बात समझाने के लिए थोड़ा रूठना भी पड़ता है।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    और इस तरह कैलाश पर हुई छोटी-सी नाराज़गी फिर से मुस्कान में बदल गई।

     

    क्योंकि जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ रूठना भी रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं होता—बल्कि एक-दूसरे को थोड़ा और समझने के लिए होता है।

  • नन्हे कान्हा की बाल लीलाएं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ कान्हा और यशोदा मैया की रंगोली

     

    वृंदावन में सुबह होते ही हर तरफ चहल-पहल शुरू हो गई थी। गोपियाँ अपने घरों के बाहर आँगन साफ कर रही थीं। कोई फूलों की माला बना रही थी तो कोई घर के दरवाजे पर सुंदर रंगोली सजा रही थी।

     

    उस दिन नंद भवन के पास रहने वाली गोपी राधिका ने अपने आँगन में बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी। उसने कई रंगों से फूल, पत्तियाँ और बीच में एक बड़ा सा मोर बनाया था।

     

    राधिका रंगोली पूरी करके पीछे हटी और खुशी से बोली—

     

    “आज तो मेरी रंगोली सबसे सुंदर लग रही है।”

     

    पास खड़ी दूसरी गोपी ने कहा—

     

    “सच में बहुत सुंदर है। बस इसे कान्हा से बचाकर रखना।”

     

    राधिका का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे हाँ! कान्हा ने देख लिया तो मेरी सारी मेहनत खराब कर देगा।”

     

    उधर थोड़ी दूरी पर खड़े कान्हा अपने दोस्तों के साथ यह बात सुन रहे थे।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “तुमने सुना?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो कह रही है कि मैं उसकी रंगोली खराब कर दूँगा।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने आँखों में शरारत भरकर कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारे चेहरे से तो लग रहा है कि जरूर कुछ करोगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद राधिका घर के अंदर चली गई।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उसके आँगन के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने रंगोली को देखा।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    उनके दोस्त भी पास आ गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे मत छूना। बहुत मेहनत से बनाई है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं खराब थोड़ी करूँगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी सी उंगली रंग के पास ले जाकर रोक ली।

     

    फिर अचानक उन्होंने रंगोली के बीच एक छोटा सा बांसुरी का निशान बना दिया।

     

    दोस्तों ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी रोक ली।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब ये मेरी भी हो गई।”

     

    तभी राधिका बाहर आ गई।

     

    उसने रंगोली देखी।

     

    पहले तो वह चौंकी।

     

    फिर कान्हा को देखकर बोली—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा भागने लगे।

     

    राधिका उनके पीछे दौड़ी।

     

    “रुको! आज तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “मैंने रंगोली खराब नहीं की। मैंने तो उसमें बांसुरी बनाई है।”

     

    “तुमने मेरी पूरी रंगोली में अपनी बांसुरी क्यों बना दी?”

     

    “क्योंकि तुमने मोर बनाया था। मोर को भी तो बांसुरी सुननी चाहिए।”

     

    राधिका कुछ बोल नहीं पाई।

     

    पास खड़े बच्चे हँसने लगे।

     

    राधिका ने कहा—

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर गुस्सा मत करो।”

     

    राधिका ने हाथ में थोड़ा रंग लिया और कान्हा के गाल पर लगा दिया।

     

    “अब बराबर!”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने भी रंग उठाया और राधिका के गाल पर लगा दिया।

     

    अब बाकी बच्चे भी रंग लगाने लगे।

     

    कुछ ही पल में पूरा आँगन रंगों से भर गया।

     

    राधिका की सुंदर रंगोली जरूर खराब हो गई थी, लेकिन आँगन में बच्चों की हँसी गूँज रही थी।

     

    तभी वहाँ यशोदा मैया आ गईं।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सब बच्चे एकदम शांत हो गए।

     

    यशोदा ने रंगोली की तरफ देखा।

     

    फिर कान्हा की तरफ।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तो ये रंग तुम्हारे गाल पर कैसे आया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “राधिका ने लगाया।”

     

    राधिका तुरंत बोली—

     

    “पहले कान्हा ने लगाया था!”

     

    यशोदा मुस्कुराने लगीं।

     

    उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़ा।

     

    “चलो मेरे साथ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “घर।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारे कपड़े देखे हैं?”

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    उनका पूरा कुर्ता रंगों से भर गया था।

     

    वह हँसने लगे।

     

    “मैया, आज तो मैं बहुत सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, बिल्कुल रंगों की पोटली जैसे।”

     

    कान्हा हँसते हुए उनके साथ चल दिए।

     

    घर पहुँचकर यशोदा ने उन्हें पानी से साफ किया।

     

    कान्हा बार-बार पानी से बचने की कोशिश करते।

     

    “मैया, ठंडा पानी है!”

     

    “चुपचाप बैठो।”

     

    “मैया, आँख में चला गया।”

     

    “आँखें बंद कर लो।”

     

    “मैया, कान में चला गया।”

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    उन्होंने कान्हा के बाल साफ किए और कपड़े बदलाए।

     

    फिर उन्हें पास बैठाकर बोलीं—

     

    “कान्हा, किसी की मेहनत खराब नहीं करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझसे गलती हो गई।”

     

    “अगर तुम्हें रंगोली पसंद आई थी तो तुम राधिका से पूछ सकते थे।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं उससे माफी माँगूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस यही बात अच्छी है।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा वापस राधिका के घर पहुँचे।

     

    राधिका नई रंगोली बना रही थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “राधिका।”

     

    राधिका ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    राधिका मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

     

    राधिका ने सोचा।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन इस बार रंगोली खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं करूँगा।”

     

    दोनों मिलकर रंगोली बनाने लगे।

     

    कान्हा ने फूलों के लिए पीला रंग दिया।

     

    राधिका ने नीला रंग लगाया।

     

    कुछ देर बाद रंगोली पहले से भी सुंदर बन गई।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अब ये सच में सुंदर है।”

     

    राधिका बोली—

     

    “क्योंकि इस बार तुमने इसे बिगाड़ा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी उनके दोस्त आ गए।

     

    एक बोला—

     

    “कान्हा, चलो! नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम लोग जाओ, मैं अभी आता हूँ।”

     

    दोस्तों के जाते ही राधिका ने पूछा—

     

    “तुम्हें इतनी शरारत करने की जरूरत क्यों पड़ती है?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि जब सब हँसते हैं ना, तो मुझे अच्छा लगता है।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शरारत से किसी को दुख भी हो सकता है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अब ध्यान रखूँगा।”

     

    शाम को यशोदा ने कान्हा को बुलाया।

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज मैंने रंगोली बनाई।”

     

    “खराब तो नहीं की?”

     

    “नहीं मैया। इस बार मैंने बनवाई है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “सच?”

     

    कान्हा ने गर्व से सिर हिलाया।

     

    “हाँ। और राधिका ने मुझे माफ भी कर दिया।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरा कान्हा बड़ा हो रहा है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “नहीं मैया, मैं बड़ा नहीं होना चाहता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बड़ा हो गया तो आप मुझे गोद में नहीं उठाओगी।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “तुम चाहे कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए हमेशा मेरे नन्हे कान्हा ही रहोगे।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डाल दिया।

     

    बाहर शाम की हवा चल रही थी और वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा के दोस्तों ने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    कान्हा ने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, जाऊँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जाओ, लेकिन आज कोई नई शरारत मत करना।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैं कोशिश करूँगा।”

     

    और यह कहते ही वह दौड़ते हुए बाहर निकल गए।

     

    यशोदा उन्हें जाते हुए देखती रहीं और मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “ये ‘कोशिश’ कह रहा है… मतलब आज फिर कोई शरारत होने वाली है।”

     

    और सच में, अगले दिन कान्हा की शरारत वृंदावन की रंगोली से निकलकर यमुना किनारे तक पहुँचने वाली थी।

     

  • नन्हा कान्हा और यशोदा मैया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यशोदा मैया की छुपी हुई मटकी

     

    वृंदावन में उस दिन सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। कहीं मटकी में दही जम रहा था तो कहीं मक्खन निकाला जा रहा था। नंद भवन में भी यशोदा मैया सुबह से काम में लगी हुई थीं।

     

    यशोदा मैया को अब अपने कान्हा की माखन चोरी की आदत अच्छी तरह पता चल चुकी थी।

     

    इसलिए उन्होंने आज एक नई योजना बनाई।

     

    उन्होंने खूब सारा ताजा माखन निकाला और उसे एक बड़ी मटकी में भर दिया। फिर उस मटकी को घर के ऐसे कमरे में रख दिया जहाँ कान्हा की नजर आसानी से न पहुँच सके।

     

    यशोदा ने मन ही मन कहा—

     

    “आज देखती हूँ मेरा नटखट कान्हा माखन कैसे ढूँढ़ता है।”

     

    उन्हें क्या पता था कि कान्हा को रोकना इतना आसान नहीं था।

     

    उसी समय कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में खेल रहे थे।

     

    एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला—

     

    “कान्हा! आज मैया ने माखन कहीं छिपा दिया है।”

     

    कान्हा ने खेलना छोड़ दिया।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैंने देखा है। मैया मटकी लेकर अंदर गई थीं।”

     

    कान्हा ने आँखें सिकोड़कर कहा—

     

    “तो आज माखन ढूँढ़ने का खेल खेलेंगे।”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन अगर यशोदा मैया ने पकड़ लिया तो?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “पकड़ लिया तो कह देंगे हम तो छुपन-छुपाई खेल रहे थे।”

     

    सब बच्चे धीरे-धीरे घर के अंदर जाने लगे।

     

    कान्हा सबसे आगे थे।

     

    उन्होंने पहले रसोई में देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    फिर उन्होंने अनाज वाले कमरे में देखा।

     

    वहाँ भी कुछ नहीं मिला।

     

    फिर एक छोटे कमरे में गए।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “यहाँ भी नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कहीं मैया ने मटकी बाहर तो नहीं रख दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। माखन घर के अंदर ही है। मुझे इसकी खुशबू आ रही है।”

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    तभी उन्हें एक बंद दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    एक दोस्त डरते हुए बोला—

     

    “कान्हा, इसे मत खोलो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “माखन यहीं है।”

     

    उन्होंने दरवाजा खटखटाया।

     

    अंदर से कोई आवाज नहीं आई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “तुम सब पीछे हटो।”

     

    फिर उन्होंने धीरे से दरवाजे की कुंडी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    कान्हा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    एक कोने में बड़ी सी मटकी रखी थी।

     

    कान्हा के चेहरे पर चमक आ गई।

     

    “मिल गया!”

     

    सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।

     

    कान्हा मटकी के पास गए।

     

    उन्होंने ढक्कन हटाया।

     

    ताजा सफेद माखन देखकर उनकी आँखें चमकने लगीं।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, जल्दी करो। मैया आ जाएँगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पहले सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने हाथ से माखन निकाला और दोस्तों को देने लगे।

     

    तभी बाहर से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    सभी बच्चों के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कान्हा ने जल्दी से कहा—

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    कोई परदे के पीछे छिप गया।

     

    कोई संदूक के पीछे।

     

    कान्हा खुद मटकी के पीछे बैठ गए।

     

    यशोदा कमरे के पास पहुँचीं।

     

    उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।

     

    वह समझ गईं कि उनकी योजना पकड़ ली गई है।

     

    उन्होंने अंदर जाकर कहा—

     

    “कान्हा, बाहर आ जाओ।”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं हो।”

     

    फिर भी चुप्पी।

     

    यशोदा ने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “अच्छा, अगर कान्हा नहीं निकले तो मैं ये माखन किसी और को दे दूँगी।”

     

    मटकी के पीछे से तुरंत आवाज आई—

     

    “नहीं!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा धीरे-धीरे बाहर निकले।

     

    उनके हाथ और गाल माखन से भरे थे।

     

    यशोदा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।

     

    “तो तुम यहाँ माखन ढूँढ़ रहे थे?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “जी मैया।”

     

    “मैंने माखन छिपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी तुमने ढूँढ़ लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैया, आप माखन छिपा सकती हो, लेकिन उसकी खुशबू नहीं।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “और ये सारे बच्चे?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे बाहर आ गए।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, गलती हमारी नहीं थी। कान्हा हमें लेकर आए थे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “अरे! दोस्ती में सबकी गलती बराबर होती है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब दोस्ती भी याद आ रही है?”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी उठाई।

     

    “ठीक है। आज मैं तुम्हें माखन दूँगी।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “पहले तुम मेरे लिए एक काम करोगे।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    “आँगन में जो मटके पड़े हैं, उन्हें सही जगह रखना होगा।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “माखन कितना मिलेगा?”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “काम के हिसाब से।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “चलो, काम करते हैं।”

     

    बच्चे मटके उठाने लगे।

     

    कुछ ही देर में आँगन साफ हो गया।

     

    यशोदा ने देखा तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

     

    उन्होंने सब बच्चों को माखन और मिश्री दी।

     

    कान्हा ने अपना हिस्सा लिया और आधा अपने दोस्तों को दे दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम अपना माखन भी बाँट देते हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अकेले खाने में क्या मजा है?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “लेकिन ये बात मैया को मत बताना।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मैंने सुन लिया है।”

     

    सभी बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    शाम को जब नंद बाबा घर लौटे तो उन्होंने देखा कि आँगन बहुत साफ था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज माखन चुराया भी और घर का काम भी किया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “क्यों बेटा, आज क्या कारनामा किया?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “कुछ नहीं बाबा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “मटकी ढूँढ़ निकाली।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “वाह! तुम्हारी नाक तो बहुत तेज है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, माखन की खुशबू मुझे दूर से बुलाती है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    रात को कान्हा यशोदा की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

     

    यशोदा उनके बाल सहला रही थीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम इतना माखन क्यों खाते हो?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि माखन मीठा होता है।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और माँ का प्यार?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वो माखन से भी ज्यादा मीठा है।”

     

    यशोदा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को सीने से लगा लिया।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन सोने से पहले उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “कल माखन कहाँ छिपाओगी?”

     

    यशोदा ने हँसते हुए कहा—

     

    “अब तो मैं तुम्हारे सामने ही रखूँगी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर कल चोरी करने में मजा नहीं आएगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारी शरारतें भी ना!”

     

    कान्हा हँसते हुए माँ से लिपट गए।

     

    उस रात नंद भवन में शांति थी।

     

    लेकिन यशोदा जानती थीं कि अगले दिन उनका नन्हा कान्हा फिर कोई नई शरारत करने वाला है।

     

    और इस बार उसकी शरारत सिर्फ माखन की मटकी तक सीमित नहीं रहने वाली थी।

  • नन्हे कान्हा ओर माखन की मटकी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    नन्हे कान्हा और माखन की मटकी

     

    वृंदावन में सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ बज रही थीं और गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। लेकिन नंद भवन में आज यशोदा मैया कुछ ज्यादा ही परेशान थीं।

     

    उन्होंने सुबह-सुबह माखन की मटकी खोली तो उसमें माखन बहुत कम था।

     

    यशोदा ने हैरानी से मटकी देखी।

     

    “कल तो मैंने पूरी मटकी भरी थी। इतनी जल्दी माखन खत्म कैसे हो गया?”

     

    उन्होंने घर में काम करने वाली गोपी से पूछा—

     

    “तुमने माखन निकाला था?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया। मैंने तो मटकी को हाथ तक नहीं लगाया।”

     

    यशोदा कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    तभी उन्हें बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    उन्होंने धीरे से दरवाजे के पास जाकर देखा।

     

    आँगन में कान्हा अपने दोस्तों के साथ बैठे थे। सभी बच्चे कुछ खाने में व्यस्त थे।

     

    यशोदा ने ध्यान से देखा।

     

    कान्हा के हाथ में माखन था।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत माखन पीछे कर लिया।

     

    “जी मैया?”

     

    “इधर आओ।”

     

    कान्हा धीरे-धीरे उनके पास आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हारे हाथ में क्या है?”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “अच्छा? हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने धीरे से हाथ आगे किया।

     

    उसमें सफेद माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “ये क्या है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “माखन।”

     

    “और ये तुम्हारे हाथ में कैसे आया?”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, मैं तो बस देख रहा था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”

     

    यशोदा हँसते-हँसते बोलीं—

     

    “माखन देखकर हाथ में कैसे आ गया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “वो… हाथ खुद चला गया।”

     

    पास खड़े ग्वाल-बाल हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कान्हा तुरंत भाग गए।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कान्हा आँगन के एक कोने से दूसरे कोने तक भागने लगे।

     

    यशोदा उनके पीछे दौड़ती रहीं।

     

    आखिर कान्हा एक बड़े घड़े के पीछे छिप गए।

     

    यशोदा ने जानबूझकर कहा—

     

    “लगता है मेरा कान्हा कहीं चला गया।”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    यशोदा दूसरी तरफ जाने लगीं।

     

    कान्हा धीरे से बाहर निकले।

     

    जैसे ही उन्होंने भागने के लिए कदम बढ़ाया, यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “अब बताओ, माखन किसने खाया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने नहीं खाया।”

     

    “तो?”

     

    “मेरे दोस्तों ने खाया।”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा ने ही हमें बुलाया था।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी शिकायत कर दी?”

     

    बच्चा हँसने लगा।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “कान्हा, अगर तुम्हें माखन चाहिए तो मुझसे माँग लिया करो। चोरी क्यों करते हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “माँगने पर तो आप थोड़ा देती हो। मटकी में बहुत सारा होता है।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, तो अब मटकी खाली कर दोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    अगले दिन यशोदा ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर रख दी।

     

    उन्होंने सोचा कि अब कान्हा वहाँ तक नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन कान्हा ने मटकी देखी तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “आज मटकी बहुत ऊपर है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो आज माखन नहीं मिलेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्यों नहीं मिलेगा? बस तरीका बदलना पड़ेगा।”

     

    उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर खड़ा किया।

     

    सबसे ऊपर कान्हा चढ़ गए।

     

    कान्हा ने मटकी पकड़ ली।

     

    “देखा! मैंने कहा था ना, माखन मिलेगा।”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “लेकिन मैया पकड़ लेंगी।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “पहले माखन तो निकालो।”

     

    मटकी नीचे उतारी गई।

     

    कान्हा ने उसे खोला।

     

    माखन की खुशबू फैल गई।

     

    सभी बच्चे खुशी से झूम उठे।

     

    कान्हा ने माखन बाँटा।

     

    किसी को थोड़ा मिला, किसी को ज्यादा।

     

    तभी एक बंदर भी वहाँ आ गया।

     

    कान्हा ने उसे भी माखन दे दिया।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम बंदर को क्यों दे रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “उसे भी भूख लगी है।”

     

    बंदर माखन लेकर पेड़ पर चढ़ गया।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने सब देख लिया था।

     

    “कान्हा!”

     

    बच्चे भाग गए।

     

    कान्हा वहीं खड़े रह गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “फिर माखन चोरी?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मैया…”

     

    “आज तो तुम्हें सजा मिलेगी।”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कैसी सजा?”

     

    “आज तुम्हें मेरे साथ बैठकर पूरा माखन खाना होगा।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हें लगा मैं तुम्हें सच में सजा दूँगी?”

     

    कान्हा दौड़कर उनकी गोद में बैठ गए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी सामने रख दी।

     

    कान्हा ने पहला निवाला लिया और फिर अपनी माँ को खिलाया।

     

    “पहले आप।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि माखन आपने बनाया है।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    उस दिन शाम को कई गोपियाँ फिर शिकायत लेकर आईं।

     

    एक बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कान्हा हमारे घर की मटकी भी खाली कर गया।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और मेरे घर तो बंदरों को भी बुला लाया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की ओर देखा।

     

    कान्हा धीरे से मुस्कुराए।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लेकिन सच कहूँ तो जब से कान्हा हमारे घर आने लगा है, घर में रौनक हो गई है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “पहले हम माखन बनाकर रखती थीं, अब बनाते ही सोचती हैं कि कान्हा कब आएगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    कान्हा गोपियों की तरफ देखकर बोले—

     

    “तो कल से मैं सबके घर आऊँगा।”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ बोलीं—

     

    “नहीं!”

     

    पूरा आँगन हँसी से भर गया।

     

    कान्हा भी खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “मेरे नटखट कान्हा, तुम्हारी शरारतों से पूरा वृंदावन परेशान भी है और खुश भी।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डालकर कहा—

     

    “मैया, मैं शरारत नहीं करता। मैं तो सबको खुश करता हूँ।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    और सच ही तो था।

     

    कान्हा की माखन चोरी सिर्फ माखन की चोरी नहीं थी। उनके बहाने हर घर में हँसी पहुँचती थी, हर आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी और हर गोपी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    इसीलिए वृंदावन में जब भी कोई माखन की खाली मटकी देखता, तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहता—

     

    “लगता है कान्हा यहाँ होकर गए हैं।”

     

     

    . नन्हे कान्हा और खोया हुआ बछड़ा

     

    एक सुबह नंद बाबा ने कान्हा से कहा—

     

    “कान्हा, आज तुम अपने दोस्तों के साथ बछड़ों को चराने ले जाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच बाबा?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना। कोई बछड़ा झुंड से अलग नहीं होना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ बछड़ों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते में बच्चे खेलते रहे।

     

    कोई पेड़ से फल तोड़ता, कोई फूल इकट्ठा करता और कान्हा कभी बांसुरी बजाते तो कभी बछड़ों के साथ दौड़ते।

     

    जंगल के पास पहुँचकर उन्होंने बछड़ों को हरी घास वाले मैदान में छोड़ दिया।

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाने लगे।

     

    सभी बछड़े उनकी आवाज सुनकर शांत हो गए।

     

    कुछ देर बाद एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, चलो नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पहले बछड़ों को देख लो।”

     

    सभी बच्चों ने बछड़ों को गिना।

     

    एक कम था।

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “एक बछड़ा कहाँ गया?”

     

    सब बच्चे परेशान हो गए।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    लेकिन बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद जंगल की तरफ चला गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो, उसे ढूँढ़ते हैं।”

     

    सब बच्चे अलग-अलग दिशा में फैल गए।

     

    कान्हा ने बछड़े को आवाज दी—

     

    “आ जा… आ जा…”

     

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    तभी उन्हें झाड़ियों के पीछे से हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “कान्हा, इधर!”

     

    कान्हा दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक छोटा बछड़ा झाड़ियों में फँसा हुआ था।

     

    उसका पैर एक बेल में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठ गए।

     

    “डर मत। मैं तुम्हें निकालता हूँ।”

     

    उन्होंने बेल को सावधानी से हटाया।

     

    बछड़ा आजाद हो गया।

     

    लेकिन वह बहुत डरा हुआ था।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “अब ठीक है।”

     

    बछड़ा कान्हा के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो, इसे वापस झुंड में ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, बछड़ा एक दिशा में देखने लगा।

     

    कान्हा समझ गए कि शायद उसकी माँ उसी तरफ होगी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ को ढूँढ़ना होगा।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम ज्यादा दूर गए तो बाबा चिंता करेंगे।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम जल्दी वापस आ जाएँगे।”

     

    वे बछड़े के पीछे चल पड़े।

     

    काफी देर तक जंगल में घूमने के बाद उन्हें घंटियों की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “सुनो!”

     

    सबने ध्यान लगाया।

     

    घंटियों की आवाज लगातार आ रही थी।

     

    वे उसी दिशा में दौड़े।

     

    वहाँ गायों का एक बड़ा झुंड था।

     

    बछड़े ने अपनी माँ को देखते ही आवाज लगाई और दौड़कर उसके पास चला गया।

     

    गाय ने अपने बछड़े को प्यार से चाटा।

     

    कान्हा यह देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब इसे यहीं छोड़ दें?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। इसे अपनी माँ के साथ वापस ले चलेंगे।”

     

    वे दोनों को लेकर वापस लौटने लगे।

     

    जब वे मैदान में पहुँचे तो बाकी बछड़े भी उनके पास आ गए।

     

    लेकिन शाम होने तक कान्हा घर नहीं लौटे थे।

     

    यशोदा मैया चिंतित हो गईं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से पूछा—

     

    “कान्हा अभी तक क्यों नहीं आया?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद बच्चों के साथ खेल रहा होगा।”

     

    लेकिन थोड़ी देर बाद बच्चे वापस आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कान्हा कहाँ है?”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा एक बछड़े को उसकी माँ तक पहुँचाने गए थे।”

     

    यशोदा की चिंता और बढ़ गई।

     

    “कहाँ गए हैं?”

     

    “बस आते होंगे।”

     

    कुछ देर बाद दूर से कान्हा दिखाई दिए।

     

    उनके कपड़े मिट्टी से भरे थे।

     

    बालों में पत्ते लगे थे और कंधे पर बांसुरी लटकी हुई थी।

     

    यशोदा दौड़कर उनके पास पहुँचीं।

     

    “कहाँ चले गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, एक बछड़ा खो गया था।”

     

    “तो तुम अकेले इतनी दूर चले गए?”

     

    “मैं अकेला नहीं था। मेरे दोस्त भी थे।”

     

    यशोदा ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान थी?”

     

    कान्हा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माफ कर दो मैया। अगली बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा का गुस्सा तुरंत गायब हो गया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “बस अपना ध्यान रखा करो।”

  • मजबूरी में बनी नाचने वाली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मजबूरी में नचनिया बनी राधा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा कस्बा था, जहाँ लोग एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। उसी कस्बे के किनारे एक पुराने से घर में राधा अपनी माँ और छोटे भाई मोहन के साथ रहती थी।

     

    राधा को बचपन से नृत्य का बहुत शौक था। जब भी मंदिर में भजन होता या किसी शादी में ढोलक बजती, उसके पैर अपने आप थिरकने लगते। उसकी माँ अक्सर मुस्कुराकर कहतीं—

     

    “बेटी, तेरे पैरों में तो जैसे घुंघरू बंधे हैं।”

     

    राधा हँसकर कहती—

     

    “माँ, एक दिन मैं बहुत बड़ा मंच ढूँढ़ूँगी और वहाँ नाचूँगी।”

     

    लेकिन राधा की जिंदगी में सपनों से ज्यादा मजबूरियाँ थीं।

     

    उसके पिता पहले मजदूरी करते थे। एक दुर्घटना के बाद उनका काम छूट गया। घर की थोड़ी-सी बचत इलाज में खत्म हो गई। कुछ ही समय बाद पिता चल बसे।

     

    घर की सारी जिम्मेदारी माँ पर आ गई।

     

    माँ दूसरों के घरों में काम करने लगीं, लेकिन इतनी कम कमाई में घर चलाना मुश्किल था। ऊपर से मोहन की पढ़ाई और माँ की दवाइयों का खर्च अलग था।

     

    राधा ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।

     

    माँ ने बहुत रोका।

     

    “तू पढ़ ले बेटी। तेरे पिता का सपना था कि तू खूब पढ़े।”

     

    राधा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “माँ, पहले घर संभालना जरूरी है। पढ़ाई बाद में कर लूँगी।”

     

    एक दिन कस्बे में एक कार्यक्रम हुआ। वहाँ नृत्य करने वाली लड़कियों की जरूरत थी। राधा की पड़ोसन ने उसे बताया।

     

    “राधा, तू तो अच्छा नाचती है। वहाँ काम मिल जाएगा। कुछ पैसे भी मिलेंगे।”

     

    राधा पहले झिझकी।

     

    “लेकिन मैं ऐसे कार्यक्रमों में कभी नहीं गई।”

     

    पड़ोसन ने कहा—

     

    “नाचना ही तो है। अगर इससे घर चल सकता है तो बुरा क्या है?”

     

    राधा अपनी माँ की दवाइयों को देखकर चुप हो गई।

     

    उसने कार्यक्रम में जाने का फैसला कर लिया।

     

    उस रात उसने पहली बार मंच पर नृत्य किया।

     

    लोगों ने तालियाँ बजाईं।

     

    उसे पैसे मिले।

     

    घर लौटकर उसने पैसे माँ के हाथ में रख दिए।

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “बेटी, तूने आज मेरा बोझ हल्का कर दिया।”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मोहन की फीस समय पर जाएगी।”

     

    धीरे-धीरे राधा को अलग-अलग कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा।

     

    लोग उसे “नचनिया” कहने लगे।

     

    शुरुआत में राधा को यह शब्द बुरा लगता था।

     

    कई लोग उसके काम को सम्मान की नजर से नहीं देखते थे।

     

    एक दिन बाजार में किसी ने उसे देखकर अपने साथी से कहा—

     

    “देखो, यही है वो नचनिया।”

     

    राधा ने सुन लिया।

     

    उसके कदम रुक गए।

     

    घर लौटकर वह देर तक चुप बैठी रही।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राधा बोली—

     

    “माँ, क्या मैं गलत काम कर रही हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बेटी। मेहनत करके घर चलाना गलत नहीं होता। गलत तो लोगों की सोच है, जो बिना किसी की मजबूरी जाने फैसला कर देती है।”

     

    राधा ने माँ की बात दिल में रख ली।

     

    लेकिन कुछ समय बाद हालात और मुश्किल हो गए।

     

    जिस कार्यक्रम में वह काम करती थी, वहाँ आयोजक ने उससे कहा—

     

    “अब तुम्हें ज्यादा कार्यक्रम करने होंगे। तभी ज्यादा पैसे मिलेंगे।”

     

    राधा ने कहा—

     

    “मैं जितना काम कर सकती हूँ, करूँगी। लेकिन अपनी मर्यादा के खिलाफ कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उसने साफ मना कर दिया।

     

    आयोजक नाराज हो गया।

     

    “फिर तुम्हें काम नहीं मिलेगा।”

     

    राधा ने शांत होकर जवाब दिया—

     

    “काम जाएगा तो दूसरा ढूँढ़ लूँगी। लेकिन अपने सम्मान से समझौता नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन उसे काम नहीं मिला।

     

    घर की हालत फिर खराब होने लगी।

     

    लेकिन राधा ने हार नहीं मानी।

     

    उसने अपने नृत्य को सिर्फ मजबूरी नहीं, अपनी कला बनाने का फैसला किया।

     

    उसने पुराने गुरुजी से संपर्क किया, जो कभी मंदिर में बच्चों को नृत्य सिखाते थे।

     

    “गुरुजी, क्या आप मुझे फिर से सिखाएँगे?”

     

    गुरुजी ने पूछा—

     

    “तुम्हें नृत्य सीखना है या सिर्फ पैसे कमाने हैं?”

     

    राधा ने कहा—

     

    “अब मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे मेरी मजबूरी से नहीं, मेरी कला से पहचानें।”

     

    गुरुजी मुस्कुराए।

     

    “तो कल से आ जाना।”

     

    राधा ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    सुबह घर का काम।

     

    दोपहर में छोटे कार्यक्रम।

     

    शाम को नृत्य की कक्षा।

     

    रात को माँ और भाई की देखभाल।

     

    कुछ महीनों बाद राधा की कला में बहुत सुधार आया।

     

    एक दिन शहर में एक बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम होने वाला था। गुरुजी ने राधा का नाम वहाँ भेज दिया।

     

    राधा का चयन हो गया।

     

    कार्यक्रम वाले दिन वह मंच के पीछे खड़ी थी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “डर क्यों रही हो?”

     

    राधा बोली—

     

    “आज पहली बार लग रहा है कि मैं अपनी मजबूरी के लिए नहीं, अपने सपने के लिए मंच पर जा रही हूँ।”

     

    गुरुजी ने कहा—

     

    “यही फर्क तुम्हें आगे ले जाएगा।”

     

    राधा मंच पर पहुँची।

     

    संगीत शुरू हुआ।

     

    उसने नृत्य करना शुरू किया।

     

    इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

     

    उसके हर कदम में उसकी कहानी थी—पिता की याद, माँ की मेहनत, भाई की पढ़ाई, लोगों के ताने और उसके अपने सपने।

     

    पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

     

    कार्यक्रम के बाद एक बड़ी संस्था ने उसे अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “हम चाहते हैं कि आप बच्चों को नृत्य सिखाएँ।”

     

    राधा कुछ पल चुप रही।

     

    “क्या मैं भी बच्चों को सिखा सकती हूँ?”

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्यों नहीं?”

     

    उस दिन राधा की जिंदगी बदल गई।

     

    अब वह सिर्फ कार्यक्रमों में नाचने वाली लड़की नहीं थी।

     

    वह एक नृत्य शिक्षिका थी।

     

    उसने अपने कस्बे में गरीब बच्चों के लिए एक छोटी-सी नृत्य कक्षा शुरू की।

     

    एक दिन वही पड़ोसन, जिसने उसे पहली बार कार्यक्रम में भेजा था, उससे मिलने आई।

     

    उसने कहा—

     

    “राधा, मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “मैंने बस इतना सीखा है कि मजबूरी इंसान को रास्ता दिखा सकती है, लेकिन मंजिल उसे खुद चुननी पड़ती है।”

     

    कुछ समय बाद राधा ने अपने भाई मोहन की पढ़ाई पूरी करवाई।

     

    माँ की दवाइयाँ भी नियमित चलने लगीं।

     

    एक शाम माँ ने राधा को घुंघरू बाँधते हुए देखा।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “याद है, बचपन में मैं कहती थी तेरे पैरों में घुंघरू बंधे हैं?”

     

    राधा हँस पड़ी।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तब मुझे नहीं पता था कि यही घुंघरू एक दिन हमारे घर की उम्मीद बनेंगे।”

     

    राधा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने माँ को गले लगा लिया।

     

    अब जब कोई उसे “नचनिया” कहता, तो वह बुरा नहीं मानती थी।

     

    वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “हाँ, मैं नृत्य करती हूँ। क्योंकि नृत्य मेरी कला है, मेरी मेहनत है और मेरे सपनों का रास्ता है।”

     

    राधा ने अपनी मजबूरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

     

    उसने उसे अपनी ताकत बना लिया।

     

    और उसकी कहानी ने पूरे कस्बे को एक बात सिखा दी—

     

    किसी इंसान के काम को देखकर उसके चरित्र या उसकी मजबूरी का फैसला नहीं करना चाहिए। हर मेहनत के पीछे एक कहानी होती है, और हर इंसान सम्मान का हकदार होता है।

     

     

  • ज़िंदगी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 2

     

    आरव घर पहुँचा तो उसकी माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं।

     

    उसे देखते ही माँ ने पूछा—

     

    “बेटा, खाना खाएगा?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कुछ नहीं पूछा।

     

    वह समझ गई थीं कि आज उनका बेटा पहले से थोड़ा बेहतर है।

     

    रात को खाना खाने के बाद आरव अपनी माँ के पास बैठ गया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “माँ, क्या आपको कभी लगा कि मैं नाकाम हो गया हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कभी नहीं।”

     

    “लेकिन मैं तो बार-बार हार रहा हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हारने वाला इंसान वह नहीं होता जो कोशिश करके असफल हो जाए। हारने वाला वह होता है जो अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ दे।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे बहुत डर लगता है माँ।”

     

    “किस बात से?”

     

    “इस बात से कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “भविष्य की चिंता में आज की जिंदगी मत खो देना।”

     

    ये बात आरव के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन वह फिर उसी पार्क में गया।

     

    वही बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वापस आ गया।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “मुझे उम्मीद थी।”

     

    आरव उनके पास बैठ गया।

     

    “मैंने फैसला किया है कि मैं फिर कोशिश करूँगा। लेकिन इस बार सिर्फ एक परीक्षा के भरोसे नहीं बैठूँगा। मैं कोई काम भी सीखूँगा।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अब तुम सही रास्ते पर हो।”

     

    आरव ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की।

     

    सुबह पढ़ाई करता, दोपहर में एक दुकान पर काम सीखता और शाम को अपने दोस्त रोहित से मिलता।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।

     

    समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।

     

    पैसे अभी भी कम थे।

     

    परीक्षा का डर अभी भी था।

     

    लेकिन अब आरव हर समस्या को अपनी पूरी जिंदगी नहीं समझता था।

     

    एक दिन रोहित ने पूछा—

     

    “तुझे याद है कुछ महीने पहले तू कितना परेशान था?”

     

    आरव हँसते हुए बोला—

     

    “हाँ। लगता था मेरी जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “और अब?”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “अब लगता है कि जिंदगी में बहुत कुछ बाकी है।”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने अपनी मेहनत से एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया। उसे शुरुआत में बहुत कम पैसे मिले।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    उसने नई चीजें सीखीं, गलतियाँ कीं और फिर उन्हें सुधारा।

     

    एक साल बाद उसकी आमदनी इतनी हो गई कि वह घर के खर्च में माँ की मदद करने लगा।

     

    पिता भी धीरे-धीरे अपना काम शुरू करने लगे।

     

    आरव की छोटी बहन की पढ़ाई जारी रही।

     

    एक शाम आरव उसी पार्क में बैठा था।

     

    वही बुजुर्ग उसके पास आए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “अब भी लगता है कि जिंदगी बेकार है?”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “नहीं। अब तो लगता है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “यही समझ सबसे जरूरी है।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “अगर उस दिन मैं आपसे नहीं मिला होता तो शायद मैं अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता।”

     

    बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—

     

    “इसलिए हमेशा याद रखना, जब मन बहुत भारी हो जाए तो अकेले मत रहना। अपने परिवार, दोस्त, शिक्षक या किसी भरोसेमंद बड़े इंसान से बात करना। मदद माँगना कमजोरी नहीं है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि मुश्किल समय में सबसे जरूरी चीज समाधान नहीं, बल्कि साथ और बातचीत भी होती है।

     

    कुछ दिनों बाद आरव ने अपने मोहल्ले के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की कक्षा शुरू की।

     

    वह उन्हें पढ़ाने लगा।

     

    एक दिन एक बच्चा उससे बोला—

     

    “भैया, मैं गणित में बहुत कमजोर हूँ। मुझसे नहीं होगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “ऐसा मत बोलो। अभी नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि कभी नहीं आएगा।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “अगर मैं फेल हो गया तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो फिर से कोशिश करेंगे। एक नतीजा तुम्हारी पूरी जिंदगी तय नहीं करता।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    आरव ने उसे देखकर सोचा—

     

    “काश मैंने ये बात खुद को भी उस समय समझाई होती।”

     

    समय बीतता गया।

     

    आरव ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी।

     

    उसके पहले पन्ने पर आज भी वही लाइन लिखी थी—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    उसने उसके नीचे एक नई लाइन जोड़ दी—

     

    “और रास्ता कितना भी मुश्किल हो, मैं अपनी जिंदगी को बेकार नहीं जाने दूँगा।”

     

    उस दिन आरव ने अपनी कहानी बच्चों को सुनाई।

     

    उसने कहा—

     

    “जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल। कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारे खिलाफ हो जाती हैं। लेकिन इन सबका मतलब ये नहीं कि हमारी जिंदगी की कीमत कम हो गई।”

     

    बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत ज्यादा परेशान हो, तो अकेले मत रहना। किसी भरोसेमंद इंसान से बात करना। अपने मन की बात कहना। मदद माँगना। एक मुश्किल दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत बनने देना।”

     

    पार्क की वही बेंच दूर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे याद आया कि कभी वह उसी बेंच पर बैठकर सोचता था कि उसकी जिंदगी में कुछ नहीं बचा।

     

    आज उसे पता था—

     

    बहुत कुछ बचा था।

     

    सपने बाकी थे।

     

    परिवार बाकी था।

     

    दोस्त बाकी थे।

     

    नई शुरुआत बाकी थी।

     

    और सबसे जरूरी—

     

    जिंदगी बाकी थी।

     

    इसलिए जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, खुद को अकेला मत समझो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करो, मदद लो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो।

     

    क्योंकि जिंदगी में बुरे दिन आ सकते हैं, लेकिन वे हमेशा नहीं रहते।

     

    जिंदगी सच में अनमोल है। इसे किसी एक हार, एक गलती या एक बुरे दौर के नाम मत कर दो।

     

    कहानी समाप्त।

  • जिंदगी अनमोल है

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 1

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का एक लड़का रहता था। आरव पढ़ाई में अच्छा था और बचपन से ही उसके बहुत सारे सपने थे। वह चाहता था कि एक दिन अपने माता-पिता के लिए एक अच्छा घर बनाएगा, अपनी छोटी बहन की पढ़ाई पूरी करवाएगा और अपनी पसंद का काम करके अपने पैरों पर खड़ा होगा।

     

    लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी जिंदगी में परेशानियाँ बढ़ती चली गईं।

     

    पिता की नौकरी चली गई।

     

    घर की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी।

     

    माँ घर चलाने के लिए सिलाई करने लगीं और आरव भी पढ़ाई के साथ छोटा-मोटा काम करने लगा।

     

    शुरुआत में आरव हर मुश्किल का सामना हँसकर करता था।

     

    वह अपनी माँ से कहता—

     

    “माँ, चिंता मत करो। ये समय भी निकल जाएगा।”

     

    माँ उसके सिर पर हाथ रखकर कहतीं—

     

    “मुझे अपने बेटे पर भरोसा है।”

     

    लेकिन कुछ महीनों बाद आरव की जिंदगी में एक और परेशानी आ गई।

     

    जिस प्रतियोगी परीक्षा की वह तैयारी कर रहा था, उसमें वह असफल हो गया।

     

    उसके कई दोस्त सफल हो गए थे।

     

    सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें देखकर आरव को लगता कि सबकी जिंदगी आगे बढ़ रही है और सिर्फ वही पीछे रह गया है।

     

    एक दिन उसका दोस्त रोहित उससे मिलने आया।

     

    “आरव, चल कहीं बाहर चलते हैं।”

     

    आरव ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

     

    “मेरा मन नहीं है।”

     

    “तू कई दिनों से घर से बाहर नहीं निकला।”

     

    “तो क्या करूँ?”

     

    रोहित चुप हो गया।

     

    आरव अचानक गुस्से में बोला—

     

    “तुम लोगों को क्या पता मेरी हालत का? सबको लगता है कि बस मेहनत करो और सफलता मिल जाएगी। लेकिन अगर बार-बार हार मिले तो?”

     

    रोहित ने धीरे से कहा—

     

    “हार मिलने का मतलब ये नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारे लिए बोलना आसान है।”

     

    रोहित ने बहस नहीं की।

     

    वह जाते-जाते बस इतना कह गया—

     

    “जब भी बात करनी हो, मुझे फोन करना। मैं सुनूँगा।”

     

    लेकिन आरव ने फोन नहीं किया।

     

    वह अपने कमरे में बंद रहने लगा।

     

    उसे अपने अंदर की परेशानियाँ किसी से कहना मुश्किल लगता था।

     

    माँ कई बार उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक देतीं।

     

    “बेटा, खाना रख दूँ?”

     

    अंदर से जवाब आता—

     

    “भूख नहीं है।”

     

    “थोड़ा सा खा ले।”

     

    “माँ, बाद में।”

     

    माँ दरवाजे के बाहर कुछ देर खड़ी रहतीं और फिर चुपचाप चली जातीं।

     

    एक रात आरव अपनी पुरानी डायरी खोलकर बैठा।

     

    उसमें बचपन के सपने लिखे थे।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    आरव उस लाइन को देर तक देखता रहा।

     

    उसे अपने बचपन का चेहरा याद आया।

     

    वह बच्चा जो छोटी-सी चीज मिलने पर भी खुश हो जाता था।

     

    जिसे पतंग उड़ाने में खुशी मिलती थी।

     

    जो बारिश में भीगने के लिए माँ से डाँट खाता था।

     

    आरव की आँखें नम हो गईं।

     

    “मैं इतना बदल कैसे गया?”

     

    लेकिन उसके मन का बोझ अभी भी कम नहीं हुआ।

     

    अगले दिन वह बिना किसी को बताए घर से बाहर निकल गया।

     

    वह शहर के पुराने पार्क में जाकर एक बेंच पर बैठ गया।

     

    वहाँ एक बुजुर्ग आदमी रोज की तरह बैठे अखबार पढ़ रहे थे।

     

    उन्होंने आरव को कई दिनों से वहाँ बैठे देखा था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “बेटा, परेशान लग रहे हो।”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बुजुर्ग ने अखबार मोड़कर रख दिया।

     

    “अगर बात नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं। मैं बस इतना कहूँगा कि परेशानी को अकेले उठाना बहुत भारी पड़ता है।”

     

    आरव ने पहली बार उनकी तरफ देखा।

     

    “अगर जिंदगी में कुछ भी सही न हो रहा हो तो क्या करना चाहिए?”

     

    बुजुर्ग ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक दिन का फैसला पूरे जीवन के लिए मत करना।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    बुजुर्ग बोले—

     

    “मुश्किल समय में दिमाग हमें बताता है कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन सच ये होता है कि मुश्किल समय सिर्फ एक हिस्सा होता है, पूरी जिंदगी नहीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन अगर इंसान बार-बार हारता रहे तो?”

     

    “तो अगली बार अलग तरीके से कोशिश करनी चाहिए।”

     

    “और अगर हिम्मत ही न बचे?”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “तो किसी ऐसे इंसान के पास बैठो जो तुम्हें संभाल सके। हिम्मत हमेशा अकेले पैदा नहीं करनी पड़ती। कभी-कभी दूसरे लोग हमारी हिम्मत बन जाते हैं।”

     

    आरव उनकी बातें सुनता रहा।

     

    तभी उसका फोन बजा।

     

    माँ का फोन था।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    “हाँ माँ?”

     

    माँ ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “बेटा, तू ठीक है ना?”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    माँ ने फिर पूछा—

     

    “कहाँ है?”

     

    “पार्क में।”

     

    “घर आ जा बेटा। मैं इंतजार कर रही हूँ।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “माँ, मैं घर आ रहा हूँ।”

     

    फोन कट गया।

     

    वह उठने लगा।

     

    तभी उसकी नजर पार्क में खेल रहे कुछ बच्चों पर पड़ी।

     

    एक बच्चा गिर गया था।

     

    वह रोया, फिर उसके दोस्त ने हाथ बढ़ाया।

     

    “उठ, फिर से खेलते हैं।”

     

    बच्चा उठ गया।

     

    आरव कुछ देर उन्हें देखता रहा।

     

    उसे लगा जैसे जिंदगी भी यही कह रही हो—

     

    “गिर गए हो तो उठो। खेल अभी खत्म नहीं हुआ।”

     

    वह घर की ओर चल पड़ा।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि घर पहुँचने के बाद उसे अपनी जिंदगी का एक ऐसा सच पता चलने वाला था, जो उसकी सोच पूरी तरह बदल देगा।